Adhik maas ki Katha 3 adhayay | अधिक मास की कथा तीसरा अध्याय


Adhik maas ki Katha 3 adhayay | अधिक मास की कथा तीसरा अध्याय 


॥ अथ तृतीयोऽध्यायः प्रारंभः ॥


व्यासजी कहते हैं अपने श्रोतागणों से, सूतजी कहते हैं शौनकादि ऋषियों से, भगवान नारायण कहते हैं नारदजी से एवं भगवान कृष्ण कहते हैं युधिष्ठिर से कि -

हे धर्मराज, भगवान पुरुषोत्तम के आग्रह से भगवान विष्णु पास ही सिंहासन पर विराजमान होते हैं। उनके पीछे अत्यंत दयनीय अवस्था में नेत्रों में आंसू भरे हुए, हाथ जोड़कर अधिकमास खड़ा था। उसकी ऐसी अवस्था को देखकर परम दयालु भगवान पुरुषोत्तम विष्णुजी से पूछते हैं। हे विष्णो! आप यह किसको लेकर आए हैं? इसका नाम क्या है? इसके नेत्रों में आंसू क्यों हैं? मेरे गोलोक में किसी प्रकार का दुःख नहीं है, यहाँ हमेशा परमानंद व्याप्त रहता है। फिर मैं इसको इतना दुःखी क्यों देख रहा हूं। इसका शरीर भी भय से थर-थर कांप रहा है।


भगवान पुरुषोत्तम के पूछने पर भगवान विष्णु कहते हैं। हे देवाधिदेव! यह अत्यंत दीन व दुःखी है। तथा निराश्रित और लोगों के द्वारा निन्दनीय बना है। इसी कारण यह आपके गोलोक में आने पर भी दुःख से छुटकारा नहीं पा रहा है। हे प्रभु! संसार में घटी, पल, कल्प, दिन, पक्ष, संवत्सर, ऋतु, अयन, औषधि, लता वृक्ष, झरने, नदी, तालाब, कुंज, बावली, इन सबका कोई न कोई देवता स्वामी है। वे सब समय-समय पर पूजित होते हैं। आदर की दृष्टि से प्रशंसा प्राप्त हैं। परंतु इसका कोई स्वामी न होने से सांसारिक लोग इसको अशुभ और मलमास कहते हैं। इसके समय पर सब लोग शुभ कर्म करना बंद कर देते हैं। इसमें सूर्य की संक्रांति न होने से यह अत्यंत अशुभ माना जाता है। इसके समय पर लोग विवाह, प्रतिष्ठा, यज्ञ, होम, दान, स्नान, जप, यात्रा, आदिक सब बंद कर देते हैं।


हे महाप्रभो! इसकी अवस्था विधवा नारी के समान है। इसी दुःख से यह अत्यंत दुःखित होकर मेरे वैकुंठ लोक में आकर इसने शरण की याचना की। इसके दुःख को सुनकर मैंने विचार किया कि आपके सिवा इसका दुःख दूर होना असंभव है। इसीलिए मैं आपकी शरण में लेकर आया हूं। हे महाप्रभो! हम ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि समस्त देवगण आपकी ही कृपा से तेजस्वी, प्रभावशाली, पराक्रमी हैं, दैत्य और दुष्टों पर विजय प्राप्त करके अपने भक्तों की और संसार की रक्षा करते हैं। और संसार में जो भी भक्तगण, ऋषि, मुनि, योगी, संन्यासी और गृहस्थ पुरुष आपकी उपासना करते हैं।

हे दीनदयालु! आप बहुत शीघ्र उसपर प्रसन्न होकर संसार में सर्वश्रेष्ठ अत्यंत कठिन तपस्या से प्राप्त होने वाला चौरासी लक्ष योनी के आवागमन से मुक्त करने वाला ऐसा सर्वोत्तम मोक्ष पद आप अपने भक्तों को दे देते हैं। हम देवतागण इस फल को देने में असमर्थ हैं। आप सर्वशक्तिमान हैं, आप अपनी इच्छा से जो चाहें कर सकते हैं। इसलिये हे महाप्रभु! मैं इस अधिकमास को आपकी शरण में लाया हूं। आप इसको अपनी शरण में लेकर इसका उद्धार करिए।

