Adhik mass ki Katha 19 adhyaya | अधिक मास की कथा उन्नीसवा अध्याय

Adhik mass ki Katha 19 adhyaya | अधिक मास की कथा उन्नीसवा अध्याय 








|| श्री गणाधिपतये नम: ||
श्री भगवान नारायण नारदजी से तथा सूतजी शौनकदि ऋषियों से और भगवान विष्णु लक्ष्मीजी से कहते हैं, हे लक्ष्मी चार महापर्वों का वर्णन मैंने तुमसे कहा अब मैं पांचवा पुरुषोत्तम मास की द्वादशी महापर्व के माहात्म्य का वर्णन तुमसे कहता हूँ। यह महापर्व सभी महापर्वों से विशेष महत्वपूर्ण है। इसका पालन करने से कभी न नष्ट होने वाला अक्षय धाम की प्राप्ति होती है। यह परमपुण्य दायक है। गंगा आदि तीर्थों का सेवन इसके सोलह अंशों की भी बराबरी नहीं कर सकते। एकादशी को उपवास करके द्वादशी के दिन आंवले के वृक्ष के नीचे जो मनुष्य अपने पितरों का पिंडदान व तर्पण करते हैं। ऐसे मनुष्यों को अनेक तीर्थों में पितरों को तृप्ति प्राप्त होती है। वे स्वर्ग के अधिकारी हो जाते हैं। द्वादशी के दिन जो भी मनुष्य अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा सहित अन्नदान तुलसी पत्र रखकर संकल्प के द्वारा ब्राह्मण को दान करते हैं। उनको अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। तर्पण करने से वह जल अमृत के समान होकर पितरों को प्राप्त होता है। अन्न के सहित भूमि का दान करने से समस्त पितरों तक बैकुंठवास का पुण्य मिलता है। तथा सर्व लक्षणयुक्त दुग्धवती गाय का दान करने से समस्त पितरों का उद्धार होकर वे बैकुंठ में निवास करते हैं। विद्यादान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
साधारण प्रत्येक मास की द्वादशी की अपेक्षा पुरुषोत्तम मास की द्वादशी महान पुण्य दायक होती है। इस पर्व के दिन प्रात: स्नान करके भगवान पुरुषोत्तम की पूजा करके सुपात्र ब्राह्मण को अपनी शक्ति के अनुसार धन, अन्न, वस्त्र, पादुका, घृत, तिलपात्र, दक्षिणा सहित संकल्प पूर्वक दान करना चाहिए तथा कांसे के पात्र में घी भरकर सुवर्ण की प्रतिमा का दान करते हैं, वे अनंत पुण्य व अक्षय पद को प्राप्त करते हैं। पुरुषोत्तम मास की द्वादशी को घृतदान करने का बड़ा महत्व है। भैंस के घी से गाय का घी अधिक पुण्यदाता होता है। यदि गाय का घी अप्राप्त हो तो भैंस का घी दान करना ही श्रेष्ठ है। हे लक्ष्मी घृत की मात्रा १ प्रस्थ (पार्वाक) १/२ प्रस्थ (६६४ ग्रा.) अथवा चौथाई प्रस्थ (३३२ ग्राम)
कम से कम होना चाहिए। इससे कम का दान कोई महत्वपूर्ण नहीं होता।
हे लक्ष्मी जितनी घृत की महिमा है, उतना ही अन्न और जलदान का माहात्म्य है। देवताओं में पुरुषोत्तम देव के समान कोई दूसरा देवता नहीं है। उसी के आधार पर संसार के समस्त तिथियों में द्वादशी तिथि के समान शरीर स्थिर है। इसलिये मनुष्य को विशेषकर द्वादशी के दिन अपनी श्रद्धा से अन्नदान अवश्य करना चाहिए। घर में आए अतिथि को कभी विमुख नहीं लौटाना चाहिए। भोजन का अन्न का दान अवश्य देना चाहिए। चैत्र वैशाख आदि पौष ऋतु में जल का दान अवश्य करना चाहिए।
