Adhik maas ki Katha 2 adhyaya| अधिक मास की कथा दूसरा अध्याय



Adhik maas ki Katha 2 adhyaya| अधिक मास की कथा दूसरा अध्याय

व्यास जी कहते हैं -

प्रथम अध्याय के कथानुसार धर्मराज ने श्री कृष्णजी से प्रश्न किया, उनके प्रश्नोत्तर में रुक्मिणी रमण भगवान कृष्ण कहते हैं। हे धर्मराज तुम्हारे प्रश्न का उत्तर अत्यंत गुप्त है। जिसको कि आज तक ऋषियों ने मेरे स्त्री, पुत्र, बंधु बांधव भी नहीं प्राप्त कर सके। परंतु तुम मेरे परम भक्त हो, इसलिये मैं तुमसे इस महान पुण्य और मोक्ष दायक प्रसंग को प्रकट करता हूँ।

हे धर्मराज, संसार में कल्प, काष्ठ, लव, घटी, प्रहर रात्रि दिन प्रदोष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर युग, एवं कुंआ, बावली, झरना, तालब, नदियां, समुद्र, एवं लता, वृक्ष वनस्पति, जड़ें वन, उपवन, ग्राम, पर्वत, शहर, देवताओं के निवास और धाम इन सबका कोई न कोई देवता स्वामी है। और वे सब अपने - अपने निश्चित दिन और समय पर पूजित होते हैं। तथा जन समुदाय के द्वारा हर्ष उल्लास के द्वारा पूजन करने पर उत्तम फल देते हैं। अपने- अपने गुण और अधिकार के कारण वे पूजित होते हैं। तथा इनको अपने स्वामी का आश्रय प्राप्त होने से वे सब सौभाग्य-शाली और संसार में प्रशंसनीय माने जाते हैं।
परंतु हे धर्मराज - इन सबके मध्य एक अधिक महीना ऐसा उत्पन्न हुआ कि जिसका समय आने पर लोग अत्यंत निंदा करते तथा निंदनीय शब्दों का प्रयोग करते हुए उसको मलमास कहते एवं अधिकमास में समस्त शुभ कार्य करना छोड़ देते। क्योंकि यह महीना सूर्य की संक्रांतिहीन होता अर्थात इस महिने में सूर्य की संक्रांति न होने से यज्ञ, उत्सव, विवाह, प्रतिष्ठा, वास्तुकर्म अथवा किसी भी शुभ कार्य को नहीं करते और सभी निंदा करते। इस प्रकार सांसारिक पुरुषों की इसके प्रति अशुभ भावना थी। किसी भी शुभकार्य में वर्जित और लोगों के मन में अपने प्रति हीन व निरादर व्यवहार को देखकर इस अधिकमास के मन में अत्यंत दुःख हुआ। चिंताग्रस्त- और दुःख व्यतीत करते हुए अनेक समय बीत जाने पर जब मानसिक क्लेश असह्य हो गया तो वह विचार करने लगा कि संसार में निंदित होकर जीने से तो अपना नाम ही खत्म कर देना अच्छा है, यदि जीवित रहना है तो यश प्राप्ति के लिये किसी देवता का आश्रय [लेना आवश्यक है।]
प्राप्त करना आवश्यक है। इसके लिये संसार प्रसिद्ध शरणागत की रक्षा करने वाले भगवान विष्णु की शरण में जाकर उनसे प्रार्थना करना ही उत्तम रहेगा। ऐसा विचार निश्चय होते ही अधिक मास शीघ्र ही (वैकुंठ लोक) जहां कि शांत स्वरूप समस्त प्राणियों को जीवनदान देने वाले शरण में आए हुए की रक्षा करने वाले भगवान विष्णु हमेशा विराजमान रहते हैं।
ऐसे वैकुंठलोक में पहुंचकर जहां भगवान का निवास मंदिर है। तथा भगवान विष्णु रत्न जड़ित सिंहासन पर आनंद मग्न विराजमान हैं भगवान के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हुआ। उस समय अधिक मास भय और दुःख से कांप रहा था। तथा उसके नेत्रों से आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी। ऐसी अवस्था में थोड़ी देर खड़ा रहने के बाद अधिकमास अत्यंत कातर और दयनीय वाणी से भगवान से कहता है। हे जगन्नाथ, हे देवताओं के स्वामी, हे शरणागत वत्सल, हे दया के सागर आप मेरी ऐसी हालत देखकर भी चुप क्यों बैठे हैं मेरी रक्षा क्यों नहीं करते। मैं निराश्रित हूँ मेरा कोई स्वामी नहीं है। इसीलिये सांसारिक लोगों ने मेरा नाम (मलमास), रख दिया है। मेरी निंदा करते हैं। मेरा मास आने पर अशुभ कहकर समस्त शुभ कार्यों का त्याग कर देते हैं। हे महाप्रभु ऐसी अवस्था में मैं जीवित नहीं रहना चाहता। आप मुझे अपनी शरण में लेकर मेरी रक्षा करें अथवा इस संसार से मेरा नाम समाप्त कर दें।
