Adhik mass ki Katha 31 adhyaya| अधिक मास की कथा 31वा अध्याय

 Adhik mass ki Katha 31 adhyaya| अधिक मास की कथा 31वा अध्याय 

॥ अथ एकत्रिंशत्तमोऽध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री गणधिपतये नमः ॥
(३१)
श्री भगवान नारायण नारदजी से सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं। हे ऋषियों इसके पहले कथा प्रसंग में जब उस वानर की मृगतोर्थ कुंड में पांचदिन जल में रहने के बाद मृत्यु हो गई और वानर के शरीर को त्याग जीवात्मा ने चतुर्भुजी दिव्य स्वरूप अलंकार आभूषणों से युक्त भगवान के जैसा उसका स्वरूप हो गया और उसने आकाश मार्ग से एक दिव्य विमान जिसपर भेरी मृदंग के वाद्य बज रहे थे देवांगनाएं नृत्य कर रही थी। सुवर्ण रत्न और मोतियों की झालर से सुशोभित चंद्र के समान कांतिवाला जिसपर भगवान पुरुषोत्तम के पार्षद बैठे हुए ऐसे विमान को अपने पास आकर रुकते हुए देखा तो उस दिव्य देह धारी वानर व कर्दयु की जीवात्मा अत्यंत विस्मय चकित हो सोचने लगी वह विमान यहाँ क्यों आया मुझ पापी को यह सौभाग्य कहां प्राप्त हो सकता है। अभी तो मुझे अनेक नरकों की यातना यमराज की आज्ञा से भोगनी पड़ेगी। विमान का सुख तो किसी बड़े महान पुण्यात्मा को ही प्राप्त हो सकता है।
इस प्रकार विचार कर रहा था वह जीवात्मा। तभी विमान से भगवान के पार्षद व देवांगनाएं उतरकर उस जीवात्मा के सामने नृत्य करने लगी और एक देवांगना ने उसी जीवात्मा को कभी न सूखने वाले सुगंधित पुष्पों की माला पहना दी और एक ने सोने की झारी में गंगाजल लेकर उसके सामने रख दिया और एकने रत्नों से जड़ित सोने के पानदान में ताबुल (पान का बीड़ा) सहित सामने लेकर खड़ी रही इन सब दृश्यों को देखकर वह जीवात्मा अत्यंत भयभीत होकर चित्र के समान खड़ी रह गई। और मन में सोचने लगी। मेरे जैसे दुष्ट और पापी को यह सौभाग्य कहां से प्राप्त होगा। मेरे द्वारा कोई भी पुण्य घटित नहीं हुआ। जिससे मुझे यह सुख प्राप्त हो सके। तभी पार्षद गण जीवात्मा के पास आकर उसको नमस्कार करके हांथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं।
(१२४)
भोगना बाकी है। मेरे समझ में नहीं आ रहा कि मुझ से ऐसा कौन सा पुण्य घटित हुआ कि मेरे समस्त पाप नष्ट होकर यह सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। अरे यमदूतों मैं जानता हूँ कि कितनी बूंद गिरती है। पृथ्वी पर जितनी घास उत्पन्न होती है। उससे भी ज्यादा मेरे द्वारा किए गए पाप हैं। इतने पर भी मेरा यह दिव्य चतुर्भुजी स्वरूप यह विमान और मेरा यह सम्मान विमान पर बैठकर गोलोक चलने का आग्रह मेरे कुछ समझ में नहीं आ रहा कृपा करके मुझे सब समझाकर बताओं कि क्यों ऐसा घटित हो रहा है। जीवात्मा के शब्दों को सुनकर एक पार्षद (देवदूत) ने कहा है स्वामी मैं आपको बताता हूँ। यह जो महीना व्यतीत हुआ सभी महीनों में श्रेष्ठ और थोड़ा भी कर्म करने पर अनंत पुण्यदायक होता है। यह मास भगवान पुरुषोत्तम का मास कहा जाता है जो सभी देवताओं के स्वामी हैं। इस मास में घटित पुण्य प्रत्यक्ष फल देने वाला होता है।
आपसे इस मास मेंकठिन तपस्या घटित हुई है। जो कि मानव शरीर के द्वारा भी नहीं हो पाती। आपने वानर शरीर से मुख में फोड़ेहोने से निराहार रहकर इस मास को व्यतीत करने से संपूर्ण मास के व्रत का पुण्य प्राप्त किया। व जातीय चंचलता के कारण अनेक वृक्षों के फलों को तोड़कर कष्ट के कारण स्वयं न खाकर फेंक दिया जिससे अनेक जीवों पर परोपकार का पुण्य प्राप्त किया। नीचे गिरे फलों को अनेक वन्य पशुओं ने खाकर तृप्त होने से पुण्य प्राप्त किया। मुख की पीड़ा जल तक नहीं पीने से निराहार और जल रहित उपवास का पुण्य प्राप्त किया। मृगतीर्थ कुंड में पानी के भीतर ठंडक व हवा का प्रकोप सहते हुए, अंतिम पांचदिन त्रिकाल स्नान का पुण्य प्राप्त किया। यद्यपि आप से मुख में व्रण होने से अज्ञानावस्था में और जातीय चंचलता के कारण यह सब घटित हुआ है। फिर भी आपको समस्त पुण्य की उपलब्धि का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यही इस मास की विशेषता है किसी भी प्रकार से कैसी भी अवस्था में थोड़ा भी कर्म महान पुण्यदायक होता है।
जो लोग इसके माहात्म्य को जानते हुए नियम व्रत धारण करते हुए कर्म करते हैं, उनको कितना पुण्य घटित होता है इसका वर्णन चार मुखवाले ब्रह्माजी भी कहने में असमर्थ हैं। पुरुषोत्तम मास में यदि कोई एक भी व्रत कर लेवे तो उसके जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। वे लोग बड़े भाग्यशाली हैं जिन्होंने मानवशरीर धारण करके अधिक मास में स्नान व्रत जप दान आदि शुभकर्म करके व्यतीत किया। तथा जो मानवशरीर धारण करके अधिक मास व्यर्थ ही बिता देते हैं वे मूखों को धिक्कार है। देवदूतों के ऐसे शब्दों को सुनकर कर्दयु की जीवात्मा आश्चर्य चकित हो गई। फिर उसने मृगतीर्थ कुंड...
