Shrimad Bhagwad Geeta ke dusra adhyay ki katha | श्रीमद्भगवद्गीता: द्वितीय अध्याय का माहात्म्य

 श्रीमद्भगवद्गीता: द्वितीय अध्याय का माहात्म्य

श्रीभगवान् कहते हैं—लक्ष्मी! प्रथम अध्याय के माहात्म्य का उत्तम उपाख्यान मैंने तुम्हें सुना दिया। अब अन्य अध्यायों के माहात्म्य श्रवण करो।

दक्षिण दिशा में पुरन्दरपुर नामक नगर में देवशर्मा नामक एक विद्वान ब्राह्मण रहते थे। वे अतिथियों के पूजक, स्वाध्यायशील, वेद-शास्त्रों के विशेषज्ञ, यज्ञों का अनुष्ठान करने वाले और तपस्वियों के सदा ही प्रिय थे। उन्होंने उत्तम द्रव्यों के द्वारा अग्नि में हवन करके दीर्घकाल तक देवताओं को तृप्त किया, किंतु उन धर्मात्मा ब्राह्मण को कभी सदा रहने वाली शान्ति न मिली। वे परम कल्याणमय तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा से प्रतिदिन प्रचुर सामग्रियों के द्वारा सत्य-संकल्प वाले तपस्वियों की सेवा करने लगे।

इस प्रकार शुभ आचरण करते हुए उन्हें बहुत समय बीत गया। तदनन्तर एक दिन पृथ्वी पर उनके समक्ष एक त्यागी महात्मा प्रकट हुए। वे पूर्ण अनुभवी, आकांक्षा रहित, नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि रखने वाले तथा शान्तचित्त थे। निरन्तर परमात्मा के चिन्तन में संलग्न हो वे सदा आनन्दविभोर रहते थे। देवशर्मा ने उन नित्यसंतुष्ट तपस्वी को शुद्धभाव से प्रणाम किया और पूछा— 'महात्मन्! मुझे शान्तिमयी स्थिति कैसे प्राप्त होगी?'

तब उन आत्मज्ञानी संत ने देवशर्मा को सौपुर ग्राम के निवासी मित्रवान् का परिचय दिया, जो बकरियों का चरवाहा था, और कहा— 'वही तुम्हें उपदेश देगा।'

यह सुनकर देवशर्मा ने महात्मा के चरणों की वन्दना की और समृद्धशाली सौपुर ग्राम में पहुँचकर उसके उत्तर भाग में एक विशाल वन देखा। उसी वन में नदी के किनारे एक शिला पर मित्रवान् बैठा था। उसके नेत्र आनन्दातिरेक से निश्चल हो रहे थे— वह अपलक दृष्टि से देख रहा था। वह स्थान आपस का स्वाभाविक वैर छोड़कर एकत्रित हुए परस्पर विरोधी जन्तुओं से घिरा था। मृगों के झुंड शान्त भाव से बैठे थे और मित्रवान् दया से भरी हुई आनन्दमयी दृष्टि से पृथ्वी पर मानो अमृत छिड़क रहा था।

देवशर्मा ने विनम्रता से उससे आत्म-ज्ञान का उपाय पूछा। मित्रवान् ने अपनी एक घटना सुनाई:

"विद्वन्! एक समय मैं वन में बकरियों की रक्षा कर रहा था। तभी एक भयानक व्याघ्र (बाघ) आया। मैं डरकर भागने लगा, किंतु एक बकरी निडर होकर नदी के किनारे उस बाघ के पास चली गई। व्याघ्र का द्वेष मिट गया और वह चुपचाप खड़ा हो गया। बकरी ने कहा— 'व्याघ्र! तुम्हें तो अभीष्ट भोजन प्राप्त हुआ है, मेरे शरीर से मांस निकालकर प्रेमपूर्वक खाओ न।'