हे दीनानाथ, आप तो दया के सागर हैं। गजेंद्र की करुण पुकार को सुनकर आप शीघ्र ही रक्षा करने के लिये दौड़ पड़े थे। अधिक मास के अत्यंत दयनीय वचनों को सुनकर भगवान विष्णु उसपर कृपा दृष्टि करते हुए कहते हैं। हे वत्स तू मेरी शरण में आ गया है अब तू किसी भी प्रकार का दुःख मत कर जो भी मेरी शरण में आ जाता है, मैं उसकी अवश्य रक्षा करता हूँ। मेरा यह वैकुंठ स्थान केवल आनंदमय है। यहां दुःख शोक, भय, मृत्यु कुछ भी नहीं है।
भगवान के ऐसे वचनों को सुनकर अधिक मास के सब दुःख दूर हो गये वह स्वस्थचित और आनंदित हो गया, तथा प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना करने लगा। हे सर्वज्ञ, ब्रह्माण्ड नायक, सबमें विराजमान, सारे संसार का पालन करने वाले जगत् के स्वामी आपसे संसार की कोई बात छिपी हुई नहीं है। आप अंतर्यामी हैं। फिर भी मैं आपसे अपने मन की व्यथा कहता हूँ। संसार में कला, घटी, पल, मूहूर्त दिन, रात्रि, मास, वर्ष, पक्ष, ऋतु, अयन, संवत्सर इस सबका कोई न कोई देवता स्वामी होने से समय समय पर लोगों द्वारा पूजनीय और शुभ कर्म के अधिकारी माने जाते हैं तथा अपने स्वामी [की कृपा से लोगों को आशीर्वाद देकर फलीभूत होकर जन समुदाय में यश और प्रशंसा प्राप्त करते हैं।]
के प्रभाव से लोगों को आशीर्वाद देकर फलीभूत होकर जन समुदाय में यश और प्रशंसा प्राप्त करते हैं। परंतु मैं निराश्रित और मेरा कोई स्वामी न होने से लोग मेरी निंदा करते हैं।
अशुभ और मलमास कहकर समस्त शुभ कार्यों में मेरा परित्याग करते हैं। हे महाप्रभु इसी कारण मेरी ऐसी स्थिती हुई मेरे दुःख का कोई पारवार नहीं होने से मैंने अपने मन में निश्चित कर लिया था कि ऐसा जीवित रहने से मरना ही अच्छा है। यही सोचकर मैं आपकी शरण में आया हूँ कि आप तो भगवान की प्रार्थना करता हुआ मूर्छित होकर गिर पड़ा। इसके गिरते ही भगवान की सभा में विराजमान सभी सदस्य आश्चर्य चकित रह गए कि यहां वैकुंठ धाम में कभी दुःख और शोक व्याप्त नहीं है। फिर भी यह कितना दुःखित जीव है कि यहां आनेपर भी इसका दुःख दूर नहीं हो सका, भगवान ने गरूड़जी को संकेत किया, भगवान की आज्ञा से गरूड़जी अपने पंखों से अधिकमास को हवा करके होश में लाने की कोशिश करने लगे। होश में आते ही भगवान उससे कहते हैं।
हे वत्स, उठ तेरा कल्याण होगा। तेरे समस्त दुःखों का अंत निश्चय होग। तू मेरे साथ गोलोकाधिपति भगवान पुरुषोत्तम के पास चल, वहां गोलोक में भगवान पुरुषोत्तम विराजमान हैं। वे पर ब्रह्म परमात्मा समस्त देवताओं के देवता हैं। वे दो भुजावाले पीतांबरधारी, मुरली धारण करनेवाले, भगवान पुरुषोत्तम अखंड ब्रह्माण्ड नायक हैं। उनकी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। वे चत अचल के स्वामी शरणागत वत्सल, सबके दुःखों को क्षण में नष्ट करने वाले हैं हम सभी देवता हमेशा उनकी वंदना किया करते हैं। वे संसार को उत्पन्न करने वाले, पालन करने वाले और प्रलयकर्ता भी वही हैं। ऐसा कहकर भगवान विष्णु गरूड़जी को गोलोक चलने का संकेत करते हुए अधिकमास को अपने साथ गरूड़ पर बैठाकर गोलोक में पहुंचते हैं।
भगवान कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि हे धर्मराज मैं तुमको गोलोक का वर्णन सुनाता हूँ एकाग्रचित होकर सुनो, गोलोक करोड़ों सूर्य से भी ज्यादा तेजमान है। ज्योतिस्वरूप, अनंत विशाल और स्वेच्छामय है। वह ब्रह्मलोक, विष्णुलोक, शिवलोक के ऊपर है। तीन कोटि योजन का उसका विस्तार है। वह गोल आकृति वाला है। उसमें समस्त भूमि रत्न से जड़ित है। वह स्थान बड़े बड़े महात्मा और ऋषियों को भी अप्राप्य है। भगवान पुरुषोत्तम अपने योगबल से उसको अंतरिक्ष में धारण किये हुए हैं। उसमें असंख्य मंदिर हैं गोलोक के नीचे दक्षिणी ओर सुंदर वैकुंठ लोक है। वह एक कोटियोजन लंबा [और चौड़ा है।]