(१२५)
और कालिंजर पर्वत को नमस्कार करके उस दिव्य विमान की प्रदक्षिणा करके देवदूतों के साथ विमान पर बैठकर गोलोक की ओर प्रस्थान किया जब विमान देवलोक से जा रहा था तब इंद्र आदि देवताओं ने विमान पर फूलों की वर्षा की।
वायु की गति से उड़ता हुआ विमान स्वर्ग आदि लोकों के ऊपर से होता हुआ गोलोक को पहुंचा वहां भी पार्षदों द्वारा उस जीवात्मा का स्वागत हुआ फिर देवदूत उस स्थान में पहुंचे जहां गोलोकाधिपति भगवान पुरुषोत्तम रत्न जड़ित सिंहासन पर विराजमान थे वहां पहुंचकर जीवात्मा ने भगवान पुरुषोत्तम को साष्टांग नमस्कार करके वह दिव्यज्योति भगवान के प्रकाश में लीन अर्थात चौरासी लक्ष योनियों में भ्रमण से रहित होकर मोक्ष को प्राप्त हो गई। हे नारद वह ब्राह्मण कर्दयु नीच पापी होकर भी भगवान पुरुषोत्तम के अधिकमास के पुण्य प्रभाव से उत्तम गति अर्थात मोक्ष को प्राप्त हो गया। इतना महान और अक्षय पुण्य को देनेवाला मोक्ष की सद्गति को देनेवाला अधिक मास का पुण्य सर्वश्रेष्ठ है।
सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं, हे ऋषियों भगवान नारायण के द्वारा संपूर्ण मास के माहात्म्य को सुनकर आनंद विभोर होकर बारंबार भगवान को नमस्कार करके भगवान पुरुषोत्तम का नाम स्मरण करते हुए नारदजी सत्यलोक को चले गए। हे ऋषियों आपके द्वारा किए गए प्रश्नों का उत्तर भगवान नारायण और देवर्षि संवाद के रूप में आपको सुनाया अधिक मास के समान पुण्यदाता संसार में कोई कर्म नहीं है और भगवान पुरुषोत्तम के समान मोक्ष दाता और कोई देवता नहीं है। इसलिये मानव शरीर धारण करने पर जीवात्मा को सद्गति (मोक्ष) प्राप्त करने के लिये अधिक मास में अपनी शक्ती और श्रद्धा के अनुसार कर्म अवश्य करना चाहिए क्योंकि जीवात्मा चौरासी लक्ष योनि भ्रमण करने के बाद मानव योनि प्राप्त करता है। यदि मनुष्य योनि में अपने उद्धार के निमित्त शुभकर्म नहीं किया तो माया मोह स्त्री पुत्र धन के जंजाल में फंसकर जीवन व्यतीत कर दिया तो मृत्यु के उपरांत कर्मों के द्वारा नरक की यातना और चौरासी लक्ष योनि में बारबार पैदा होना और मृत्यु होना इसी चक्कर में (घटी यंत्र) घड़ी के कांटों के अनुसार अनेक कल्पों तक जीवात्मा दुःख भोगते रहेगी। इसलिये सबसे सरल मोक्ष प्राप्ति का साधन पुरुषोत्तम मास में भगवान पुरुषोत्तम की सेवा आराधना ही सर्वश्रेष्ठ और सतत साधना है। अधिक मास में इसकी कथा तथा माहात्म्य का श्रवण करके अंत में कथावाचक ब्राह्मण की पूजा करके वस्त्र, अन्न दक्षिणा का दान करते हैं। इससे भी भगवान पुरुषोत्तम की प्रसन्नता कृपा प्राप्त होती है। इस प्रकार इस कथा को सूतजी ने शौनकादि ऋषियों को सुनाया और महर्षि वेद-व्यास ने अपने...
(१२६)
श्रोतागणों को सुनाया।
(उसी संस्कृत भाषा का अनुवाद करके प्रांतीय भाषा मराठी (लवणी) भाषा में भृगुकुल में उत्पन्न रेणुका जमदग्नि से उत्तर कोंकण (महाराष्ट्र) में सह्याद्रि पर्वत की तलहटी में प्रसिद्ध राजा पुर नामक ग्राम में धूतपापेश्वर नामक शिवलिंग और मंदिर है उस मंदिर के पुजारी धगवे कुल में उत्पन्न श्री सदाशिव, उनके पुत्र श्री विट्ठल, उनके पुत्र श्री रघुनाथ शास्त्री तर्कशास्त्र और व्याकरण शास्त्र के विद्वान श्री परशुराम शास्त्री ने श्री मातापिता के चरणों का आशीर्वाद और भगवान शंकर की कृपा से प्रांतीय मराठी (लवणी) भाषा में अनुवाद किया यह शुभ कार्य शके अठारह सौ अठत्तर दुर्मुखनाम संवत्सर वैशाख शुक्ल १५ पूर्णिमा सोमवार को परिपूर्ण हुआ। इसी प्रकार भगवान पुरुषोत्तम की महान भक्त प्रत्येक अधिक मास में स्नान व्रत अखंडदीप नित्य इसकी कथा और श्री मदभागवत का श्रवण करते हुए, संपूर्ण मास श्रद्धापूर्वक व्यतीत करके अमावस को उद्यापन का विधान हवनादि कर्म यथा शक्ति दान करते हुए, उत्तर पूजन ब्राह्मण भोजन दक्षिणा आदि कर्म श्रद्धापूर्वक समस्त कर्म संपन्न करने वाली धर्म के प्रति महान रूचि रखने वाली स्व. श्री मन्शीलाल साहु की पत्नि भ. श्री. श्री केशर बाई की अथक आग्रह और इच्छा से इनके कुल पुरोहित उपमन्यु गोत्र में उत्पन्न पं. रजनीकिशोर अवस्थी के ज्येष्ठ पुत्र पं. मधुसूदन अवस्थी ने आज संवत २०५० शके १९१५ वैशाख शुक्ल १५ पूर्णिमा गुरुवार तदनुसार ता. ६ मई सन १९९३ को इस ग्रंथ को मराठी (कोंकणी) भाषा का हिंदी में अनुवाद परिपूर्ण किया।)
इस महान पुण्य कार्य में समस्त जनसमुदाय को इसका लाभ प्राप्त हो भगवान पुरुषोत्तम के प्रति श्रद्धा जागृत करके अपनी आत्मा को मोक्ष की सद्गति प्राप्त करें। कभी भी नष्ट होनेवाला पंचभौतिक शरीर और हमेशा चलायमान होने वाली लक्ष्मी जब दोनों का समागम मनुष्य के जीवन में हो तभी इन दोनों के प्रति मोहत्याग कर मनुष्य कुछ पुण्यकर्म कर सकता है। ऋषियों और महापुरुषों के इन्हीं सद्वाक्यों की प्रेरणा से जागृत होकर चौधरी परिवार में उत्पन्न (श्री केशर बाई की द्वितिय कन्या कमलाबाई व स्व. श्री बलराम चौधरी के पुत्र) श्री सतीश चौधरी ने इसे हिन्दी में अनुवादित ग्रंथ को छपाने का सर्वपुर्ण प्रयास किया।)
॥ शुभमंगल मस्तु ॥





Adhik mass ki Katha 30 adhyaya| अधिक मास की कथा 30 वा अध्याय

 Adhik mass ki Katha 30 adhyaya| अधिक मास की कथा 30 वा अध्याय 


॥ अथ त्रिंशत्तमोऽध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
