Adhik mass ki Katha 19 adhyaya | अधिक मास की कथा उन्नीसवा अध्याय

Adhik mass ki Katha 19 adhyaya | अधिक मास की कथा उन्नीसवा अध्याय 








|| श्री गणाधिपतये नम: ||
श्री भगवान नारायण नारदजी से तथा सूतजी शौनकदि ऋषियों से और भगवान विष्णु लक्ष्मीजी से कहते हैं, हे लक्ष्मी चार महापर्वों का वर्णन मैंने तुमसे कहा अब मैं पांचवा पुरुषोत्तम मास की द्वादशी महापर्व के माहात्म्य का वर्णन तुमसे कहता हूँ। यह महापर्व सभी महापर्वों से विशेष महत्वपूर्ण है। इसका पालन करने से कभी न नष्ट होने वाला अक्षय धाम की प्राप्ति होती है। यह परमपुण्य दायक है। गंगा आदि तीर्थों का सेवन इसके सोलह अंशों की भी बराबरी नहीं कर सकते। एकादशी को उपवास करके द्वादशी के दिन आंवले के वृक्ष के नीचे जो मनुष्य अपने पितरों का पिंडदान व तर्पण करते हैं। ऐसे मनुष्यों को अनेक तीर्थों में पितरों को तृप्ति प्राप्त होती है। वे स्वर्ग के अधिकारी हो जाते हैं। द्वादशी के दिन जो भी मनुष्य अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा सहित अन्नदान तुलसी पत्र रखकर संकल्प के द्वारा ब्राह्मण को दान करते हैं। उनको अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। तर्पण करने से वह जल अमृत के समान होकर पितरों को प्राप्त होता है। अन्न के सहित भूमि का दान करने से समस्त पितरों तक बैकुंठवास का पुण्य मिलता है। तथा सर्व लक्षणयुक्त दुग्धवती गाय का दान करने से समस्त पितरों का उद्धार होकर वे बैकुंठ में निवास करते हैं। विद्यादान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
साधारण प्रत्येक मास की द्वादशी की अपेक्षा पुरुषोत्तम मास की द्वादशी महान पुण्य दायक होती है। इस पर्व के दिन प्रात: स्नान करके भगवान पुरुषोत्तम की पूजा करके सुपात्र ब्राह्मण को अपनी शक्ति के अनुसार धन, अन्न, वस्त्र, पादुका, घृत, तिलपात्र, दक्षिणा सहित संकल्प पूर्वक दान करना चाहिए तथा कांसे के पात्र में घी भरकर सुवर्ण की प्रतिमा का दान करते हैं, वे अनंत पुण्य व अक्षय पद को प्राप्त करते हैं। पुरुषोत्तम मास की द्वादशी को घृतदान करने का बड़ा महत्व है। भैंस के घी से गाय का घी अधिक पुण्यदाता होता है। यदि गाय का घी अप्राप्त हो तो भैंस का घी दान करना ही श्रेष्ठ है। हे लक्ष्मी घृत की मात्रा १ प्रस्थ (पार्वाक) १/२ प्रस्थ (६६४ ग्रा.) अथवा चौथाई प्रस्थ (३३२ ग्राम)
कम से कम होना चाहिए। इससे कम का दान कोई महत्वपूर्ण नहीं होता।
हे लक्ष्मी जितनी घृत की महिमा है, उतना ही अन्न और जलदान का माहात्म्य है। देवताओं में पुरुषोत्तम देव के समान कोई दूसरा देवता नहीं है। उसी के आधार पर संसार के समस्त तिथियों में द्वादशी तिथि के समान शरीर स्थिर है। इसलिये मनुष्य को विशेषकर द्वादशी के दिन अपनी श्रद्धा से अन्नदान अवश्य करना चाहिए। घर में आए अतिथि को कभी विमुख नहीं लौटाना चाहिए। भोजन का अन्न का दान अवश्य देना चाहिए। चैत्र वैशाख आदि पौष ऋतु में जल का दान अवश्य करना चाहिए।
पौष व माघ मास व हेमंत शिशिर ऋतु में ठंड से बचने के लिये काष्ठ (सूखी लकड़ी) का दान करना चाहिए। परंतु अन्नदान हमेशा करते रहना चाहिए। क्योंकि अन्न के द्वारा शरीर का पोषण होता है और नित्यप्रति की आवश्यकता का पूरक अन्न ही है। हे लक्ष्मी द्वादशी तिथि बहुत फलदाई और प्रभावशालिनी है। इस द्वादशी तिथि के प्रभाव से राजा अंबरीष ने महाप्रतापी और महाक्रोधी दुर्वासा ऋषि के घमंड को नष्ट कर दिया था। यह सारे संसार में इतिहास प्रसिद्ध है। हे लक्ष्मी सत्यव्रत को दिया हुआ दान सार्थक और पुण्य देने वाला होता है। वही कुपात्र को दियादान अधर्म और नरक देने वाला होता है। जैसे प्रदीप्त प्राण के बिना व्यर्थ है। विद्वान के बिना सभा व्यर्थ है। दीपक बिना घर व्यर्थ है। बिना मुख व्यर्थ है। पुत्र के बिना वंश व्यर्थ है। दृष्टि के बिना आंखें व्यर्थ है। वेदांत ज्ञान बिना पंडित व्यर्थ है। इसी प्रकार सत्यव्रत के बिना दान देना व्यर्थ होता है।
हे लक्ष्मी सत्यव्रत वह कहलाता है जो सात्विक प्रकृतवाला ज्ञानी और भगवान में आस्था रखने वाला दुषकर्म और पाप आचरण से दूर रहने वाला मांस मदिरा का सेवन नहीं करने वाले दूसरों को शुभ आचरण और अच्छे कर्म और ज्ञान की राह का मार्ग दिखाने वाले ही मनुष्य सत्यव्रत कहलाता है। हे लक्ष्मी कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों की द्वादशी समान फल देने वाली है इसमें कोई भेद नहीं है। पुरुषोत्तम मास में द्वादशी को प्रात: उठकर स्नान और नित्य कर्म से निवृत्त होकर भगवान पुरुषोत्तम की पूजा करके सत्यव्रत ब्राह्मण को आमंत्रित कर विप्र पूजन करके अपनी शक्ति और श्रद्धा के अनुसार धन का लोभ छोड़कर घी, अन्न, वस्त्र फलदक्षिणा आदि वस्तु संकल्प पूर्वक दान देवें।
हे लक्ष्मी काशी, कांची, मथुरा, द्वारका, हरिद्वार, उज्जैन, अयोध्या ये सब नगरी पुण्यदायक मानी गई हैं। परंतु द्वादशी तिथि के पुण्य की बराबरी इनका भी पुण्य नहीं है। जिस मास में पुरुषोत्तम मास आये उस मास के स्वामी का भी पूजन द्वादशी तिथि को करना चाहिए। और दान सामग्री के साथ यज्ञोपवीत और पादुका (जूता चप्पल) अवश्य दान करना चाहिए। इनके बिना दान की पूर्ति नहीं होती। हे लक्ष्मी द्वादशी तिथि के पुण्य का महत्व इतना है कि हजार मुखवाले शेषनाग भी इसका वर्णन करने में असमर्थ है। मैंने संक्षेप में तुमसे इसके माहात्म्य का वर्णन किया है। इस पुण्य कर्म के द्वारा मनुष्य अपने पूर्वजों का उद्धार करते हुए सांसारिक सुखों को भोगकर मृत्यु के बाद अनंत पद अर्थात मोक्ष को प्राप्त होता है। जहां जाने पर मनुष्य को चौंसठ योनि का भ्रमण संसार के आवागमन से मुक्ति प्राप्त हो जाती है।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
बृहन्नारदीय पद्माधारे एकोनविंशो S अध्याय: समाप्त ||
(१९)
|| शुभमभवतु ||