और चौड़ा है। वह भगवान विष्णु का लोक है। उस लोक में भगवान विष्णु को भक्ति और उपासना करने वाले ऋषि, मुनी, तपस्वी, व सांसारिक गृहस्थ मृत्यु के बाद अपने पुण्य के प्रभाव से वैकुंठ लोक को जाते हैं। वहां चतुर्भुजी स्वरूप पीतांबर धारण करके तेजस्वी स्वरूप होकर अपने पुण्य को कर्म के अनुसार उतने समय तक वैकुंठ सुख भोगकर फिर मनुष्य योनि में जन्म लेते हैं। गोलोक के नीचे बाएं बाजू में शिवलोक है वह एक कोटियोजन लंबा चौड़ा है। वहां भगवान शंकर पार्वती समेत विराजमान रहते हैं। वे भगवान शंकर स्फटिक मणि के समान सुंदर स्वरूप चार भुजावाले सारे शरीर में भस्म का लेपन और नाग का यज्ञोपवीत धारण व्याघ्राम्बर पहने हुए जटा में गंगाजी तथा अर्धचंद्र धारण किए हुए त्रिनेत्र वाले, पार्वती सहित विराजमान रहते हैं। शिवलोक में मृत्यु के बाद ऋषि, मुनि, तपस्वी शंकरजी की उपासना करने वाले सांसारिक पुरुष और स्त्रियां अपने पुण्यकर्म के प्रभाव से निश्चित समय तक आनंद पूर्वक रहकर समय समाप्त होने पर फिर पृथ्वीपर जन्म लेकर शुभकर्म और शंकरजी की आराधना करते हुए जीवन व्यतीत करते हैं।
हे धर्मराज, गोलोक में अनंत ज्योति स्वरूप भगवान पुरुषोत्तम का जो स्वरूप है वह नीले कमल के समान सर्वांग श्यामवर्ण नया उत्पन्न कमल पुष्प के समान कोमल, करोड़ों शरद पूर्णिमा के चंद्र के समान देदीप्यमान, प्रसन्न मुख मद्रावाले धनुष के समान नेत्र और भृकुटी वाले, पीतांबर धारण किए हुए कानों में कुंडल, गले में वैजयंती माला पहने हुए, वनमाला कौस्तुभ माला धारण किए हुए, कस्तूरी का तिलक लगाए हुए, रत्न जड़ित सिंहासन पर विराजमान, हाथों में मुरली धारण किए हुए, अत्यंत सुंदर, करोड़ों कामदेव के समान सुंदर आकर्षित युवा किशोर अवस्था वाले सिंहासन पर विराजमान रहते हैं। ऐसे भगवान पुरुषोत्तम का दर्शन बड़े बड़े ऋषि योगी तपस्वी और यज्ञ करने वालों को भी दुर्लभ होता है। वे ही परब्रह्म परमात्मा हैं सारे संसार का आधार और सबके पालनहार उन्हीं की इच्छा से संसार की उत्पत्ति और प्रलय होता है। वे आदि, मध्य और अंत से रहित हैं। विश्व के पालनहार, अनंतकोटि ब्रह्माण्ड नायक और मोक्षस्वरूप है निर्गुण, निर्विकार, सच्चिदानंद हैं। वे ही जीवात्मा को मोक्ष देने वाले हैं। उनकी उपासना करने वाले मृत्यु के बाद मोक्ष को प्राप्त करके उन्हीं में लीन होकर हमेशा के लिए जन्म मृत्यु और चौरासी लक्ष योनि में भ्रमण करने का दुःख जीवात्मा का हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
हे धर्मराज, अधिकमास को साथ में लिये हुए भगवान विष्णु ने गोलोक में प्रवेश किया। दूर से ही भगवान पुरुषोत्तम का सुंदर मंदिर दिखाई दे रहा था। उसके तेज से अधिकमासकी आंखें चकाचौंध [हो रही थी।]
हो रही थी। वह मंदिर मणि के स्तंभो से बना हुआ बीच सिंहासन पर भगवान पुरुषोत्तम विराजमान थे अपने पीछे पीछे अधिकमास को साथ लेकर मंदगति से भगवान विष्णु वहां पहुंचे। भगवान विष्णु को देखकर द्वारपाल ने उठकर उनका अभिवादन किया प्रेम से उनके चरणों में नमस्कार किया भगवान विष्णुने अधिकमास को साथ में लेकर मंदिर में प्रवेश किया मंदिर के भीतर किशोर अवस्था वाले दिव्य स्वरूप भगवान पुरुषोत्तम रत्न जड़ित सिंहासन पर आनंद मुद्रा में विराजमान थे। उनके सामने पहुंचकर भगवान विष्णु हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे समस्त पार्षद गणों ने उठकर भगवान विष्णु का अभिवादन किया। तथा भगवान पुरुषोत्तम ने अपने सिंहासन के समीप सिंहासन पर बैठने का आग्रह करने पर भगवान विष्णु उसपर विराजमान हो गए विष्णु के पीछे अधिकमास, अश्रु पूरित नेत्रों से थरथर कांपता हुआ दोनों हाथ जोड़कर खड़ा रहा। इस प्रकार भगवान नारायण ने नारदमुनि से सूतजीने शौनकादि ऋषियों से तथा भगवान कृष्ण ने धर्मराज से कहा।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार बृहन्नारदीय पद्याधार पुराण का द्वितीय ऽ अध्यायः समाप्त ॥ (२)




