Pitru stotram lyrics in Sanskrit and Hindi

Pitru Stotram Lyrics in Sanskrit and Hindi


उदिताम् अवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः।

असुम् यऽ ईयुर-वृका ॠतज्ञास्ते नो ऽवन्तु पितरो हवेषु॥1

जो पितर अधोलोक में हैं, जो उत्तम लोक में हैं और जो मध्यम लोक में हैं, वे सभी तृप्त होकर ऊपर उठें। जो निष्पाप और सत्य को जानने वाले प्राणों के रक्षक हैं, वे पितर इस यज्ञ में हमारी रक्षा करें।



अंगिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वनो भृगवः सोम्यासः।

तेषां वयम् सुमतो यज्ञियानाम् अपि भद्रे सौमनसे स्याम्॥2

अंगिरा, नवग्वा, अथर्वा और भृगु वंश के जो हमारे पूज्य पितर हैं, वे सभी सोम के योग्य हैं। उन यज्ञ के पात्र पितरों की सुंदर बुद्धि और कल्याणकारी कृपा दृष्टि हम पर सदैव बनी रहे।


ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासो ऽनूहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः।

तेभिर यमः सरराणो हवीष्य उशन्न उशद्भिः प्रतिकामम् अत्तु॥3

हमारे जो श्रेष्ठ पूर्वज सोमपान के अधिकारी होकर वशिष्ठ कुल में उत्पन्न हुए, उनके साथ मिलकर यमराज प्रसन्नतापूर्वक हमारे द्वारा दिए गए हवियों को ग्रहण करें।


त्वं सोम प्र चिकितो मनीषा त्वं रजिष्ठम् अनु नेषि पंथाम्।

तव प्रणीती पितरो न देवेषु रत्नम् अभजन्त धीराः॥4

हे सोमदेव! आप अपनी बुद्धि से हमें जानते हैं, आप हमें सीधे मार्ग पर ले जाते हैं। आपकी ही प्रेरणा से हमारे बुद्धिमान पितरों ने देवताओं के बीच श्रेष्ठ पद को प्राप्त किया है।


त्वया हि नः पितरः सोम पूर्वे कर्माणि चक्रुः पवमान धीराः।

वन्वन् अवातः परिधीन् ऽरपोर्णु वीरेभिः अश्वैः मघवा भवा नः॥5

हे सोम! आपके ही सहारे हमारे पूर्वजों ने बड़े-बड़े शुभ कर्म किए। आप शत्रुओं को पराजित करने वाले हैं। आप हमें वीर पुत्रों और अश्वों से संपन्न कर ऐश्वर्यवान बनाएँ।


त्वं सोम पितृभिः संविदानो ऽनु द्यावा-पृथिवीऽ आ ततन्थ।

तस्मै तऽ इन्दो हविषा विधेम वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥6

हे सोमदेव! आप पितरों के साथ मिलकर आकाश और पृथ्वी तक व्याप्त हैं। हम हवि के द्वारा आपकी सेवा करते हैं, ताकि हम धन-धान्य के स्वामी बन सकें।


बर्हिषदः पितरः ऊत्य-र्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम्।

तऽ आगत अवसा शन्तमे नाथा नः शंयोर ऽरपो दधात॥7

 हे दर्भासन पर बैठने वाले पितरों! आप हमारी रक्षा के लिए यहाँ आएँ। हमने जो हवि तैयार की है, उसे ग्रहण करें। आप हमें शांति और सुख प्रदान करें और हमारे पापों को दूर करें।

आहं पितृन्त् सुविदत्रान् ऽअवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः।

बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वः तऽ इहागमिष्ठाः॥8

मैं अपने उन विद्वान पितरों को जानता हूँ जो विष्णु के चरणों के समीप आनंदित हैं। जो कुश के आसन पर विराजमान होकर स्वधा के साथ सोम का भोग करते हैं, वे यहाँ पधारें।


उपहूताः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु।

तऽ आ गमन्तु तऽ इह श्रुवन्तु अधि ब्रुवन्तु ते ऽवन्तु-अस्मान्॥9

सोम के प्रिय पात्र जिन पितरों को हमने आमंत्रित किया है, वे इस पवित्र आसन पर आएँ। वे हमारी प्रार्थना सुनें, हमारे पक्ष में बोलें और हमारी रक्षा करें।


आ यन्तु नः पितरः सोम्यासो ऽग्निष्वात्ताः पथिभि-र्देवयानैः।

अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तो ऽधि ब्रुवन्तु ते ऽवन्तु-अस्मान्॥10

अग्नि में होम किए गए हवियों से तृप्त होने वाले हमारे पितर देवयान मार्ग से यहाँ आएँ। इस यज्ञ में स्वधा का आनंद लेते हुए वे हमारा मार्गदर्शन करें और हमारी रक्षा करें।


अग्निष्वात्ताः पितर एह गच्छत सदःसदः सदत सु-प्रणीतयः।

अत्ता हवींषि प्रयतानि बर्हिष्य-था रयिम् सर्व-वीरं दधातन॥11

हे अग्नि से पवित्र हुए पितरों! यहाँ आएँ और अपने-अपने आसन पर विराजमान हों। इस कुश पर रखे हुए हवियों को ग्रहण करें और हमें वीर पुत्रों सहित धन-संपत्ति प्रदान करें 