श्री भगवान नारायणजी से और सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं हे ऋषियों! इसके पहले के अध्याय में जब कदर्यु की जीवात्मा को यम के दूत रस्सों से बांधकर मुद्गरों से पीटते हुए ले जा रहे थे और वह जीवात्मा अपने कर्मों पर पश्चात्ताप कर रहा था। इस प्रकार उस को यमराज के सामने खड़ा किया यमराज ने चित्रगुप्त से पूछा हे चित्रगुप्त! इस जीवात्मा के पाप आदि कर्मों का निवेदन करो। यमराज की आज्ञा को सुनकर चित्रगुप्त ने कहा हे प्रभु! यह जीवात्मा पापी कदर्यु की है। वह जाति से ब्राह्मण था परन्तु इसके कर्म नीच थे यह धन का अत्यंत लोभी इसने चोरी की और मित्र से विश्वासघात किया। बगीचे में रहकर अनेक जीवों की हिंसा की फलों की चोरी की और धन को संचय करके जमीन में गाड़कर रखा। धन के लोभ में अपने परिवार का पालन पोषण नहीं करके उनका त्याग किया और भी अनेक प्रकार के पाप किए हैं। कदर्यु के जीवन का वृत्तांत चित्रगुप्त के द्वारा सुनकर यमराज अत्यंत क्रोधित होकर कहते हैं। इसको फल की चोरी के अपराध में वानर की योनि दी जाय और विश्वास घात व अनेक पाप कर्मों के लिये इसको प्रेत योनि दी जाय और अनेक प्रकार से नरक की यातना भी दी जाय यमराज की आज्ञा को चित्रगुप्त ने सुनकर दूतों को आज्ञा दी की प्रथम इसको प्रेत योनि में डाल दो दूतों ने कदर्यु की जीवात्मा को भयंकर जंगल में ले जाकर प्रेतयोनि में डाल दी वह भयंकर प्रेत हो गया वहां उसको न खाने की कोई वस्तु न पीने का जल प्राप्त हो तथा वह भूख प्यास से तड़पता हुआ रातदिन घूमता रहता था। अनेक वर्षों तक प्रेत योनि का दुःख भोगने के पश्चात फलों की चोरी के अपराध से वानर योनि प्राप्त हुई। वानर की योनि में उसका कालिंजर पर्वत पर जन्म हुआ। कालिंजर पर्वत अत्यंत सुंदर स्थान है वहां बड़े बड़े फलों के वृक्षों की शीतल छाया रहती है। मधुर और मीठे फल बहुतायत से वृक्षों में लगे रहते हैं। वह अत्यंत पवित्र स्थान माना जाता है। वहां पाप नाशक कुंड है। जो कि सरोवर के समान बड़ा और शुद्ध जल से परिपूर्ण रहता है। वह स्थान मृगतीर्थ के नाम से शास्त्रों में प्रसिद्ध है। वहां पितरों के प्रति श्राद्ध पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष देने वाला सिद्ध होता है। इंद्रकेद्वारा निर्मित वह कुंड मृगतीर्थ समस्त पापों का नाशक है। जब कोई महाबली दैत्य देवताओं पर विजय प्राप्त कर लेता है, तो देवतालोग भयभीत होकर इसी कालिंजर पर्वत पर मृग का स्वरूप धारण करके छिपे रहते हैं और उसी कुंड का जल पीते हैं। इसीलिये उसकुंड का नाम मृगतीर्थ प्रसिद्ध हुआ। जब भगवान के द्वारा महाबलि राक्षस का वध हो जाता है, तब इंद्र इत्यादि देवता उसी मृगकुंड में स्नान करके निष्पाप होकर अपने देवता स्वरूप को धारण करके देव लोक को चले जाते हैं।
भगवान नारायण के वचनों को सुनकर नारदजी ने शंका प्रगट की, हे महाप्रभु कदर्यु तो महापापी था फिर उसको ऐसे पवित्र स्थान पर वानर की योनि क्यों प्राप्त हुई। इसका कारण बताकर मुझे शंका से मुक्त करें। देवर्षि नारद की वाणी को सुनकर भगवान आनंदित होकर कहते हैं। हे नारद जिस नगर में कदर्यु रहता था उसी नगर में चित्रकुंडल नाम का एक धनवान वैश्य रहता था। उसकी स्त्री का नाम तारा का था। वे दोनों पति पत्नि भगवान के भक्त और बड़े दानी थे। जब भी अधिकमास आता बड़ी श्रद्धा से नियमव्रत धारण करके अखंडदीप नित्य पूजन दीपदान अनेक प्रकार के दान करके संपूर्ण मास व्यतीत करके अंतिपदिन के पहले चतुर्दशी को उद्यापन हवन ब्राह्मण भोजन अपूपदान सुवर्ण वस्त्र धान्य का दान करते और दूसरे दिन भगवान का उत्तर पूजन करके विसर्जन क्षमा याचना करके अनेक प्रकार का दान शय्यादान तिलपात्र का दान द्रव्य दान और भिक्षुकों को भी अन्न आदि का दान करके व्रत का समापन करते थे। ऐसा उनका प्रत्येक अधिक मास का नियम था। ऐसे ही एक समय अधिकमास के उद्यापन में उस वैश्य ने वेद शास्त्रों को जाननेवाले अनेक विद्वानों को आमंत्रित करके पूजन हवन की समस्त विधि को संपन्न करके ब्राह्मणों को भोजन कराके तांबूल, द्रव्य, वस्त्र, आभूषण और बहुमूल्य वस्तुओं को देकर संतुष्ट करके विदा किया और अनेक प्रकार के मांगलिक वाद्यों के द्वारा भजन कीर्तन में संलग्न होकर भजन करने लगा। कदर्यु को जब उत्सव के वाद्य और भजन की आवाज सुनाई दी तो वह भी द्रव्य प्राप्त करने की इच्छा से वहां पहुंच गया और भगवान के पूजन मंडप और हवन कुंड के दर्शन करके भगवान को नमस्कार करके यज्ञ की भस्म को ललाट पर लगाकर प्रणाम किया और पूजा द्वार पर कुछ मिलने की आशा से खड़ा हो गया काफी देर तक खड़ा रहा।
भजन कीर्तन का जब विश्राम हुआ वैश्य ने कदर्यु को देखा तो कदर्यु के पास आकर उसको भी कुछ दक्षिणा दी। परंतु कदर्यु को लोभ के कारण संतोष नहीं हुआ और कुछ प्राप्त होगा इस आशा से वैष्णव की प्रशंसा करने लगा। हाथ जोड़कर गदगद वाणी से कहता है। हे धर्मात्मा तुम बड़े भाग्यशाली हो तुमने भगवान पुरुषोत्तम की आराधना उद्यापन कर्म बड़ी श्रद्धा से की है। इस प्रकार का पुण्यकर्म आज तक इस नगरी में किसी ने नहीं किया। तुम्हारे माता पिता धन्य हैं। जिन्होंने तुम जैसे धर्मात्मा पुत्र को जन्म दिया। और तुम भी धन्य हो कि तुम्हारे मन में भगवान पुरुषोत्तम के प्रति इतनी श्रद्धा भावना है तुमने यह पुण्य कर्म करके अपना इहलोक और परलोक दोनों बना लिया।
भगवान पुरुषोत्तम की आराधना से जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट होकर सभी प्रकार के सुख की उपलब्धि आजन्म पर्यन्त रहती है। अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस का समस्त कर्म अक्षय पुण्य देता है। हे वैश्य तुमने अनेक ब्राह्मणों को बहुत सा द्रव्य दान में दिया परंतु मैं कैसा भाग्यहीन हूं कि मुझे इतना सा ही प्राप्त हुआ। कदर्यु के वचनों को सुनकर उस वैश्य ने प्रसन्न होकर और भी द्रव्य देकर कदर्यु को प्रसन्न कर दिया। कदर्यु द्रव्य प्राप्त कर आनंदित होकर उस द्रव्य को लाकर जमीन में गाड़ दिया। किसी भी निमित्त से कदर्यु ने उद्यापन पूजन का दर्शन किया यज्ञ हवन की भस्म का प्राशन किया भगवान को नमस्कार करके पुरुषोत्तम मास और पुण्य की प्रशंसा की इससे उसको भी कुछ पुण्य की प्राप्ति हुई जिसके कारण उसको कालिंजर पर्वत की पुण्य पावन भूमि पर वानर की योनि प्राप्त हुई। हे नारद वानरों को वैसे भी भगवान राम का वरदान प्राप्त है। त्रेतायुग में जब राम और रावण का युद्ध हुआ श्रीराम की सेना में वानर ही वानर थे। भगवान राम ने विभीषण को छोड़कर समस्त राक्षसों को मारकर विजय प्राप्त की। इस युद्ध में बहुत से वानर भी मृत्यु को प्राप्त हुए।
