Adhik mass ki Katha 25 adhyaya | अधिक मास की कथा 25वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 24 adhyaya | अधिक मास की कथा 24वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 24 adhyaya | अधिक मास की कथा 24वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 23 adhyaya | अधिक मास की कथा 23वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 23 adhyaya | अधिक मास की कथा 23वा अध्याय
।। अथ त्रयोविंशतितमो ऽध्याय: प्रारंभ: ।।
श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकदि ऋषियों से कहते हैं, भगवान विष्णु के द्वारा स्नान के महात्म्य को सुनकर लक्ष्मीजी प्रसन्न होकर प्रश्न करती हैं। हे महाप्रभु अब आप कृपाकर धारणा पारणा (एकांतोरपवास) व्रत के महात्म्य का वर्णन सुनाइयेगा। और यह किससे किया और कैसे फल को प्राप्त किया, सो बताने की कृपा करें। भगवान विष्णु कहते हैं, हे लक्ष्मी विंध्य पर्वत के एक भाग में अमरकंटक नाम का पर्वत हैं। उसी पर्वत में नर्मदाजी का उद्रम स्थान है। उस पर्वत पर सन्यासी जिसे भगवान शंकर निवास करके तपस्या करते हैं। नर्मदाजी का साक्षात शंकर का वर हस्त मानी जाती है। जिसे मनुष्य अपनी मनोरकामनाओं को प्राप्त करते हैं। वैसे ही नर्मदाजी का स्नान परिक्रमा और पूजा नर्मदा नदी के किनारे बड़े बड़े तीर्थस्थल और भगवान शंकर के मंदिर बने हुए हैं। इसी प्रकार भृगुच्छ नाम का एक नगर है। उस नगर में सदाचार संपन्न सत्यवादी कुशल शर्मा नाम का ब्राह्मण रहता था। सुंदर और पतिव्रता कुशलावती नाम की उसकी पति थी। वे दोनों पति-पति अपने धर्म कर्म में लगे हुए जीवन यापन करते थे। उनकी मेधावती नाम की कन्या थी। कन्या जब विवाह योग्य हुई तब ब्राह्मण ने पदमनाभ नाम का ब्राह्मण पुत्र जो कि सुंदर सुशील और विद्वान था उसके साथ अपनी कन्या का विवाह कर दिया। कन्या अपने पति के घर में आनंदपूर्वक रहने लगी। दोनों पति पति में अनंत प्रेम था। एक दिन का भी वियोग दोनों को असह्य था। कुछ दिनों के बाद भाग्य की विवित्रता से एकदिन पदमनाभ नर्मदाजी में स्नान करने गया। अपने समवयस्क लोगों से जल क्रीड़ा करते हुए पानी में डूबने लगा। साथ के लोगों को जब वह नहीं दिखाई दिया तब लोग घबड़ाकर उसको पानी में ढूढने लगे। परंतु उसके प्राण जा चुके थे वह मृत हो चुका था। तुरंत लोगों के द्वारा उसके शरीर को निकालकर बाहर लाए। उसके घर पहुँचा। उसके मातापिता और पति रोते दहाकार करते हुए वहां आए। पति उसके मृतशरीर को गोद में लेकर छाती पीटती हुई रुदन करती रही है देव हे जगन्नाथ मैं इस वैधव्यता का दुख कैसे भोगूंगी।
प्राण क्यों नहीं निकलते। मेरा सौभाग्यही जहां डूब गया अब मैं इस जीवनरूपी सागर को कैसे पार करूंगी। पति के बिना जैसे मछली तड़पती है। उसी प्रकार से वह तड़प रही थी। उसी प्रकार से कुछ दिनों तक सास-श्वसुर के पास रही कुछ दिनों बाद पिता ने उस दुखी कन्या को सांत्वना और धीरज देने के तन्मित अपने घर ले आए। परंतु माता पिता के घर आने के बाद भी उसका दुःख कम नहीं हुआ रात दिन रोती, तड़पती हुई अपने भविष्य में सोचती रहती थी।
