Adhik mass ki Katha 31 adhyaya| अधिक मास की कथा 31वा अध्याय
॥ अथ एकत्रिंशत्तमोऽध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री गणधिपतये नमः ॥
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श्री भगवान नारायण नारदजी से सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं। हे ऋषियों इसके पहले कथा प्रसंग में जब उस वानर की मृगतोर्थ कुंड में पांचदिन जल में रहने के बाद मृत्यु हो गई और वानर के शरीर को त्याग जीवात्मा ने चतुर्भुजी दिव्य स्वरूप अलंकार आभूषणों से युक्त भगवान के जैसा उसका स्वरूप हो गया और उसने आकाश मार्ग से एक दिव्य विमान जिसपर भेरी मृदंग के वाद्य बज रहे थे देवांगनाएं नृत्य कर रही थी। सुवर्ण रत्न और मोतियों की झालर से सुशोभित चंद्र के समान कांतिवाला जिसपर भगवान पुरुषोत्तम के पार्षद बैठे हुए ऐसे विमान को अपने पास आकर रुकते हुए देखा तो उस दिव्य देह धारी वानर व कर्दयु की जीवात्मा अत्यंत विस्मय चकित हो सोचने लगी वह विमान यहाँ क्यों आया मुझ पापी को यह सौभाग्य कहां प्राप्त हो सकता है। अभी तो मुझे अनेक नरकों की यातना यमराज की आज्ञा से भोगनी पड़ेगी। विमान का सुख तो किसी बड़े महान पुण्यात्मा को ही प्राप्त हो सकता है।
इस प्रकार विचार कर रहा था वह जीवात्मा। तभी विमान से भगवान के पार्षद व देवांगनाएं उतरकर उस जीवात्मा के सामने नृत्य करने लगी और एक देवांगना ने उसी जीवात्मा को कभी न सूखने वाले सुगंधित पुष्पों की माला पहना दी और एक ने सोने की झारी में गंगाजल लेकर उसके सामने रख दिया और एकने रत्नों से जड़ित सोने के पानदान में ताबुल (पान का बीड़ा) सहित सामने लेकर खड़ी रही इन सब दृश्यों को देखकर वह जीवात्मा अत्यंत भयभीत होकर चित्र के समान खड़ी रह गई। और मन में सोचने लगी। मेरे जैसे दुष्ट और पापी को यह सौभाग्य कहां से प्राप्त होगा। मेरे द्वारा कोई भी पुण्य घटित नहीं हुआ। जिससे मुझे यह सुख प्राप्त हो सके। तभी पार्षद गण जीवात्मा के पास आकर उसको नमस्कार करके हांथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं।
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भोगना बाकी है। मेरे समझ में नहीं आ रहा कि मुझ से ऐसा कौन सा पुण्य घटित हुआ कि मेरे समस्त पाप नष्ट होकर यह सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। अरे यमदूतों मैं जानता हूँ कि कितनी बूंद गिरती है। पृथ्वी पर जितनी घास उत्पन्न होती है। उससे भी ज्यादा मेरे द्वारा किए गए पाप हैं। इतने पर भी मेरा यह दिव्य चतुर्भुजी स्वरूप यह विमान और मेरा यह सम्मान विमान पर बैठकर गोलोक चलने का आग्रह मेरे कुछ समझ में नहीं आ रहा कृपा करके मुझे सब समझाकर बताओं कि क्यों ऐसा घटित हो रहा है। जीवात्मा के शब्दों को सुनकर एक पार्षद (देवदूत) ने कहा है स्वामी मैं आपको बताता हूँ। यह जो महीना व्यतीत हुआ सभी महीनों में श्रेष्ठ और थोड़ा भी कर्म करने पर अनंत पुण्यदायक होता है। यह मास भगवान पुरुषोत्तम का मास कहा जाता है जो सभी देवताओं के स्वामी हैं। इस मास में घटित पुण्य प्रत्यक्ष फल देने वाला होता है।
आपसे इस मास मेंकठिन तपस्या घटित हुई है। जो कि मानव शरीर के द्वारा भी नहीं हो पाती। आपने वानर शरीर से मुख में फोड़ेहोने से निराहार रहकर इस मास को व्यतीत करने से संपूर्ण मास के व्रत का पुण्य प्राप्त किया। व जातीय चंचलता के कारण अनेक वृक्षों के फलों को तोड़कर कष्ट के कारण स्वयं न खाकर फेंक दिया जिससे अनेक जीवों पर परोपकार का पुण्य प्राप्त किया। नीचे गिरे फलों को अनेक वन्य पशुओं ने खाकर तृप्त होने से पुण्य प्राप्त किया। मुख की पीड़ा जल तक नहीं पीने से निराहार और जल रहित उपवास का पुण्य प्राप्त किया। मृगतीर्थ कुंड में पानी के भीतर ठंडक व हवा का प्रकोप सहते हुए, अंतिम पांचदिन त्रिकाल स्नान का पुण्य प्राप्त किया। यद्यपि आप से मुख में व्रण होने से अज्ञानावस्था में और जातीय चंचलता के कारण यह सब घटित हुआ है। फिर भी आपको समस्त पुण्य की उपलब्धि का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यही इस मास की विशेषता है किसी भी प्रकार से कैसी भी अवस्था में थोड़ा भी कर्म महान पुण्यदायक होता है।
