Adhik mass ki Katha 27 adhyaya| अधिक मास की कथा 27वा अध्याय

 Adhik mass ki Katha 27 adhyaya| अधिक मास की कथा 27वा अध्याय 

॥ अथ सप्तविंशतितमोऽध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री मन्महागणधिपतये नमः ॥
श्री भगवान नारायण नारदजी से सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं। हे ऋषियों इसके पहले के अध्याय में भगवान ने अधिक मास के उद्यापन का विधान और समस्त मास की पूर्णता के लिये दान का विधान कहा। आज के कथा प्रसंग में भगवान विष्णु कहते हैं। हे लक्ष्मी पुरुषोत्तम मास का व्रत सभी व्रतों में सर्वोत्तम और सभी पुण्यकर्मों से विशेष महान अक्षय पुण्य को देने वाला होता है। जो लोग पुरुषोत्तम मास में नियमव्रत आदि धारण करते हुए श्रद्धापूर्वक मास को व्यतीत करते हैं। वे पुण्यात्मा के पास अन्तिम समय यमदूत कभी नहीं आते जैसे सिंह को देखकर हाथी भाग जाते हैं। और गरुड़ को देखकर सांप बिल में घुस जाते हैं। सूर्य का प्रकाश आते ही अंधकार भाग जाता है। उसी प्रकार पुण्यात्मा को देखकर यमदूत कभी उनके पास नहीं जाते। हे लक्ष्मी जिसने पुरुषोत्तम मास में आराधना की है। उसके घर और शरीर में समस्त तीर्थों का वास रहता है। और समस्त देवताओं की कृपा रहती है। और समस्त विघ्नबाधाएं नष्ट होकर मन में शांति स्थापित रहती है। उनके समक्ष भूत प्रेत पिशाच आदि की कोई बाधा नहीं आती वे कहीं भी रहें सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करते हुए यज्ञ यागादिक करने वाले पुण्यात्माओं से भी ज्यादा पुण्य शाली होकर अंत में अक्षय पुण्य के द्वारा मोक्ष को प्राप्त करते हैं। हे लक्ष्मी इसके पुण्य फल का वर्णन करने में हजार जिह्वा वाले शेषनाग भी असमर्थ हैं।
हे लक्ष्मी इस मास को किस प्रकार कौन कौन से नियम धारण करने योग्य होते है सो मैं कहता हूं इसमें अपनी शारीरिक शक्ति के अनुसार कोई भी एक या अनेक नियम को धारण करने का संकल्प (निश्चय) करके नित्य प्रातः स्नान पूजन जप स्मरण भजन कीर्तन करते हुए सात्विक वृत्ति से रहना चाहिये। इसके नियम हैं, भूमि पर सोना, किसी एक तेल का परित्याग, एक ही जाति की पत्रावलीपर भोजन करना, नख और बालों को न काटना, एक ही अन्न का भोजन करना नित्य दीपदान करना, मालपुआ या अन्नशा या मिष्ठान का दान करना, नित्य ब्राह्मण भोजन करवाना, जूता चप्पल न पहनना, आंवले के चूर्ण को पानी में डालकर स्नान करना, किसी एक फल का त्याग, नमक का त्याग, नियतलीला, तांबूल, धान्य का दान, सुवर्ण, चांदी या द्रव्य का दान, भागवत श्रवण का नियम, अयाचित, नक्त, धारणापारण, या एक समय भोजन का नियम, हविष्यान्न भोजन का नियम, मौन धारण का नियम तुलसी पूजन, शालिग्राम पूजन, आदि अनेक नियमों में से एक दो या तीन चार जितने भी नियम धारण करने की शारीरिक क्षमता हो उतने नियम का निश्चय करके संपूर्ण मास पर्यंत पालन करना चाहिये बीच में नियम भंग न हो इस बात की दक्षता रखना चाहिये।
