अधिक मास ki Katha 10 adhyaya |अधिक मास की कथा दसवां अध्याय

 

अधिक मास ki Katha 10 adhyaya |अधिक मास की कथा दसवां अध्याय 



|| अथ दशमो ऽध्याय: प्रारंभ: ||

|| श्री गणधाय पतयेनम: ||

भगवान विष्णु नारद जी से सूतजी शौनकादि ऋषियों से वाल्मीक ऋषि राजा दृढ़धन्वा से तथा श्रीहरि लक्ष्मीजी से कहते हैं हे लक्ष्मी! चैत्र आदि जो बारह महीने हैं उनका स्वामी सूर्य है। इन बारह महीनों में प्रत्येक मास में सूर्य की संक्रांति होती है। परंतु जो संक्रांति से हीन महीना है, उसी को अधिक मास कहा जाता है। उसी के स्वामी भगवान पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। इस मास में थोड़ा भी जप, नियम, व्रतदान, भजन, कीर्तन आदि अक्षयपुण्य देनेवाला होता है। इसलिये इस मास में प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि अपनी शारीरिक शक्ति के अनुसार नियम व्रत आदि धारण करता हुआ श्रद्धापूर्वक दान का पुण्य यादिक कर्म अवश्य करें। ये समस्त कर्म प्रतिपदा से प्रारंभ कर अमावस पर्यंत एक मास तक करे। जिन मनुष्यों में नियमव्रत करने की शारीरिक क्षमता न हो तथा शारीरिक क्षमता होते हुए आर्थिक क्षमता न हो, उनके लिये सरल उपाय यह है कि एक तो श्री नियम धारण कर भगवान का नाम संकीर्तन करते हुए पुरुषोत्तम मास का पुण्य प्राप्त करे। इसमें न तो शारीरिक शक्ति की आवश्यकता न द्रव्य की आवश्यकता है। सिर्फ मन में श्रद्धा भावना और अपने आत्म के उद्धार की आकांक्षा होनी चाहिए। भगवान के वचनों को सुनकर लक्ष्मीजी प्रश्न करती है, हे प्रभो! जो मनुष्य निर्धन है, दुराचारी है, बुद्धिहीन है ऐसे मनुष्यों के लिये कोई सरल उपाय बताएं। भगवान कहते हैं कि हे लक्ष्मी! पुण्य प्राप्ति के अनेक साधन हैं परंतु इनमें सबसे सरल उपाय यह है कि वे विद्वानों का सत्संग करे। जिससे ज्ञान की वृद्धि होती है, श्रद्धा भावना जागृत होकर पुण्यकर्म में प्रवृत्ति होती है। संतों की कृपा से समस्त मनोकामनाएं परिपूर्ण होकर बैकुंठ धाम की प्राप्ति होते हैं। हे लक्ष्मी! इसी प्रकार गौ और ब्राह्मण के पूजा का भी बड़ा महत्व है। गौ के शरीर में चौदह भुवन निवास करते हैं। हे लक्ष्मी! इसी प्रकार गौ का दर्शन, स्पर्श और पूजन मनुष्य के समस्त पापों को नष्ट करके दुःख शोक दारिद्रय नष्ट होकर घर में लक्ष्मी का आगमन, पुत्र पौत्रों की वृद्धि होती है। गौ का पूजन अर्थात ब्रह्माविष्णु महेश का पूजन होता है। गौ के गोबर में यमुनाजी का वास, गो-मूत्र में नर्मदा जी का वास और दूध में गंगाजी का निवास रहता है। इसलिये गौ का पूजन हमेशा करना चाहिए परंतु पुरुषोत्तम मास में गौ पूजा, सेवा विशेष पुण्य दायी होती है।

इसी प्रकार विष्णुपा का भी विशेष महत्व है। मनुष्य के शरीर के लिये गौ का आधार माता के आधार के समान है। गाय का दूध, दही, घी के शरीर कर्म परिपूर्ण होते है। ये पुराण और वेद शास्त्रों के अति पवित्र मानी गई है। वेद और शास्त्रों में भी गाय का बड़ा महत्व कहा गया है। इसलिये गौ को पूज्य का स्थान तथा यशशाला और पूजन का स्थान गौ के गोबर से ही पवित्र होता है। इसलिये गौ को पूज्य का मुख और दूध को अमृत की संज्ञा दी गई है। जिससे मन में स्वर्गलोक प्राप्ति की इच्छा होती है, पुरुषोत्तम मास में गौ की सेवा और पूजा करने वाले को वही पुण्य की प्राप्ति होती है। गाय सूर्य की कन्या है। समस्त जनकल्याण और यज्ञ साधन की पूर्ति के लिये ही इसकी उत्पत्ति हुई है। जैसे कि भागीरथी गंगा अति पवित्र व जनकल्याण का कारण है, उसी प्रकार गौ भी पवित्र और जनकल्याणप्रदाय है। हे लक्ष्मी! गौ के महत्व का वर्णन चार मुखवाले ब्रह्माजी भी करने में असमर्थ है।

गौ दान का महात्म्य समस्त दानों से श्रेष्ठ होता है। हे लक्ष्मी! जिस मनुष्य के मन में पुरुषोत्तम मास का अनंत पुण्य की प्राप्ति की इच्छा हो। उनको चाहिये कि अच्छे लक्षणों से युक्त सुशील, युवावस्था और पुष्ट शरीर वाली गौ को वस्त्र और अलंकार से सुशोभित करें यदि सामर्थ्य हो तो गाय के सींग सुवर्ण से तथा खुरचांदी से मड़वाकर श्रद्धापूर्वक विधान से पूजन करके सुपात्र ब्राह्मण को संकल्पपूर्वक दान करे। अधिकमास में किया हुआ गौदान जन्म जन्मांतर के पापों को नष्ट करने वाला, तथा स्वर्गलोक देने वाला होता है। तीनों लोकों में गौदान के पुण्य के समान कोई पुण्य कार्य नहीं है। हे लक्ष्मी! गौदान सुपात्र ब्राह्मण को ही देना चाहिए। सुपात्र ब्राह्मण किसे कहते हैं सो सुनो। जो ब्राह्मण अपने धर्म कर्म में लगा हो। जिसमें शास्त्रों का अध्ययन किया और विद्वान हो। जो ब्राह्मण अपने कुटुंब परिवार का पालन करने वाला, और शांत स्वभाववाला, शुद्ध और सात्त्विक प्रकृति वाला, अपने कुटुंब परिवार का पालन करने वाला, भगवान की भक्ति और सेवा में तत्पर हो वही ब्राह्मण सुपात्र माना जाता है।

ऐसे ब्राह्मण को पुरुषोत्तम मास में गौदान करने से महान पुण्य की प्राप्ति और स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है। इसलिये पुरुषोत्तम मास में गौ की सेवा और पूजा करते हुए, पुष्ट शरीर वाली अधिक दूध देनेवाली बछड़े सहित गौ लाकर धर्म शास्त्रों में बताए हुए, अनुसार वस्त्र अलंकार आदि से सजाकर एकाग्रचित्त से श्रद्धा पूर्वक गौ की पूजा करके सुपात्र ब्राह्मण को बुलाकर ब्राह्मण की भी पूजा करे। पाद्य अर्घ आदि उपचार समर्पित करके वस्त्र अलंकार भी दे और उत्तम प्रकार की खाद्य सामग्रियों का भोजन करावे। तांबूल, फल, दक्षिणा देकर संतुष्ट करे। फिर गाय की पूंछ अपने हाथ में लेकर पत्ती छोड़कर ब्राह्मण के चरणों में और ब्राह्मण के चरणों में प्रणाम करे। अगर कोई ब्राह्मण के हाथ में न छोड़ता जाए यह जल ब्राह्मण के हाथ में में छोड़ता जाए। इस प्रकार के दान से ब्राह्मण को प्रतिग्रहण का दोष नहीं लगता। सुपात्र को दान देने से ही दान का सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है। यह गौ दान पितृलोक में और संसार में भी पुण्य देनेवाला तथा दानकर्ता पुरुष को भी महान फलदायी होता है। ये सारे शास्त्रों में और संसार में गौ दान के सदृश कोई पुण्य कर्म नहीं है। कुपात्र को दिया हुआ दान देने वाले और लेने वाले दोनों को नरक की यातना और कष्ट देने वाला तथा सांसारिक जीवन में दुःख दारिद्रय और अनेक व्याधियों से युक्त होकर महान कष्टदायी होता है। इसलिये कभी भी कुपात्र ब्राह्मण को दान नहीं देना चाहिए। उसी प्रकार दुग्धहीन दूध न देनेवाली अत्यंत दुर्बल शरीरवाली, बांझ, रोगी, वृद्ध, अंधी, लंगड़ी, ऐसी गौ का दान पुण्य की अपेक्षा प्रायश्चित देने वाला होता है, ऐसे दान से दाता अपने पूर्वजोंसहित नरक की यातना भोगता है। इसलिये मनुष्य का कर्तव्य है पुण्य प्राप्ति के निमित्त जब द्रव्य और मानसिक श्रद्धा भावना परिपूर्ण हो तभी श्रद्धापूर्वक गौदान करना चाहिए।

