अधिक मास ki Katha 10 adhyaya |अधिक मास की कथा दसवां अध्याय
|| अथ दशमो ऽध्याय: प्रारंभ: ||
|| श्री गणधाय पतयेनम: ||
भगवान विष्णु नारद जी से सूतजी शौनकादि ऋषियों से वाल्मीक ऋषि राजा दृढ़धन्वा से तथा श्रीहरि लक्ष्मीजी से कहते हैं हे लक्ष्मी! चैत्र आदि जो बारह महीने हैं उनका स्वामी सूर्य है। इन बारह महीनों में प्रत्येक मास में सूर्य की संक्रांति होती है। परंतु जो संक्रांति से हीन महीना है, उसी को अधिक मास कहा जाता है। उसी के स्वामी भगवान पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। इस मास में थोड़ा भी जप, नियम, व्रतदान, भजन, कीर्तन आदि अक्षयपुण्य देनेवाला होता है। इसलिये इस मास में प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि अपनी शारीरिक शक्ति के अनुसार नियम व्रत आदि धारण करता हुआ श्रद्धापूर्वक दान का पुण्य यादिक कर्म अवश्य करें। ये समस्त कर्म प्रतिपदा से प्रारंभ कर अमावस पर्यंत एक मास तक करे। जिन मनुष्यों में नियमव्रत करने की शारीरिक क्षमता न हो तथा शारीरिक क्षमता होते हुए आर्थिक क्षमता न हो, उनके लिये सरल उपाय यह है कि एक तो श्री नियम धारण कर भगवान का नाम संकीर्तन करते हुए पुरुषोत्तम मास का पुण्य प्राप्त करे। इसमें न तो शारीरिक शक्ति की आवश्यकता न द्रव्य की आवश्यकता है। सिर्फ मन में श्रद्धा भावना और अपने आत्म के उद्धार की आकांक्षा होनी चाहिए। भगवान के वचनों को सुनकर लक्ष्मीजी प्रश्न करती है, हे प्रभो! जो मनुष्य निर्धन है, दुराचारी है, बुद्धिहीन है ऐसे मनुष्यों के लिये कोई सरल उपाय बताएं। भगवान कहते हैं कि हे लक्ष्मी! पुण्य प्राप्ति के अनेक साधन हैं परंतु इनमें सबसे सरल उपाय यह है कि वे विद्वानों का सत्संग करे। जिससे ज्ञान की वृद्धि होती है, श्रद्धा भावना जागृत होकर पुण्यकर्म में प्रवृत्ति होती है। संतों की कृपा से समस्त मनोकामनाएं परिपूर्ण होकर बैकुंठ धाम की प्राप्ति होते हैं। हे लक्ष्मी! इसी प्रकार गौ और ब्राह्मण के पूजा का भी बड़ा महत्व है। गौ के शरीर में चौदह भुवन निवास करते हैं। हे लक्ष्मी! इसी प्रकार गौ का दर्शन, स्पर्श और पूजन मनुष्य के समस्त पापों को नष्ट करके दुःख शोक दारिद्रय नष्ट होकर घर में लक्ष्मी का आगमन, पुत्र पौत्रों की वृद्धि होती है। गौ का पूजन अर्थात ब्रह्माविष्णु महेश का पूजन होता है। गौ के गोबर में यमुनाजी का वास, गो-मूत्र में नर्मदा जी का वास और दूध में गंगाजी का निवास रहता है। इसलिये गौ का पूजन हमेशा करना चाहिए परंतु पुरुषोत्तम मास में गौ पूजा, सेवा विशेष पुण्य दायी होती है।
इसी प्रकार विष्णुपा का भी विशेष महत्व है। मनुष्य के शरीर के लिये गौ का आधार माता के आधार के समान है। गाय का दूध, दही, घी के शरीर कर्म परिपूर्ण होते है। ये पुराण और वेद शास्त्रों के अति पवित्र मानी गई है। वेद और शास्त्रों में भी गाय का बड़ा महत्व कहा गया है। इसलिये गौ को पूज्य का स्थान तथा यशशाला और पूजन का स्थान गौ के गोबर से ही पवित्र होता है। इसलिये गौ को पूज्य का मुख और दूध को अमृत की संज्ञा दी गई है। जिससे मन में स्वर्गलोक प्राप्ति की इच्छा होती है, पुरुषोत्तम मास में गौ की सेवा और पूजा करने वाले को वही पुण्य की प्राप्ति होती है। गाय सूर्य की कन्या है। समस्त जनकल्याण और यज्ञ साधन की पूर्ति के लिये ही इसकी उत्पत्ति हुई है। जैसे कि भागीरथी गंगा अति पवित्र व जनकल्याण का कारण है, उसी प्रकार गौ भी पवित्र और जनकल्याणप्रदाय है। हे लक्ष्मी! गौ के महत्व का वर्णन चार मुखवाले ब्रह्माजी भी करने में असमर्थ है।