रावण के मारे जाने पर ब्रह्मा आदि देवताओं ने प्रसन्न होकर श्री राम से अनुरोध किया कि हे राम आपने इस अधम राक्षस और रावण को मारकर हम सब देवताओं को भय से मुक्त कर दिया इसलिये हम सब देवता प्रसन्न होकर आपको वरदान देना चाहते हैं। आपके मन में जो इच्छा हो वरदान मांगो। देवताओं की इच्छा को सुनकर श्री राम ने कहा, हे देवताओं यदि आप वरदान देना चाहते हैं। तो इस युद्ध में जो वानर राक्षसों के द्वारा मारे गए हैं उनके ऊपर अमृत की वर्षा करके जीवित कर दो। रामचंद्रजी के द्वारा यह वरदान मांगने पर देवताओं ने मृत वानरों पर अमृत की वर्षा की।
वानरों के मृत शरीर पर अमृत गिरते ही समस्त वानर जय जय श्री राम कहते हुए उठकर बैठ गए जैसे घोर निद्रा से जागे हुए हों। जब भगवान राम अयोध्या को जाने के लिये पुष्पक विमान पर बैठे तो समस्त वानरगण विमान के पास आकर खड़े हो गए। तो भगवान राम ने अत्यंत प्रेम से कहा, हे सुग्रीव, हनुमंत, अंगद, जांबवंत सहित समस्त मित्र वानरों तुम लोगों ने युद्ध में सहयोग देकर मित्रता कार्य किया है। अब तुम लोग अपनी इच्छा से कहीं भी जा सकते हो मैं तुम समस्त वानर जाति को वरदान देता हूं कि आप लोग जहां कहीं भी रहेंगे उस स्थान पर फल से परिपूर्ण वृक्ष और जल चाहे वह नदी तालाब या झरना हो जल से परिपूर्ण रहेंगे सुंदर शीतल छाया प्राप्त होगी। कभी भी कहीं पर भूख और प्यास का कष्ट नहीं होगा। और तुम वानर जाति हमेशा दीर्घायु होगे। हे नारद श्रीराम के द्वारा आशीर्वाद वरदान के कारण ही जहां जहां वानर रहते हैं वह स्थान फल फूल और जल से परिपूर्ण रहता है।
परंतु वानर योनि में भी अपने पूर्व कर्मों के अनुसार सुख दुःख भोगना ही पड़ता है। उस कदर्यु की जीवात्मा का कालिंजर पर्वत पर वानर योनि में जन्म हुआ। दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा। उत्तम उत्तम फलों को खाकर हष्ट पुष्ट बड़े शरीर वाला दीर्घ काय हो गया। जातीय चंचलता के कारण एक जगह स्थिर न रहकर इस वृक्ष से उस वृक्षपर कूदते रहता था। पूर्व जन्म के पाप का फल तो भोगना ही पड़ेगा। पित्त की अधिकता होने से उस वानर के मुख में फोड़ा होगया उसकी भयानक पीड़ा से उसको महान दुःख तथा मुख से चबाना खाना सब बंद हो गया। खाना बंद होने से शरीर दुर्बल और अशक्त हो गया। परंतु स्वभाव की चंचलता से वृक्ष से फल तोड़ता जैसे ही खाने के लिये मुखखोलता भयंकर पीड़ा होती तो फल को फेंक देता। कभी एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर कूदता तो शारीरिक शक्ति हीनता से पूरी उछाल न भरने से पृथ्वी पर गिरकर कई जगह शरीर में चोट लगने से महान कष्ट भोगना पड़ता। इस प्रकार भूख प्यास से व्याकुल इस वृक्ष से उस वृक्ष पर घूमते हुए अनेक दिन बीत गए। फलों को तोड़कर फेंक देने का क्रम बराबर चालू था उस जीवात्मा के सौभाग्य से वह अधिक मास का पुण्यदायक समय था।
उस मास के जब अंतिम पांच दिन शेष रहे तब उस वानर को अत्यंत प्यास से विकलता ऊपर हो गई। वह मृगतीर्थ कुंड के ऊपर वृक्ष की डाली पर बैठा हुआ कुंड केजल की तरफ तृष्णा भरी दृष्टि से देख रहा था परंतु कोई उपाय वहां तक जाकर जलपीने का सूझ नहीं रहा था। ऐसे में जातीय चंचलता से दूसरी डाली पर जाने के लिये उड़ान मारी परंतु शारीरिक कमजोरी के कारण उस डाली तक न जाकर नीचे मृगकुंड में गिर पड़ा उस समय उसकुंड में कम पानी होने से उसमें डूब नहीं सका परंतु उसकी छाती भर पानी होने से जल में ही पांचदिन तक पड़ा रहा शरीर अशक्त होने के कारण इतनी ऊंची उड़ान नहीं ले सकता था कि कुंड के बाहर आ जाए। भूख से व्याकुल और कमजोर शरीर मुख में फोड़ा और पानी में लगातार भीगे रहने से गिरते के पांचवे दिन (अर्थात् दशमी से अमावस पर्यंत) मध्यान्ह के समय उस पवित्र मृगतीर्थ के जल में उसने प्राणों का परित्याग कर दिया। वानर के शरीर का त्याग करते ही उसकी जीवात्मा ने दिव्य स्वरूप धारण कर लिया। वह चतुर्भुजी मेघ के समान श्यामल वर्ण का अत्यंत तेजस्वी सूर्य के समान कांतिवाला पीतांबर धारण किए हुए, सिरपर सुंदर रत्नों से जड़ा हुआ मुकुट कानों में कुंडल आदि आभूषण से सुसज्जित शरीर वाला दशों उंगलियों में मुद्रिका गले में वैजयंती माला ऐसे दिव्य स्वरूप का हो गया। उसी समय उस जीवात्मा को आकाश मार्ग से दिव्य विमान आता हुआ दिखाई दिया।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
बृहन्नारदीय पद्याधारे त्रिंशत्तमोऽध्यायः समाप्त ॥
(३०)
॥ शुभमभवतु ॥




Adhik mass ki Katha 29 adhyaya | अधिक मास की कथा 29 वा अध्याय

 Adhik mass ki Katha 29 adhyaya | अधिक मास की कथा 29 वा अध्याय 

॥ अथ एकोनविंशोऽध्यायः प्रारंभः ॥
श्री मन्महागणधिपतये नमः ॥
(२९)
श्री भगवान नारायण नारदजी से सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं, हे ऋषियों! पहले के कथा प्रसंग में राजा दृढधन्वा अपने राज्य का कार्य भार ज्येष्ठ पुत्र पर सौंपकर पत्नि के सहित तपोवन में गंगाजी के किनारे कुटिया बनाकर रहने लगा। गंगाजी में त्रिकाल स्नान करना नित्य नैमित्तिक कर्मों के साथ भगवद भजन और आराधना करना कंद मूलफल जो भी तपोवन में प्राप्त होते उनको खाकर और गंगाजल पीकर रहना यही उनकी दिनचर्या थी। रात्री भी पति की सेवा में रहकर पति को प्रत्येक कर्म में सहयोग देना यही उस साध्वी का कार्य था। इस प्रकार तपोवन में रहकर भगवदाराधना करते हुए अनेक समय व्यतीत होने लगा। पुरुषोत्तम मास आने पर राजा व रानी दोनों ने निराहार रहकर सिर्फ गंगाजल पीकर एक पैर के अंगूठे के आधार पर खड़े होकर दोनों हाथ ऊपर करके भगवान पुरुषोत्तम के नाम का जप करते हुए संपूर्ण मास को भक्ति से परिपूर्ण होकर व्यतीत किया। रानी भी पति का अनुसरण करती रही। इस प्रकार अधिकमास का अनुष्ठान परिपूर्ण होने पर आकाश से दिव्य विमान आया उस विमान से कांति निकल कर चारों ओर प्रकाश हो रहा था सोने की घंटियां रत्नों और मोतियों की झालर बंधी हुई थी झमझम शब्द हो रहा था। दिव्यांगनाएं नृत्य कर रही थी। उस विमान पर दो दिव्य देवदूत बैठे हुए थे। विमान को पास आता हुआ देखकर राजा व रानी को बड़ा आश्चर्य हुआ। विमान से उतर कर दोनों दिव्य दूतों ने राजा से आग्रह किया हे पुण्यात्माओं! आपकी तपस्या से प्रसन्न होकर गोलोकाधिपति भगवान पुरुषोत्तम ने आपके लिये विमान भेजा है आप इस नश्वर शरीर को त्यागकर विमान पर बैठें। उनके आग्रह पर राजा व रानी ने पंचमहाभौतिक शरीर का भगवान पुरुषोत्तम का नाम स्मरण करते हुए शरीर का त्याग कर दिया। उनकी आत्मा चतुर्भुजी स्वरूप की होकर सूर्य के समान तेजस्विनी हो गई। दोनों दिव्य पुरुषों ने राजारानी को आदरपूर्वक विमान पर बैठाया। विमान अत्यंत तेजगति से अनेक लोकों को लांघता हुआ गोलोक में पहुंचा भगवान के पार्षदों ने राजा रानी का सत्कार किया इस प्रकार राजा व रानी दोनों दिव्यस्वरूप से भगवान पुरुषोत्तम के सान्निध्य में रहकर मोक्ष को प्राप्त हो गए।