इस प्रकार के दान से ही अनंत पुण्य की प्राप्ति कर सकता है। जैसे अमृत कितना स्वादिष्ट है। आकाश कितना बड़ा है। सूर्य का तेज कितना है। पाताल कितना गहरा है। मेरु पर्वत कितना ऊंचा है। भगवान विष्णु और शंकर कितने प्रतापी और तपस्वी हैं। कामदेव की पति कितनी सुंदर है। इन सबकी उपमा का वर्णन करना असंभव है। उसी प्रकार गौ दान के महात्म्य और फल का वर्णन करना असंभव है। इस महात्म्य के श्रवण मात्र से मनुष्यों के अनेक पाप नष्ट हो जाते हैं।

जे जे श्री अधिकमास महात्म्य सार

(४०)

|| शुभमभवतु ||





Adhik mass ki Katha 9adhyaya|अधिक मास की कथा नौवा अध्याय


Adhik mass ki Katha 9adhyaya|अधिक मास की कथा नौवा अध्याय 




 ।। अथ नवमोऽध्यायः प्रारम्भः ।।

।। श्री गणेशाय नमः ।।

भगवान विष्णु नारद जी से सूतजी शौनकदि ऋषियों से तथा वाल्मीकि ऋषि राजा दृढ़धन्वा से उसके पूर्व जन्म का वृत्तांत बतलाते हुए कहते हैं। हे राजन जब ब्राह्मण सुदेव ने भगवान पुरुषोत्तम से आश्चर्य प्रकट करते हुए प्रश्न किया कि कठिन तपस्या करने के बाद जो वरदान मुझे नहीं प्राप्त हो सका उसे कई गुना अधिक वरदान आपने मुझे अनायास कैसे दे दिया। तब भगवान पुरुषोत्तम कहते हैं हे सुदेव तू नहीं जानता अज्ञानवस्था में तुझसे जो कठिन तपस्या घटित हुई है उसके द्वारा अनंत पुण्य तुझे प्राप्त हुआ और उसी के प्रभाव से मुझे प्रसन्न होकर यह वरदान देना पड़ा। हे सुदेव जो मास तेरे दुःखित अवस्था में व्यतीत हुआ वह मेरा परम प्रिय मास था इसमें थोड़ा भी दुःख किया कर्म अनंत पुण्य देने वाला होता है। तुझ से तो कठिन तपस्या घटित हुई है। पुत्र के दुःख में दुःखित अत्रजल का परित्याग कर निरंतर वर्ष में बैठे रहने से रहने से कठिन तपस्या का पुण्य, अखंड उपवास का पुण्य, और भगवान का नाम लेते रहने से चिंतन भजन का पुण्य, इस पुण्य के समान संसार का कोई भी पुण्य कर्म नहीं है।

बड़े बड़े ऋषि मुनि भी पुण्य प्राप्ति के लिये इस मास में निरंतर आराधना करते रहते हैं। इस समय में समस्त पुण्यात्मा संसार में कोई दूसरा नहीं है। इसी के प्रभाव से तुझे यह वरदान प्राप्त हुआ है। हे सुदेव तेरे जन्मांतर के सभी पाप नष्ट होकर शुद्ध पुण्यात्मा की शक्ति प्राप्त हो गई है। इस पुरुषोत्तम मास की महिमा का वर्णन चार मुख वाले ब्रह्मा भी कह सकने में असमर्थ हो गए है। इतना प्रभावशाली यह पुरुषोत्तम मास है। ऐसा कहकर भगवान पुरुषोत्तम वहां से अदृश्य हो गए। वह ब्राह्मण सुदेव पति और पुत्र के सहित प्रसन्नचित्त होकर भगवान पुरुषोत्तम के पुरुषोत्तम मास की महिमा की प्रशंसा करते हुए अपने आश्रम में आकर सुख पूर्वक गृहस्थ जीवन व्यतीत करने लगा। निरंतर देवकर्म व पितृकर्म करते हुए जब पुरुषोत्तम मास आता बड़ी श्रद्धा से व्रतन्नियम धारण करके व्यतीत करता हजार वर्ष तक जीवित रहकर समयानुसार इस शरीर को त्याग कर ब्रह्मलोक का सुख भोगकर फिर से पृथ्वी पर राजा दृढ़धन्वा के रूप में उत्पन्न हुआ।

हे राजन वही पूर्व जन्म की पत्नि गौतमी इस जन्म में पटरानी के रूप में तुझे प्राप्त हुई है। पूर्व जन्म का पुत्र शुकदेव तोते का रूप धारण कर तुझे उपदेश दे गया है। पिता के ऋण से मुक्त होने के के लिये तुझे सांसारिक विषयों में निसन देखकर संसार रूपी सागर को पार करने के लिये उसने यह सद् उपदेश दिया है कि भगवान की आराधना के बिना आत्मा का उद्धार कैसे होगा यदि मैंने पूर्व जन्म के के लिये इस मार्ग का अनुसरण किया। हे राजन अब तू चिंता मुक्त होकर अपने भविष्य को बनाने के लिये इस मास का अनुसरण किया। अब मैं सूतजी से स्नान के लिये जाता हूँ अपने उद्धार कर ले। ऐसा कहकर ऋषि जाने के लिये उद्यत हुए तभी राजा दृढ़धन्वा ऋषि के चरणों को पकड़ कर कहता है।

कि ऋषिवर आपने जो पुरुषोत्तममास के महात्म्य का वर्णन किया है सो मुझे पूर्वजन्म का स्मरण नहीं है कृपाकर आप यह सब आप विस्तार पूर्वक कहने की कृपा करें कि राजा दृढ़धन्वा के प्रश्न पर वाल्मीकि ऋषि कहते है, हे राजन जैसे प्रश्न तुमने मुझसे किया उसी प्रकार का प्रश्न भगवान विष्णु से लक्ष्मीजी ने किया था। मैं तुमसे विस्तार पूर्वक कहता हूँ, एकाग्र चित होकर सुनो एक समय की बात है। वैकुंठ विहारी भगवान विष्णु प्रसन्नचित अपने मंदिर में बैठे हुए थे ऐसे समय लक्ष्मी जी भगवान से कहती हैं। हे नाथ मेरे आपके मुखारविंद से पुरुषोत्तममास की अनेक प्रशंसा सुनी है, कि इस मास में थोड़ा भी कर्म स्नानदान व्रत आदि करने से अक्षय पुण्य व सुख की प्राप्ति होती है, सो आप कृपाकर यह बताएं कि कौन सा व्रत दान आदि कैसे करना चाहिए आप विस्तार पूर्वक बताने की कृपा करें लक्ष्मी जी के प्रश्न पर भगवान विष्णु प्रसन्न होकर कहते है कि लक्ष्मी तुम धन्य हो जो तुम्हारे मन में पुरुषोत्तम मास के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हुई है। हे लक्ष्मी जो महीना सूर्य की संक्रांति से हीन रहता है अर्थात जिस महीने में सूर्य की संक्रांति नहीं होती उसे उस मास को पुरुषोत्तम मास कहा जाता है।

इस मास के स्वामी गोलोकाधिपति भगवान पुरुषोत्तम हैं। जो हम सब देवताओं के भी स्वामी हैं। इस मास में अपनी शक्ति के अनुसार स्नान, दान, व्रत, जप, तर्पण, पूजा, आराधना, भजनकीर्तन आदि का नियम धारण करना चाहिए। तथा भूमिप्रशयन, तेल का त्याग, एक जति के पत्रावली पर भोजन, मालपूप का दान, नख, केश न काटने का नियम, एक समय भोजन, नित्यदीपदल, जूता चप्पल न पहनने का नियम, किसी एक धान्य का परित्याग, आंवले के चूर्ण से स्नान का नियम, किसी फल का त्याग, नमक का त्याग, तिलपान का दान, सुवर्ण चांदी का दान, गौदान, एक दिन के बाद एकदिन उपवास, हविष्य अन्न खाने का नियम, मौन धारण का नियम, इन में से कोई भी एक अथवा ज्यादा नियम प्रथम दिन से धारण कर मास पर्यंत करना चाहिए, इस प्रकार इस मास में जन्म जन्मांतर के पाप भस्म हो जाते है।