येऽअग्निष्वात्ता येऽ अनग्निष्वात्ता मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते।

तेभ्यः स्वराड-सुनीतिम् एताम् यथा-वशं तन्वं कल्पयाति॥12

जो पितर अग्नि में जले हैं और जो नहीं जले हैं, जो स्वर्ग के मध्य में आनंदित हैं, यमराज उन्हें उनकी इच्छा के अनुसार दिव्य शरीर प्रदान करें।


अग्निष्वात्तान् ॠतुमतो हवामहे नाराशं-से सोमपीथं यऽ आशुः।

ते नो विप्रासः सुहवा भवन्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥13

हम उन पितरों का आह्वान करते हैं जो अग्नि से तृप्त हैं और सोमपान करते हैं। वे बुद्धिमान पितर हमारी पुकार सुनें और हमें समृद्ध बनाएँ।


आच्या जानु दक्षिणतो निषद्य इमम् यज्ञम् अभि गृणीत विश्वे।

मा हिंसिष्ट पितरः केन चिन्नो यद्व आगः पुरूषता कराम॥14

हे पितरों! अपने दाहिने घुटने को जमीन पर टेककर बैठें और इस यज्ञ को स्वीकार करें। मनुष्य होने के नाते हमसे जो भी भूल-चूक हुई हो, उसके लिए हमें दंड न दें, बल्कि क्षमा करें।


आसीनासोऽ अरूणीनाम् उपस्थे रयिम् धत्त दाशुषे मर्त्याय।

पुत्रेभ्यः पितरः तस्य वस्वः प्रयच्छत तऽ इह ऊर्जम् दधात।।15

प्रातःकाल के समय विराजमान पितरों! आप इस यज्ञ को करने वाले मनुष्य को धन प्रदान करें। अपने पुत्रों को ऐश्वर्य दें और हमें शक्ति व ऊर्जा प्रदान करें।


Pitru stotram ke laabh | पितृ स्तोत्र के लाभ

पितृ स्तोत्र का पाठ हिंदू धर्म में अत्यंत कल्याणकारी और फलदायी माना गया है, विशेषकर पितृ पक्ष या अमावस्या के दिनों में इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से कुंडली में मौजूद पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और पितरों की आत्मा को परम शांति प्राप्त होती है। जब हमारे पूर्वज प्रसन्न होते हैं, तो उनके आशीर्वाद से घर में सुख-शांति का वास होता है और वंश वृद्धि में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं। अक्सर देखा गया है कि जीवन में बिना कारण आने वाली परेशानियाँ, जैसे व्यापार में घाटा, संतान प्राप्ति में देरी या परिवार में कलह, पितृ दोष के कारण हो सकती हैं, जिन्हें इस स्तोत्र के माध्यम से दूर किया जा सकता है। इसके अलावा, पितृ स्तोत्र के शुभ प्रभाव से आर्थिक तंगी खत्म होती है और व्यक्ति को कर्ज से मुक्ति मिलती है। यह स्तोत्र न केवल मानसिक शांति प्रदान करता है, बल्कि परिवार के सदस्यों की अकाल मृत्यु और गंभीर बीमारियों से भी रक्षा करता है।

पाठ विधि 

 दक्षिण दिशा की ओर मुख करके श्रद्धापूर्वक किया गया यह पाठ पितरों तक सीधे पहुँचता है और जातक के जीवन में सौभाग्य और समृद्धि लेकर आता है। तिल के तेल का दीपक लगावे नीचे तिल रखें तथा पितरों को पसंद आने वाला धुप लगावे और कुश आसन का प्रयोग करें ।


पितृ दोष मुक्ति के लिए पितृ स्तोत्र का पाठ और उसका हिंदी अर्थ





Traditional Indian wedding rituals and their significance | Indian marriage traditions

Traditional Indian wedding rituals and their significance | Indian marriage traditions


 The Beginning of Hindu Marriage Rituals

In a Hindu Marriage, the initial rituals hold immense significance as they mark the beginning of the union between two families.

1. Finalizing the Relationship (Pre-Wedding Rituals)

The journey begins with these foundational customs:

Vagdana (वाग्दान): This literally means "Giving your word" or "Oral Betrothal." In this ritual, both families give a formal promise to each other, confirming that the alliance is fixed.

Tilak / Sagai (Engagement): During this ceremony, the groom’s family usually visits the bride’s home, or both families meet at a common venue. The application of the 'Tilak' marks the official announcement of the relationship.

Kundali Milan (Horoscope Matching): According to Vedic traditions, the horoscopes (Gunas) of the couple are matched first to ensure a happy and harmonious married life.If the kundalis cannot be matched using the date of birth, they are matched based on their names (Naam Milan) to determine the auspicious time (Muhurat) for the wedding.

2. The Commencement of Wedding Ceremonies

As the wedding day approaches, the following main rituals take place first:

Ganesh Pujan (Lord Ganesha Worship): The very first ritual of any Hindu wedding is Ganesh Pujan. Since Lord Ganesha is the "Vighnaharta" (Remover of Obstacles), he is worshipped to ensure that the entire wedding is completed without any hurdles.