हे ऋषियों! हजारों वर्षों तक तपस्या करने पर जिस पुण्य फल की प्राप्ति नहीं होती। वही पुण्य सिर्फ अधिक मास में स्नान व्रत जप दान करने वाले को प्राप्त हो जाती है। अज्ञानावस्था में भी घटित हुआ व्रत आदि पुण्यकर्म अनंत फल को देने वाला होता है। जैसे एक वानर को एक शाखा से दूसरे वृक्षपर कूदते हुए पानी के कुंड़ में गिर जाने से अधिक-मास के स्नान और व्रत का पुण्य प्राप्त हुआ और उस पुण्य के प्रभाव से महाप्रतापी होते हुए भी सब पाप नष्ट होकर दिव्य स्वरूप का होकर विमान पर बैठकर गोलोक को प्राप्त हुआ। अज्ञानावस्था में घटित पुण्य इतना फलदायी हो सकता है।
तो मनुष्य अपनी श्रद्धा से इसके माहात्म्य को समझकर अधिक-मास में नियम धारण करते हुए व्रत पूजन दान कर्म के द्वारा व्यतीत करेंगे। उनके पुण्य का वर्णन करना सूर्य को दीपक दिखाने के बराबर है। हे महाप्रभु आप मुझे उस वानर का संपूर्ण प्रसंग सुनाइये कि कैसे उस पापी वानर को आकस्मिक पुण्य का लाभ प्राप्त होकर मोक्ष प्राप्त हुआ देवर्षि नारद के आग्रह करने पर भगवान नारायण कहते हैं, हे नारद केरल नाम के देश में एक ब्राह्मण रहता था। वह ब्राह्मण मूर्ख और महालोभी था। जैसे शहद की मधुमक्खी एक एक फूलों से बूंद-बूंद शहद लाकर अपने छत्ते में जमा करती है। वैसे ही वह ब्राह्मण भीख मांगकर एक एक पैसा जमाकर जमीन में गाड़कर रखता था। उसने प्राप्त किए पैसों का कभी सदुपयोग नहीं किया यह द्रव्य न अपने परिवारजनों पर खर्च किया, न कभी भगवान के पूजन हवन में, न पितरों के श्राद्ध में न, दान पुण्य में, यहां तक कि लोभ के कारण कभी अच्छे वस्त्र नहीं पहना, कभी अच्छी स्वादिष्ट वस्तु या अन्न भी नहीं खाया।
मनुष्य का जो कर्तव्य है अपने परिवार का पालन पोषण करना, सामाजिक प्रतिष्ठा के लिये शुभकर्म करना ऐसे कोई भी कर्म अपने जीवन में उसने नहीं किये। माघमास में तिल का दान, सूर्य की संक्रांति में अनेक दान, व सूर्यचंद्रमा के ग्रहण के समय जप हवन कर्म, पर्व के समय स्नान, आदि कोई शुभ और पुण्य प्राप्ति के कर्म अपने जीवन में कभी नहीं किया। उसके कर्मों के कारण समाज और परिवार के लोग उसको धिक्कारते और निंदा करते थे फिर भी वह किसी की परवाह न करके अपने स्वभाव के अनुसार धन को जमीन में गाड़कर रखना, कैसा भी वर्षा या ठंड का मौसम हो फटे चीथड़े वस्त्र पहनकर गुजारा करना यही उसका नित्य कर्म था। उसके पिता का रखा हुआ नाम चित्रशर्मा था। परंतु उसके व्यवहार और कर्म को देखकर लोगों ने उसका नाम कदर्यु रख दिया। सभी जगह लोग कदर्यु नाम से पुकारने व जानने लगे।
तिरस्कार करने से उसने अपने परिवार को त्याग कर अलग रहने लगा। उसका नित्य नियम था प्रातःकाल से ही भिक्षा मांगने निकलना, रास्ते में जो भी मिले बड़ी दीनवाणी से आंखों से आंसू बहाते हुए अपने शरीर की हालत दिखाते हुए प्रार्थना करते हुए भिक्षा मांगना। इस प्रकार अपने नगर के अलावा अनेक नगरों में वह भिक्षा मांगता फिरता रहता था। जब जन समुदाय में कदर्यु के स्वभाव और कंजूसी का प्रचार व प्रसार हो गया। तो सभी लोग उसको धिक्कारने लगे और भिक्षा देना भी बंद कर दिया। भिक्षा न मिलने से कदर्यु का मन बड़ा बेचैन रहने लगा। रातदिन चिंताग्रस्त होकर सोचता था कि मैं अब क्या करूं कहां जाऊं कैसे धन प्राप्ति हो। अचानक उसको याद आया कि मेरा बचपन का मित्र एक माली है। गांव से कुछ दूर उसका बगीचा है, वहीं वह रहता है। उसके पास जाना चाहिए ऐसा सोचकर वहां जाने का निश्चय किया। माली हमेशा बगीचे में रहता था गांव की ओर कदर्यु की बातों से अनभिज्ञ था। कदर्यु बगीचे में जाकर मित्र माली से बड़े प्रेम से मिला और आंखों से पानी बहाते हुए अपनी गरीबी का बखान करते हुए सहायता की भीख मांगने लगा। हे मित्र मैं अपने दुर्भाग्य का वर्णन कैसे करूं मैं बड़ा दुःखी हूं। क्या करूं कुछ समझ में नहीं आता। ग्रामवासी सब मेरा तिरस्कार करते हैं कोई भिक्षा तक नहीं देता। मैंने नगर का त्याग कर दिया है। जहां जीवन यापन नहीं होता ऐसे नगर में रहकर क्या फायदा। माली ने कदर्यु के प्रार्थना युक्त वचन और दयनीय अवस्था को देखा तो उसको दया आ गई। और कहा हे कदर्यु अच्छा हुआ तुम्हारे आने से मुझे भी सहयोग मिलेगा। मैं अकेला होने से दिन भर बगीचे में रहता जिससे मेरे गांव के सब कार्य बंद हो गए थे। घर परिवार की देखभाल भी बराबर नहीं हो पाती थी मैं अब बगीचे की चिंता से मुक्त होकर गांव में फूलहार का व्यवसाय करके घर परिवार की देखरेख कर सकूंगा। तुम यहीं बगीचे में रहकर इसकी देखरेख करो। ऐसा कहकर कदर्यु को अपने बगीचे में रख लिया कुछ दिन माली नित्य प्रति बगीचे में आकर वहां का कामकाज उसको समझाने लगा। जो काम माली बतलाता कदर्यु बड़ी मेहनत से उस कार्य को करता। बड़ी तन्मयता से बगीचे के फलों की रक्षा करता गिरे और पके हुए फल माली को सौंप देता। उसके व्यवहार और मेहनत को देखकर माली को उसपर विश्वास हो गया कि यह अपने परिवार बंधु बांधव जैसा ही है। बगीचे की सारी जिम्मेदारी उस पर छोड़ कर गांव में रहने लगा तथा अपने पूर्वजों का पारंपरिक व्यवसाय फूलों की दुकान को शुरु कर दिया।
