Adhik maas ki Katha 3 adhayay | अधिक मास की कथा तीसरा अध्याय
॥ अथ तृतीयोऽध्यायः प्रारंभः ॥
व्यासजी कहते हैं अपने श्रोतागणों से, सूतजी कहते हैं शौनकादि ऋषियों से, भगवान नारायण कहते हैं नारदजी से एवं भगवान कृष्ण कहते हैं युधिष्ठिर से कि -
हे धर्मराज, भगवान पुरुषोत्तम के आग्रह से भगवान विष्णु पास ही सिंहासन पर विराजमान होते हैं। उनके पीछे अत्यंत दयनीय अवस्था में नेत्रों में आंसू भरे हुए, हाथ जोड़कर अधिकमास खड़ा था। उसकी ऐसी अवस्था को देखकर परम दयालु भगवान पुरुषोत्तम विष्णुजी से पूछते हैं। हे विष्णो! आप यह किसको लेकर आए हैं? इसका नाम क्या है? इसके नेत्रों में आंसू क्यों हैं? मेरे गोलोक में किसी प्रकार का दुःख नहीं है, यहाँ हमेशा परमानंद व्याप्त रहता है। फिर मैं इसको इतना दुःखी क्यों देख रहा हूं। इसका शरीर भी भय से थर-थर कांप रहा है।
भगवान पुरुषोत्तम के पूछने पर भगवान विष्णु कहते हैं। हे देवाधिदेव! यह अत्यंत दीन व दुःखी है। तथा निराश्रित और लोगों के द्वारा निन्दनीय बना है। इसी कारण यह आपके गोलोक में आने पर भी दुःख से छुटकारा नहीं पा रहा है। हे प्रभु! संसार में घटी, पल, कल्प, दिन, पक्ष, संवत्सर, ऋतु, अयन, औषधि, लता वृक्ष, झरने, नदी, तालाब, कुंज, बावली, इन सबका कोई न कोई देवता स्वामी है। वे सब समय-समय पर पूजित होते हैं। आदर की दृष्टि से प्रशंसा प्राप्त हैं। परंतु इसका कोई स्वामी न होने से सांसारिक लोग इसको अशुभ और मलमास कहते हैं। इसके समय पर सब लोग शुभ कर्म करना बंद कर देते हैं। इसमें सूर्य की संक्रांति न होने से यह अत्यंत अशुभ माना जाता है। इसके समय पर लोग विवाह, प्रतिष्ठा, यज्ञ, होम, दान, स्नान, जप, यात्रा, आदिक सब बंद कर देते हैं।
हे महाप्रभो! इसकी अवस्था विधवा नारी के समान है। इसी दुःख से यह अत्यंत दुःखित होकर मेरे वैकुंठ लोक में आकर इसने शरण की याचना की। इसके दुःख को सुनकर मैंने विचार किया कि आपके सिवा इसका दुःख दूर होना असंभव है। इसीलिए मैं आपकी शरण में लेकर आया हूं। हे महाप्रभो! हम ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि समस्त देवगण आपकी ही कृपा से तेजस्वी, प्रभावशाली, पराक्रमी हैं, दैत्य और दुष्टों पर विजय प्राप्त करके अपने भक्तों की और संसार की रक्षा करते हैं। और संसार में जो भी भक्तगण, ऋषि, मुनि, योगी, संन्यासी और गृहस्थ पुरुष आपकी उपासना करते हैं।
हे दीनदयालु! आप बहुत शीघ्र उसपर प्रसन्न होकर संसार में सर्वश्रेष्ठ अत्यंत कठिन तपस्या से प्राप्त होने वाला चौरासी लक्ष योनी के आवागमन से मुक्त करने वाला ऐसा सर्वोत्तम मोक्ष पद आप अपने भक्तों को दे देते हैं। हम देवतागण इस फल को देने में असमर्थ हैं। आप सर्वशक्तिमान हैं, आप अपनी इच्छा से जो चाहें कर सकते हैं। इसलिये हे महाप्रभु! मैं इस अधिकमास को आपकी शरण में लाया हूं। आप इसको अपनी शरण में लेकर इसका उद्धार करिए।
