Adhik mass ki Katha 8 adhyaya| अधिक मास की कथा आठवां अध्याय
॥ अथ अष्टमोऽध्यायः प्रारंभः ॥
।। श्री गणधिपतये नमः ।।
व्यासजी श्रोतागणों से तथा सूतजी शौनकादि ऋषियों से, भगवान् नारायण नारदजी से कहते हैं, हे नारद कल के कथा प्रसंग में वाल्मीकि ऋषि राजा दृढ़धन्वा से उसके पूर्व जन्म का इतिहास सुनाते हुए कहते हैं कि हे राजन् पत्नि गौतमी के वचनों को सुनकर ब्राह्मण को कुछ संतोष हुआ दुःख का परित्याग करके मन में धैर्य धारण करके वह ब्राह्मण सुदेव अपने नित्य नैमित्तिक परिचर्या में लग गया। जो होनेवाला है वह निश्चित ही होगा उसको कोई टाल नहीं सकता। उसको गरुड़जी के वाक्य याद आ गए कि आपत्ति व्याधी दुःख आरोप भगवान्की सेवा मनन चिंतन कभी मत छोड़ना भगवान के द्वारा ही समस्त दुःख नष्ट होकर सुख की प्राप्ति होती है। इस परम वाक्य को मन में धारण करके भगवान की आराधना करते हुए अपनी दिनचर्या में संलग्न रहने लगा।
इस प्रकार कुछ समय और बीत गया जब उस बालक की उम्र ने बारहवें वर्ष में प्रवेश किया ऐसे ही एक समय की बात है ग्रीष्म ऋतु का समय था आश्रम के आसपास फूलों के वृक्ष सूख जाने से पूजन के लिये समिधा, कुशा, और फूल लाने वह ब्राह्मण वन में गया हुआ था और पत्नि गृहकार्य में व्यस्त थी। बालक शुकदेव बराबरी के लड़कों के साथ जलक्रीड़ा करने बावली पर गया जल में प्रवेश करने पर बालकों को ग्रीष्म ऋतु के कारण बहुत आनंद आने लगा वे एक दूसरे पर पानी उछालते एक दूसरे का हाथ पकड़कर इधर से उधर खींचते कोई पानी में डुबकी लगाकर किसी का पैर पकड़ कर पानी के भीतर खींचते इस तरह अनेक प्रकार की जलक्रीड़ा करने लगे इस तरह पानी का खेल खेलते हुए काफी समय बीत गया, थकावट आने लगी परंतु बाहर भयानक गर्मी होने से पानी से बाहर निकलने की इच्छा भी नहीं होती थी।
इस प्रकार थकावट में शरीर शिथिल होने पर भी बालक शुकदेव ने श्वासरोककर पानी में घुसकर अपने मित्र का पैर पकड़कर गहरे पानी में खींचकर ले गया नीचे पानी के तलपर पहुंचते ही रोका हुआ श्वास छूट गया और पानी उसके पेट में भर जाने से प्राण निकल गया। मित्रवर्ग शुकदेव को ऊपर न आया देखकर भयभीत हो गए और बावली से बाहर निकलकर चिल्लाते भागते हुए माता गौतमी के पास आए।
जाकर शुकदेव का पानी में डूबने का दुःखद समाचार सुना दिया। सुनते ही गौतमी हाहाकार करती हुई मूर्छित होकर गिर पड़ी। उसी समय ब्राह्मण सुदेव भी वन से वापस आ गया आते ही पुत्र के मरण का समाचार सुनकर कटे हुए वृक्ष के समान पृथ्वी पर गिरकर बेहोश हो गया। थोड़ी देर के बाद जब पत्नि पति की मूर्च्छा दूर हुई तब दोनों हाहाकार करके दौड़ते हुए बावली की ओर भागे। तब तक बालक शुकदेव का मृत शरीर पानी से फूलकर ऊपर तैर रहा था। दोनों ने बालक के शरीर को बावली के बाहर लाकर गोद में रखकर आलिंगन करते हुए बार-बार मुख चूमते हुए रुदन करने लगे।