अब माली को कदर्यु पर विश्वास और समय की कमी से बगीचे में बहुत कम कई दिनों के बाद जाने का मौका मिलता था। कुछ दिनों तक कदर्यु ने बगीचे के पके फलों को मालिक के पास पहुंचाया। परंतु लोभी होने के कारण उसके मन की भावना बदल गई और पके फलों को माली के पास पहुंचाना बंद कर दिया बगीचे से निकले हुए चोटीले दागी फलों को स्वंय पेटभर खाता और अच्छे फलों को बेंचकर जो पैसा मिलता उसको जमीन में गाड़ देता। कई दिनों तक फल न पहुंचने से माली एक दिन समय निकालकर बगीचे में पहुंचकर कदर्यु से फल न लाने के विषय में पूछने लगा। तो कदर्यु कहता है हे मित्र इस बगीचे में पशुपक्षी बहुत आते हैं और सब फल खाकर नष्ट कर देते हैं। देखो मैंने कई पक्षियों को भगाया और मारा भी देखो उनके पंख और शरीर का मांस पड़ा हुआ है। यहां तो मेरे खाने के लिये भी फल नहीं मिलते मैं तो किसी तरह गांव से अन्न की भिक्षा मांगकर अपना गुजारा करके तुम्हारे बगीचे की देखभाल करता हूं। पक्षियों के मरे हुए शरीर और मांस पंख आदि देखकर माली को कदर्यु की बातों पर विश्वास हो गया। गांव में माली का व्यवसाय अच्छा होने से आमदनी खूब बढ़ गई थी इस कारण बगीचे के विषय में उसको चिंता नहीं थी। माली गांव वापस चला गया और अपने व्यवसाय में लग गया।
इधर कदर्यु पहले से भी अधिक फलों की चोरी करके बेंचता और प्राप्त किए धन को जमीन में गाड़ देता। इस प्रकार कई वर्षों तक यही क्रम चलता रहा। कदर्यु की आयु का अंतिम समय आ गया एक दिन कदर्यु मृत्यु को प्राप्त हो गया। मृत्यु के समय यम के दूतों ने उसकी जीवात्मा को रस्सी से बांधकर यमपुरी ले चले। मार्ग में यमदूत उसको मुद्गरों से मारते अनेक प्रकार कष्ट देते हुए ले जा रहे थे तब उसकी आत्मा स्वंय को धिक्कार रही थी कि मैंने अति उत्तम मनुष्य शरीर प्राप्त करके भी कोई शुभ कर्म नहीं किया। हमेशा लोभ और चोरी करके सारे जीवन को व्यर्थ ही बिता दिया। न तो कोई दान किया न पूजन हवन किया न कोई व्रत उपवास किया न किसी पर्व में दान पुण्य किया न अच्छे वस्त्र पहना न अच्छा भोजन किया जमीन में गाड़ा हुआ धन वहीं गाड़ा रह गया। उसका भी कोई उपयोग मैंने नहीं किया।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
॥ बृहन्नारदीय पुराधारे एकोनत्रिंशोऽध्यायः समाप्त ॥
(२९)
॥ शुभमभवतु ॥









Adhik mass ki Katha 28 adhyaya | अधिक मास की कथा 28अध्याय

 Adhik mass ki Katha 28 adhyaya | अधिक मास की कथा 28अध्याय 


॥ अथ अठ्ठाविंशतितमोऽध्यायः प्रारंभ ॥
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकादि ऋषियों से और भगवान विष्णु लक्ष्मीजी से कहते हैं। हे लक्ष्मी! पहले एक समय सोपदेश में उग्र सुमति नाम का एक प्रख्यात राजा हो चुका है। वह राजा महान धर्मात्मा, दानी, अहंकार रहित सदाचार संपन्न और भगवान का भक्त था। नित्य भगवान की पूजा आराधना करना और अनेक पुराणों का श्रवण करना। इसी प्रकार वह अपनी दिनचर्या बनाकर पुत्र के समान प्रजा का पालन किया करता था। राजा की स्त्री का नाम सत्यमती था। वह भी पतिव्रता के धर्म से परिपूर्ण महासौभाग्यवती सभी शुभलक्षणों से संपन्न, और भगवद् भक्ति से परिपूर्ण थी। भगवान की कृपा और अपने पुण्यकर्मों के प्रभाव से राजा रानी दोनों को अपने पूर्वजन्म का वृत्तांत संपूर्ण स्मरण था। इसी कारण से वे दोनों इस जन्म में भी जब जब अधिक मास आता तब बड़ी भक्ति और श्रद्धा से नियमव्रत धारण भगवान पुरुषोत्तम का पूजन, अनेक प्रकार के दान कर्म करते हुए व्यतीत करते।
जनसमुदाय को सुख देने के निमित्त कुंए, बावली, तालाब का निर्माण करवाते थे और यश का प्रसार हो गया। एक समय राज्य में अंगिरस ऋषि का अनेक शिष्यों के साथ आगमन हुआ वे सब भ्रमण करते हुए राज भवन की ओर पहुंचे। ऋषि का आगमन सुनकर राजारानी दोनों मुख्यद्वार पर जाकर मुनि के चरणों में प्रणाम करके आदर पूर्वक राजमहल में लाकर उत्तम सिंहासन पर बैठाया और पाद्य अर्घ्य आदि के द्वारा उनका पूजन किया उनके आसन के पास नीचे बैठकर आदरपूर्वक हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए कहा हे मुनिराज आपके आगमन से मैं कृतार्थ हो गया। मेरा अहो भाग्य है जो आप इस भवन में पधारे इसको अपने चरणरज से पवित्र कर दिए। संतो का आगमन, और संतो की कृपा से दुर्बुद्धि होकर धर्म के प्रति अनुराग की वृद्धि होती है। जिस पर संतो की कृपा हो जाय उसको तीनों लोक में ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो न प्राप्त हो सके। संतो के चरणों का जल अपने सिर में धारण करते ही समस्त तीर्थों का पुण्य प्राप्त हो जाता है। आपके आगमन और दर्शन से मेरे समस्त संसार में कोई पुण्यवान नहीं होगा ऐसा मैं समझता हूं। राजा के ऐसे नम्रतापूर्ण वचनों को सुनकर ऋषि बड़े प्रसन्न होकर राजा के सिरपर हाथ फिरते हुए कहते हैं, हे राजन, तेरे जैसे धर्मात्मा और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को जानने वाले और नम्रता और विनय से युक्त शब्दों को सुनकर मन में बड़ी प्रसन्नता हुई।
विनय के द्वारा संसार में सभी अप्राप्य वस्तुओं को मनुष्य प्राप्त कर लेता है। हमेशा तेरा और तेरी प्रजा का कल्याण हो यह मेरा आशीर्वाद है। तुम दोनों पति पत्नि सदाचार संपन्न और भगवान के भक्त हो। धन राज्य और ऐश्वर्य के मद में लोग भगवान की भक्ति से विमुख हो जाते हैं। परंतु तुम्हारे पूर्वजन्म में ऐसा कौन सा पुण्य कर्म किया जिसके प्रभाव से तुम्हारी बुद्धि स्थिर है और भगवान के प्रति वैसी ही श्रद्धा बनी हुई है। ऋषि के वचनों को सुनकर राजा सुमति हाथ जोड़कर कहता है।
