Adhik mass ki Katha | अधिक मास की कथा

 Adhik mass ki Katha | अधिक मास की कथा 

पहले अध्याय की कथा 

2 दूसरे अध्याय की कथा 

3 तीसरे अध्याय की कथा 

4 चौथे अध्याय की कथा 

5 पांचवे अध्याय की कथा 

6 छठे अध्याय की कथा 

7 सातवें अध्याय की कथा 

8 आठवें अध्याय की कथा 

9 नौवें अध्याय की कथा 

10 दसवें अध्याय की कथा 

11 ग्यारहवे अध्याय की कथा 

12 बारह वे अध्याय की कथा 

13 तेरह वे अध्याय की कथा 

14 चौदहवें अध्याय की कथा 

15 पंद्रहवें अध्याय की कथा 

16 सोलहवें अध्याय की कथा 

17 सत्रहवी अध्याय की कथा 

18 अठारहवें अध्याय की कथा 

19 उन्नीसवे अध्याय की कथा 

20 बीसवें अध्याय की कथा 

21 21वे अध्याय की कथा 

22 22वे अध्याय की कथा 

23 23 वे अध्याय की कथा 

24  24वे अध्याय की कथा 

25  25वे अध्याय की कथा 

26 26वे अध्याय की कथा 

27 27वे अध्याय की कथा 

28 28वे अध्याय की कथा 

29 29 वे अध्याय की कथा 

30 30वे अध्याय की कथा 

31 31वे अध्याय की कथा 

Adhik mass ki Katha 31 adhyaya| अधिक मास की कथा 31वा अध्याय

 Adhik mass ki Katha 31 adhyaya| अधिक मास की कथा 31वा अध्याय 

॥ अथ एकत्रिंशत्तमोऽध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री गणधिपतये नमः ॥
(३१)
श्री भगवान नारायण नारदजी से सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं। हे ऋषियों इसके पहले कथा प्रसंग में जब उस वानर की मृगतोर्थ कुंड में पांचदिन जल में रहने के बाद मृत्यु हो गई और वानर के शरीर को त्याग जीवात्मा ने चतुर्भुजी दिव्य स्वरूप अलंकार आभूषणों से युक्त भगवान के जैसा उसका स्वरूप हो गया और उसने आकाश मार्ग से एक दिव्य विमान जिसपर भेरी मृदंग के वाद्य बज रहे थे देवांगनाएं नृत्य कर रही थी। सुवर्ण रत्न और मोतियों की झालर से सुशोभित चंद्र के समान कांतिवाला जिसपर भगवान पुरुषोत्तम के पार्षद बैठे हुए ऐसे विमान को अपने पास आकर रुकते हुए देखा तो उस दिव्य देह धारी वानर व कर्दयु की जीवात्मा अत्यंत विस्मय चकित हो सोचने लगी वह विमान यहाँ क्यों आया मुझ पापी को यह सौभाग्य कहां प्राप्त हो सकता है। अभी तो मुझे अनेक नरकों की यातना यमराज की आज्ञा से भोगनी पड़ेगी। विमान का सुख तो किसी बड़े महान पुण्यात्मा को ही प्राप्त हो सकता है।
इस प्रकार विचार कर रहा था वह जीवात्मा। तभी विमान से भगवान के पार्षद व देवांगनाएं उतरकर उस जीवात्मा के सामने नृत्य करने लगी और एक देवांगना ने उसी जीवात्मा को कभी न सूखने वाले सुगंधित पुष्पों की माला पहना दी और एक ने सोने की झारी में गंगाजल लेकर उसके सामने रख दिया और एकने रत्नों से जड़ित सोने के पानदान में ताबुल (पान का बीड़ा) सहित सामने लेकर खड़ी रही इन सब दृश्यों को देखकर वह जीवात्मा अत्यंत भयभीत होकर चित्र के समान खड़ी रह गई। और मन में सोचने लगी। मेरे जैसे दुष्ट और पापी को यह सौभाग्य कहां से प्राप्त होगा। मेरे द्वारा कोई भी पुण्य घटित नहीं हुआ। जिससे मुझे यह सुख प्राप्त हो सके। तभी पार्षद गण जीवात्मा के पास आकर उसको नमस्कार करके हांथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं।
(१२४)
भोगना बाकी है। मेरे समझ में नहीं आ रहा कि मुझ से ऐसा कौन सा पुण्य घटित हुआ कि मेरे समस्त पाप नष्ट होकर यह सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। अरे यमदूतों मैं जानता हूँ कि कितनी बूंद गिरती है। पृथ्वी पर जितनी घास उत्पन्न होती है। उससे भी ज्यादा मेरे द्वारा किए गए पाप हैं। इतने पर भी मेरा यह दिव्य चतुर्भुजी स्वरूप यह विमान और मेरा यह सम्मान विमान पर बैठकर गोलोक चलने का आग्रह मेरे कुछ समझ में नहीं आ रहा कृपा करके मुझे सब समझाकर बताओं कि क्यों ऐसा घटित हो रहा है। जीवात्मा के शब्दों को सुनकर एक पार्षद (देवदूत) ने कहा है स्वामी मैं आपको बताता हूँ। यह जो महीना व्यतीत हुआ सभी महीनों में श्रेष्ठ और थोड़ा भी कर्म करने पर अनंत पुण्यदायक होता है। यह मास भगवान पुरुषोत्तम का मास कहा जाता है जो सभी देवताओं के स्वामी हैं। इस मास में घटित पुण्य प्रत्यक्ष फल देने वाला होता है।
आपसे इस मास मेंकठिन तपस्या घटित हुई है। जो कि मानव शरीर के द्वारा भी नहीं हो पाती। आपने वानर शरीर से मुख में फोड़ेहोने से निराहार रहकर इस मास को व्यतीत करने से संपूर्ण मास के व्रत का पुण्य प्राप्त किया। व जातीय चंचलता के कारण अनेक वृक्षों के फलों को तोड़कर कष्ट के कारण स्वयं न खाकर फेंक दिया जिससे अनेक जीवों पर परोपकार का पुण्य प्राप्त किया। नीचे गिरे फलों को अनेक वन्य पशुओं ने खाकर तृप्त होने से पुण्य प्राप्त किया। मुख की पीड़ा जल तक नहीं पीने से निराहार और जल रहित उपवास का पुण्य प्राप्त किया। मृगतीर्थ कुंड में पानी के भीतर ठंडक व हवा का प्रकोप सहते हुए, अंतिम पांचदिन त्रिकाल स्नान का पुण्य प्राप्त किया। यद्यपि आप से मुख में व्रण होने से अज्ञानावस्था में और जातीय चंचलता के कारण यह सब घटित हुआ है। फिर भी आपको समस्त पुण्य की उपलब्धि का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यही इस मास की विशेषता है किसी भी प्रकार से कैसी भी अवस्था में थोड़ा भी कर्म महान पुण्यदायक होता है।
जो लोग इसके माहात्म्य को जानते हुए नियम व्रत धारण करते हुए कर्म करते हैं, उनको कितना पुण्य घटित होता है इसका वर्णन चार मुखवाले ब्रह्माजी भी कहने में असमर्थ हैं। पुरुषोत्तम मास में यदि कोई एक भी व्रत कर लेवे तो उसके जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। वे लोग बड़े भाग्यशाली हैं जिन्होंने मानवशरीर धारण करके अधिक मास में स्नान व्रत जप दान आदि शुभकर्म करके व्यतीत किया। तथा जो मानवशरीर धारण करके अधिक मास व्यर्थ ही बिता देते हैं वे मूखों को धिक्कार है। देवदूतों के ऐसे शब्दों को सुनकर कर्दयु की जीवात्मा आश्चर्य चकित हो गई। फिर उसने मृगतीर्थ कुंड...
(१२५)
और कालिंजर पर्वत को नमस्कार करके उस दिव्य विमान की प्रदक्षिणा करके देवदूतों के साथ विमान पर बैठकर गोलोक की ओर प्रस्थान किया जब विमान देवलोक से जा रहा था तब इंद्र आदि देवताओं ने विमान पर फूलों की वर्षा की।
वायु की गति से उड़ता हुआ विमान स्वर्ग आदि लोकों के ऊपर से होता हुआ गोलोक को पहुंचा वहां भी पार्षदों द्वारा उस जीवात्मा का स्वागत हुआ फिर देवदूत उस स्थान में पहुंचे जहां गोलोकाधिपति भगवान पुरुषोत्तम रत्न जड़ित सिंहासन पर विराजमान थे वहां पहुंचकर जीवात्मा ने भगवान पुरुषोत्तम को साष्टांग नमस्कार करके वह दिव्यज्योति भगवान के प्रकाश में लीन अर्थात चौरासी लक्ष योनियों में भ्रमण से रहित होकर मोक्ष को प्राप्त हो गई। हे नारद वह ब्राह्मण कर्दयु नीच पापी होकर भी भगवान पुरुषोत्तम के अधिकमास के पुण्य प्रभाव से उत्तम गति अर्थात मोक्ष को प्राप्त हो गया। इतना महान और अक्षय पुण्य को देनेवाला मोक्ष की सद्गति को देनेवाला अधिक मास का पुण्य सर्वश्रेष्ठ है।
सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं, हे ऋषियों भगवान नारायण के द्वारा संपूर्ण मास के माहात्म्य को सुनकर आनंद विभोर होकर बारंबार भगवान को नमस्कार करके भगवान पुरुषोत्तम का नाम स्मरण करते हुए नारदजी सत्यलोक को चले गए। हे ऋषियों आपके द्वारा किए गए प्रश्नों का उत्तर भगवान नारायण और देवर्षि संवाद के रूप में आपको सुनाया अधिक मास के समान पुण्यदाता संसार में कोई कर्म नहीं है और भगवान पुरुषोत्तम के समान मोक्ष दाता और कोई देवता नहीं है। इसलिये मानव शरीर धारण करने पर जीवात्मा को सद्गति (मोक्ष) प्राप्त करने के लिये अधिक मास में अपनी शक्ती और श्रद्धा के अनुसार कर्म अवश्य करना चाहिए क्योंकि जीवात्मा चौरासी लक्ष योनि भ्रमण करने के बाद मानव योनि प्राप्त करता है। यदि मनुष्य योनि में अपने उद्धार के निमित्त शुभकर्म नहीं किया तो माया मोह स्त्री पुत्र धन के जंजाल में फंसकर जीवन व्यतीत कर दिया तो मृत्यु के उपरांत कर्मों के द्वारा नरक की यातना और चौरासी लक्ष योनि में बारबार पैदा होना और मृत्यु होना इसी चक्कर में (घटी यंत्र) घड़ी के कांटों के अनुसार अनेक कल्पों तक जीवात्मा दुःख भोगते रहेगी। इसलिये सबसे सरल मोक्ष प्राप्ति का साधन पुरुषोत्तम मास में भगवान पुरुषोत्तम की सेवा आराधना ही सर्वश्रेष्ठ और सतत साधना है। अधिक मास में इसकी कथा तथा माहात्म्य का श्रवण करके अंत में कथावाचक ब्राह्मण की पूजा करके वस्त्र, अन्न दक्षिणा का दान करते हैं। इससे भी भगवान पुरुषोत्तम की प्रसन्नता कृपा प्राप्त होती है। इस प्रकार इस कथा को सूतजी ने शौनकादि ऋषियों को सुनाया और महर्षि वेद-व्यास ने अपने...
(१२६)
श्रोतागणों को सुनाया।
(उसी संस्कृत भाषा का अनुवाद करके प्रांतीय भाषा मराठी (लवणी) भाषा में भृगुकुल में उत्पन्न रेणुका जमदग्नि से उत्तर कोंकण (महाराष्ट्र) में सह्याद्रि पर्वत की तलहटी में प्रसिद्ध राजा पुर नामक ग्राम में धूतपापेश्वर नामक शिवलिंग और मंदिर है उस मंदिर के पुजारी धगवे कुल में उत्पन्न श्री सदाशिव, उनके पुत्र श्री विट्ठल, उनके पुत्र श्री रघुनाथ शास्त्री तर्कशास्त्र और व्याकरण शास्त्र के विद्वान श्री परशुराम शास्त्री ने श्री मातापिता के चरणों का आशीर्वाद और भगवान शंकर की कृपा से प्रांतीय मराठी (लवणी) भाषा में अनुवाद किया यह शुभ कार्य शके अठारह सौ अठत्तर दुर्मुखनाम संवत्सर वैशाख शुक्ल १५ पूर्णिमा सोमवार को परिपूर्ण हुआ। इसी प्रकार भगवान पुरुषोत्तम की महान भक्त प्रत्येक अधिक मास में स्नान व्रत अखंडदीप नित्य इसकी कथा और श्री मदभागवत का श्रवण करते हुए, संपूर्ण मास श्रद्धापूर्वक व्यतीत करके अमावस को उद्यापन का विधान हवनादि कर्म यथा शक्ति दान करते हुए, उत्तर पूजन ब्राह्मण भोजन दक्षिणा आदि कर्म श्रद्धापूर्वक समस्त कर्म संपन्न करने वाली धर्म के प्रति महान रूचि रखने वाली स्व. श्री मन्शीलाल साहु की पत्नि भ. श्री. श्री केशर बाई की अथक आग्रह और इच्छा से इनके कुल पुरोहित उपमन्यु गोत्र में उत्पन्न पं. रजनीकिशोर अवस्थी के ज्येष्ठ पुत्र पं. मधुसूदन अवस्थी ने आज संवत २०५० शके १९१५ वैशाख शुक्ल १५ पूर्णिमा गुरुवार तदनुसार ता. ६ मई सन १९९३ को इस ग्रंथ को मराठी (कोंकणी) भाषा का हिंदी में अनुवाद परिपूर्ण किया।)
इस महान पुण्य कार्य में समस्त जनसमुदाय को इसका लाभ प्राप्त हो भगवान पुरुषोत्तम के प्रति श्रद्धा जागृत करके अपनी आत्मा को मोक्ष की सद्गति प्राप्त करें। कभी भी नष्ट होनेवाला पंचभौतिक शरीर और हमेशा चलायमान होने वाली लक्ष्मी जब दोनों का समागम मनुष्य के जीवन में हो तभी इन दोनों के प्रति मोहत्याग कर मनुष्य कुछ पुण्यकर्म कर सकता है। ऋषियों और महापुरुषों के इन्हीं सद्वाक्यों की प्रेरणा से जागृत होकर चौधरी परिवार में उत्पन्न (श्री केशर बाई की द्वितिय कन्या कमलाबाई व स्व. श्री बलराम चौधरी के पुत्र) श्री सतीश चौधरी ने इसे हिन्दी में अनुवादित ग्रंथ को छपाने का सर्वपुर्ण प्रयास किया।)
॥ शुभमंगल मस्तु ॥