आखिर अपने पूर्वजन्म का पाप उदय हुआ यह समझकर उसके प्रायश्चित करने के लिये कोई व्रत या देवता की आराधन करना चाहिए। इस निमित एक बालिका ने अपने पिता से कहा, हे पिता मेरे दुःख को दूर करने के लिये आप कोई व्रत आदी साधन मुझे बताइये। जिसके द्वारा मैं दुःख से छुटकारा पाकर भवसागर से पार हो जाऊं। कन्या के वचनों को सुनकर पिता ने कहा हे पुत्री अब से तोत्तम मास भगवान पुरुषोत्तम का मास आनेवाला हैं। उस मास में एकांतोरपवास जिसको धारणा पारणावत भी कहते हैं, करने से मनुष्य के पापों का समूह नष्ट हो जाता है। सभी दुःख दूर होते है। और मनुष्य भव्यवसागर से पार हो जाता है। पिता के वचनों को सुनकर मेधावती प्रसन्न होते हुए समय व्यतीत होने पर पुरुषोत्तम मास प्रारंभ हुआ तब पिता के कथनानुसार नियम धारण करके हुए ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नर्मदाजी में स्नान करना, भगवान पुरुषोत्तम की पूजा करना, विप्रपूजा करके यथा शक्ति दान देना, भूमि पर शयन करना, एकदीत उपवास करके दूसरे दिन हविष्य खाकर पारणा करना अखंडदीप की स्थापना आदि इस प्रकार नियमपूर्वक बड़ी श्रद्धा से संपूर्ण मास पूरा करके उपवास के दिन विधिवत उद्यापन किया। इस प्रकार उसने अपने जीवन में अनेक पुरुषोत्तमास नियम और श्रद्धापूर्वक संपूर्ण किया। समय व्यतीत होते बुद्धवस्था आने पर शरीर कृश हो गए और उसका अंत समय प्राप्त हो गया। पुण्य के प्रभाव से और भगवान शंकर की महान भक्ति के कारण मृत्यु के बाद वह मेधावती की आत्मा शिवलोक में पहुंच कर पार्वतीजी की सखी हो गई। वहां अनेक सुखों को भोगकर पृथ्वी पर फिर से जन्म लिया। काशी नगरी में विशालाक्षी नामक तपस्विनी के रूप में प्रसिद्ध हुई। आज भी काशी में विशालाक्षी मंदिर है लोग उसके पूजा करके अपना मनोरथ पूर्ण करते हैं। हे लक्ष्मी पुरुषोत्तम मास का धारणा पारणावत शरीर को अरोग्यता देनेवाला, अंत में मोक्ष देने वाला है। इसी व्रत के प्रभाव से वह मेधावती मानव शरीर वाली होकर दूसरे जन्म में देव स्वरूप हो गई।
हे लक्ष्मी मेधावती की एक सखी कोमला नाम की ब्राह्मणी थी उसे भी पुण्य के प्रभाव से मृत्यु के बाद शिवलोक से अधिक मास में नरक भोजन में जन्म लेकर तपस्या के प्रभाव से मंगलागौरी के नाम से आज भी प्रसिद्ध है। हे लक्ष्मी पुरुषोत्तम मास का अद्भुत पुण्य है। जिसका वर्णन हजार मुख वाले शेषनाग भी करने में असमर्थ है। इतनी कथा सुनकर लक्ष्मीजी कहती हैं, हे महाप्रभु अब आप विप्रसेवा के महात्म्य का वर्णन सुनाइयेगा। भगवान कहते हैं, हे लक्ष्मी मैं तुम से इस विषय का एक इतिहास सुनाता हूँ। भरतखंड में विराट नाम का देश है। उस देश में