समस्त वेद, पुराण और विद्वान कहते हैं - आप निराश्रितों के आश्रयदाता, शरणागत पर शीघ्र प्रसन्न होकर रक्षा करने वाले अत्यंत दयालु हैं। अपने इस शरणागत की रक्षा कीजिये। इस प्रकार विष्णु जी भगवान पुरुषोत्तम की प्रार्थना कर हाथ जोड़कर खड़े रहे। विष्णुजी के वचनों को सुनकर भगवान पुरुषोत्तम अत्यंत प्रसन्न होते हुए कहते हैं। हे विष्णो! आपने उत्तम मार्ग इस निराश्रित के लिये चुना। आप इसको लेकर मेरे पास आए हैं, इसका उद्धार करने के कारण तीनों लोकों में आपकी (कीर्ति) प्रशंसा होती है। आपने इसको शरण दी है तो मैं भी इसको शरण अवश्य दूंगा, इसमें संशय नहीं है।
हे विष्णु! आज से मैं इस अधिकमास को सर्वश्रेष्ठ सर्वोच्च पद देता हूं। जैसे मैं देवताओं में सर्वश्रेष्ठ हूं। उसी प्रकार समस्त भक्ति मार्ग, व्रत, उपवास, दान पुण्य के द्वारा मनोवांछित फल और मोक्ष देने में यह सामर्थ्यवान होगा। जैसे मुझ में दया, कीर्ति, शांति, उदारता, पराक्रम, धैर्य, ज्ञान, वैराग्य, कान्ति, ऐश्वर्य आदि गुण हैं, उसी प्रकार इस अधिकमास में भी होंगे। आज से यह संसार में प्रसिद्धि और प्रशंसा में सर्वश्रेष्ठ होकर अपने अर्थात अधिकमास आने पर जो भी मनुष्य भक्ति और दान पुण्य व्रत उपवास नियम धारण करेंगे, उनको मेरे जैसा ही वरदान देने में सामर्थ्यवान होगा।
हे विष्णो! आज से अपने सभी गुण और प्रतिभा से इसको संपन्न कर दिया है। जैसे मेरा नाम संसार में प्रख्यात है, उसी प्रकार यह भी जग प्रसिद्ध होगा। हे विष्णो! आज से मैं इसका स्वामी हूं। इसको मैं अपना नाम (पुरुषोत्तम) भी देता हूं। यह आज से सभी महीनों में श्रेष्ठ माना जाएगा। इसका समय (मास) आने पर जो लोग व्रत नियम धारण करेंगे, अपनी शक्ति के अनुसार धर्म कर्म, दान, पुण्य करेंगे, वह अनंतपुण्य के और मोक्ष के भागीदार होंगे। इसके जो भक्त होंगे, उनके समस्त दुःख-दारिद्र्य नष्ट होकर सब सुखमय जीवन प्राप्त करेंगे। और अंत में मोक्ष को प्राप्त करेंगे।
आज से यह मेरे ही समान अपने भक्तों को वरदान देने में सामर्थ्यशील होगा। इसके समय में थोड़ी भी आराधना करने वालों के जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होकर वह अनंत पुण्य प्राप्त करेगा। जिस मोक्ष की प्राप्ति के लिये लोग संन्यास, ब्रह्मचर्य धारण करके तपस्या करते हैं तथा पंचाग्नि साधन, व्रत उपवास, व सिर्फ वायु का भक्षण धूम्रपान करते हैं। वर्षों ऋतु में खुले मैदान में बैठकर तपस्या करते हैं। भयंकर सर्दी के समय पर्वतों में जाकर तपस्या करते हैं, भयंकर गर्मी में अपने आसन के चारों तरफ अग्नि जलाकर पंचाग्नि साधन करते हुए तपस्या करते हैं। वही मोक्ष प्राप्ति इस पुरुषोत्तम मास के भक्तों को मैं प्रदान करूंगा। जैसे पृथ्वी में अनाज का एक कण बोने से हजारों कण अनाज उत्पन्न होता है, उसी प्रकार इसके मास में किया हुआ पुण्य कर्म कई गुना अधिक होकर इसके भक्तों को प्राप्त होगा। चातुर्मास्य, यज्ञ, दान और देवताओं की आराधना करने वालों को वैकुंठ आदि लोकों की प्राप्ति होती है। अपने कर्म और पुण्य की सीमा के अनुसार वैकुंठ का सुख भोगकर फिर जन्म लेना पड़ता है। परंतु इसके भक्तों को अनंत पुण्य के प्रभाव से मोक्ष की प्राप्ति होगी।