गीता तृतीय अध्याय माहात्म्य |gita ke 3 adhayay ki Katha

 

गीता तृतीय अध्याय माहात्म्य |gita ke 3 adhayay  ki Katha 


जड़ नामक ब्राह्मण और उसका पतन: जनस्थान में 'जड़' नाम का एक ब्राह्मण था, जिसने अपना धर्म छोड़कर व्यभिचार, जुआ और मदिरापान जैसे पापों को अपना लिया था। जब उसका सारा धन नष्ट हो गया, तो वह व्यापार के लिए उत्तर दिशा में गया। लौटते समय रात के अंधेरे में लुटेरों ने उसे मार डाला। अपने पापों के कारण वह एक भयानक प्रेत बना।

पुत्र की पितृ-भक्ति और गीता पाठ: उसका पुत्र बहुत बड़ा विद्वान और धर्मात्मा था। जब पिता नहीं लौटे, तो वह उन्हें खोजने निकला। मार्ग में उसे पिता की मृत्यु का पता चला। वह पिता का उद्धार करने के लिए उनकी अस्थियाँ लेकर काशी जाने लगा। रास्ते में वह उसी वृक्ष के नीचे रुका जहाँ उसके पिता की हत्या हुई थी। वहाँ उसने संध्या वंदन किया और गीता के तीसरे अध्याय का पाठ किया।

पिता का उद्धार: जैसे ही पाठ संपन्न हुआ, आकाश में भयंकर शोर हुआ और एक दिव्य विमान उतरा। पुत्र ने देखा कि उसके पिता प्रेत योनि से मुक्त होकर दिव्य रूप में विमान पर बैठे हैं। पिता ने बताया कि "तुम्हारे गीता के तीसरे अध्याय के पाठ से मेरी मुक्ति हो गई है और अब काशी जाने की आवश्यकता नहीं रही।"

नारकी जीवों का उद्धार: पिता ने पुत्र से आग्रह किया कि वह इसी पाठ के पुण्य से अपने अन्य पूर्वजों और नरक में पड़े जीवों का भी उद्धार करे। पुत्र ने वापस लौटकर श्रीकृष्ण मंदिर में बैठकर तीसरे अध्याय का पाठ किया और सारा पुण्य नरक के जीवों को अर्पित कर दिया।

यमराज और भगवान विष्णु का मिलन: इस पुण्य के प्रभाव से नरक खाली हो गया। भगवान विष्णु के दूत यमराज के पास पहुँचे और सभी कैदियों को छोड़ने की आज्ञा दी। यमराज स्वयं क्षीरसागर जाकर भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे। भगवान ने यमराज को सांत्वना दी और उन्हें वापस अपने लोक भेजा। अंत में वह धर्मात्मा ब्राह्मण पुत्र भी अपनी जाति और अनगिनत जीवों का उद्धार करके स्वयं विष्णुधाम को गया।