इसमें प्रातः काल उठकर नित्यकर्म शौच, मुख, मार्जन दांतोन आदि करके शुद्ध जल से स्नानकर शुद्ध वस्त्र धारण करके नित्य प्रति का संध्या पूजन करके विद्वान ब्राह्मण को बुलाकर उसका पूजन करके उसकी आज्ञा और क्रम से घर में एकांत और पवित्र स्थानपर गोबर से लीपकर रंगवल्ली से स्थान को सुशोभित करके चौरंगपर सफेद वस्त्र बिछाकर अनाज से अष्ट दल कमल बनाये। उसके उपर अपनी शक्ति के अनुसार चांदी तांबा अथवा पीतल का कलश ८ अंगुल लंबा स्थापित करके उसमें सवापंची पंचपल्लव व सप्त मिट्टी तीर्थ व गंगाजी के जल से पूरित करके पहले वरुण देव का पूजन करके उपर ताम्रपात्र पर राधिका के सहित भगवान कृष्ण की सुवर्ण की मूर्ति को स्थापित करें पहले विद्वान ब्राह्मण के द्वारा विधानपूर्वक प्राण प्रतिष्ठा करके अभिषेक पूजन करे ऋतु में उत्पन्न फूल फल और पूजन सामग्री के द्वारा भगवान पुरुषोत्तम का श्रद्धासहित पूजन करके उत्तम प्रकार के मिष्टान्न का भोग लगाकर तांबूल अर्पण करके आरती करे भगवान को साष्टांग दण्डवत नमस्कार करके मिष्ठान्न का भोग लगाकर त्रुटियों की क्षमा मांगे। संपूर्ण मास पर्यंत जलने वाला अखंडदीप की स्थापना करे।

जैसी शक्ति हो वैसा उपरोक्त कहे गए नियमों में से एक या अधिक नियम धारण करने का संकल्प करके भगवान के सामने हाथ में जल लेकर प्रतिज्ञा करे कि मैं संपूर्ण मास पर्यंत इन नियमों को धारण करता हुआ व्यतीत करूंगा। संकल्प करके भगवान के नामों का उच्चारण करें।

(१) नमः पुरुषोत्तमायाय नमस्ते विश्वभावन।

नमस्तेस्तु हृषीकेश, महापुरुष पूर्वज।

(२) येनेदं अखिलं जातं यंत्र सर्व प्रतिष्ठितम्।

त्वयि मेध्यति यत्रैतत् ते अपरोत्तिम केशवम्।

(३) परेशः परमानंदः परास्पर सरः प्रभुः।

चिद्रूप पश्चितपरज्ञेयो समेकृष्णः प्रसीदतु।

(४) कृष्णं कमल पत्राक्षं रामं रघु कुलोद भवम्।

नृसिंहवामनं विष्णुं स्मरन् याति परांगतिम्।

(५) वासुदेव वाराहंच, कंस केसि निषूदनम्।

पुराण पुरुषं यज्ञ पुरुषं प्रणतोस्म्यहम्।

(६) अनाधि निधनं देवं शंखचक्र गदाधरम्।

त्रिविक्रमं हलधरं प्रणतोस्मि सनातनम्।

(७) सइदं कीर्त योज्नित्यं स्तोत्राणामुक्तमोत्तमम्।

सर्वपाप विनिर्मुक्तते गोलोकं महीयते।

इस मास में ब्रमचर्य धारण कर शुद्ध पवित्र रहकर भगवत संबंधी कथा पुराण का श्रवण करके भजन कीर्तन करते हुए संपूर्ण मास को भक्तिभाव पूर्वक व्यतीत करना चाहिए इस कर्म के पुण्य से पापों का समूह नष्ट होकर समस्त मनोकामनाएं परिपूर्ण होती हैं। सांसारिक सुखों को भोगकर मृत्यु के बाद अक्षयपद अर्थात मोक्ष की प्राप्ति होती है।

जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार

ब्रह्मनारदीय पद्याधारे नवमोऽध्यायः समाप्त।।

(१)

।। शुभमभवतु ।।





Adhik mass ki Katha 8 adhyaya| अधिक मास की कथा आठवां अध्याय

 

Adhik mass ki Katha 8 adhyaya| अधिक मास की कथा आठवां अध्याय 




 ॥ अथ अष्टमोऽध्यायः प्रारंभः ॥

।। श्री गणधिपतये नमः ।।

व्यासजी श्रोतागणों से तथा सूतजी शौनकादि ऋषियों से, भगवान् नारायण नारदजी से कहते हैं, हे नारद कल के कथा प्रसंग में वाल्मीकि ऋषि राजा दृढ़धन्वा से उसके पूर्व जन्म का इतिहास सुनाते हुए कहते हैं कि हे राजन् पत्नि गौतमी के वचनों को सुनकर ब्राह्मण को कुछ संतोष हुआ दुःख का परित्याग करके मन में धैर्य धारण करके वह ब्राह्मण सुदेव अपने नित्य नैमित्तिक परिचर्या में लग गया। जो होनेवाला है वह निश्चित ही होगा उसको कोई टाल नहीं सकता। उसको गरुड़जी के वाक्य याद आ गए कि आपत्ति व्याधी दुःख आरोप भगवान्‌की सेवा मनन चिंतन कभी मत छोड़ना भगवान के द्वारा ही समस्त दुःख नष्ट होकर सुख की प्राप्ति होती है। इस परम वाक्य को मन में धारण करके भगवान की आराधना करते हुए अपनी दिनचर्या में संलग्न रहने लगा।

इस प्रकार कुछ समय और बीत गया जब उस बालक की उम्र ने बारहवें वर्ष में प्रवेश किया ऐसे ही एक समय की बात है ग्रीष्म ऋतु का समय था आश्रम के आसपास फूलों के वृक्ष सूख जाने से पूजन के लिये समिधा, कुशा, और फूल लाने वह ब्राह्मण वन में गया हुआ था और पत्नि गृहकार्य में व्यस्त थी। बालक शुकदेव बराबरी के लड़कों के साथ जलक्रीड़ा करने बावली पर गया जल में प्रवेश करने पर बालकों को ग्रीष्म ऋतु के कारण बहुत आनंद आने लगा वे एक दूसरे पर पानी उछालते एक दूसरे का हाथ पकड़कर इधर से उधर खींचते कोई पानी में डुबकी लगाकर किसी का पैर पकड़ कर पानी के भीतर खींचते इस तरह अनेक प्रकार की जलक्रीड़ा करने लगे इस तरह पानी का खेल खेलते हुए काफी समय बीत गया, थकावट आने लगी परंतु बाहर भयानक गर्मी होने से पानी से बाहर निकलने की इच्छा भी नहीं होती थी।

इस प्रकार थकावट में शरीर शिथिल होने पर भी बालक शुकदेव ने श्वासरोककर पानी में घुसकर अपने मित्र का पैर पकड़कर गहरे पानी में खींचकर ले गया नीचे पानी के तलपर पहुंचते ही रोका हुआ श्वास छूट गया और पानी उसके पेट में भर जाने से प्राण निकल गया। मित्रवर्ग शुकदेव को ऊपर न आया देखकर भयभीत हो गए और बावली से बाहर निकलकर चिल्लाते भागते हुए माता गौतमी के पास आए।

जाकर शुकदेव का पानी में डूबने का दुःखद समाचार सुना दिया। सुनते ही गौतमी हाहाकार करती हुई मूर्छित होकर गिर पड़ी। उसी समय ब्राह्मण सुदेव भी वन से वापस आ गया आते ही पुत्र के मरण का समाचार सुनकर कटे हुए वृक्ष के समान पृथ्वी पर गिरकर बेहोश हो गया। थोड़ी देर के बाद जब पत्नि पति की मूर्च्छा दूर हुई तब दोनों हाहाकार करके दौड़ते हुए बावली की ओर भागे। तब तक बालक शुकदेव का मृत शरीर पानी से फूलकर ऊपर तैर रहा था। दोनों ने बालक के शरीर को बावली के बाहर लाकर गोद में रखकर आलिंगन करते हुए बार-बार मुख चूमते हुए रुदन करने लगे।