Adhik mass ki Katha 18 adhyaya | अधिक मास की कथा अठारहवां अध्याय

 Adhik mass ki Katha 18 adhyaya | अधिक मास की कथा अठारहवां अध्याय 


|| अथ अष्टदशोऽध्यायः प्रारंभः ||
|| श्री गणेशाय नमः ||
श्री भगवान नारायण नारदजी से तथा सूतजी शौनक आदि ऋषियों से कहते हैं। लक्ष्मी जी भगवान विष्णु से कहती हैं। हे सच्चिदानंद हे देवदेव आपके मुखारबिंद से मौन भोजन के महिमा का वर्णन सुनकर मेरे मन में अब पुरुषोत्तम मास में पांच महापर्व का माहात्म्य सुनने की प्रबल इच्छा जागृत है। आप कृपाकर बताएं कि वे पांच महापर्व कौन से हैं और कौनसा कर्म करने से किस फल की प्राप्ति होती है।
लक्ष्मीजी के वचनों को सुनकर भगवान विष्णु कहते हैं। हे लक्ष्मी तुम्हारी इच्छा के अनुसार पांच महापर्वों का वर्णन विस्तारपूर्वक कहता हूँ। वैधृति, व्यतिपात, पूर्णिमा, अमावस्या और द्वादशी ये पांच महापर्व कहे गए हैं। ये पांचों महापर्व एक से बढ़कर फल देने वाले हैं। वैधृति पर्व में कर्म करने से मैं (साक्षात विष्णु) प्रसन्न होता हूँ। व्यतिपात योग से धर्मराज। पूर्णिमा के पर्व में ब्रह्मदेव। अमावस्या के पर्व से भगवान हृषीकेश प्रसन्न होते हैं। वैधृति पर्व में जो मनुष्य स्नान दान होम कर्म करते हैं। उनकी समस्त मनोकामनाएं मैं (विष्णु) प्रसन्न होकर पूर्ण करता हूँ। हे लक्ष्मी इन पांचों महापर्वों के इतने महान पुण्य हैं कि इन पुण्यों की प्राप्ति के लिये इंद्र आदि देवता भी लालायित रहते हैं। इन पर्वों में अपनी शक्ति के अनुसार मनुष्य को धन, धान्य, तिल, दूध, घी, फल आदि का दान अवश्य करना चाहिए। इसके करने से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है। यह पुण्य अक्षय होता है। दैत्यराज प्रहलाद ने इसी वैधृति पर्व में स्नान दान होमदि कर्म करके अक्षय पुण्य प्राप्त किया। तथा इंद्र ने भी इसी पुण्य के द्वारा इंद्रत्व प्राप्त किया। उसी प्रकार वैधृति पर्व में दान होम कर्म भी अक्षय पुण्य को देनेवाला होता है। इसके प्रभाव से नष्ट हुई लक्ष्मी और अनेक पुण्य प्राप्त करके हमेशा के लिये इंद्रपद के अधिकारी हो गए थे। परंतु सूर्यवंशी राजा मांधाता परमधार्मिक और अनेक पुण्य कर्मों करके के वे इंद्रसन पर ज्यादा दिन नहीं बैठ सके। राजा मांधाता ने जब इंद्रसन को प्राप्त कर लिया। तब इंद्र को बड़ी चिंता हुई।
अचानक देवर्षि नारद से उनकी भेंट हुई। और उन्होंने अपनी चिंता का कारण बताकर चिंतामुक्त होने का उपाय पूछा तब देवर्षि नारद ने उनको पुरुषोत्तम मास में वैधृति पर्व में स्नान दान होम का माहात्म्य समझाकर नियम पूर्वक कर्म करने की शिक्षा दी। नारदजी के बताए अनुसार पुरुषोत्तम मास अनेपइंद्र ने वैधृति पर्व में नियम पूर्वक समस्त कर्म किए और अक्षय पुण्य के अधिकारी होतेपर फिर से इंद्रसन प्राप्त कर लिया।
ब्रह्माजी ने भी इसी अक्षयपुण्य के द्वारा सृष्टि रचना में विशेष दक्षता प्राप्त की। प्रत्येक मास में वैधृति पर्व आता है। श्रद्धालु मनुष्य प्रत्येक वैधृति पर्व में पुण्य कर्म कर सकते हैं। परंतु पुरुषोत्तम मास का वैधृति पर्व विशेष रूप से अक्षय पुण्य को देनेवाला होता है। इस पर्व में प्रातः स्नानकर भगवान पुरुषोत्तम का पूजन कर श्राद्ध, शहद, दध, घी, तिलके लड्डू, नारियल, सौलह पान, सौलह सुपारी इन सबको एकत्र कर पात्र में रखकर श्रद्धा से संकल्प-पूर्वक दान करना चाहिए। इस पुण्यकर्म से मनुष्य को समस्त सांसारिक सुख प्राप्त होकर अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। हे लक्ष्मी इस प्रकार महान पुण्य देने वाला वैधृति पर्व का माहात्म्य मैंने संक्षेप में तुम से कहा। अब व्यतिपात योग के पर्व का माहात्म्य कहता हूँ। व्यतिपात योग सूर्य और चंद्रमा के संयोग से उत्पन्न हुआ महान पर्व है। इस पर्व में कर्म करने से मनुष्य में धार्मिक वृत्ति का निर्माण और वृद्धि होते हैं। तथा धर्मराज प्रसन्न होते हैं। और कर्म करने वाले मनुष्य को धन धान्य, संतति, संपत्ति और विशुद्ध कीर्ति प्राप्त होकर सांसारिक जीवन सुखमय व्यतीत होता है।
सूर्य चंद्रमा के ग्रहण में कुरुक्षेत्र में दान करने से जिस पुण्य की प्राप्ति होती है। उससे बारहगुना पुण्य व्यतिपात योग में करने से प्राप्त होते हैं। कुरुक्षेत्र और चक्रतीर्थ में देह का परित्याग करने से जिस पुण्य की प्राप्ति होती है। उससे भी ज्यादा पुण्य व्यतिपात योग में दान करने से होती है। इस योग में तपस्या के प्रभाव से अनेक ऋषियों ने स्वर्ग लोक को प्राप्त कर लिया। इस योग में करने से पितृ लोक में पूर्वज प्रसन्न होते हैं। व्यतिपात योग भी प्रत्येक मास में आता है। परंतु पुरुषोत्तम मास में व्यतिपात योग महान पुण्य देता है।
