Adhik mass ki Katha 8 adhyaya| अधिक मास की कथा आठवां अध्याय

 

Adhik mass ki Katha 8 adhyaya| अधिक मास की कथा आठवां अध्याय 




 ॥ अथ अष्टमोऽध्यायः प्रारंभः ॥

।। श्री गणधिपतये नमः ।।

व्यासजी श्रोतागणों से तथा सूतजी शौनकादि ऋषियों से, भगवान् नारायण नारदजी से कहते हैं, हे नारद कल के कथा प्रसंग में वाल्मीकि ऋषि राजा दृढ़धन्वा से उसके पूर्व जन्म का इतिहास सुनाते हुए कहते हैं कि हे राजन् पत्नि गौतमी के वचनों को सुनकर ब्राह्मण को कुछ संतोष हुआ दुःख का परित्याग करके मन में धैर्य धारण करके वह ब्राह्मण सुदेव अपने नित्य नैमित्तिक परिचर्या में लग गया। जो होनेवाला है वह निश्चित ही होगा उसको कोई टाल नहीं सकता। उसको गरुड़जी के वाक्य याद आ गए कि आपत्ति व्याधी दुःख आरोप भगवान्‌की सेवा मनन चिंतन कभी मत छोड़ना भगवान के द्वारा ही समस्त दुःख नष्ट होकर सुख की प्राप्ति होती है। इस परम वाक्य को मन में धारण करके भगवान की आराधना करते हुए अपनी दिनचर्या में संलग्न रहने लगा।

इस प्रकार कुछ समय और बीत गया जब उस बालक की उम्र ने बारहवें वर्ष में प्रवेश किया ऐसे ही एक समय की बात है ग्रीष्म ऋतु का समय था आश्रम के आसपास फूलों के वृक्ष सूख जाने से पूजन के लिये समिधा, कुशा, और फूल लाने वह ब्राह्मण वन में गया हुआ था और पत्नि गृहकार्य में व्यस्त थी। बालक शुकदेव बराबरी के लड़कों के साथ जलक्रीड़ा करने बावली पर गया जल में प्रवेश करने पर बालकों को ग्रीष्म ऋतु के कारण बहुत आनंद आने लगा वे एक दूसरे पर पानी उछालते एक दूसरे का हाथ पकड़कर इधर से उधर खींचते कोई पानी में डुबकी लगाकर किसी का पैर पकड़ कर पानी के भीतर खींचते इस तरह अनेक प्रकार की जलक्रीड़ा करने लगे इस तरह पानी का खेल खेलते हुए काफी समय बीत गया, थकावट आने लगी परंतु बाहर भयानक गर्मी होने से पानी से बाहर निकलने की इच्छा भी नहीं होती थी।

इस प्रकार थकावट में शरीर शिथिल होने पर भी बालक शुकदेव ने श्वासरोककर पानी में घुसकर अपने मित्र का पैर पकड़कर गहरे पानी में खींचकर ले गया नीचे पानी के तलपर पहुंचते ही रोका हुआ श्वास छूट गया और पानी उसके पेट में भर जाने से प्राण निकल गया। मित्रवर्ग शुकदेव को ऊपर न आया देखकर भयभीत हो गए और बावली से बाहर निकलकर चिल्लाते भागते हुए माता गौतमी के पास आए।

जाकर शुकदेव का पानी में डूबने का दुःखद समाचार सुना दिया। सुनते ही गौतमी हाहाकार करती हुई मूर्छित होकर गिर पड़ी। उसी समय ब्राह्मण सुदेव भी वन से वापस आ गया आते ही पुत्र के मरण का समाचार सुनकर कटे हुए वृक्ष के समान पृथ्वी पर गिरकर बेहोश हो गया। थोड़ी देर के बाद जब पत्नि पति की मूर्च्छा दूर हुई तब दोनों हाहाकार करके दौड़ते हुए बावली की ओर भागे। तब तक बालक शुकदेव का मृत शरीर पानी से फूलकर ऊपर तैर रहा था। दोनों ने बालक के शरीर को बावली के बाहर लाकर गोद में रखकर आलिंगन करते हुए बार-बार मुख चूमते हुए रुदन करने लगे।

ब्राह्मण सुदेव कहता है कि हे पुत्र तू निद्रा त्याग कर जल्दी से उठ, मुझसे बात कर, आंखें खोलकर हमारी तरफ देख, तेरे शब्दों को सुनने के लिये हम अधीर हो रहे हैं। इस वृद्धावस्था में हम दोनों को छोड़कर जाना उचित नहीं है। देख तेरे मित्र तुझे अध्ययन करने के लिये बुला रहे हैं। हम तुझे छोड़कर अब आश्रम भी नहीं जाएंगे हमको घर जाने का कोई मतलब नहीं है। हमारे लिये घर अब जंगल के समान दिखाई देता है। हे भगवान मैंने कोई ब्रह्म हत्या नहीं की आज तक कोई पाप कर्म नहीं किया फिर किस कर्म का फल मुझे भोगना पड़ रहा है कि मुझे बालक की मृत्यु देखनी पड़ी है भगवान् में वृद्ध असहाय हूं मेरा सिर्फ एक पुत्र ही सहारा था उसको तुमने मुझ से छीन लिया अब मैं किसका सहारा करूं। हे भगवान आप तो बड़े दयालु प्रसिद्ध हो।

फिर मेरे लिये ऐसी कठोरता क्यों कर रहे हो। ब्राह्मण अनेक प्रकार से रोते हुए विलाप करता हुआ कहता मेघों से पानी गिरता है पानी से पृथ्वी अन्न उत्पन्न करती है। भूमि में अनेक प्रकार के रत्न मिलते हैं। सागर से मोती प्राप्त होते हैं परंतु ऐसा कोई स्थान नहीं दिखता जहां से मेरा मृत पुत्र जीवित प्राप्त हो जाय। हे पुत्र तू भी मेरे ऊपर दया नहीं करता एक बार तो हमसे बात कर देख तेरी माता किस प्रकार बिलख बिलखकर रो रही है। आज तक तू कभी हमसे पूछे बिना कहीं नहीं गया, कभी वेदाध्ययन में नागा नहीं किया फिर तू आज इतना निष्ठुर क्यों हो गया। तेरे वे मीठे वचन अब कहां सुनने को मिलेंगे। मेरा हृदय भी कितना कठोर है, मुझे धिक्कार है बालक मृत देखकर भी मेरे प्राण नहीं निकल रहे। वे राजा दशरथ धन्य हैं। जिन्होंने पुत्र को वनवास जाता देखकर अपने प्राणों का परित्याग कर दिया। मैं दुःख की अग्नि में जल रहा हूं परंतु मेरे प्राण नहीं निकल रहे। हे देवाधिदेव हे जगन्नाथ दोनों पर दया करने वाले लक्ष्मीपति वैकुंठाधिपति आपके सिवा अब मेरी रक्षा करने वाला कोई नहीं है। तीनों लोक में मेरे समान मूर्ख और दुर्भागी कोई नहीं होगा। जो मैंने भगवान के वचनों को न मानकर पुत्र के लिये जिद कि अगर मैं उनका कहना मान लेता तो मुझे यह दिन क्यों देखना पड़ता।

यह दुःखित और रोते हुए पति पत्नि पुत्र के मृत शरीर को गोद में लेकर वहीं बैठे रहे। उन्होंने निश्चित कर लिया कि अब हम जीवित रहकर क्या करेंगे, यहीं बैठे बैठे अपने प्राणों का परित्याग कर देंगे। अकस्मात आकाश में बादल घिर गए, गर्जना होने लगी, बिजली कड़कने लगी और भयंकर बरसात होने लगी। आंधी चलने से बड़े बड़े वृक्ष उखड़कर गिर गए। ऐसा भयंकर प्रकृति का उन्माद होने पर भी ब्राह्मण पति पत्नि दुःखित रोते हुए अचल जल का परित्याग कर बैठे हुए कभी अपने भाग्य को कोसते कभी पुत्र का आलिंगन करते कभी देवाधिदेव भगवान से अपने दुःख का वर्णन करते हुए दया की भीख मांगते हुए उनको चालीस दिन का समय बीत गया कब सूर्य उदय हुआ कब अस्त हुआ इसका भी उनको ज्ञान नहीं था। भाग्यवश वह समय पुरुषोत्तम का संपूर्ण मास था जो ब्राह्मण ने दुःखमय पुत्र शोक में अन्नजल का परित्याग कर व्यतीत किया था।

परम प्रिय भगवान्पुरुषोत्तम का अत्यंत अनंत पुण्य दाता मास में अज्ञातवस्था में ब्राह्मण के द्वारा जो कठिन तपस्या घटित हुई उसके द्वारा भगवान् पुरुषोत्तम प्रसन्न होकर ब्राह्मण के समक्ष प्रगट हुए उस समय भगवान का स्वरूप नवीन मेघ के समान पीतांबर धारण किए हुए दो भुजावाले मुरली धारण किए हुए गले में वनमाला सुशोभित हो रही है। ऐसी सुंदर आकृति और स्वरूप में प्रगट हुए। भगवान के सुंदर स्वरूप को देखकर ब्राह्मण गोद से बालक का मृत शरीर जमीन पर रखकर प्रसन्नमुख बारंबार दंडवत करता हुआ हांथ जोड़कर खड़ा हुआ। दया के सागर मोक्ष के दाता भगवान पुरुषोत्तम उससे कहते हैं हे ब्राह्मण तू धन्य है, बड़ा भाग्यशाली है तूने जो इस पुरुषोत्तम मास में कठिन तपस्या की है उससे मैं बहुत प्रसन्न हूं। हे ब्राह्मण तेरा यह मृत पुत्र जीवित होकर इसकी आयु बारह हजार वर्ष की होगी।

पुत्र सुख के अलावा और भी बहुत सांसारिक सुख तुझे प्राप्त होंगे। इस पुत्र के साथ गृहस्थ सुख भोगकर इस शरीर को छोड़ने के बाद तुझे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होगी। वहां बारह हजार वर्ष सुख भोगने पर पृथ्वी पर मनुष्य योनि में जन्म होगा। इस संसार में राजा दृढ़धन्वा के नाम से प्रसिद्ध होकर धन, बल, वाहन, संपत्ति, राज, ऐश्वर्य दिन प्रतिदिन बढ़कर चक्रवर्ती राजा के रूप में प्रख्यात होगा। यही पत्नि दूसरे जन्म में तेरी पटरानी होगी। सर्वगुण संपन्न सुंदर चारपुत्र और एक कन्या होगी अनेक दिन राजसुख में निमग्न व्यतीत होंगे। सांसारिक विषय में निमग्न होने से भगवान का स्मरण भूल सा जायेगा। तब यही तेरा पुत्र तोता का शरीर धारण कर वट वृक्ष पर बैठकर मनुष्य वाणी में तुझे उपदेश देकर सचेत करेगा।