ब्राह्मण सुदेव कहता है कि हे पुत्र तू निद्रा त्याग कर जल्दी से उठ, मुझसे बात कर, आंखें खोलकर हमारी तरफ देख, तेरे शब्दों को सुनने के लिये हम अधीर हो रहे हैं। इस वृद्धावस्था में हम दोनों को छोड़कर जाना उचित नहीं है। देख तेरे मित्र तुझे अध्ययन करने के लिये बुला रहे हैं। हम तुझे छोड़कर अब आश्रम भी नहीं जाएंगे हमको घर जाने का कोई मतलब नहीं है। हमारे लिये घर अब जंगल के समान दिखाई देता है। हे भगवान मैंने कोई ब्रह्म हत्या नहीं की आज तक कोई पाप कर्म नहीं किया फिर किस कर्म का फल मुझे भोगना पड़ रहा है कि मुझे बालक की मृत्यु देखनी पड़ी है भगवान् में वृद्ध असहाय हूं मेरा सिर्फ एक पुत्र ही सहारा था उसको तुमने मुझ से छीन लिया अब मैं किसका सहारा करूं। हे भगवान आप तो बड़े दयालु प्रसिद्ध हो।

फिर मेरे लिये ऐसी कठोरता क्यों कर रहे हो। ब्राह्मण अनेक प्रकार से रोते हुए विलाप करता हुआ कहता मेघों से पानी गिरता है पानी से पृथ्वी अन्न उत्पन्न करती है। भूमि में अनेक प्रकार के रत्न मिलते हैं। सागर से मोती प्राप्त होते हैं परंतु ऐसा कोई स्थान नहीं दिखता जहां से मेरा मृत पुत्र जीवित प्राप्त हो जाय। हे पुत्र तू भी मेरे ऊपर दया नहीं करता एक बार तो हमसे बात कर देख तेरी माता किस प्रकार बिलख बिलखकर रो रही है। आज तक तू कभी हमसे पूछे बिना कहीं नहीं गया, कभी वेदाध्ययन में नागा नहीं किया फिर तू आज इतना निष्ठुर क्यों हो गया। तेरे वे मीठे वचन अब कहां सुनने को मिलेंगे। मेरा हृदय भी कितना कठोर है, मुझे धिक्कार है बालक मृत देखकर भी मेरे प्राण नहीं निकल रहे। वे राजा दशरथ धन्य हैं। जिन्होंने पुत्र को वनवास जाता देखकर अपने प्राणों का परित्याग कर दिया। मैं दुःख की अग्नि में जल रहा हूं परंतु मेरे प्राण नहीं निकल रहे। हे देवाधिदेव हे जगन्नाथ दोनों पर दया करने वाले लक्ष्मीपति वैकुंठाधिपति आपके सिवा अब मेरी रक्षा करने वाला कोई नहीं है। तीनों लोक में मेरे समान मूर्ख और दुर्भागी कोई नहीं होगा। जो मैंने भगवान के वचनों को न मानकर पुत्र के लिये जिद कि अगर मैं उनका कहना मान लेता तो मुझे यह दिन क्यों देखना पड़ता।

यह दुःखित और रोते हुए पति पत्नि पुत्र के मृत शरीर को गोद में लेकर वहीं बैठे रहे। उन्होंने निश्चित कर लिया कि अब हम जीवित रहकर क्या करेंगे, यहीं बैठे बैठे अपने प्राणों का परित्याग कर देंगे। अकस्मात आकाश में बादल घिर गए, गर्जना होने लगी, बिजली कड़कने लगी और भयंकर बरसात होने लगी। आंधी चलने से बड़े बड़े वृक्ष उखड़कर गिर गए। ऐसा भयंकर प्रकृति का उन्माद होने पर भी ब्राह्मण पति पत्नि दुःखित रोते हुए अचल जल का परित्याग कर बैठे हुए कभी अपने भाग्य को कोसते कभी पुत्र का आलिंगन करते कभी देवाधिदेव भगवान से अपने दुःख का वर्णन करते हुए दया की भीख मांगते हुए उनको चालीस दिन का समय बीत गया कब सूर्य उदय हुआ कब अस्त हुआ इसका भी उनको ज्ञान नहीं था। भाग्यवश वह समय पुरुषोत्तम का संपूर्ण मास था जो ब्राह्मण ने दुःखमय पुत्र शोक में अन्नजल का परित्याग कर व्यतीत किया था।

परम प्रिय भगवान्पुरुषोत्तम का अत्यंत अनंत पुण्य दाता मास में अज्ञातवस्था में ब्राह्मण के द्वारा जो कठिन तपस्या घटित हुई उसके द्वारा भगवान् पुरुषोत्तम प्रसन्न होकर ब्राह्मण के समक्ष प्रगट हुए उस समय भगवान का स्वरूप नवीन मेघ के समान पीतांबर धारण किए हुए दो भुजावाले मुरली धारण किए हुए गले में वनमाला सुशोभित हो रही है। ऐसी सुंदर आकृति और स्वरूप में प्रगट हुए। भगवान के सुंदर स्वरूप को देखकर ब्राह्मण गोद से बालक का मृत शरीर जमीन पर रखकर प्रसन्नमुख बारंबार दंडवत करता हुआ हांथ जोड़कर खड़ा हुआ। दया के सागर मोक्ष के दाता भगवान पुरुषोत्तम उससे कहते हैं हे ब्राह्मण तू धन्य है, बड़ा भाग्यशाली है तूने जो इस पुरुषोत्तम मास में कठिन तपस्या की है उससे मैं बहुत प्रसन्न हूं। हे ब्राह्मण तेरा यह मृत पुत्र जीवित होकर इसकी आयु बारह हजार वर्ष की होगी।

पुत्र सुख के अलावा और भी बहुत सांसारिक सुख तुझे प्राप्त होंगे। इस पुत्र के साथ गृहस्थ सुख भोगकर इस शरीर को छोड़ने के बाद तुझे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होगी। वहां बारह हजार वर्ष सुख भोगने पर पृथ्वी पर मनुष्य योनि में जन्म होगा। इस संसार में राजा दृढ़धन्वा के नाम से प्रसिद्ध होकर धन, बल, वाहन, संपत्ति, राज, ऐश्वर्य दिन प्रतिदिन बढ़कर चक्रवर्ती राजा के रूप में प्रख्यात होगा। यही पत्नि दूसरे जन्म में तेरी पटरानी होगी। सर्वगुण संपन्न सुंदर चारपुत्र और एक कन्या होगी अनेक दिन राजसुख में निमग्न व्यतीत होंगे। सांसारिक विषय में निमग्न होने से भगवान का स्मरण भूल सा जायेगा। तब यही तेरा पुत्र तोता का शरीर धारण कर वट वृक्ष पर बैठकर मनुष्य वाणी में तुझे उपदेश देकर सचेत करेगा।

इसके वाक्यों को सुनकर तुझे वैराग्य उत्पन्न होकर चिंताग्रस्त रहेगा। तब वाल्मीकि ऋषि के द्वारा यथार्थ ज्ञान प्राप्त करके तू भगवान की सेवा में लिप्त होगा तथा समयावधि के अनुसार मोक्ष को प्राप्त करेगा। इस प्रकार का वरदान देते ही ब्राह्मण का मृतपुत्र जीवित होकर मातापिता तथा भगवान के चरणों को प्रणाम करके प्रसन्न मुख स्वस्थ हो गया।

भगवान पुरुषोत्तम के द्वारा प्राप्त वरदान तथा जीवित पुत्र को देखकर ब्राह्मण पति पत्नि अत्यंत प्रसन्न होकर बारंबार भगवान के चरणों में प्रणाम करते हुए हांथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए कहते हैं हे महाप्रभु दीन दयालु कृपाकर मेरे मानसिक संदेह को दूर करने की कृपा करें। हे ऋषिकेश मैंने चार हजार वर्ष तक कठिन तपस्या की जिससे भगवान विष्णु प्रसन्न होकर वरदान देने के लिये प्रगट हुए। मैंने पुत्र प्राप्ति का वरदान मांगा तो उन्होंने कहा तेरे प्रारब्ध में सात जन्म तक पुत्र का सुख नहीं है। सो हे महाप्रभु आज मैं देख रहा हूं मेरा मृत पुत्र भी जीवित हो गया और आपने ब्रह्मलोक का सुख दूसरे जन्म में मुझे अखंड चक्रवर्ती राज्य, चार पुत्र एक कन्या और संसार के सभी सुखों का वरदान बिना किसी तपस्या व आराधना के आपने मुझे क्यों दे दिया। यह सब देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है। कृपा करके मेरे मानसिक संदेह को दूर कर दीजिये। इस प्रकार वह ब्राह्मण सुदेव भगवान पुरुषोत्तम से प्रार्थना करता हुआ हाथ जोड़कर खड़ा रहा।

जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार बृहन्नारदीय

पद्याधारे अष्टमो s अध्यायः समाप्त ॥

(८)

॥ शुभंभवतु ॥





Adhik mass ki Katha 7 adhyaya| अधिक मास की कथा सातवां अध्याय

 


Adhik mass ki Katha 7 adhyaya| अधिक मास की कथा सातवां अध्याय 



॥ अथ सप्तमो ऽ ध्याय: प्रारंभ: ॥

॥ श्री गणेशाय नम: ॥

व्यासजी श्रोतागणों से सूतजी शौनकदि ऋषियों से भगवान नारायण नारदजी से कहते हैं कि हे नारद, वाल्मीकि ऋषि राजा दृढ़धन्वा को बता रहे हैं कि वह सुदेव ब्राह्मण भगवान की स्तुति कर हाथ जोड़कर खड़ा रहा। उसके वचनों को सुनकर सच्चिदानंद भगवान विष्णु गंभीर वाणी में कहते हैं, हे ब्राह्मण तुमने जैसी तपस्या की है। उस उग्र तपस्या के द्वारा मैं अत्यंत प्रसन्न होकर तुझे वरदान देने के लिये मैंने तुझे दर्शन दिया है। अब तेरे मन में जो भी इच्छा हो वह मांग। मैं तेरी सभी इच्छाएं परिपूर्ण करूंगा। भगवान के वचनों को सुनकर ब्राह्मण सुदेव हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना करता है कि हे दया के सागर यदि आप मुझे वरदान देना चाहते हैं तो मुझे एक सुंदर सुपुत्र का वरदान दीजिये। मुझे पुत्र के सिवा कुछ नहीं चाहिए। पुत्र के बिना सारा संसार निरर्थक प्रतीत होता है। ब्राह्मण के वचनों को सुनकर भगवान विष्णु कहते हैं, हे ब्राह्मण पुत्र के अलावा संसार की कोई भी वस्तु मांग ले मैं तुझे राज्य धन संपदा सभी सुख दे सकता हूं। परंतु पुत्र सुख नहीं दे सकता कारण कि तेरे भाग्य में विधाता ने पुत्र का सुख लिखा ही नहीं है। मैंने तेरे ललाट में लिखी हुई सब बातें देख ली है। सात जन्म तक तेरे भाग्य में पुत्र का सुख नहीं है। भगवान के द्वारा वज्र के समान लगने वाले शब्दों को सुनकर अत्यंत दु:खित होकर कटे हुए वृक्ष के समान पृथ्वी पर गिरकर बेहोश हो गया। पति की ऐसी अवस्था देखकर पत्नि गौतमी भी दु:खित होकर रोने लगी। थोड़ी देर रोते हुए उसने धैर्य धारण कर पति के समीप जाकर कहने लगी हे प्राणनाथ उठिये! व्यर्थ में दु:ख मत करिए, मैंने जो आपसे पहले कहा था उन शब्दों को याद करिए। मैंने कहा था कि भाग्य में विधाता ने जो सुख दु:ख लिख दिया है वही मनुष्य को प्राप्त होता है। पूर्वजन्म के पुण्यकर्मों के द्वारा ही मनुष्य सुख प्राप्त करता है। ऐसी स्थिती में भगवान भी क्या कर सकते हैं।

जैसे मृत्यु के समीप जाने वाले मनुष्य को औषधी देना निष्फल होता है। वैसे अभागी मनुष्य के सारे कर्म निष्फल होते हैं। हमने सुना था कि यज्ञ, तप, दान और भगवान की आराधना से मनुष्य अपनी मनोकामना प्राप्त कर सकता है ऐसी श्रुतिपुराण आदि ग्रंथों से भी सुना गया है। परंतु आज हमको पूरा विश्वास हो गया कि भाग्य के सामने सब व्यर्थ है। जैसे सूर्य के प्रकाश के समक्ष जुगनू का प्रकाश व्यर्थ होता है। इसलिये मेरी बातों पर विश्वास करके आप धैर्य धारण करिए और भाग्य के भरोसे अपना शेष जीवन बिताइये। अब हमको भगवान से कोई प्रयोजन नहीं है। गौतमी के ऐसे तीव्र और शोकयुक्त वचनों को सुनकर गुरुजी भगवान से हाथ जोड़कर कहते हैं हे महाप्रभु यह ब्राह्मण सुदेव और उसकी पत्नि गौतमी अत्यंत दु:ख के सागर में डूबे हुए हैं। इनकी रक्षा करने वाला कोई नहीं है। आपके सामने इनकी दयनीय अवस्था प्रगट है। फिर भी आप अपने भक्त पर दया क्यों नहीं करते। आप तो दीन बंधु हैं। दया के सागर हैं। आज आपने अपनी कृपा त्याग कर इतनी कठोरता क्यों धारण की है। आपकी सेवा तो आपके भक्तों को चारों प्रकार की मुक्ति देने वाली है। आपके भक्तों के सामने अष्टसिद्धि नवनिद्धि नौकरों के समान रहती है। फिर आप अपने भक्त की शुभेच्छा को पूर्ण क्यों नहीं करते।

यदि आपने इस ब्राह्मण की इच्छा पूर्ण नहीं की तो सांसारिक मनुष्य आपकी आराधना तपस्या करना छोड़कर भाग्य के भरोसे ही रहेंगे। सब लोग आपकी भक्ति से विमुख होकर भाग्य को प्रधानता देंगे। हे महाप्रभु आपने गजेंद्र की रक्षा की तथा ध्रुव को अक्षय पद दिया, भक्त प्रहलाद को सर्वश्रेष्ठता दी, सारे संसार में आपकी दयालुता प्रसिद्ध है। यह ब्राह्मण आपकी शरण में है। फिर आप इसकी उपेक्षा क्यों करते हैं। इससे संसार में आपकी निंदा होगी। गरुड़जी के ऐसे वचनों को सुनकर भगवान कहते हैं, हे गरुड़ यदि तेरे मन में इस ब्राह्मण के प्रति दया उत्पन्न हो गई है, तो मेरी आज्ञा से इसे पुत्र का वरदान बारह वर्ष का दे दे। भगवान के वचनों को सुनकर गरुड़ प्रसन्न होकर कहते हैं, हे ब्राह्मण यद्यपि तेरे भाग्य में सात जन्म तक पुत्र का सुख नहीं है। फिर भी मैं भगवान की आज्ञा से तुझे एक उत्तम पुत्र का वरदान देता हूं। इस पुत्र के द्वारा तुझे अत्यंत दु:ख भी होगा। फिर भी तुम भगवान की आराधना मत छोड़ना तुम्हारा कल्याण होगा। भगवान की भक्ति चाहे सकाम हो या निष्काम कभी व्यर्थ नहीं जाती यह पांच तत्वों का बना हुआ भौतिक शरीर कभी भी पानी के बुलबुले के समान नष्ट होने वाला है। इस पर अभिमान कभी भी नहीं करना चाहिए हमेशा भगवान की आराधना करने से ही जीवात्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिये भगवान की सेवा से कभी विमुख नहीं होना चाहिये यही संसार का मुख्य सार है। मैंने तुझे एक सुंदर सर्वगुण संपन्न पुत्र का वरदान भगवान की आज्ञा से दिया है।

अब तुम पत्नि के सहित सांसारिक वातावरण में रहकर भगवान का चिंतन और सेवा करते रहो उसी से तुम्हारे सभी दु:ख दूर होंगे। इस प्रकार वरदान देकर गरुड़ सहित भगवान वैकुंठ लोक को चले गए। वह ब्राह्मण सुदेव भी अपने पत्नि के सहित आश्रम में आकर पहले की तरह गृहस्थ जीवन व्यतीत करने लगा। कुछ दिनों के बाद ब्राह्मण की पत्नि भगवान के वरदान के अनुसार गर्भावस्था को प्राप्त हुई और नवमास व्यतीत होने पर उसने पुत्र रत्न को जन्म दिया। अत्यंत सुंदर और सभी लक्षणों से युक्त ऐसे पुत्र को प्राप्त कर पति, पत्नि दोनों को महान आनंद हुआ। ब्राह्मण सुदेव ने यथा समय विद्वान ब्राह्मणों को बुलाकर बालक का जात कर्मसंस्कार किया। और अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को वस्त्र, पात्र, दक्षिणा दिया और याचक गरजियों को भी दान देकर संतुष्ट किया, बारहवें दिन ज्योतिष शास्त्र को जानने वाले विद्वानों के द्वारा बालक का नामकरण संस्कार करके शुकदेव, ऐसा नाम रखा गया।