Bagvat gita ki kahaniya | भगवत गीता की कहानियां

Bagvat gita ki kahaniya|भगवत गीता की कहानियां 

 गीता के पहले अध्याय की कथ
 गीता के दूसरे अध्याय की कथा
गीता के तीसरे अध्याय की कथा
 गीता के चौथे अध्याय की कथा
 गीता के पांचवें अध्याय की कथा
 गीता के छठवें अध्याय की कथा 
गीता के सातवें अध्याय की कथा
गीता के आठवें अध्याय की कथा
 गीता के नॉर्वे अध्याय की कथा 
गीता के दसवें अध्याय की कथा
 गीता के ग्यारहवें वें अध्याय की कथा 
गीता के बारहवें अध्याय की 
गीता के तेरहवें अध्याय की कथा 
गीता के चौदहवां अध्याय कथा
  गीता के पंद्रहवें अध्याय की कथा 
गीता के सोलहवें अध्याय की कथा 
गीता के सत्रह अध्याय की कथा 
गीता के अठारह अध्याय की कथा  

Gita ke 1 adhayay ki Katha| गीता की पहली अध्याय की कथा


Gita ke 1 adhayay ki Katha| गीता की पहली अध्याय की कथा 


 श्रीपार्वतीजीने कहा—भगवन्! आप सब तत्त्वोंके ज्ञाता हैं। आपकी कृपासे मुझे श्रीविष्णु-सम्बन्धी नाना प्रकारके धर्म सुननेको मिले, जो समस्त लोकका उद्धार करनेवाले हैं। देवेश! अब मैं गीताका माहात्म्य सुनना चाहती हूँ, जिसका श्रवण करनेसे श्रीहरिमें भक्ति बढ़ती है।

श्रीमहादेवजी बोले—जिनका श्रीविग्रह अलसीके फूलकी भाँति श्याम-वर्णका है, पक्षिराज गरुड़ ही जिनके वाहन हैं, जो अपनी महिमासे कभी च्युत नहीं होते तथा शेषनागकी शय्यापर शयन करते हैं, उन भगवान् महाविष्णुकी हम उपासना करते हैं। एक समयकी बात है, मुर दैत्यके नाशक भगवान् विष्णु शेषनागके रमणीय आसनपर सुखपूर्वक विराजमान थे। उस समय समस्त लोकोंको आनन्द देनेवाली भगवती लक्ष्मीने आदरपूर्वक प्रश्न किया।

श्रीलक्ष्मीजीने पूछा—भगवन्! आप सम्पूर्ण जगत्का पालन करते हुए भी अपने ऐश्वर्यके प्रति उदासीन-से होकर जो इस क्षीरसागरमें नींद ले रहे हैं, इसका क्या कारण है?

श्रीभगवान् बोले—सुमुखि! मैं नींद नहीं लेता हूँ, अपितु तत्त्वका अनुसरण करनेवाली अन्तर्दृष्टिके द्वारा अपने ही माहेश्वर तेजका साक्षात्कार कर रहा हूँ। देवि! यह वही तेज है, जिसका योगी पुरुष कुशाग्र-बुद्धिके द्वारा अपने अन्तःकरणमें दर्शन करते हैं तथा जिसे मीमांसक विद्वान् वेदोंका सार-तत्त्व निश्चित करते हैं। वह माहेश्वर तेज एक, अजर, प्रकाशस्वरूप, आत्मरूप, रोग-शोकसे रहित, अखण्ड आनन्दका पुंज, निष्पन्द (निरीह) तथा द्वैतरहित है। इस जगत्का जीवन उसीके अधीन है। मैं उसीका अनुभव करता हूँ। देवेश्वरि! यही कारण है कि मैं तुम्हें नींद लेता-सा प्रतीत हो रहा हूँ।

श्रीलक्ष्मीजीने कहा—हृषीकेश! आप ही योगी पुरुषोंके ध्येय हैं। आपके अतिरिक्त भी कोई ध्यान करनेयोग्य तत्त्व है, यह जानकर मुझे बड़ा कौतूहल हो रहा है। इस चराचर जगत्की सृष्टि और संहार करनेवाले स्वयं आप ही हैं। आप सर्वसमर्थ हैं। इस प्रकारकी स्थितिमें होकर भी यदि आप उस परम तत्त्वसे भिन्न हैं तो मुझे उसका बोध कराइये।

श्रीभगवान् बोले—प्रिये! आत्माका स्वरूप द्वैत और अद्वैतसे पृथक्, भाव और अभावसे मुक्त तथा आदि और अन्तसे रहित है। शुद्ध ज्ञानके प्रकाशसे उपलब्ध होनेवाला तथा परमानन्दस्वरूप होनेके कारण एकमात्र सुन्दर है। वही मेरा ईश्वरीय रूप है। आत्माका एकत्व ही सबके द्वारा जाननेयोग्य है। गीताशास्त्रमें इसीका प्रतिपादन हुआ है।