जो लोग इसके माहात्म्य को जानते हुए नियम व्रत धारण करते हुए कर्म करते हैं, उनको कितना पुण्य घटित होता है इसका वर्णन चार मुखवाले ब्रह्माजी भी कहने में असमर्थ हैं। पुरुषोत्तम मास में यदि कोई एक भी व्रत कर लेवे तो उसके जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। वे लोग बड़े भाग्यशाली हैं जिन्होंने मानवशरीर धारण करके अधिक मास में स्नान व्रत जप दान आदि शुभकर्म करके व्यतीत किया। तथा जो मानवशरीर धारण करके अधिक मास व्यर्थ ही बिता देते हैं वे मूखों को धिक्कार है। देवदूतों के ऐसे शब्दों को सुनकर कर्दयु की जीवात्मा आश्चर्य चकित हो गई। फिर उसने मृगतीर्थ कुंड...
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और कालिंजर पर्वत को नमस्कार करके उस दिव्य विमान की प्रदक्षिणा करके देवदूतों के साथ विमान पर बैठकर गोलोक की ओर प्रस्थान किया जब विमान देवलोक से जा रहा था तब इंद्र आदि देवताओं ने विमान पर फूलों की वर्षा की।
वायु की गति से उड़ता हुआ विमान स्वर्ग आदि लोकों के ऊपर से होता हुआ गोलोक को पहुंचा वहां भी पार्षदों द्वारा उस जीवात्मा का स्वागत हुआ फिर देवदूत उस स्थान में पहुंचे जहां गोलोकाधिपति भगवान पुरुषोत्तम रत्न जड़ित सिंहासन पर विराजमान थे वहां पहुंचकर जीवात्मा ने भगवान पुरुषोत्तम को साष्टांग नमस्कार करके वह दिव्यज्योति भगवान के प्रकाश में लीन अर्थात चौरासी लक्ष योनियों में भ्रमण से रहित होकर मोक्ष को प्राप्त हो गई। हे नारद वह ब्राह्मण कर्दयु नीच पापी होकर भी भगवान पुरुषोत्तम के अधिकमास के पुण्य प्रभाव से उत्तम गति अर्थात मोक्ष को प्राप्त हो गया। इतना महान और अक्षय पुण्य को देनेवाला मोक्ष की सद्गति को देनेवाला अधिक मास का पुण्य सर्वश्रेष्ठ है।
सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं, हे ऋषियों भगवान नारायण के द्वारा संपूर्ण मास के माहात्म्य को सुनकर आनंद विभोर होकर बारंबार भगवान को नमस्कार करके भगवान पुरुषोत्तम का नाम स्मरण करते हुए नारदजी सत्यलोक को चले गए। हे ऋषियों आपके द्वारा किए गए प्रश्नों का उत्तर भगवान नारायण और देवर्षि संवाद के रूप में आपको सुनाया अधिक मास के समान पुण्यदाता संसार में कोई कर्म नहीं है और भगवान पुरुषोत्तम के समान मोक्ष दाता और कोई देवता नहीं है। इसलिये मानव शरीर धारण करने पर जीवात्मा को सद्गति (मोक्ष) प्राप्त करने के लिये अधिक मास में अपनी शक्ती और श्रद्धा के अनुसार कर्म अवश्य करना चाहिए क्योंकि जीवात्मा चौरासी लक्ष योनि भ्रमण करने के बाद मानव योनि प्राप्त करता है। यदि मनुष्य योनि में अपने उद्धार के निमित्त शुभकर्म नहीं किया तो माया मोह स्त्री पुत्र धन के जंजाल में फंसकर जीवन व्यतीत कर दिया तो मृत्यु के उपरांत कर्मों के द्वारा नरक की यातना और चौरासी लक्ष योनि में बारबार पैदा होना और मृत्यु होना इसी चक्कर में (घटी यंत्र) घड़ी के कांटों के अनुसार अनेक कल्पों तक जीवात्मा दुःख भोगते रहेगी। इसलिये सबसे सरल मोक्ष प्राप्ति का साधन पुरुषोत्तम मास में भगवान पुरुषोत्तम की सेवा आराधना ही सर्वश्रेष्ठ और सतत साधना है। अधिक मास में इसकी कथा तथा माहात्म्य का श्रवण करके अंत में कथावाचक ब्राह्मण की पूजा करके वस्त्र, अन्न दक्षिणा का दान करते हैं। इससे भी भगवान पुरुषोत्तम की प्रसन्नता कृपा प्राप्त होती है। इस प्रकार इस कथा को सूतजी ने शौनकादि ऋषियों को सुनाया और महर्षि वेद-व्यास ने अपने...