वह बालक शुकदेव अपने मातापिता की सेवा में दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा। जैसे जैसे दिन बीतने लगे वैसे वैसे बालक के अंग प्रत्यंग सुंदर और बलवान होते गए। अपने उम्र के बालकों के साथ वह बालक्रीड़ा में आनंदित रहने लगा। उस बालक को देख-देखकर मातापिता हमेशा आनंदित होते थे। पांचवर्ष बीतने पर उसको अक्षरांभ कराके विद्याध्ययन कराने लगे वह बालक विद्याध्ययन में अत्यंत प्रवीण होकर अनेक विद्याओं को सीखने में तत्पर रहने लगा। जब आठवां वर्ष प्रारंभ हुआ तब ब्राह्मण सुदेव के मन में बालक के यज्ञोपवीत संस्कार करने की अभिलाषा उत्पन्न हुई। इसी प्रेरणा से उसने शुभ मुहूर्त देखकर योग्य विद्वान ब्राह्मणों ने बालक शुकदेव को गायत्री मंत्र का उपदेश देकर उसका संस्कार करा दिया। इस संस्कार में भी सुदेव ने ब्राह्मणों को दान दक्षिणा तथा याचकों को भी बहुत सा दान देकर संतुष्ट किया। इस संस्कार के प्रभाव से बालक के शरीर में सूर्य के तेज से तेजस्विता उत्पन्न होकर शरीर अत्यंत प्रखर होकर बढ़ने लगा। बालक को वेदाध्ययन के लिये गुरु के पास भेजने लगे। बालक कुशाग्र बुद्धि होने से शीघ्र ही वेदपाठ में प्रवीण होने लगा और अनेक शास्त्रों का अध्ययन करने लगा।

बालक की दिनचर्या को देखकर ब्राह्मण पति पत्नि अपने आपको भाग्यशाली और धन्य समझने लगे। इस प्रकार सुख पूर्वक समय व्यतीत हो रहा था। ऐसे ही एक दिन उस ब्राह्मण के आश्रम में देवल नाम के ऋषि का आगमन हुआ उनको देखकर सुदेव बड़े प्रसन्न हुए और उनको नमस्कार कर आदर सहित पाद्य अर्घ्य देकर उत्तम आसन पर विराजमान किया। उसी समय बालक शुकदेव ने भी आकर मुनि के चरणों में मस्तक रखकर दंडवत नमस्कार किया। बालक को शुभाशिष देते हुए ऋषि ने उसको अपने पास बैठाया और उसकी प्रशंसा करते हुए ब्राह्मण सुदेव से कहते हैं कि हे सुदेव तू धन्य है जो तूने सभी सुंदर लक्षणों से युक्त ऐसे बालक का पिता होने का सौभाग्य प्राप्त किया। बुद्धि में प्रखर वेद और विद्याध्ययन में प्रवीण ऐसे बालक शायद ही कहीं देखने में आते हैं। इस प्रकार बालक की प्रशंसा करते हुए ऋषि बालक के हाथ को अपने हाथ में लेकर उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि ब्राह्मण सुदेव इस बालक का सुंदर और पुष्ट शरीर, घुटने तक लंबी भुजाएं, कान तक लंबे नेत्र, शंख के समान कंठ, विनय और काले घुंघराले बाल, ऊंचा वक्षस्थल, पुष्ट कंधे, हास्य मुख इन सभी लक्षणों से संपन्न यह बालक है परंतु एक ही कुलक्षण का संकेत इसकी हस्त रेखा में है जो तुम्हारे लिये महान दु:खदायी है। जिसके सामने सब सुलक्षण व्यर्थ होंगे।

दीर्घश्वास छोड़ते हुए ऋषि कहते हैं। हे सुदेव यह बालक अतिअल्प आयु वाला है बारहवर्ष की आयु में यह पानी में डूबने से मृत्यु को प्राप्त होगा। परंतु तुम अपने मन में दु:ख मत करो जो होने वाला है वह होकर रहेगा। उसको कोई रोक नहीं सकता। ऐसा कहकर देवल ऋषि वहां से निकल गए। ऋषि के जाने पर उनके शब्दों को याद कर ब्राह्मण पति पत्नि दोनों अति दु:ख से मूर्छित हो गए, कुछ देर बाद होश आने पर पुत्र को गोद में लेकर प्यार करके दु:ख भरे स्वर में ब्राह्मणी पति से कहती है, हे प्राणनाथ धैर्य धारण करें जो होने वाला है उसके विषय में सोचना व्यर्थ है। बड़े-बड़े देवताओं को भी समयानुकूल दु:ख और कष्ट भोगना पड़ा है। महान पराक्रमी दैत्यराज बली हिरण्याक्ष वृत्रासुर कार्तवीर्य जैसे राजाओं को भी मृत्यु ने नहीं छोड़ा तो मनुष्य की क्या शक्ति है जो रोक सके।

जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार बृहन्नारदीय

पद्याधारे सप्तमो ऽ ध्याय: समाप्त ॥

(७)

॥ शुभम भवतु ॥






Adhik mass ki Katha 6 adhyaya| अधिक मास की कथा छठा अध्याय


Adhik mass ki Katha 6 adhyaya| अधिक मास की कथा छठा अध्याय 


॥ अथ षष्ठोऽध्यायः प्रारंभः ॥

॥ श्री गणेशाय नमः ॥

श्री व्यासजी अपने श्रोतागणों से तथा सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं कि हे ऋषियों! भगवान नारायण के मुखारबिंद से इतनी कथा सुनकर नारदजी बहुत प्रसन्न हुए तथा हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना करते हैं कि हे महाराज! मुझे राजा दृढ़धन्वा का संपूर्ण इतिहास सुनाइये। नारदजी के वचनों को सुनकर भगवान नारायण कहते हैं कि हे नारद! गंगाजी के किनारे बसा हुआ हैहय नाम का एक प्रदेश था। उस राज्य में महापराक्रमी सात्विक प्रकृति वाला चित्रधर्मा नाम का राजा राज्य करता था। वह अपनी शक्ति और पराक्रम के कारण सारे संसार में प्रसिद्ध था। उस राजा को अपनी रानी द्वारा एक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह पुत्र भी सुंदर शरीर व आकृतिवाला विशाल नेत्रोंवाला सभी गुणों से युक्त था। राजा ने अपने पुत्र का नाम विद्वानों की सम्मति से दृढ़धन्वा रखा। वह पुत्र दिन प्रतिदिन चंद्रकला के समान बढ़ने लगा। बाल्यावस्था व्यतीत होने पर राजा ने पुलह ऋषि के आश्रम में विद्याध्ययन के लिये भेजा। वह बालक अत्यंत प्रखर बुद्धिमान होने से शीघ्र ही राजनीति और चौदह विद्याओं में पारंगत हो गया। उसका संपूर्ण शरीर बल शौर्य से परिपूर्ण होकर युवावस्था में प्रवेश किया।

विद्याध्ययन पूर्ण होने पर गुरु की आज्ञा से राजपुत्र अपने राज्य में आकर पिता के साथ राज्यकार्य में सहयोग देने लगा। राज्य की समस्त प्रजा से नीति और धर्मपूर्वक व्यवहार करने से वह समस्त प्रजाजनों की प्रशंसा का पात्र बन गया। पिता चित्रधर्मा ने पुत्र को सर्वगुण संपन्न देखकर पुस्कर राज्य की राजकन्या जो कि अत्यंत सुंदर सुशील थी उसके साथ पुत्र दृढ़धन्वा का विवाह बड़े उत्सव के साथ संपन्न कर दिया। विवाह के पश्चात राजा दृढ़धन्वा को चार पुत्र और एक कन्या उत्पन्न हुई। उनका क्रमशः नामकरण चित्रवाक, चित्रबाहु, मणिमान, और चित्रकुंडल नाम रखा तथा कन्या का चारुमती नाम रखा। वे सभी बालक अत्यंत सुंदर और शुभलक्षणों से युक्त और सर्वगुण संपन्न थे। राजा चित्रधर्मा ने अपने पुत्र को सर्व संपन्न और प्रजापालन में कुशल देखकर सांसारिक मायामोह से मन को विरक्त करके परंपरा से चल रही नीतिका अनुसरण करना उचित समझा कि अब वृद्धावस्था का समय भगवान की आराधना में लगाकर अपनी आत्मा का उद्धार करना चाहिए।

