Adhik maas ki Katha 1 adhayay| अधिक मास की कथा प्रथम अध्याय

 


Adhik maas ki Katha 1 adhayay| अधिक मास की कथा प्रथम अध्याय 







|| अथ प्रथम अध्यायः ||


|| श्री मन्महागणधिपतये नमः ||


वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्य समप्रभ ।


निर्विघ्नं कुरुमे देव सर्व कार्येषु सर्वदा ॥


करोड़ों सूर्य के समान कान्तिवाले वक्रतुण्ड वाले ऐसे भगवान गणपति से प्रार्थना है। हमारे समस्त कार्यों को हमेशा विघ्न रहित करके पूर्ण करें।


गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।


गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवेनमः ॥


गुरु ब्रह्मास्वरूप हैं गुरु विष्णु स्वरूप हैं गुरु महादेव स्वरूप हैं गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं जिस गुरु के मार्गदर्शन और ज्ञान प्राप्ति की कृपा से हम ग्रंथ की रचना करते हैं ऐसे गुरु को साष्टांग नमस्कार है।


शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमा माद्यां जगद्व्यापिनीं ।


वीणा पुस्तक धारिणीं अभयदां जाड्यांधकारा पहाम् ।


हस्ते स्फटिक मालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम् ।


वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धि प्रदां शारदाम् ॥


आदि शक्ति संपूर्ण संसार को वाणी की शक्ति देने वाली श्वेत वस्त्रों को धारण कर श्वेत कमल पर विराजमान वीणा और पुस्तक धारण करने वाली जडबुद्धि के अंधकार को नष्ट करने वाली, भय को दूर करने वाली हाथ में स्फटिक मणि की माला से सुशोभित विद्या और बुद्धि देने वाली परमेश्वरी भगवती शारदा को हम नमस्कार करते हैं। ग्राम देवता, स्थान देवता, वास्तुदेवता, कुलदेवता, माता-पिता, इष्ट देवता समस्त देवगणों की प्रार्थना कर नमस्कार करते हुए ग्रंथ का प्रारंभ करते हैं।




श्री व्यास जी कहते हैं श्रोतागणों से — हे श्रोतागणों, भगवान के चरणों में श्रद्धा रखने वालों, मोक्ष प्राप्ति के साधन में तत्पर रहने वालों मैं आपकी इच्छानुसार संसार में अल्प प्रयास से महान फल देने वाला भक्ति के सभी प्रयासों में सर्व श्रेष्ठ कहा जाने वाला (जैसे - चारों वेदों में सामवेद सर्व श्रेष्ठ है। नदियों में गंगा जी श्रेष्ठ हैं। पर्वतों में सुमेरु पर्वत श्रेष्ठ है। गायों में कामधेनु श्रेष्ठ है। वर्णों में विप्रवर्ण श्रेष्ठ है। पुराणों में महाभारत पुराण श्रेष्ठ है। इसी प्रकार यह श्रेष्ठ है। जोकि पुरुषोत्तम मास के नाम से संसार में प्रसिद्ध है। एक समय की बात है नैमिसारण्य नाम का जो तपोवन है।


उस तपोवन में ऋषियों के द्वारा प्रारंभ किया गया, ज्ञान-और मोक्ष प्राप्ति के साधन देने वाला यज्ञ हो रहा था। कुछ दिन व्यतीत होने पर समस्त ऋषियों ने ऋषिश्रेष्ठ सूत जी से प्रश्न किया कि हे ऋषिवर हम लोगों ने आपके मुखार बिंद से श्रद्धा और भक्ति संबंधी अनेक ज्ञान की कथाएं सुनी। अब हम आपसे शीघ्र फलदाता तथा मोक्ष प्राप्ति का साधन जानना चाहते हैं। आप तो कथा प्रसंगों में कह चुके हैं कि जीवात्मा को मोक्ष प्राप्ति के लिये अत्यंत कठिन साधन अर्थात् (तपस्या, योग साधना) करना चाहिए। परंतु हे ऋ



षिवर मोक्ष का साधन देने वाला यदि सांसारिक मनुष्य जो कि मायामोह के बंधन में फंसे हुए पारिवारिक विषय वासना में लिप्त हैं। ऐसे लोगों के लिये मोक्ष प्राप्ति का कोई साधन जो कि सर्व-साधारण के लिये सरल हो, बताने की कृपा करें।


ऋषियों के विशेष आग्रह को सुनकर सूत जी बहोत प्रसन्न होकर कहते हैं। हे ऋषियों आप लोग धन्य हैं। जो कि परोपकार करते हुए श्रद्धापूर्वक परमात्मा का यशोगान सुनना चाहते हैं। मैंने अपने गुरु के द्वारा मोक्ष दायिनी, अनंत पुण्य देने वाला सर्व सुलभ और सांसारिक पुरुषों को अत्यंत सरल मार्ग-मोक्ष प्राप्ति का सुना है। वह मैं आपके सामने प्रगट करता हूं। आप लोग एकाग्र चित्त होकर सुनें। जैसा कि प्रश्न आपने मुझसे किया उसी प्रकार नारदजी ने भगवान नारायण से किया तथा- धर्मराज ने भगवान श्रीकृष्ण से किया कि हे महाप्रभों मैंने आपके मुखार बिंद से अनेक धार्मिक प्रसंग सुने आज मैं आपसे सांसारिक मायामोह में फंसे हुए अनेक पाप कर्मों में लिप्त, चौरासी लक्षयोनि में बारंबार जन्म लेने और मृत्यु को प्राप्त होने वाले जीवात्मा को मोक्ष प्राप्ति का साधन बताइये।


|| शुभम् भवतु ||


|| प्रथम अध्याय समाप्त ||


 