व्याघ्र बोला— 'बकरी! इस स्थान पर आते ही मेरे मन से द्वेष का भाव निकल गया। भूख-प्यास भी मिट गई।'

हम दोनों पास खड़े एक वानरराज के पास गए। वानरराज ने बताया कि सामने वन के भीतर जो मंदिर है, उसमें ब्रह्माजी द्वारा स्थापित एक शिवलिंग है। पूर्वकाल में वहाँ सुकर्मा नामक महात्मा रहते थे। एक बार उनके पास एक अतिथि आए। सुकर्मा की सेवा से प्रसन्न होकर उन अतिथि ने एक शिलाखंड पर गीता का दूसरा अध्याय लिख दिया और सुकर्मा को उसका पाठ करने को कहा।

सुकर्मा के अभ्यास से उनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया और उन्हें आत्मज्ञान प्राप्त हुआ। उस स्थान पर गीता के द्वितीय अध्याय के प्रभाव से ही भूख, प्यास, क्रोध और वैर-भाव का नाश हो गया है।"

मित्रवान् ने कहा— "मैंने भी उस मंदिर में जाकर शिला पर लिखे द्वितीय अध्याय को पढ़ा और उसी की आवृत्ति से मैंने तपस्या का पार पा लिया है। अतः भद्रपुरुष! तुम भी सदा द्वितीय अध्याय की ही आवृत्ति किया करो।"

श्रीभगवान् कहते हैं— प्रिये! मित्रवान् के इस प्रकार आदेश देने पर देवशर्मा ने उसका पूजन किया और पुरन्दरपुर लौट आए। वहाँ किसी देवालय में उन्होंने द्वितीय अध्याय का पाठ शुरू किया। उससे उन्हें शुद्ध अन्तःकरण और परम पद की प्राप्ति हुई।

यह द्वितीय अध्याय का माहात्म्य पूर्ण हुआ।






Mithe ras se bhariyodi radha rani laage | मीठे रस से भरीयो रे, राधा रानी लागे, राधा रानी लागे । मने कारो कारो, यमुना जी रो पानी लागे ।

 मीठे रस से भरीयो रे,

राधा रानी लागे,

राधा रानी लागे ।

मने कारो कारो,

यमुना जी रो पानी लागे ।


मीठे रस से भरीयो रे,

राधा रानी लागे,

राधा रानी लागे ।

मने कारो कारो,

यमुना जी रो पानी लागे ।


 