भाद्रपद मास की अमावस्या को गंगाजी में स्नान करने से जिस पुण्य की प्राप्ति होती है। उससे भी हजार गुना पुण्य पुरुषोत्तम मास में व्यतिपात पुण्य देनेवाला होता है। प्रातः स्नान करके भगवान पुरुषोत्तम की पूजा करके ब्राह्मण का पाद प्रक्षालन करके पूजा करें। नारियल, तेरह,
केला के फल, तेरह खाािक, तेरह अंगूर, तेरह आम के फल, अखंड (अक्षत) कटहल का फल और ऋतु में उत्पन्न होने वाले जो भी फल प्राप्त हों। दक्षिणा के सहित संकल्पपूर्वक दान करना चाहिए। इस पुण्य के प्रभाव से समस्त पापों का समूह भस्म हो जाते हैं। जैसे अग्नि में तृण घास आदि भस्म होते हैं उसी प्रकार वैधव्य या शुद्ध हो, भक्ति और श्रद्धा से किया हुआ यह कर्म सबके लिये समान फल देने वाला होता है। समस्त फलों की प्राप्ति के लिये इस महापर्व में सुवर्णदान अवश्य करना चाहिए। इस व्यतिपात योग में तिलपात्र के दान का भी बड़ा महत्व है।
हे लक्ष्मी पुरुषोत्तम मास के व्यतिपात योग में जो भी मनुष्य श्रद्धा से धन, धान्य, तिलपात्र का दान उपरोक्त वस्तु सामग्री का दान करते हैं उनके तत्काल पुण्य की प्राप्ति होती है। इसलिये मनुष्य को चाहिये कि इस पर्व में अपनी शक्ति के अनुसार दान कर्म अवश्य करें।
हे लक्ष्मी मैंने संक्षेप में व्यतिपात योग के पर्व का माहात्म्य तुम से कह दिया। अब मैं तुम से पूर्णिमा के माहात्म्य का वर्णन कहता हूँ। पूर्णिमा का व्रत करने से समस्त देवता प्रसन्न होते हैं। विशेषकर पुरुषोत्तम मास की पूर्णिमा को थोड़ा भी दानपुण्य महान फल को देने वाला होता है। स्नान करके भगवान पुरुषोत्तम की पूजा करके जो भी वस्तु दान देने की इच्छा हो जैसे सुवर्ण, तिलपात्र, धन, धान्य, वस्त्र फल आदि संकल्पपूर्वक दान करना चाहिए। इस दान को ब्राह्मण के रूप में साक्षात ब्रह्माजी ग्रहण करके प्रसन्न होते हैं। समस्त तीर्थों का पुण्य प्राप्त होता है। मन वाणी और शरीर से किये हुए समस्त पाप नष्ट होकर अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। लक्ष्मी जैसे पूर्णिमा का माहात्म्य है उसी प्रकार अमावस्या का भी बड़ा महत्व है। अमावस्या विशेषकर पुरुषोत्तम मास की अक्षय पुण्यदायिनी होती हैं। अमावस्या को स्नान व्रत दान कर्म से पितृलोक मे स्थित देवता और पूर्वज प्रसन्न और तृप्त होते हैं। मनुष्य अपने पूर्वज के ऋण से मुक्त हो जाता है। अमावस्या के दिन प्रातः स्नान कर भगवान पुरुषोत्तम की पूजा करके देवताओं का और पितरों का तर्पण करके अपनी शक्ति और श्रद्धा के अनुसार दान देने योग्य वस्तु सामग्री जैसे सुवर्ण, तिलपात्र, धन, धान्य, वस्त्र, फल आदि का दान सुपात्र ब्राह्मण को पूजन करके संकल्पपूर्वक तैंतीस मालपुआ उत्तम सामग्री से बनाकर पात्र में रखकर दान करना चाहिए।
(१९)
इस दान से पितर वर्ग प्रसन्न होकर दान करने वाले को समस्त मनोकामनाएं परिपूर्ण करते हैं। जो मनुष्य पितरों के निमित्त अमावस्या के दिन अन्न आदि का दान नहीं करते तथा पितृतर्पण नहीं करते ऐसे मनुष्य नरक के अधिकारी बनते हैं। क्योंकि पितृवर्ग अमावस्या के दिन अपने कुल की संतति से अन्न-वस्त्र जल की आकांक्षा रखते हैं कि हमारे कुल में कोई ऐसी धर्मात्मा संतति होगी जो हमारे निमित्त अन्नदान, वस्त्र आदि अनेक वस्तुओं का दान करेगा हमारा श्राद्ध, पिंडदान, व तर्पण करके हमको तृप्त करेगा। परंतु जब उनकी आकांक्षा पूर्ण नहीं होती। तब वे पितृगण भूख और प्यास से व्याकुल होकर वायु का भक्षण करते हैं। तथा वे क्रोधित होकर अपने कुल के वर्तमान संतति को श्राप दे देते हैं। उनके श्राप से कुल की वर्तमान संतति को अनेक दुःख घटित होते हैं। संपत्ति नष्ट हो जाती है। इसके श्राप से कुल घटित होते हैं। सारा जीवन दुःखमय व्यतीत होता है। इसलिये मनुष्य को चाहिये कि जितने कार्य देवताओं का महत्व है उतना ही पितरों के महत्व को समझकर उनकी प्रसन्नता के लिये श्राद्ध तर्पण दान आदि कर्म अवश्य करें। हे लक्ष्मी मैंने तुम से अमावस्या के महापर्व का माहात्म्य संक्षेप में कह दिया।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
बृहस्पतिरदीय पद्यांशोऽ १८ अध्यायः समाप्त ||
|| शुभमभवतु ||