इसके वाक्यों को सुनकर तुझे वैराग्य उत्पन्न होकर चिंताग्रस्त रहेगा। तब वाल्मीकि ऋषि के द्वारा यथार्थ ज्ञान प्राप्त करके तू भगवान की सेवा में लिप्त होगा तथा समयावधि के अनुसार मोक्ष को प्राप्त करेगा। इस प्रकार का वरदान देते ही ब्राह्मण का मृतपुत्र जीवित होकर मातापिता तथा भगवान के चरणों को प्रणाम करके प्रसन्न मुख स्वस्थ हो गया।

भगवान पुरुषोत्तम के द्वारा प्राप्त वरदान तथा जीवित पुत्र को देखकर ब्राह्मण पति पत्नि अत्यंत प्रसन्न होकर बारंबार भगवान के चरणों में प्रणाम करते हुए हांथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए कहते हैं हे महाप्रभु दीन दयालु कृपाकर मेरे मानसिक संदेह को दूर करने की कृपा करें। हे ऋषिकेश मैंने चार हजार वर्ष तक कठिन तपस्या की जिससे भगवान विष्णु प्रसन्न होकर वरदान देने के लिये प्रगट हुए। मैंने पुत्र प्राप्ति का वरदान मांगा तो उन्होंने कहा तेरे प्रारब्ध में सात जन्म तक पुत्र का सुख नहीं है। सो हे महाप्रभु आज मैं देख रहा हूं मेरा मृत पुत्र भी जीवित हो गया और आपने ब्रह्मलोक का सुख दूसरे जन्म में मुझे अखंड चक्रवर्ती राज्य, चार पुत्र एक कन्या और संसार के सभी सुखों का वरदान बिना किसी तपस्या व आराधना के आपने मुझे क्यों दे दिया। यह सब देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है। कृपा करके मेरे मानसिक संदेह को दूर कर दीजिये। इस प्रकार वह ब्राह्मण सुदेव भगवान पुरुषोत्तम से प्रार्थना करता हुआ हाथ जोड़कर खड़ा रहा।

जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार बृहन्नारदीय

पद्याधारे अष्टमो s अध्यायः समाप्त ॥

(८)

॥ शुभंभवतु ॥





Adhik mass ki Katha 7 adhyaya| अधिक मास की कथा सातवां अध्याय

 


Adhik mass ki Katha 7 adhyaya| अधिक मास की कथा सातवां अध्याय 



॥ अथ सप्तमो ऽ ध्याय: प्रारंभ: ॥

॥ श्री गणेशाय नम: ॥

व्यासजी श्रोतागणों से सूतजी शौनकदि ऋषियों से भगवान नारायण नारदजी से कहते हैं कि हे नारद, वाल्मीकि ऋषि राजा दृढ़धन्वा को बता रहे हैं कि वह सुदेव ब्राह्मण भगवान की स्तुति कर हाथ जोड़कर खड़ा रहा। उसके वचनों को सुनकर सच्चिदानंद भगवान विष्णु गंभीर वाणी में कहते हैं, हे ब्राह्मण तुमने जैसी तपस्या की है। उस उग्र तपस्या के द्वारा मैं अत्यंत प्रसन्न होकर तुझे वरदान देने के लिये मैंने तुझे दर्शन दिया है। अब तेरे मन में जो भी इच्छा हो वह मांग। मैं तेरी सभी इच्छाएं परिपूर्ण करूंगा। भगवान के वचनों को सुनकर ब्राह्मण सुदेव हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना करता है कि हे दया के सागर यदि आप मुझे वरदान देना चाहते हैं तो मुझे एक सुंदर सुपुत्र का वरदान दीजिये। मुझे पुत्र के सिवा कुछ नहीं चाहिए। पुत्र के बिना सारा संसार निरर्थक प्रतीत होता है। ब्राह्मण के वचनों को सुनकर भगवान विष्णु कहते हैं, हे ब्राह्मण पुत्र के अलावा संसार की कोई भी वस्तु मांग ले मैं तुझे राज्य धन संपदा सभी सुख दे सकता हूं। परंतु पुत्र सुख नहीं दे सकता कारण कि तेरे भाग्य में विधाता ने पुत्र का सुख लिखा ही नहीं है। मैंने तेरे ललाट में लिखी हुई सब बातें देख ली है। सात जन्म तक तेरे भाग्य में पुत्र का सुख नहीं है। भगवान के द्वारा वज्र के समान लगने वाले शब्दों को सुनकर अत्यंत दु:खित होकर कटे हुए वृक्ष के समान पृथ्वी पर गिरकर बेहोश हो गया। पति की ऐसी अवस्था देखकर पत्नि गौतमी भी दु:खित होकर रोने लगी। थोड़ी देर रोते हुए उसने धैर्य धारण कर पति के समीप जाकर कहने लगी हे प्राणनाथ उठिये! व्यर्थ में दु:ख मत करिए, मैंने जो आपसे पहले कहा था उन शब्दों को याद करिए। मैंने कहा था कि भाग्य में विधाता ने जो सुख दु:ख लिख दिया है वही मनुष्य को प्राप्त होता है। पूर्वजन्म के पुण्यकर्मों के द्वारा ही मनुष्य सुख प्राप्त करता है। ऐसी स्थिती में भगवान भी क्या कर सकते हैं।

जैसे मृत्यु के समीप जाने वाले मनुष्य को औषधी देना निष्फल होता है। वैसे अभागी मनुष्य के सारे कर्म निष्फल होते हैं। हमने सुना था कि यज्ञ, तप, दान और भगवान की आराधना से मनुष्य अपनी मनोकामना प्राप्त कर सकता है ऐसी श्रुतिपुराण आदि ग्रंथों से भी सुना गया है। परंतु आज हमको पूरा विश्वास हो गया कि भाग्य के सामने सब व्यर्थ है। जैसे सूर्य के प्रकाश के समक्ष जुगनू का प्रकाश व्यर्थ होता है। इसलिये मेरी बातों पर विश्वास करके आप धैर्य धारण करिए और भाग्य के भरोसे अपना शेष जीवन बिताइये। अब हमको भगवान से कोई प्रयोजन नहीं है। गौतमी के ऐसे तीव्र और शोकयुक्त वचनों को सुनकर गुरुजी भगवान से हाथ जोड़कर कहते हैं हे महाप्रभु यह ब्राह्मण सुदेव और उसकी पत्नि गौतमी अत्यंत दु:ख के सागर में डूबे हुए हैं। इनकी रक्षा करने वाला कोई नहीं है। आपके सामने इनकी दयनीय अवस्था प्रगट है। फिर भी आप अपने भक्त पर दया क्यों नहीं करते। आप तो दीन बंधु हैं। दया के सागर हैं। आज आपने अपनी कृपा त्याग कर इतनी कठोरता क्यों धारण की है। आपकी सेवा तो आपके भक्तों को चारों प्रकार की मुक्ति देने वाली है। आपके भक्तों के सामने अष्टसिद्धि नवनिद्धि नौकरों के समान रहती है। फिर आप अपने भक्त की शुभेच्छा को पूर्ण क्यों नहीं करते।

यदि आपने इस ब्राह्मण की इच्छा पूर्ण नहीं की तो सांसारिक मनुष्य आपकी आराधना तपस्या करना छोड़कर भाग्य के भरोसे ही रहेंगे। सब लोग आपकी भक्ति से विमुख होकर भाग्य को प्रधानता देंगे। हे महाप्रभु आपने गजेंद्र की रक्षा की तथा ध्रुव को अक्षय पद दिया, भक्त प्रहलाद को सर्वश्रेष्ठता दी, सारे संसार में आपकी दयालुता प्रसिद्ध है। यह ब्राह्मण आपकी शरण में है। फिर आप इसकी उपेक्षा क्यों करते हैं। इससे संसार में आपकी निंदा होगी। गरुड़जी के ऐसे वचनों को सुनकर भगवान कहते हैं, हे गरुड़ यदि तेरे मन में इस ब्राह्मण के प्रति दया उत्पन्न हो गई है, तो मेरी आज्ञा से इसे पुत्र का वरदान बारह वर्ष का दे दे। भगवान के वचनों को सुनकर गरुड़ प्रसन्न होकर कहते हैं, हे ब्राह्मण यद्यपि तेरे भाग्य में सात जन्म तक पुत्र का सुख नहीं है। फिर भी मैं भगवान की आज्ञा से तुझे एक उत्तम पुत्र का वरदान देता हूं। इस पुत्र के द्वारा तुझे अत्यंत दु:ख भी होगा। फिर भी तुम भगवान की आराधना मत छोड़ना तुम्हारा कल्याण होगा। भगवान की भक्ति चाहे सकाम हो या निष्काम कभी व्यर्थ नहीं जाती यह पांच तत्वों का बना हुआ भौतिक शरीर कभी भी पानी के बुलबुले के समान नष्ट होने वाला है। इस पर अभिमान कभी भी नहीं करना चाहिए हमेशा भगवान की आराधना करने से ही जीवात्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिये भगवान की सेवा से कभी विमुख नहीं होना चाहिये यही संसार का मुख्य सार है। मैंने तुझे एक सुंदर सर्वगुण संपन्न पुत्र का वरदान भगवान की आज्ञा से दिया है।

अब तुम पत्नि के सहित सांसारिक वातावरण में रहकर भगवान का चिंतन और सेवा करते रहो उसी से तुम्हारे सभी दु:ख दूर होंगे। इस प्रकार वरदान देकर गरुड़ सहित भगवान वैकुंठ लोक को चले गए। वह ब्राह्मण सुदेव भी अपने पत्नि के सहित आश्रम में आकर पहले की तरह गृहस्थ जीवन व्यतीत करने लगा। कुछ दिनों के बाद ब्राह्मण की पत्नि भगवान के वरदान के अनुसार गर्भावस्था को प्राप्त हुई और नवमास व्यतीत होने पर उसने पुत्र रत्न को जन्म दिया। अत्यंत सुंदर और सभी लक्षणों से युक्त ऐसे पुत्र को प्राप्त कर पति, पत्नि दोनों को महान आनंद हुआ। ब्राह्मण सुदेव ने यथा समय विद्वान ब्राह्मणों को बुलाकर बालक का जात कर्मसंस्कार किया। और अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को वस्त्र, पात्र, दक्षिणा दिया और याचक गरजियों को भी दान देकर संतुष्ट किया, बारहवें दिन ज्योतिष शास्त्र को जानने वाले विद्वानों के द्वारा बालक का नामकरण संस्कार करके शुकदेव, ऐसा नाम रखा गया।