अमित तेजस्वी भगवान् विष्णुके ये वचन सुनकर लक्ष्मी देवीने शंका उपस्थित करते हुए कहा—भगवन्! यदि आपका स्वरूप स्वयं परमानन्दमय और मन-वाणीकी पहुँचके बाहर है तो गीता कैसे उसका बोध कराती है? मेरे इस सन्देहका आप निवारण कीजिये।

श्रीभगवान् बोले—सुन्दरि! सुनो, मैं गीतामें अपनी स्थितिका वर्णन करता हूँ। क्रमशः पाँच अध्यायोंको तुम पाँच मुख जानो, दस अध्यायोंको दस भुजाएँ समझो तथा एक अध्यायको उदर और दो अध्यायोंको दोनों चरणकमल जानो। इस प्रकार यह अठारह अध्यायोंकी वाङ्मयी ईश्वरीय मूर्ति ही समझनी चाहिये।* यह ज्ञानमात्रसे ही महान् पातकोंका नाश करनेवाली है। जो उत्तम बुद्धिवला पुरुष गीताके एक या आधे अध्यायका अथवा एक, आधे या चौथाई श्लोकका भी प्रतिदिन अभ्यास करता है, वह सुशर्माके समान मुक्त हो जाता है।

श्रीलक्ष्मीजीने पूछा—देव! सुशर्मा कौन था? किस जातिका था और किस कारणसे उसकी मुक्ति हुई?

श्रीभगवान् बोले—प्रिये! सुशर्मा बड़ी खोटी बुद्धिका मनुष्य था। पापियोंका तो वह शिरोमणि ही था। उसका जन्म वैदिक ज्ञानसे शून्य एवं क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाले ब्राह्मणोंके कुलमें हुआ था। वह न ध्यान करता था, न जप; न होम करता था, न अतिथियोंका सत्कार। वह लम्पट होनेके कारण सदा विषयोंके सेवनमें ही आसक्त रहता था। हल जोतता और पत्ते बेचकर जीविका चलाता था। उसे मदिरा पीनेका व्यसन था तथा वह मांस भी खाया करता था। इस प्रकार उसने अपने जीवनका दीर्घकाल व्यतीत कर दिया। एक दिन मूढ़ बुद्धि सुशर्मा पत्ते लानेके लिये किसी ऋषिकी वाटिकामें घूम रहा था। इसी बीचमें कालरूपधारी काले साँप ने उसे डस लिया। सुशर्माकी मृत्यु हो गयी। तदनन्तर वह अनेक नरकोंमें जा वहाँकी यातनाएँ भोगकर मर्त्यलोकमें लौट आया और वहाँ बोझ ढोनेवाला बैल हुआ। उस समय किसी पगुन ने अपने जीवनका आरामसे व्यतीत करनेके लिये उसे खरीद लिया। बैलने अपनी पीठपर पंगुका भार ढोते हुए बड़े कष्टसे सात-आठ वर्ष बिताये। एक दिन पंगुने किसी ऊँचे स्थानपर बहुत देरतक बड़ी तेजीके साथ उस बैलको घुमाया। इससे वह थककर बड़े वेगसे पृथ्वीपर गिरा और मूर्च्छित हो गया। उस समय वहाँ कुतूहलवश आकृष्ट हो बहुत-से लोग एकत्रित हो गये। उस जनसमुदायमें किसी पुण्यात्मा व्यक्तिने उस बैलका कल्याण करनेके लिये उसे अपना पुण्य दान किया।

तत्पश्चात् कुछ दूसरे लोगोंने भी अपने-अपने पुण्योंको याद करके उन्हें उसके लिये दान किया। उस भीड़में एक वेश्या भी खड़ी थी। उसे अपने पुण्यका पता नहीं था तो भी उसने लोगोंकी देखा-देखी उस बैलके लिये कुछ त्याग किया।

तदनन्तर यमराजके दूत उस मरे हुए प्राणीको पहले यमपुरीमें ले गये। वहाँ यह विचारकर कि यह वेश्याके दिये हुए पुण्यसे पुण्यवान् हो गया है, उसे छोड़ दिया गया। फिर वह भूलोकमें आकर उत्तम कुल और शीलवाले ब्राह्मणोंके घरमें उत्पन्न हुआ। उस समय भी उसे अपने पूर्व-जन्मकी बातोंका स्मरण बना रहा। बहुत दिनोंके बाद अपने अज्ञानको दूर करनेवाले कल्याण-तत्त्वका जिज्ञासु होकर वह उस वेश्याके पास गया और उसके दानकी बात बतलाते हुए उसने पूछा—'तुमने कौन-सा पुण्यदान किया था?' वेश्याने उत्तर दिया—'वह पिंजरेमें बैठा हुआ तोता प्रतिदिन कुछ पढ़ता है। उससे मेरा अन्तःकरण पवित्र हो गया है। उसीका पुण्य मैंने तुम्हारे लिये दान किया था।' इसके बाद उन दोनोंने तोतेसे पूछा। तब उस तोतेने अपने पूर्वजन्मका स्मरण करके प्राचीन इतिहास कहना आरम्भ किया।