Adhik maas ki Katha 1 adhayay| अधिक मास की कथा प्रथम अध्याय 




|| अथ प्रथम अध्यायः ||

|| श्री मन्महागणधिपतये नमः ||

वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्य समप्रभ ।

निर्विघ्नं कुरुमे देव सर्व कार्येषु सर्वदा ॥

करोड़ों सूर्य के समान कान्तिवाले वक्रतुण्ड वाले ऐसे भगवान गणपति से प्रार्थना है। हमारे समस्त कार्यों को हमेशा विघ्न रहित करके पूर्ण करें।

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।

गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवेनमः ॥

गुरु ब्रह्मास्वरूप हैं गुरु विष्णु स्वरूप हैं गुरु महादेव स्वरूप हैं गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं जिस गुरु के मार्गदर्शन और ज्ञान प्राप्ति की कृपा से हम ग्रंथ की रचना करते हैं ऐसे गुरु को साष्टांग नमस्कार है।

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमा माद्यां जगद्व्यापिनीं ।

वीणा पुस्तक धारिणीं अभयदां जाड्यांधकारा पहाम् ।

हस्ते स्फटिक मालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम् ।

वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धि प्रदां शारदाम् ॥

आदि शक्ति संपूर्ण संसार को वाणी की शक्ति देने वाली श्वेत वस्त्रों को धारण कर श्वेत कमल पर विराजमान वीणा और पुस्तक धारण करने वाली जडबुद्धि के अंधकार को नष्ट करने वाली, भय को दूर करने वाली हाथ में स्फटिक मणि की माला से सुशोभित विद्या और बुद्धि देने वाली परमेश्वरी भगवती शारदा को हम नमस्कार करते हैं। ग्राम देवता, स्थान देवता, वास्तुदेवता, कुलदेवता, माता-पिता, इष्ट देवता समस्त देवगणों की प्रार्थना कर नमस्कार करते हुए ग्रंथ का प्रारंभ करते हैं।


श्री व्यास जी कहते हैं श्रोतागणों से — हे श्रोतागणों, भगवान के चरणों में श्रद्धा रखने वालों, मोक्ष प्राप्ति के साधन में तत्पर रहने वालों मैं आपकी इच्छानुसार संसार में अल्प प्रयास से महान फल देने वाला भक्ति के सभी प्रयासों में सर्व श्रेष्ठ कहा जाने वाला (जैसे - चारों वेदों में सामवेद सर्व श्रेष्ठ है। नदियों में गंगा जी श्रेष्ठ हैं। पर्वतों में सुमेरु पर्वत श्रेष्ठ है। गायों में कामधेनु श्रेष्ठ है। वर्णों में विप्रवर्ण श्रेष्ठ है। पुराणों में महाभारत पुराण श्रेष्ठ है। इसी प्रकार यह श्रेष्ठ है। जोकि पुरुषोत्तम मास के नाम से संसार में प्रसिद्ध है। एक समय की बात है नैमिसारण्य नाम का जो तपोवन है।

उस तपोवन में ऋषियों के द्वारा प्रारंभ किया गया, ज्ञान-और मोक्ष प्राप्ति के साधन देने वाला यज्ञ हो रहा था। कुछ दिन व्यतीत होने पर समस्त ऋषियों ने ऋषिश्रेष्ठ सूत जी से प्रश्न किया कि हे ऋषिवर हम लोगों ने आपके मुखार बिंद से श्रद्धा और भक्ति संबंधी अनेक ज्ञान की कथाएं सुनी। अब हम आपसे शीघ्र फलदाता तथा मोक्ष प्राप्ति का साधन जानना चाहते हैं। आप तो कथा प्रसंगों में कह चुके हैं कि जीवात्मा को मोक्ष प्राप्ति के लिये अत्यंत कठिन साधन अर्थात् (तपस्या, योग साधना) करना चाहिए। परंतु हे ऋ

षिवर मोक्ष का साधन देने वाला यदि सांसारिक मनुष्य जो कि मायामोह के बंधन में फंसे हुए पारिवारिक विषय वासना में लिप्त हैं। ऐसे लोगों के लिये मोक्ष प्राप्ति का कोई साधन जो कि सर्व-साधारण के लिये सरल हो, बताने की कृपा करें।

ऋषियों के विशेष आग्रह को सुनकर सूत जी बहोत प्रसन्न होकर कहते हैं। हे ऋषियों आप लोग धन्य हैं। जो कि परोपकार करते हुए श्रद्धापूर्वक परमात्मा का यशोगान सुनना चाहते हैं। मैंने अपने गुरु के द्वारा मोक्ष दायिनी, अनंत पुण्य देने वाला सर्व सुलभ और सांसारिक पुरुषों को अत्यंत सरल मार्ग-मोक्ष प्राप्ति का सुना है। वह मैं आपके सामने प्रगट करता हूं। आप लोग एकाग्र चित्त होकर सुनें। जैसा कि प्रश्न आपने मुझसे किया उसी प्रकार नारदजी ने भगवान नारायण से किया तथा- धर्मराज ने भगवान श्रीकृष्ण से किया कि हे महाप्रभों मैंने आपके मुखार बिंद से अनेक धार्मिक प्रसंग सुने आज मैं आपसे सांसारिक मायामोह में फंसे हुए अनेक पाप कर्मों में लिप्त, चौरासी लक्षयोनि में बारंबार जन्म लेने और मृत्यु को प्राप्त होने वाले जीवात्मा को मोक्ष प्राप्ति का साधन बताइये।

|| शुभम् भवतु ||








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