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श्रोतागणों को सुनाया।
(उसी संस्कृत भाषा का अनुवाद करके प्रांतीय भाषा मराठी (लवणी) भाषा में भृगुकुल में उत्पन्न रेणुका जमदग्नि से उत्तर कोंकण (महाराष्ट्र) में सह्याद्रि पर्वत की तलहटी में प्रसिद्ध राजा पुर नामक ग्राम में धूतपापेश्वर नामक शिवलिंग और मंदिर है उस मंदिर के पुजारी धगवे कुल में उत्पन्न श्री सदाशिव, उनके पुत्र श्री विट्ठल, उनके पुत्र श्री रघुनाथ शास्त्री तर्कशास्त्र और व्याकरण शास्त्र के विद्वान श्री परशुराम शास्त्री ने श्री मातापिता के चरणों का आशीर्वाद और भगवान शंकर की कृपा से प्रांतीय मराठी (लवणी) भाषा में अनुवाद किया यह शुभ कार्य शके अठारह सौ अठत्तर दुर्मुखनाम संवत्सर वैशाख शुक्ल १५ पूर्णिमा सोमवार को परिपूर्ण हुआ। इसी प्रकार भगवान पुरुषोत्तम की महान भक्त प्रत्येक अधिक मास में स्नान व्रत अखंडदीप नित्य इसकी कथा और श्री मदभागवत का श्रवण करते हुए, संपूर्ण मास श्रद्धापूर्वक व्यतीत करके अमावस को उद्यापन का विधान हवनादि कर्म यथा शक्ति दान करते हुए, उत्तर पूजन ब्राह्मण भोजन दक्षिणा आदि कर्म श्रद्धापूर्वक समस्त कर्म संपन्न करने वाली धर्म के प्रति महान रूचि रखने वाली स्व. श्री मन्शीलाल साहु की पत्नि भ. श्री. श्री केशर बाई की अथक आग्रह और इच्छा से इनके कुल पुरोहित उपमन्यु गोत्र में उत्पन्न पं. रजनीकिशोर अवस्थी के ज्येष्ठ पुत्र पं. मधुसूदन अवस्थी ने आज संवत २०५० शके १९१५ वैशाख शुक्ल १५ पूर्णिमा गुरुवार तदनुसार ता. ६ मई सन १९९३ को इस ग्रंथ को मराठी (कोंकणी) भाषा का हिंदी में अनुवाद परिपूर्ण किया।)
इस महान पुण्य कार्य में समस्त जनसमुदाय को इसका लाभ प्राप्त हो भगवान पुरुषोत्तम के प्रति श्रद्धा जागृत करके अपनी आत्मा को मोक्ष की सद्गति प्राप्त करें। कभी भी नष्ट होनेवाला पंचभौतिक शरीर और हमेशा चलायमान होने वाली लक्ष्मी जब दोनों का समागम मनुष्य के जीवन में हो तभी इन दोनों के प्रति मोहत्याग कर मनुष्य कुछ पुण्यकर्म कर सकता है। ऋषियों और महापुरुषों के इन्हीं सद्वाक्यों की प्रेरणा से जागृत होकर चौधरी परिवार में उत्पन्न (श्री केशर बाई की द्वितिय कन्या कमलाबाई व स्व. श्री बलराम चौधरी के पुत्र) श्री सतीश चौधरी ने इसे हिन्दी में अनुवादित ग्रंथ को छपाने का सर्वपुर्ण प्रयास किया।)
॥ शुभमंगल मस्तु ॥