ऐसा सोचकर पुत्र दृढ़धन्वा को राजतिलक करके राज्य सिंहासन और राज्य का समस्त कार्य सौंपकर पुलह ऋषि के आश्रम में जाकर तपस्या करने लगा। अंतःकरण में भगवान का चिंतन करके कठिन तपस्या प्रारंभ की। निंद्रा त्यागकर निराहार रहकर रातदिन भगवान का स्तवन करते रहने से राजा का शरीर अत्यंत कृश व क्षीण होकर कुछ दिनों में उन्होंने शरीर का त्याग करके उनकी आत्मा मोक्ष को प्राप्त हो गई। ऋषि के आश्रम में पिता की सद्गतिका समाचार सुनकर राजा दृढ़धन्वा को दुःख और हर्ष दोनों हुए। पितृ भक्त होने से राजा ने ब्राह्मणों की आज्ञा से पिता का और्ध्वदैहिक कर्म, श्राद्ध, पिंडदान किया तथा बहुत द्रव्य सुवर्ण, गौ आदि वस्तुओं का दान दिया। जिस याचक की जो इच्छा थी उनकी इच्छानुसार हाथी घोड़ा, पालकी, रथ, पृथ्वी, द्रव्य आदि देकर सबको प्रसन्न किया। नगर में भोज्यन्न करके हजारों ब्राह्मण और लाखों प्रजाजनों को उत्तम भोजन कराके संतुष्ट किया। पिता के समस्त और्ध्वदैहिक कर्म अत्यंत श्रद्धा के सहित संपन्न करके वह राजा दृढ़धन्वा वेद वेदांग में विद्वान धनुर्विद्या में निपुण, क्षमा में पृथ्वी के समान, गंभीरता में सागर के समान, विद्वता में ब्रह्मा के समान, उदारता में भगवान शंकर के सदृश, एक पत्निव्रत धारी शत्रुओं के समूह को पराजित करता हुआ चारों दिशाओं में अपने राज्य का विस्तार करके अखंड चक्रवर्ती राजा बन गया।

सभी राजा उसको अपने राज्य का कर देने लगे। उस राजा दृढ़धन्वा की कीर्ति, जैसे आकाश में शुक्ल पक्ष में चंद्रमा के प्रकाश के समान फैल गई। राज ऐश्वर्य दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा। संसार के सभी सुख राजा को प्राप्त हो गए। एक समय राजा रात्रि में शयनकक्ष में जाकर शयन की स्थिती में बिस्तरपर लेटा हुआ मनमें विचार करने लगा। मेरा यह अतुल वैभव, अखंड चक्रवर्ती राज्य, मुझे कौन से पुण्य से प्राप्त हुआ, मेरा यह भाग्योदय कैसे हुआ। मैंने आजतक न तो तपस्या की न व्रत उपवास किया न किसी प्रकार का दान, पुण्य, यज्ञ, हवनादि कर्म किया। फिर यह अनंत वैभव और सभी सुख कैसे प्राप्त हुए। यही विचार अंतर्मन में बारबार उत्पन्न होने से राजा को रात भर नींद नहीं आई।

ब्रह्म मुहूर्त में प्रातः एक घटीरात्रि शेष रहने पर शय्या छोड़ राजा उठा नित्य कर्मों से निपटकर उसने अनेक प्रकार के दान ब्राह्मणों और याचकों को देकर भगवान की वंदना करके चतुरंगिनी सेनासाथ में लेकर घोड़े पर सवार होकर भयानक जंगल में शिकार करने के लिये चल दिया। जंगल में सेना की हलचल को सुनकर जंगली जानवर व्याघ्र, हरिण, आदि इधर से उधर भागने लगे राजा भी तीक्ष्णबाण और अचूक निशानों से अनेक पशुओं का शिकार करते हुए उससे एक अत्यंत पुष्ट शरीर वाला मृग देखकर उसके पीछे घोड़ा दौड़ाते हुए एक तीक्ष्ण बाण उसके ऊपर चला दिया बाण तो मृग के शरीर में घुस गया परंतु फिर भी वह मृग, भागता हुआ घोर जंगल में में छिप गया। राजा उसका पीछा रक्त की धार के आधार पर करता हुआ जंगल में मृग को ढूंढने लगा परंतु छिप जाने से राजा को मृग नहीं मिला राजा उसकी तलाश में बहुत दूर निकल गया काफी देर तक इधर उधर घोड़ा दौड़ाने पर भी वह मृग नहीं मिला। राजा भी थककर प्यास के लगने से व्याकुल होकर मध्यान्ह के समय सूर्य के तापसे पीड़ित हो गया। वहां न तो राजा का कोई सेवक था जो कि राजा के लिये पानी आदि की व्यवस्था करके राजा को शांति देता। ऐसी अवस्था में राजा भटकता हुआ ऐसे स्थान पर पहुंच गया, कि उसे अत्यंत सुंदर स्वच्छ जल से भरा हुआ कमल पुष्पों से शोभित ऐसा तालाब दिखाई दिया उस तालाब को देखकर राजा ने अत्यंत प्रसन्न होकर तालाब के जल को पीकर घोड़े को भी जल पिलाया। पास ही विशाल वट वृक्ष और उसकी शीतल छाया को देखकर थोड़ी देर विश्राम करने के उद्देश्य से घोड़े को वृक्ष की जड़ से बांधकर वृक्ष की शीतल छाया में राजा विश्राम कर रहा था उसी डाली के ऊपर एक बड़ी आकृति का तोता आकर बैठा और राजा को संबोधित करके कहने लगा कि हे राजन

श्लोक : विद्यामानतुलं सुखमालोक्ययतीव भूतले।

न चिंतयसि तत्वं त्वं तत्कथं परमेष्यसि ॥

अर्थ : पृथ्वी पर ऐसा अनुपम सुख प्राप्त हुआ। परंतु इसके तत्व को आंतरिक मन से विचार करके भवसागर से कैसे पार होगे। इस प्रकार बारबार इस श्लोक को सुनकर राजा अपने मन में विचार करने लगा। यह तोता मनुष्य की वाणी में मुझे क्या शिक्षा दे रहा है। यह राजा की समझ में नहीं आ रहा था। कभी विचार करता कि जैसे राजा परीक्षित भवसागर में डूब रहा था। तब उसके उद्धार के लिये व्यास पुत्र श्री शुकदेव ऋषि ने श्री मद्भागवद् का ज्ञान देकर उद्धार किया था उसी प्रकार वही शुकदेव तोते का रूपधर कहीं मेरे उद्धार के लिये तो नहीं आए। राजा के मन में अनेक विचार उत्पन्न हो रहे थे। परंतु श्लोक का अर्थ समझ में न आने से राजा बड़ा मानसिक चिंता से घिरा हुआ था। ऐसे ही समय राजा की चतुरंगिणी सेना वहां पहुंच गई। तोता भी वहां से उड़कर अदृश्य हो गया। राजा भी अपनी सेना के साथ अपने राज भवन में आ गया। परंतु राजा के मन मस्तिष्क में रातदिन तोते का वही श्लोक गूंजता रहा। उससे राजा की ऐसी अवस्था हो गई कि राजा न तो किसी से बोलता था न किसी की बात का कोई जवाब देता था।

खाना पीना निद्रा सबका परित्याग करके एकांत में बैठा रहता था, राजा की ऐसी विषम स्थिती को देखकर उसकी पटरानी को बहुत चिंता उत्पन्न हो गई। एक दिन रानी साहस करके राजा के समीप पहुंचकर हाथ जोड़कर विनम्रता पूर्वक कहने लगी। हे प्राणनाथ आप इतने खिन्न क्यों हैं? मुझसे क्या भूल हो गई, जो आपने खानपान का परित्याग करके मौन धारण कर लिया। आपकी अवस्था देखकर मुझे अत्यंत दारुण दुःख हो रहा है। इसलिये हे प्राणनाथ मेरे ऊपर दया करके आप भोजन करिए, प्रसन्न होकर कुछ बात करिए। बारबार रानी के आग्रह करने पर भी राजा पर कोई असर न होकर राजा उसी प्रकार निश्चल बैठा रहा राजा के मन में तोते का कहा हुआ श्लोक ही विचार का कारण बना रहा।