Adhik mass ki Katha 17 adhyaya | अधिक मास की कथा सतरहवा अध्याय

 Adhik mass ki Katha 17 adhyaya | अधिक मास की कथा सतरहवा अध्याय 


।। अथ सप्तदशो ऽध्यायः प्रारंभः ।।
।। श्री गणाधिपतये नमः ।।
श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं, हे भगवान विष्णु से पुरुषोत्तम मास के महात्म्य को सुनकर लक्ष्मी जी कहती हैं, हे महाप्रभु जिन नर नारियों में उपवास करने की सामर्थ्य न हो उनको कौनसा कर्म करना चाहिये जिससे पुण्य प्राप्ति हो सके भगवान विष्णु लक्ष्मी जी के प्रश्न को सुनकर कहते हैं, हे लक्ष्मी तुमने समस्त जन समुदाय की भलाई के लिये उत्तम प्रश्न किया है, हे लक्ष्मी जो नर नारी संपूर्ण मास उपवास करने में असमर्थ हो उनको करने योग्य अनेक साधन है जैसे मौन धारण करना, एक समय भोजन करना अथवा हविष्यन्न खाकर ही रहना इन नियमों के द्वारा भी संपूर्ण पुण्य प्राप्त होता है। मौन धारण करने से सौभाग्य प्राप्त होता है कलह मिटता है। सुख प्राप्ति और कीर्ति की वृद्धि होती है। शारीरिक क्रांति और आयु की वृद्धि होती है। इसलिये मनुष्य के लिये मौन धारण, बहुत ही लाभदायक है। संपूर्ण समय नहीं तो कम से कम तीन स्थानों में, स्नान भोजन और हवन करने के समय एकाग्रचित और मौन धारण अवश्य करना चाहिये। इन तीनों स्थानों पर मौन धारण से कौन कौन से फल प्राप्त होते है, सो तुम से कहता हूं। मौन होकर स्नान करने से आयु की वृद्धि होती है। मौन होकर भोजन करने से लक्ष्मी की वृद्धि होती है। मौन होकर भोजन करने से समय जो बोलते है उससे वरुण देव क्रोधित होकर भोजन करते से आयु को वृद्धि होते है। समय जो बोलते हैं। उनके आयु का ह्रास होता है मृत्यु कुपित होकर शरीर को रोग ग्रस्त कर आयु का हरण करती है। इसलिये मनुष्य को इन तीनों स्थानों पर अवश्य ही मौन धारण करना चाहिये है लक्ष्मी इन तीनों स्थानों का मौन तो मनुष्य को हमेशा ही करना चाहिये परंतु पुरुषोत्तम मास का मौन विशेष पुण्यदायक होता है सभी प्रकार के पापों का शमन होता है। समस्त मनोकामनाएं परिपूर्ण होती है। अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
इसी पुण्य के प्रभाव से देवर्षि नारद अत्यंत नीच और दासी पुत्र थे परंतु उन्होंने पुरुषोत्तम मास में मौन धारण पुण्य के प्रभाव से ससंगति प्राप्त कर सत्पुरुषों की कृपा से ब्रह्मत्व प्राप्त किया और कुरुक्षेत्र

में तपस्या और उपवास के प्रभाव से ज्ञानी और ब्रह्मपुर की उपाधि प्राप्त कर समस्त ऋषियों में श्रेष्ठता प्राप्त की। हे लक्ष्मी सभी साधनों में सरल और श्रेष्ठ मौन व्रत कहा गया है। अनेक तीर्थों की यात्रा समस्त मासों के धार्मिक कृत्यों से सब पुरुषोत्तम मास में मौन धारण कर्म के सामने तुच्छ है। इस पुण्य कृत्य की प्रशंसा ब्रह्मा महादेव आदि अनेक देवताओं ने की है। मौन धारण के पुण्य प्रभाव से जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट होकर अनंतपुण्य की प्राप्ति होती है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, की उपलब्धि होती है। हे लक्ष्मी इस विषय में एक पुरातन का इतिहास कहता हूं।
पहले अवंति पुरी नाम की नगरी में एक वेदशर्मा नामक ब्राह्मण रहता था। वह ब्राह्मण नित्यवेदी पाठ शांतस्वभाव दानी और जितेंद्रिय था। अपने धर्म कर्म में रातदिन लगा रहता था। हमेशा पुरुषोत्तम मास में व्रत नियम धारण करके संपूर्ण मास श्रद्धा पूर्वक व्यतीत करता था। अनेक समय व्यतीत हो गया उसकी वृद्धावस्था आ गई इसी समय पुरुषोत्तम मास का प्रारंभ होने में जब तीन दिन बाकी रह गए तब वह ब्राह्मण मन में विचार करने लगा कि मैं अनेक वर्षों से पुरुषोत्तम मास में व्रत नियम स्नान आदि करता था परंतु अब मेरे में उपवास करने का सामर्थ्य नहीं है। अब मैं क्या करूं कौन सा कर्म करूं जो मेरे से सार्थक हो सके समझ में नहीं आता इस प्रकार वह ब्राह्मण दिन भर विचारमन रहा और रात्रि में भी वही सोचना हुआ सो गया। अपने भक्त को चिंताग्रस्त देखकर परमदयालु भगवान पुरुषोत्तम रात्रि में उसको स्वप्न में दर्शन देकर कहते है, हे ब्राह्मण तुम मौनव्रत धारण करो इस नियम से तुमको संपूर्ण नियमों के फल की प्राप्ति होगी। इस प्रकार का आदेश देकर भगवान अंतर्ध्यान हो गए। भगवान के अंतर्ध्यान होते ही ब्राह्मण जागृत हो गया।
और आश्चर्य चकित हो मन में सोचने लगा यह दिन दयालु भगवान की ही कृपा थी मुझे प्राप्त की असमर्थ और चिंताग्रस्त स्थिति देखकर स्वयं मार्गदर्शन करने के निमित्त मुझे आदेश देने आए। यह सोचते हुए उसके नेत्रों से आंसुओं की धारा बहने लगी और श्रद्धापूर्वक भगवान का स्मरण करते हुए कहता है। हे शारंगधर हे दीनदयाल मेरे उपर कृपा कर, मेरे उद्धार के लिये मुझे इतना कष्ट किया। आपके इस उपकार को मैं कैसे चुकाऊंगा। इस प्रकार प्रेम में निमग्न होकर ब्राह्मण ने रात्रि व्यतीत की। प्रातः उठकर हर्षित हो नित्य करने लगा। इस प्रकार जिस दिन से पुरुषोत्तम मास प्रारंभ हुआ उसदिन प्रातः स्नानकर नित्य कर्मों से निवृत होकर भगवान पुरुषोत्तम की पूजाकर मौन व्रत धारण करने का संकल्प करके संपूर्ण मास मौन धारण करते