Haldi (Turmeric Ceremony): A paste of turmeric, oil, and water is applied to both the bride and the groom. The scientific reason behind this is to cleanse the skin and provide a natural glow for the big day.

Mehendi (Henna Ceremony): Beautiful henna designs are applied to the bride’s hands and feet. It is traditionally believed that the darker the color of the mehendi, the more love the bride will receive from her husband.

Marriage Mantras with Meaning 

Swastivachan

The meaning of Swastivachan is that may everything be good and auspicious for us."



प्रमुख देवताओं को नमन Salutations to the primary deities

"Now I will call out the names of all the Gods and Goddesses, and you have to join your hands, bow down to them, and say 'Namah'."


Mangal sloka 

"Mangal Shlokas are chanted for the smooth completion of any task and to receive divine blessings."

 (Sankalp) Sacred Vow

"Sankalp means informing God about what I am going to do and why I am doing it."

Ganesh poojan 

"Ganesh Puja is performed to remove all the problems coming into married life."

Varun poojan 

"In weddings, the Kalash is worshipped because it symbolizes 'Amrit' and the 'Entire Universe,' bringing peace, prosperity, and purity to the couple's new life."

shodash matrika poojan 

The worship of Sodas Matrika (16 Devis) is essential for the obstacle-free completion of any auspicious task and to attain good fortune, protection, and strength for the family."

navgrah Pooja 

"Navgrah Puja is performed to remove the negative effects of the planets and to achieve peace, prosperity, and success in life. Seeking blessings from the Navgrahas is essential because, according to Hindu astrology, every small or significant event in our lives is connected to the movement and positions of these nine planets."


Rakshavidhan 

"Raksha Vidhan is performed during puja to keep away all kinds of negative energies and obstacles, and to keep oneself protected."



"Every man is an embodiment of Lord Vishnu and every woman is an embodiment of Goddess Lakshmi. Their union is the meeting of Lakshmi-Narayan, which is why they are adorned. For this reason, the bride’s father worships the groom as Narayan and offers him his Lakshmi-like daughter."

Vedic Marriage Rituals

Var poojan 

Vishtar Paadyam Vishtar Arghyam Aachamani Madhupark

Gau Gau Gau

Kanyadaan

 Transfer of Responsibility

​It does not mean that a daughter is an object. The true essence is that the responsibilities of the daughter's protection, sustenance, and happiness, which the father had been fulfilling until now, are now officially being handed over to the Groom.

Continuity of Lineage and Dharma

​According to the scriptures, Kanyadaan marks the union of two families (clans). The father entrusts his daughter as an 'Ardhangini' (better half) to the groom so that they may both walk the path of Dharma (Duty), Artha (Prosperity), and Kama (Desires) together to carry forward the creation.

Emotional Sacrifice

​This is considered the greatest sacrifice (Tyag) for a father, where he joyfully entrusts a piece of his heart for the progress and prosperity of another family.


Havan Vedic Ritual Fire:

Laja Havan

In Laja Havan, the word 'Laja' refers to parched rice (Kheel). This ritual highlights the beautiful bond between a brother and a sister. During this ceremony, the bride's brother fills his sister's cupped hands with the parched rice, which the bride and groom then jointly offer into the sacred fire.

​The parched rice symbolizes fertility and prosperity. By placing the rice in his sister's hands, the brother prays that her new home always remains filled with wealth, food, and happiness. It also signifies the brother's commitment to support his sister and help her overcome any obstacles in her married life.


7 Phere

Saptapadi

ॐ एकमिषे विष्णुस्त्त्वा नयतु ॥ १ ॥ विष्णुरूप जो मैं वर हूँ अन्नादिकों की रक्षा के लिये तुझ वधू को प्रथम मण्डल में प्रथम पैर धराता हूँ। "I, the groom in the form of Vishnu, take this first step with you for the sake of food and nourishment"।

  ॐ द्वे ऊर्जे विष्णुस्त्त्वा नयतु ॥ २ ॥ विष्णुरूप जो मैं वर हूँ (ऊर्जे) बल के लिये (द्वे) दूसरे मण्डल में दूसरा पैर चलने को प्राप्त करता हूँ। "I take this second step with you for the sake of strength and energy"।

  ॐ त्रीणि रायस्पोषाय विष्णुस्त्त्वा नयतु ॥ ३ ॥ विष्णुरूप जो मैं वर हूँ (रायस्पोषाय) धनकी बढोत्तरी के लिए तीसरे मण्डल में तीसरा पैर धरा कर प्राप्त करता हूँ। "I take this third step with you for the increase of wealth and prosperity"।

  ॐ चत्वारि मायोभवाय विष्णुस्त्त्वा नयतु ॥ ४ ॥ विष्णुरूप में जो वर हूँ (मायोभवाय) सुखकी उत्पत्ति के लिए चौथे मण्डल में चौथे पैर के चलने में तुझको प्राप्त करता हूँ। "I take this fourth step with you for the attainment of happiness and joy"। 