समस्त वेद, पुराण और विद्वान कहते हैं - आप निराश्रितों के आश्रयदाता, शरणागत पर शीघ्र प्रसन्न होकर रक्षा करने वाले अत्यंत दयालु हैं। अपने इस शरणागत की रक्षा कीजिये। इस प्रकार विष्णु जी भगवान पुरुषोत्तम की प्रार्थना कर हाथ जोड़कर खड़े रहे। विष्णुजी के वचनों को सुनकर भगवान पुरुषोत्तम अत्यंत प्रसन्न होते हुए कहते हैं। हे विष्णो! आपने उत्तम मार्ग इस निराश्रित के लिये चुना। आप इसको लेकर मेरे पास आए हैं, इसका उद्धार करने के कारण तीनों लोकों में आपकी (कीर्ति) प्रशंसा होती है। आपने इसको शरण दी है तो मैं भी इसको शरण अवश्य दूंगा, इसमें संशय नहीं है।


हे विष्णु! आज से मैं इस अधिकमास को सर्वश्रेष्ठ सर्वोच्च पद देता हूं। जैसे मैं देवताओं में सर्वश्रेष्ठ हूं। उसी प्रकार समस्त भक्ति मार्ग, व्रत, उपवास, दान पुण्य के द्वारा मनोवांछित फल और मोक्ष देने में यह सामर्थ्यवान होगा। जैसे मुझ में दया, कीर्ति, शांति, उदारता, पराक्रम, धैर्य, ज्ञान, वैराग्य, कान्ति, ऐश्वर्य आदि गुण हैं, उसी प्रकार इस अधिकमास में भी होंगे। आज से यह संसार में प्रसिद्धि और प्रशंसा में सर्वश्रेष्ठ होकर अपने अर्थात अधिकमास आने पर जो भी मनुष्य भक्ति और दान पुण्य व्रत उपवास नियम धारण करेंगे, उनको मेरे जैसा ही वरदान देने में सामर्थ्यवान होगा।


हे विष्णो! आज से अपने सभी गुण और प्रतिभा से इसको संपन्न कर दिया है। जैसे मेरा नाम संसार में प्रख्यात है, उसी प्रकार यह भी जग प्रसिद्ध होगा। हे विष्णो! आज से मैं इसका स्वामी हूं। इसको मैं अपना नाम (पुरुषोत्तम) भी देता हूं। यह आज से सभी महीनों में श्रेष्ठ माना जाएगा। इसका समय (मास) आने पर जो लोग व्रत नियम धारण करेंगे, अपनी शक्ति के अनुसार धर्म कर्म, दान, पुण्य करेंगे, वह अनंतपुण्य के और मोक्ष के भागीदार होंगे। इसके जो भक्त होंगे, उनके समस्त दुःख-दारिद्र्य नष्ट होकर सब सुखमय जीवन प्राप्त करेंगे। और अंत में मोक्ष को प्राप्त करेंगे।

आज से यह मेरे ही समान अपने भक्तों को वरदान देने में सामर्थ्यशील होगा। इसके समय में थोड़ी भी आराधना करने वालों के जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होकर वह अनंत पुण्य प्राप्त करेगा। जिस मोक्ष की प्राप्ति के लिये लोग संन्यास, ब्रह्मचर्य धारण करके तपस्या करते हैं तथा पंचाग्नि साधन, व्रत उपवास, व सिर्फ वायु का भक्षण धूम्रपान करते हैं। वर्षों ऋतु में खुले मैदान में बैठकर तपस्या करते हैं। भयंकर सर्दी के समय पर्वतों में जाकर तपस्या करते हैं, भयंकर गर्मी में अपने आसन के चारों तरफ अग्नि जलाकर पंचाग्नि साधन करते हुए तपस्या करते हैं। वही मोक्ष प्राप्ति इस पुरुषोत्तम मास के भक्तों को मैं प्रदान करूंगा। जैसे पृथ्वी में अनाज का एक कण बोने से हजारों कण अनाज उत्पन्न होता है, उसी प्रकार इसके मास में किया हुआ पुण्य कर्म कई गुना अधिक होकर इसके भक्तों को प्राप्त होगा। चातुर्मास्य, यज्ञ, दान और देवताओं की आराधना करने वालों को वैकुंठ आदि लोकों की प्राप्ति होती है। अपने कर्म और पुण्य की सीमा के अनुसार वैकुंठ का सुख भोगकर फिर जन्म लेना पड़ता है। परंतु इसके भक्तों को अनंत पुण्य के प्रभाव से मोक्ष की प्राप्ति होगी।

हे विष्णो! आज के बाद जो लोग इसकी निंदा, अवहेलना करेंगे या इसे मलमास कहेंगे, उन्हें उनके समस्त पुण्य नष्ट होकर दुःख दारिद्र्य भोगना पड़ेगा तथा वे नरक गामी होंगे।