Adhik mass ki Katha 30 adhyaya| अधिक मास की कथा 30 वा अध्याय

 Adhik mass ki Katha 30 adhyaya| अधिक मास की कथा 30 वा अध्याय 


॥ अथ त्रिंशत्तमोऽध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
श्री भगवान नारायणजी से और सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं हे ऋषियों! इसके पहले के अध्याय में जब कदर्यु की जीवात्मा को यम के दूत रस्सों से बांधकर मुद्गरों से पीटते हुए ले जा रहे थे और वह जीवात्मा अपने कर्मों पर पश्चात्ताप कर रहा था। इस प्रकार उस को यमराज के सामने खड़ा किया यमराज ने चित्रगुप्त से पूछा हे चित्रगुप्त! इस जीवात्मा के पाप आदि कर्मों का निवेदन करो। यमराज की आज्ञा को सुनकर चित्रगुप्त ने कहा हे प्रभु! यह जीवात्मा पापी कदर्यु की है। वह जाति से ब्राह्मण था परन्तु इसके कर्म नीच थे यह धन का अत्यंत लोभी इसने चोरी की और मित्र से विश्वासघात किया। बगीचे में रहकर अनेक जीवों की हिंसा की फलों की चोरी की और धन को संचय करके जमीन में गाड़कर रखा। धन के लोभ में अपने परिवार का पालन पोषण नहीं करके उनका त्याग किया और भी अनेक प्रकार के पाप किए हैं। कदर्यु के जीवन का वृत्तांत चित्रगुप्त के द्वारा सुनकर यमराज अत्यंत क्रोधित होकर कहते हैं। इसको फल की चोरी के अपराध में वानर की योनि दी जाय और विश्वास घात व अनेक पाप कर्मों के लिये इसको प्रेत योनि दी जाय और अनेक प्रकार से नरक की यातना भी दी जाय यमराज की आज्ञा को चित्रगुप्त ने सुनकर दूतों को आज्ञा दी की प्रथम इसको प्रेत योनि में डाल दो दूतों ने कदर्यु की जीवात्मा को भयंकर जंगल में ले जाकर प्रेतयोनि में डाल दी वह भयंकर प्रेत हो गया वहां उसको न खाने की कोई वस्तु न पीने का जल प्राप्त हो तथा वह भूख प्यास से तड़पता हुआ रातदिन घूमता रहता था। अनेक वर्षों तक प्रेत योनि का दुःख भोगने के पश्चात फलों की चोरी के अपराध से वानर योनि प्राप्त हुई। वानर की योनि में उसका कालिंजर पर्वत पर जन्म हुआ। कालिंजर पर्वत अत्यंत सुंदर स्थान है वहां बड़े बड़े फलों के वृक्षों की शीतल छाया रहती है। मधुर और मीठे फल बहुतायत से वृक्षों में लगे रहते हैं। वह अत्यंत पवित्र स्थान माना जाता है। वहां पाप नाशक कुंड है। जो कि सरोवर के समान बड़ा और शुद्ध जल से परिपूर्ण रहता है। वह स्थान मृगतीर्थ के नाम से शास्त्रों में प्रसिद्ध है। वहां पितरों के प्रति श्राद्ध पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष देने वाला सिद्ध होता है। इंद्रकेद्वारा निर्मित वह कुंड मृगतीर्थ समस्त पापों का नाशक है। जब कोई महाबली दैत्य देवताओं पर विजय प्राप्त कर लेता है, तो देवतालोग भयभीत होकर इसी कालिंजर पर्वत पर मृग का स्वरूप धारण करके छिपे रहते हैं और उसी कुंड का जल पीते हैं। इसीलिये उसकुंड का नाम मृगतीर्थ प्रसिद्ध हुआ। जब भगवान के द्वारा महाबलि राक्षस का वध हो जाता है, तब इंद्र इत्यादि देवता उसी मृगकुंड में स्नान करके निष्पाप होकर अपने देवता स्वरूप को धारण करके देव लोक को चले जाते हैं।
भगवान नारायण के वचनों को सुनकर नारदजी ने शंका प्रगट की, हे महाप्रभु कदर्यु तो महापापी था फिर उसको ऐसे पवित्र स्थान पर वानर की योनि क्यों प्राप्त हुई। इसका कारण बताकर मुझे शंका से मुक्त करें। देवर्षि नारद की वाणी को सुनकर भगवान आनंदित होकर कहते हैं। हे नारद जिस नगर में कदर्यु रहता था उसी नगर में चित्रकुंडल नाम का एक धनवान वैश्य रहता था। उसकी स्त्री का नाम तारा का था। वे दोनों पति पत्नि भगवान के भक्त और बड़े दानी थे। जब भी अधिकमास आता बड़ी श्रद्धा से नियमव्रत धारण करके अखंडदीप नित्य पूजन दीपदान अनेक प्रकार के दान करके संपूर्ण मास व्यतीत करके अंतिपदिन के पहले चतुर्दशी को उद्यापन हवन ब्राह्मण भोजन अपूपदान सुवर्ण वस्त्र धान्य का दान करते और दूसरे दिन भगवान का उत्तर पूजन करके विसर्जन क्षमा याचना करके अनेक प्रकार का दान शय्यादान तिलपात्र का दान द्रव्य दान और भिक्षुकों को भी अन्न आदि का दान करके व्रत का समापन करते थे। ऐसा उनका प्रत्येक अधिक मास का नियम था। ऐसे ही एक समय अधिकमास के उद्यापन में उस वैश्य ने वेद शास्त्रों को जाननेवाले अनेक विद्वानों को आमंत्रित करके पूजन हवन की समस्त विधि को संपन्न करके ब्राह्मणों को भोजन कराके तांबूल, द्रव्य, वस्त्र, आभूषण और बहुमूल्य वस्तुओं को देकर संतुष्ट करके विदा किया और अनेक प्रकार के मांगलिक वाद्यों के द्वारा भजन कीर्तन में संलग्न होकर भजन करने लगा। कदर्यु को जब उत्सव के वाद्य और भजन की आवाज सुनाई दी तो वह भी द्रव्य प्राप्त करने की इच्छा से वहां पहुंच गया और भगवान के पूजन मंडप और हवन कुंड के दर्शन करके भगवान को नमस्कार करके यज्ञ की भस्म को ललाट पर लगाकर प्रणाम किया और पूजा द्वार पर कुछ मिलने की आशा से खड़ा हो गया काफी देर तक खड़ा रहा।
भजन कीर्तन का जब विश्राम हुआ वैश्य ने कदर्यु को देखा तो कदर्यु के पास आकर उसको भी कुछ दक्षिणा दी। परंतु कदर्यु को लोभ के कारण संतोष नहीं हुआ और कुछ प्राप्त होगा इस आशा से वैष्णव की प्रशंसा करने लगा। हाथ जोड़कर गदगद वाणी से कहता है। हे धर्मात्मा तुम बड़े भाग्यशाली हो तुमने भगवान पुरुषोत्तम की आराधना उद्यापन कर्म बड़ी श्रद्धा से की है। इस प्रकार का पुण्यकर्म आज तक इस नगरी में किसी ने नहीं किया। तुम्हारे माता पिता धन्य हैं। जिन्होंने तुम जैसे धर्मात्मा पुत्र को जन्म दिया। और तुम भी धन्य हो कि तुम्हारे मन में भगवान पुरुषोत्तम के प्रति इतनी श्रद्धा भावना है तुमने यह पुण्य कर्म करके अपना इहलोक और परलोक दोनों बना लिया।
भगवान पुरुषोत्तम की आराधना से जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट होकर सभी प्रकार के सुख की उपलब्धि आजन्म पर्यन्त रहती है। अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस का समस्त कर्म अक्षय पुण्य देता है। हे वैश्य तुमने अनेक ब्राह्मणों को बहुत सा द्रव्य दान में दिया परंतु मैं कैसा भाग्यहीन हूं कि मुझे इतना सा ही प्राप्त हुआ। कदर्यु के वचनों को सुनकर उस वैश्य ने प्रसन्न होकर और भी द्रव्य देकर कदर्यु को प्रसन्न कर दिया। कदर्यु द्रव्य प्राप्त कर आनंदित होकर उस द्रव्य को लाकर जमीन में गाड़ दिया। किसी भी निमित्त से कदर्यु ने उद्यापन पूजन का दर्शन किया यज्ञ हवन की भस्म का प्राशन किया भगवान को नमस्कार करके पुरुषोत्तम मास और पुण्य की प्रशंसा की इससे उसको भी कुछ पुण्य की प्राप्ति हुई जिसके कारण उसको कालिंजर पर्वत की पुण्य पावन भूमि पर वानर की योनि प्राप्त हुई। हे नारद वानरों को वैसे भी भगवान राम का वरदान प्राप्त है। त्रेतायुग में जब राम और रावण का युद्ध हुआ श्रीराम की सेना में वानर ही वानर थे। भगवान राम ने विभीषण को छोड़कर समस्त राक्षसों को मारकर विजय प्राप्त की। इस युद्ध में बहुत से वानर भी मृत्यु को प्राप्त हुए।
रावण के मारे जाने पर ब्रह्मा आदि देवताओं ने प्रसन्न होकर श्री राम से अनुरोध किया कि हे राम आपने इस अधम राक्षस और रावण को मारकर हम सब देवताओं को भय से मुक्त कर दिया इसलिये हम सब देवता प्रसन्न होकर आपको वरदान देना चाहते हैं। आपके मन में जो इच्छा हो वरदान मांगो। देवताओं की इच्छा को सुनकर श्री राम ने कहा, हे देवताओं यदि आप वरदान देना चाहते हैं। तो इस युद्ध में जो वानर राक्षसों के द्वारा मारे गए हैं उनके ऊपर अमृत की वर्षा करके जीवित कर दो। रामचंद्रजी के द्वारा यह वरदान मांगने पर देवताओं ने मृत वानरों पर अमृत की वर्षा की।
वानरों के मृत शरीर पर अमृत गिरते ही समस्त वानर जय जय श्री राम कहते हुए उठकर बैठ गए जैसे घोर निद्रा से जागे हुए हों। जब भगवान राम अयोध्या को जाने के लिये पुष्पक विमान पर बैठे तो समस्त वानरगण विमान के पास आकर खड़े हो गए। तो भगवान राम ने अत्यंत प्रेम से कहा, हे सुग्रीव, हनुमंत, अंगद, जांबवंत सहित समस्त मित्र वानरों तुम लोगों ने युद्ध में सहयोग देकर मित्रता कार्य किया है। अब तुम लोग अपनी इच्छा से कहीं भी जा सकते हो मैं तुम समस्त वानर जाति को वरदान देता हूं कि आप लोग जहां कहीं भी रहेंगे उस स्थान पर फल से परिपूर्ण वृक्ष और जल चाहे वह नदी तालाब या झरना हो जल से परिपूर्ण रहेंगे सुंदर शीतल छाया प्राप्त होगी। कभी भी कहीं पर भूख और प्यास का कष्ट नहीं होगा। और तुम वानर जाति हमेशा दीर्घायु होगे। हे नारद श्रीराम के द्वारा आशीर्वाद वरदान के कारण ही जहां जहां वानर रहते हैं वह स्थान फल फूल और जल से परिपूर्ण रहता है।
परंतु वानर योनि में भी अपने पूर्व कर्मों के अनुसार सुख दुःख भोगना ही पड़ता है। उस कदर्यु की जीवात्मा का कालिंजर पर्वत पर वानर योनि में जन्म हुआ। दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा। उत्तम उत्तम फलों को खाकर हष्ट पुष्ट बड़े शरीर वाला दीर्घ काय हो गया। जातीय चंचलता के कारण एक जगह स्थिर न रहकर इस वृक्ष से उस वृक्षपर कूदते रहता था। पूर्व जन्म के पाप का फल तो भोगना ही पड़ेगा। पित्त की अधिकता होने से उस वानर के मुख में फोड़ा होगया उसकी भयानक पीड़ा से उसको महान दुःख तथा मुख से चबाना खाना सब बंद हो गया। खाना बंद होने से शरीर दुर्बल और अशक्त हो गया। परंतु स्वभाव की चंचलता से वृक्ष से फल तोड़ता जैसे ही खाने के लिये मुखखोलता भयंकर पीड़ा होती तो फल को फेंक देता। कभी एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर कूदता तो शारीरिक शक्ति हीनता से पूरी उछाल न भरने से पृथ्वी पर गिरकर कई जगह शरीर में चोट लगने से महान कष्ट भोगना पड़ता। इस प्रकार भूख प्यास से व्याकुल इस वृक्ष से उस वृक्ष पर घूमते हुए अनेक दिन बीत गए। फलों को तोड़कर फेंक देने का क्रम बराबर चालू था उस जीवात्मा के सौभाग्य से वह अधिक मास का पुण्यदायक समय था।
उस मास के जब अंतिम पांच दिन शेष रहे तब उस वानर को अत्यंत प्यास से विकलता ऊपर हो गई। वह मृगतीर्थ कुंड के ऊपर वृक्ष की डाली पर बैठा हुआ कुंड केजल की तरफ तृष्णा भरी दृष्टि से देख रहा था परंतु कोई उपाय वहां तक जाकर जलपीने का सूझ नहीं रहा था। ऐसे में जातीय चंचलता से दूसरी डाली पर जाने के लिये उड़ान मारी परंतु शारीरिक कमजोरी के कारण उस डाली तक न जाकर नीचे मृगकुंड में गिर पड़ा उस समय उसकुंड में कम पानी होने से उसमें डूब नहीं सका परंतु उसकी छाती भर पानी होने से जल में ही पांचदिन तक पड़ा रहा शरीर अशक्त होने के कारण इतनी ऊंची उड़ान नहीं ले सकता था कि कुंड के बाहर आ जाए। भूख से व्याकुल और कमजोर शरीर मुख में फोड़ा और पानी में लगातार भीगे रहने से गिरते के पांचवे दिन (अर्थात् दशमी से अमावस पर्यंत) मध्यान्ह के समय उस पवित्र मृगतीर्थ के जल में उसने प्राणों का परित्याग कर दिया। वानर के शरीर का त्याग करते ही उसकी जीवात्मा ने दिव्य स्वरूप धारण कर लिया। वह चतुर्भुजी मेघ के समान श्यामल वर्ण का अत्यंत तेजस्वी सूर्य के समान कांतिवाला पीतांबर धारण किए हुए, सिरपर सुंदर रत्नों से जड़ा हुआ मुकुट कानों में कुंडल आदि आभूषण से सुसज्जित शरीर वाला दशों उंगलियों में मुद्रिका गले में वैजयंती माला ऐसे दिव्य स्वरूप का हो गया। उसी समय उस जीवात्मा को आकाश मार्ग से दिव्य विमान आता हुआ दिखाई दिया।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
बृहन्नारदीय पद्याधारे त्रिंशत्तमोऽध्यायः समाप्त ॥
(३०)
॥ शुभमभवतु ॥




Adhik mass ki Katha 29 adhyaya | अधिक मास की कथा 29 वा अध्याय

 Adhik mass ki Katha 29 adhyaya | अधिक मास की कथा 29 वा अध्याय 

॥ अथ एकोनविंशोऽध्यायः प्रारंभः ॥
श्री मन्महागणधिपतये नमः ॥
(२९)
श्री भगवान नारायण नारदजी से सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं, हे ऋषियों! पहले के कथा प्रसंग में राजा दृढधन्वा अपने राज्य का कार्य भार ज्येष्ठ पुत्र पर सौंपकर पत्नि के सहित तपोवन में गंगाजी के किनारे कुटिया बनाकर रहने लगा। गंगाजी में त्रिकाल स्नान करना नित्य नैमित्तिक कर्मों के साथ भगवद भजन और आराधना करना कंद मूलफल जो भी तपोवन में प्राप्त होते उनको खाकर और गंगाजल पीकर रहना यही उनकी दिनचर्या थी। रात्री भी पति की सेवा में रहकर पति को प्रत्येक कर्म में सहयोग देना यही उस साध्वी का कार्य था। इस प्रकार तपोवन में रहकर भगवदाराधना करते हुए अनेक समय व्यतीत होने लगा। पुरुषोत्तम मास आने पर राजा व रानी दोनों ने निराहार रहकर सिर्फ गंगाजल पीकर एक पैर के अंगूठे के आधार पर खड़े होकर दोनों हाथ ऊपर करके भगवान पुरुषोत्तम के नाम का जप करते हुए संपूर्ण मास को भक्ति से परिपूर्ण होकर व्यतीत किया। रानी भी पति का अनुसरण करती रही। इस प्रकार अधिकमास का अनुष्ठान परिपूर्ण होने पर आकाश से दिव्य विमान आया उस विमान से कांति निकल कर चारों ओर प्रकाश हो रहा था सोने की घंटियां रत्नों और मोतियों की झालर बंधी हुई थी झमझम शब्द हो रहा था। दिव्यांगनाएं नृत्य कर रही थी। उस विमान पर दो दिव्य देवदूत बैठे हुए थे। विमान को पास आता हुआ देखकर राजा व रानी को बड़ा आश्चर्य हुआ। विमान से उतर कर दोनों दिव्य दूतों ने राजा से आग्रह किया हे पुण्यात्माओं! आपकी तपस्या से प्रसन्न होकर गोलोकाधिपति भगवान पुरुषोत्तम ने आपके लिये विमान भेजा है आप इस नश्वर शरीर को त्यागकर विमान पर बैठें। उनके आग्रह पर राजा व रानी ने पंचमहाभौतिक शरीर का भगवान पुरुषोत्तम का नाम स्मरण करते हुए शरीर का त्याग कर दिया। उनकी आत्मा चतुर्भुजी स्वरूप की होकर सूर्य के समान तेजस्विनी हो गई। दोनों दिव्य पुरुषों ने राजारानी को आदरपूर्वक विमान पर बैठाया। विमान अत्यंत तेजगति से अनेक लोकों को लांघता हुआ गोलोक में पहुंचा भगवान के पार्षदों ने राजा रानी का सत्कार किया इस प्रकार राजा व रानी दोनों दिव्यस्वरूप से भगवान पुरुषोत्तम के सान्निध्य में रहकर मोक्ष को प्राप्त हो गए।
हे ऋषियों! हजारों वर्षों तक तपस्या करने पर जिस पुण्य फल की प्राप्ति नहीं होती। वही पुण्य सिर्फ अधिक मास में स्नान व्रत जप दान करने वाले को प्राप्त हो जाती है। अज्ञानावस्था में भी घटित हुआ व्रत आदि पुण्यकर्म अनंत फल को देने वाला होता है। जैसे एक वानर को एक शाखा से दूसरे वृक्षपर कूदते हुए पानी के कुंड़ में गिर जाने से अधिक-मास के स्नान और व्रत का पुण्य प्राप्त हुआ और उस पुण्य के प्रभाव से महाप्रतापी होते हुए भी सब पाप नष्ट होकर दिव्य स्वरूप का होकर विमान पर बैठकर गोलोक को प्राप्त हुआ। अज्ञानावस्था में घटित पुण्य इतना फलदायी हो सकता है।
तो मनुष्य अपनी श्रद्धा से इसके माहात्म्य को समझकर अधिक-मास में नियम धारण करते हुए व्रत पूजन दान कर्म के द्वारा व्यतीत करेंगे। उनके पुण्य का वर्णन करना सूर्य को दीपक दिखाने के बराबर है। हे महाप्रभु आप मुझे उस वानर का संपूर्ण प्रसंग सुनाइये कि कैसे उस पापी वानर को आकस्मिक पुण्य का लाभ प्राप्त होकर मोक्ष प्राप्त हुआ देवर्षि नारद के आग्रह करने पर भगवान नारायण कहते हैं, हे नारद केरल नाम के देश में एक ब्राह्मण रहता था। वह ब्राह्मण मूर्ख और महालोभी था। जैसे शहद की मधुमक्खी एक एक फूलों से बूंद-बूंद शहद लाकर अपने छत्ते में जमा करती है। वैसे ही वह ब्राह्मण भीख मांगकर एक एक पैसा जमाकर जमीन में गाड़कर रखता था। उसने प्राप्त किए पैसों का कभी सदुपयोग नहीं किया यह द्रव्य न अपने परिवारजनों पर खर्च किया, न कभी भगवान के पूजन हवन में, न पितरों के श्राद्ध में न, दान पुण्य में, यहां तक कि लोभ के कारण कभी अच्छे वस्त्र नहीं पहना, कभी अच्छी स्वादिष्ट वस्तु या अन्न भी नहीं खाया।
मनुष्य का जो कर्तव्य है अपने परिवार का पालन पोषण करना, सामाजिक प्रतिष्ठा के लिये शुभकर्म करना ऐसे कोई भी कर्म अपने जीवन में उसने नहीं किये। माघमास में तिल का दान, सूर्य की संक्रांति में अनेक दान, व सूर्यचंद्रमा के ग्रहण के समय जप हवन कर्म, पर्व के समय स्नान, आदि कोई शुभ और पुण्य प्राप्ति के कर्म अपने जीवन में कभी नहीं किया। उसके कर्मों के कारण समाज और परिवार के लोग उसको धिक्कारते और निंदा करते थे फिर भी वह किसी की परवाह न करके अपने स्वभाव के अनुसार धन को जमीन में गाड़कर रखना, कैसा भी वर्षा या ठंड का मौसम हो फटे चीथड़े वस्त्र पहनकर गुजारा करना यही उसका नित्य कर्म था। उसके पिता का रखा हुआ नाम चित्रशर्मा था। परंतु उसके व्यवहार और कर्म को देखकर लोगों ने उसका नाम कदर्यु रख दिया। सभी जगह लोग कदर्यु नाम से पुकारने व जानने लगे।
तिरस्कार करने से उसने अपने परिवार को त्याग कर अलग रहने लगा। उसका नित्य नियम था प्रातःकाल से ही भिक्षा मांगने निकलना, रास्ते में जो भी मिले बड़ी दीनवाणी से आंखों से आंसू बहाते हुए अपने शरीर की हालत दिखाते हुए प्रार्थना करते हुए भिक्षा मांगना। इस प्रकार अपने नगर के अलावा अनेक नगरों में वह भिक्षा मांगता फिरता रहता था। जब जन समुदाय में कदर्यु के स्वभाव और कंजूसी का प्रचार व प्रसार हो गया। तो सभी लोग उसको धिक्कारने लगे और भिक्षा देना भी बंद कर दिया। भिक्षा न मिलने से कदर्यु का मन बड़ा बेचैन रहने लगा। रातदिन चिंताग्रस्त होकर सोचता था कि मैं अब क्या करूं कहां जाऊं कैसे धन प्राप्ति हो। अचानक उसको याद आया कि मेरा बचपन का मित्र एक माली है। गांव से कुछ दूर उसका बगीचा है, वहीं वह रहता है। उसके पास जाना चाहिए ऐसा सोचकर वहां जाने का निश्चय किया। माली हमेशा बगीचे में रहता था गांव की ओर कदर्यु की बातों से अनभिज्ञ था। कदर्यु बगीचे में जाकर मित्र माली से बड़े प्रेम से मिला और आंखों से पानी बहाते हुए अपनी गरीबी का बखान करते हुए सहायता की भीख मांगने लगा। हे मित्र मैं अपने दुर्भाग्य का वर्णन कैसे करूं मैं बड़ा दुःखी हूं। क्या करूं कुछ समझ में नहीं आता। ग्रामवासी सब मेरा तिरस्कार करते हैं कोई भिक्षा तक नहीं देता। मैंने नगर का त्याग कर दिया है। जहां जीवन यापन नहीं होता ऐसे नगर में रहकर क्या फायदा। माली ने कदर्यु के प्रार्थना युक्त वचन और दयनीय अवस्था को देखा तो उसको दया आ गई। और कहा हे कदर्यु अच्छा हुआ तुम्हारे आने से मुझे भी सहयोग मिलेगा। मैं अकेला होने से दिन भर बगीचे में रहता जिससे मेरे गांव के सब कार्य बंद हो गए थे। घर परिवार की देखभाल भी बराबर नहीं हो पाती थी मैं अब बगीचे की चिंता से मुक्त होकर गांव में फूलहार का व्यवसाय करके घर परिवार की देखरेख कर सकूंगा। तुम यहीं बगीचे में रहकर इसकी देखरेख करो। ऐसा कहकर कदर्यु को अपने बगीचे में रख लिया कुछ दिन माली नित्य प्रति बगीचे में आकर वहां का कामकाज उसको समझाने लगा। जो काम माली बतलाता कदर्यु बड़ी मेहनत से उस कार्य को करता। बड़ी तन्मयता से बगीचे के फलों की रक्षा करता गिरे और पके हुए फल माली को सौंप देता। उसके व्यवहार और मेहनत को देखकर माली को उसपर विश्वास हो गया कि यह अपने परिवार बंधु बांधव जैसा ही है। बगीचे की सारी जिम्मेदारी उस पर छोड़ कर गांव में रहने लगा तथा अपने पूर्वजों का पारंपरिक व्यवसाय फूलों की दुकान को शुरु कर दिया।
अब माली को कदर्यु पर विश्वास और समय की कमी से बगीचे में बहुत कम कई दिनों के बाद जाने का मौका मिलता था। कुछ दिनों तक कदर्यु ने बगीचे के पके फलों को मालिक के पास पहुंचाया। परंतु लोभी होने के कारण उसके मन की भावना बदल गई और पके फलों को माली के पास पहुंचाना बंद कर दिया बगीचे से निकले हुए चोटीले दागी फलों को स्वंय पेटभर खाता और अच्छे फलों को बेंचकर जो पैसा मिलता उसको जमीन में गाड़ देता। कई दिनों तक फल न पहुंचने से माली एक दिन समय निकालकर बगीचे में पहुंचकर कदर्यु से फल न लाने के विषय में पूछने लगा। तो कदर्यु कहता है हे मित्र इस बगीचे में पशुपक्षी बहुत आते हैं और सब फल खाकर नष्ट कर देते हैं। देखो मैंने कई पक्षियों को भगाया और मारा भी देखो उनके पंख और शरीर का मांस पड़ा हुआ है। यहां तो मेरे खाने के लिये भी फल नहीं मिलते मैं तो किसी तरह गांव से अन्न की भिक्षा मांगकर अपना गुजारा करके तुम्हारे बगीचे की देखभाल करता हूं। पक्षियों के मरे हुए शरीर और मांस पंख आदि देखकर माली को कदर्यु की बातों पर विश्वास हो गया। गांव में माली का व्यवसाय अच्छा होने से आमदनी खूब बढ़ गई थी इस कारण बगीचे के विषय में उसको चिंता नहीं थी। माली गांव वापस चला गया और अपने व्यवसाय में लग गया।
इधर कदर्यु पहले से भी अधिक फलों की चोरी करके बेंचता और प्राप्त किए धन को जमीन में गाड़ देता। इस प्रकार कई वर्षों तक यही क्रम चलता रहा। कदर्यु की आयु का अंतिम समय आ गया एक दिन कदर्यु मृत्यु को प्राप्त हो गया। मृत्यु के समय यम के दूतों ने उसकी जीवात्मा को रस्सी से बांधकर यमपुरी ले चले। मार्ग में यमदूत उसको मुद्गरों से मारते अनेक प्रकार कष्ट देते हुए ले जा रहे थे तब उसकी आत्मा स्वंय को धिक्कार रही थी कि मैंने अति उत्तम मनुष्य शरीर प्राप्त करके भी कोई शुभ कर्म नहीं किया। हमेशा लोभ और चोरी करके सारे जीवन को व्यर्थ ही बिता दिया। न तो कोई दान किया न पूजन हवन किया न कोई व्रत उपवास किया न किसी पर्व में दान पुण्य किया न अच्छे वस्त्र पहना न अच्छा भोजन किया जमीन में गाड़ा हुआ धन वहीं गाड़ा रह गया। उसका भी कोई उपयोग मैंने नहीं किया।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
॥ बृहन्नारदीय पुराधारे एकोनत्रिंशोऽध्यायः समाप्त ॥
(२९)
॥ शुभमभवतु ॥