 पञ्च पशुभ्यो विष्णुस्त्त्वा नयतु ॥ ५ ॥ विष्णुरूप मैं जो वर हूँ पशुओं के सुख के लिए पांचवें मंडल में पांचवें पैर के चलने में तुझको प्राप्त करता हूँ। "I take this fifth step with you for the welfare of cattle and animals"।

  ॐ षड् ऋतुभ्यो विष्णुस्त्त्वा नयतु ॥ ६ ॥ विष्णुरूप में जो वर हूँ छहों ऋतुओं के सुख के लिए तेरे को छठे मण्डल में पैर धरने को प्राप्त करता हूँ। "I take this sixth step with you for happiness in all the six seasons"।

  ॐ सखे सप्तपदा भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्त्वा नयतु ॥ ७ ॥ हे सखे ! विष्णुरूप मैं जो वर हूँ आपसे यह कहता हूँ कि यहाँ (भूर्भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यः) इन सात लोकों में मेरे साथ मेरी आज्ञा में होकर पतिव्रता धर्म शील से सुन्दर कीर्ति वाली हो और मेरे अनुकूल हो एवं पातिव्रत शील से उत्पन्न हुए धर्म के अनुकूल रहती हुई तू सात लोकों में विख्यात होगी। "O friend! Having taken seven steps, be my companion, follow my path, and may you be blessed across the seven worlds"।

 sun or Pole Star (Dhruva Tara)

The sun or the Pole Star (Dhruva Tara) is seen in marriage as a symbol of radiance, stability, and steadfastness so that the couple's married life and love may also remain eternally bright and unshakable.

Gauri Shankar Vivah Katha

During the wedding of Lord Shiva and Gauri, Lord Vishnu arrived with his vahana (mount), Garuda. The snakes around Lord Shiva’s neck and Garuda (who are natural enemies) started fighting with each other. To resolve this, Lord Brahma picked up a mountain and placed it between them so they could not see each other. Once the wedding rituals were successfully completed, the mountain was removed.



The story of Gauri-Shankar's wedding is told because even their divine marriage faced unexpected obstacles and chaos (like the clash of different energies). By listening to this, the couple learns that if any conflict or crisis arises in their life, they should use patience and wisdom (just like Lord Brahma did) to resolve it and keep their union strong.



Saat Phere Ke 7 Vachan

"तीर्थव्रतोद्यापनदानयज्ञान् मया सह त्वं यदि काान्त कुर्या:। वामाङ्गमायामि तदा त्वदीयं भाषेत वाक्यं प्रथमं कुमारी" ॥ १ ॥ (If you perform pilgrimages, vows, fast-conclusions, charity, and sacrifices with me, then I shall come to your left side—this is the first vow of the maiden.) 

"हव्यप्रदानैरमरान् पितृँश्च कव्यप्रदानैर्यदि पूजयेथा:। वामाङ्गमायामि तदा त्वदीयं भाषेत कन्या वचनं द्वितीयम्" ॥ २ ॥ (If you worship the gods with offerings and the ancestors with oblations, then I shall come to your left side—this is the second vow of the maiden.) 

"कुटुम्बरक्षाभरणे यदि त्वं कुर्या: पशूनां परिपालनं च। वामाङ्गमायामि तदा त्वदीयं भाषेत कन्या वचनं तृतीयम्" ॥ ३ ॥ (If you protect and maintain the family and take care of the livestock, then I shall come to your left side—this is the third vow of the maiden.) 

"आयव्ययौ धान्यधनादिकानां दृष्ट्वा गृहे चेदुचितं निदध्या:। वामाङ्गमायामि तदा त्वदीयं भाषेत कन्या वचनं चतुर्थम्" ॥ ४ ॥ (If you manage the income and expenditure of wealth and grains and ensure proper arrangements in the house, then I shall come to your left side—this is the fourth vow of the maiden.)

 "देवालयारामतडागकूपवापीर्विदध्या अथ पूजयेथा:। वामाङ्गमायामि तदा त्वदीयं भाषेत कन्या वचनं च पञ्चमम्" ॥ ५ ॥ (If you build and worship at temples, gardens, ponds, and wells, then I shall come to your left side—this is the fifth vow of the maiden.) 

"देशान्तरे वा स्वपुरान्तरे वा यदि प्रकुर्या: क्रयविक्रयौ त्वम्। वामाङ्गमायामि तदा त्वदीयं भाषेत कन्या वचनं च षष्ठम्" ॥ ६ ॥ (Whether in a foreign land or in your own city, if you engage in trade/commerce, then I shall come to your left side—this is the sixth vow of the maiden.)

 "न सेवनीया परपूर्विका स्यात् काले त्वया भाविनि भामिनीति। वामाङ्गमायामि तदा त्वदीयं भाषेत कन्या वचनं च सप्तमम्" ॥ ७ ॥ (If you promise never to seek another woman and remain devoted to your one wife, then I shall come to your left side—this is the seventh vow of the maiden.)