एक भी नियम धारण करके यदि दक्षता पूर्ण संपूर्ण मास पालन किया जाय तो भी अनन्य पुण्य की प्राप्ति होती है। इस मास में सभी को इन वस्तुओं का त्याग करना चाहिए। राई, चना, नागरमोथा, तिल का तेल, प्याज, लहसुन, मूली, गाजर, बैंगन, इमली, जाम्बीर नींबू, मादक नशा उत्पन्न करने वाले पदार्थ, मसूर की दाल, पकाया हुआ बासी अन्न, गाय भैंस के अलावा दूसरे पशुओं का दूध, भूमि से उत्पन्न नमक, तांबे के बर्तन में रखा हुआ दूध या घी, सिर्फ अपने लिये पकाया हुआ अन्न, ब्रह्मचर्य धारण, जलहुुआ अन्न, दूसरों से निंदित अन्न, अपने मन से दूषित अन्न देवता और ब्राह्मणों से द्वेष रखने वालों का अन्न, कौवों से स्पर्श किया अन्न, सूतक लगी अवस्था का अन्न इन सभी वस्तु और पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। तथा दूसरों से द्वेष करना, किसी की निंदा करना, वेद ब्राह्मण, राजा, स्त्री और गौ की निंदा नहीं करना चाहिए। इस प्रकार इन नियमों का पालन करते हुए अधिक मास को बिताना चाहिए।
तुलसीदल या मंजरी से शालिग्राम की नित्यपूजा और नित्य श्री मद भागवत का श्रवण अनंत पुण्य देने वाला होता है। मृत्यु के उपरांत चतुर्भुजी स्वरूप धारण करके स्वर्गों की प्राप्ति देता है। व्रत उपवास का नियम धारण करने वाले को नित्य अश्वमेघ यज्ञ के फल की प्राप्ति होती है। हे लक्ष्मी नियम धारण करनेवाले को किस प्रकार अंत में नियम छोड़ना चाहिए सो मैं कहता हूं। नक्त भोजन का नियम धारण करने वाले को अंत में ब्राह्मण भोजन और सुवर्ण का दान करके नियम छोड़ना चाहिए। आंवले के चूर्ण का स्नान करने वाले को दही और दूध का दान करना चाहिए। एक अन्न का भोजन करने वाले को गेहूं और चावल का दान, भूमि पर सोने के नियम वाले को शय्यादान, तेल त्याग में घी का दान, घी के त्याग में दूध का दान, पत्रावली पर भोजन करने वाले को घी, शक्कर और अन्न का दान मौन व्रत वाले को घंटा घड़ियाल का दान, नखकेश धारण के नियम में आईने का दान, जूता चप्पल के नियम में जूता या चप्पल का दान, लवण त्याग करने पर घी, शक्कर, नमक का दान, दीपदान के नियम में चांदी का दीपक, सुवर्ण की बत्ती का दान, धारणापारण नियम में वस्त्र और कुंभ (जलपात्र) का दान, एक समय भोजन के नियम में उत्तम अन्न और शुद्ध घी से बने तीस लड्डू का दान करना चाहिए नियम की पूर्ति और फल की प्राप्ति के लिये इसी प्रकार नियम छोड़ना चाहिए यह कर्म अमावस्या के दिन करना श्रेष्ठ होता है।
जो जो पदार्थ छोड़ने का नियम धारण किया हो असमर्थ पुरुषों को वही पदार्थ दान करना चाहिए भगवान पुरुषोत्तम का पूजन हवन करके उपरोक्त प्रकार से दान करके ब्राह्मण का आशीर्वाद प्राप्त करके नियम छोड़ना चाहिए। अपने नियम और व्रत की सफलता के लिये यथा शक्ति दक्षिणा देकर व्रत की पूर्ति का फल प्राप्त करे। हे लक्ष्मी समस्त मनोकामनाओं को देनेवाला महान पुण्यदायक अधिक मास का नियम है। इन नियमों को अनेक देवता ऋषि संन्यासी भी धारण करके अक्षय पुण्य को प्राप्त करते हैं।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
॥ बृहन्नारदीय पुराणांतर्गत सप्तविंशतितमोऽध्यायः समाप्त ॥
॥ शुभमभवतु ॥




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