Adhik mass ki Katha 28 adhyaya | अधिक मास की कथा 28अध्याय

 Adhik mass ki Katha 28 adhyaya | अधिक मास की कथा 28अध्याय 


॥ अथ अठ्ठाविंशतितमोऽध्यायः प्रारंभ ॥
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकादि ऋषियों से और भगवान विष्णु लक्ष्मीजी से कहते हैं। हे लक्ष्मी! पहले एक समय सोपदेश में उग्र सुमति नाम का एक प्रख्यात राजा हो चुका है। वह राजा महान धर्मात्मा, दानी, अहंकार रहित सदाचार संपन्न और भगवान का भक्त था। नित्य भगवान की पूजा आराधना करना और अनेक पुराणों का श्रवण करना। इसी प्रकार वह अपनी दिनचर्या बनाकर पुत्र के समान प्रजा का पालन किया करता था। राजा की स्त्री का नाम सत्यमती था। वह भी पतिव्रता के धर्म से परिपूर्ण महासौभाग्यवती सभी शुभलक्षणों से संपन्न, और भगवद् भक्ति से परिपूर्ण थी। भगवान की कृपा और अपने पुण्यकर्मों के प्रभाव से राजा रानी दोनों को अपने पूर्वजन्म का वृत्तांत संपूर्ण स्मरण था। इसी कारण से वे दोनों इस जन्म में भी जब जब अधिक मास आता तब बड़ी भक्ति और श्रद्धा से नियमव्रत धारण भगवान पुरुषोत्तम का पूजन, अनेक प्रकार के दान कर्म करते हुए व्यतीत करते।
जनसमुदाय को सुख देने के निमित्त कुंए, बावली, तालाब का निर्माण करवाते थे और यश का प्रसार हो गया। एक समय राज्य में अंगिरस ऋषि का अनेक शिष्यों के साथ आगमन हुआ वे सब भ्रमण करते हुए राज भवन की ओर पहुंचे। ऋषि का आगमन सुनकर राजारानी दोनों मुख्यद्वार पर जाकर मुनि के चरणों में प्रणाम करके आदर पूर्वक राजमहल में लाकर उत्तम सिंहासन पर बैठाया और पाद्य अर्घ्य आदि के द्वारा उनका पूजन किया उनके आसन के पास नीचे बैठकर आदरपूर्वक हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए कहा हे मुनिराज आपके आगमन से मैं कृतार्थ हो गया। मेरा अहो भाग्य है जो आप इस भवन में पधारे इसको अपने चरणरज से पवित्र कर दिए। संतो का आगमन, और संतो की कृपा से दुर्बुद्धि होकर धर्म के प्रति अनुराग की वृद्धि होती है। जिस पर संतो की कृपा हो जाय उसको तीनों लोक में ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो न प्राप्त हो सके। संतो के चरणों का जल अपने सिर में धारण करते ही समस्त तीर्थों का पुण्य प्राप्त हो जाता है। आपके आगमन और दर्शन से मेरे समस्त संसार में कोई पुण्यवान नहीं होगा ऐसा मैं समझता हूं। राजा के ऐसे नम्रतापूर्ण वचनों को सुनकर ऋषि बड़े प्रसन्न होकर राजा के सिरपर हाथ फिरते हुए कहते हैं, हे राजन, तेरे जैसे धर्मात्मा और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को जानने वाले और नम्रता और विनय से युक्त शब्दों को सुनकर मन में बड़ी प्रसन्नता हुई।
विनय के द्वारा संसार में सभी अप्राप्य वस्तुओं को मनुष्य प्राप्त कर लेता है। हमेशा तेरा और तेरी प्रजा का कल्याण हो यह मेरा आशीर्वाद है। तुम दोनों पति पत्नि सदाचार संपन्न और भगवान के भक्त हो। धन राज्य और ऐश्वर्य के मद में लोग भगवान की भक्ति से विमुख हो जाते हैं। परंतु तुम्हारे पूर्वजन्म में ऐसा कौन सा पुण्य कर्म किया जिसके प्रभाव से तुम्हारी बुद्धि स्थिर है और भगवान के प्रति वैसी ही श्रद्धा बनी हुई है। ऋषि के वचनों को सुनकर राजा सुमति हाथ जोड़कर कहता है।
हे ऋषिवर आप त्रिलोकज्ञ हैं। हाथ में आंवले के समान भूत भविष्य वर्तमान को जानते हैं फिर भी आप मुझ से पूछते हैं तो आपकी आज्ञा से मैं अपने पूर्वजन्म का वृतांत कहता हूं। हे मुनिवर मैं पूर्वजन्म में वीरनामा नाम का वैश्य था। मैं जाति से वैश्य जरूर था लेकिन मेरे कर्म शूद्र से भी पतित थे। मैंने अपने जीवन में अनेक पाप कर्म किए। ब्राह्मणों की संपत्ति जबर्दस्ती अपहरण की। चोरी डकैती दूसरों का वध करना यही मेरा नित्य कर्म था। दूसरों को अपशब्द बोलना, कष्ट देना, धन का हरण करके वेश्यालय में खर्च करना मदिरा और मांस का भक्षण करना, यही मेरा कर्म था। मेरे इस कर्म से बंधु बांधव पारिवारिक जन और गांववासी सभी कुपित थे कोई मुझ से बात नहीं करता और अपने दरवाजे पर खड़ा नहीं रखता था इस प्रकार बहुत समय व्यतीत हो गया। लोगों के तिरस्कार से दुःखित होकर मैंने गांव छोड़ दिया और जंगल में पत्ते की झोपड़ी बनाकर रहने लगा। और जंगली जीव, पक्षी, मृग आदि को मारकर उनका मांस भक्षण करके किसी प्रकार दिन बिताने लगा। परंतु जंगल में भी कभी पशु पक्षी का शिकार नहीं मिलता तो भूखा ही रहना पड़ता इस प्रकार भूख से व्याकुल होकर जंगल में घूमता रहता था।
एक समय भूख से व्याकुल जंगल में घूमता हुआ काफी दूर निकल गया वहां मैंने एक स्थान ऐसा देखा कि अत्यंत जीर्ण अवस्था में भगवान विष्णु का मंदिर है। पास में ही सुंदर स्वच्छ जल से भरा हुआ तालाब है कमल खिले हुए हैं और अनेक प्रकार के पक्षी कलरव कर रहे हैं। तालाब के समीप जाकर उसका जल पीकर मन को शांति मिली और विश्राम के निमित्त एक वृक्ष के नीचे लेट गया। इधर मेरी पत्नि मेरे चले जाने के बाद दुःखित होकर इधर-उधर भटकने लगी मेरे बंधुजनों ने मेरे न रहने पर संपत्ति का अपहरण करके मेरी पत्नि को निकाल दिया कोई भी अपने पास उसको आश्रय देने को तैयार नहीं था। मेरे दुष्कर्मों का फल मेरी पत्नि को भी भोगना पड़ रहा था। दुःखित होकर उसने भी जंगल में प्रवेश किया और भटकती भूख प्यास से दुःखित उसी जगह पहुंची जहां मैं लेटा हुआ था। उसको देखकर मुझे भी दुःख हुआ मैंने उसको कुछ जंगली फल खाने को दिए फल खाकर जलपीकर उसका मन कुछ शांत हुआ मेरे पास आकर बैठ गई। और कहने लगी हे स्वामी जानते हुए अथवा अनजानते हुए जो भी पाप मनुष्य से हो जाते हैं उस कर्म का फल मनुष्य को जीवन पर्यन्त और मृत्यु के बाद रौरव आदि नरकों की यातना से दुःख भोगना पड़ता है। अपने पूर्व कर्मों का प्रायश्चित न करने से निरंतर पाप होते रहते हैं। और कभी दुःख से छुटकारा नहीं मिलता। मैंने ज्ञानी और धार्मिक पुरुषों से सुना है कि भगवान के नामों में इतनी शक्ति है कि जन्म जन्मांतर के समस्त पापों को नष्ट करके मन को शांति और सुख की अनुभूति देता है।
जो भगवान का नाम स्मरण करनेवाले भक्त हैं। जो भगवान के मंदिर में जाकर मंदिर की साफ सफाई पूजन और भजन कीर्तन नाम स्मरण करते हैं। ऐसे लोग समस्त पापों से मुक्त होकर संसार में सुखी जीवन व्यतीत करते हुए अंत में मोक्ष को प्राप्त करते हैं। यही कर्म यदि अधिक मास में किया जाय तो अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है। ऐसा मैंने विद्वानों से सुना है। इतना दुःख भोगने के बाद अब यदि अपना कल्याण चाहने की इच्छा हो तो समस्त दुष्कर्मों को छोड़कर अपना भविष्य बनाने के लिए धर्म का आचरण करो। ऐसी ज्ञान पूर्ण बातों को सुनकर मेरे मन में भी पाप कर्मों का प्रायश्चित करने की इच्छा जागृत हुई। हम दोनों पति पत्नि वही रहकर नित्य भगवान विष्णु के मंदिर को स्वच्छ रखकर भगवान का पूजन और नाम स्मरण करते हुए, हिंसा त्यागकर, जंगल में उत्पन्न कंद फलों को खाकर समय व्यतीत करने लगे। जंगल में रहने से हमको महीना पर्व और अधिक मास का ज्ञान नहीं था फिर भी निरंतर भगवान की आराधना में लिप्त रहने से हमारे जीवन में अनेक अधिमास व्यतीत हुए उसी पुण्य के प्रभाव से हमें इस जन्म में समस्त सुख वैभव राज्य प्राप्त हुआ और पूर्वजन्म की सब बातें याद हैं।
राजा सुमति के द्वारा पूर्व जन्म का वृतांत और अधिक मास के माहात्म्य को सुनकर अंगिरस ऋषि बड़े प्रसन्न हुए। राजा को आशीर्वाद देकर अपने आश्रम को प्रस्थान कर गए। राजा सुमति भी निरंतर धर्माचरण पर चलकर अधिक मास में भगवान पुरुषोत्तम की आराधना करता हुआ सांसारिक सुखों को भोगकर अंत में मोक्ष को प्राप्त हुआ। सूतजी कहते हैं कि हे ऋषियों इसी कथा प्रसंग को अर्थात लक्ष्मी और विष्णु के संवाद वाल्मीकि ऋषि दृढधन्वा को पूर्व के कथा प्रसंग में सुना रहे थे। उन्होंने कहा हे राजन संसार में भगवान पुरुषोत्तम के समान महान पुण्यदाता कोई देवता नहीं है। अधिकमास के देवता भगवान पुरुषोत्तम है उन्होंने अपने सब गुण धर्म अधिमास को दे दिए हैं इसीलिए भगवान पुरुषोत्तम के सदृश अधिकमास भी उन्हीं के सदृश पुण्य और मोक्ष देने में सामर्थ्यशील है। हे राजा तू भाग्यशाली है। इसीलिए निरंतर अधिकमास में व्रत नियम धारण करते हुए भगवान पुरुषोत्तम की आराधना करता रहता है। तेरा सर्वदा कल्याण हो। ऐसा कहकर वाल्मीकि ऋषि ने जाने की इच्छा प्रकट की। राजा ने ऋषि का पूजन करके उनको विदा किया। ग्राम की सीमा तक उनको पहुंचाने गया। और वापस राजमहल में आकर पत्नि से कहा हे प्रिये यह शरीर नश्वर है इसमें हमेशा काम क्रोध, लोभ, मोह आदि विकार उत्पन्न होते रहते हैं। वात, पित्त, कफ से भरा हुआ रोग से ग्रसित होकर कब नष्ट हो जाए इसका कोई निश्चय नहीं है। इसलिये बचा हुआ शेष जीवन संसार से विरक्त होकर तपोवन में जाकर तपस्या के द्वारा शरीर का परित्याग कर देना ही सर्वोत्तम होगा। पति के ज्ञान पूर्ण वचनों को सुनकर रानी ने भी अपने अंतकरण में विचार किया और कहा पति के जाने पर मुझे यहां रहकर क्या करना है।
जो स्त्रियां पति के बिना बहू के आधीन रहती हैं। वे अपने ही घर में नौकर के समान जीवन बिताती हैं। तथा कुत्ते के समान प्राप्त भोजन करती हैं पति ही परमेश्वर के समान रक्षक और सुखदाता होता है। इसलिये मैं भी पति का अनुसरण करके उन्हीं की सेवा में शरीर का परित्याग कर दूंगी। पत्नि की ऐसी इच्छा को देख राजा ने अपने पुत्र का राजतिलक करके राज्य का भार सौंपकर तपोवन में पत्नि सहित जाकर तपस्या में लीन हो गया। पत्नि भी पति की सेवा करते हुए भगवान की आराधना में लिप्त होकर दोनों ने कुछ दिनों बाद शरीर का परित्याग कर अनंत मोक्ष को प्राप्त किया।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
बृहन्नारदीय पद्याधारे अठ्ठाविंशतितमोऽध्यायः समाप्त
(२८)
॥ शुभमभवतु ॥