Var ke Vachan (Varo Brute):

​"उद्याने मद्यप्रस्थाने परगेहे गमनं तथा। परपुंसारतिर्गीतं हास्यं वर्ज्यं त्वया सदा ॥ १ ॥ अन्तर्गेहे स्थितानित्यं सुखदु:खानुभोगिनी। यदा तिष्ठसि भद्रे ! त्वं पालनीया सदा मम" ॥ २ ॥ (You must always avoid going alone to gardens, liquor shops, or others' houses, and avoid singing, laughing, or intimacy with other men; if you stay at home sharing my joys and sorrows, O lady, I shall always protect you.) 

"उद्याने सोमपाने च पितृगृहगमेऽपिच। मदाज्ञां लंघयित्वा तु न गच्छेर्यदि सुन्दरि" ॥ ३ ॥ (O beautiful one, if you do not go to gardens, drinking places, or even your father’s house by disobeying my command, then I shall protect you.)

 "सदैव सेवां कुरु मे गुरूणां मदीयचित्तानुगता च भूया:। पतिव्रताधर्मपरायणात्वं-गृहस्थकार्यं सकलं कुरुष्व" ॥ ४ ॥ (Always serve my elders, follow my thoughts, remain devoted to your husband, and perform all household duties diligently.) 

"मदीय चित्तानुगतं च चित्तं सदा मदाज्ञापरिपालनं च। पतिव्रताधर्मपरायणा त्वं कुर्या: सदा सर्वमिमं प्रयत्नम्" ॥ ५ ॥ (May your mind follow mine, always obey my commands, and strive to remain devoted to your husband in every way.)


Sindoor

According to Yoga Shastra, the spot on the forehead where Sindoor is applied is near the 'Ajna Chakra' (the third eye). When the husband applies Sindoor there, it is believed to awaken his wife's mental well-being and bring good fortune.

​Applying Sindoor in front of the sacred fire (Agni) and the gods confirms that both are now bound together socially and religiously in the bond of marriage.


traditional-indian-wedding-rituals
भारतीय संस्कृति में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो आत्माओं का पवित्र मिलन है।



geeta ke 4 adhyay ki katha | गीता के चौथे अध्याय की कथा

श्रीमद्भगवद् गीता के चौथे अध्याय का माहात्म्य

श्रीभगवान् कहते हैं—प्रिये! अब मैं चौथे अध्याय का माहात्म्य बतलाता हूँ। सुनो, भागीरथी के तट पर वाराणसी (बनारस) नाम की एक पुरी है। वहाँ विश्वनाथजी के मन्दिर में भरत नाम के एक योगनिष्ठ महात्मा रहते थे, जो प्रतिदिन आत्मचिन्तन में तत्पर हो आदरपूर्वक गीता के चतुर्थ अध्याय का पाठ किया करते थे। उसके अभ्यास से उनका अन्तःकरण निर्मल हो गया था। वे शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वों से कभी व्यथित नहीं होते थे।

एक समय की बात है, वे तपोधन नगर की सीमा में स्थित देवताओं का दर्शन करने की इच्छा से भ्रमण करते हुए नगर से बाहर निकल गये। वहाँ बेर (Ber) के दो वृक्ष थे। उन्हीं की जड़ में वे विश्राम करने लगे। एक वृक्ष की जड़ में उन्होंने अपना मस्तक रखा था और दूसरे वृक्ष के मूल में उनका एक पैर टिका हुआ था। थोड़ी देर बाद जब वे तपस्वी चले गये तब बेर के वे दोनों वृक्ष पाँच ही छह दिनों के भीतर सूख गये। उनमें पत्ते और डालियाँ भी नहीं रह गयीं। तत्पश्चात वे दोनों वृक्ष कहीं ब्राह्मणों के पवित्र गृह में दो कन्याओं के रूप में उत्पन्न हुए।

वे दोनों कन्याएँ जब बढ़कर सात वर्ष की हो गयीं, तब एक दिन उन्होंने दूर देशों से घूमकर आते हुए भरतमुनि को देखा। उन्हें देखते ही वे दोनों उनके चरणों में पड़ गयीं और मीठी वाणी में बोलीं—'मुने! आपकी ही कृपा से हम दोनों का उद्धार हुआ है। हमने बेर की योनि त्यागकर मानव-शरीर प्राप्त किया है।' उनके इस प्रकार कहने पर मुनि को बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने पूछा—'पुत्रियों! मैंने कब और किस साधन से तुम्हें मुक्त किया था? साथ ही यह भी बताओ कि तुम्हारे बेर के वृक्ष होने में क्या कारण था? क्योंकि इस विषय में मुझे कुछ भी ज्ञात नहीं है।'

तब वे कन्याएँ पहले उन्हें अपने बेर हो जाने का कारण बतलाती हुई बोलीं—"मुने! गोदावरी नदी के तट पर छिन्नपाप नामक एक उत्तम तीर्थ है, जो मनुष्यों को पुण्य प्रदान करनेवाला है। वह पावनता की चरम सीमा पर पहुँचा हुआ है। उस तीर्थ में सत्यतपा नामक एक तपस्वी बड़ी कठोर तपस्या कर रहे थे। वे ग्रीष्म-ऋतु में प्रज्वलित अग्नियों के बीच में बैठते थे, वर्षाकाल में जल की धाराओं से उनके मस्तक के बाल सदा भीगे ही रहते थे तथा जाड़े के समय जल में निवास करने के कारण उनके शरीर में हमेशा रोंगटे खड़े रहते थे। वे बाहर-भीतर से सदा शुद्ध रहते, समय पर तपस्या करते तथा मन और इन्द्रियों को संयम में रखते हुए परम शान्ति प्राप्त करके आत्मा में ही रमण करते थे।