वह बालक शुकदेव अपने मातापिता की सेवा में दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा। जैसे जैसे दिन बीतने लगे वैसे वैसे बालक के अंग प्रत्यंग सुंदर और बलवान होते गए। अपने उम्र के बालकों के साथ वह बालक्रीड़ा में आनंदित रहने लगा। उस बालक को देख-देखकर मातापिता हमेशा आनंदित होते थे। पांचवर्ष बीतने पर उसको अक्षरांभ कराके विद्याध्ययन कराने लगे वह बालक विद्याध्ययन में अत्यंत प्रवीण होकर अनेक विद्याओं को सीखने में तत्पर रहने लगा। जब आठवां वर्ष प्रारंभ हुआ तब ब्राह्मण सुदेव के मन में बालक के यज्ञोपवीत संस्कार करने की अभिलाषा उत्पन्न हुई। इसी प्रेरणा से उसने शुभ मुहूर्त देखकर योग्य विद्वान ब्राह्मणों ने बालक शुकदेव को गायत्री मंत्र का उपदेश देकर उसका संस्कार करा दिया। इस संस्कार में भी सुदेव ने ब्राह्मणों को दान दक्षिणा तथा याचकों को भी बहुत सा दान देकर संतुष्ट किया। इस संस्कार के प्रभाव से बालक के शरीर में सूर्य के तेज से तेजस्विता उत्पन्न होकर शरीर अत्यंत प्रखर होकर बढ़ने लगा। बालक को वेदाध्ययन के लिये गुरु के पास भेजने लगे। बालक कुशाग्र बुद्धि होने से शीघ्र ही वेदपाठ में प्रवीण होने लगा और अनेक शास्त्रों का अध्ययन करने लगा।

बालक की दिनचर्या को देखकर ब्राह्मण पति पत्नि अपने आपको भाग्यशाली और धन्य समझने लगे। इस प्रकार सुख पूर्वक समय व्यतीत हो रहा था। ऐसे ही एक दिन उस ब्राह्मण के आश्रम में देवल नाम के ऋषि का आगमन हुआ उनको देखकर सुदेव बड़े प्रसन्न हुए और उनको नमस्कार कर आदर सहित पाद्य अर्घ्य देकर उत्तम आसन पर विराजमान किया। उसी समय बालक शुकदेव ने भी आकर मुनि के चरणों में मस्तक रखकर दंडवत नमस्कार किया। बालक को शुभाशिष देते हुए ऋषि ने उसको अपने पास बैठाया और उसकी प्रशंसा करते हुए ब्राह्मण सुदेव से कहते हैं कि हे सुदेव तू धन्य है जो तूने सभी सुंदर लक्षणों से युक्त ऐसे बालक का पिता होने का सौभाग्य प्राप्त किया। बुद्धि में प्रखर वेद और विद्याध्ययन में प्रवीण ऐसे बालक शायद ही कहीं देखने में आते हैं। इस प्रकार बालक की प्रशंसा करते हुए ऋषि बालक के हाथ को अपने हाथ में लेकर उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि ब्राह्मण सुदेव इस बालक का सुंदर और पुष्ट शरीर, घुटने तक लंबी भुजाएं, कान तक लंबे नेत्र, शंख के समान कंठ, विनय और काले घुंघराले बाल, ऊंचा वक्षस्थल, पुष्ट कंधे, हास्य मुख इन सभी लक्षणों से संपन्न यह बालक है परंतु एक ही कुलक्षण का संकेत इसकी हस्त रेखा में है जो तुम्हारे लिये महान दु:खदायी है। जिसके सामने सब सुलक्षण व्यर्थ होंगे।

दीर्घश्वास छोड़ते हुए ऋषि कहते हैं। हे सुदेव यह बालक अतिअल्प आयु वाला है बारहवर्ष की आयु में यह पानी में डूबने से मृत्यु को प्राप्त होगा। परंतु तुम अपने मन में दु:ख मत करो जो होने वाला है वह होकर रहेगा। उसको कोई रोक नहीं सकता। ऐसा कहकर देवल ऋषि वहां से निकल गए। ऋषि के जाने पर उनके शब्दों को याद कर ब्राह्मण पति पत्नि दोनों अति दु:ख से मूर्छित हो गए, कुछ देर बाद होश आने पर पुत्र को गोद में लेकर प्यार करके दु:ख भरे स्वर में ब्राह्मणी पति से कहती है, हे प्राणनाथ धैर्य धारण करें जो होने वाला है उसके विषय में सोचना व्यर्थ है। बड़े-बड़े देवताओं को भी समयानुकूल दु:ख और कष्ट भोगना पड़ा है। महान पराक्रमी दैत्यराज बली हिरण्याक्ष वृत्रासुर कार्तवीर्य जैसे राजाओं को भी मृत्यु ने नहीं छोड़ा तो मनुष्य की क्या शक्ति है जो रोक सके।

जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार बृहन्नारदीय

पद्याधारे सप्तमो ऽ ध्याय: समाप्त ॥

(७)

॥ शुभम भवतु ॥






Adhik mass ki Katha 6 adhyaya| अधिक मास की कथा छठा अध्याय


Adhik mass ki Katha 6 adhyaya| अधिक मास की कथा छठा अध्याय 


॥ अथ षष्ठोऽध्यायः प्रारंभः ॥

॥ श्री गणेशाय नमः ॥

श्री व्यासजी अपने श्रोतागणों से तथा सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं कि हे ऋषियों! भगवान नारायण के मुखारबिंद से इतनी कथा सुनकर नारदजी बहुत प्रसन्न हुए तथा हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना करते हैं कि हे महाराज! मुझे राजा दृढ़धन्वा का संपूर्ण इतिहास सुनाइये। नारदजी के वचनों को सुनकर भगवान नारायण कहते हैं कि हे नारद! गंगाजी के किनारे बसा हुआ हैहय नाम का एक प्रदेश था। उस राज्य में महापराक्रमी सात्विक प्रकृति वाला चित्रधर्मा नाम का राजा राज्य करता था। वह अपनी शक्ति और पराक्रम के कारण सारे संसार में प्रसिद्ध था। उस राजा को अपनी रानी द्वारा एक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह पुत्र भी सुंदर शरीर व आकृतिवाला विशाल नेत्रोंवाला सभी गुणों से युक्त था। राजा ने अपने पुत्र का नाम विद्वानों की सम्मति से दृढ़धन्वा रखा। वह पुत्र दिन प्रतिदिन चंद्रकला के समान बढ़ने लगा। बाल्यावस्था व्यतीत होने पर राजा ने पुलह ऋषि के आश्रम में विद्याध्ययन के लिये भेजा। वह बालक अत्यंत प्रखर बुद्धिमान होने से शीघ्र ही राजनीति और चौदह विद्याओं में पारंगत हो गया। उसका संपूर्ण शरीर बल शौर्य से परिपूर्ण होकर युवावस्था में प्रवेश किया।

विद्याध्ययन पूर्ण होने पर गुरु की आज्ञा से राजपुत्र अपने राज्य में आकर पिता के साथ राज्यकार्य में सहयोग देने लगा। राज्य की समस्त प्रजा से नीति और धर्मपूर्वक व्यवहार करने से वह समस्त प्रजाजनों की प्रशंसा का पात्र बन गया। पिता चित्रधर्मा ने पुत्र को सर्वगुण संपन्न देखकर पुस्कर राज्य की राजकन्या जो कि अत्यंत सुंदर सुशील थी उसके साथ पुत्र दृढ़धन्वा का विवाह बड़े उत्सव के साथ संपन्न कर दिया। विवाह के पश्चात राजा दृढ़धन्वा को चार पुत्र और एक कन्या उत्पन्न हुई। उनका क्रमशः नामकरण चित्रवाक, चित्रबाहु, मणिमान, और चित्रकुंडल नाम रखा तथा कन्या का चारुमती नाम रखा। वे सभी बालक अत्यंत सुंदर और शुभलक्षणों से युक्त और सर्वगुण संपन्न थे। राजा चित्रधर्मा ने अपने पुत्र को सर्व संपन्न और प्रजापालन में कुशल देखकर सांसारिक मायामोह से मन को विरक्त करके परंपरा से चल रही नीतिका अनुसरण करना उचित समझा कि अब वृद्धावस्था का समय भगवान की आराधना में लगाकर अपनी आत्मा का उद्धार करना चाहिए।

ऐसा सोचकर पुत्र दृढ़धन्वा को राजतिलक करके राज्य सिंहासन और राज्य का समस्त कार्य सौंपकर पुलह ऋषि के आश्रम में जाकर तपस्या करने लगा। अंतःकरण में भगवान का चिंतन करके कठिन तपस्या प्रारंभ की। निंद्रा त्यागकर निराहार रहकर रातदिन भगवान का स्तवन करते रहने से राजा का शरीर अत्यंत कृश व क्षीण होकर कुछ दिनों में उन्होंने शरीर का त्याग करके उनकी आत्मा मोक्ष को प्राप्त हो गई। ऋषि के आश्रम में पिता की सद्गतिका समाचार सुनकर राजा दृढ़धन्वा को दुःख और हर्ष दोनों हुए। पितृ भक्त होने से राजा ने ब्राह्मणों की आज्ञा से पिता का और्ध्वदैहिक कर्म, श्राद्ध, पिंडदान किया तथा बहुत द्रव्य सुवर्ण, गौ आदि वस्तुओं का दान दिया। जिस याचक की जो इच्छा थी उनकी इच्छानुसार हाथी घोड़ा, पालकी, रथ, पृथ्वी, द्रव्य आदि देकर सबको प्रसन्न किया। नगर में भोज्यन्न करके हजारों ब्राह्मण और लाखों प्रजाजनों को उत्तम भोजन कराके संतुष्ट किया। पिता के समस्त और्ध्वदैहिक कर्म अत्यंत श्रद्धा के सहित संपन्न करके वह राजा दृढ़धन्वा वेद वेदांग में विद्वान धनुर्विद्या में निपुण, क्षमा में पृथ्वी के समान, गंभीरता में सागर के समान, विद्वता में ब्रह्मा के समान, उदारता में भगवान शंकर के सदृश, एक पत्निव्रत धारी शत्रुओं के समूह को पराजित करता हुआ चारों दिशाओं में अपने राज्य का विस्तार करके अखंड चक्रवर्ती राजा बन गया।