Adhik mass ki Katha 27 adhyaya| अधिक मास की कथा 27वा अध्याय

 Adhik mass ki Katha 27 adhyaya| अधिक मास की कथा 27वा अध्याय 

॥ अथ सप्तविंशतितमोऽध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री मन्महागणधिपतये नमः ॥
श्री भगवान नारायण नारदजी से सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं। हे ऋषियों इसके पहले के अध्याय में भगवान ने अधिक मास के उद्यापन का विधान और समस्त मास की पूर्णता के लिये दान का विधान कहा। आज के कथा प्रसंग में भगवान विष्णु कहते हैं। हे लक्ष्मी पुरुषोत्तम मास का व्रत सभी व्रतों में सर्वोत्तम और सभी पुण्यकर्मों से विशेष महान अक्षय पुण्य को देने वाला होता है। जो लोग पुरुषोत्तम मास में नियमव्रत आदि धारण करते हुए श्रद्धापूर्वक मास को व्यतीत करते हैं। वे पुण्यात्मा के पास अन्तिम समय यमदूत कभी नहीं आते जैसे सिंह को देखकर हाथी भाग जाते हैं। और गरुड़ को देखकर सांप बिल में घुस जाते हैं। सूर्य का प्रकाश आते ही अंधकार भाग जाता है। उसी प्रकार पुण्यात्मा को देखकर यमदूत कभी उनके पास नहीं जाते। हे लक्ष्मी जिसने पुरुषोत्तम मास में आराधना की है। उसके घर और शरीर में समस्त तीर्थों का वास रहता है। और समस्त देवताओं की कृपा रहती है। और समस्त विघ्नबाधाएं नष्ट होकर मन में शांति स्थापित रहती है। उनके समक्ष भूत प्रेत पिशाच आदि की कोई बाधा नहीं आती वे कहीं भी रहें सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करते हुए यज्ञ यागादिक करने वाले पुण्यात्माओं से भी ज्यादा पुण्य शाली होकर अंत में अक्षय पुण्य के द्वारा मोक्ष को प्राप्त करते हैं। हे लक्ष्मी इसके पुण्य फल का वर्णन करने में हजार जिह्वा वाले शेषनाग भी असमर्थ हैं।
हे लक्ष्मी इस मास को किस प्रकार कौन कौन से नियम धारण करने योग्य होते है सो मैं कहता हूं इसमें अपनी शारीरिक शक्ति के अनुसार कोई भी एक या अनेक नियम को धारण करने का संकल्प (निश्चय) करके नित्य प्रातः स्नान पूजन जप स्मरण भजन कीर्तन करते हुए सात्विक वृत्ति से रहना चाहिये। इसके नियम हैं, भूमि पर सोना, किसी एक तेल का परित्याग, एक ही जाति की पत्रावलीपर भोजन करना, नख और बालों को न काटना, एक ही अन्न का भोजन करना नित्य दीपदान करना, मालपुआ या अन्नशा या मिष्ठान का दान करना, नित्य ब्राह्मण भोजन करवाना, जूता चप्पल न पहनना, आंवले के चूर्ण को पानी में डालकर स्नान करना, किसी एक फल का त्याग, नमक का त्याग, नियतलीला, तांबूल, धान्य का दान, सुवर्ण, चांदी या द्रव्य का दान, भागवत श्रवण का नियम, अयाचित, नक्त, धारणापारण, या एक समय भोजन का नियम, हविष्यान्न भोजन का नियम, मौन धारण का नियम तुलसी पूजन, शालिग्राम पूजन, आदि अनेक नियमों में से एक दो या तीन चार जितने भी नियम धारण करने की शारीरिक क्षमता हो उतने नियम का निश्चय करके संपूर्ण मास पर्यंत पालन करना चाहिये बीच में नियम भंग न हो इस बात की दक्षता रखना चाहिये।
एक भी नियम धारण करके यदि दक्षता पूर्ण संपूर्ण मास पालन किया जाय तो भी अनन्य पुण्य की प्राप्ति होती है। इस मास में सभी को इन वस्तुओं का त्याग करना चाहिए। राई, चना, नागरमोथा, तिल का तेल, प्याज, लहसुन, मूली, गाजर, बैंगन, इमली, जाम्बीर नींबू, मादक नशा उत्पन्न करने वाले पदार्थ, मसूर की दाल, पकाया हुआ बासी अन्न, गाय भैंस के अलावा दूसरे पशुओं का दूध, भूमि से उत्पन्न नमक, तांबे के बर्तन में रखा हुआ दूध या घी, सिर्फ अपने लिये पकाया हुआ अन्न, ब्रह्मचर्य धारण, जलहुुआ अन्न, दूसरों से निंदित अन्न, अपने मन से दूषित अन्न देवता और ब्राह्मणों से द्वेष रखने वालों का अन्न, कौवों से स्पर्श किया अन्न, सूतक लगी अवस्था का अन्न इन सभी वस्तु और पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। तथा दूसरों से द्वेष करना, किसी की निंदा करना, वेद ब्राह्मण, राजा, स्त्री और गौ की निंदा नहीं करना चाहिए। इस प्रकार इन नियमों का पालन करते हुए अधिक मास को बिताना चाहिए।
तुलसीदल या मंजरी से शालिग्राम की नित्यपूजा और नित्य श्री मद भागवत का श्रवण अनंत पुण्य देने वाला होता है। मृत्यु के उपरांत चतुर्भुजी स्वरूप धारण करके स्वर्गों की प्राप्ति देता है। व्रत उपवास का नियम धारण करने वाले को नित्य अश्वमेघ यज्ञ के फल की प्राप्ति होती है। हे लक्ष्मी नियम धारण करनेवाले को किस प्रकार अंत में नियम छोड़ना चाहिए सो मैं कहता हूं। नक्त भोजन का नियम धारण करने वाले को अंत में ब्राह्मण भोजन और सुवर्ण का दान करके नियम छोड़ना चाहिए। आंवले के चूर्ण का स्नान करने वाले को दही और दूध का दान करना चाहिए। एक अन्न का भोजन करने वाले को गेहूं और चावल का दान, भूमि पर सोने के नियम वाले को शय्यादान, तेल त्याग में घी का दान, घी के त्याग में दूध का दान, पत्रावली पर भोजन करने वाले को घी, शक्कर और अन्न का दान मौन व्रत वाले को घंटा घड़ियाल का दान, नखकेश धारण के नियम में आईने का दान, जूता चप्पल के नियम में जूता या चप्पल का दान, लवण त्याग करने पर घी, शक्कर, नमक का दान, दीपदान के नियम में चांदी का दीपक, सुवर्ण की बत्ती का दान, धारणापारण नियम में वस्त्र और कुंभ (जलपात्र) का दान, एक समय भोजन के नियम में उत्तम अन्न और शुद्ध घी से बने तीस लड्डू का दान करना चाहिए नियम की पूर्ति और फल की प्राप्ति के लिये इसी प्रकार नियम छोड़ना चाहिए यह कर्म अमावस्या के दिन करना श्रेष्ठ होता है।
जो जो पदार्थ छोड़ने का नियम धारण किया हो असमर्थ पुरुषों को वही पदार्थ दान करना चाहिए भगवान पुरुषोत्तम का पूजन हवन करके उपरोक्त प्रकार से दान करके ब्राह्मण का आशीर्वाद प्राप्त करके नियम छोड़ना चाहिए। अपने नियम और व्रत की सफलता के लिये यथा शक्ति दक्षिणा देकर व्रत की पूर्ति का फल प्राप्त करे। हे लक्ष्मी समस्त मनोकामनाओं को देनेवाला महान पुण्यदायक अधिक मास का नियम है। इन नियमों को अनेक देवता ऋषि संन्यासी भी धारण करके अक्षय पुण्य को प्राप्त करते हैं।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
॥ बृहन्नारदीय पुराणांतर्गत सप्तविंशतितमोऽध्यायः समाप्त ॥
॥ शुभमभवतु ॥




Adhik mass ki Katha 26 adhyaya | अधिक मास की कथा 26वा अध्याय

 

Adhik mass ki Katha 26 adhyaya | अधिक मास की कथा 26वा अध्याय 




॥ अथ षड्विंशतितमोऽध्यायः प्रारंभः ॥

॥ श्री गणेशाय नमः ॥

श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकादि ऋषियों से और भगवान विष्णु लक्ष्मी जी से कहते हैं। हे लक्ष्मी! अब मैं तुमसे अधिक मास के उद्यापन की विधिपूर्वक कहता हूँ तुम एकाग्रचित्त से सुनो। अधिक मास में नियम व्रत अखंडदीप और मौन व्रतधारण आदि के साथ नित्य भगवान पुरुषोत्तम का पूजन अपनी शक्ति के अनुसार अनेक प्रकार के दान कर्म करते हुए भगवान स्मरण भजन कीर्तन गीता भागवत का श्रवण करते हुए संपूर्ण मास को श्रद्धापूर्वक व्यतीत करना चाहिए, अंत में उद्यापन करना आवश्यक है। उद्यापन के लिये अधिक मास की अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या ये चार तिथियां मुख्य हैं। इन तिथियों में जिसको जिस तिथि में उद्यापन करना सोयस्कर हो। अपनी इच्छा से उस तिथि में करना चाहिए।

उसका विधान इस प्रकार है उद्यापन के एक दिन पहले पूजन हवन करने के लिये सात्विक और कर्मकांडी ब्राह्मण को तथा भोजन के निमित्त अपनी श्रद्धा और शक्ति के अनुसार निश्चित संख्या में आमंत्रित कर देना चाहिए। उद्यापन के दिन प्रातः काल उठकर शौचक्रम दंत मुख मार्जन करके शुद्ध जल से स्नान करके शुद्ध वस्त्रों को धारण करके नित्य नैमित्तिक संध्या वंदन कर्म करके कर्मकांडी ब्राह्मण के विधान से भगवान पुरुषोत्तम का पूजन श्रद्धापूर्वक करना चाहिए। पूजन के स्थान और भगवान के मंडप को तोरण अनेक ऋतु में उत्पन्न फूलमाला और अनेक वस्त्रों की ध्वजा पताकाओं से सुसज्जित करना चाहिए। मंडप के स्थान को गोबर से लीपकर (रंगवल्ली) रांगोड़ी से चौकपूरकर उसपर चौरंग रखकर नया सफेद वस्त्र बिछाकर चावल आदि धान्य से सर्वतोभद्र मंडल बनाकर चारों दिशाओं में चार और बीच में प्रधान कलश को स्थापित करना चाहिए। अपनी शक्ति के अनुसार चांदी तांबा या पीतल के कलश होना चाहिए। उन कलशों में तीर्थों का अथवा गंगाजल अथवा शुद्ध जल भरकर पंचपल्लव सर्वौषधी डालकर वस्त्र से लिपटा हुआ नारियल के फल रखना चाहिए। उन कलशों में क्रम से संकर्षण, वासुदेव प्रद्युम्न अनिरुद्ध का आवाहन ध्यान करके मध्य में प्रधान कलश पर सुवर्ण की बनाई हुई राधा के सहित भगवान पुरुषोत्तम की मूर्ति को प्राणप्रतिष्ठा करके पाद्य अर्ध्य स्नान कराके स्थापित करे चारों कलशों में पाद्य अर्ध्य स्नान करावे।

श्रद्धा के सहित सभी देवताओं को यज्ञोपवीत चंदन गंध अक्षत पुष्प माला धूप दीप नैवेद्य अर्पण करे प्रधान देवता भगवान पुरुषोत्तम को पुरुषयोग्य वस्त्र अलंकार अंगूठी तथा राधाजी को स्त्रीयोग्य वस्त्र साड़ी, ब्लाऊज, श्रृंगार सामग्री, चूड़ी, टिकली, बिंदिया, महावर, कुंकू, सेंदुर, काजल, आईना, अत्तर सुगंधित तेल, आदि अर्पण करके धान्य, चावल, फल मेवा, आदि से ओटी भरे। उत्तम प्रकार के मिष्टान्न पक्वान्न मिठाई मेवा, फल के द्वारा सभी देवताओं को भोग लगावे। लौंग, इलायची, जायपत्री, कपूर से बनाया हुआ पान का बीड़ा अर्पण करके पांचों देवताओं के निमित्त घी के पांच दीपक प्रज्वलित करके दीपदान करे। यदि मनुष्य में द्रव्य की शक्ति हो तो चारों देवताओं के निमित्त चार ब्राह्मणों को जप का संकल्प देकर चारों देवताओं की प्रसन्नता के लिये जप करवावे। तांबे के पात्र में जल भरकर उसमें गंध अक्षत पुष्प डालकर अपनी जंघा मोड़कर अर्थात् घुटना टेककर (देव देव नमस्तुभ्यं) इस मंत्र के द्वारा सभी देवताओं को अर्ध्य देना चाहिए। श्रद्धापूर्वक देवताओं को नमस्कार करे। आचार्य ब्राह्मण का पूजन करके भगवान के स्तोत्र का पाठ भागवत पुराण आदि का श्रवण करना चाहिए।

भगवान को छत्र चामर आदि अर्पण करके सभी देवताओं की प्रसन्नता और व्रत की पूर्ति के लिये बेदी बनाकर अग्नि को स्थापित करके अग्नि का पूजन करके शुद्ध घी और हवन सामग्री के द्वारा आचार्य के कहे मंत्रो द्वारा हवन करना चाहिये। हवन पूर्ण होने पर पंचलोक पाल, दशदिक्पाल और क्षेत्रपाल के बलि का विधान करके अग्नि में नारियल में घी भरकर पूर्णाहुति देना चाहिए। अनंतर घी की पांच या सात दीप मालिका सजाकर प्रेममय श्रद्धा में विभोर होकर भगवान की आरती करके मंत्र पुष्पांजली अर्पण करें। सभी देवताओं को साष्टांग दंडवत नमस्कार समर्पित करे। आमंत्रित ब्राह्मणों को पत्नि के सहित पाद प्रक्षालन करवा के गंध अक्षत लगाकर उत्तम प्रकार की भोज्य सामग्री मिष्टान्न पक्वान्न फल दूध खीर के द्वारा भोजन कराकर अपनी शक्ति के अनुसार वस्त्र, दक्षिणा तांबूल पान सुपारी देकर प्रार्थना करें कि हे ब्राह्मणों मैंने अपनी शक्ति के अनुसार इस उद्यापन कर्म में आपकी सेवा में जो भी समर्पित किया उससे आप संतुष्ट होकर आशीर्वाद दें कि यह उद्यापन कर्म परिपूर्ण हुआ इस प्रकार का आशीर्वाद ब्राह्मणों से ग्रहण कर उनको विदा करे। हे लक्ष्मी उद्यापन की रात्रि में अनेक मांगलिक वाद्य संगीत गीत भजन करते हुए रात्रि जागरण करते हुए व्यतीत करना चाहिए। दूसरे दिन प्रातःकाल नित्य नैमित्तिक कर्म करके स्नान करे शुद्ध वस्त्रों को धारण करके संध्या वंदन नित्य पूजन करके सभी देवताओं का उत्तर पूजन करना चाहिए। नाम मंत्रों से आचार्य द्वारा हवन करे, तर्पण मार्जन और भगवान की आरती और मंत्र पुष्पांजली समर्पित करके साष्टांग दंडवत नमस्कार करके हांथ जोड़कर प्रार्थना करे।

हे देवाधिदेव पुरुषोत्तम मैंने अपनी शक्ति और श्रद्धा के अनुसार जो नियमव्रत धारण करते हुए यथाशक्ति उद्यापन कर्म किया उससे आपकी कृपा बनी रहे तथा मेरे मन में निरंतर आपके प्रति श्रद्धा और निष्ठा बनी रहे। इस प्रकार भगवान की प्रार्थना करके आवाहित देवताओं का आचार्य के मंत्रों द्वारा विसर्जन करे। आचार्य का पूजन करके पूर्णपात्र का दान भगवान की मूर्ति और पूजन के मंडल का दान संकल्प पूर्वक आचार्य को देवे। यदि शक्ति हो तो सुंदर सुशील पुष्ट शरीर वाली दुग्ध देने वाली बछड़े के सहित गौ का दान करना चाहिए। आचार्य को वस्त्र आभूषण पददान, तिलपात्र, घृतपात्र, जलपात्र, छाता, जूता, शंख, पंच, रत्न, सप्तधान्य, श्री मदभागवत का दान अपनी श्रद्धा और शक्ति के अनुसार द्रव्य का लोभ त्यागकर करना चाहिए।

हे लक्ष्मी श्रीमद भागवत के दान का बड़ा भारी माहात्म्य है। साक्षात भगवान पुरुषोत्तम के स्वरूप का दान कहलाता है। हजार कन्यादान सैकड़ों बाजपेय यज्ञ करने से तथा अनाज से परिपूर्ण क्षेत्र का दान और अनेक तुलादान करने से जिस पुण्य की प्राप्ति होती है उससे हजार गुणा पुण्य की प्राप्ति श्री मद भागवत का दान करने वाले को प्राप्त होती है।

कांसे के अथवा तांबे, पीतल के पात्र में तैंतीस मालपुआ या अनरसा रखकर कपड़े से ढांककर व्रत की संपूर्णता प्राप्त करने के लिये आचार्य को संकल्प पूर्वक दान करना चाहिए। इस अपूप दान से अधिक मास के व्रत नियम की पूर्णता प्राप्त होती है। इसलिये अपूप दान अवश्य करना चाहिए। अगर मालपुआ, अनरसा बनाने का साधन न हो तो इसको बनाने की कच्ची सामग्री का दान करना चाहिए। ब्राह्मण को ही भगवान का स्वरूप मानकर उत्तम प्रकार के खाद्य सामग्री मिष्टान्न मेवा फल आदि का भोजन कराके पान सुपारी लौंग इलायची देकर उपरोक्त वस्तुओं का यथा शक्ति दान देवे। श्री कृष्णार्पण मस्तु ऐसा कहकर हांथ में जल दक्षिणा लेकर ब्राह्मण के हांथ में छोड़ देवे। मंत्रहीनं क्रियाहीनं और यस्यस्मृत्या इस मंत्र के द्वारा पुरुषोत्तम भगवान की वंदना करके आचार्य ब्राह्मण को विदा करके स्वयं प्रसाद और भोजन को ग्रहण करे। अपनी शक्ति के अनुसार गरीबों को भिक्षार्थियों को भोजन या अन्नदान देवे। यदि कोई मनुष्य अष्टमी या नवमी को उद्यापन करना चाहें उनको उद्यापन के बाद भी अमावस तक नित्यप्रति की तरह पूजन करते रहना चाहिए। और अमावस की रात्रि को मांगलिक वाद्य संगीत भजन कीर्तन करते हुए रात्रि जागरण करके दूसरे दिन आचार्य के द्वारा उत्तर पूजन का विधान करके विसर्जन कराके आचार्य का पूजन भोजन और दान योग्य सामग्रियों का दान भगवान से क्षमा याचना आदि उपरोक्त विधान से कर्म करके यथा शक्ति दक्षिणा और जल हांथ में लेकर श्री कृष्णार्पण मस्तु कहकर ब्राह्मण के हांथ में जल छोड़कर आशीर्वाद ग्रहण करके ब्राह्मण को विदा करके स्वंय प्रसाद और भोजन ग्रहण करे। हे लक्ष्मी इस प्रकार विधान पूर्वक जो मनुष्य अथवा स्त्री अधिक मास का उद्यापन कर्म करेंगे, वे सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्त होकर दुःख दारिद्रय और जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्त होकर सुख, शांति, संपत्ति, संतति, यश, कीर्ति, धनधान्य से संपन्न होकर सांसारिक जीवन व्यतीत करके अंत में अक्षय पद अर्थात् चौरासी लक्ष योनियों में भ्रमण की बाधा से मुक्त होकर अनंत में लीन होकर मोक्ष को प्राप्त होंगे।

जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार

बृहन्नारदीय पद्माधारे षड्विंशतितमोऽध्यायः समाप्त

(२६)