वे अपनी विद्वत्ता के द्वारा जैसा व्याख्यान करते थे, उसे सुनने के लिये साक्षात् ब्रह्माजी भी प्रतिदिन उनके पास उपस्थित होते और प्रश्न करते थे। ब्रह्माजी के साथ उनका संकोच नहीं रह गया था, अतः उनके आने पर भी वे सदा तपस्या में मग्न रहते थे। परमात्मा के ध्यान में निरन्तर संलग्न रहने के कारण उनकी तपस्या सदा बढ़ती रहती थी। सत्यतपा को जीवन्मुक्त के समान मानकर इन्द्र को अपने समृद्धिशाली पद के सम्बन्ध में कुछ भय हुआ, तब उन्होंने उनकी तपस्या में सैकड़ों विघ्न डालने आरम्भ किये। अप्सराओं के समुदाय से हम दोनों को बुलाकर इन्द्र ने इस प्रकार आदेश दिया—'तुम दोनों उस तपस्वी की तपस्या में विघ्न डालो, जो मुझे इन्द्रपद से हटाकर स्वयं स्वर्ग का राज्य भोगना चाहता है।'

इन्द्र का यह आदेश पाकर हम दोनों उनके सामने से चलकर गोदावरी के तीर पर, जहाँ वे मुनि तपस्या करते थे, आयीं। वहाँ मन्द एवं गम्भीर स्वर से बजते हुए मृदंग तथा मधुर वेणुनाद के साथ हम दोनों ने अन्य अप्सराओं सहित मधुर स्वर में गान आरम्भ किया। इतना ही नहीं, उन योगी महात्मा को वश में करने के लिये हमलोग स्वर, ताल और लय के साथ नृत्य भी करने लगीं। बीच-बीच में ज़रा-ज़रा सा अंचल खिसकने पर उन्हें हमारी छाती भी दीख जाती थी। हम दोनों की उन्मत्त गति कामभाव का उद्दीपन करनेवाली थी, किंतु उसने उन निर्विकार चित्तवाले महात्मा के मन में क्रोध का संचार कर दिया। तब उन्होंने हाथ से जल छोड़कर हमें क्रोधपूर्वक शाप दिया—'अरी! तुम दोनों गंगाजी के तट पर बेर के वृक्ष हो जाओ।' यह सुनकर हमलोगों ने बड़ी विनय के साथ कहा—'महात्मन्! हम दोनों पराधीन थीं, अतः हमारे द्वारा जो दुष्कर्म बन गया है, उसे आप क्षमा करें।' यों कहकर हमने मुनि को प्रसन्न कर लिया।

तब उन पवित्र चित्तवाले मुनि ने हमारे शापोद्धार की अवधि निश्चित करते हुए कहा—'भरतमुनि के आने तक ही तुमपर यह शाप लागू होगा। उसके बाद तुमलोगों का मर्त्यलोक में जन्म होगा और पूर्वजन्म की स्मृति बनी रहेगी।' 'मुने! जिस समय हम दोनों बेर-वृक्ष के रूप में खड़ी थीं, उस समय आपने हमारे समीप आकर गीता के चौथे अध्याय का जप करते हुए हमारा उद्धार किया था, अतः हम आपको प्रणाम करती हैं। आपने केवल शाप से ही नहीं, इस भयानक संसार से भी गीता के चतुर्थ अध्याय के पाठ द्वारा हमें मुक्त कर दिया।'

श्रीभगवान् कहते हैं—उन दोनों के इस प्रकार कहने पर मुनि बहुत ही प्रसन्न हुए और उनसे पूजित हो विदा लेकर जैसे आये थे, वैसे ही चले गये तथा वे कन्याएँ भी बड़े आदर के साथ प्रतिदिन गीता के चतुर्थ अध्याय का पाठ करने लगीं, जिससे उनका उद्धार हो गया।




geeta ke 5 adhyay ki katha | गीता के पांचवें अध्याय की कथा

 