जमुना मैया कारी कारी,

राधा गोरी गोरी,

वृन्दावन में धूम मचावे,

बरसाने की छोरी ।

व्रजधाम राधा जी की,

राजधानी लागे,

राजधानी लागे ।

मने कारो कारो,

यमुना जी रो पानी लागे ।

मीठे रस से भरीयो रे,

राधा रानी लागे,

राधा रानी लागे ।

मने कारो कारो,

यमुना जी रो पानी लागे ।




ना भावे मने माखन मिसरी,

अब ना कोई मिठाई,

मारी जीबड़या ने भावे अब तो,

राधा नाम मलाई ।

वृषभानु की लली तो,

गुड़धानी लागे,

गुड़धानी लागे ।

मने कारो कारो,

यमुना जी रो पानी लागे ।


कान्हा नित मुरली मे तेरी,

सुमरे बारम बार,

कोटिन रूप धरे मनमोहन,

कहुँ ना पावे पार ।

रूप रंग की छबीली,

पटरानी लागे,

पटरानी लागे ।

मने कारो कारो,

यमुना जी रो पानी लागे ।

राधा राधा नाम रटत है,

जो नर आठों याम,

देखो उनकी बाधा दूर करत है,

राधा राधा नाम ।

राधा नाम मे सफल,

जिंदगानी लागे,

जिंदगानी लागे ।

मने कारो कारो,

यमुना जी रो पानी लागे ।


राधा राधा नाम रटत है,

जो नर आठों याम,

देखो उनकी बाधा दूर करत है,

राधा राधा नाम ।

राधा नाम मे सफल,

 लागे,

जिंदगानी लागे ।

मने कारो कारो,

यमुना जी रो पानी लागे ।

Manihari ka bhesh banaya | मनिहारी का भेस बनाया, श्याम चूड़ी बेचने आया |

 मनिहारी का भेस बनाया,

श्याम चूड़ी बेचने आया |


छलिया का भेस बनाया,

श्याम चूड़ी बेचने आया ||


झोली कंधे धरी,

उस में चूड़ी भरी,

गलिओं में शोर मचाया,

श्याम चूड़ी बेचने आया |


छलिया का भेस बनाया,

श्याम चूड़ी बेचने आया ||


राधा ने सुनी,

ललिता से कही,

मोहन को तुरंत बुलाया,

श्याम चूड़ी बेचने आया |


छलिया का भेस बनाया,

श्याम चूड़ी बेचने आया ||


चूड़ी लाल नहीं पहनू,

चूड़ी हरी नहीं पहनू,

मुझे श्याम रंग है भाया,

श्याम चूड़ी बेचने आया |


छलिया का भेस बनाया,

श्याम चूड़ी बेचने आया ||


राधा पहनन लगी,

श्याम पहनाने लगे,

राधा ने हाथ बढाया,

श्याम चूड़ी बेचने आया |


छलिया का भेस बनाया,

श्याम चूड़ी बेचने आया ||


राधे कहने लगी,

तुम हो छलिया बड़े,

धीरे से हाथ दबाया,

श्याम चूड़ी बेचने आया |


छलिया का भेस बनाया,

श्याम चूड़ी बेचने आया ||


मनिहारी का भेस बनाया,

श्याम चूड़ी बेचने आया |


छलिया का भेस बनाया,

श्याम चूड़ी बेचने आया ||


मनिहारी का भेस बनाया,

श्याम चूड़ी बेचने आया |


छलिया का भेस बनाया,

श्याम चूड़ी बेचने आया ||

Sakhi ri mohe laage vrindawan | सखि री मोहे लागे वृन्दावन नीको,

 सखि री मोहे लागे वृन्दावन नीको, 

घर- घर तुलसी ठाकुर पुजा, 

दर्शन गोविन्दजी को, सखि री ....॥



निर्मल नीर बहत जमुना मे,

भोजन दुध, दही, को, सखि री ....॥



रत्न सिंहासन आप विराजे,

मुकुट धरयो तुलसी को, सखि री ....॥  


कुंजन-कुंजनफिरत राधिका,

स्वर सुनत मुरली को सखि री ....॥


मीरा के प्रभु गिरधर नागर, 

भजन बिना नर फीको, सखि री ....॥

संसारका काम तो दूसरा कोई भी कर लेगा, पर अपने कल्याणका काम तो खुदको ही करना पडेगा; जैसे - भोजन और दवा खुदको ही लेनी पडती है ।

परम श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज

म्हारा रे बालाजी सालासर वाला, अवध पुरी रा श्री राम

 🙏 हनुमान जी (Hanuman Ji)

म्हारा रे बालाजी सालासर वाला, अवध पुरी रा श्री राम।

जोड़ी रो जवाब नहीं।।

म्हारा रे बालाजी ने लाल लंगोटो,

पीताम्बर श्री राम, जोड़ी रो जवाब नहीं।।

म्हारा रे बालाजी ने सवा मण रोटो,

लाडु पेड़ो श्री राम, जोड़ी रो जवाब नहीं।।

म्हारा रे बालाजी ने सिंदुर सोहे,

केशर तिलक श्री राम, जोड़ी रो जवाब नहीं।।

म्हारा रे बालाजी ने लंका जारी,

रावण मारयो श्री राम, जोड़ी रो....

म्हारा रे बालाजी भक्ति देवै,

मुक्ति देवै श्री राम जोड़ी रो जवाब नहीं....