Adhik mass ki Katha 20 adhyaya | अधिक मास की कथा 20वा अध्याय

 

Adhik mass ki Katha 20 adhyaya | अधिक मास की कथा 20वा अध्याय 



॥ अथ विंशते ऽध्यायः प्रारंभः ॥

॥ श्री गणाधिपतये नमः ॥

श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकदि ऋषियों से कहते हैं भगवान के मुखारविंद से पुरुषोत्तम मास के पांच महापर्वों का वर्णन सुनकर लक्ष्मीजी बहुत प्रसन्न होकर कहती है हे महाप्रभु अमृत तुल्य कथा को सुनकर अभी मनकी तृप्ति नहीं हुई, इसलिये जनकल्याण हेतु आप और माहात्म्य इतिहास का वर्णन सुनाइये। भगवान कहते हैं लक्ष्मी से, हे लक्ष्मी द्वादशी और व्यतीपात का पर्व महान पुण्यदायक है। इन पर्वों में थोड़ा भी दान कर्म अनेक यज्ञों का और अनेक तीर्थों का फल देता है। अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। द्वादशी को प्रातः स्नान और नित्यकर्म से निवृत होकर भगवान पुरुषोत्तम का पूजन करके उत्तम सामग्री और शुद्ध घी से बनाए हुए तैंतीस मालपुए या अनरसे कांसे के पात्र में रखकर वस्त्र से ढांककर भगवान के सामने अर्पण करे। और पैरों में पहनने योग्य पादत्राण (चप्पल जूता) अक्षत से मालपुआ का पूजन करके संकल्प पूर्वक सत्पात्र ब्राह्मण को दान देवे। और हाथ जोड़कर भगवान पुरुषोत्तम की प्रार्थना करें (इस मंत्र के द्वारा)

श्लोक :

(१) कल्ला कालदि रूपेण योनित्यं वर्तते हरिः ।

लोके विप्रस्वरूपेण तस्मै कालात्मने नमः ॥

(२) यस्य हस्ते गदाचक्रे गरुड़स्य वाहनम् ।

शंखः करतले यस्य समे विष्णुः प्रसीद तु ॥

(३) अर्धमासे तु संप्राप्ते घृत वस्त्र मुपान हौ ।

दानं गृहाण सर्वात्मन् व्रत संपूर्णं हे तवे ॥

चित्र 2 (पृष्ठ 78)

(४) राज्यंच शर्कराचैव त्रयींसंद अपूपकम् ।

प्राणिनतां प्राणनाथाय तस्मै कालात्मने नमः ॥

(५) कुरुक्षेत्र मिदं देशः साक्षाद् विष्णुमूर्धिजः ।

पृथ्वी समर्पितं दानं गृहाण पुरुषोत्तम ॥

(६) मल्लानांचैव शुद्धयर्थ पाप प्रशमनायच ।

पुत्र पौत्रादि वृद्धयर्थ तव दास्यामि भास्कर ॥

(७) अर्धमासे तु संप्राप्ते पुण्ये दंत जनार्दन ।

त्वं उदिष्य सुराध्यक्ष प्रसीद पुरुषोत्तम ॥

(८) शरण्यं सर्वभूतानां सर्वेविष्णुः प्रसी दतु ॥

इन श्लोकों के द्वारा भगवान की प्रार्थना कर पानी छोड़े। इस महान पुण्य कर्म के द्वारा संपूर्ण मनोकामनाएं पूर्ण होकर सुख शांतिपूर्वक जीवन होता है। सांसारिक सुखों को भोगकर मृत्यु के बाद स्वर्ग का सुख प्राप्त होता है। हे लक्ष्मी इस विषय का मैं एक इतिहास तुम से कहता हूँ। यक्षराज कुबेर की एक स्थित विलासिनी नाम की अप्सरा थी। एक समय वह स्वर्ग लोक से मृत्यु लोक का भ्रमण करने आई। घूमते हुए वह कुरुक्षेत्र में जा पहुंची।