शुक बोला—पूर्वजन्ममें मैं विद्वान् होकर भी विद्वत्ताके अभिमानसे मोहित रहता था। मेरा राग-द्वेष इतना बढ़ गया था कि मैं गुणवान् विद्वानोंके प्रति भी ईर्ष्याभाव रखने लगा। फिर समयानुसार मेरी मृत्यु हो गयी और मैं अनेकों घृणित लोकोंमें भटकता फिरा। उसके बाद इस लोकमें आया। सद्गुरुकी अत्यन्त निन्दा करनेके कारण तोतेके कुलमें मेरा जन्म हुआ। पापी होनेके कारण छोटी अवस्था में ही मेरा माता-पितासे वियोग हो गया। एक दिन मैं ग्रीष्म-ऋतुमें तपे हुए मार्गपर पड़ा था। वहाँसे कुछ श्रेष्ठ मुनि मुझे उठा लाये और महात्माओंके आश्रयमें आश्रमके भीतर एक पिंजरेमें उन्होंने मुझे डाल दिया। वहीं मुझे पढ़ाया गया। ऋषियोंके बालक बड़े आदरके साथ गीताके प्रथम अध्यायकी आवृत्ति करते थे। उन्हीं सुनकर मैं भी बारंबार पाठ करने लगा। इसी बीचमें एक चोरी करनेवाले बहेलियेने मुझे वहाँसे चुरा लिया। तत्पश्चात् इस देवीने मुझे खरीद लिया। यही मेरा वृत्तान्त है, जिसे मैंने आपलोगोंसे बता दिया। पूर्वकालमें मैंने इस प्रथम अध्यायका अभ्यास किया था, जिससे मैंने अपने पापको दूर किया है। फिर उसीसे इस वेश्याका भी अन्तःकरण शुद्ध हुआ है और उसीके पुण्यसे ये द्विजश्रेष्ठ सुशर्मा भी पापमुक्त हुए हैं।

Gita ke 18 adhayay ki Katha| गीता के अठारहवा अध्याय की कथा

 

Gita ke 18 adhayay ki Katha| गीता के अठारहवा अध्याय की कथा 



श्रीपार्वतीजीने कहा—भगवन्! आपने सत्रहवें अध्यायका माहात्म्य बतलाया। अब अठारहवें अध्यायके माहात्म्यका वर्णन कीजिये।

श्रीमहादेवजीने कहा—गिरिनन्दिनि! चिन्मय आनन्दकी धारा बहानेवाले अठारहवें अध्यायके पावन माहात्म्यको जो वेदसे भी उत्तम है, श्रवण करो। यह सम्पूर्ण शास्त्रोंका सर्वस्व, कानोंमें पड़ा हुआ रसायनके समान तथा संसारके यातना-जालको छिन्न-भिन्न करनेवाला है। सिद्ध पुरुषोंके लिये यह परम रहस्यकी वस्तु है। इसमें अविद्याका नाश करनेकी पूर्ण क्षमता है। यह भगवान् विष्णुकी चेतना तथा सर्वश्रेष्ठ परमपद है। इतना ही नहीं, यह विवेकमी लताका मूल, काम-क्रोध और मदको नष्ट करनेवाला, इन्द्र आदि देवताओंके चित्तका विश्राम-मन्दिर तथा सनक-सनन्दन आदि महायोगियोंका मनोरंजन करनेवाला है। इसके पाठमात्रसे यमदूतोंकी गर्जना बंद हो जाती है। पार्वती! इससे बढ़कर कोई ऐसा रहस्यमय उपदेश नहीं है, जो संतप्त मानवोंके त्रिविध तापको हरनेवाला और बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला हो। अठारहवें अध्यायका लोकोत्तर माहात्म्य है। इसके सम्बन्धमें जो पवित्र उपाख्यान है, उसे भक्तिपूर्वक सुनो। उसके श्रवणमात्रसे जीव समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।