अनेक पुण्यशाली और धनिक लोग रहते थे। उस नगर में अनेक मंदिर थे कुएं बावली तालाब और बगीचों से वे नगर हमेशा संपन्न और सुखी रहेगा। वहां परमार्थिक कर्म होते रहने से देवताओं को प्रसन्न वरदान दिया था कि शंकरजी का भी मंदिर है। चारों वर्णों के लोग अपने कर्म धर्म में लगे रहकर सभी प्रकार से सुखी और प्रसन्न है। उसी नगर में धनदास नाम का एक शूद्र रहता था। वह धनसंपन्न था और उसके अनेक नौकर थे। परंतु वह हमेशा ब्राह्मणों को आमंत्रित कर अपने हाथ से ब्राह्मणों का पादप्रक्षालन और पूजा करता था और अनेक प्रकार के दान देकर संतुष्ट करता था। अनेक पर्व के समय स्वयं ब्राह्मण के घर जाकर झाडू लगाए, कपड़े धोए, उनकी आवश्यक इच्छित वस्तु को बाजार से लाकर देना ये सब स्वयं पति के सहित करता था। उसकी पति भी पति का अनुसरण करते हुए विप्र पत्नियों की सेवा करती रहती थी। धनदास को अपने ऊपर धन संपन्न होने का कोई गर्व नहीं था वह विप्रसेवा में कितना भी धन क्यों न खर्च हो जाए उसके मन में चिंता नहीं होती थी। इस प्रकार विप्रसेवा करते हुए उसकी आयु बहुत बीत गई। अचानक दैव के प्रभाव और पूर्वजन्म के कर्म के प्रभाव से धनदास के शरीर में काफी कष्ट का रोग उत्पन्न हो गया। जगह जगह उसके शरीर में व्रण (घाव) खून और पीब बहने लगी। रोग को देखकर धनदास मन में बहुत उदास रहने लगा। कि अब मेरे से ब्राह्मणों की सेवा कैसे होगी। इसी चिंता ग्रस्त स्थिति में एक समय एक सिद्ध पुरुष धनदास के घर आए उनसे उसने अपने मन का दुःख प्रकट किया। उसके दुःख को सुनकर सिद्ध पुरुष ने कहा हे धनदास तू चिंता छोड़ दे तूने जो विप्रसेवा की है, उसका पुण्य तुझे अवश्य प्राप्त होगा। तेरी अच्छी मृत्यु होगी और मृत्यु के बाद तू और तेरी पति सुंदर विमान पर बैठकर स्वर्ग लोक को जाओगे। ऐसा कहकर सिद्ध पुरुष वहां से अंतर्धान हो गए। सिद्ध पुरुष के शब्दों को यादकर धनदास बहुत प्रसन्न हुआ अपने धन संपदा के तीन भाग किए।
एक भाग अपने पुत्र को दूसरा भाग कन्या को और तीसरा अपने साथ लेकर तीर्थ यात्रा को पत्नी समेत निकल गया। अनेक तीर्थों में अपने धनका दान कर दिया। तीर्थ क्षेत्र में रहते हुए, ही दोनों पति पति की एकही दिन मृत्यु हो गई। अपने पुण्य के प्रभाव से सुंदर विमान पर बैठकर उन दोनों की जीवात्मा स्वर्ग लोक को चली गई। हे लक्ष्मी विप्रसेवा का महात्म्य देवताओं की पूजा से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। मैंने भी जब पृथ्वीपर जन्म लिया तब विप्रसेवा अवश्य की है।
(२३)
बृहत् नारदीय पद्माधारे त्रयोविंशतितमो ऽध्याय: समाप्त ।।
।। शुभमभवत् ।।
Adhik mass ki Katha 22 adhyaya | अधिक मास की कथा 22वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 22 adhyaya | अधिक मास की कथा 22वा अध्याय
|| अथ द्वाविंशो ऽध्याय: प्रारम्भ: ||
|| श्री गणेशाय नम: ||