हुए भोजन करने का नियम चलता रहा। अंत में उपवास के दिन विधानपूर्वक उद्यापन किया यथाशक्ति दान पुण्यआदि कर्म किया। ब्राह्मण के इस प्रकार श्रद्धापूर्वक किए हुए कृत्य से प्रसन्न होकर भगवान पुरुषोत्तम साक्षात प्रगट होकर कहते है, हे ब्राह्मण मैं तुझ पर अत्यंत प्रसन्न हूँ तेरे मन में जो इच्छा हो वरदान मांग ले। मैं तेरी समस्त इच्छाओं को परिपूर्ण करूँगा।
भगवान को अपने समक्ष देखकर और वरदान का आग्रह करते हुए देखकर वह ब्राह्मण अत्यंत प्रसन्न होकर बारंबार भगवान को दंडवत नमस्कार करता हुआ हाथ जोड़कर कहता है, हे महाप्रभु दीनदयाल यदि आप मेरी इच्छा पूर्ण करना चाहते है तो मैं आपसे यही प्रार्थना करता हूँ कि मेरी भक्ति आपके चरणों में हमेशा इसी तरह बनी रहे। और संसार में आपके जितने भी भक्त जन हो उनको भी इसी प्रकार आपकी कृपा प्राप्त होती रहे। इस जन्म में मेरे द्वारा मनक्रम वचन से ब्राह्मणों की सेवा और अनेक धार्मिक कर्म घटित हो। मैं दीन दुखियों की सहायता और दूसरों पर उपकार करता रहूँ। मेरा शरीर निरोगी रहे, घर में लक्ष्मी स्थिर रहे। इस प्रकार आपकी सेवा में मेरा संपूर्ण जीवन व्यतीत हो। मृत्यु के बाद मुझे स्वर्ग लोक की प्राप्ति हो। ब्राह्मण की इच्छा को सुनकर उसकी इच्छा के अनुसार वरदान देकर भगवान अंतर्ध्यान हो गए।
भगवान की कृपा से वह ब्राह्मण संसार में सर्वसंभ्र होकर अनेक शुभ कर्मों को करता हुआ अनेक सांसारिक भोगों को भोगकर अनेक यज्ञ किए, परोपकार के निमित्त नित्य कुआं, बावली, तालाब, धर्म शालाएं, प्याऊ, अत्रका सत्र चलाता हुआ आनंद मय जीवन व्यतीत करता हुआ। संपूर्ण जीवन सुखमय बिताकर आयु समाप्त होने पर मृत्यु को प्राप्त हुआ उत्तम विमान उसको लेने के लिये स्वर्ग लोक से आया। उसकी आत्मा ने दिव्य रूप धारणकर उत्तम विमान पर बैठकर देवंगनाओं से पूजित होकर स्वर्ग लोक को चला गया। वहां जाकर वह देवताओं से पूजित और सत्कार प्राप्त करके पुरुषोत्तम मास में भगवान की आराधना ने थी प्रशंसा की उसी के पुण्य प्रभाव से तुमको यह परमपद और स्वर्ग की प्राप्ति हुई। इस प्रकार आनंदपूर्वक वह ब्राह्मण स्वर्ग लोक का सुख भोगता हुआ आज भी स्वर्ग में विद्यमान है।
जै जै श्री अधिकमास महात्म्य सार
बृहत्नारदीय पद्मादशे ऽध्यायः समाप्त