॥ शुभमभवतु ॥








Adhik mass ki Katha 25 adhyaya | अधिक मास की कथा 25वा अध्याय

 Adhik mass ki Katha 25 adhyaya | अधिक मास की कथा 25वा अध्याय 


॥ अथ पंचविंशतितमोऽध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री गणाधिपतये नमः ॥
श्री भगवान नारायण नारदजी से, श्री सूतजी शौनकादि ऋषियों से तथा भगवान विष्णु लक्ष्मीजी से कहते हैं। हे लक्ष्मी! अधिक मास में स्नान व्रत नियम दान आदि कर्म करते हुए भगवान पुरुषोत्तम की आराधना पूजा करते हुए संपूर्ण मास को श्रद्धापूर्वक व्यतीत करते हैं। ऐसे लोग संसार में सदा सुखी जीवन व्यतीत करते हुए अंत में मोक्ष को प्राप्त होते हैं। इस विषय में तुमसे पुरातन का इतिहास कहता हूँ। हे लक्ष्मी! इसी भारत वर्ष में वीरबाहु नाम का एक प्रसिद्ध राजा था। वह राजा नीतिपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करने वाला, यज्ञ यागादिक धार्मिक कृत्यों में रुचि रखकर दैवीकृत्यों को करने वाला महान बलिष्ठ बुद्धिमान और गुणवान था। उसी प्रकार उसकी पत्नी यशोमति नाम का था मदन मंत्री भी महान शूरवीर और स्वामी भक्त था। मंत्री की पत्नी का नाम गुणवती था। गुणवती अत्यंत धार्मिक वृत्तिवाली और पतिव्रता थी। वह हमेशा भगवान का पूजन व्रत उपवास करते हुए अनेक प्रकार के दान धर्म करती रहती थी। जब-जब अधिकमास प्रारंभ होता तब बड़ी श्रद्धा से नियम धारण करते हुए व्रत अखंडदीप अनेक प्रकार के दान करके भगवान पुरुषोत्तम को आराधना में संपूर्ण मास व्यतीत करती थी। इस जगमगाते अक्षय पुण्य के द्वारा मंत्रों के द्वारा पति गुणवती को सौभाग्य सूचक सौंदर्य बिना श्रृंगार किए ही श्रृंगार किया हो। यह सब भगवान पुरुषोत्तम की आराधना और कृपा से अलौकिक सौंदर्य उसको प्राप्त था। उधर राजा वीरबाहु की पति यशोमति अपनी युवावस्था और सुंदरता के जाल में फंसा हुआ राजा को सारे कारभार मंत्री के भरोसे छोड़कर भोगविलास के भोजन पेय पदार्थ, अनेक वाहनों का सुख, शिकार करना, अनेक वन उपवनों का भ्रमण करना इसी मौज मस्ती में राजा और रानी का सारा समय व्यतीत होता था। वे दोनों कभी भी देवताओं की पूजा अर्चना दान पुण्य कोई भी कर्म नहीं करते थे।
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इस प्रकार बहुत समय व्यतीत हो गया राजा के दो पुत्र उत्पन्न हुए राजा के पुत्र प्राप्ति से राजा और रानी को प्रसन्नता हुई उन्होंने पुत्रों के उत्तर होने की खुशी में राजमहल में खूब नर्तकियों का नृत्य गायन वादन आदि के द्वारा उत्सव मनाकर दोनों पुत्रों का नाम सुबाहु और शतबाहु रखा, दोनों पुत्र अत्यंत सुंदर और अच्छे शरीर वाले होकर दिन-प्रतिदिन बड़े होते गए। राजरानी पूर्ववत भोग विलास में निमग्न रहकर समय व्यतीत करने लगे। मंत्री की पत्नी गुणवती एक समय विचार मग्न होकर सोचने लगी। राजा को पूर्वजन्म के पुण्य प्रभाव से इस जन्म में राज्य ऐश्वर्य बलसंपत्ति सभी प्रकार का सुख प्राप्त हुआ है। परंतु राजा इस जन्म में कोई भी दान पुण्य देवताओं की पूजा आराधना नहीं करता तो इसके भविष्य में सुख कैसे मिलेगा पूर्व जन्म का पुण्य क्षीण होते ही यह सब नष्ट होकर राजरानी को महान कष्ट भोगना पड़ेगा। इसलिए परोपकार के निमित्त और भविष्य में कष्ट बाधाओं से बचाने के लिये पुण्य कर्म की प्रेरणा देना हमारा कर्तव्य है। ऐसा सोचकर एक समय गुणवती रानी के पास राजमहल में पहुँची। राजमहल अत्यंत सुंदर इंद्र के भवन के जैसा दिखता था अनेक स्थानों पर रत्न जड़े हुए सुवर्ण की नक्काशी से सुशोभित अनेक दास दासियों से परिपूर्ण ऐसे सुंदर राजभवन में रानी हो हमारी स्वामिनी हो मैं तुमसे एक रानी से प्रेम पूर्वक कहती हूँ। हे सखी यशोमति तुम हमारी रानी हो हमारे भविष्य के हित के लिये प्रार्थना करती हूँ तुम मेरे आग्रह को सुनने की कृपा करो। यह अधिक तुम्हारे भविष्य के हित के लिये है। अबसे तीसरा मास भगवान पुरुषोत्तम का मास आने वाला है। उस मास में स्नान, व्रत, दान और नियम धारण आदि थोड़ा भी किया हुआ कर्म महान पुण्य दाता और अंत में मोक्ष देने वाला होता है। इसलिए उस मास में तुम भी भगवान पुरुषोत्तम के प्रति श्रद्धापूर्वक कुछ कर्म करो इससे तुम्हारे समस्त मनोरथ पूर्ण होंगे। गुणवती के वचनों को सुनकर रानी यशोमति मुँह बिचकाकर कहती है, हे गुणवती मैं राजा की अर्धांगिनी होने थे व्रत नियम दान पुण्य कर्म करते हैं उसका कुछ भाग राजा को प्राप्त होता है। पुण्य प्राप्ति राजा की होती है, फिर शरीर को व्रत उपवास आदि करके सुखाने से मुझे प्राप्त क्या होता है। जब बिना परिश्रम के पुण्य प्राप्ति होती है, तो शरीर को व्रत उपवास आदि करके सुखाने से मुझे प्राप्त क्या होता है? जब बिना परिश्रम के पुण्य प्राप्ति होती है, तो शरीर को कष्ट देने से क्या फायदा? भाग्य से मिली संपत्ति का उपभोग करना चाहिए। यह युवावस्था तो सांसारिक सुख का उपभोग करने के लिये होती है। जो तुमने कहा वे सब कर्म वृद्धावस्था में करने चाहिए। अभी से शरीर की सुंदरता को सुखाने का कोई प्रयोजन नहीं है। कोई दूसरी बात मन को आनंद देने वाली करो। कहाँ से अधिक मास लेकर आ गई हो।
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इस प्रकार क्रोध प्रकट करते हुए रानी ने मंत्री की पत्नी गुणवती से कहा। रानी के वचनों को सुनकर गुणवती को मानसिक दुःख हुआ। परंतु रानी के सामने दुःख को प्रकट नहीं किया, कहते हैं, हे लक्ष्मी पराधीनता बड़ी कठिन होती है। मृत्यु के सदृश दुःख दाईनी हमेशा अपनी इच्छा का हनन करने वाली होती है। मालिक के सामने नौकर को अपनी इच्छा त्यागकर मालिक की आज्ञा का पालन करना पड़ता है। इस प्रकार समय व्यतीत होता रहा कुछ दिनों के बाद जब अधिक मास आया तो गुणवती ने पति की आज्ञा लेकर व्रत नियम धारण करते हुए अधिकमास में पूर्ण किया। इस पुण्य के प्रभाव से गुणवती के शरीर में सौभाग्य सूचक चिन्ह और भी अधिक रूप में प्रकट होकर उसके मुख की कांति बिना श्रृंगार किए ही जगमगाने लगी। कुछ दिनों के पश्चात रानी यशोमति ने अधिक मास के प्रति अवहेलना की थी उसके प्रभाव से उसकी युवावस्था को और असर होते वाले दोनों पुत्रों का एकाएक भयानक बुखार आया और उस बुखार की तीव्रता को न सहन करने के कारण दोनों पुत्रों का एक ही समय प्राणांत हो गया।
पुत्रों का इस प्रकार निधन देखकर यशोमति दुःख के कारण बार बार बेहोश होकर हाहाकार करते हुए रोने लगी। इसी प्रकार की हालत राजा वीरबाहु की भी थी। सारे राजमहल में घोर दुःख और हाहाकार मच गया। रानी यशोमति बार-बार अपने मस्तक को पृथ्वी पर पटकती पुत्रों का मुख देखकर अनेक प्रकार की सांत्वना देकर समझाते। उधर अनेक दासियाँ रानी को समझाने की कोशिश करती लेकिन सब व्यर्थ होता। गुणवती को जब यह समाचार सुनाई दिया तब उसको भी मानसिक दुःख हुआ। रानी को सांत्वना देने के निमित्त वह जल्दी से रानी के महल में पहुँची। रानी के मृत पुत्रों को देखकर संतप्त रानी के नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी वह भी रानी के दुःख में सहभागिनी हो गई। शोक से संतप्त रानी बार-बार पुत्रों का मुख चूमती उनके गुणों का वर्णन करती अपने वक्ष स्थल को पीटती और अनेक प्रकार से रुदन करती थी।
इस प्रकार बहुत देर तक रानी का रुदन चलता रहा कुछ समय के बाद रानी ने जब गुणवती की तरफ देखा और उसके मुख को श्रृंगार से रचा हुआ देखा कि उसके मस्तक में कुंकु लगा हुआ है मांग में सिंदूर भरा हुआ है आँखों में काजल लगा हुआ है। मुख में ओठों में लाली ऐसी दिखाई देती है
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जैसे अभी-अभी इसने पान का बीड़ा खाकर मुख रंगा हो। गुणवती के ऐसे श्रृंगार को देखकर रानी यशोमति की क्रोधग्नि भड़क गई। उसने क्रोध में भरकर कहा हे गुणवती मेरे ऊपर दुःख का पहाड़ टूटा हुआ है। ऐसे समय तुम श्रृंगार करके यहाँ आई हो तुमको शर्म नहीं आती क्या, ऐसे समय आने की यही रीति है। तुमको यह उचित मालूम पड़ता है क्या तुम मेरा उपहास करने आई हो।
उठो तुम इसी समय अपने घर जा जाओ। मुझे अपमानितनी को मेरे हाल पर छोड़ दो ऐसा कहकर रानी ने दासी के द्वारा गुणवती को महल से निकाल दिया। गुणवती अपमानित होकर अपने घर आ गई। घर आने पर गुणवती के प्रति दुःख हुआ। चिंतित होकर सोचने लगी मैंने तो कोई श्रृंगार नहीं किया मैं तो सरल स्वभाव से रानी के दुःख प्रकट करने गई थी फिर रानी ने इस प्रकार का व्यवहार क्यों किया। कुछ समय बाद मंत्री के घर आने पर उसने पति से कहा हे प्राणनाथ आज मैं राजमहल में रानी से मिलने और उसके दुःख में सहभागिनी बनने के निमित्त गई थी परंतु रानी ने मुझे उल्टे वचन कहकर तिरस्कार करते हुए महल से बाहर निकाल दिया।
इस प्रकार के व्यवहार से मेरे मन में बड़ा दुःख हुआ मेरे मन में यही चिंता सता रही है कि रानी ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया। पति के वचनों को सुनकर मंत्री ने अनेक प्रकार से पति को समझाया कि रानी इस समय दुःख के सागर में डूबी हुई है ऐसे समय मन व्य्यथित रहता है। अगर रानी ने इस अवस्था में कुछ कह दिया या अनुचित व्यवहार किया तो अपने मन में बुरा नहीं मानना चाहिए। कल सवेरे जाकर रानी को सांत्वना देकर समझाना। मैं भी कल प्रातः काल राजसभा में जाकर राजा को सांत्वना दूंगा। गुणवती को पति के द्वारा समझाने पर मानसिक दुःख का बोझ कुछ कम हुआ। दूसरे दिन प्रातः नित्य कर्मों से निपटकर मंत्री राजदरबार में जाकर पहुँच गया। गुणवती भी पति की आज्ञा से रानी के सौंदर्य के लिए श्रृंगार और सौंदर्य का श्रृंगार किया।
महल में पहुँचकर रानी का क्रोध तमतमाने लगा। उसने क्रोधपूर्ण होकर दासी को तरह आज भी श्रृंगार और सौंदर्य की युक्त देखकर रानी का क्रोध तमतमाने लगा। उसने क्रोधपूर्ण होकर दासी को तरह आज भी राजसभा में राजा को बुलाने के लिये भेजा। राजा के आने पर रानी ने कहा देखिये आज अपने लिये कितने दुःख का दिन है ऐसे समय यह गुणवती कितने ठाठ बाट से सजधज और श्रृंगार करके आई है। कल भी इसी प्रकार से आई थी मैंने इसको महल के बाहर निकाल दिया था। फिर भी आज यह उसी प्रकार सजधज कर आई है। यह हमारे अधीन रहकर भी बाहर से प्रेम और अंदर से द्वेष की भावना रखती है। मेरे दोनों पुत्रों की मृत्यु देखकर इसके मन में बड़ी प्रसन्नता हुई है। मैं इस बात को सहन नहीं कर सकती आपको
(पृष्ठ १०१)
विश्वास न होते स्वयं देखले ऐसा कहकर रानी के श्रृंगार युक्त मुख को देखकर रानी के पास पहुँची। राजा रानी का कथन उसे सत्य मालूम पड़ने लगा।
राजा ने उसी समय आदेश देकर मंत्री और उसकी पति को कैद करके जेल में पिलवा दिया और मंत्री के घर का सब द्रव्य और सामान जब्त कर लिया। मंत्री और उसकी पति जेल में रहकर विचार करते हैं कि ऐसा क्यों हुआ हमने कोई अपराध न करने पर भी यह सजा क्यों मिल रही है। कौन सा पाप कर्म हमसे हुआ जिसका प्रायश्चित हमको भोगना पड़ रहा है। पति के वचनों को सुनकर गुणवती ने कहा हे स्वामी हमारा राजा अविचारी, क्रोधी और पति की सलाह को मानने वाले है ऐसे राजा के विषय में सोचना व्यर्थ है। हमारे प्रारब्ध का भोग हमको भोगना पड़ रहा है। इसको मिटाने के लिए सर्व दुःखनाशक दया के सागर भगवान पुरुषोत्तम ही हमारी रक्षा कर सकते हैं। उन्हीं की प्रार्थना करते हुए अपना समय व्यतीत करना चाहिए। वे ही हमें इस दुःख से छुटकारा देंगे। इस प्रकार हथकड़ी बेड़ी से जकड़े हुए, पति-पत्नी भगवान का निरंतर नाम स्मरण करते हुए जेल की यातना सहने लगे।
कुछ दिन व्यतीत होने पर भगवान को अपने भक्तों पर दुःख पड़ना असह्य हो गया। भगवान ने एक ही रात्रि में राजा और रानी को स्वप्न देकर आदेश दिया हे वीरबाहु राजा तू बड़ा मूर्ख है। तूने इन दोनों को बिना विचार किए और उसकी पति को जेल में डालकर बड़ा अन्याय किया है। तेरे दोनों बड़े पुण्यात्मा और मेरे भक्त हैं। इनको जल्दी से मुक्त कर दे नहीं तो मैं तेरा सब नष्ट कर दूंगा। वे दोनों मेरे अनंत भक्त हैं। उन्होंने अनेक अधिकमास में व्रत नियम धारण करके मेरी आराधना करके अक्षयपुण्य प्राप्त किया है। पूर्व जन्म में ये दोनों अत्यंत निर्धन थे फिर भी अधिकमास में मैंने इनको मंत्री पद प्राप्त हुआ और उसकी पति गुणवती को अखंड सौंदर्य बिना श्रृंगार किए ही स्पष्ट दिखाई देता है। गुणवती के माथे पर कुंकु आंखों में काजल मांग में सिंदूर मुख में पान की लालिमा ये सब अक्षयपुण्य के द्वारा धुलवा कर देख ले, ये वे सौभाग्य चिन्ह मिटते हैं कि नहीं तब तुझे पूर्ण विश्वास हो जायेगा। वे श्रृंगार चिन्ह अगर नहीं मिटते हैं, तो उनको निर्दोष समझकर जेल से मुक्त कर दे। तुम्हारी पति रानी ने अधिकमास की अपेक्षा की है और इसीलिये तुमको पुरुषोत्तम प्राप्त हुआ है, इस प्रकार का आदेश देकर भगवान
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अंतर्ध्यान हो गए। प्रातःकाल उठकर राजा ने स्वप्न के प्रतिविस्तार करता हुआ रानी से स्वप्न का वृतांत कहा। रानी ने भी राजा से कहा कि मुझे भी इसी प्रकार का स्वप्न दिखा है। दोनों वे स्वप्न की हथकड़ी बेड़ी खुलवाकर दासी के द्वारा रानी का मुख बारबार धुलवाया और पोंछा गया। परंतु पति की हथकड़ियों में कोई कमी नहीं हुई। फिर भी रानी ने स्वयं अपने हाथों से गुणवती का मुख धोया और पोंछा। बारबार धोने के बाद थी जब गुणवती के सौभाग्य चिन्ह जैसे के तैसे रहे तब रानी बड़ी लज्जित होकर गुणवती से क्षमा मांगने लगी कि हे गुणवती मैंने तुम्हारा अपमान किया और बंधन का कुछ दिया उसके लिए क्षमा कर दो। इस प्रकार और गुणवती को आदरपूर्वक राजमहल में लाकर उनका आदर सत्कार किया गया। राजा ने भी हाथ जोड़कर मंत्री को आदेश दिया। हे मंत्री आप महान पुण्यात्मा हो आपके लिये स्वयं भगवान ने स्वप्न देकर हमको आदेश दिया। आपने अधिकमास में किस प्रकार का अनंतपुण्य और आपकी पति ने अखंड श्रृंगार को प्राप्त किया।
हमको भी उसका विधान बताएं आगे आने वाले अधिक मास में हम भी नियम धारण करते हुए, भगवान पुरुषोत्तम की आराधना और क्षमा प्रार्थना करेंगे। रानी ने अधिक मास की उपेक्षा की जिसके प्रायश्चित में हमें पुत्रशोक प्राप्त हुआ। उन्हीं देवता को आराधना करके फिर से पुत्र सुख प्राप्त करेंगे। इस प्रकार राजा और रानी ने दोनों को संबोधित करके उनकी संपत्ति और मंत्रीपद देकर प्रसन्न कर दिया। राजा और रानी को अधिक मास का प्रत्यक्ष फल और अनुभव प्राप्त कर पूर्ण विश्वास हो गया। आगे आने वाले पुरुषोत्तम मास में राजा और रानी ने गुणवती के मार्गदर्शन में नियम धारण करते हुए व्रत उपवास भगवान पुरुषोत्तम का पूजन दान पुण्यकर्म करते हुए श्रद्धापूर्वक संपूर्ण मास व्यतीत किया। और भविष्य में आने वाले सभी अधिकमास में निरंतर पुण्यकर्म करते रहे। इसके पुण्य प्रभाव से राजा के राज्य का और अधिक विस्तार होकर यशकीर्ति और पराक्रम में वृद्धि हुई और रानी को अत्यंत सुंदर सर्वगुण संपन्न ऐसे पांच पुत्र उत्पन्न हुए जिससे उसका पूर्व पुत्र शोक नष्ट हो गया। और रानी को अत्यंत संसार में जीवित रहे सभी प्रकार का सुख भोगकर अंत में मोक्ष को प्राप्त हो गए।
॥ जै जै श्री अधिकमास महात्म्य सार बृहत्नारदीय पंचविंशतितमोऽध्यायः समाप्त ॥
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॥ शुभमभवत् ॥