पत्नी की ऐसी अवस्था देखकर रानी बहुत दुःखित होकर मछली की तरह तड़पने लगी। उसके कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। कुछ दिन ऐसे ही व्यतीत हो गए। ऐसे ही समय अचानक रामायण ग्रंथ के रचयिता वाल्मीकि ऋषि भ्रमण करते हुए उस राजा के राजमहल में पधारे। दूतों के द्वारा ऋषि का आगमन सुनकर राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे संतों के पैर जल्दी मुख्यद्वार पर आकर ऋषि के चरणों में नमस्कार करके आदरपूर्वक महल के भीतर ले जाकर उत्तम सिंहासन पर बैठाकर चरण प्रक्षालन करके अर्घ्य देकर ऋषि का पूजन किया और कहने लगा। हे ऋषिवर आज मैं अपने आप को बड़ा भाग्यवान समझता हूं। आज मेरा जन्म सफल हो गया। सारे संसार को अपने तपोबल से पवित्र करनेवाले आप जैसे महान ऋषि के आगमन से मैं धन्य हो गया। राजा के ऐसे प्रार्थनीय वचनों को सुनकर ऋषि प्रसन्न होकर कहते हैं कि हे राजन मैं तेरे आदर सत्कार से बहुत प्रसन्न हूं। संसार में जैसी तेरी प्रसिद्धि थी वैसा ही तू है।

परंतु हे राजन मैं तुझे अत्यंत चिंतातुर देख रहा हूं। मुझे अपनी चिंता का कारण बता मैं तेरी समस्त चिंताओं को दूर करूंगा। ऋषि के प्रश्न करने पर राजा ने कहा हे ऋषिवर आपके चरणों की कृपा से मुझे सभी सुख प्राप्त हैं। किसी प्रकार की कमी नहीं है। परंतु मेरे मन में एक शंका उत्पन्न हो गई है। जो मेरे हृदय में शूल की तरह चुभती रहती है। आप सिर्फ उस शंका का निवारण कर दीजिये बड़ी कृपा होगी। हे ऋषिवर कुछ दिनों पहले मैं शिकार करने गया था। घने जंगल में घूमता हुआ थक गया था। विश्रांति के लिये मैं एक बड़े वट वृक्ष के लिये लेट गया। थोड़ी ही देर में हिल्स डाली के नीचे मैं लेटा हुआ था उसी डालपर एक सुंदर और बड़ी आकृतिवाला तोता आकर बैठ गया। और बारबार यह श्लोक मनुष्य की वाणी में मुझे संबोधित करके कहने लगा। हे राजन -

श्लोक : विद्यामानतुलं सुखमालोक्ययतीव भूतले।

न चिंतयसि तत्वं त्वं तत्कथं परमेष्यसि ॥

उस तोते के द्वारा यह सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। परंतु उसका अर्थ न समझने के कारण मेरे मनमें उसी विषय में रातदिन चिंता व्याप्त है। आज मेरे पास आपकी कृपा से इतना बड़ा राज्य है। उत्तम चार पुत्र और एक कन्या है। सुंदर और पतिव्रता पत्नि है। हाथी, घोड़ा, रत्न आदि अतुल संपत्ति है। ये सब मुझे कौन से पुण्य के प्रभाव से प्राप्त हुआ। और वह तोता मुझे क्या उपदेश दे रहा था। इन सब विषयों का विचार करके मुझे विस्तार पूर्वक समझाइये। जिससे मेरे मन की शंका दूर हो जाय। राजा के वचनोंको सुनकर वाल्मीकि ऋषि ने प्राणायाम करके अपने आपको ध्यानस्थ किया और एक घटीपर्यंत ध्यानस्थ रहकर राजा के पूर्व जन्म के वृत्तांत का अवलोकन करके राजा से कहने लगे कि हे राजन तेरे सब प्रश्नों का उत्तर तेरे पूर्व जन्म से संबंधित है। इसलिये मैं तेरे पूर्व जन्म का वृत्तांत कहता हूं ध्यान लगाकर सुन। तू पूर्व जन्म में द्रविड़ देश में उत्पन्न हुआ था। जाति से ब्राह्मण और सुदेव तेरा नाम था। ताम्रपर्णी नदी के किनारे तपोवन में कुटिया बनाकर रहता था।

सत्य बोलना, धर्म में तत्पर रहकर ब्राह्मण के बालकों को वेद की शिक्षा देना यही तुम्हारा दैनिक कर्म था सदृण संपन्न पति परायण गौतमी नाम की तुम्हारी पत्नि थी। वह रातदिन पति की आज्ञा का अनुसरण करती और जैसे पार्वती शंकरजी से प्रेम करती है उसी प्रकार का प्रेम उसका अपने पति के प्रति था। इस प्रकार वह ब्राह्मण सुदेव अपने गार्हस्थ्य धर्म का पालन करता हुआ जीवन व्यतीत कर रहा था। अनेक दिन व्यतीत होने पर उन्हें कोई संतति उत्पन्न न होने से ब्राह्मण मन में दुःखित रहने लगा। एक समय ब्राह्मण अपने आश्रम में विश्राम कर रहा था और पत्नि उसकी सेवा में लगी हुई पैर दबा रही थी तब ब्राह्मण पत्नि से बोला। हे प्रिये संसार में पुत्र सुख के समान कोई सुख नहीं होता।

व्रत, तप, दान, इनका पुण्य तो मनुष्य को परलोक में सुख देता है। परंतु एक सुपुत्र इसलोक में महान सुखदाई होता है। हमको वह भी नहीं प्राप्त हो सका। मुझे तो यह जीवन निष्फल सा ही प्रतीत हो रहा है। मेरे पुत्र को गोद में नहीं खिलाया वेदाध्ययन नहीं कराया, मैं कितना भाग्यहीन हूं। मैं पितृऋण से मुक्त कैसे हो सकूंगा। मेरा यह जीवन व्यर्थ ही व्यतीत हो रहा है। ऐसे जीवन से तो मृत्यु हो जाय यही मैं चाहता हूं। पति के ऐसे दुःखमय वचनों को सुनकर भार्या गौतमी भी अपने मन में दुःखित होकर कहती है, हे प्राणनाथ ऐसे अपशब्द मत बोलिये। आप इतने ज्ञानी धर्म के तत्व को जानने वाले होकर सांसारिक मायामोह में क्यों लिप्त होना चाहते है। हे स्वामी मनुष्य के भाग्य में जो सुख नहीं है।

वह पुत्र प्राप्ति के बाद भी नहीं मिल सकता बल्कि दुःख बढ़ सकता है। पूर्व का इतिहास साक्षी है। राजा अंग भी अपने पुत्र के द्वारा ही अत्यंत दुखित होकर रात्रि में जंगल की ओर भाग गए। ऐसे ही संसार में अनेक प्रसंग घटित हुए हैं। इसलिये पुत्र के द्वारा ही सुख घटित होगा ऐसा सोचना व्यर्थ है। यदि पुत्र प्राप्ति की इच्छा ही है। तो सुपुत्र की प्राप्ति के लिये मनोवांछित फलदेने वाले ऐसे श्री विष्णु की आराधना, उपासना करना चाहिए। पत्नि के वचनों को सुनकर ब्राह्मण के मन को कुछ समाधान हुआ। वह निश्चय करके ताम्रपर्णी नदी में स्नानकरके पत्नि के साथ तपस्या में लीन हो गया। अन्न का परित्याग करके सूखे पत्ते खाकर जलपीकर रहने लगा कुछ दिनों बाद धारादित निराहार एकादिन आहार इस प्रकार कुछ दिन के बाद बिल्कुल निराहार रहकर तपस्या करता था। पत्नि भी पति की सेवा करती हुई सहयोग देती थी इस प्रकार तपस्या करते हुए चार हजार वर्ष व्यतीत हो गए। उसकी तपस्या को देखकर तीनों लोक के प्राणी थर्राने लगे। भगवान विष्णु का सिंहासन हिलने लगा। आखिर अपने भक्त की मनोकामना के लिये भगवान विष्णु को वहां प्रगट होना पड़ा श्यामल शरीर चतुर्भुजी स्वरूप प्रसन्न मुद्रावाले आराध्यदेव भगवान विष्णु को अपने प्रत्यक्ष देखकर ब्राह्मण अति प्रसन्न होकर साष्टांग दंडवत नमस्कार करता हुआ प्रार्थना करता है हे महाप्रभु दीन वत्सल जगद् का उद्धार करने वाले शरणागत की रक्षा करने वाले मैं आपकी शरण में हूं, आप मेरी रक्षा करिए मैं दुःख रूपी सागर में डूब रहा हूं। मेरे दुःख को दूर करिए। ऐसा कहता हुआ स्त्री सहित ब्राह्मण हाथ जोड़कर भगवान के सामने खड़ा रहा।

जै जै श्री अधिकमास महात्म्य सार वृहत्प्रदीय

पद्माधारे षष्ठोऽध्यायः समाप्त ॥

(६)