हे ऋषिवर आप त्रिलोकज्ञ हैं। हाथ में आंवले के समान भूत भविष्य वर्तमान को जानते हैं फिर भी आप मुझ से पूछते हैं तो आपकी आज्ञा से मैं अपने पूर्वजन्म का वृतांत कहता हूं। हे मुनिवर मैं पूर्वजन्म में वीरनामा नाम का वैश्य था। मैं जाति से वैश्य जरूर था लेकिन मेरे कर्म शूद्र से भी पतित थे। मैंने अपने जीवन में अनेक पाप कर्म किए। ब्राह्मणों की संपत्ति जबर्दस्ती अपहरण की। चोरी डकैती दूसरों का वध करना यही मेरा नित्य कर्म था। दूसरों को अपशब्द बोलना, कष्ट देना, धन का हरण करके वेश्यालय में खर्च करना मदिरा और मांस का भक्षण करना, यही मेरा कर्म था। मेरे इस कर्म से बंधु बांधव पारिवारिक जन और गांववासी सभी कुपित थे कोई मुझ से बात नहीं करता और अपने दरवाजे पर खड़ा नहीं रखता था इस प्रकार बहुत समय व्यतीत हो गया। लोगों के तिरस्कार से दुःखित होकर मैंने गांव छोड़ दिया और जंगल में पत्ते की झोपड़ी बनाकर रहने लगा। और जंगली जीव, पक्षी, मृग आदि को मारकर उनका मांस भक्षण करके किसी प्रकार दिन बिताने लगा। परंतु जंगल में भी कभी पशु पक्षी का शिकार नहीं मिलता तो भूखा ही रहना पड़ता इस प्रकार भूख से व्याकुल होकर जंगल में घूमता रहता था।
एक समय भूख से व्याकुल जंगल में घूमता हुआ काफी दूर निकल गया वहां मैंने एक स्थान ऐसा देखा कि अत्यंत जीर्ण अवस्था में भगवान विष्णु का मंदिर है। पास में ही सुंदर स्वच्छ जल से भरा हुआ तालाब है कमल खिले हुए हैं और अनेक प्रकार के पक्षी कलरव कर रहे हैं। तालाब के समीप जाकर उसका जल पीकर मन को शांति मिली और विश्राम के निमित्त एक वृक्ष के नीचे लेट गया। इधर मेरी पत्नि मेरे चले जाने के बाद दुःखित होकर इधर-उधर भटकने लगी मेरे बंधुजनों ने मेरे न रहने पर संपत्ति का अपहरण करके मेरी पत्नि को निकाल दिया कोई भी अपने पास उसको आश्रय देने को तैयार नहीं था। मेरे दुष्कर्मों का फल मेरी पत्नि को भी भोगना पड़ रहा था। दुःखित होकर उसने भी जंगल में प्रवेश किया और भटकती भूख प्यास से दुःखित उसी जगह पहुंची जहां मैं लेटा हुआ था। उसको देखकर मुझे भी दुःख हुआ मैंने उसको कुछ जंगली फल खाने को दिए फल खाकर जलपीकर उसका मन कुछ शांत हुआ मेरे पास आकर बैठ गई। और कहने लगी हे स्वामी जानते हुए अथवा अनजानते हुए जो भी पाप मनुष्य से हो जाते हैं उस कर्म का फल मनुष्य को जीवन पर्यन्त और मृत्यु के बाद रौरव आदि नरकों की यातना से दुःख भोगना पड़ता है। अपने पूर्व कर्मों का प्रायश्चित न करने से निरंतर पाप होते रहते हैं। और कभी दुःख से छुटकारा नहीं मिलता। मैंने ज्ञानी और धार्मिक पुरुषों से सुना है कि भगवान के नामों में इतनी शक्ति है कि जन्म जन्मांतर के समस्त पापों को नष्ट करके मन को शांति और सुख की अनुभूति देता है।
जो भगवान का नाम स्मरण करनेवाले भक्त हैं। जो भगवान के मंदिर में जाकर मंदिर की साफ सफाई पूजन और भजन कीर्तन नाम स्मरण करते हैं। ऐसे लोग समस्त पापों से मुक्त होकर संसार में सुखी जीवन व्यतीत करते हुए अंत में मोक्ष को प्राप्त करते हैं। यही कर्म यदि अधिक मास में किया जाय तो अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है। ऐसा मैंने विद्वानों से सुना है। इतना दुःख भोगने के बाद अब यदि अपना कल्याण चाहने की इच्छा हो तो समस्त दुष्कर्मों को छोड़कर अपना भविष्य बनाने के लिए धर्म का आचरण करो। ऐसी ज्ञान पूर्ण बातों को सुनकर मेरे मन में भी पाप कर्मों का प्रायश्चित करने की इच्छा जागृत हुई। हम दोनों पति पत्नि वही रहकर नित्य भगवान विष्णु के मंदिर को स्वच्छ रखकर भगवान का पूजन और नाम स्मरण करते हुए, हिंसा त्यागकर, जंगल में उत्पन्न कंद फलों को खाकर समय व्यतीत करने लगे। जंगल में रहने से हमको महीना पर्व और अधिक मास का ज्ञान नहीं था फिर भी निरंतर भगवान की आराधना में लिप्त रहने से हमारे जीवन में अनेक अधिमास व्यतीत हुए उसी पुण्य के प्रभाव से हमें इस जन्म में समस्त सुख वैभव राज्य प्राप्त हुआ और पूर्वजन्म की सब बातें याद हैं।
राजा सुमति के द्वारा पूर्व जन्म का वृतांत और अधिक मास के माहात्म्य को सुनकर अंगिरस ऋषि बड़े प्रसन्न हुए। राजा को आशीर्वाद देकर अपने आश्रम को प्रस्थान कर गए। राजा सुमति भी निरंतर धर्माचरण पर चलकर अधिक मास में भगवान पुरुषोत्तम की आराधना करता हुआ सांसारिक सुखों को भोगकर अंत में मोक्ष को प्राप्त हुआ। सूतजी कहते हैं कि हे ऋषियों इसी कथा प्रसंग को अर्थात लक्ष्मी और विष्णु के संवाद वाल्मीकि ऋषि दृढधन्वा को पूर्व के कथा प्रसंग में सुना रहे थे। उन्होंने कहा हे राजन संसार में भगवान पुरुषोत्तम के समान महान पुण्यदाता कोई देवता नहीं है। अधिकमास के देवता भगवान पुरुषोत्तम है उन्होंने अपने सब गुण धर्म अधिमास को दे दिए हैं इसीलिए भगवान पुरुषोत्तम के सदृश अधिकमास भी उन्हीं के सदृश पुण्य और मोक्ष देने में सामर्थ्यशील है। हे राजा तू भाग्यशाली है। इसीलिए निरंतर अधिकमास में व्रत नियम धारण करते हुए भगवान पुरुषोत्तम की आराधना करता रहता है। तेरा सर्वदा कल्याण हो। ऐसा कहकर वाल्मीकि ऋषि ने जाने की इच्छा प्रकट की। राजा ने ऋषि का पूजन करके उनको विदा किया। ग्राम की सीमा तक उनको पहुंचाने गया। और वापस राजमहल में आकर पत्नि से कहा हे प्रिये यह शरीर नश्वर है इसमें हमेशा काम क्रोध, लोभ, मोह आदि विकार उत्पन्न होते रहते हैं। वात, पित्त, कफ से भरा हुआ रोग से ग्रसित होकर कब नष्ट हो जाए इसका कोई निश्चय नहीं है। इसलिये बचा हुआ शेष जीवन संसार से विरक्त होकर तपोवन में जाकर तपस्या के द्वारा शरीर का परित्याग कर देना ही सर्वोत्तम होगा। पति के ज्ञान पूर्ण वचनों को सुनकर रानी ने भी अपने अंतकरण में विचार किया और कहा पति के जाने पर मुझे यहां रहकर क्या करना है।
जो स्त्रियां पति के बिना बहू के आधीन रहती हैं। वे अपने ही घर में नौकर के समान जीवन बिताती हैं। तथा कुत्ते के समान प्राप्त भोजन करती हैं पति ही परमेश्वर के समान रक्षक और सुखदाता होता है। इसलिये मैं भी पति का अनुसरण करके उन्हीं की सेवा में शरीर का परित्याग कर दूंगी। पत्नि की ऐसी इच्छा को देख राजा ने अपने पुत्र का राजतिलक करके राज्य का भार सौंपकर तपोवन में पत्नि सहित जाकर तपस्या में लीन हो गया। पत्नि भी पति की सेवा करते हुए भगवान की आराधना में लिप्त होकर दोनों ने कुछ दिनों बाद शरीर का परित्याग कर अनंत मोक्ष को प्राप्त किया।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
बृहन्नारदीय पद्याधारे अठ्ठाविंशतितमोऽध्यायः समाप्त
(२८)
॥ शुभमभवतु ॥




Adhik mass ki Katha 27 adhyaya| अधिक मास की कथा 27वा अध्याय