Adhik mass ki Katha 16 adhyaya | अधिक मास की कथा सोलहवां अध्याय

 Adhik mass ki Katha 16 adhyaya | अधिक मास की कथा सोलहवां अध्याय 


।। अथ षोडशोऽध्यायः प्रारभ्यः ।।
।। श्री मन्महागणपतये नमः ।।
श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकदि ऋषियों से, भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी से इस कल्याणदायिनी कथा को सुनाकर लक्ष्मीजी ने भगवान से कहा, हे सच्चिदानंद स्वरूप, संसार के दुःखों का हरण करने वाले परोपकारार्थ इन कथाओं को प्रकट किए। आप कृपाकर यह बताएं कि जो लोग स्नान आदिकर्म करने में शरीर से असमर्थ हों। उनको कौनसा कर्म पुरुषोत्तम मास में करना चाहिए जिससे उनको पुण्य प्राप्ति हो। लक्ष्मीजी के प्रश्न को सुनकर भगवान विष्णु कहते हैं। हे लक्ष्मी तुम्हें समस्त जनसमुदाय के कल्याण के लिये उत्तम प्रश्न किया है। जो नर अथवा नारी शरीर से अशक्त हैं इस कर्म के द्वारा उनकी समस्त मनोरमनाएं परिपूर्ण होगी कलियुग में जो लोग कृष्ण के नामका जप, कीर्तन भजन करना चाहिए। है वे हजारों यज्ञ का फल प्राप्त करते हैं। और करोड़ों तीर्थों का फल प्राप्त करते हैं। जो लोग धर्म में आस्था रखकर पवित्रपूर्ण हरिकीर्तन, भजन, जप निरंतर करते हैं वे ही सत्पुर कहलाते है। और अपने पुण्यकर्म के प्रभाव से पितरों का उद्धार करते हैं।
विद्वानों का कहना है। संसार में सैकड़ों पुत्र दुष्टशरीर वाले पृथ्वी पर उत्पन्न होकर पृथ्वी का भार बनकर रहते हैं। ऐसे पुत्रों से पूर्वजों को कष्ट होता है। यदि कुल में एक भी पुत्र धर्मात्मा और भगवान का भक्त होता है। तो सात कुलों का उद्धार अपने पुण्य कर्मों से कर देता है। धर्मात्मा पुत्र हमेशा भगवान के चरणों में आस्था रखकर भगवान स्मरण जप भागवद् गीता का पाठ और भगवान पुरुषोत्तम की आराधना करते हुए जीवन व्यतीत करते हैं। वे ही संसारिक आवागमन से मुक्त हो जाते हैं। जैसे स्त्री की हत्या, राजा की हत्या, विश्वासघाती, दूसरों का सर्वस्व हरण करने वाला, बालकों की हत्या करने वाला, ग्राम में अग्नि लगाने वाला, गर्भपात करने वाला, मदिरा पीनेवाले, सर्व निंदक, गोरियों का हत्यारा, किए उपकार को न मानने वाला, मार्ग में बाधा उत्पन्न कर यात्रियों को कष्ट देने वाले, आदि अनेक पाप कर्म करने वाले समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं। चारों वेदों का अध्ययन और धर्मशास्त्रों की व्याख्या और इतिहास का उपदेश देने से, चांद्रायण व्रत करने से, अनेक मंत्रों

का जप करने से, सातों द्वीपों की परिक्रमा और अनेक दानदे से, हाथी घोड़े रथ सुवर्ण का दान करने से, अनेक मंदिरों की प्रतिष्ठा करने से, अनेक तीर्थों का भ्रमण करने से जिस पुण्य की प्राप्ति होती है। उससे भी हजार गुना पुण्य की प्राप्ति कलियुग में सिर्फ भगवान के नाम:स्मरण व तप से हो जाती है। सभी युगों से ज्यादा इस कलियुग में भगवान के नाम का माहात्म्य कहा गया है। विशेषकर पुरुषोत्तम मास में और भी विशेष फलदायी महाव्रत भगवान स्मरण का कहा गया है। भगवान के शब्दों को सुनकर लक्ष्मीजी कहती है, हे देवाधिदेव आपने भद्रनाम की महिमा का बहुत उत्तम वर्णन सुनाए, अब आप अन्नदान की महिमा का वर्णन बताईये। भगवान विष्णु प्रसन्न होकर कहते हैं। हे प्रिये तुम्हें उत्तम प्रकार का प्रश्न किया है जिसकी महिमा से मनुष्य तुरंत पापरहित हो जाता है। ऐसा तत्काल फलदाई अन्नदान होता है। संपूर्ण ब्रह्मांड में अन्न को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। क्योंकि अन्न के द्वारा संपूर्ण जीवों का पोषण होता है। अब सब जीवों का प्राण है। अन्न के द्वारा शरीर की पुष्टि होती है। मनुष्य चाहे कोई व्रत जप तप नियम न धारण करे परंतु अन्नदान के द्वारा उत्तम पुण्य प्राप्त कर सकता है। जो मनुष्य पुरुषोत्तम मास में थोड़ा भी अन्नदान कर लेता है। वह अनंत पुण्य को प्राप्त करता है।
उसी प्रकार पुरुषोत्तम मास में जो मनुष्य एक भी उपवास कर लेता है वह समस्त मनोकामना से परिपूर्ण होकर मोक्ष को प्राप्त होता है। संपूर्ण मास का उपवास एक पक्ष का उपवास अथवा छांवत्रि या तीन रात्रि के बाद का एकांतरा उपवास इस प्रकार एक दिन का व्रत आदि धारण करना चाहिये। मनुष्य में जैसी शारीरिक शक्ति और क्षमता हो उसी के अनुसार यह पुरुषोत्तममास में श्रद्धा के सहित एक तो भी व्रत करना चाहिये। हे लक्ष्मी इस विषय में एक पुरातन इतिहास सुनाता हूँ। नर्मदादी के किनारे महिष्मती नाम का एक नगर था उस नगर में तापसी नाम की एक ब्राह्मणी रहती थी। वह हमेशा धर्म कर्म में लगी रहने से उसका तापसी ऐसा नाम प्रसिद्ध हो गया था। पुरुषोत्तम मास में नित्य नियम धारण करते हुए श्रद्धा पूर्वक संपूर्ण मास का पुण्य प्राप्त करती थी। उस तापसी को बाल्यावस्था की सखी जदि जाति में उत्पन्न चपला नाम की थी वह अनेक घरों में लोगों का गृहकार्य करके अपना गुजर करती थी।
अचानक दैव योग से मध्यावस्था के बाद उसके शरीर में कुष्ठ रोग उत्पन्न हो गया जिससे उसको