ब्राह्मण सुदेव कहता है कि हे पुत्र तू निद्रा त्याग कर जल्दी से उठ, मुझसे बात कर, आंखें खोलकर हमारी तरफ देख, तेरे शब्दों को सुनने के लिये हम अधीर हो रहे हैं। इस वृद्धावस्था में हम दोनों को छोड़कर जाना उचित नहीं है। देख तेरे मित्र तुझे अध्ययन करने के लिये बुला रहे हैं। हम तुझे छोड़कर अब आश्रम भी नहीं जाएंगे हमको घर जाने का कोई मतलब नहीं है। हमारे लिये घर अब जंगल के समान दिखाई देता है। हे भगवान मैंने कोई ब्रह्म हत्या नहीं की आज तक कोई पाप कर्म नहीं किया फिर किस कर्म का फल मुझे भोगना पड़ रहा है कि मुझे बालक की मृत्यु देखनी पड़ी है भगवान् में वृद्ध असहाय हूं मेरा सिर्फ एक पुत्र ही सहारा था उसको तुमने मुझ से छीन लिया अब मैं किसका सहारा करूं। हे भगवान आप तो बड़े दयालु प्रसिद्ध हो।
फिर मेरे लिये ऐसी कठोरता क्यों कर रहे हो। ब्राह्मण अनेक प्रकार से रोते हुए विलाप करता हुआ कहता मेघों से पानी गिरता है पानी से पृथ्वी अन्न उत्पन्न करती है। भूमि में अनेक प्रकार के रत्न मिलते हैं। सागर से मोती प्राप्त होते हैं परंतु ऐसा कोई स्थान नहीं दिखता जहां से मेरा मृत पुत्र जीवित प्राप्त हो जाय। हे पुत्र तू भी मेरे ऊपर दया नहीं करता एक बार तो हमसे बात कर देख तेरी माता किस प्रकार बिलख बिलखकर रो रही है। आज तक तू कभी हमसे पूछे बिना कहीं नहीं गया, कभी वेदाध्ययन में नागा नहीं किया फिर तू आज इतना निष्ठुर क्यों हो गया। तेरे वे मीठे वचन अब कहां सुनने को मिलेंगे। मेरा हृदय भी कितना कठोर है, मुझे धिक्कार है बालक मृत देखकर भी मेरे प्राण नहीं निकल रहे। वे राजा दशरथ धन्य हैं। जिन्होंने पुत्र को वनवास जाता देखकर अपने प्राणों का परित्याग कर दिया। मैं दुःख की अग्नि में जल रहा हूं परंतु मेरे प्राण नहीं निकल रहे। हे देवाधिदेव हे जगन्नाथ दोनों पर दया करने वाले लक्ष्मीपति वैकुंठाधिपति आपके सिवा अब मेरी रक्षा करने वाला कोई नहीं है। तीनों लोक में मेरे समान मूर्ख और दुर्भागी कोई नहीं होगा। जो मैंने भगवान के वचनों को न मानकर पुत्र के लिये जिद कि अगर मैं उनका कहना मान लेता तो मुझे यह दिन क्यों देखना पड़ता।
यह दुःखित और रोते हुए पति पत्नि पुत्र के मृत शरीर को गोद में लेकर वहीं बैठे रहे। उन्होंने निश्चित कर लिया कि अब हम जीवित रहकर क्या करेंगे, यहीं बैठे बैठे अपने प्राणों का परित्याग कर देंगे। अकस्मात आकाश में बादल घिर गए, गर्जना होने लगी, बिजली कड़कने लगी और भयंकर बरसात होने लगी। आंधी चलने से बड़े बड़े वृक्ष उखड़कर गिर गए। ऐसा भयंकर प्रकृति का उन्माद होने पर भी ब्राह्मण पति पत्नि दुःखित रोते हुए अचल जल का परित्याग कर बैठे हुए कभी अपने भाग्य को कोसते कभी पुत्र का आलिंगन करते कभी देवाधिदेव भगवान से अपने दुःख का वर्णन करते हुए दया की भीख मांगते हुए उनको चालीस दिन का समय बीत गया कब सूर्य उदय हुआ कब अस्त हुआ इसका भी उनको ज्ञान नहीं था। भाग्यवश वह समय पुरुषोत्तम का संपूर्ण मास था जो ब्राह्मण ने दुःखमय पुत्र शोक में अन्नजल का परित्याग कर व्यतीत किया था।
