Adhik mass ki Katha 13 adhyaya | अधिक मास की कथा तेरहवां अध्याय

 

Adhik mass ki Katha 13 adhyaya | अधिक मास की कथा तेरहवां अध्याय 




।। श्री गणेशाय नमः ।।

श्री भगवान नारायण नारदजी से सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं कि इसके पहले के अध्याय में लक्ष्मीजी ने भगवान विष्णु के द्वारा पुरुषोत्तम मास में अखंडदीप और दीपदान माहात्म्य को सुनकर बड़ी प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा, हे देवाधिदेव आपके मुखारबिंद से दीपदान के माहात्म्य को सुनकर मन और अधिक पीने की इच्छा प्रबल हो रही है। जैसे अमृत को पीकर बारंबार पीने की इच्छा होती है। इसलिये कृपा करके मुझे और भी दीपदान के माहात्म्य का वर्णन सुनाने की कृपा करें। लक्ष्मीजी के वचनों को सुनकर भगवान विष्णु कहते हैं, हे लक्ष्मी तुम धन्य हो। तुम्हारे मन में भगवान पुरुषोत्तम के प्रति अनुराग की भावना इतनी प्रबल है, मैं तुमसे इस विषय का और एक इतिहास कहता हूँ। किसी समय मथुरा नाम की नगरी में शाकली नाम एक ब्राह्मण रहता था। वह सदाचारी और कर्मनिष्ठ था। उसकी दो स्त्री थी। एक का नाम विमला था और दूसरी का नाम सुशीला था। दोनों पत्नियां पति की सेवा में रहती थीं। उनका गृहस्थाश्रम उत्तम प्रकार से चलता रहता था।

एक समय की बात है। पुरुषोत्तम मास का प्रारंभ हुआ। उस दिन नित्य की तरह ब्राह्मण की पत्नी सुशीला प्रातःकाल यमुनाजी में जल लेने गई। वहां उसने देखा बहुत से लोग यमुनाजी में स्नान के लिये आ रहे हैं। कई स्नान कर जा रहे हैं। यह देखकर सुशीला के मन में आश्चर्य हुआ कि कभी इतने लोग स्नान के लिये नहीं आते थे। और आज एकाएक इतने अधिक लोग क्यों आ रहे हैं। वह जल भरकर अपने घर आ गई। और अपने पति के चरणों में नमस्कार करके आग्रह पूर्वक पूछती है हे स्वामी आज मेरे मन में एक कौतूहल उत्पन्न हो गया है। कृपा करके मेरे मन को समाधान करें। आज मैं यमुनाजी में जल लेने गई वहां मैंने देखा बहुत से नर-नारी स्नान करने आए हैं। कभी इतने लोगों को आते मैंने नहीं देखा इसका क्या कारण है। सुशीला के वचनों को सुनकर ब्राह्मण शाकली कहता है, हे प्रिये आज से भगवान पुरुषोत्तम का अत्यंतप्रिय पुरुषोत्तम मास प्रारंभ हुआ है इस मास में सूर्य की संक्रांति नहीं होती इस मास में स्नान, व्रतदान, नियम, संयम, अखंड दीप का स्थापन ये सब कर्म अनंत पुण्य को देने वाले होते हैं।

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जिसमें जैसी श्रद्धा और शक्ति होती है और जिनके मन में मोक्ष प्राप्ति की इच्छा होती है वे नित्यस्नान दीपदान संपूर्ण मासपर्यत करते हैं। हे प्रिये इस मास में थोड़ा भी किया हुआ कर्म अनंत पुण्य देने वाला होता है। पति के वचनों को सुनकर पत्नि सुशीला आनंदित होकर पति से कहती है। हे स्वामी यदि आपकी आज्ञा प्राप्त हो तो मैं भी नित्यस्नान और अखंडदीप की स्थापना आदि कर्म करूं। पति की आज्ञा बिना स्त्रियों का समस्तकर्म निष्फल हो जाता है। इसलिये आपकी आज्ञा प्राप्त होना आवश्यक है। पत्नि के श्रद्धाभाव को देखकर ब्राह्मण शाकली प्रसन्न होकर कहता है। हे प्रिये तुम धन्य हो तुम्हारे मन में भगवान पुरुषोत्तम के प्रति श्रद्धा उत्पन्न है तुम मेरी आज्ञा से नित्यस्नान और अखंडदीप की स्थापना अवश्य करो। पति की आज्ञा प्राप्त होते ही सुशीला ने उसी समय यमुनाजी में स्नानकर शुद्ध वस्त्रों को धारण कर अपने घर में उचित स्थान पर गोबर से लीपकर चौक पूरकर उसपर घट स्थापना करके दीपक जलाकर विधान पूर्वक पूजन किया। उसदिन से उसका नित्य का नियम हो गया। प्रातः सूर्योदय के पहले यमुनाजी में स्नान करके घर में आकर घट और दीपक का पूजन करना पति की सेवा करते हुए भोजन में पति के द्वारा शेष छोड़ा हुआ अन्न का भोजन करना उतने ही भोजन पर रह जाना यही क्रम मास पर्यत उसने धारण किया। उसके इस प्रकार के नियम को देखकर उसकी सौंत विमला के मन में द्वेष की भावना जागृत हो गई।