मेरुगिरिके शिखरपर अमरावती नामवाली एक रमणीय पुरी है। उसे पूर्वकालमें विश्वकर्मा ने बनाया था। उस पुरीमें देवताओंद्वारा सेवित इन्द्र शचीके साथ निवास करते थे। एक दिन वे सुखपूर्वक बैठे हुए थे, इतनेहीमें उन्होंने देखा कि भगवान् विष्णुके दूतोंसे सेवित एक अन्य पुरुष वहाँ आ रहा है। इन्द्र उस नवागत पुरुषके तेजसे तिरस्कृत होकर तुरंत ही अपने मणिमय सिंहासनसे मण्डपमें गिर पड़े। तब इन्द्रके सेवकों ने देवलोकके साम्राज्यका मुकुट इस नूतन इन्द्रके मस्तकपर रख दिया। फिर तो दिव्य गीत गाती हुई देवांगनाओंके साथ सब देवता उनकी आरती उतारने लगे। ऋषियोंने वेदमन्त्रोंका उच्चारण करके उन्हें अनेक आशीर्वाद दिये। गन्धर्वोंका ललित स्वरमें मंगलमय गान होने लगा।

इस प्रकार इस नवीन इन्द्रको सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किये बिना ही नाना प्रकारके उत्सवोंसे सेवित देखकर पुराने इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। वे सोचने लगे 'इसने तो मार्गमें न कभी पाँसले बनवाये हैं, न पोखरे खुदवाये हैं और न पथिकोंको विश्राम देनेवाले बड़े-बड़े वृक्ष ही लगवाये हैं। अकाल पड़नेपर अन्नदानके द्वारा इसने प्राणियोंका सत्कार भी नहीं किया है। इसके द्वारा तीर्थोंमें सत्र और गाँवोंमें यज्ञका अनुष्ठान भी नहीं हुआ है। फिर इसने यहाँ भाग्यकी दी हुई ये सारी वस्तुएँ कैसे प्राप्त की हैं?' इस चिन्तासे व्याकुल होकर इन्द्र भगवान् विष्णुसे पूछने लिये प्रेमपूर्वक क्षीरसागरके तटपर गये और वहाँ अकस्मात् अपने साम्राज्यसे भ्रष्ट होनेका दुःख निवेदन करते हुए बोले—'लक्ष्मीकान्त! मैंने पूर्वकालमें आपकी प्रसन्नताके लिये सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। उसीके पुण्यसे मुझे इन्द्रपदकी प्राप्ति हुई थी; किंतु इस समय स्वर्गमें कोई दूसरा ही इन्द्र अधिकार जमाये बैठा है। उसने तो न कभी धर्मका अनुष्ठान किया है और न यज्ञोंका। फिर उसने मेरे दिव्य सिंहासनपर कैसे अधिकार जमाया है?'

श्रीभगवान् बोले—इन्द्र! वह गीताके अठारहवें अध्यायमेंसे पाँच श्लोकोंका प्रतिदिन पाठ करता है। उसीके पुण्यसे उसने तुम्हारे उत्तम साम्राज्यको प्राप्त कर लिया है। गीताके अठारहवें अध्यायका पाठ सब पुण्योंका शिरोमणि है। उसीका आश्रय लेकर तुम भी अपने पदपर स्थिर हो सकते हो।

भगवान् विष्णुके ये वचन सुनकर और उस उत्तम उपायको जानकर इन्द्र ब्राह्मणका वेष बनाये गोदावरीके तटपर गये। वहाँ उन्होंने कालिकाग्राम नामक उत्तम और पवित्र नगर देखा, जहाँ कालका भी मर्दन करनेवाले भगवान् कालेश्वर विराजमान हैं। वहीं गोदावरी-तटपर एक परम धर्मात्मा ब्राह्मण बैठे थे, जो बड़े ही दयालु और वेदोंके पारंगत विद्वान् थे। वे अपने मनको वशमें करके प्रतिदिन गीताके अठारहवें अध्यायका स्वाध्याय किया करते थे। उन्हें देखकर इन्द्रने बड़ी प्रसन्नताके साथ उनके दोनों चरणोंमें मस्तक झुकाया और उन्हींसे अठारहवें अध्यायको पढ़ा। फिर उसीके पुण्यसे उन्होंने श्रीविष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लिया। इन्द्र आदि देवताओंका पद बहुत ही छोटा है, यह जानकर वे परम हर्षके साथ उत्तम वैकुण्ठधामको गये। अतः यह अध्याय मुनियोंके लिये श्रेष्ठ परम तत्त्व है। पार्वती! अठारहवें अध्यायके इस दिव्य माहात्म्यका वर्णन समाप्त हुआ। इसके श्रवणमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है। इस प्रकार सम्पूर्ण गीताका पापनाशक माहात्म्य बतलाया गया। महाभागे! जो पुरुष श्रद्धायुक्त होकर इसका श्रवण करता है, वह समस्त यज्ञोंका फल पाकर अन्तमें श्रीविष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लेता है।