परम प्रिय भगवान्पुरुषोत्तम का अत्यंत अनंत पुण्य दाता मास में अज्ञातवस्था में ब्राह्मण के द्वारा जो कठिन तपस्या घटित हुई उसके द्वारा भगवान् पुरुषोत्तम प्रसन्न होकर ब्राह्मण के समक्ष प्रगट हुए उस समय भगवान का स्वरूप नवीन मेघ के समान पीतांबर धारण किए हुए दो भुजावाले मुरली धारण किए हुए गले में वनमाला सुशोभित हो रही है। ऐसी सुंदर आकृति और स्वरूप में प्रगट हुए। भगवान के सुंदर स्वरूप को देखकर ब्राह्मण गोद से बालक का मृत शरीर जमीन पर रखकर प्रसन्नमुख बारंबार दंडवत करता हुआ हांथ जोड़कर खड़ा हुआ। दया के सागर मोक्ष के दाता भगवान पुरुषोत्तम उससे कहते हैं हे ब्राह्मण तू धन्य है, बड़ा भाग्यशाली है तूने जो इस पुरुषोत्तम मास में कठिन तपस्या की है उससे मैं बहुत प्रसन्न हूं। हे ब्राह्मण तेरा यह मृत पुत्र जीवित होकर इसकी आयु बारह हजार वर्ष की होगी।
पुत्र सुख के अलावा और भी बहुत सांसारिक सुख तुझे प्राप्त होंगे। इस पुत्र के साथ गृहस्थ सुख भोगकर इस शरीर को छोड़ने के बाद तुझे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होगी। वहां बारह हजार वर्ष सुख भोगने पर पृथ्वी पर मनुष्य योनि में जन्म होगा। इस संसार में राजा दृढ़धन्वा के नाम से प्रसिद्ध होकर धन, बल, वाहन, संपत्ति, राज, ऐश्वर्य दिन प्रतिदिन बढ़कर चक्रवर्ती राजा के रूप में प्रख्यात होगा। यही पत्नि दूसरे जन्म में तेरी पटरानी होगी। सर्वगुण संपन्न सुंदर चारपुत्र और एक कन्या होगी अनेक दिन राजसुख में निमग्न व्यतीत होंगे। सांसारिक विषय में निमग्न होने से भगवान का स्मरण भूल सा जायेगा। तब यही तेरा पुत्र तोता का शरीर धारण कर वट वृक्ष पर बैठकर मनुष्य वाणी में तुझे उपदेश देकर सचेत करेगा।
इसके वाक्यों को सुनकर तुझे वैराग्य उत्पन्न होकर चिंताग्रस्त रहेगा। तब वाल्मीकि ऋषि के द्वारा यथार्थ ज्ञान प्राप्त करके तू भगवान की सेवा में लिप्त होगा तथा समयावधि के अनुसार मोक्ष को प्राप्त करेगा। इस प्रकार का वरदान देते ही ब्राह्मण का मृतपुत्र जीवित होकर मातापिता तथा भगवान के चरणों को प्रणाम करके प्रसन्न मुख स्वस्थ हो गया।
भगवान पुरुषोत्तम के द्वारा प्राप्त वरदान तथा जीवित पुत्र को देखकर ब्राह्मण पति पत्नि अत्यंत प्रसन्न होकर बारंबार भगवान के चरणों में प्रणाम करते हुए हांथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए कहते हैं हे महाप्रभु दीन दयालु कृपाकर मेरे मानसिक संदेह को दूर करने की कृपा करें। हे ऋषिकेश मैंने चार हजार वर्ष तक कठिन तपस्या की जिससे भगवान विष्णु प्रसन्न होकर वरदान देने के लिये प्रगट हुए। मैंने पुत्र प्राप्ति का वरदान मांगा तो उन्होंने कहा तेरे प्रारब्ध में सात जन्म तक पुत्र का सुख नहीं है। सो हे महाप्रभु आज मैं देख रहा हूं मेरा मृत पुत्र भी जीवित हो गया और आपने ब्रह्मलोक का सुख दूसरे जन्म में मुझे अखंड चक्रवर्ती राज्य, चार पुत्र एक कन्या और संसार के सभी सुखों का वरदान बिना किसी तपस्या व आराधना के आपने मुझे क्यों दे दिया। यह सब देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है। कृपा करके मेरे मानसिक संदेह को दूर कर दीजिये। इस प्रकार वह ब्राह्मण सुदेव भगवान पुरुषोत्तम से प्रार्थना करता हुआ हाथ जोड़कर खड़ा रहा।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार बृहन्नारदीय
पद्याधारे अष्टमो s अध्यायः समाप्त ॥
(८)
॥ शुभंभवतु ॥
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