सभी राजा उसको अपने राज्य का कर देने लगे। उस राजा दृढ़धन्वा की कीर्ति, जैसे आकाश में शुक्ल पक्ष में चंद्रमा के प्रकाश के समान फैल गई। राज ऐश्वर्य दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा। संसार के सभी सुख राजा को प्राप्त हो गए। एक समय राजा रात्रि में शयनकक्ष में जाकर शयन की स्थिती में बिस्तरपर लेटा हुआ मनमें विचार करने लगा। मेरा यह अतुल वैभव, अखंड चक्रवर्ती राज्य, मुझे कौन से पुण्य से प्राप्त हुआ, मेरा यह भाग्योदय कैसे हुआ। मैंने आजतक न तो तपस्या की न व्रत उपवास किया न किसी प्रकार का दान, पुण्य, यज्ञ, हवनादि कर्म किया। फिर यह अनंत वैभव और सभी सुख कैसे प्राप्त हुए। यही विचार अंतर्मन में बारबार उत्पन्न होने से राजा को रात भर नींद नहीं आई।

ब्रह्म मुहूर्त में प्रातः एक घटीरात्रि शेष रहने पर शय्या छोड़ राजा उठा नित्य कर्मों से निपटकर उसने अनेक प्रकार के दान ब्राह्मणों और याचकों को देकर भगवान की वंदना करके चतुरंगिनी सेनासाथ में लेकर घोड़े पर सवार होकर भयानक जंगल में शिकार करने के लिये चल दिया। जंगल में सेना की हलचल को सुनकर जंगली जानवर व्याघ्र, हरिण, आदि इधर से उधर भागने लगे राजा भी तीक्ष्णबाण और अचूक निशानों से अनेक पशुओं का शिकार करते हुए उससे एक अत्यंत पुष्ट शरीर वाला मृग देखकर उसके पीछे घोड़ा दौड़ाते हुए एक तीक्ष्ण बाण उसके ऊपर चला दिया बाण तो मृग के शरीर में घुस गया परंतु फिर भी वह मृग, भागता हुआ घोर जंगल में में छिप गया। राजा उसका पीछा रक्त की धार के आधार पर करता हुआ जंगल में मृग को ढूंढने लगा परंतु छिप जाने से राजा को मृग नहीं मिला राजा उसकी तलाश में बहुत दूर निकल गया काफी देर तक इधर उधर घोड़ा दौड़ाने पर भी वह मृग नहीं मिला। राजा भी थककर प्यास के लगने से व्याकुल होकर मध्यान्ह के समय सूर्य के तापसे पीड़ित हो गया। वहां न तो राजा का कोई सेवक था जो कि राजा के लिये पानी आदि की व्यवस्था करके राजा को शांति देता। ऐसी अवस्था में राजा भटकता हुआ ऐसे स्थान पर पहुंच गया, कि उसे अत्यंत सुंदर स्वच्छ जल से भरा हुआ कमल पुष्पों से शोभित ऐसा तालाब दिखाई दिया उस तालाब को देखकर राजा ने अत्यंत प्रसन्न होकर तालाब के जल को पीकर घोड़े को भी जल पिलाया। पास ही विशाल वट वृक्ष और उसकी शीतल छाया को देखकर थोड़ी देर विश्राम करने के उद्देश्य से घोड़े को वृक्ष की जड़ से बांधकर वृक्ष की शीतल छाया में राजा विश्राम कर रहा था उसी डाली के ऊपर एक बड़ी आकृति का तोता आकर बैठा और राजा को संबोधित करके कहने लगा कि हे राजन

श्लोक : विद्यामानतुलं सुखमालोक्ययतीव भूतले।

न चिंतयसि तत्वं त्वं तत्कथं परमेष्यसि ॥

अर्थ : पृथ्वी पर ऐसा अनुपम सुख प्राप्त हुआ। परंतु इसके तत्व को आंतरिक मन से विचार करके भवसागर से कैसे पार होगे। इस प्रकार बारबार इस श्लोक को सुनकर राजा अपने मन में विचार करने लगा। यह तोता मनुष्य की वाणी में मुझे क्या शिक्षा दे रहा है। यह राजा की समझ में नहीं आ रहा था। कभी विचार करता कि जैसे राजा परीक्षित भवसागर में डूब रहा था। तब उसके उद्धार के लिये व्यास पुत्र श्री शुकदेव ऋषि ने श्री मद्भागवद् का ज्ञान देकर उद्धार किया था उसी प्रकार वही शुकदेव तोते का रूपधर कहीं मेरे उद्धार के लिये तो नहीं आए। राजा के मन में अनेक विचार उत्पन्न हो रहे थे। परंतु श्लोक का अर्थ समझ में न आने से राजा बड़ा मानसिक चिंता से घिरा हुआ था। ऐसे ही समय राजा की चतुरंगिणी सेना वहां पहुंच गई। तोता भी वहां से उड़कर अदृश्य हो गया। राजा भी अपनी सेना के साथ अपने राज भवन में आ गया। परंतु राजा के मन मस्तिष्क में रातदिन तोते का वही श्लोक गूंजता रहा। उससे राजा की ऐसी अवस्था हो गई कि राजा न तो किसी से बोलता था न किसी की बात का कोई जवाब देता था।

खाना पीना निद्रा सबका परित्याग करके एकांत में बैठा रहता था, राजा की ऐसी विषम स्थिती को देखकर उसकी पटरानी को बहुत चिंता उत्पन्न हो गई। एक दिन रानी साहस करके राजा के समीप पहुंचकर हाथ जोड़कर विनम्रता पूर्वक कहने लगी। हे प्राणनाथ आप इतने खिन्न क्यों हैं? मुझसे क्या भूल हो गई, जो आपने खानपान का परित्याग करके मौन धारण कर लिया। आपकी अवस्था देखकर मुझे अत्यंत दारुण दुःख हो रहा है। इसलिये हे प्राणनाथ मेरे ऊपर दया करके आप भोजन करिए, प्रसन्न होकर कुछ बात करिए। बारबार रानी के आग्रह करने पर भी राजा पर कोई असर न होकर राजा उसी प्रकार निश्चल बैठा रहा राजा के मन में तोते का कहा हुआ श्लोक ही विचार का कारण बना रहा।

पत्नी की ऐसी अवस्था देखकर रानी बहुत दुःखित होकर मछली की तरह तड़पने लगी। उसके कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। कुछ दिन ऐसे ही व्यतीत हो गए। ऐसे ही समय अचानक रामायण ग्रंथ के रचयिता वाल्मीकि ऋषि भ्रमण करते हुए उस राजा के राजमहल में पधारे। दूतों के द्वारा ऋषि का आगमन सुनकर राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे संतों के पैर जल्दी मुख्यद्वार पर आकर ऋषि के चरणों में नमस्कार करके आदरपूर्वक महल के भीतर ले जाकर उत्तम सिंहासन पर बैठाकर चरण प्रक्षालन करके अर्घ्य देकर ऋषि का पूजन किया और कहने लगा। हे ऋषिवर आज मैं अपने आप को बड़ा भाग्यवान समझता हूं। आज मेरा जन्म सफल हो गया। सारे संसार को अपने तपोबल से पवित्र करनेवाले आप जैसे महान ऋषि के आगमन से मैं धन्य हो गया। राजा के ऐसे प्रार्थनीय वचनों को सुनकर ऋषि प्रसन्न होकर कहते हैं कि हे राजन मैं तेरे आदर सत्कार से बहुत प्रसन्न हूं। संसार में जैसी तेरी प्रसिद्धि थी वैसा ही तू है।

परंतु हे राजन मैं तुझे अत्यंत चिंतातुर देख रहा हूं। मुझे अपनी चिंता का कारण बता मैं तेरी समस्त चिंताओं को दूर करूंगा। ऋषि के प्रश्न करने पर राजा ने कहा हे ऋषिवर आपके चरणों की कृपा से मुझे सभी सुख प्राप्त हैं। किसी प्रकार की कमी नहीं है। परंतु मेरे मन में एक शंका उत्पन्न हो गई है। जो मेरे हृदय में शूल की तरह चुभती रहती है। आप सिर्फ उस शंका का निवारण कर दीजिये बड़ी कृपा होगी। हे ऋषिवर कुछ दिनों पहले मैं शिकार करने गया था। घने जंगल में घूमता हुआ थक गया था। विश्रांति के लिये मैं एक बड़े वट वृक्ष के लिये लेट गया। थोड़ी ही देर में हिल्स डाली के नीचे मैं लेटा हुआ था उसी डालपर एक सुंदर और बड़ी आकृतिवाला तोता आकर बैठ गया। और बारबार यह श्लोक मनुष्य की वाणी में मुझे संबोधित करके कहने लगा। हे राजन -

श्लोक : विद्यामानतुलं सुखमालोक्ययतीव भूतले।

न चिंतयसि तत्वं त्वं तत्कथं परमेष्यसि ॥

उस तोते के द्वारा यह सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। परंतु उसका अर्थ न समझने के कारण मेरे मनमें उसी विषय में रातदिन चिंता व्याप्त है। आज मेरे पास आपकी कृपा से इतना बड़ा राज्य है। उत्तम चार पुत्र और एक कन्या है। सुंदर और पतिव्रता पत्नि है। हाथी, घोड़ा, रत्न आदि अतुल संपत्ति है। ये सब मुझे कौन से पुण्य के प्रभाव से प्राप्त हुआ। और वह तोता मुझे क्या उपदेश दे रहा था। इन सब विषयों का विचार करके मुझे विस्तार पूर्वक समझाइये। जिससे मेरे मन की शंका दूर हो जाय। राजा के वचनोंको सुनकर वाल्मीकि ऋषि ने प्राणायाम करके अपने आपको ध्यानस्थ किया और एक घटीपर्यंत ध्यानस्थ रहकर राजा के पूर्व जन्म के वृत्तांत का अवलोकन करके राजा से कहने लगे कि हे राजन तेरे सब प्रश्नों का उत्तर तेरे पूर्व जन्म से संबंधित है। इसलिये मैं तेरे पूर्व जन्म का वृत्तांत कहता हूं ध्यान लगाकर सुन। तू पूर्व जन्म में द्रविड़ देश में उत्पन्न हुआ था। जाति से ब्राह्मण और सुदेव तेरा नाम था। ताम्रपर्णी नदी के किनारे तपोवन में कुटिया बनाकर रहता था।