हे विष्णो! मैं कदाचित अपने भक्तों की इच्छापूर्ण करने में विलंब कर सकता हूं, परंतु इस पुरुषोत्तम मास के भक्तों की इच्छाएं शीघ्र पूर्ण करूंगा। इस मास के आने पर जो सांसारिक मनुष्य व्रत नियम धारण करेंगे तथा अपनी शक्ति के अनुसार दान, पुण्य, भजन-कीर्तन, यज्ञ, हवन आदि पूजा कर्म करेंगे, ऐसे मनुष्यों को संसार में कीर्ति, यश, सौभाग्य, संतति, धन ऐश्वर्य की संपन्नता, सुखमय जीवन प्राप्त होकर अंत में मोक्ष की प्राप्ति होगी। तथा जो मनुष्य इसका मास आने पर संपूर्ण मास ऐसे ही व्यतीत करेंगे, ऐसे लोग दुर्भाग्यशाली और अनंत पुण्य से वंचित रहकर सांसारिक दुःख में लिप्त रहेंगे। आज से यह मेरा परम भक्त है। मैं इसका स्वामी हूं।

हे विष्णो! अब आप निश्चिंत हो जाएं। अपने वैकुंठ लोक में जाकर इसको उचित और उत्तम स्थान दें। भगवान पुरुषोत्तम की आज्ञा प्राप्त कर श्री विष्णु अधिकमास को अपने साथ गरुड़ पर बैठाकर वैकुंठ लोक में लाए तथा वहां अपने मंदिर के पास ही सुंदर मंदिर में पुरुषोत्तम मास को स्थान दिया, तब से वह पुरुषोत्तम मास वैकुंठ धाम में सर्वोच्च कीर्ति प्राप्त कर रहने लगा।

भगवान कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि, हे धर्मराज! उसी समय से संसार में अधिक मास की ख्याति पुरुषोत्तम मास के नाम से प्रसिद्ध हुई। तीनों लोक में भगवान की कृपा से यह अत्यंत सामर्थ्यवान, परमश्रेष्ठ और सभी भक्ति मार्ग में प्रधानता प्राप्त की। जो लोग इसके आने पर थोड़ा भी पुण्य कर्म करते हैं उनके समस्त पाप क्षीण होकर सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। हे युधिष्ठिर! तुम पांडवों पर एक के बाद एक अनेक आपत्तियां आ रही हैं। तुमको वनवास की अवस्था में अनेक दुःख भोगने पड़ रहे हैं। दो-तीन बार पुरुषोत्तम मास आकर व्यतीत हो गया, परंतु तुमको इसकी जानकारी न होने से कुछ भी नहीं कर सके। परंतु अब जो पुरुषोत्तम मास आएगा, उसमें तुम लोग अवश्य व्रत उपवास नियम धारण करना। इस कर्म के द्वारा तुम्हारे समस्त पाप क्षय होकर अनंत पुण्य के द्वारा तुम कौरवों पर विजय प्राप्त करके अपना साम्राज्य प्राप्त करोगे और संसार में यशकीर्ति और सौभाग्य भी प्राप्त होगा।

जै जै श्री बृहन्नारदीय पद्म धरे अधिकमास महात्म्य सार तृतीयोऽध्यायः समाप्त

(३)



Adhik maas ki Katha 1 adhayay| अधिक मास की कथा प्रथम अध्याय

 


 

Adhik maas ki Katha 1 adhayay| अधिक मास की कथा प्रथम अध्याय 




|| अथ प्रथम अध्यायः ||

|| श्री मन्महागणधिपतये नमः ||

वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्य समप्रभ ।

निर्विघ्नं कुरुमे देव सर्व कार्येषु सर्वदा ॥

करोड़ों सूर्य के समान कान्तिवाले वक्रतुण्ड वाले ऐसे भगवान गणपति से प्रार्थना है। हमारे समस्त कार्यों को हमेशा विघ्न रहित करके पूर्ण करें।

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।

गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवेनमः ॥

गुरु ब्रह्मास्वरूप हैं गुरु विष्णु स्वरूप हैं गुरु महादेव स्वरूप हैं गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं जिस गुरु के मार्गदर्शन और ज्ञान प्राप्ति की कृपा से हम ग्रंथ की रचना करते हैं ऐसे गुरु को साष्टांग नमस्कार है।

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमा माद्यां जगद्व्यापिनीं ।

वीणा पुस्तक धारिणीं अभयदां जाड्यांधकारा पहाम् ।

हस्ते स्फटिक मालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम् ।

वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धि प्रदां शारदाम् ॥

आदि शक्ति संपूर्ण संसार को वाणी की शक्ति देने वाली श्वेत वस्त्रों को धारण कर श्वेत कमल पर विराजमान वीणा और पुस्तक धारण करने वाली जडबुद्धि के अंधकार को नष्ट करने वाली, भय को दूर करने वाली हाथ में स्फटिक मणि की माला से सुशोभित विद्या और बुद्धि देने वाली परमेश्वरी भगवती शारदा को हम नमस्कार करते हैं। ग्राम देवता, स्थान देवता, वास्तुदेवता, कुलदेवता, माता-पिता, इष्ट देवता समस्त देवगणों की प्रार्थना कर नमस्कार करते हुए ग्रंथ का प्रारंभ करते हैं।