श्रीमद्भगवद्गीता के पाँचवें अध्याय का माहात्म्य

​श्रीभगवान् कहते हैं—देवि! अब सब लोगोंद्वारा सम्मानित पाँचवें अध्याय का माहात्म्य संक्षेपसे बतलाता हूँ, सावधान होकर सुनो। मद्रदेशमें पुरुकुत्सपुर नामक एक नगर है। उसमें पिंगल नामक एक ब्राह्मण रहता था। वह वेदपाठी ब्राह्मणोंके विख्यात वंशमें, जो सर्वथा निष्कलंक था, उत्पन्न हुआ था, किंतु अपने कुलके लिये उचित वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायको छोड़कर ढोल आदि बजाते हुए उसने नाच-गानमें मन लगाया। गीत, नृत्य और बाजा बजानेकी कलामें परिश्रम करके पिंगलने बड़ी प्रसिद्धि प्राप्त कर ली और उसीसे उसका राजभवनमें भी प्रवेश हो गया। अब वह राजाके साथ रहने लगा और परायी स्त्रियोंको बुला-बुलाकर उनका उपभोग करने लगा। स्त्रियोंके सिवा और कहीं उसका मन नहीं लगता था। धीरे-धीरे अभिमान बढ़ जानेसे उच्छृंखल होकर वह एकान्तमें राजासे दूसरोंके दोष बतलाने लगा। पिंगलकी एक स्त्री थी, जिसका नाम था अरुणा। वह नीच कुलमें उत्पन्न हुई थी और कामी पुरुषोंके साथ विहार करनेकी इच्छासे सदा उन्हींकी खोजमें घूमा करती थी। उसने पतिको अपने मार्गका कण्टक समझकर एक दिन आधी रातमें घरके भीतर ही उसका सिर काटकर मार डाला और उसकी लाशको जमीनमें गाड़ दिया। इस प्रकार प्राणोंसे वियुक्त होनेपर वह यमलोकमें पहुँचा और भीषण नरकोंका उपभोग करके निर्जन वनमें गिद्ध हुआ।

​अरुणा भी भगन्दर रोगसे अपने सुन्दर शरीरको त्यागकर घोर नरक भोगनेके पश्चात् उसी वनमें शुकी हुई। एक दिन वह दाना चुगनेकी इच्छासे इधर-उधर फुदक रही थी, इतनेमें ही उस गिद्धने पूर्व जन्मके वैरका स्मरण करके उसे अपने तीखे नखोंसे फाड़ डाला। शुकी घायल होकर पानीसे भरी हुई मनुष्यकी खोपड़ीमें गिरी। गिद्ध पुनः उसकी ओर झपटा। इतनेमें ही जाल फैलानेवाले बहेलियोंने उसे भी बाणोंका निशाना बनाया। उसकी पूर्वजन्मकी पत्नी शुकी उस खोपड़ीके जलमें डूबकर प्राण त्याग चुकी थी। फिर वह क्रूर पक्षी भी उसीमें गिरकर डूब गया। तब यमराजके दूत उन दोनोंको यमराजके लोकमें ले गये। वहाँ अपने पूर्वकृत पापकर्मको याद करके दोनों ही भयभीत हो रहे थे। तदनन्तर यमराजने जब उनके घृणित कर्मोंपर दृष्टिपात किया, तब उन्हें मालूम हुआ कि मृत्युके समय अकस्मात् खोपड़ीके जलमें स्नान करनेसे इन दोनोंका पाप नष्ट हो चुका है। तब उन्होंने उन दोनोंको मनोवांछित लोकमें जानेकी आज्ञा दी। यह सुनकर अपने पापको याद करते हुए वे दोनों बड़े विस्मयमें पड़े और पास जाकर धर्मराजके चरणोंमें प्रणाम करके पूछने लगे—'भगवन्! हम दोनोंने पूर्वजन्ममें अत्यन्त घृणित पापका संचय किया है। फिर हमें मनोवांछित लोकोंमें भेजनेका क्या कारण है? बताइये।'

​यमराजने कहा—गंगाके किनारे वट नामक एक उत्तम ब्रह्मज्ञानी रहते थे। वे एकान्तसेवी, ममतारहित, शान्त, विरक्त और किसीसे भी द्वेष न रखनेवाले थे। प्रतिदिन गीताके पाँचवें अध्यायका जप करना उनका सदाका नियम था। पाँचवें अध्यायको श्रवण कर लेनेपर महापापी पुरुष भी सनातन ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त कर लेता है। उसी पुण्यके प्रभावसे शुद्धचित्त होकर उन्होंने अपने शरीरका परित्याग किया था। गीताके पाठसे जिनका शरीर निर्मल हो गया था, जो आत्मज्ञान प्राप्त कर चुके थे, उन्हीं महात्माकी खोपड़ीका जल पाकर तुम दोनों पवित्र हो गये हो। अतः अब तुम दोनों मनोवांछित लोकोंको जाओ क्योंकि गीताके पाँचवें अध्यायके माहात्म्यसे तुम दोनों शुद्ध हो गये हो।

​श्रीभगवान् कहते हैं—सबके प्रति समान भाव रखनेवाले धर्मराजके द्वारा इस प्रकार समझाये जानेपर वे दोनों बहुत प्रसन्न हुए और विमानपर बैठकर वैकुण्ठधामको चले गये।






Shrimad Bhagwad Geeta ke dusra adhyay ki katha | श्रीमद्भगवद्गीता: द्वितीय अध्याय का माहात्म्य

 श्रीमद्भगवद्गीता: द्वितीय अध्याय का माहात्म्य

श्रीभगवान् कहते हैं—लक्ष्मी! प्रथम अध्याय के माहात्म्य का उत्तम उपाख्यान मैंने तुम्हें सुना दिया। अब अन्य अध्यायों के माहात्म्य श्रवण करो।