Adhik mass ki Katha 24 adhyaya | अधिक मास की कथा 24वा अध्याय

 Adhik mass ki Katha 24 adhyaya | अधिक मास की कथा 24वा अध्याय 


॥ श्री गणाधिपतये नमः ॥
श्री भगवान नारायण नारदजी से सूतजी पौराणिक ऋषियों से कहते हैं। हे ऋषियों! लक्ष्मीजी अब आप कृपाकर बतायें कि अधिक मास में दान करने से किस फल की प्राप्ति होती है। भगवान विष्णु कहते हैं, हे लक्ष्मी! जो मनुष्य अधिक मास में अपनी शक्ति के अनुसार सुपात्र ब्राह्मण को सुवर्ण का दान करते हैं। उनकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। दुःख दारिद्रय की बाधाएं आजीवन पर्यंत नहीं होती। गौदान करने वाले को मृत्यु के उपरांत अनेक कल्पों तक ब्रह्मलोक में निवास करने का फल प्राप्त होता है। जो चांदी का दान करते हैं वे चांदी का दान करके पितृलोक में निवास करते रहे अपने पितरों का उद्धार करते हैं। तंबा या तांबे का पात्र देने से पार्वती सहित भगवान शंकर प्रसन्न होते हैं। उनकी प्रसन्नता से मनुष्य सर्वत्र आनंद और सुख भोगता है। रत्नदान करने से दूसरे जन्म में राजा के घर में जन्म होता है।
मोती का दान करने से मुक्ति की प्राप्ति होती है। कंबल का दान करने से मनुष्य के अनेक जन्मों का पाप नष्ट होता है। सूती वस्त्रों का दान मनुष्य को चंद्रलोक का फल देता है। अत्र का दान महादान कहलाता है। अत्र वज्रल का दान अक्षय पुण्य को देता है। जूता चप्पल या पैरों में पहनने योग्य वस्तु का दान मृत्यु के बाद यमदूतों की यातना से मुक्ति देता है। घी और घी से भरा हुआ पात्र का दान सूर्यलोक का पुण्य देता है। तिलपात्र का दान रुद्रलोक का पुण्य देता है।
हे लक्ष्मी! पुरुषोत्तम मास में द्वादशी के दिन पुरुषोत्तम भगवान और शंकरजी की पूजा करके सुपात्र ब्राह्मण को भी पूजा करके अपनी शक्ति के अनुसार पहले कहे गए वस्तुओं का दान श्रद्धा के सहित संकल्प पूर्वक करना चाहिए। और अमावस को उद्यापन कर्म विद्वान ब्राह्मण के द्वारा विधान पूर्वक कराना चाहिए। शुद्ध घी इलायची शक्कर आदि पदार्थों से बना हुआ मालपुआ, अनरसा या लड्डू तैंतीस की संख्या में कांसे का पात्र या अपनी शक्ति के अनुसार तांबा या पीतल के पात्र में रखकर सुपात्र ब्राह्मण को दान देना चाहिए। इस दान से ही पुरुषोत्तम मास के समस्त नियम व्रत आदि जो भी धारण किए हैं उनकी पूर्ति होती है। इस कर्म के द्वारा दान देकर मनुष्य निर्विघ्नता और अनेक सुखों को प्राप्त करता है। उसकी समस्त मनोकामनाएं परिपूर्ण होती हैं। जन्मजयांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं।
इसलिए मनुष्य को पुरुषोत्तम मास में अपनी शारीरिक शक्ति के अनुसार कोई भी नियम धारण करके श्रद्धापूर्वक द्रव्य का मोह लोभ त्याग कर दान कर्म अवश्य करना चाहिए क्योंकि मनुष्य की आयु फटे दूध के समान दिन प्रतिदिन कम होते जाती है। कब आयु समाप्त होकर मृत्यु हो जाए इसका कोई निश्चित नहीं है। आगे आने वाला पुरुषोत्तम मास देख सकें या नहीं यह भी निश्चित नहीं है। गंगा, गया, कांची, पुष्कर, रेवा, मही, शिवा, यमुना, चंद्रभागा, गोदावरी, कुरुक्षेत्र ये सब पवित्र तीर्थ पुण्यदायक हैं फिर भी पुरुषोत्तम मास के पुण्य की बराबरी नहीं कर सकते।
जैसे उत्तम भूमि में बोया हुआ बीज असंख्य बीज उत्पन्न करता है। गुरुबल की एकलता असंख्य पत्ते उत्पन्न करती है। दूर्वा का एक अंकुर शीघ्र ही असंख्य अंकुरों में उत्पन्न होती है। उसी प्रकार पुरुषोत्तम मास का किंचित भी नियम व्रत आदि कर्म अनंत पुण्य देने वाला होता है। इसलिये मनुष्य को पुरुषोत्तम मास में यथा शक्ति कर्म अवश्य करना चाहिए। है तुमसे पुरातन का एक इतिहास कहता हूं। एक समय ऋषिगण अरुंधती और पार्वतीजी आपस में संवाद चल रहा था। अरुंधती ने हाथ जोड़कर पार्वती से विनय किया है उमा आपने मुझे पुरुषोत्तम मास के निर्मल पुण्य का वर्णन कहा। अब अधिक मास में पुण्य प्राप्ति का कर्म और बताईयेगा। पार्वती जी अरुंधती के वचनों को सुनकर कहती हैं कि मैं एक समय अपने पति के पास बैठी हुई थी उसी समय मेरी माता मेरे पास आकर स्नेहपूर्वक कहती हैं। हे पुत्री तुम मुझसे उत्पन्न होकर तीनों लोक में विख्यात हो गई हो। और सारा संसार तुम्हारी पूजा करता है।
परंतु मुझे और मेरे नाम तक को कोई नहीं जानता ब्रह्मा आदि देवता तक तुम्हारी आराधना करते हैं। तुम्हारी माता होने का सौभाग्य मुझे अवश्य प्राप्त हुआ है। परंतु मेरी ख्याति सिर्फ अपने घर परिवार तक ही सीमित हैं। सांसारिक मनुष्य कोई मुझे नहीं जानते। प्रत्येक दिन पक्ष मास पर्व और प्रत्येक शुभकार्यों में तुम्हारी पूजा होती हैं। परंतु मेरे नाम से मेरे मस्तक पर कोई एक फूल तक नहीं चढ़ाता। ऐसी अवस्था में तुम्हारी माता होने का मुझे क्या श्रेय मिला। वर्ष के तीनसौ पैंसठ दिन सभी तुम्हारी पूजा और व्रत में लोग व्यतीत करते हैं। परंतु मुझे लोग आधी घटी तक भी याद नहीं करते। हे अरुंधती माता के ऐसे वचनों को सुनकर मैंने हंसते हुए माता से कहा कि हे माता आप ऐसा क्यों बोलती हो। यद्यपि संपूर्ण बारह मास लोग मेरी पूजा करते हैं। परंतु अत्यंत धार्मिक और पुण्यदाता ऐसा जो अधिक मास होता है उसमें कोई मेरी पूजा नहीं करता। इसलिये मैंने अधिकमास आने पर मैं तुम्हारी पूजा करूंगी ऐसी सांत्वना देकर अधिक मास को पुण्यदाई और कृपा करके मुझे विस्तार पूर्वक बताइये।
पार्वतीजी के वचनों को सुनकर अरुंधती जी कहती हैं। हे कल्याणी आपने अधिक मास में किस प्रकार किस विधान से माता का व्रत और पूजन किया तथा उस व्रत के द्वारा कौन से पुण्य की प्राप्ति होती है कृपा करके मुझे विस्तार पूर्वक बताइये।
पार्वतीजी कहती है, हे सखी तुमने जन कल्याण के लिये उत्तम प्रश्न किया है। मैंने अपनी माता की ख्याति के लिये अधिकमास के उनके प्रति समर्पित कर दिया है। हे अरुंधती अधिकमास की शुक्लपक्ष की तृतीया के दिन किसी जलाशय कुंआ, नदी, तालाब अथवा अपने घर में शुद्ध जल से स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करे नित्य नैमित्तिक संध्या पूजा करके घर के पवित्र स्थान में गोबर से लीपकर चौकपुरकर पलाश की लकड़ी का आसन रखना चाहिए। आसन पर सुंदर वस्त्र बिछाकर माता की मूर्ति ऐसी बनी हो जो हांथी पर पति और पुत्र के सहित बैठी हुई अनेक अलंकार और वस्त्रों से सुशोभित ऐसी सुंदर माता की मूर्ति को आसन पर स्थापित करना चाहिए।
विद्वान ब्राह्मण के द्वारा मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करके पाद्य, स्नान, अर्घ्य, अक्षत पुष्प, धूपदीप, नैवेद्य, पान, सुपारी, फल, दक्षिणा समर्पित करके आरंभी श्रद्धा पूर्वक पुष्पांजलि जलाकर नित्यपूजन में श्रद्धा पूर्वक करना चाहिए। धन का लोभ त्यागकर संपूर्ण मास पर्यंत अखंडदीप जलाकर माता के प्रति अर्पण करना चाहिए। शरीर में जैसे उत्पन्न होने वाले फल और फूलों को तथा स्वादिष्ट व्यंजनों को माता के प्रति अर्पण करना चाहिए। शरीर में जैसी शक्ति हो उसके अनुसार व्रत उपवास या एक समय भोजन का नियम धारण करना चाहिए। यदि शरीर शक्तिहीन हो तो पहले और आखिरी दिन का उपवास या पूजन हवन करके अंत में अमावस के दिन माता की सुवर्ण की मूर्ति बनाकर विद्वान ब्राह्मण के द्वारा पूजन हवन करके संकल्पपूर्वक वस्त्र और अलंकार के सहित मूर्ति का दान करना चाहिए। यदि मनुष्य में धन संपन्नता हो तो पांच ब्राह्मण पति के सहित आमंत्रित करके उनका पाद प्रक्षालन करके उनका यथाशक्ति वस्त्र दक्षिणा देकर आशीर्वाद ग्रहण करके व्रत की पूर्ति करनी चाहिए। हे अरुंधती इस प्रकार जो भी क्रिया या स्त्रियां इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करेंगी उनको संपूर्ण पुरुषोत्तम मास के पुण्य की प्राप्ति होगी। मनुष्य सांसारिक बाधाओं से छुटकारा पाकर सुख और शांति का जीवन व्यतीत करेंगे तथा अखंड सौभाग्य और पुत्र पौत्रादिकों का सुख प्राप्त करके अंत में मोक्ष को प्राप्त करेंगे। यह माता मैंने का व्रत और पूजन समस्त सांसारिक सुख को देनेवाला अंत में मोक्ष को देने वाला है।
जे जै श्री अधिकमास महात्म्य सार
ब्रह्मरादिय पद्याधारे चतुर्विंशतितमो ऽध्याय: समाप्त
(२४)
।। शुभमभवतु ।।






Adhik mass ki Katha 23 adhyaya | अधिक मास की कथा 23वा अध्याय


Adhik mass ki Katha 23 adhyaya | अधिक मास की कथा 23वा अध्याय 




 ।। अथ त्रयोविंशतितमो ऽध्याय: प्रारंभ: ।।

श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकदि ऋषियों से कहते हैं, भगवान विष्णु के द्वारा स्नान के महात्म्य को सुनकर लक्ष्मीजी प्रसन्न होकर प्रश्न करती हैं। हे महाप्रभु अब आप कृपाकर धारणा पारणा (एकांतोरपवास) व्रत के महात्म्य का वर्णन सुनाइयेगा। और यह किससे किया और कैसे फल को प्राप्त किया, सो बताने की कृपा करें। भगवान विष्णु कहते हैं, हे लक्ष्मी विंध्य पर्वत के एक भाग में अमरकंटक नाम का पर्वत हैं। उसी पर्वत में नर्मदाजी का उद्रम स्थान है। उस पर्वत पर सन्यासी जिसे भगवान शंकर निवास करके तपस्या करते हैं। नर्मदाजी का साक्षात शंकर का वर हस्त मानी जाती है। जिसे मनुष्य अपनी मनोरकामनाओं को प्राप्त करते हैं। वैसे ही नर्मदाजी का स्नान परिक्रमा और पूजा नर्मदा नदी के किनारे बड़े बड़े तीर्थस्थल और भगवान शंकर के मंदिर बने हुए हैं। इसी प्रकार भृगुच्छ नाम का एक नगर है। उस नगर में सदाचार संपन्न सत्यवादी कुशल शर्मा नाम का ब्राह्मण रहता था। सुंदर और पतिव्रता कुशलावती नाम की उसकी पति थी। वे दोनों पति-पति अपने धर्म कर्म में लगे हुए जीवन यापन करते थे। उनकी मेधावती नाम की कन्या थी। कन्या जब विवाह योग्य हुई तब ब्राह्मण ने पदमनाभ नाम का ब्राह्मण पुत्र जो कि सुंदर सुशील और विद्वान था उसके साथ अपनी कन्या का विवाह कर दिया। कन्या अपने पति के घर में आनंदपूर्वक रहने लगी। दोनों पति पति में अनंत प्रेम था। एक दिन का भी वियोग दोनों को असह्य था। कुछ दिनों के बाद भाग्य की विवित्रता से एकदिन पदमनाभ नर्मदाजी में स्नान करने गया। अपने समवयस्क लोगों से जल क्रीड़ा करते हुए पानी में डूबने लगा। साथ के लोगों को जब वह नहीं दिखाई दिया तब लोग घबड़ाकर उसको पानी में ढूढने लगे। परंतु उसके प्राण जा चुके थे वह मृत हो चुका था। तुरंत लोगों के द्वारा उसके शरीर को निकालकर बाहर लाए। उसके घर पहुँचा। उसके मातापिता और पति रोते दहाकार करते हुए वहां आए। पति उसके मृतशरीर को गोद में लेकर छाती पीटती हुई रुदन करती रही है देव हे जगन्नाथ मैं इस वैधव्यता का दुख कैसे भोगूंगी।

प्राण क्यों नहीं निकलते। मेरा सौभाग्यही जहां डूब गया अब मैं इस जीवनरूपी सागर को कैसे पार करूंगी। पति के बिना जैसे मछली तड़पती है। उसी प्रकार से वह तड़प रही थी। उसी प्रकार से कुछ दिनों तक सास-श्वसुर के पास रही कुछ दिनों बाद पिता ने उस दुखी कन्या को सांत्वना और धीरज देने के तन्मित अपने घर ले आए। परंतु माता पिता के घर आने के बाद भी उसका दुःख कम नहीं हुआ रात दिन रोती, तड़पती हुई अपने भविष्य में सोचती रहती थी।

आखिर अपने पूर्वजन्म का पाप उदय हुआ यह समझकर उसके प्रायश्चित करने के लिये कोई व्रत या देवता की आराधन करना चाहिए। इस निमित एक बालिका ने अपने पिता से कहा, हे पिता मेरे दुःख को दूर करने के लिये आप कोई व्रत आदी साधन मुझे बताइये। जिसके द्वारा मैं दुःख से छुटकारा पाकर भवसागर से पार हो जाऊं। कन्या के वचनों को सुनकर पिता ने कहा हे पुत्री अब से तोत्तम मास भगवान पुरुषोत्तम का मास आनेवाला हैं। उस मास में एकांतोरपवास जिसको धारणा पारणावत भी कहते हैं, करने से मनुष्य के पापों का समूह नष्ट हो जाता है। सभी दुःख दूर होते है। और मनुष्य भव्यवसागर से पार हो जाता है। पिता के वचनों को सुनकर मेधावती प्रसन्न होते हुए समय व्यतीत होने पर पुरुषोत्तम मास प्रारंभ हुआ तब पिता के कथनानुसार नियम धारण करके हुए ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नर्मदाजी में स्नान करना, भगवान पुरुषोत्तम की पूजा करना, विप्रपूजा करके यथा शक्ति दान देना, भूमि पर शयन करना, एकदीत उपवास करके दूसरे दिन हविष्य खाकर पारणा करना अखंडदीप की स्थापना आदि इस प्रकार नियमपूर्वक बड़ी श्रद्धा से संपूर्ण मास पूरा करके उपवास के दिन विधिवत उद्यापन किया। इस प्रकार उसने अपने जीवन में अनेक पुरुषोत्तमास नियम और श्रद्धापूर्वक संपूर्ण किया। समय व्यतीत होते बुद्धवस्था आने पर शरीर कृश हो गए और उसका अंत समय प्राप्त हो गया। पुण्य के प्रभाव से और भगवान शंकर की महान भक्ति के कारण मृत्यु के बाद वह मेधावती की आत्मा शिवलोक में पहुंच कर पार्वतीजी की सखी हो गई। वहां अनेक सुखों को भोगकर पृथ्वी पर फिर से जन्म लिया। काशी नगरी में विशालाक्षी नामक तपस्विनी के रूप में प्रसिद्ध हुई। आज भी काशी में विशालाक्षी मंदिर है लोग उसके पूजा करके अपना मनोरथ पूर्ण करते हैं। हे लक्ष्मी पुरुषोत्तम मास का धारणा पारणावत शरीर को अरोग्यता देनेवाला, अंत में मोक्ष देने वाला है। इसी व्रत के प्रभाव से वह मेधावती मानव शरीर वाली होकर दूसरे जन्म में देव स्वरूप हो गई।

हे लक्ष्मी मेधावती की एक सखी कोमला नाम की ब्राह्मणी थी उसे भी पुण्य के प्रभाव से मृत्यु के बाद शिवलोक से अधिक मास में नरक भोजन में जन्म लेकर तपस्या के प्रभाव से मंगलागौरी के नाम से आज भी प्रसिद्ध है। हे लक्ष्मी पुरुषोत्तम मास का अद्भुत पुण्य है। जिसका वर्णन हजार मुख वाले शेषनाग भी करने में असमर्थ है। इतनी कथा सुनकर लक्ष्मीजी कहती हैं, हे महाप्रभु अब आप विप्रसेवा के महात्म्य का वर्णन सुनाइयेगा। भगवान कहते हैं, हे लक्ष्मी मैं तुम से इस विषय का एक इतिहास सुनाता हूँ। भरतखंड में विराट नाम का देश है। उस देश में अनेक पुण्यशाली और धनिक लोग रहते थे। उस नगर में अनेक मंदिर थे कुएं बावली तालाब और बगीचों से वे नगर हमेशा संपन्न और सुखी रहेगा। वहां परमार्थिक कर्म होते रहने से देवताओं को प्रसन्न वरदान दिया था कि शंकरजी का भी मंदिर है। चारों वर्णों के लोग अपने कर्म धर्म में लगे रहकर सभी प्रकार से सुखी और प्रसन्न है। उसी नगर में धनदास नाम का एक शूद्र रहता था। वह धनसंपन्न था और उसके अनेक नौकर थे। परंतु वह हमेशा ब्राह्मणों को आमंत्रित कर अपने हाथ से ब्राह्मणों का पादप्रक्षालन और पूजा करता था और अनेक प्रकार के दान देकर संतुष्ट करता था। अनेक पर्व के समय स्वयं ब्राह्मण के घर जाकर झाडू लगाए, कपड़े धोए, उनकी आवश्यक इच्छित वस्तु को बाजार से लाकर देना ये सब स्वयं पति के सहित करता था। उसकी पति भी पति का अनुसरण करते हुए विप्र पत्नियों की सेवा करती रहती थी। धनदास को अपने ऊपर धन संपन्न होने का कोई गर्व नहीं था वह विप्रसेवा में कितना भी धन क्यों न खर्च हो जाए उसके मन में चिंता नहीं होती थी। इस प्रकार विप्रसेवा करते हुए उसकी आयु बहुत बीत गई। अचानक दैव के प्रभाव और पूर्वजन्म के कर्म के प्रभाव से धनदास के शरीर में काफी कष्ट का रोग उत्पन्न हो गया। जगह जगह उसके शरीर में व्रण (घाव) खून और पीब बहने लगी। रोग को देखकर धनदास मन में बहुत उदास रहने लगा। कि अब मेरे से ब्राह्मणों की सेवा कैसे होगी। इसी चिंता ग्रस्त स्थिति में एक समय एक सिद्ध पुरुष धनदास के घर आए उनसे उसने अपने मन का दुःख प्रकट किया। उसके दुःख को सुनकर सिद्ध पुरुष ने कहा हे धनदास तू चिंता छोड़ दे तूने जो विप्रसेवा की है, उसका पुण्य तुझे अवश्य प्राप्त होगा। तेरी अच्छी मृत्यु होगी और मृत्यु के बाद तू और तेरी पति सुंदर विमान पर बैठकर स्वर्ग लोक को जाओगे। ऐसा कहकर सिद्ध पुरुष वहां से अंतर्धान हो गए। सिद्ध पुरुष के शब्दों को यादकर धनदास बहुत प्रसन्न हुआ अपने धन संपदा के तीन भाग किए।

एक भाग अपने पुत्र को दूसरा भाग कन्या को और तीसरा अपने साथ लेकर तीर्थ यात्रा को पत्नी समेत निकल गया। अनेक तीर्थों में अपने धनका दान कर दिया। तीर्थ क्षेत्र में रहते हुए, ही दोनों पति पति की एकही दिन मृत्यु हो गई। अपने पुण्य के प्रभाव से सुंदर विमान पर बैठकर उन दोनों की जीवात्मा स्वर्ग लोक को चली गई। हे लक्ष्मी विप्रसेवा का महात्म्य देवताओं की पूजा से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। मैंने भी जब पृथ्वीपर जन्म लिया तब विप्रसेवा अवश्य की है।

(२३)

बृहत् नारदीय पद्माधारे त्रयोविंशतितमो ऽध्याय: समाप्त ।।

।। शुभमभवत् ।।





Adhik mass ki Katha 22 adhyaya | अधिक मास की कथा 22वा अध्याय

 