श्री व्यास जी कहते हैं श्रोतागणों से — हे श्रोतागणों, भगवान के चरणों में श्रद्धा रखने वालों, मोक्ष प्राप्ति के साधन में तत्पर रहने वालों मैं आपकी इच्छानुसार संसार में अल्प प्रयास से महान फल देने वाला भक्ति के सभी प्रयासों में सर्व श्रेष्ठ कहा जाने वाला (जैसे - चारों वेदों में सामवेद सर्व श्रेष्ठ है। नदियों में गंगा जी श्रेष्ठ हैं। पर्वतों में सुमेरु पर्वत श्रेष्ठ है। गायों में कामधेनु श्रेष्ठ है। वर्णों में विप्रवर्ण श्रेष्ठ है। पुराणों में महाभारत पुराण श्रेष्ठ है। इसी प्रकार यह श्रेष्ठ है। जोकि पुरुषोत्तम मास के नाम से संसार में प्रसिद्ध है। एक समय की बात है नैमिसारण्य नाम का जो तपोवन है।

उस तपोवन में ऋषियों के द्वारा प्रारंभ किया गया, ज्ञान-और मोक्ष प्राप्ति के साधन देने वाला यज्ञ हो रहा था। कुछ दिन व्यतीत होने पर समस्त ऋषियों ने ऋषिश्रेष्ठ सूत जी से प्रश्न किया कि हे ऋषिवर हम लोगों ने आपके मुखार बिंद से श्रद्धा और भक्ति संबंधी अनेक ज्ञान की कथाएं सुनी। अब हम आपसे शीघ्र फलदाता तथा मोक्ष प्राप्ति का साधन जानना चाहते हैं। आप तो कथा प्रसंगों में कह चुके हैं कि जीवात्मा को मोक्ष प्राप्ति के लिये अत्यंत कठिन साधन अर्थात् (तपस्या, योग साधना) करना चाहिए। परंतु हे ऋ

षिवर मोक्ष का साधन देने वाला यदि सांसारिक मनुष्य जो कि मायामोह के बंधन में फंसे हुए पारिवारिक विषय वासना में लिप्त हैं। ऐसे लोगों के लिये मोक्ष प्राप्ति का कोई साधन जो कि सर्व-साधारण के लिये सरल हो, बताने की कृपा करें।

ऋषियों के विशेष आग्रह को सुनकर सूत जी बहोत प्रसन्न होकर कहते हैं। हे ऋषियों आप लोग धन्य हैं। जो कि परोपकार करते हुए श्रद्धापूर्वक परमात्मा का यशोगान सुनना चाहते हैं। मैंने अपने गुरु के द्वारा मोक्ष दायिनी, अनंत पुण्य देने वाला सर्व सुलभ और सांसारिक पुरुषों को अत्यंत सरल मार्ग-मोक्ष प्राप्ति का सुना है। वह मैं आपके सामने प्रगट करता हूं। आप लोग एकाग्र चित्त होकर सुनें। जैसा कि प्रश्न आपने मुझसे किया उसी प्रकार नारदजी ने भगवान नारायण से किया तथा- धर्मराज ने भगवान श्रीकृष्ण से किया कि हे महाप्रभों मैंने आपके मुखार बिंद से अनेक धार्मिक प्रसंग सुने आज मैं आपसे सांसारिक मायामोह में फंसे हुए अनेक पाप कर्मों में लिप्त, चौरासी लक्षयोनि में बारंबार जन्म लेने और मृत्यु को प्राप्त होने वाले जीवात्मा को मोक्ष प्राप्ति का साधन बताइये।

|| शुभम् भवतु ||








Adhik maas ki Katha 2 adhyaya| अधिक मास की कथा दूसरा अध्याय



Adhik maas ki Katha 2 adhyaya| अधिक मास की कथा दूसरा अध्याय

व्यास जी कहते हैं -

प्रथम अध्याय के कथानुसार धर्मराज ने श्री कृष्णजी से प्रश्न किया, उनके प्रश्नोत्तर में रुक्मिणी रमण भगवान कृष्ण कहते हैं। हे धर्मराज तुम्हारे प्रश्न का उत्तर अत्यंत गुप्त है। जिसको कि आज तक ऋषियों ने मेरे स्त्री, पुत्र, बंधु बांधव भी नहीं प्राप्त कर सके। परंतु तुम मेरे परम भक्त हो, इसलिये मैं तुमसे इस महान पुण्य और मोक्ष दायक प्रसंग को प्रकट करता हूँ।