 Adhik mass ki Katha 27 adhyaya| अधिक मास की कथा 27वा अध्याय 

॥ अथ सप्तविंशतितमोऽध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री मन्महागणधिपतये नमः ॥
श्री भगवान नारायण नारदजी से सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं। हे ऋषियों इसके पहले के अध्याय में भगवान ने अधिक मास के उद्यापन का विधान और समस्त मास की पूर्णता के लिये दान का विधान कहा। आज के कथा प्रसंग में भगवान विष्णु कहते हैं। हे लक्ष्मी पुरुषोत्तम मास का व्रत सभी व्रतों में सर्वोत्तम और सभी पुण्यकर्मों से विशेष महान अक्षय पुण्य को देने वाला होता है। जो लोग पुरुषोत्तम मास में नियमव्रत आदि धारण करते हुए श्रद्धापूर्वक मास को व्यतीत करते हैं। वे पुण्यात्मा के पास अन्तिम समय यमदूत कभी नहीं आते जैसे सिंह को देखकर हाथी भाग जाते हैं। और गरुड़ को देखकर सांप बिल में घुस जाते हैं। सूर्य का प्रकाश आते ही अंधकार भाग जाता है। उसी प्रकार पुण्यात्मा को देखकर यमदूत कभी उनके पास नहीं जाते। हे लक्ष्मी जिसने पुरुषोत्तम मास में आराधना की है। उसके घर और शरीर में समस्त तीर्थों का वास रहता है। और समस्त देवताओं की कृपा रहती है। और समस्त विघ्नबाधाएं नष्ट होकर मन में शांति स्थापित रहती है। उनके समक्ष भूत प्रेत पिशाच आदि की कोई बाधा नहीं आती वे कहीं भी रहें सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करते हुए यज्ञ यागादिक करने वाले पुण्यात्माओं से भी ज्यादा पुण्य शाली होकर अंत में अक्षय पुण्य के द्वारा मोक्ष को प्राप्त करते हैं। हे लक्ष्मी इसके पुण्य फल का वर्णन करने में हजार जिह्वा वाले शेषनाग भी असमर्थ हैं।
हे लक्ष्मी इस मास को किस प्रकार कौन कौन से नियम धारण करने योग्य होते है सो मैं कहता हूं इसमें अपनी शारीरिक शक्ति के अनुसार कोई भी एक या अनेक नियम को धारण करने का संकल्प (निश्चय) करके नित्य प्रातः स्नान पूजन जप स्मरण भजन कीर्तन करते हुए सात्विक वृत्ति से रहना चाहिये। इसके नियम हैं, भूमि पर सोना, किसी एक तेल का परित्याग, एक ही जाति की पत्रावलीपर भोजन करना, नख और बालों को न काटना, एक ही अन्न का भोजन करना नित्य दीपदान करना, मालपुआ या अन्नशा या मिष्ठान का दान करना, नित्य ब्राह्मण भोजन करवाना, जूता चप्पल न पहनना, आंवले के चूर्ण को पानी में डालकर स्नान करना, किसी एक फल का त्याग, नमक का त्याग, नियतलीला, तांबूल, धान्य का दान, सुवर्ण, चांदी या द्रव्य का दान, भागवत श्रवण का नियम, अयाचित, नक्त, धारणापारण, या एक समय भोजन का नियम, हविष्यान्न भोजन का नियम, मौन धारण का नियम तुलसी पूजन, शालिग्राम पूजन, आदि अनेक नियमों में से एक दो या तीन चार जितने भी नियम धारण करने की शारीरिक क्षमता हो उतने नियम का निश्चय करके संपूर्ण मास पर्यंत पालन करना चाहिये बीच में नियम भंग न हो इस बात की दक्षता रखना चाहिये।
एक भी नियम धारण करके यदि दक्षता पूर्ण संपूर्ण मास पालन किया जाय तो भी अनन्य पुण्य की प्राप्ति होती है। इस मास में सभी को इन वस्तुओं का त्याग करना चाहिए। राई, चना, नागरमोथा, तिल का तेल, प्याज, लहसुन, मूली, गाजर, बैंगन, इमली, जाम्बीर नींबू, मादक नशा उत्पन्न करने वाले पदार्थ, मसूर की दाल, पकाया हुआ बासी अन्न, गाय भैंस के अलावा दूसरे पशुओं का दूध, भूमि से उत्पन्न नमक, तांबे के बर्तन में रखा हुआ दूध या घी, सिर्फ अपने लिये पकाया हुआ अन्न, ब्रह्मचर्य धारण, जलहुुआ अन्न, दूसरों से निंदित अन्न, अपने मन से दूषित अन्न देवता और ब्राह्मणों से द्वेष रखने वालों का अन्न, कौवों से स्पर्श किया अन्न, सूतक लगी अवस्था का अन्न इन सभी वस्तु और पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। तथा दूसरों से द्वेष करना, किसी की निंदा करना, वेद ब्राह्मण, राजा, स्त्री और गौ की निंदा नहीं करना चाहिए। इस प्रकार इन नियमों का पालन करते हुए अधिक मास को बिताना चाहिए।
तुलसीदल या मंजरी से शालिग्राम की नित्यपूजा और नित्य श्री मद भागवत का श्रवण अनंत पुण्य देने वाला होता है। मृत्यु के उपरांत चतुर्भुजी स्वरूप धारण करके स्वर्गों की प्राप्ति देता है। व्रत उपवास का नियम धारण करने वाले को नित्य अश्वमेघ यज्ञ के फल की प्राप्ति होती है। हे लक्ष्मी नियम धारण करनेवाले को किस प्रकार अंत में नियम छोड़ना चाहिए सो मैं कहता हूं। नक्त भोजन का नियम धारण करने वाले को अंत में ब्राह्मण भोजन और सुवर्ण का दान करके नियम छोड़ना चाहिए। आंवले के चूर्ण का स्नान करने वाले को दही और दूध का दान करना चाहिए। एक अन्न का भोजन करने वाले को गेहूं और चावल का दान, भूमि पर सोने के नियम वाले को शय्यादान, तेल त्याग में घी का दान, घी के त्याग में दूध का दान, पत्रावली पर भोजन करने वाले को घी, शक्कर और अन्न का दान मौन व्रत वाले को घंटा घड़ियाल का दान, नखकेश धारण के नियम में आईने का दान, जूता चप्पल के नियम में जूता या चप्पल का दान, लवण त्याग करने पर घी, शक्कर, नमक का दान, दीपदान के नियम में चांदी का दीपक, सुवर्ण की बत्ती का दान, धारणापारण नियम में वस्त्र और कुंभ (जलपात्र) का दान, एक समय भोजन के नियम में उत्तम अन्न और शुद्ध घी से बने तीस लड्डू का दान करना चाहिए नियम की पूर्ति और फल की प्राप्ति के लिये इसी प्रकार नियम छोड़ना चाहिए यह कर्म अमावस्या के दिन करना श्रेष्ठ होता है।
जो जो पदार्थ छोड़ने का नियम धारण किया हो असमर्थ पुरुषों को वही पदार्थ दान करना चाहिए भगवान पुरुषोत्तम का पूजन हवन करके उपरोक्त प्रकार से दान करके ब्राह्मण का आशीर्वाद प्राप्त करके नियम छोड़ना चाहिए। अपने नियम और व्रत की सफलता के लिये यथा शक्ति दक्षिणा देकर व्रत की पूर्ति का फल प्राप्त करे। हे लक्ष्मी समस्त मनोकामनाओं को देनेवाला महान पुण्यदायक अधिक मास का नियम है। इन नियमों को अनेक देवता ऋषि संन्यासी भी धारण करके अक्षय पुण्य को प्राप्त करते हैं।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
॥ बृहन्नारदीय पुराणांतर्गत सप्तविंशतितमोऽध्यायः समाप्त ॥
॥ शुभमभवतु ॥