महाकष्ट होने लगा। लोगों ने अपने अपने घर में उससे काम करना बंद कर दिया इसका कारण यह गंध से वह व्याकुल और रोग से ग्रसित होने से मृत्यु की कामना करने लगी परंतु मृत्यु भी नहीं हो रही थी। इस समय कष्ट के समय उसको अपनी सखी तापसी के पास जाकर प्रार्थना करने लगी। हे सखी मेरा संपूर्ण जीवन निरर्थक हो व्यतीत हुआ। मेरे अन्न पोषण के निमित्त दूसरे के गृह कार्य करने में जीवन व्यतीत कर दिया। जीवन में कोई भी पुण्य कार्य व्रत नियम आदि मैंने नहीं किया। इसलिए मुझे मृत्यु भी नहीं होती। मृत्यु के बाद भी मुझे कर्मों के कारण नरक यातना भोगनी पड़ेगी। इसलिए हे सखी तुम बड़ी पुण्यवान हो।
तुम अगर अपने पुण्य में से थोड़ा पुण्य मुझे दे दो तो मेरा उद्धार हो जायेगा। तुम्हारे पुण्य के प्रभाव से सुखपूर्वक मेरी मृत्यु होकर मैं नरक की यातना से बच जाऊंगी। हे सखी तुम बड़ी दयालु हो। मेरी प्रार्थना स्वीकार करो तुम्हारे सिवा मेरा उद्धार करने वाला कोई नहीं है। उसकी करुणापूर्ण प्रार्थना सुनकर तापसी को दया आ गई और उसने हाथ में जल लेकर भगवान पुरुषोत्तम का स्मरण करके संकल्प किया कि मैंने पुरुषोत्तम मास में जो उपवास का नियम धारण किया था उसमें से एक उपवास का पुण्य इसको समर्पित करती हूं। ऐसा कहकर हाथ का संकल्पित जल जैसे उसके शरीर पर छोड़ा वैसे ही हो स्वर्ग लोक से उत्तम विमान आया और उसका रोगग्रस्त शरीर मृत्यु को प्राप्त होकर उसकी आत्मा दिव्य स्वरूप होकर स्वर्ग लोक के विमान पर बैठकर स्वर्ग लोक को चली गई। स्वर्ग लोक के सुखों को भोगकर फिर से पृथ्वी पर जन्म लिया। इस जन्म में वह पुण्य के प्रभाव से काशी नाम की नगरी में राजकन्या के रूप में उत्पन्न होकर अनेक परोपकारी और शुभ कृत्यों को करते हुए भगवान विश्वनाथ की अनन्य भक्ति करते हुए संसार में विख्यात होकर शिवलोक को प्राप्त हुई। हे लक्ष्मी पुरुषोत्तममास के एक उपवास का पुण्य इतना प्रभावशाली हुआ कि वह सुदंरी जिससे जीवन भर कोई शुभ कर्म नहीं किया अपनी सखी तापसी के द्वारा दिए हुए पुण्य के प्रभाव से इतना सुख और उत्पाद प्राप्त किया तो फिर जो स्वयं भगवान पुरुषोत्तम की सेवा आराधना व्रत नियम धारण करेंगे उनको कितना पुण्य और उस पुण्य के प्रभाव से कितना सुख प्राप्त होगा इसकी कल्पना तुम स्वयं कर सकती हो।
जे जे श्री अधिकमास माहात्म्यसार बृहन्नारदीय पद्याधारे षोडशोऽध्यायः समाप्त ।। (१६)