हे धर्मराज, संसार में कल्प, काष्ठ, लव, घटी, प्रहर रात्रि दिन प्रदोष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर युग, एवं कुंआ, बावली, झरना, तालब, नदियां, समुद्र, एवं लता, वृक्ष वनस्पति, जड़ें वन, उपवन, ग्राम, पर्वत, शहर, देवताओं के निवास और धाम इन सबका कोई न कोई देवता स्वामी है। और वे सब अपने - अपने निश्चित दिन और समय पर पूजित होते हैं। तथा जन समुदाय के द्वारा हर्ष उल्लास के द्वारा पूजन करने पर उत्तम फल देते हैं। अपने- अपने गुण और अधिकार के कारण वे पूजित होते हैं। तथा इनको अपने स्वामी का आश्रय प्राप्त होने से वे सब सौभाग्य-शाली और संसार में प्रशंसनीय माने जाते हैं।
परंतु हे धर्मराज - इन सबके मध्य एक अधिक महीना ऐसा उत्पन्न हुआ कि जिसका समय आने पर लोग अत्यंत निंदा करते तथा निंदनीय शब्दों का प्रयोग करते हुए उसको मलमास कहते एवं अधिकमास में समस्त शुभ कार्य करना छोड़ देते। क्योंकि यह महीना सूर्य की संक्रांतिहीन होता अर्थात इस महिने में सूर्य की संक्रांति न होने से यज्ञ, उत्सव, विवाह, प्रतिष्ठा, वास्तुकर्म अथवा किसी भी शुभ कार्य को नहीं करते और सभी निंदा करते। इस प्रकार सांसारिक पुरुषों की इसके प्रति अशुभ भावना थी। किसी भी शुभकार्य में वर्जित और लोगों के मन में अपने प्रति हीन व निरादर व्यवहार को देखकर इस अधिकमास के मन में अत्यंत दुःख हुआ। चिंताग्रस्त- और दुःख व्यतीत करते हुए अनेक समय बीत जाने पर जब मानसिक क्लेश असह्य हो गया तो वह विचार करने लगा कि संसार में निंदित होकर जीने से तो अपना नाम ही खत्म कर देना अच्छा है, यदि जीवित रहना है तो यश प्राप्ति के लिये किसी देवता का आश्रय [लेना आवश्यक है।]
प्राप्त करना आवश्यक है। इसके लिये संसार प्रसिद्ध शरणागत की रक्षा करने वाले भगवान विष्णु की शरण में जाकर उनसे प्रार्थना करना ही उत्तम रहेगा। ऐसा विचार निश्चय होते ही अधिक मास शीघ्र ही (वैकुंठ लोक) जहां कि शांत स्वरूप समस्त प्राणियों को जीवनदान देने वाले शरण में आए हुए की रक्षा करने वाले भगवान विष्णु हमेशा विराजमान रहते हैं।
ऐसे वैकुंठलोक में पहुंचकर जहां भगवान का निवास मंदिर है। तथा भगवान विष्णु रत्न जड़ित सिंहासन पर आनंद मग्न विराजमान हैं भगवान के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हुआ। उस समय अधिक मास भय और दुःख से कांप रहा था। तथा उसके नेत्रों से आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी। ऐसी अवस्था में थोड़ी देर खड़ा रहने के बाद अधिकमास अत्यंत कातर और दयनीय वाणी से भगवान से कहता है। हे जगन्नाथ, हे देवताओं के स्वामी, हे शरणागत वत्सल, हे दया के सागर आप मेरी ऐसी हालत देखकर भी चुप क्यों बैठे हैं मेरी रक्षा क्यों नहीं करते। मैं निराश्रित हूँ मेरा कोई स्वामी नहीं है। इसीलिये सांसारिक लोगों ने मेरा नाम (मलमास), रख दिया है। मेरी निंदा करते हैं। मेरा मास आने पर अशुभ कहकर समस्त शुभ कार्यों का त्याग कर देते हैं। हे महाप्रभु ऐसी अवस्था में मैं जीवित नहीं रहना चाहता। आप मुझे अपनी शरण में लेकर मेरी रक्षा करें अथवा इस संसार से मेरा नाम समाप्त कर दें।
हे दीनानाथ, आप तो दया के सागर हैं। गजेंद्र की करुण पुकार को सुनकर आप शीघ्र ही रक्षा करने के लिये दौड़ पड़े थे। अधिक मास के अत्यंत दयनीय वचनों को सुनकर भगवान विष्णु उसपर कृपा दृष्टि करते हुए कहते हैं। हे वत्स तू मेरी शरण में आ गया है अब तू किसी भी प्रकार का दुःख मत कर जो भी मेरी शरण में आ जाता है, मैं उसकी अवश्य रक्षा करता हूँ। मेरा यह वैकुंठ स्थान केवल आनंदमय है। यहां दुःख शोक, भय, मृत्यु कुछ भी नहीं है।