सत्य बोलना, धर्म में तत्पर रहकर ब्राह्मण के बालकों को वेद की शिक्षा देना यही तुम्हारा दैनिक कर्म था सदृण संपन्न पति परायण गौतमी नाम की तुम्हारी पत्नि थी। वह रातदिन पति की आज्ञा का अनुसरण करती और जैसे पार्वती शंकरजी से प्रेम करती है उसी प्रकार का प्रेम उसका अपने पति के प्रति था। इस प्रकार वह ब्राह्मण सुदेव अपने गार्हस्थ्य धर्म का पालन करता हुआ जीवन व्यतीत कर रहा था। अनेक दिन व्यतीत होने पर उन्हें कोई संतति उत्पन्न न होने से ब्राह्मण मन में दुःखित रहने लगा। एक समय ब्राह्मण अपने आश्रम में विश्राम कर रहा था और पत्नि उसकी सेवा में लगी हुई पैर दबा रही थी तब ब्राह्मण पत्नि से बोला। हे प्रिये संसार में पुत्र सुख के समान कोई सुख नहीं होता।

व्रत, तप, दान, इनका पुण्य तो मनुष्य को परलोक में सुख देता है। परंतु एक सुपुत्र इसलोक में महान सुखदाई होता है। हमको वह भी नहीं प्राप्त हो सका। मुझे तो यह जीवन निष्फल सा ही प्रतीत हो रहा है। मेरे पुत्र को गोद में नहीं खिलाया वेदाध्ययन नहीं कराया, मैं कितना भाग्यहीन हूं। मैं पितृऋण से मुक्त कैसे हो सकूंगा। मेरा यह जीवन व्यर्थ ही व्यतीत हो रहा है। ऐसे जीवन से तो मृत्यु हो जाय यही मैं चाहता हूं। पति के ऐसे दुःखमय वचनों को सुनकर भार्या गौतमी भी अपने मन में दुःखित होकर कहती है, हे प्राणनाथ ऐसे अपशब्द मत बोलिये। आप इतने ज्ञानी धर्म के तत्व को जानने वाले होकर सांसारिक मायामोह में क्यों लिप्त होना चाहते है। हे स्वामी मनुष्य के भाग्य में जो सुख नहीं है।

वह पुत्र प्राप्ति के बाद भी नहीं मिल सकता बल्कि दुःख बढ़ सकता है। पूर्व का इतिहास साक्षी है। राजा अंग भी अपने पुत्र के द्वारा ही अत्यंत दुखित होकर रात्रि में जंगल की ओर भाग गए। ऐसे ही संसार में अनेक प्रसंग घटित हुए हैं। इसलिये पुत्र के द्वारा ही सुख घटित होगा ऐसा सोचना व्यर्थ है। यदि पुत्र प्राप्ति की इच्छा ही है। तो सुपुत्र की प्राप्ति के लिये मनोवांछित फलदेने वाले ऐसे श्री विष्णु की आराधना, उपासना करना चाहिए। पत्नि के वचनों को सुनकर ब्राह्मण के मन को कुछ समाधान हुआ। वह निश्चय करके ताम्रपर्णी नदी में स्नानकरके पत्नि के साथ तपस्या में लीन हो गया। अन्न का परित्याग करके सूखे पत्ते खाकर जलपीकर रहने लगा कुछ दिनों बाद धारादित निराहार एकादिन आहार इस प्रकार कुछ दिन के बाद बिल्कुल निराहार रहकर तपस्या करता था। पत्नि भी पति की सेवा करती हुई सहयोग देती थी इस प्रकार तपस्या करते हुए चार हजार वर्ष व्यतीत हो गए। उसकी तपस्या को देखकर तीनों लोक के प्राणी थर्राने लगे। भगवान विष्णु का सिंहासन हिलने लगा। आखिर अपने भक्त की मनोकामना के लिये भगवान विष्णु को वहां प्रगट होना पड़ा श्यामल शरीर चतुर्भुजी स्वरूप प्रसन्न मुद्रावाले आराध्यदेव भगवान विष्णु को अपने प्रत्यक्ष देखकर ब्राह्मण अति प्रसन्न होकर साष्टांग दंडवत नमस्कार करता हुआ प्रार्थना करता है हे महाप्रभु दीन वत्सल जगद् का उद्धार करने वाले शरणागत की रक्षा करने वाले मैं आपकी शरण में हूं, आप मेरी रक्षा करिए मैं दुःख रूपी सागर में डूब रहा हूं। मेरे दुःख को दूर करिए। ऐसा कहता हुआ स्त्री सहित ब्राह्मण हाथ जोड़कर भगवान के सामने खड़ा रहा।

जै जै श्री अधिकमास महात्म्य सार वृहत्प्रदीय

पद्माधारे षष्ठोऽध्यायः समाप्त ॥

(६)






 


Adhik mass ki Katha 5 adhyaya| अधिक मास की कथा पांचवा अध्याय


Adhik mass ki Katha 5 adhyaya| अधिक मास की कथा पांचवा अध्याय 




 ॥ अथ पंचमो ऽ ध्यायः प्रारंभः ॥

॥ श्री गणधिपतये नमः ॥

श्री व्यासजी अपने श्रोतागणों से, तथा सूतजी शौनकादि ऋषियों से, भगवान नारायण नारदजी से तथा भगवान कृष्ण धर्मराज से कहते हैं। हे युधिष्ठिर मेधावी ब्राह्मण की कन्या बालिका के ऐसे दुःख पूर्ण शब्दों को सुनकर दुर्वासाऋषि उसको सांत्वना देते हुए कहते हैं। हे ब्राह्मण कन्या अब तू शोक मत कर तेरे दुःखों को समाप्त होने का समय शीघ्र ही आने वाला है। मैंने अपने अंतर मन में तेरे समस्त दुःखों को दूर करने वाला शीघ्र फलदाता अत्यंत गुप्त प्रयास सोचा है। तू मेरे कहे अनुसार प्रयास करने पर समस्त दुःखों से छुटकारा पा जाएगी। मेरे बताए अनुसार नियम संयम व्रत धारण करने से जन्म जन्मांतर के समस्त पातक नष्ट होकर सुखी जीवन प्राप्त करेगी। हे बालिका अब से ३ तीसरा मास जो आएगा वह मास पुरुषोत्तम नाम का मास होगा।

इस मास में थोड़ा भी शुभ और पुण्य कर्म करने से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है। तथा समस्त पाप नष्ट होकर मोक्ष की भी प्राप्ति होती है। कार्तिक आदि जितने भी मास हैं कोई इसके समान पुण्य दाता नहीं है। मास पक्ष तिथी संक्रांति सूर्य चंद्र का ग्रहण आदि जितने भी पुण्यदायक कर्म शास्त्रों में कहे गए हैं कोई भी इसके समान पुण्यदायक नहीं हैं। इसके महात्म्य का वर्णन मैं तुझसे क्या कहूं यह इतना महान है कि बारह हजार वर्ष तक गंगा स्नान करने से तथा सिंहस्त पर्व में नित्य प्रति गौदान करने से जिस पुण्य की प्राप्ति नहीं होती उससे भी ज्यादा पुरुषोत्तम मास में किसी भी कुंआ, बावली, तालाब या नदी के शुद्ध जल में स्नान करने मात्र से प्राप्त हो जाती है। यह पुरुषोत्तम मास देवताओं के भी देवता भगवान पुरुषोत्तम का अत्यंत प्रिय मास है। इस मास में जो भी मनुष्य अथवा स्त्री थोड़ा भी नियम धारण, व्रत, दान, भजनकीर्तन आदि कर्म करते हैं। वे मनवांछित फलों को प्राप्त करके अनंत पुण्य के भागीदार होते हैं। यह मेरा अनुभव किया हुआ है। इसी के प्रभाव से सारे संसार में मेरा प्रताप फैला हुआ है। इसलिये हे बालिके आनेवाले अधिकमास में मेरे कथानुसार स्नान, व्रत आदि नियम धारण करते हुए श्रद्धा पूर्वक कर्म कर जिससे तेरी समस्त इच्छाएं परिपूर्ण होंगी।

भगवान कृष्ण कहते हैं कि हे धर्मराज मेधावी ऋषिकी कन्या प्रारब्ध की मारी हुई, बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी थी। विद्वानों का मत है, जिसका भाग्य बिगड़ा हुआ होता है उसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है। अगर उसके पास कोई अमृत से भरा हुआ घड़ा लाकर देवे तो भी वह भाग्यहीन उसको साधारण पानी समझकर फेंक देगा। कोई चिंतामणि रत्न लाकर देदे तो उसको भी साधारण पत्थर समझकर फेंक देगा। अगर कामधेनु गौ दरवाजे पर आ जाय तो उसको साधारण गाय समझकर भगा देगा। दरवाजे पर कल्पवृक्ष उत्पन्न हो जाय तो उसको भी साधारण झाड़ समझकर उखाड़कर फेंक देगा। प्रारब्ध के कारण ही अभागा उल्टे कर्म करने लगता है। इसी प्रकार वह बालिका भी दुर्वासाऋषि के उपदेश को सुनकर मन से विप्र होकर कहने लगी कि आपके कथानुसार सब बातें मुझे कुछ अच्छी नहीं मालूम हुईं।

कार्तिक माघवैशाख मास इतने पुण्यदायक हैं कि शास्त्रों में उनकी प्रशंसा की गई है। इसी प्रकार भगवान शंकर की भक्ति मनुष्य को शीघ्र मोक्षपद देनेवाली है। आकाश में प्रत्यक्ष दिखने वाले भगवान सूर्य की उपासना भी महान पुण्य दायक होती है। अंबिकादेवी व गणेशजी की उपासना भी प्रत्यक्ष फलदायी होती है। इन सबको छोड़कर आप एक साधारण अधिक मास की उपासना करने को कहते हैं। जो कि संसार में मलमास कहा जाता है जिसमें सूर्य की संक्रांति नहीं होती।