Adhik mass ki Katha 22 adhyaya | अधिक मास की कथा 22वा अध्याय 


|| अथ द्वाविंशो ऽध्याय: प्रारम्भ: ||

|| श्री गणेशाय नम: ||

हे लक्ष्मी! भगवान नारायण से सूतजी शौनकादि ऋषियों से और भगवान विष्णु लक्ष्मी जी से कहते हैं। हे लक्ष्मी! पहले किसी समय मारवाड़ प्रदेश में गोकर्ण पर्वत के किनारे शिवपुरी नाम की एक सुंदर नगरी थी। वह नगरी चारों तरफ विख्यात और प्रसिद्ध थी। उसमें बड़े बड़े राजमार्ग और छोटे बड़े गलियाँ, गलियारे बने हुए थे। बड़े बड़े महल और छोटे बड़े मकान बहुत से थे। उस नगरी में चारों वेदों के ज्ञाता विद्वान ब्राह्मण और क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सभी वर्ण और जाति के लोग रहते थे। और अपने अपने कर्म करते हुए सब संपन्न और सुखी थे। सत्य बोलना, शुद्ध सात्विक व्यवहार करना यही समस्त नगरवासियों में विशेषता थी।

अनेक स्थानों पर कथा, भागवत, होम, हवन, यज्ञ आदि हमेशा होते रहते थे। वेद मंत्रों का घोष और शास्त्रों की चर्चा हर मंदिरों में हुआ करती थी। सभी जाति के लोग एकत्रित होकर भजन, कीर्तन आदि किया करते थे। उस नगरी में अधर्म और पाप कहीं देखने में नहीं आता था। ऐसी वह उत्तम शिवपुरी नाम की नगरी थी। उसी नगर में विप्रदास नाम का एक शूद्र रहता था। वह सदाचार संपन्न और जैसा उसका नाम था उसमें गुण भी था। उसी प्रकार उसकी स्त्री भी अत्यंत सुंदर पतिव्रता, पति की आज्ञा का अनुसरण करने वाली थी। वे दोनों पति-पत्नी हमेशा ब्राह्मणों की सेवा में लगे रहते थे। जब पुरुषोत्तम मास प्रारंभ हुआ तब दोनों पति-पत्नी ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर नित्य ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने का नियम प्रारंभ करके ब्राह्मणों को अनेक प्रकार का दान करने लगे।

हे लक्ष्मी! गोकर्ण पर्वत के समीप गोकर्णो नाम की नदी थी। उसी नदी के किनारे सारणेश्वर नाम का भगवान शंकर का भव्य मंदिर था। उस मंदिर में लिंगरूप भगवान शंकर की सुंदर और जागृत मूर्ति है। भगवान सारणेश्वर की पूजा अर्चना से मनुष्यों की समस्त मनोकामनाएं परिपूर्ण होती है। वह विप्रदास पति के सहित नित्य प्रति उसी गोकर्णो नदी में ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने के लिए जाता था। और स्नान करके भगवान सारणेश्वर की पूजा करते और विद्वान ब्राह्मणों की पूजा करके श्रद्धापूर्वक अन्न, वस्त्र, तिलपात्र, सुवर्ण, द्रव्य का दान करते थे।

(पृष्ठ ६८)

इस प्रकार संपूर्ण अधिकमास पर्यंत उनका क्रम चलता रहा अंतिम अमावस के दिन उसी मंदिर में अनेक विद्वान ब्राह्मणों को निमंत्रित करके यथानियम पूर्वक अध्यापन किया और स्वर्णिक ब्राह्मणों को उत्तम भोज्य सामग्रियों से भोजन कराकर वस्त्र अलंकार और सुवर्ण आदि की दक्षिणा दी। और हाथ जोड़कर ब्राह्मणों से दीनवाणी के द्वारा प्रार्थना कि हे महाराज! मैं अत्यंत दीन और गरीब हूं, आप लोगों ने मेरे ऊपर बड़ी कृपा की जो मेरा निमंत्रण स्वीकार करके अपने यहां आए। आप लोग मुझे आशीर्वाद दें कि मेरा यह उद्यापन संपन्न हो गया और मेरे मन में भगवान के प्रति और आप लोगों के चरणों में ऐसी ही श्रद्धा बनी रहे।

इस प्रकार ब्राह्मण लोग उस विप्रदास को आशीर्वाद देकर अपने अपने घर चले गए। विप्रदास अपना समस्त कार्य जैसे मंदिर जाते हुए दान, भोजन सायंकाल होकर रात्रि का समय आ गया। तब वह पति के सहित साथ भगवान का प्रसाद चरणामृत और गोकर्णो गंगा जल लेकर अपने घर जाने के लिए निकला। आद्यात्म ही पर सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले अपने घर के जाने के लिए सैकड़ों प्रेत खड़े हुए दिखाई दिए। वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले भयंकर आकृति वाले सैकड़ों प्रेत खड़े हुए दिखाई दिए। वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले भयंकर आकृति वाले सैकड़ों प्रेत खड़े हुए दिखाई दिए, वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले भयंकर आकृति वाले थे। वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले थे। वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले थे। (पाठ में यहाँ पुनरावृत्ति है) वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले थे। भयंकर आकृति वाले सैकड़ों प्रेत खड़े हुए दिखाई दिए। वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले भयंकर आकृति वाले थे। निरंतर चीत्कार का शब्द और अंगों से समस्त चमकती हुई और मेंढक का मुख, शरीर और जैसा उसका नाम था उसी प्रकार का उसमें गुण था। उसी प्रकार उसकी स्त्री भी अत्यंत सुंदर पतिव्रता, पति की आज्ञा का अनुसरण करने वाली थी। वे दोनों पति-पत्नी हमेशा ब्राह्मणों की सेवा में लगे रहते थे। जब पुरुषोत्तम मास प्रारंभ हुआ तब दोनों पति-पत्नी ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर नित्य ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने का नियम प्रारंभ करके ब्राह्मणों को अनेक प्रकार का दान करने लगे।

हे महाराज हम लोग प्रेत हैं निंदनीय वस्तु का भक्षण, हिंसा आदि निंदनीय हमारे कर्म है अनेक

(पृष्ठ ६९)

पाप कर्म करना दूसरे लोगों को कष्ट देना यही हमारा कर्म है। हम लोग अत्यंत क्रूर स्वभाव के हैं। हमारी संख्या सात सौ है। भूख प्यास से पीड़ित होकर घूमते रहते हैं। इस प्रेत योनि में सिवाय दुःख के कुछ भी नहीं है। आज आपके चरणों को देखकर मन को कुछ समाधान हुआ है। हे महाराज साधुजन के रक्षक होते हैं। हम लोग अत्यंत पापी और दीन है। आपके सिवाय हमारा कोई उद्धार नहीं कर सकता आप महान पुण्यात्मा है हम लोग दुःख भोगते हुए मारे-मारे फिरते हुए, अनेक कल्प बीत गए। आज हमारे सौभाग्य से आपका दर्शन हो गया। आप से प्रार्थना है अपने पुण्य प्रभाव से हम लोगों को इस प्रेत योनि से मुक्ति दे दो।

इस प्रकार प्रेतराज की प्रार्थना को सुनकर विप्रदास के मन में दया उत्पन्न हो गई। उसने मन में भगवान पुरुषोत्तम का ध्यान करके हाथ में गोकर्णो गंगा का जल लेकर संकल्प किया कि मैंने इस अधिकमास में जो नित्य स्नान का नियम धारण किया उसमें से सात स्नान का पुण्य होते ही वे सब प्रेत योनि से मुक्त होकर दिव्य स्वरूप धारण कर, स्वर्ग लोक को चले गए। हे लक्ष्मी सात सौ प्रेतों का उद्धार सिर्फ सात स्नान के पुण्य से हो गया। हे लक्ष्मी सौराष्ट्र देश में प्रभास नाम की एक नगरी थी उसमें सोमशर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वह वेद शास्त्रों में पारंगत सर्वगुण संपन्न वाजपेय आदि यज्ञों को करता था। अपनी शक्ति के अनुसार दान पुण्य भी करता था। उसने परोपकार की दृष्टि से अनेक गांवों में कुआं बावली भी बनवा दिए थे। समय समय पर कार्तिक स्नान माघ स्नान व्रत, उपवास अनेक पर्वों के पुण्य प्राप्ति के दान भी किए थे।

एक समय वह सोमशर्मा ब्राह्मण किसी पर्व के समय सरस्वती नदी का सागर के साथ जहां संगम हुआ वहां स्नान के निमित्त घर से निकला। जंगल के मार्ग से जा रहा था। रास्ते में एक पर्वतकार शरीर वाला भयंकर राक्षस मार्ग में खड़ा हुआ था। वह पीले रंग का जा रहा था रास्ते में एक पर्वतकार शरीर में स्थित लगा हुआ लंबा, लंबी गर्दन, लंबा पेट, मुख विकराल जिह्वा, बड़ी बड़ी मगरमच्छ जैसी दाढ़े, गुफा जैसी नाक, ऊंट के समान खड़ा हुआ उस राक्षस को देखकर मन में कुछ भयभीत हुआ। परंतु हिम्मत करके मन में नृसिंह भगवान का स्मरण करके खड़ा हो गया। वह राक्षस ब्राह्मण को देखकर उसको पकड़ने के लिए दौड़ा। ब्राह्मण के समीप जाने पर भी वह ब्राह्मण को स्पर्श करने में असमर्थ हो गया।

(पृष्ठ ७०)

पुण्य कर्मों के द्वारा ब्राह्मण तेज और आत्मबल होने से राक्षस असमर्थ हो गया। उसका कोई बल प्रयोग नहीं चलता था। अपनी ऐसी अवस्था देख राक्षस को आश्चर्य हुआ और मन में ज्ञान का उदय हुआ कि यह ब्राह्मण जरूर कोई पुण्यात्मा और तपस्वी होना चाहिए। मैंने तो बड़े-बड़े शक्तिशाली नर और पशुओं को मार डाला। फिर ये साधारण मनुष्य के सामने मेरी शक्ति क्यों क्षीण हो गई। ज्ञान उत्पन्न होते ही वह राक्षस सोमशर्मा को दंडवत नमस्कार करके हाथ जोड़कर प्रार्थना करता है, हे स्वामी! पुण्यात्मा आज मैं आपके पुण्य तप के समक्ष असमर्थ हो गया हूं। मैं राक्षस हूं अनेक स्वरूप का दर्शन करने से मेरे पाप नष्ट हो गए हैं और ज्ञान का उदय हो गया है। मैं आपके दर्शन करने के लिए तरस रहा था। मेरे भाग्य से आपके दर्शन हो गए हैं और आपके दर्शन करने से मेरा पाप नष्ट हो गया है। मैं आपके दर्शन करने से मेरा पाप नष्ट हो गया है। हे स्वामी! मेरे ऊपर भी कृपा करके मुझे इस दुर्गति से मेरा उद्धार करिए। साधुजन हमेशा दोनों के रक्षक और परोपकारी होते हैं। मेरे ऊपर भी आप उपकार करिए।

इस प्रकार राक्षस की प्रार्थना सुनकर ब्राह्मण ने मन में विचार किया कि अगर मैंने इसके ऊपर दया नहीं की तो यह राक्षस और अनेक प्राणियों को कष्ट देकर हत्या करेगा। इस का उद्धार करने से मुझे भी पुण्य प्राप्त होगा। ऐसा विचार कर ब्राह्मण ने हाथ में जल लेकर भगवान पुरुषोत्तम का स्मरण करके संकल्प किया कि मैंने अधिक मास में जो स्नान किए हैं उसमें से एक स्नान का पुण्य इस राक्षस को प्राप्त हो, ऐसा कहकर जल राक्षस के ऊपर छोड़ दिया। जल पड़ते ही वह राक्षस दिव्य स्वरूप होकर ब्राह्मण की वंदना करता हुआ स्वर्ग लोक को चला गया। हे लक्ष्मी महान पुण्य दायक पुरुषोत्तम मास में स्नान करने की महिमा है।

|| जै जै श्री अधिकमास महात्म्य सार ||

|| बृहत् नारदीय पद्याधारे द्वाविंशो ऽध्याय: समाप्त: ||






Adhik mass ki Katha 21 adhyaya | अधिक मास की कथा 21वा अध्याय


Adhik mass ki Katha 21 adhyaya | अधिक मास की कथा 21वा अध्याय 


 ।। श्री गणेशाधिपतये नमः ।।

श्री भगवान नारायण नारदजी से तथा सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं। हे ऋषियों भगवान विष्णु से लक्ष्मीजी कहती हैं, हे दयानिधे आपने अप्सरा उद्वार की कथा मुझे सुनाई अब आप पुरुषोत्तम मास के स्नान का फल और माहात्म्य का वर्णन सुनाइये। भगवान विष्णु लक्ष्मीजी की इच्छा को सुनकर प्रसन्नता से कहते हैं, हे लक्ष्मी तुम्हारी इच्छा के अनुसार मैं पुरुषोत्तम मास के स्नान का माहात्म्य वर्णन करता हूँ जो लोग पुरुषोत्तम मास में नित्य प्रति सूर्योदय के पहले स्नान करते हैं उनके समस्त पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। और उनको शारीरिक कष्ट बाधा कभी नहीं होती है। सभी कार्य निर्विघ्नता से पूरे होते हैं। मन में संतोष और प्रसन्नता होती है। सभी तीर्थों में स्नान करने का पुण्य प्राप्त होता है। विधिक (नियम) युक्त स्नान करने से बारहों महीने के स्नान का फल प्राप्त होता है। अधिकमास में गंगाजी के स्नान का बड़ा महत्त्व है। गंगाजी में स्नानकर माधव भगवान का दर्शन करने से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है। अधिकमास में जो लोग सरस्वती नदी में स्नान करते हैं।

उनके सात जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं। सूर्य चंद्रमा के ग्रहण के समय गोदाम करने का जो पुण्य होता है, वही पुण्य अधिकमास में स्नान करने वाले को प्राप्त होता है। वह मनुष्य महामूर्ख होगा जिससे अधिक मास में स्नान करने वाले को प्राप्त नहीं होता है। वह मनुष्य महामूर्ख होगा जिससे अधिक मास में स्नान नहीं किया और पितरों का तर्पण नहीं किया। इस नरक रूपी संसार से अपनी आत्मा की मुक्ति के लिये कोई कर्म नहीं किया उसका जन्म ही वृथा गया ऐसा निश्चित समझना चाहिए। ऐसे लोग पृथ्वी का भार हैं। हे लक्ष्मी जो लोग पुरुषोत्तम मास में श्रद्धापूर्वक स्नान दान तर्पण आदि कर्म करते हैं वे बड़े भाग्यशाली और परम पुण्यशील होते हैं। वैशाख में तप उपवास चैत्र मास में होम कार्तिक मास में दानधर्म ऐसे प्रत्येक मास के अलग अलग पुण्य है। परंतु अधिकमास में व्रत, होम, दान इन तीनों का साधन एक साथ हो करके सभी मासों का पुण्य प्राप्त होता है।

इस कर्म के द्वारा जीवत्मा उत्तम सद्गति को प्राप्त होती है। वह मनुष्य जब तक जीवित रहता है। उत्तम सुख धन धान्य से परिपूर्ण दीर्घायु जीवन व्यतीत करके मृत्यु के बाद मोक्ष को प्राप्त होता है। वह जीवत्मा चौरासीयोनिन का भ्रमण और आवागमन से छुटकारा पाकर परब्रह्म में लीन हो जाते है।

हे लक्ष्मी अधिकमास में स्नान का कितना पुण्य है इस विषय में पुरातन का इतिहास कहता हूँ। दक्षिणदिशा में गोदावरी में स्नान के तट पर पैठण नाम का एक सुंदर नगर है। उस नगर में चारों वर्णों के लोग रहते थे और अपने अपने कर्म में लगे हुए सुखी और संपन्न थे। वहाँ एक ब्राह्मण रहता था। वह सज्जन, विद्वान अनेक जनों से पूजित भगवान का भक्त था। प्रत्येक पुरुषोत्तम में नियमपूर्वक सूर्योदय के पहले स्नान करने की श्रद्धा थी उसका समस्त जीवन शांतमय और सुखमय व्यतीत हो रहा था। वृद्धावस्था आ गई शरीर अवस्था के प्रभाव से कमजोर अशक्त हो गया। गोदावरी नदी उसके घर से कुछ दूरी पर थी नित्य प्रति उतनी दूर कैसे स्नान करने जा सकूँगा यह विचार उसके मन में चिंता का विषय बना हुआ था पुरुषोत्तम मास प्रारंभ हो चुका था। इस प्रकार विचार करते हुए आखिर उसने निश्चय किया कि यदि मास के अंतिम तीन दिन नियमपूर्वक स्नान करूँगा।

पापों को नष्ट करने वाला ऐसे मास को व्यर्थ नहीं बिताना चाहिए। अपनी शक्ति के अनुसार जितना हो सके पुण्य संचित करना चाहिए। हे लक्ष्मी इस प्रकार उस ब्राह्मण ने मन में निश्चय करके पुरुषोत्तम मास के जब अंतिम तीन दिन शेष रहे तब से स्नान का नियम प्रारंभ कर दिया। एक प्रहर रात्रि शेष रहती थी तब घर से स्नान के निमित्त गोदावरी के लिये निकल जाता। और स्नान करके सूर्योदय के पहले ही घर वापस आ जाता था।

दो दिन स्नान का और घर वापस आने का समय निर्विघ्नता हो गया। अंतिम तीसरे दिन ब्राह्मण गोदावरी में स्नान करके कमंडलु में जल भरकर अपने घर वापस आ रहा था। थोड़ा थोड़ा अंधकार था सूर्योदय की आभा प्रकट हो रही थी। ऐसे ही समय मार्ग में एक बड़े भयंकर आकृति वाला प्रेत ब्राह्मण के सामने प्रकट हुआ। वह प्रेत बड़ी बड़ी अंगारे के समान आँखें वाला, सूखा शरीर सिर्फ हड्डियाँ ही दिखाई दे रही थीं। दाढ़ के बीच जीभ लपलपा रही थी पेट पीठ से सटा हुआ बड़े बड़े भयंकर बाल बड़े भयंकर शरीर पीले रंग का बार बार हाथ से पेट को पीटता हुआ मुख फैलाता हुआ डरावना करता हुआ वह प्रेत ब्राह्मण के सामने प्रकट हुआ। उस प्रेत को देखकर ब्राह्मण के मन में भय अवश्य हुआ। परंतु ब्राह्मण मन में भगवान पुरुषोत्तम का नाम स्मरण करते हुए हिम्मत धारण करता कहता है। अरे तू ऐसा भयानक और महान शरीर वाला प्रेत है। ब्राह्मण को नमस्कार करके कहता है। हे ब्राह्मण मैं समस्त प्राणियों को कष्ट देने वाला प्रेत हूँ। मैं श्मशान में रहता हूँ और अत्यंत निंदनीय वस्तुओं को भक्षण करता हूँ। जिन मनुष्यों में आत्मबल तथा संचित पुण्य नहीं रहता तथा जो

देवताओं की आराधना से दूर रहते हैं। ऐसे मनुष्यों को हमेशा पीड़ा पहुँचाना ही हमारा कर्म होता है।