भगवान के ऐसे वचनों को सुनकर अधिक मास के सब दुःख दूर हो गये वह स्वस्थचित और आनंदित हो गया, तथा प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना करने लगा। हे सर्वज्ञ, ब्रह्माण्ड नायक, सबमें विराजमान, सारे संसार का पालन करने वाले जगत् के स्वामी आपसे संसार की कोई बात छिपी हुई नहीं है। आप अंतर्यामी हैं। फिर भी मैं आपसे अपने मन की व्यथा कहता हूँ। संसार में कला, घटी, पल, मूहूर्त दिन, रात्रि, मास, वर्ष, पक्ष, ऋतु, अयन, संवत्सर इस सबका कोई न कोई देवता स्वामी होने से समय समय पर लोगों द्वारा पूजनीय और शुभ कर्म के अधिकारी माने जाते हैं तथा अपने स्वामी [की कृपा से लोगों को आशीर्वाद देकर फलीभूत होकर जन समुदाय में यश और प्रशंसा प्राप्त करते हैं।]
के प्रभाव से लोगों को आशीर्वाद देकर फलीभूत होकर जन समुदाय में यश और प्रशंसा प्राप्त करते हैं। परंतु मैं निराश्रित और मेरा कोई स्वामी न होने से लोग मेरी निंदा करते हैं।
अशुभ और मलमास कहकर समस्त शुभ कार्यों में मेरा परित्याग करते हैं। हे महाप्रभु इसी कारण मेरी ऐसी स्थिती हुई मेरे दुःख का कोई पारवार नहीं होने से मैंने अपने मन में निश्चित कर लिया था कि ऐसा जीवित रहने से मरना ही अच्छा है। यही सोचकर मैं आपकी शरण में आया हूँ कि आप तो भगवान की प्रार्थना करता हुआ मूर्छित होकर गिर पड़ा। इसके गिरते ही भगवान की सभा में विराजमान सभी सदस्य आश्चर्य चकित रह गए कि यहां वैकुंठ धाम में कभी दुःख और शोक व्याप्त नहीं है। फिर भी यह कितना दुःखित जीव है कि यहां आनेपर भी इसका दुःख दूर नहीं हो सका, भगवान ने गरूड़जी को संकेत किया, भगवान की आज्ञा से गरूड़जी अपने पंखों से अधिकमास को हवा करके होश में लाने की कोशिश करने लगे। होश में आते ही भगवान उससे कहते हैं।
हे वत्स, उठ तेरा कल्याण होगा। तेरे समस्त दुःखों का अंत निश्चय होग। तू मेरे साथ गोलोकाधिपति भगवान पुरुषोत्तम के पास चल, वहां गोलोक में भगवान पुरुषोत्तम विराजमान हैं। वे पर ब्रह्म परमात्मा समस्त देवताओं के देवता हैं। वे दो भुजावाले पीतांबरधारी, मुरली धारण करनेवाले, भगवान पुरुषोत्तम अखंड ब्रह्माण्ड नायक हैं। उनकी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। वे चत अचल के स्वामी शरणागत वत्सल, सबके दुःखों को क्षण में नष्ट करने वाले हैं हम सभी देवता हमेशा उनकी वंदना किया करते हैं। वे संसार को उत्पन्न करने वाले, पालन करने वाले और प्रलयकर्ता भी वही हैं। ऐसा कहकर भगवान विष्णु गरूड़जी को गोलोक चलने का संकेत करते हुए अधिकमास को अपने साथ गरूड़ पर बैठाकर गोलोक में पहुंचते हैं।
भगवान कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि हे धर्मराज मैं तुमको गोलोक का वर्णन सुनाता हूँ एकाग्रचित होकर सुनो, गोलोक करोड़ों सूर्य से भी ज्यादा तेजमान है। ज्योतिस्वरूप, अनंत विशाल और स्वेच्छामय है। वह ब्रह्मलोक, विष्णुलोक, शिवलोक के ऊपर है। तीन कोटि योजन का उसका विस्तार है। वह गोल आकृति वाला है। उसमें समस्त भूमि रत्न से जड़ित है। वह स्थान बड़े बड़े महात्मा और ऋषियों को भी अप्राप्य है। भगवान पुरुषोत्तम अपने योगबल से उसको अंतरिक्ष में धारण किये हुए हैं। उसमें असंख्य मंदिर हैं गोलोक के नीचे दक्षिणी ओर सुंदर वैकुंठ लोक है। वह एक कोटियोजन लंबा [और चौड़ा है।]