समस्त शुभ कर्मों में लोग जिसका परित्याग कर देते हैं। ऐसे निंदनीय मासकी उपासना करने का उपदेश मुझको देते हैं। मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है आपके उपदेश को सुनकर। संसार में सर्वश्रेष्ठ कहे जानेवाले भगवान विष्णु श्री शंकरजी तथा सीतापति राम क्या इनकी भक्ति मेरे दुःखों को दूर नहीं कर सकती जो आप क्षुद्र और मलिन तथा निंदनीय अधिकमास की भक्ति करने का उपदेश देते हैं। बालिका के ऐसे वचनों को सुनकर दुर्वासाऋषि अत्यंत क्रोधित हो गए। उनके नेत्र लाल हो गए। परंतु उन्होंने अपने क्रोध का शमन करते हुए मन में विचार किया कि यह मेरे मित्र मेधावी की कन्या है। तथा प्रारब्ध की मारी हुई बुद्धि से भ्रष्ट हो गई है। दुःखअग्नि से पीड़ित है। मेरे द्वारा दिए हुए श्राप को यह कैसे सहन कर सकेगी। ऐसा सोचकर श्री दुर्वासाऋषि उससे कहते हैं कि हे बालिका तूने बड़ा भारी अपराध किया जो कि पुरुषोत्तम मास की अवहेलना व निंदनीय वचन कहे। अगर कोई तेरी जगह दूसरा होता तो मैं उसे अभी श्राप दे देता। परंतु तू मेरे मित्र की कन्या और पितृहीन और अत्यंत दुःखित है इसलिये मैं तुझे श्राप नहीं देता हूं। परंतु किए हुए अपराध का प्रायश्चित तुझे भोगना पड़ेगा।

दुर्भाग्य के कारण बुद्धि भ्रष्ट होने से तूने परम पुण्यदाता पुरुषोत्तममास की निंदा की है। इसका परिणाम इस जन्म में अथवा अगले जन्म में तुझे भोगना पड़ेगा। क्या करना उचित है अथवा अनुचित है तू अपनी बुद्धि से निर्णय कर। भगवान तेरा कल्याण करें। अब मैं बदरिकाश्रम की ओर जा रहा हूँ। ऐसा कहकर श्री दुर्वासाऋषि वहां से चल दिए। उनके जाते ही वह बालिका निस्तेज हो गई। तथा अपने भविष्य पर विचार करने लगी। अनेक दिन सोच विचार में व्यतीत हो गए। परंतु किसी बात का निर्णय नहीं कर सकी। आखिर एक समय उसने निश्चित किया कि सभी देवताओं में शीघ्र फलदाता भगवान शंकर माने जाते हैं। उन्हीं की तपस्या और आराधना करना चाहिए। ऐसा निश्चय करके वह ब्राह्मण कन्या ने अत्यंत दुष्कर तपस्या करना प्रारंभ कर दिया। समस्त जगत के स्वामी पांचमुख वाले दशभुजा और तीननेत्रोंवाले व्याघ्राम्बर धारण किए हुए। मस्तक में अर्धचंद्र है तथा जटाओं में गंगाजी प्रवाहित हो रही हैं।

ऐसे पार्वतीपति, अनाथों के नाथ, असहाय की रक्षा करने वाले भगवान शंकर की भयंकर कष्ट साध्य तपस्या करने लगी। ग्रीष्म ऋतु में अपने आसन के चारों तरफ अग्नि जलाकर पंचाग्नि साधन करते हुए तपस्या की। तथा वर्षा ऋतु में भयंकर वर्षा में खुले मैदान में आसन लगाकर साधना की। तथा हेमंत और शिशिर ऋतु में जब भयानक ठंड रहती है। तब भी उसने साधना की। प्रातः सायंकाल नित्य नियम धारण करके भोजन का परित्याग करके सूखे पत्तों का आहार करती कुछ दिनों के बाद इसका भी परित्याग करके अधोमुख होकर सिर्फ धूम्रपान करके निंदा का परित्याग करके रात दिन तपस्या में लीन रहने लगी उसका संपूर्ण शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया। मुख पर तपस्या का तेज प्रकाशित होने लगा। उस बालिका की ऐसी उम्र तपस्या और साधना के द्वारा उत्पन्न तेजस्विता को देखकर इंद्रदेव अत्यंत भयभीत रहने लगे कि कहीं यह बालिका मेरा इंद्रसन प्राप्त करने के लिये तो तपस्या नहीं कर रही। ऐसी चिंता उत्पन्न होने से इंद्रने उसकी तपस्या में अनेक बाधाएं डालने की कोशिश की। परंतु वह बालिका इन सब बाधाओं से विचलित नहीं हुई। तथा एकाग्रता से अपनी साधना में लगी रही।

इस प्रकार साधना करते हुए, नौ हजार वर्ष व्यतीत हो गए। उसकी भयंकर तपस्या और साधना से भगवान शंकर का आसन हिलने लगा। आखिर भगवान शंकर को अपने भक्त के सामने प्रकट होना पड़ा। उस समय उनका स्वरूप अत्यंत प्रसन्न स्फटिक मणि के समान गौर वर्ण, पांचमुख, व दशभुजावाले नीलकंठ और पिंगट जटावाले जटाओं से गंगाजी बह रही हैं। मस्तक पर चंद्रकला सुशोभित है। तीन नेत्रों वाले गले में मुंडमाला हांथ में त्रिशूल धारण किए हुए व्याघ्रचर्म से व्याप्त सारे शरीर में भस्म का लेपन नाग का यज्ञोपवीत अत्यंत तेजस्वी स्वरूप द्वारा भगवान शंकर प्रगट हुए। उनके स्वरूप को देखकर बालिका अत्यंत प्रसन्न हो गई। जे जे जै चंद्रमौली देवाधिदेव ऐसा कहते हुए भगवान के चरण कमलों में अपना मस्तक झुकाकर साष्टांग नमस्कार करने लगी। उससे मन ही मन उनका पंचोपचार पूजन किया और उनके सामने प्रसन्न- चित होकर हाथ जोड़कर खड़ी रही।

शंकर जी उससे कहते हैं। हे बालिका मैं तेरी साधना से अत्यंत प्रसन्न हूँ तुझे वरदान देने यहां आया हूं तेरे मन में जो भी इच्छा हो वर मांग। मैं तेरी समस्त इच्छाओं को परिपूर्ण करूंगा। भगवान के ऐसे वचनों को सुनकर बालिका बहुत प्रसन्न होकर कहती है। हे दया के सागर मेरी मनोकामना आप पूर्ण करें मुझे पति दे पति दे पति दे। मैं पति के सिवा कुछ भी नहीं चाहती। मुझे सिर्फ पति का वरदान चाहिये। इसके सिवा मेरे मन में कुछ भी इच्छा नहीं है। उसके ऐसे वचनों को सुनकर भगवान शंकर कहते हैं। हे बालिका तूने अपने मुख से जितनेबार जो मांगा है। वही तुझे प्राप्त होगा। तूने पांच बार पति शब्द का उच्चारण किया है इसलिये तुझे पांच पति होते का वरदान मैं देता हूं। हे बालिका तेरे पांचों पति शूरवीर, प्रतापी, सत्यप्रतिज्ञा वाले, धार्मिक, अनेक यज्ञों को करने वाले, जितेंद्रीय, सारे संसार में प्रसिद्ध, यशस्वी, कीर्तिमान, क्षत्रिय जाति के तुझ से अत्यंत प्रेम करने वाले होंगे।

शंकर जी के ऐसे वरदान को सुनकर बालिका दुःखित होकर कहती है, हे प्रभु मैं आपकी भक्त होकर मेरे लिये ऐसा निंदनीय वरदान क्यों दे रहे हैं। हे दया के सागर एक स्त्री का एक ही पति होता है आज तक संसार में कभी भी एक स्त्री के पांच पति नहीं हुए। न तो सुना गया न आज तक ऐसा देखा गया है। एक पुरुष को अनेक स्त्रियां हो सकती हैं, हुई हैं। परंतु एक स्त्री का दूसरा पति नहीं हो सकता, फिर मैं पांच पति की पत्नि कैसे बन सकूंगी। आपको अपने भक्त के प्रति ऐसा वरदान शोभा नहीं देता। मेरी निंदा के साथ आपकी भी संसार निंदा करेगा। बालिका के वचनों को सुनकर भगवान शंकर कहते हैं, मेरा यह वरदान इस जन्म में नहीं अगले जन्म में तुझे प्राप्त होगा। तुझे इस शरीर से छुटकारा मिलने पर तेरा दूसरा जन्म बिना योनि के होगा और मेरे दिए वरदान के मुताबिक पांच पतियों का सुख प्राप्त कर अनेक राजसी ऐश्वर्यों को भोगकर तू मोक्ष को प्राप्त होगी।

दुर्वासाऋषि साक्षात मेरा ही स्वरूप है। तूने उनके शब्दों का अपमान किया वे अत्यंत क्रोधी हैं। यह तो तेरा सौभाग्य था जो उन्होंने तुझे श्राप नहीं दिया, अपने क्रोध का शमन कर दिया। तूने लोक में ऐसा कोई सामर्थ्यवान नहीं है जो उनके श्राप से बच सके। उनके वचनों को याद कर उन्होंने कहा था कि पुरुषोत्तम की निंदा करने से तुझे प्रायश्चित भोगना पड़ेगा। हे बालिका भगवान पुरुषोत्तम हम लोगों के भी देवता हैं। हम लोग ब्रह्मा, विष्णु और मैं तथा अनेक तपस्वी सिद्ध योगी नारदादी ऋषि सभी उनकी उपासना करते हैं। ऐसे भगवान पुरुषोत्तम का अत्यंत प्रिय मास पुरुषोत्तम मास है। उन्होंने अपना नाम, शक्ति आदि सभी कुछ उसको दे दी है। वह निंदा पात्र हो ही नहीं भगवान की हुई, इसी कारण तेरी आकांक्षा में भ्रम पैदा होकर तेरे पांच बार पति शब्द का वरदान मांगा और मैंने दिया। अब यह वचन असत्य नहीं हो सकता। ऐसा कहकर भगवान शंकर वहां से अंतर्ध्यान हो गए।