अपनी सखियों के साथ कई दिनों तक वहां का आनंद लेते हुए रही। एकदिन उसकी सखियों ने उसका अनेक रंग के फूलों से श्रृंगार किया और हंसी मजाक करते हुए श्रृंगार रस के गाते गाने लगीं। युवावस्था श्रृंगार से युक्त और कामोद्दीपक गायन आदि वातावरण के द्वारा उस अप्सरा के शरीर में मदन जागृत हो गया वह फूलों की माला हाथ में लेकर मदमस्त होकर घूमने लगी। जंगल में भ्रमण कर रही थी। अचानक उसी मार्ग से नारदजी जा रहे थे। वह अप्सरा मदोन्मत्त होकर और साधारण पुरुष समझकर उनके गले में फूलों की माला डाल दी। माला गले में डालते ही नारदजी अत्यंत

चित्र 3 (पृष्ठ 79)

कोधित हो गए। और कहने लगे अरे दुष्ट तूने मुझे स्पर्श कर दिया। तू इतनी कामांध हो गई कि संन्यासी को साधारण पुरुष समझकर मेरे गले माला डाल दी। मैं तुझे श्राप देता हूँ तू पिशाचिनी हो जा। ऋषि के श्राप को सुनकर अप्सरा भयभीत होकर ऋषि के चरणों को पकड़कर रोती हुई क्षमा मांगने लगी। हे ऋषिवर मैं अबला और दीन जड़बुद्धि हूँ। आप महान सामर्थ्यवान हो दया के सागर हो दीन वत्सल हो विद्वान हो मेरे अपराध को क्षमा कर दो। इस समय आप के सिवा यहां मेरी रक्षा करने वाला कोई नहीं है। उसकी ऐसी दीनवाणी को सुनकर नारदजी ने सोचा यह मेरी प्रणागत हो गई है। स्त्री जाति की नहीं है। यह उसकी हत्या नहीं करते। इस समय आप के सिवा यह मेरी रक्षा करने वाला कोई नहीं है। स्त्री जाति की नहीं है। यह सोचकर उन्होंने अपने क्रोध का शमन किया और बोले मेरा दिया हुआ श्राप कभी असत्य नहीं हो सकता। तू पिशाचिनी होगी। जहां महानदी गंगा का सागर के साथ संगम हुआ है, वहां कुमारी क्षेत्र नाम की एक तपस्विनी हजारों वर्ष से तपस्या हुई रहती है। उसने अत्यंत दुक्कर तपस्या की है और एक सौ आठ पुरुषोत्तम मास का नियमपूर्वक स्नान, दान, अखंडदीप उपवास आदि नियम धारण करके पुण्य अर्जित किया है। तू पिशाचिनी होकर ब्रह्मवास से व्याकुल भ्रमण करते हुए अधिकमास में वहां पहुंचेगी तब उसके समीप पहुंचेगी तब उसके दर्शन होंगे पिशाचिनी के स्वभाववश तू तपस्विनी को खाने के लिये दौड़कर प्रार्थना करेगी।

हे तपस्विनी पुण्य स्वरूपिणी मेरे ऊपर दया करो मैं पिशाच योनि में महान दुख भोग रही हूँ। मेरा इस योनि से उद्धार करो। आपके सिवा कोई मेरा उद्धार नहीं कर सकता। इस प्रकार दीन वचनों से तू अपने उद्धार की बारंबार भिक्षा मांगेगी। तेरी दीन वाणी और हीन दशा को देखकर उस तपस्विनी को दया उत्पन्न होगी। और वह तुझे अपने किए हुए पुरुषोत्तम मास का एक पुण्य तुझे देगी। उसके प्रभाव से तेरा उद्धार होगा। ऐसा कहकर नारदऋषि वहां से चल दिए। उनके जाते ही वह अप्सरा पिशाच बन गई। और भयंकर स्वरूप की होकर जंगल में भटकने लगी। अनेक पशुओं की हिंसा करके और भी पाप कर्मों की वृद्धि होने लगी। जंगल में उत्तम फलों के वृक्ष हैं। जगह जगह सुंदर तालाब और नदियां बहती हैं। परंतु प्रेत पिशाचवालों को वृक्ष से तोड़कर फल खाने का अधिकार नहीं है नीचे गिरे हुए फल ही खा सकते हैं। उसी प्रकार तालाब और नदी के जल को स्पर्श करने का अधिकार न होते हुए






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