Adhik mass ki Katha 15 adhyaya | अधिक मास की कथा पंद्रहवां अध्याय

 Adhik mass ki Katha 15 adhyaya | अधिक मास की कथा पंद्रहवां अध्याय 


॥ अथ पंचदशोऽध्यायः प्रारम्भः ॥
॥ श्री गणाधिपतये नमः ॥
श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकदि ऋषियों से, अगस्त ऋषि राजा चित्रबाहु से और भगवान विष्णु लक्ष्मीजी से कहते हैं, हे लक्ष्मी मणिग्रीव ने अपने जीवन का वृतांत कहते हुए कहा कि, मैं उसी नगर में शुद्ध जाति में उत्पन्न मेरा नाम मणिग्रीव है। मैं भी अपने पत्नी के सहित उसी नगर में रहता था। मैं भी धन संपन्न था शुभकर्म और परोपकार करता हुआ आनंदमय जीवन बिता रहा था।
परंतु दैव योग से मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई। दुष्ट जनों की संगति में पड़कर अपना धर्म छोड़कर दुर्व्यसन, मदिरापान, वेश्यागमन आदि में मैंने अपना सारा धन नष्ट कर दिया। धन नष्ट हो जाने पर चोरी डकैती हिंसाकर्म करने लगा। मेरे इस अपराध से सभी नगरवासी और बंधु वर्ग त्रस्त हो गए। मेरे पति ने मुझे बहुत उपदेश दिए समझाने की कोशिश की परंतु बुद्धि भ्रष्ट होने से मैंने उसकी बात न मानकर आपराधिक कर्म करता रहा। आखिर मेरे दुष्कर्म से तंग आकर नगरवासियों ने राजा के पास शिकायत कर दी। राजा ने भी उनकी बात मानकर मेरी संपत्ति जब्त कर ली। और मुझे नगर से निकाल बाहर कर दिया। मेरी यह पतिव्रता पति ऐसे नाजुक समय में भी अपने मातापिता बंधुवर्ग को त्याग मेरी सेवा में लगी रही। इतने दुर्व्यसन होने पर भी इसने मेरा तिरस्कार नहीं किया। मुझे कोई मारने न सूझने पर आखिर मैंने पति के सहित इस जंगल में आकर अपना निवास बना लिया। यहाँ उदर पोषण के लिये अनेक वन्य पशुपक्षियों की हत्या करके किसी प्रकार जीवनयापन करता हूँ। मुझ से नित्यप्रति हिंसा आदि पाप कर्म होते रहते हैं। हे ऋषिवर मेरा कोई पूर्वका संचित पुण्य था। जिसके प्रभाव से आपके दर्शन हुए। अब मैं आपकी शरण में हूँ। मेरे ऊपर दया करिये। मुझे शरणागत समझकर मेरे समस्त पापों को नष्ट करने के लिये और सद्गति प्राप्त होने के लिये कोई उत्तम उपाय बताएं जिससे मेरे दुःख दारिद्र दूर होकर शेष शांतिपम्य व्यतीत करके अंत में सद्गति प्राप्त हो।
हे ऋषिवर मुझे ऐसा मार्ग दिखाएं जिससे मेरे पाप नष्ट होकर विपुल संपत्ति प्राप्त हो। मैं उसे शुभ
और पुण्य कर्मों में खर्च करके कृतार्थ हो जाऊं। मणिग्रीव के वचनों को सुनकर ऋषि कहते हैं, हे मणिग्रीव तू अब कृतकृत्य हो गया है। तूने ऐसे भयानक जंगल में मेरे प्राणों की रक्षा करके समुचित रूप से मेरा आतिथ्य सत्कार किया। इससे आगे अब तेरा स्त्री सहित कल्याण होगा। भविष्य अच्छा और शुभ होगा इसके लक्षण पहले ही प्रगट हो चुके हैं। अब मैं तुझसे उत्तम प्रकार का कर्म जो कि बिना तीर्थ और दान किए असंतोष को देने वाला है, तुझे बतलाता हूँ ध्यान लगाकर सुन। हे मणिग्रीव अब से जो तीसरा मास आएगा उस मास को पुरुषोत्तम मास कहते हैं।
उस मास में अखंडदीप की स्थापना करने से तुम्हारे समस्त दुःख दारिद्र नष्ट हो जाएंगे तिल का तेल या घी का दीपक होना चाहिए परंतु इस जंगल में तुमको वह प्राप्त नहीं होगा। यहाँ पर महुआ के वृक्ष अधिक दिखाई पड़ते हैं इसलिये महुआ के फलों का तेल निकालकर उसका दीपक लगाना। उसका नियम धारण करना। स्त्री के सहित प्रातः उठकर नित्यकर्मों से निवृत्त होकर इस तालाब में स्नान करना और अपनी कुटी में दीपक की स्थापना करके वहां प्राप्त होने वाले कंद मूल फल फूलों के द्वारा उस दीपक में ही भगवान पुरुषोत्तम का ध्यान करके दीपक का पूजन करना।
इस प्रकार संपूर्ण मास पर्यंत अखंडदीप की स्थापना और पूजन से तुम्हारे समस्त पाप लुप्त होकर तुम्हें लक्ष्मी की प्राप्ति होगी। वैसे तो शास्त्रों में पुण्य प्राप्ति के अनेक मार्ग कहे गए हैं जैसे अनेक प्रकार के व्रत, दान, तीर्थों का सेवन, वेदों का अध्ययन, चांद्रायणव्रत, गोमती नदी के तट का सेवन गयाश्राद्ध हजारों के समय जप दान कर्म वैध्यति और व्यतीपात योग में कुरुक्षेत्र का सेवन दंड वन में तपस्या आदि कर्म महान फल देने वाले कहे गए हैं। फिर भी ये सब कर्म पुरुषोत्तम मास के अखंडदीप की स्थापना से सोलहवां हिस्सा भी नहीं प्राप्त कर सकते हैं। मणिग्रीव पुरुषोत्तम मास में अखंडदीप की स्थापना से बांझ स्त्री पुत्र प्राप्त कर सकती है। धनहीन को धन की प्राप्ति होती है। कन्याओं को गुणी सुशील और दीर्घायु वर प्राप्त होता है। धनहीन को धन की इच्छा वालों को सुंदर पतिव्रता पति प्राप्त होते हैं। विद्यार्थियों को उच्च कोटि की विद्या प्राप्त होती है। सिद्धि
प्राप्ति की इच्छा वालों को सिद्धि प्राप्त होती है। मोक्ष की इच्छावालों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। भगवान पुरुषोत्तम को अत्यंत प्रिय ऐसे पुरुषोत्तममास को आराधना बिना विघ्न और नियम के द्वारा भी अत्यंत सरल उपाय मैंने तुझसे कह दिया। तुमने मेरी बहुत सेवा की मुझे जीवनदान दिया इसीलिए प्रसन्न होकर यह अत्यंत गुप्त साधन मैंने तुम से कहा। अब मैं प्रयागराज को प्रस्थान करता हूँ। तुम्हारा कल्याण हो।
ऐसा कहकर भगवान का नाम स्मरण करते हुए मुनि ने प्रस्थान किया। उनको छोड़ने और मार्ग की पहचान बताने के लिये मणिग्रीव और उसकी पति जंगल में काफी दूर तक जाकर मार्ग की रूपरेखा समझाकर मुनि के चरणों में नमस्कार कर उनको विदा करके अपने आश्रम में आ गए। और मुनि के कहे अनुसार भगवान पुरुषोत्तम का मास आने पर बताए हुए नियम से अखंड दीप की स्थापना और पूजन करते हुए भगवान का नाम स्मरण करते हुए श्रद्धापूर्वक समस्त मास को व्यतीत किया। इस पुण्य कर्म के द्वारा उनका मानसिक संताप शांत होकर अंतःकरण शुद्ध हो गया। वे आनंदपूर्वक पति पति जीवन व्यतीत करने लगे जब जब पुरुषोत्तममास आता बड़ी श्रद्धा के सहित अखंडदीप की स्थापना पूजन नाम स्मरण करके संपूर्ण मास को व्यतीत करते हुए वृद्धावस्था और मृत्यु हो जाने पर वे दोनों उत्तम स्वरूप धारण कर विमान पर बैठकर स्वर्ग लोक को चले गए वहां स्वर्गलोक में देवताओं के साथ अनेक सुखों को भोगकर फिर से इस पृथ्वी पर वही दुराचारी और हिंसक मणिग्रीव के पुण्य प्रभाव से राजा चित्रबाहु के नाम से प्रसिद्ध हुआ। पूर्व जन्म की पति इस जन्म में चंद्रकला नाम से प्रसिद्ध तुम्हारी पटरानी हुई। इसने पूर्वजन्म में पतिव्रता रहकर अपने पति की मनक्रम वचन से सेवा की थी और अखंडदीप की स्थापना पूजा में इसका भी पूर्ण सहयोग था उसी के पुण्य प्रभाव से इस जन्म में भी अपने पूर्व जन्म के पति और पटरानी के रूप में समस्त सुखों को प्राप्त किया। जो स्त्रियां पतिव्रता होती हैं।
वे अपने पति के पुण्य का आधाभाग प्राप्त करती हैं। यह अनेक शास्त्रों का सिद्धांत है। हे राजन पूर्व जन्म के पुण्य प्रभाव से ही तुझे यह निष्कंटक राज्य विपुल वैभव और पतिव्रता पति प्राप्त हुई। तुमने
जो मुझसे प्रश्न किया था कि मैंने पूर्वजन्म में कौन सा पुण्य कर्म किया था जिससे मुझे यह सब प्राप्त हुआ। सो मैंने अध्यात्म योग को किया द्वारा तुम्हारे पूर्व जन्म का संपूर्ण वृतांत तुमसे कह दिया। ऐसा कहकर अगस्त ऋषि राजा को शुभाशीष देकर चले गए। राजा भी अपनी पति के सहित राज्य का सुख भोगकर पृथ्वीपर उत्तम संतान स्थापित कर अपनी प्रतिष्ठा को स्थापित कर मृत्यु के बाद मोक्ष को प्राप्त हुआ। इसी प्रकार अधिक मास आने पर जो भी नर नारी व्रत, उपवास, स्नान, अखंडदीप का स्थापना और दीपदान आदि पुण्य कर्मों को करेंगे वे भी संसार में अनेक सुखों को भोगकर अंत में मोक्ष के अधिकारी होंगे।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
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॥ शुभमभवतु ॥