उस समय बालिका की ऐसी दयनीय अवस्था हो गयी। कि शरीर भय से कांपने लगा सांस जोर से चलने लगी। मुख का तेज लुप्त हो गया। नेत्रों से आंसुओं की धारा बहने लगी। सारा शरीर तप्त होकर जलने लगा। चिंताग्नि के भड़काने से वह कोमल विप्रबाला थोड़े दिनों में जर्जर शरीर वाली हो गई। तथा कुछ दिन मानसिक दुःख में लिप्त बालिका काल के विकराल काल में समा गई अर्थात मृत्यु को प्राप्त हो गई। तपस्या के प्रभाव से उसके समस्त पाप नष्ट हो चुके थे। उसके शरीर को आश्रम के समीप रहने वाले ब्राह्मणों ने शमशान भूमि में ले जाकर अग्नि को समर्पित कर दिया। भगवान कृष्ण कहते हैं धर्मराज उसी समय राजा द्रुपद यज्ञ कर रहे थे। उसी यज्ञ कुंड से बालिका के रूप में उत्पन्न होकर तुम्हारी पत्नि बनी। पूर्व जन्म में पांच बार पति का वरदान मांगने से भगवान के दिए वरदान से यह तुम पांच पतियों की रानी बनी। यह द्रौपदी अत्यंत पवित्र और पतिव्रता तथा मुझे अत्यंत प्रिय है। मेरी भक्त है, इसलिये उसपर मेरा विशेष प्रेम है। मैं उसका रक्षक हूं।

परंतु पूर्व जन्म में इसने पुरुषोत्तम मास की अवहेलना की थी। इसलिये उसको वनवास और कौरवों से दुःख प्राप्त हो रहा है। जिस पुरुषोत्तम मास की बड़े-बड़े देवता ऋषिमुनि हमेशा स्तुति करते हैं उसकी निंदा का प्रायश्चित तो भोगना ही पड़ेगा। तुमको उस प्रायश्चित से निवृत्त होने के लिये सर्वसुगम उपाय मैं बतला रहा हूं। आनेवाले पुरुषोत्तम मास में नियमसंयम धारण करते हुए व्रत, उपवास, स्नान, दान इत्यादि कर्म करने से तुम पांडव और द्रौपदी जन्म जन्मांतर के पापों से मुक्त तथा प्रायश्चित से भी मुक्त होकर अपना अखण्ड चक्रवर्ती राज्य, कौरवों पर विजय प्राप्त करके, अनेक यज्ञादि पुण्य कर्मों के द्वारा संसार में प्रशंसा प्राप्त करोगे। सभी प्रकार के सुख साधन प्राप्त करोगे। ऐसी प्रेरणा देते हुए भगवान कृष्ण द्वारकापुरी जाने के लिये उद्यत हुए। उनको रथ में बैठाकर समस्त पांडव प्रार्थना करने लगे कि हे कृष्ण आप हमारे स्वामी और रक्षक हो, हम आपके दास हैं।

हमेशा इसी प्रकार हम पर कृपा दृष्टि रखना। नेत्रों में आंसू भरकर गले मिलकर उनको विदा किया। उस समय पांडव वनवास भोग रहे थे। अनेक तीर्थ यात्राओं का भ्रमण करते हुए काफी समय व्यतीत हो गया। जब पुरुषोत्तम मास आया तब कृष्ण के वचनों का स्मरण करते हुए उनकी दी हुई प्रेरणा के अनुसार नियम संयम धारण करके नित्य स्नान, व्रत, मनन, चिंतन करते हुए श्रद्धापूर्वक पुरुषोत्तम मास को व्यतीत किया, इस कर्म के द्वारा पांडवों को अनंत पुण्य की प्राप्ति हुई। द्रौपदी पुरुषोत्तम मास की अवहेलना करने के प्रायश्चित से मुक्त हो गई। इसके प्रभाव से उन्होंने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके अपना राज्य प्राप्त किया। संसार में उत्तम पराक्रम, प्रशंसा को प्राप्त कर अखण्ड चक्रवर्ती राज्य किया। अनेक यज्ञों को करके पुण्य के द्वारा मोक्ष को प्राप्त किया। सूत जी कहते हैं कि हे ऋषियों इसी प्रकार सूर्यवंश में उत्पन्न राज दृढ़धन्वा ने भी भगवान पुरुषोत्तम की आराधना करके संसार में अनेक सुखों को भोगकर मोक्ष पद को प्राप्त किया था।

जे जै श्री अधिकमास माहात्म्यसार बृहन्नारदीय पद्मपुराणे पंचमो ऽ ध्यायः समाप्त

(५)






Adhik mass ki Katha 4 adhayaya| अधिक मास की कथा चौथा अध्याय



Adhik mass ki Katha 4 adhayaya| अधिक मास की कथा चौथा अध्याय 






॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः प्रारंभः ॥


॥ श्री गणधिपतये नमः ॥
आज के कथा प्रसंग में व्यासजी श्रोताओं से, सूत जी शौनकादिक ऋषियों से और भगवान नारायण नारदजी से तथा भगवान कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि -
हे युधिष्ठिर मैंने तुमसे अधिक मास को श्रेष्ठता कैसे प्राप्त हुई और उसका पुरुषोत्तम नाम कैसे हुआ यह सब विस्तार पूर्वक कहा। अब मैं तुमसे पुरुषोत्तम मास से संबंधित तुम्हारी पत्नि पांचाली (द्रौपदी) के पूर्व जन्म का इतिहास कहता हूँ। हे युधिष्ठिर पहले किसी समय तपोवन में एक मेधावी नाम के ब्राह्मण की कन्या थी। इसकी माता बाल्यावस्था में ही स्वर्ग सिधार गई थी। पत्नि की मृत्यु के बाद मेधावी ब्राह्मण माता और पिता दोनों का प्रेम देते हुए बालिका का पालन पोषण करने लगे। बालिका भी चंद्रमा के समान सुंदर थी। पिता की सुरक्षा में बालिका दिन पर दिन बढ़ने लगी। जब वह दश वर्ष की हुई तो उसकी सुंदरता में और भी निखार आ गया। वह अत्यंत सुंदर चंद्रमा के समान गौरवर्ण तेजस्वी हिरणी जैसी आँखों वाली, रंभा के समान चपल चंचल और बुद्धिमान थी। पिताने उसके विद्याअध्ययन की उचित व्यवस्था की। बालिका प्रखर बुद्धि की होने के कारण शीघ्र ही अलंकार, साहित्य, और नीतिशास्त्र में प्रवीण हो गई। और सर्व गुण संपन्न हो गई। मेधावी ब्राह्मण के आश्रम के आसपास और भी कई ब्राह्मणों के आश्रम थे उनकी भी कन्याएं थी। उनके साथ बालिका का सखीभाव था उनमें से कई सखियों के विवाह हो चुके थे तथा पुत्रवान भी हो चुकी थी, वे सब अपने पति पुत्रों के साथ लौकिक आनंद भोग रही थी। उनके आनंद को देखकर मेधावी की कन्या के मन में भी विचार उत्पन्न होते थे मन में तर्क वितर्क होते थे। कि मुझे कैसा पति मिलेगा। मेरा कब विवाह होगा। मुझे यह सौभाग्य कब प्राप्त होगा। आदि।






मेरी युवावस्था बीत रही है। परंतु मुझे यह सुख कब प्राप्त होगा। मेरा भाग्य कहां सोया हुआ है। ऐसा सोचकर मन में चिंतित रहने लगी। मेधावी ब्राह्मण भी मन में चिंतात्तुर होते हुए कन्या को योग्य वर की व्यवस्था के लिये अनेक नगरों का स्थानों का भ्रमण करते हुए प्रयास में लगा रहा। अनेक दिन व्यतीत हो गए परंतु कन्या के लिये योग्य वर की प्राप्ति में सफलता नहीं मिल सकी। एक समय मेधावी ब्राह्मण ने कन्या को चिंतात्तुर देखकर अपने मन में निश्चय किया कि अबकी बार में योग्य वर की व्यवस्था करके ही आश्रम में वापस आऊंगा ऐसा निश्चय करके कन्या को समझाकर योग्यवर की तलाश करता हुआ अनेक नगरों का भ्रमण किया परंतु दुर्भाग्य ऐसा कि कहीं भी योग्य और समाधानकारक वर नहीं मिला। अनेक स्थानों का भ्रमण करते हुए ब्राह्मण परिश्रम से थकावट से शरीरे जर्जर होकर बुखार से ग्रसित हो गया ऐसी अवस्था में आश्रम की ओर लौट पड़ा मार्ग में चिंतित होकर विचार करने लगा कि मैंने अपनी कन्या का बड़े प्रेम से पालन पोषण किया उच्च शिक्षा दी परंतु मेरा सारा परिश्रम व्यर्थ हो गया यह कन्या का दुर्भाग्य ही मालूम होता है। इस प्रकार चिंता में ग्रस्त बुखार से पीड़ित वह ब्राह्मण आश्रम की तरफ लौट आ रहा था आश्रम थोड़ी ही दूरी पर था कि मेधावी की शारीरिक अवस्था अत्यंत दयनीय हो गई उसका शरीर बुखार की ज्वाला से जलने लगा, मस्तक में भयंकर पीड़ा होने लगी श्वास जोर जोर से चलने लगी। पैरों से चलना मुश्किल हो गया। जैसे शराबी व्यक्ति नशे की हालत में कदम बराबर नहीं रख पाता वैसे ही मेधावी की हालत हो गई ऐसी अवस्था में भी बड़े प्रयास से वह ब्राह्मण अपने आश्रम की ओर चलता हुआ आया। आश्रम कुछ कदमों की दूरी पर था कि मेधावी ब्राह्मण मूर्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा, उसके शरीर में कंपन होने लगे, हाथ पैर ठंडे पड़ गए, नेत्र बारबार बंद होते और खुलते लगे। अपना अंतिम समय देखकर मेधावी ब्राह्मण बारबार भगवान से प्रार्थना करने लगा कि हे गोविंद हे कृष्ण हे पुरुषोत्तम दीनानाथ इस समय आपके सिवा मेरा कोई रक्षक नहीं है। इस भवसागर से मुझे बचाइये मैं आपकी शरण में हूं।