दक्षिण दिशा में पुरन्दरपुर नामक नगर में देवशर्मा नामक एक विद्वान ब्राह्मण रहते थे। वे अतिथियों के पूजक, स्वाध्यायशील, वेद-शास्त्रों के विशेषज्ञ, यज्ञों का अनुष्ठान करने वाले और तपस्वियों के सदा ही प्रिय थे। उन्होंने उत्तम द्रव्यों के द्वारा अग्नि में हवन करके दीर्घकाल तक देवताओं को तृप्त किया, किंतु उन धर्मात्मा ब्राह्मण को कभी सदा रहने वाली शान्ति न मिली। वे परम कल्याणमय तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा से प्रतिदिन प्रचुर सामग्रियों के द्वारा सत्य-संकल्प वाले तपस्वियों की सेवा करने लगे।

इस प्रकार शुभ आचरण करते हुए उन्हें बहुत समय बीत गया। तदनन्तर एक दिन पृथ्वी पर उनके समक्ष एक त्यागी महात्मा प्रकट हुए। वे पूर्ण अनुभवी, आकांक्षा रहित, नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि रखने वाले तथा शान्तचित्त थे। निरन्तर परमात्मा के चिन्तन में संलग्न हो वे सदा आनन्दविभोर रहते थे। देवशर्मा ने उन नित्यसंतुष्ट तपस्वी को शुद्धभाव से प्रणाम किया और पूछा— 'महात्मन्! मुझे शान्तिमयी स्थिति कैसे प्राप्त होगी?'

तब उन आत्मज्ञानी संत ने देवशर्मा को सौपुर ग्राम के निवासी मित्रवान् का परिचय दिया, जो बकरियों का चरवाहा था, और कहा— 'वही तुम्हें उपदेश देगा।'

यह सुनकर देवशर्मा ने महात्मा के चरणों की वन्दना की और समृद्धशाली सौपुर ग्राम में पहुँचकर उसके उत्तर भाग में एक विशाल वन देखा। उसी वन में नदी के किनारे एक शिला पर मित्रवान् बैठा था। उसके नेत्र आनन्दातिरेक से निश्चल हो रहे थे— वह अपलक दृष्टि से देख रहा था। वह स्थान आपस का स्वाभाविक वैर छोड़कर एकत्रित हुए परस्पर विरोधी जन्तुओं से घिरा था। मृगों के झुंड शान्त भाव से बैठे थे और मित्रवान् दया से भरी हुई आनन्दमयी दृष्टि से पृथ्वी पर मानो अमृत छिड़क रहा था।

देवशर्मा ने विनम्रता से उससे आत्म-ज्ञान का उपाय पूछा। मित्रवान् ने अपनी एक घटना सुनाई:

"विद्वन्! एक समय मैं वन में बकरियों की रक्षा कर रहा था। तभी एक भयानक व्याघ्र (बाघ) आया। मैं डरकर भागने लगा, किंतु एक बकरी निडर होकर नदी के किनारे उस बाघ के पास चली गई। व्याघ्र का द्वेष मिट गया और वह चुपचाप खड़ा हो गया। बकरी ने कहा— 'व्याघ्र! तुम्हें तो अभीष्ट भोजन प्राप्त हुआ है, मेरे शरीर से मांस निकालकर प्रेमपूर्वक खाओ न।'

व्याघ्र बोला— 'बकरी! इस स्थान पर आते ही मेरे मन से द्वेष का भाव निकल गया। भूख-प्यास भी मिट गई।'

हम दोनों पास खड़े एक वानरराज के पास गए। वानरराज ने बताया कि सामने वन के भीतर जो मंदिर है, उसमें ब्रह्माजी द्वारा स्थापित एक शिवलिंग है। पूर्वकाल में वहाँ सुकर्मा नामक महात्मा रहते थे। एक बार उनके पास एक अतिथि आए। सुकर्मा की सेवा से प्रसन्न होकर उन अतिथि ने एक शिलाखंड पर गीता का दूसरा अध्याय लिख दिया और सुकर्मा को उसका पाठ करने को कहा।

सुकर्मा के अभ्यास से उनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया और उन्हें आत्मज्ञान प्राप्त हुआ। उस स्थान पर गीता के द्वितीय अध्याय के प्रभाव से ही भूख, प्यास, क्रोध और वैर-भाव का नाश हो गया है।"

मित्रवान् ने कहा— "मैंने भी उस मंदिर में जाकर शिला पर लिखे द्वितीय अध्याय को पढ़ा और उसी की आवृत्ति से मैंने तपस्या का पार पा लिया है। अतः भद्रपुरुष! तुम भी सदा द्वितीय अध्याय की ही आवृत्ति किया करो।"

श्रीभगवान् कहते हैं— प्रिये! मित्रवान् के इस प्रकार आदेश देने पर देवशर्मा ने उसका पूजन किया और पुरन्दरपुर लौट आए। वहाँ किसी देवालय में उन्होंने द्वितीय अध्याय का पाठ शुरू किया। उससे उन्हें शुद्ध अन्तःकरण और परम पद की प्राप्ति हुई।

यह द्वितीय अध्याय का माहात्म्य पूर्ण हुआ।