हे विष्णो! आज के बाद जो लोग इसकी निंदा, अवहेलना करेंगे या इसे मलमास कहेंगे, उन्हें उनके समस्त पुण्य नष्ट होकर दुःख दारिद्र्य भोगना पड़ेगा तथा वे नरक गामी होंगे।
हे विष्णो! मैं कदाचित अपने भक्तों की इच्छापूर्ण करने में विलंब कर सकता हूं, परंतु इस पुरुषोत्तम मास के भक्तों की इच्छाएं शीघ्र पूर्ण करूंगा। इस मास के आने पर जो सांसारिक मनुष्य व्रत नियम धारण करेंगे तथा अपनी शक्ति के अनुसार दान, पुण्य, भजन-कीर्तन, यज्ञ, हवन आदि पूजा कर्म करेंगे, ऐसे मनुष्यों को संसार में कीर्ति, यश, सौभाग्य, संतति, धन ऐश्वर्य की संपन्नता, सुखमय जीवन प्राप्त होकर अंत में मोक्ष की प्राप्ति होगी। तथा जो मनुष्य इसका मास आने पर संपूर्ण मास ऐसे ही व्यतीत करेंगे, ऐसे लोग दुर्भाग्यशाली और अनंत पुण्य से वंचित रहकर सांसारिक दुःख में लिप्त रहेंगे। आज से यह मेरा परम भक्त है। मैं इसका स्वामी हूं।
हे विष्णो! अब आप निश्चिंत हो जाएं। अपने वैकुंठ लोक में जाकर इसको उचित और उत्तम स्थान दें। भगवान पुरुषोत्तम की आज्ञा प्राप्त कर श्री विष्णु अधिकमास को अपने साथ गरुड़ पर बैठाकर वैकुंठ लोक में लाए तथा वहां अपने मंदिर के पास ही सुंदर मंदिर में पुरुषोत्तम मास को स्थान दिया, तब से वह पुरुषोत्तम मास वैकुंठ धाम में सर्वोच्च कीर्ति प्राप्त कर रहने लगा।
भगवान कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि, हे धर्मराज! उसी समय से संसार में अधिक मास की ख्याति पुरुषोत्तम मास के नाम से प्रसिद्ध हुई। तीनों लोक में भगवान की कृपा से यह अत्यंत सामर्थ्यवान, परमश्रेष्ठ और सभी भक्ति मार्ग में प्रधानता प्राप्त की। जो लोग इसके आने पर थोड़ा भी पुण्य कर्म करते हैं उनके समस्त पाप क्षीण होकर सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। हे युधिष्ठिर! तुम पांडवों पर एक के बाद एक अनेक आपत्तियां आ रही हैं। तुमको वनवास की अवस्था में अनेक दुःख भोगने पड़ रहे हैं। दो-तीन बार पुरुषोत्तम मास आकर व्यतीत हो गया, परंतु तुमको इसकी जानकारी न होने से कुछ भी नहीं कर सके। परंतु अब जो पुरुषोत्तम मास आएगा, उसमें तुम लोग अवश्य व्रत उपवास नियम धारण करना। इस कर्म के द्वारा तुम्हारे समस्त पाप क्षय होकर अनंत पुण्य के द्वारा तुम कौरवों पर विजय प्राप्त करके अपना साम्राज्य प्राप्त करोगे और संसार में यशकीर्ति और सौभाग्य भी प्राप्त होगा।
जै जै श्री बृहन्नारदीय पद्म धरे अधिकमास महात्म्य सार तृतीयोऽध्यायः समाप्त
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