हे विप्र मैं बड़ा दुरात्मा हूँ रात-दिन हिंसा और पाप आचरण में लिन रहता हूँ इस प्रेतयोनि के दुःख को भोग रहा हूँ। आपके दर्शन होते से और आपके शब्दों को सुनने से मेरे मन में कुछ ज्ञान का प्रकाश हुआ है। आप बड़े दयालु हैं। कृपा करके मेरा उद्धार करिए, मुझे प्रेत योनि से छुटकारा दिलवाइये। इससे आपको बड़ा पुण्य प्राप्त होगा। आपके दर्शन होते ही मेरे मन को विश्वास हो गया है कि आप प्रार्थना को सुनकर धर्मधर्मी के मन में दया उत्पन्न हो गई। हे लक्ष्मी पुरुषोत्तम पुरुष बड़े दयालु होते हैं। उस प्रेत की उनसे किसी का दुःख सहन नहीं होता। कैसा भी पापी, धर्मात्मा, प्रेत, राक्षस, पिशाच सबको शरण देते हैं। ब्राह्मण, धर्मधर्मी वचनों को सुनकर उस प्रेत को पूर्व जन्म का स्मरण हो गया।

वह हाथ जोड़कर कहता है, हे विप्र मैंने पूर्व जन्म में अनेक पाप किए कई लोगों की हत्या की, डाका और चोरी की। मदिरा पीकर अनेक बलात्कार किए अपने जीवन में कभी शुभ और पुण्य कर्म नहीं किये सारा जीवन पाप कर्म में बिता दिया। आखिर मृत्यु के बाद यमदूतों ने मुझे प्रेत योनि में भेज दिया गया। हे विप्र इस योनि में यातना दी। नरकों का दुःख भोगने के बाद मुझे प्रेत योनि में भेज दिया गया। हे विप्र इस योनि में जैसा मेरा भयंकर आकार है वैसे ही हमारे कर्म होते हैं। हम लोगों से अनेक जीवों की हिंसा होती है। पाप हो होते हैं। कभी शुभ कर्म नहीं होता। अनेक कल्पों से मैं इस प्रेत योनि का दुःख भोग रहा हूँ। आज मेरा अहो भाग्य था जो आप पुण्यात्मा के दर्शन हो गए इससे मैं समझ रहा हूँ कि मेरा पापों के प्रायश्चित का समय आ गया है। और आपके द्वारा मेरा उद्धार हो जाएगा। प्रेत के शब्दों को सुनकर ब्राह्मण धर्मधर्मी कहता है, हे प्रेत वास्तव में तू बहुत दुःखित है। मैं अपने कुछ पुण्य के द्वारा तुझे जल हाथ में लेकर संकल्प किया कि मैंने पुरुषोत्तम मास में तीन दिन स्नान किया है। उसका जो पुण्य है। इस प्रेत को दे देता हूँ। ऐसा कहकर प्रेत के शरीर पर छोड़ दिया। उस पुण्य को करते ही उसका प्रेतत्व नष्ट हो गया।

वह दिव्य स्वरूप का हो गया। और ब्राह्मण की वंदना करता हुआ स्वर्ग लोक को चला गया।

वह ब्राह्मण भी घर में आकर भगवान पुरुषोत्तम की आराधना में निमग्न होकर पुरुषोत्तम मास का उद्यापन करके समापन किया। इस प्रकार वह ब्राह्मण अपनी शेष आयु को पूराकर मृत्यु के बाद उत्तमदिव्य स्वरूप धारण करके विमान पर बैठकर स्वर्ग लोक को चला गया। हे लक्ष्मी सिर्फ तीन दिन के स्नान का इतना पुण्य है तो संपूर्ण मास के स्नान का कितना माहात्म्य और पुण्य होगा। भगवान के वचनों को सुनकर लक्ष्मी जी कहती है। हे प्रभु स्नान की महिमा को सुनकर मेरे मन में और भी स्नान की महिमा सुनने की इच्छा है। कृपा कर स्नान महिमा का वर्णन सुनाइयेगा।

जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार

ब्रह्मनारदीय पद्माधारे एकर्विंशोऽ अध्याय: समाप्त ।।

(२१)

।। शुभमभवतु ।।






Adhik mass ki Katha 20 adhyaya | अधिक मास की कथा 20वा अध्याय

 

Adhik mass ki Katha 20 adhyaya | अधिक मास की कथा 20वा अध्याय 



॥ अथ विंशते ऽध्यायः प्रारंभः ॥

॥ श्री गणाधिपतये नमः ॥

श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकदि ऋषियों से कहते हैं भगवान के मुखारविंद से पुरुषोत्तम मास के पांच महापर्वों का वर्णन सुनकर लक्ष्मीजी बहुत प्रसन्न होकर कहती है हे महाप्रभु अमृत तुल्य कथा को सुनकर अभी मनकी तृप्ति नहीं हुई, इसलिये जनकल्याण हेतु आप और माहात्म्य इतिहास का वर्णन सुनाइये। भगवान कहते हैं लक्ष्मी से, हे लक्ष्मी द्वादशी और व्यतीपात का पर्व महान पुण्यदायक है। इन पर्वों में थोड़ा भी दान कर्म अनेक यज्ञों का और अनेक तीर्थों का फल देता है। अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। द्वादशी को प्रातः स्नान और नित्यकर्म से निवृत होकर भगवान पुरुषोत्तम का पूजन करके उत्तम सामग्री और शुद्ध घी से बनाए हुए तैंतीस मालपुए या अनरसे कांसे के पात्र में रखकर वस्त्र से ढांककर भगवान के सामने अर्पण करे। और पैरों में पहनने योग्य पादत्राण (चप्पल जूता) अक्षत से मालपुआ का पूजन करके संकल्प पूर्वक सत्पात्र ब्राह्मण को दान देवे। और हाथ जोड़कर भगवान पुरुषोत्तम की प्रार्थना करें (इस मंत्र के द्वारा)

श्लोक :

(१) कल्ला कालदि रूपेण योनित्यं वर्तते हरिः ।

लोके विप्रस्वरूपेण तस्मै कालात्मने नमः ॥

(२) यस्य हस्ते गदाचक्रे गरुड़स्य वाहनम् ।

शंखः करतले यस्य समे विष्णुः प्रसीद तु ॥

(३) अर्धमासे तु संप्राप्ते घृत वस्त्र मुपान हौ ।

दानं गृहाण सर्वात्मन् व्रत संपूर्णं हे तवे ॥

चित्र 2 (पृष्ठ 78)

(४) राज्यंच शर्कराचैव त्रयींसंद अपूपकम् ।

प्राणिनतां प्राणनाथाय तस्मै कालात्मने नमः ॥

(५) कुरुक्षेत्र मिदं देशः साक्षाद् विष्णुमूर्धिजः ।

पृथ्वी समर्पितं दानं गृहाण पुरुषोत्तम ॥

(६) मल्लानांचैव शुद्धयर्थ पाप प्रशमनायच ।

पुत्र पौत्रादि वृद्धयर्थ तव दास्यामि भास्कर ॥

(७) अर्धमासे तु संप्राप्ते पुण्ये दंत जनार्दन ।

त्वं उदिष्य सुराध्यक्ष प्रसीद पुरुषोत्तम ॥

(८) शरण्यं सर्वभूतानां सर्वेविष्णुः प्रसी दतु ॥

इन श्लोकों के द्वारा भगवान की प्रार्थना कर पानी छोड़े। इस महान पुण्य कर्म के द्वारा संपूर्ण मनोकामनाएं पूर्ण होकर सुख शांतिपूर्वक जीवन होता है। सांसारिक सुखों को भोगकर मृत्यु के बाद स्वर्ग का सुख प्राप्त होता है। हे लक्ष्मी इस विषय का मैं एक इतिहास तुम से कहता हूँ। यक्षराज कुबेर की एक स्थित विलासिनी नाम की अप्सरा थी। एक समय वह स्वर्ग लोक से मृत्यु लोक का भ्रमण करने आई। घूमते हुए वह कुरुक्षेत्र में जा पहुंची।

अपनी सखियों के साथ कई दिनों तक वहां का आनंद लेते हुए रही। एकदिन उसकी सखियों ने उसका अनेक रंग के फूलों से श्रृंगार किया और हंसी मजाक करते हुए श्रृंगार रस के गाते गाने लगीं। युवावस्था श्रृंगार से युक्त और कामोद्दीपक गायन आदि वातावरण के द्वारा उस अप्सरा के शरीर में मदन जागृत हो गया वह फूलों की माला हाथ में लेकर मदमस्त होकर घूमने लगी। जंगल में भ्रमण कर रही थी। अचानक उसी मार्ग से नारदजी जा रहे थे। वह अप्सरा मदोन्मत्त होकर और साधारण पुरुष समझकर उनके गले में फूलों की माला डाल दी। माला गले में डालते ही नारदजी अत्यंत

चित्र 3 (पृष्ठ 79)

कोधित हो गए। और कहने लगे अरे दुष्ट तूने मुझे स्पर्श कर दिया। तू इतनी कामांध हो गई कि संन्यासी को साधारण पुरुष समझकर मेरे गले माला डाल दी। मैं तुझे श्राप देता हूँ तू पिशाचिनी हो जा। ऋषि के श्राप को सुनकर अप्सरा भयभीत होकर ऋषि के चरणों को पकड़कर रोती हुई क्षमा मांगने लगी। हे ऋषिवर मैं अबला और दीन जड़बुद्धि हूँ। आप महान सामर्थ्यवान हो दया के सागर हो दीन वत्सल हो विद्वान हो मेरे अपराध को क्षमा कर दो। इस समय आप के सिवा यहां मेरी रक्षा करने वाला कोई नहीं है। उसकी ऐसी दीनवाणी को सुनकर नारदजी ने सोचा यह मेरी प्रणागत हो गई है। स्त्री जाति की नहीं है। यह उसकी हत्या नहीं करते। इस समय आप के सिवा यह मेरी रक्षा करने वाला कोई नहीं है। स्त्री जाति की नहीं है। यह सोचकर उन्होंने अपने क्रोध का शमन किया और बोले मेरा दिया हुआ श्राप कभी असत्य नहीं हो सकता। तू पिशाचिनी होगी। जहां महानदी गंगा का सागर के साथ संगम हुआ है, वहां कुमारी क्षेत्र नाम की एक तपस्विनी हजारों वर्ष से तपस्या हुई रहती है। उसने अत्यंत दुक्कर तपस्या की है और एक सौ आठ पुरुषोत्तम मास का नियमपूर्वक स्नान, दान, अखंडदीप उपवास आदि नियम धारण करके पुण्य अर्जित किया है। तू पिशाचिनी होकर ब्रह्मवास से व्याकुल भ्रमण करते हुए अधिकमास में वहां पहुंचेगी तब उसके समीप पहुंचेगी तब उसके दर्शन होंगे पिशाचिनी के स्वभाववश तू तपस्विनी को खाने के लिये दौड़कर प्रार्थना करेगी।

हे तपस्विनी पुण्य स्वरूपिणी मेरे ऊपर दया करो मैं पिशाच योनि में महान दुख भोग रही हूँ। मेरा इस योनि से उद्धार करो। आपके सिवा कोई मेरा उद्धार नहीं कर सकता। इस प्रकार दीन वचनों से तू अपने उद्धार की बारंबार भिक्षा मांगेगी। तेरी दीन वाणी और हीन दशा को देखकर उस तपस्विनी को दया उत्पन्न होगी। और वह तुझे अपने किए हुए पुरुषोत्तम मास का एक पुण्य तुझे देगी। उसके प्रभाव से तेरा उद्धार होगा। ऐसा कहकर नारदऋषि वहां से चल दिए। उनके जाते ही वह अप्सरा पिशाच बन गई। और भयंकर स्वरूप की होकर जंगल में भटकने लगी। अनेक पशुओं की हिंसा करके और भी पाप कर्मों की वृद्धि होने लगी। जंगल में उत्तम फलों के वृक्ष हैं। जगह जगह सुंदर तालाब और नदियां बहती हैं। परंतु प्रेत पिशाचवालों को वृक्ष से तोड़कर फल खाने का अधिकार नहीं है नीचे गिरे हुए फल ही खा सकते हैं। उसी प्रकार तालाब और नदी के जल को स्पर्श करने का अधिकार न होते हुए






Adhik mass ki Katha 19 adhyaya | अधिक मास की कथा उन्नीसवा अध्याय

Adhik mass ki Katha 19 adhyaya | अधिक मास की कथा उन्नीसवा अध्याय 








|| श्री गणाधिपतये नम: ||
श्री भगवान नारायण नारदजी से तथा सूतजी शौनकदि ऋषियों से और भगवान विष्णु लक्ष्मीजी से कहते हैं, हे लक्ष्मी चार महापर्वों का वर्णन मैंने तुमसे कहा अब मैं पांचवा पुरुषोत्तम मास की द्वादशी महापर्व के माहात्म्य का वर्णन तुमसे कहता हूँ। यह महापर्व सभी महापर्वों से विशेष महत्वपूर्ण है। इसका पालन करने से कभी न नष्ट होने वाला अक्षय धाम की प्राप्ति होती है। यह परमपुण्य दायक है। गंगा आदि तीर्थों का सेवन इसके सोलह अंशों की भी बराबरी नहीं कर सकते। एकादशी को उपवास करके द्वादशी के दिन आंवले के वृक्ष के नीचे जो मनुष्य अपने पितरों का पिंडदान व तर्पण करते हैं। ऐसे मनुष्यों को अनेक तीर्थों में पितरों को तृप्ति प्राप्त होती है। वे स्वर्ग के अधिकारी हो जाते हैं। द्वादशी के दिन जो भी मनुष्य अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा सहित अन्नदान तुलसी पत्र रखकर संकल्प के द्वारा ब्राह्मण को दान करते हैं। उनको अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। तर्पण करने से वह जल अमृत के समान होकर पितरों को प्राप्त होता है। अन्न के सहित भूमि का दान करने से समस्त पितरों तक बैकुंठवास का पुण्य मिलता है। तथा सर्व लक्षणयुक्त दुग्धवती गाय का दान करने से समस्त पितरों का उद्धार होकर वे बैकुंठ में निवास करते हैं। विद्यादान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
साधारण प्रत्येक मास की द्वादशी की अपेक्षा पुरुषोत्तम मास की द्वादशी महान पुण्य दायक होती है। इस पर्व के दिन प्रात: स्नान करके भगवान पुरुषोत्तम की पूजा करके सुपात्र ब्राह्मण को अपनी शक्ति के अनुसार धन, अन्न, वस्त्र, पादुका, घृत, तिलपात्र, दक्षिणा सहित संकल्प पूर्वक दान करना चाहिए तथा कांसे के पात्र में घी भरकर सुवर्ण की प्रतिमा का दान करते हैं, वे अनंत पुण्य व अक्षय पद को प्राप्त करते हैं। पुरुषोत्तम मास की द्वादशी को घृतदान करने का बड़ा महत्व है। भैंस के घी से गाय का घी अधिक पुण्यदाता होता है। यदि गाय का घी अप्राप्त हो तो भैंस का घी दान करना ही श्रेष्ठ है। हे लक्ष्मी घृत की मात्रा १ प्रस्थ (पार्वाक) १/२ प्रस्थ (६६४ ग्रा.) अथवा चौथाई प्रस्थ (३३२ ग्राम)
कम से कम होना चाहिए। इससे कम का दान कोई महत्वपूर्ण नहीं होता।
हे लक्ष्मी जितनी घृत की महिमा है, उतना ही अन्न और जलदान का माहात्म्य है। देवताओं में पुरुषोत्तम देव के समान कोई दूसरा देवता नहीं है। उसी के आधार पर संसार के समस्त तिथियों में द्वादशी तिथि के समान शरीर स्थिर है। इसलिये मनुष्य को विशेषकर द्वादशी के दिन अपनी श्रद्धा से अन्नदान अवश्य करना चाहिए। घर में आए अतिथि को कभी विमुख नहीं लौटाना चाहिए। भोजन का अन्न का दान अवश्य देना चाहिए। चैत्र वैशाख आदि पौष ऋतु में जल का दान अवश्य करना चाहिए।
पौष व माघ मास व हेमंत शिशिर ऋतु में ठंड से बचने के लिये काष्ठ (सूखी लकड़ी) का दान करना चाहिए। परंतु अन्नदान हमेशा करते रहना चाहिए। क्योंकि अन्न के द्वारा शरीर का पोषण होता है और नित्यप्रति की आवश्यकता का पूरक अन्न ही है। हे लक्ष्मी द्वादशी तिथि बहुत फलदाई और प्रभावशालिनी है। इस द्वादशी तिथि के प्रभाव से राजा अंबरीष ने महाप्रतापी और महाक्रोधी दुर्वासा ऋषि के घमंड को नष्ट कर दिया था। यह सारे संसार में इतिहास प्रसिद्ध है। हे लक्ष्मी सत्यव्रत को दिया हुआ दान सार्थक और पुण्य देने वाला होता है। वही कुपात्र को दियादान अधर्म और नरक देने वाला होता है। जैसे प्रदीप्त प्राण के बिना व्यर्थ है। विद्वान के बिना सभा व्यर्थ है। दीपक बिना घर व्यर्थ है। बिना मुख व्यर्थ है। पुत्र के बिना वंश व्यर्थ है। दृष्टि के बिना आंखें व्यर्थ है। वेदांत ज्ञान बिना पंडित व्यर्थ है। इसी प्रकार सत्यव्रत के बिना दान देना व्यर्थ होता है।
हे लक्ष्मी सत्यव्रत वह कहलाता है जो सात्विक प्रकृतवाला ज्ञानी और भगवान में आस्था रखने वाला दुषकर्म और पाप आचरण से दूर रहने वाला मांस मदिरा का सेवन नहीं करने वाले दूसरों को शुभ आचरण और अच्छे कर्म और ज्ञान की राह का मार्ग दिखाने वाले ही मनुष्य सत्यव्रत कहलाता है। हे लक्ष्मी कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों की द्वादशी समान फल देने वाली है इसमें कोई भेद नहीं है। पुरुषोत्तम मास में द्वादशी को प्रात: उठकर स्नान और नित्य कर्म से निवृत्त होकर भगवान पुरुषोत्तम की पूजा करके सत्यव्रत ब्राह्मण को आमंत्रित कर विप्र पूजन करके अपनी शक्ति और श्रद्धा के अनुसार धन का लोभ छोड़कर घी, अन्न, वस्त्र फलदक्षिणा आदि वस्तु संकल्प पूर्वक दान देवें।
हे लक्ष्मी काशी, कांची, मथुरा, द्वारका, हरिद्वार, उज्जैन, अयोध्या ये सब नगरी पुण्यदायक मानी गई हैं। परंतु द्वादशी तिथि के पुण्य की बराबरी इनका भी पुण्य नहीं है। जिस मास में पुरुषोत्तम मास आये उस मास के स्वामी का भी पूजन द्वादशी तिथि को करना चाहिए। और दान सामग्री के साथ यज्ञोपवीत और पादुका (जूता चप्पल) अवश्य दान करना चाहिए। इनके बिना दान की पूर्ति नहीं होती। हे लक्ष्मी द्वादशी तिथि के पुण्य का महत्व इतना है कि हजार मुखवाले शेषनाग भी इसका वर्णन करने में असमर्थ है। मैंने संक्षेप में तुमसे इसके माहात्म्य का वर्णन किया है। इस पुण्य कर्म के द्वारा मनुष्य अपने पूर्वजों का उद्धार करते हुए सांसारिक सुखों को भोगकर मृत्यु के बाद अनंत पद अर्थात मोक्ष को प्राप्त होता है। जहां जाने पर मनुष्य को चौंसठ योनि का भ्रमण संसार के आवागमन से मुक्ति प्राप्त हो जाती है।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
बृहन्नारदीय पद्माधारे एकोनविंशो S अध्याय: समाप्त ||
(१९)
|| शुभमभवतु ||