इस प्रकार भगवान की प्रार्थना करता हुआ उसकी आत्मा शरीर से अलग हो गयी अर्थात वह मृत्यु को प्राप्त हो गया। अंतिम समय भगवान का स्मरण और नाम का उच्चारण करने से वैकुंठ लोक से भगवान के दूत उत्तम विमान लेकर आये और उस ब्राह्मण की आत्मा दिव्य स्वरूप धारण कराके आदर पूर्वक वैकुंठ लोक को चली गई आश्रम में कार्य करती हुई बालिका के कानों में पिता के कराहने के शब्द कानों में पड़ते ही बालिका दौड़ती हुई पिता के पास पहुंची वहां जाकर देखती हैं कि पिता मृत अवस्था में पड़ा हुआ है। ऐसा देखकर (पिता की मृत्यु) देखकर बालिका भयभीत और थरथर कांपती हुई बड़े जोर से रोने लगी पिता के शिर को गोदी पर रखकर कहती है पिताजी उठो बोलो तुम मेरे से बोलते क्यों नहीं क्या तुम मुझ से अब गए हो। नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता तुम तो मुझ से बहुत प्रेम करते थे। माता और पिता दोनों का प्रेम देकर तुमने मुझे इतना बड़ा किया, इतना विद्याअध्ययन कराया, तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकते। मैं लड़की की जात, आपके बिना मेरी देखभाल और रक्षा कौन करेगा? यहां अपना सगा कहलाने वाला भाई, बांधव कोई तो नहीं है। मेरी माता बड़ी तपस्विनी और लक्ष्मी का स्वरूप थी जो आपके पहले ही स्वर्ग चली गई। आपका यह आश्रम मुझे जंगल जैसा मालूम होता है। हे तात मुझे अकेली छोड़कर मत जाओं। आपने मेरे विवाह के उद्यम में अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। आप वापस आ जाओं। इस प्रकार बारंबार नेत्रों से आंसू बहाती जोर जोर से रुदन करती बहुत समय व्यतीत हुआ। जंगल में जैसे कुररी पक्षी निरंतर एक शब्द का उच्चारण करते हुए चिल्लाता है। उसी प्रकार बालिका निरंतर रो रही थी। उसके निरंतर रूदन को सुनकर आसपास रहने वाले अनेक ब्राह्मण और ऋषि एकत्रित हो गए। उन्होंने मेधावी के मृतशरीर को देखकर अत्यंत दुःख व्यक्त करते हुए बालिका को आश्वासन देते हुए समझाने लगे।

हे पुत्री विधि के विधान को कोई नहीं टाल सकता तेरे पिता इतनी ही आयु लेकर आए थे आयु समाप्त होने पर सभी को शरीर का त्याग करना पड़ता है। इस तरह अनेक प्रकार से समझाया सभी ब्राह्मणों ने मेधावी के शरीर को लेकर श्मशान में उसको अग्नि में समर्पित कर सबलोग नदी में स्नानकर मेधावी ब्राह्मण की आत्मा को तिलांजली देकर अपने अपने आश्रम को वापस आ गए। वह बालिका अत्यंत दुःख से परिपूर्ण अपनी अंतरात्मा में धैर्य धारण करते हुए यथा शक्ति खर्च करते हुए पिता का अंत्येष्टि कर्म, श्राद्ध, पिंडदान, दशगात्रादि कर्म किया तेरहवे दिन त्रयोदशाह कर्म ब्राह्मण भोजन आदि यथा शक्तिदान पुण्य कर्म पिता के निमित्त किया। इस कर्म से निवृत होकर रात दिन पितृ वियोग और अपने भविष्य की कल्पना में चिंतित और दुःखित रहने लगी। जैसे जल के बिना मछली की अवस्था होती है वैसी अवस्था उस समय बालिका की थी। रातदिन शोकाकुल रहने से खानापीना और निद्रा की कमी होने लगी। सूने आश्रम में बैठी हुई नेत्रों से टपटप आंसू बहाती हुई चिंता से ग्रस्त रहने लगी। इस प्रकार कुछ दिन व्यतीत हो गए। अचानक दैव योग से भ्रमण करते हुए उस तपोवन में दुर्वासऋषी ने प्रवेश किया। ऋषियों के द्वारा जब मेधावी ब्राह्मण की मृत्यु का समाचार दुर्वासऋषि को सुनाया गया तो दुर्वास ऋषि अपने मित्र की मृत्यु को सुनकर मेधावी के आश्रम की ओर चल पड़े।

भगवान कृष्ण कहते हैं कि हे युधिष्ठिर दुर्वास ऋषि अत्यंत क्रोधी थे, क्रोध में वे दूसरे शंकर ही प्रतीत होते थे। तपस्या के कारण उनके शरीर में महान तेजस्विता थी बड़ी बड़ी जटाएं शिर पर धारण किए हुए अत्यंत उग्र स्वरूप उनका दिखाई देता था। उनके क्रोध और उग्रस्वरूप से बड़े बड़े देवता भी हमेशा भयभीत रहते थे। तपस्या के द्वारा उन्होंने त्रिदशाकर्षिणी शक्ति प्राप्त की थी। मैं देवाधिदेव होने पर भी उन्होंने मुझे एक समय पीड़ित और शापित किया।

एक समय उन्होंने रथ में घोड़े की जगह मुझे और रुक्मिणी को रथ खींचने के लिये कहा और स्वंय रथपर सवार हो गए। रथ आगे बढ़ाने की आज्ञा दी। हम दोनों रथ खींचने लगे थोड़ा आगे चलने पर सुकुमारी रुक्मिणी थककर जब प्यासी हुई असह्य प्यास से कंठ सूखने लगा। परंतु दुर्वासऋषि के डर से न तो रथ रोक सकते थे, न रुक्मिणी को पानी पिला सकते थे ऐसी अवस्था में रुक्मिणी ने मुझ से असह्य वेदना प्रकट की मैंने उसकी अवस्था को देखकर चलते चलते एक जगह पृथ्वी को अंगूठे से दबाकर पाताल गंगा की धारा प्रगट कर रुक्मिणी के मुंह में पहुंचा दी। रुक्मिणी उससे तृप्त हो गई। परंतु दुर्वासऋषि ने जब यह कांड देखा तो अत्यंत क्रोधित हुए। अरेचक्रपाणि कृष्ण ये रुक्मिणी तेरी पटरानी है तुझे बहुत प्रिय है। इसीलिये तुमने मेरे अस्तित्व और मर्यादा का उल्लंघन कर पातालगंगा को प्रगट कर उसकी तृषा (प्यास) शांत की। तूने अपना पराक्रम दिखाने के लिये यह कार्य किया। परंतु इस कर्म का फल तुझे भोगना पड़ेगा तुम दोनों को वियोग का दंड भोगना पड़ेगा।

हे युधिष्ठिर इस प्रकार के वे अत्यंत क्रोधी दुर्वासमुनि मेधावी ब्राह्मण के आश्रम में पहुंचे। उनको देखकर बालिका अत्यंत प्रसन्न हो गई। दुःख का परित्याग कर मन में धैर्य धारण कर मुनि के चरणों में नमस्कार किया। उत्तम आसन पर बैठाकर पाद्य अर्घ्य के द्वारा उनका पूजन किया कंद मूल फल आदि वन में उत्पन्न होने वाली खाद्य सामग्री द्वारा भोजन कराया। फिर ऋषि को विश्राम करने के लिये उत्तम कुशासन देकर विश्राम कराया। इसके बाद बालिका हांथ जोड़कर ऋषि के समक्ष प्रार्थनापूर्वक कहने लगी हे ऋषिवर आज मेरा अहो भाग्य है। जो आप पधारे और मुझे अपने सत्कार का सौभाग्य दिया, हे अत्रिगोत्र के सूर्य आप कहां से आ रहे है। मुझ दुर्भाग्यिनी के आश्रम में कैसे पधारे। आपके आने से मैं समझती हूं मेरे सारे संकट समाप्त हो गये और मेरा भाग्योदय हो गया है। आप मुझे कल्याण देने के लिये ही पधारे हैं। आप जैसे तेजस्वी ऋषि का आगमन दर्शन बड़े भाग्य से प्राप्त होता है आपके चरण धूलिका स्पर्श करके मैं धन्य हो गई मेरा जन्म सार्थक हो गया। ऐसा कहकर बालिका हाथ जोड़कर खड़ी रही। बालिका के द्वारा सम्मान, आवभगत, और सत्कार अनुनय विनय के शब्दों द्वारा दुर्वासऋषि बहुत प्रसन्न होकर कहते हैं कि हे बालिका तूने अपने पिता के कुल का उद्धार कर दिया। मेधावी ऋषि की तपस्या का ही यह प्रभाव है जो तुझ जैसी बुद्धिमान कुशल कन्या उत्पन्न हुई। मैं कैलाश से आ रहा हूं मार्ग से जाते हुए तुम्हारे पिता के स्वर्गवास का समाचार सुनकर मुझे दुःख हुआ। मेधावी मेरे मित्र थे। तुम एकाकी हो तुम को सांत्वना और धैर्य देने के निमित्त मैं आ गया। तुम्हारी आवभगत सत्कार के द्वारा मन में प्रसन्नता हुई। तुम सचमुच पिता के कुल का गौरव बढ़ाने वाली गुणवंती कन्या हो। भगवान तुम्हारा कल्याण करें और पिता के बिछुड़ने का दुःख सहन करने की शक्ति दें। अब मैं बदरिकाश्रम जा रहा हूं। जहां साक्षात नारायण समस्त संसार के कल्याण के लिये रातदिन तपस्या करते हैं। उनके दर्शन करके फिर अपने आश्रम को जाऊंगा। हे बालिका दुःख का परित्याग करके मन में उत्तम विचारों के द्वारा स्वस्थ रहो। मुनि के वचनों को सुनकर बालिका कहती है हे ऋषिवर आपके दर्शनों से ही मेरा शोक दूर हो गया। तथा आपकी कृपा दृष्टि से भविष्य में भी मेरा कल्याण ही होगा। परंतु मेरे हृदय में जो दावाग्नि जल रही हैं। आप उसके विषय में मुझे मार्ग दिखाएं। इस संसार में मेरा बंधुबांधव अपना कहलाने वाला कोई नहीं है। जिधर देखती हूं मुझे अंधेरा ही दिखाई देता है। क्या मेरे विवाह योग्य संसार में कोई वर नहीं हैं। मेरी मध्य अवस्था व्यतीत हो रही है। यही चिंता मुझे रात दिन चैन नहीं लेने देती। मुझे भोजन भी नहीं अच्छा लगता अब मैंने निश्चय किया है कि अपने प्राणों का परित्याग कर दूंगी ऐसा कहकर बालिका दयनीय हो गई।

जै जै श्री आधिकमास महात्म्य ब्रह्नारदीय सार पदमाधारे चतुर्थोऽध्यायः समाप्त

(४)