और चौड़ा है। वह भगवान विष्णु का लोक है। उस लोक में भगवान विष्णु को भक्ति और उपासना करने वाले ऋषि, मुनी, तपस्वी, व सांसारिक गृहस्थ मृत्यु के बाद अपने पुण्य के प्रभाव से वैकुंठ लोक को जाते हैं। वहां चतुर्भुजी स्वरूप पीतांबर धारण करके तेजस्वी स्वरूप होकर अपने पुण्य को कर्म के अनुसार उतने समय तक वैकुंठ सुख भोगकर फिर मनुष्य योनि में जन्म लेते हैं। गोलोक के नीचे बाएं बाजू में शिवलोक है वह एक कोटियोजन लंबा चौड़ा है। वहां भगवान शंकर पार्वती समेत विराजमान रहते हैं। वे भगवान शंकर स्फटिक मणि के समान सुंदर स्वरूप चार भुजावाले सारे शरीर में भस्म का लेपन और नाग का यज्ञोपवीत धारण व्याघ्राम्बर पहने हुए जटा में गंगाजी तथा अर्धचंद्र धारण किए हुए त्रिनेत्र वाले, पार्वती सहित विराजमान रहते हैं। शिवलोक में मृत्यु के बाद ऋषि, मुनि, तपस्वी शंकरजी की उपासना करने वाले सांसारिक पुरुष और स्त्रियां अपने पुण्यकर्म के प्रभाव से निश्चित समय तक आनंद पूर्वक रहकर समय समाप्त होने पर फिर पृथ्वीपर जन्म लेकर शुभकर्म और शंकरजी की आराधना करते हुए जीवन व्यतीत करते हैं।
हे धर्मराज, गोलोक में अनंत ज्योति स्वरूप भगवान पुरुषोत्तम का जो स्वरूप है वह नीले कमल के समान सर्वांग श्यामवर्ण नया उत्पन्न कमल पुष्प के समान कोमल, करोड़ों शरद पूर्णिमा के चंद्र के समान देदीप्यमान, प्रसन्न मुख मद्रावाले धनुष के समान नेत्र और भृकुटी वाले, पीतांबर धारण किए हुए कानों में कुंडल, गले में वैजयंती माला पहने हुए, वनमाला कौस्तुभ माला धारण किए हुए, कस्तूरी का तिलक लगाए हुए, रत्न जड़ित सिंहासन पर विराजमान, हाथों में मुरली धारण किए हुए, अत्यंत सुंदर, करोड़ों कामदेव के समान सुंदर आकर्षित युवा किशोर अवस्था वाले सिंहासन पर विराजमान रहते हैं। ऐसे भगवान पुरुषोत्तम का दर्शन बड़े बड़े ऋषि योगी तपस्वी और यज्ञ करने वालों को भी दुर्लभ होता है। वे ही परब्रह्म परमात्मा हैं सारे संसार का आधार और सबके पालनहार उन्हीं की इच्छा से संसार की उत्पत्ति और प्रलय होता है। वे आदि, मध्य और अंत से रहित हैं। विश्व के पालनहार, अनंतकोटि ब्रह्माण्ड नायक और मोक्षस्वरूप है निर्गुण, निर्विकार, सच्चिदानंद हैं। वे ही जीवात्मा को मोक्ष देने वाले हैं। उनकी उपासना करने वाले मृत्यु के बाद मोक्ष को प्राप्त करके उन्हीं में लीन होकर हमेशा के लिए जन्म मृत्यु और चौरासी लक्ष योनि में भ्रमण करने का दुःख जीवात्मा का हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
हे धर्मराज, अधिकमास को साथ में लिये हुए भगवान विष्णु ने गोलोक में प्रवेश किया। दूर से ही भगवान पुरुषोत्तम का सुंदर मंदिर दिखाई दे रहा था। उसके तेज से अधिकमासकी आंखें चकाचौंध [हो रही थी।]
हो रही थी। वह मंदिर मणि के स्तंभो से बना हुआ बीच सिंहासन पर भगवान पुरुषोत्तम विराजमान थे अपने पीछे पीछे अधिकमास को साथ लेकर मंदगति से भगवान विष्णु वहां पहुंचे। भगवान विष्णु को देखकर द्वारपाल ने उठकर उनका अभिवादन किया प्रेम से उनके चरणों में नमस्कार किया भगवान विष्णुने अधिकमास को साथ में लेकर मंदिर में प्रवेश किया मंदिर के भीतर किशोर अवस्था वाले दिव्य स्वरूप भगवान पुरुषोत्तम रत्न जड़ित सिंहासन पर आनंद मुद्रा में विराजमान थे। उनके सामने पहुंचकर भगवान विष्णु हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे समस्त पार्षद गणों ने उठकर भगवान विष्णु का अभिवादन किया। तथा भगवान पुरुषोत्तम ने अपने सिंहासन के समीप सिंहासन पर बैठने का आग्रह करने पर भगवान विष्णु उसपर विराजमान हो गए विष्णु के पीछे अधिकमास, अश्रु पूरित नेत्रों से थरथर कांपता हुआ दोनों हाथ जोड़कर खड़ा रहा। इस प्रकार भगवान नारायण ने नारदमुनि से सूतजीने शौनकादि ऋषियों से तथा भगवान कृष्ण ने धर्मराज से कहा।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार बृहन्नारदीय पद्याधार पुराण का द्वितीय ऽ अध्यायः समाप्त ॥ (२)