वह मन में छटपटाने लगी सोचने लगी कि मुझे क्या करना चाहिए कैसा विघ्न उत्पन्न करूं जिससे नियम खंडित हो। इसके दीपक का तेल गिरा देना चाहिए। जिससे थोड़ी देर में दीपक बुझकर खंडित हो जाएगा। ऐसा मन में सोचकर उचित समय की प्रतीक्षा करती रही। एक समय उसको मौका मिल गया ब्राह्मण किसी कार्यवश बाहर गया था और सुशीला यमुना में स्नान करने गई थी ऐसे समय मौका देखकर सौंत विमला ने दीपक का तेल गिरा दिया और दीपक बुझाकर अपने गृहकार्य में लग गई सुशीला स्नान करके घर आती है देखती है कि दीपक बुझा हुआ है यह देखकर सुशीला को बहुत दुःख हुआ उसने फिर से दीपक को प्रज्वलित किया और नित्य की तरह घट और दीपक का पूजन कर भगवान से दीपक खंडित होने की क्षमा याचना की। दूसरे दिन भी ब्राह्मण किसी कार्यवश बाहर गया था सुशीला भोजनादि बनाने के कार्य में लगी थी। ऐसे समय मौका देखकर सौंत विमला ने फिर से दीपक बुझा दिया। थोड़ी देर बाद सुशीला ने दीपक बुझा देखकर फिर से प्रज्वलित कर दिया।

इस कृत्य के द्वारा बारबार दीप खंडित होता हुआ देखकर सुशीला के मन में अत्यंत दुःख होता

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था। वह मन में भगवान से प्रार्थना करके दीप के खंडित होने की क्षमा याचना करती रहती थी। और अब दीपक खंडित न हो इसके प्रति सतर्क रहने लगी। परंतु दुष्ट स्वभाव विमला इसी मौके की तलाश में रहती थी कैसे दीपक बुझे। वह आते जाते हुए मौका देखकर अपने साड़ी के पल्लों से दीपक को हवा करके बुझाने की चेष्टा करती रहती थी। यह सब देखकर भी सुशीला ने अपने पति से कुछ न कहकर सौंत के कृत्य को सहन करती रही। इस प्रकार सुशीला ने श्रद्धा पूर्वक पुरुषोत्तम मास को व्यतीत किया। अमावस के दिन पति के द्वारा अनेक ब्राह्मणों को आमंत्रित करके घर में उनका पाद प्रक्षालन कर पूजन करके उत्तम प्रकार के मिष्टान्न पक्वान्न के द्वारा भोजन कराया सबको दीपदान और यथाशक्ति वस्त्र दक्षिणा देकर बिदा किया। इस प्रकार जब जब पुरुषोत्तम आया तबतब सुशीला ने पति की आज्ञा से स्नान, अखंडदीप आदि नियमों को धारण करते हुए श्रद्धा पूर्वक करती रही।

इस पुण्य के प्रभाव से सुशीला को सर्वगुणसंपन्न, सुंदर, आकृति व स्वरूप वाले तीन पुत्र हुए और जीवन भर सांसारिक सुखों को भोगकर मोक्ष को प्राप्त हुई। और वह दुष्ट विमला दीपक को खंडित करने के जघन्य पाप से उसका शरीर रोग से ग्रसित हो गया। उसके भी तीन पुत्र हुए परंतु जन्म से रोगग्रसित उत्पन्न होने से कुछ दिनों बाद मृत्यु को प्राप्त हो गए। तथा विमला भी दोनो नेत्रों से अंधी हो गई, शरीररोग से जर्जर हो गया समय पर अन्न न मिलने से छटपटाते रहती थी। कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो गई यमलोक में उसको दुष्टता और पाप कर्मों के प्रभाव से हजार वर्ष तक नरक की यातना भोगकर पुनः उसका सुअर की योनि में जन्म हुआ सुअर की योनि में अनेक वर्षों तक दुःख भोगकर भयंकर सर्पिणी की योनि में जन्म हुआ।

उसका दुःख भोगकर चमगीदड़ की योनि में अनेक वर्षों तक दुःख भोगा इस प्रकार चौरासी लक्ष योनि भ्रमण करके मनुष्य की योनि में मद्रदेश में भिल्लिन जाति में उसका जन्म हुआ जन्म से ही उसके शरीर में गलित कुष्ठ का रोग था। इस प्रकार वह पापिणी विमला जन्म-जन्मांतर तक अनेक प्रकार के दुःखों को भोगती रही। और सुशीला अपने पुण्य कर्मों के प्रभाव से संसार में पति के साथ सांसारिक सुखों को भोगते हुए पुत्र पौत्र पृथ्वी पर स्थापित करके मृत्यु के बाद पति के साथ वैकुंठ लोक को प्राप्त हुई। वहां अनेक वर्षों तक सुख भोगकर अक्षय पुण्य के प्रभाव से मोक्ष को प्राप्त हुई। हे लक्ष्मी इस प्रकार यह पुरुषोत्तम मास में अखंडदीप की स्थापना का माहात्म्य है। जो भी नर नारी पुरुषोत्तम मास में नियम धारण करके नित्यस्नान अखंडदीप की स्थापना और विप्रपूजा तथा यथा शक्तिदान आदि कर्म करेंगे,

वे भी अनंत पुण्य के प्रभाव से सांसारिक सुखों को भोगकर मृत्यु के बाद अक्षय पुण्य के प्रभाव से मोक्ष को प्राप्त करेंगे। अर्थात संसार में बारबार जन्म लेना और मरना इस बाधा से हमेशा के लिये छुटकारा पाना यही मोक्ष कहलाता है। भगवान के द्वारा प्रेषित आत्मा पुण्यकर्म के द्वारा भगवान की शक्ति में लीन हो जाती है।

जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार

बृहन्नारदीय पद्याधारे त्रयोदशोऽध्यायः समाप्त ।।

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।। शुभमभवतु ।।






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