गौ दान का महात्म्य समस्त दानों से श्रेष्ठ होता है। हे लक्ष्मी! जिस मनुष्य के मन में पुरुषोत्तम मास का अनंत पुण्य की प्राप्ति की इच्छा हो। उनको चाहिये कि अच्छे लक्षणों से युक्त सुशील, युवावस्था और पुष्ट शरीर वाली गौ को वस्त्र और अलंकार से सुशोभित करें यदि सामर्थ्य हो तो गाय के सींग सुवर्ण से तथा खुरचांदी से मड़वाकर श्रद्धापूर्वक विधान से पूजन करके सुपात्र ब्राह्मण को संकल्पपूर्वक दान करे। अधिकमास में किया हुआ गौदान जन्म जन्मांतर के पापों को नष्ट करने वाला, तथा स्वर्गलोक देने वाला होता है। तीनों लोकों में गौदान के पुण्य के समान कोई पुण्य कार्य नहीं है। हे लक्ष्मी! गौदान सुपात्र ब्राह्मण को ही देना चाहिए। सुपात्र ब्राह्मण किसे कहते हैं सो सुनो। जो ब्राह्मण अपने धर्म कर्म में लगा हो। जिसमें शास्त्रों का अध्ययन किया और विद्वान हो। जो ब्राह्मण अपने कुटुंब परिवार का पालन करने वाला, और शांत स्वभाववाला, शुद्ध और सात्त्विक प्रकृति वाला, अपने कुटुंब परिवार का पालन करने वाला, भगवान की भक्ति और सेवा में तत्पर हो वही ब्राह्मण सुपात्र माना जाता है।
ऐसे ब्राह्मण को पुरुषोत्तम मास में गौदान करने से महान पुण्य की प्राप्ति और स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है। इसलिये पुरुषोत्तम मास में गौ की सेवा और पूजा करते हुए, पुष्ट शरीर वाली अधिक दूध देनेवाली बछड़े सहित गौ लाकर धर्म शास्त्रों में बताए हुए, अनुसार वस्त्र अलंकार आदि से सजाकर एकाग्रचित्त से श्रद्धा पूर्वक गौ की पूजा करके सुपात्र ब्राह्मण को बुलाकर ब्राह्मण की भी पूजा करे। पाद्य अर्घ आदि उपचार समर्पित करके वस्त्र अलंकार भी दे और उत्तम प्रकार की खाद्य सामग्रियों का भोजन करावे। तांबूल, फल, दक्षिणा देकर संतुष्ट करे। फिर गाय की पूंछ अपने हाथ में लेकर पत्ती छोड़कर ब्राह्मण के चरणों में और ब्राह्मण के चरणों में प्रणाम करे। अगर कोई ब्राह्मण के हाथ में न छोड़ता जाए यह जल ब्राह्मण के हाथ में में छोड़ता जाए। इस प्रकार के दान से ब्राह्मण को प्रतिग्रहण का दोष नहीं लगता। सुपात्र को दान देने से ही दान का सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है। यह गौ दान पितृलोक में और संसार में भी पुण्य देनेवाला तथा दानकर्ता पुरुष को भी महान फलदायी होता है। ये सारे शास्त्रों में और संसार में गौ दान के सदृश कोई पुण्य कर्म नहीं है। कुपात्र को दिया हुआ दान देने वाले और लेने वाले दोनों को नरक की यातना और कष्ट देने वाला तथा सांसारिक जीवन में दुःख दारिद्रय और अनेक व्याधियों से युक्त होकर महान कष्टदायी होता है। इसलिये कभी भी कुपात्र ब्राह्मण को दान नहीं देना चाहिए। उसी प्रकार दुग्धहीन दूध न देनेवाली अत्यंत दुर्बल शरीरवाली, बांझ, रोगी, वृद्ध, अंधी, लंगड़ी, ऐसी गौ का दान पुण्य की अपेक्षा प्रायश्चित देने वाला होता है, ऐसे दान से दाता अपने पूर्वजोंसहित नरक की यातना भोगता है। इसलिये मनुष्य का कर्तव्य है पुण्य प्राप्ति के निमित्त जब द्रव्य और मानसिक श्रद्धा भावना परिपूर्ण हो तभी श्रद्धापूर्वक गौदान करना चाहिए।
इस प्रकार के दान से ही अनंत पुण्य की प्राप्ति कर सकता है। जैसे अमृत कितना स्वादिष्ट है। आकाश कितना बड़ा है। सूर्य का तेज कितना है। पाताल कितना गहरा है। मेरु पर्वत कितना ऊंचा है। भगवान विष्णु और शंकर कितने प्रतापी और तपस्वी हैं। कामदेव की पति कितनी सुंदर है। इन सबकी उपमा का वर्णन करना असंभव है। उसी प्रकार गौ दान के महात्म्य और फल का वर्णन करना असंभव है। इस महात्म्य के श्रवण मात्र से मनुष्यों के अनेक पाप नष्ट हो जाते हैं।
जे जे श्री अधिकमास महात्म्य सार
(४०)
|| शुभमभवतु ||
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