गीता तृतीय अध्याय माहात्म्य |gita ke 3 adhayay ki Katha

 

गीता तृतीय अध्याय माहात्म्य |gita ke 3 adhayay  ki Katha 


जड़ नामक ब्राह्मण और उसका पतन: जनस्थान में 'जड़' नाम का एक ब्राह्मण था, जिसने अपना धर्म छोड़कर व्यभिचार, जुआ और मदिरापान जैसे पापों को अपना लिया था। जब उसका सारा धन नष्ट हो गया, तो वह व्यापार के लिए उत्तर दिशा में गया। लौटते समय रात के अंधेरे में लुटेरों ने उसे मार डाला। अपने पापों के कारण वह एक भयानक प्रेत बना।

पुत्र की पितृ-भक्ति और गीता पाठ: उसका पुत्र बहुत बड़ा विद्वान और धर्मात्मा था। जब पिता नहीं लौटे, तो वह उन्हें खोजने निकला। मार्ग में उसे पिता की मृत्यु का पता चला। वह पिता का उद्धार करने के लिए उनकी अस्थियाँ लेकर काशी जाने लगा। रास्ते में वह उसी वृक्ष के नीचे रुका जहाँ उसके पिता की हत्या हुई थी। वहाँ उसने संध्या वंदन किया और गीता के तीसरे अध्याय का पाठ किया।

पिता का उद्धार: जैसे ही पाठ संपन्न हुआ, आकाश में भयंकर शोर हुआ और एक दिव्य विमान उतरा। पुत्र ने देखा कि उसके पिता प्रेत योनि से मुक्त होकर दिव्य रूप में विमान पर बैठे हैं। पिता ने बताया कि "तुम्हारे गीता के तीसरे अध्याय के पाठ से मेरी मुक्ति हो गई है और अब काशी जाने की आवश्यकता नहीं रही।"

नारकी जीवों का उद्धार: पिता ने पुत्र से आग्रह किया कि वह इसी पाठ के पुण्य से अपने अन्य पूर्वजों और नरक में पड़े जीवों का भी उद्धार करे। पुत्र ने वापस लौटकर श्रीकृष्ण मंदिर में बैठकर तीसरे अध्याय का पाठ किया और सारा पुण्य नरक के जीवों को अर्पित कर दिया।

यमराज और भगवान विष्णु का मिलन: इस पुण्य के प्रभाव से नरक खाली हो गया। भगवान विष्णु के दूत यमराज के पास पहुँचे और सभी कैदियों को छोड़ने की आज्ञा दी। यमराज स्वयं क्षीरसागर जाकर भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे। भगवान ने यमराज को सांत्वना दी और उन्हें वापस अपने लोक भेजा। अंत में वह धर्मात्मा ब्राह्मण पुत्र भी अपनी जाति और अनगिनत जीवों का उद्धार करके स्वयं विष्णुधाम को गया।

Bagvat gita ki kahaniya | भगवत गीता की कहानियां

Bagvat gita ki kahaniya|भगवत गीता की कहानियां 

 गीता के पहले अध्याय की कथ
 गीता के दूसरे अध्याय की कथा
गीता के तीसरे अध्याय की कथा
 गीता के चौथे अध्याय की कथा
 गीता के पांचवें अध्याय की कथा
 गीता के छठवें अध्याय की कथा 
गीता के सातवें अध्याय की कथा
गीता के आठवें अध्याय की कथा
 गीता के नॉर्वे अध्याय की कथा 
गीता के दसवें अध्याय की कथा
 गीता के ग्यारहवें वें अध्याय की कथा 
गीता के बारहवें अध्याय की 
गीता के तेरहवें अध्याय की कथा 
गीता के चौदहवां अध्याय कथा
  गीता के पंद्रहवें अध्याय की कथा 
गीता के सोलहवें अध्याय की कथा 
गीता के सत्रह अध्याय की कथा 
गीता के अठारह अध्याय की कथा