पौष व माघ मास व हेमंत शिशिर ऋतु में ठंड से बचने के लिये काष्ठ (सूखी लकड़ी) का दान करना चाहिए। परंतु अन्नदान हमेशा करते रहना चाहिए। क्योंकि अन्न के द्वारा शरीर का पोषण होता है और नित्यप्रति की आवश्यकता का पूरक अन्न ही है। हे लक्ष्मी द्वादशी तिथि बहुत फलदाई और प्रभावशालिनी है। इस द्वादशी तिथि के प्रभाव से राजा अंबरीष ने महाप्रतापी और महाक्रोधी दुर्वासा ऋषि के घमंड को नष्ट कर दिया था। यह सारे संसार में इतिहास प्रसिद्ध है। हे लक्ष्मी सत्यव्रत को दिया हुआ दान सार्थक और पुण्य देने वाला होता है। वही कुपात्र को दियादान अधर्म और नरक देने वाला होता है। जैसे प्रदीप्त प्राण के बिना व्यर्थ है। विद्वान के बिना सभा व्यर्थ है। दीपक बिना घर व्यर्थ है। बिना मुख व्यर्थ है। पुत्र के बिना वंश व्यर्थ है। दृष्टि के बिना आंखें व्यर्थ है। वेदांत ज्ञान बिना पंडित व्यर्थ है। इसी प्रकार सत्यव्रत के बिना दान देना व्यर्थ होता है।
हे लक्ष्मी सत्यव्रत वह कहलाता है जो सात्विक प्रकृतवाला ज्ञानी और भगवान में आस्था रखने वाला दुषकर्म और पाप आचरण से दूर रहने वाला मांस मदिरा का सेवन नहीं करने वाले दूसरों को शुभ आचरण और अच्छे कर्म और ज्ञान की राह का मार्ग दिखाने वाले ही मनुष्य सत्यव्रत कहलाता है। हे लक्ष्मी कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों की द्वादशी समान फल देने वाली है इसमें कोई भेद नहीं है। पुरुषोत्तम मास में द्वादशी को प्रात: उठकर स्नान और नित्य कर्म से निवृत्त होकर भगवान पुरुषोत्तम की पूजा करके सत्यव्रत ब्राह्मण को आमंत्रित कर विप्र पूजन करके अपनी शक्ति और श्रद्धा के अनुसार धन का लोभ छोड़कर घी, अन्न, वस्त्र फलदक्षिणा आदि वस्तु संकल्प पूर्वक दान देवें।
हे लक्ष्मी काशी, कांची, मथुरा, द्वारका, हरिद्वार, उज्जैन, अयोध्या ये सब नगरी पुण्यदायक मानी गई हैं। परंतु द्वादशी तिथि के पुण्य की बराबरी इनका भी पुण्य नहीं है। जिस मास में पुरुषोत्तम मास आये उस मास के स्वामी का भी पूजन द्वादशी तिथि को करना चाहिए। और दान सामग्री के साथ यज्ञोपवीत और पादुका (जूता चप्पल) अवश्य दान करना चाहिए। इनके बिना दान की पूर्ति नहीं होती। हे लक्ष्मी द्वादशी तिथि के पुण्य का महत्व इतना है कि हजार मुखवाले शेषनाग भी इसका वर्णन करने में असमर्थ है। मैंने संक्षेप में तुमसे इसके माहात्म्य का वर्णन किया है। इस पुण्य कर्म के द्वारा मनुष्य अपने पूर्वजों का उद्धार करते हुए सांसारिक सुखों को भोगकर मृत्यु के बाद अनंत पद अर्थात मोक्ष को प्राप्त होता है। जहां जाने पर मनुष्य को चौंसठ योनि का भ्रमण संसार के आवागमन से मुक्ति प्राप्त हो जाती है।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
बृहन्नारदीय पद्माधारे एकोनविंशो S अध्याय: समाप्त ||
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|| शुभमभवतु ||





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