हे लक्ष्मी! भगवान नारायण से सूतजी शौनकादि ऋषियों से और भगवान विष्णु लक्ष्मी जी से कहते हैं। हे लक्ष्मी! पहले किसी समय मारवाड़ प्रदेश में गोकर्ण पर्वत के किनारे शिवपुरी नाम की एक सुंदर नगरी थी। वह नगरी चारों तरफ विख्यात और प्रसिद्ध थी। उसमें बड़े बड़े राजमार्ग और छोटे बड़े गलियाँ, गलियारे बने हुए थे। बड़े बड़े महल और छोटे बड़े मकान बहुत से थे। उस नगरी में चारों वेदों के ज्ञाता विद्वान ब्राह्मण और क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सभी वर्ण और जाति के लोग रहते थे। और अपने अपने कर्म करते हुए सब संपन्न और सुखी थे। सत्य बोलना, शुद्ध सात्विक व्यवहार करना यही समस्त नगरवासियों में विशेषता थी।
अनेक स्थानों पर कथा, भागवत, होम, हवन, यज्ञ आदि हमेशा होते रहते थे। वेद मंत्रों का घोष और शास्त्रों की चर्चा हर मंदिरों में हुआ करती थी। सभी जाति के लोग एकत्रित होकर भजन, कीर्तन आदि किया करते थे। उस नगरी में अधर्म और पाप कहीं देखने में नहीं आता था। ऐसी वह उत्तम शिवपुरी नाम की नगरी थी। उसी नगर में विप्रदास नाम का एक शूद्र रहता था। वह सदाचार संपन्न और जैसा उसका नाम था उसमें गुण भी था। उसी प्रकार उसकी स्त्री भी अत्यंत सुंदर पतिव्रता, पति की आज्ञा का अनुसरण करने वाली थी। वे दोनों पति-पत्नी हमेशा ब्राह्मणों की सेवा में लगे रहते थे। जब पुरुषोत्तम मास प्रारंभ हुआ तब दोनों पति-पत्नी ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर नित्य ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने का नियम प्रारंभ करके ब्राह्मणों को अनेक प्रकार का दान करने लगे।
हे लक्ष्मी! गोकर्ण पर्वत के समीप गोकर्णो नाम की नदी थी। उसी नदी के किनारे सारणेश्वर नाम का भगवान शंकर का भव्य मंदिर था। उस मंदिर में लिंगरूप भगवान शंकर की सुंदर और जागृत मूर्ति है। भगवान सारणेश्वर की पूजा अर्चना से मनुष्यों की समस्त मनोकामनाएं परिपूर्ण होती है। वह विप्रदास पति के सहित नित्य प्रति उसी गोकर्णो नदी में ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने के लिए जाता था। और स्नान करके भगवान सारणेश्वर की पूजा करते और विद्वान ब्राह्मणों की पूजा करके श्रद्धापूर्वक अन्न, वस्त्र, तिलपात्र, सुवर्ण, द्रव्य का दान करते थे।
(पृष्ठ ६८)
इस प्रकार संपूर्ण अधिकमास पर्यंत उनका क्रम चलता रहा अंतिम अमावस के दिन उसी मंदिर में अनेक विद्वान ब्राह्मणों को निमंत्रित करके यथानियम पूर्वक अध्यापन किया और स्वर्णिक ब्राह्मणों को उत्तम भोज्य सामग्रियों से भोजन कराकर वस्त्र अलंकार और सुवर्ण आदि की दक्षिणा दी। और हाथ जोड़कर ब्राह्मणों से दीनवाणी के द्वारा प्रार्थना कि हे महाराज! मैं अत्यंत दीन और गरीब हूं, आप लोगों ने मेरे ऊपर बड़ी कृपा की जो मेरा निमंत्रण स्वीकार करके अपने यहां आए। आप लोग मुझे आशीर्वाद दें कि मेरा यह उद्यापन संपन्न हो गया और मेरे मन में भगवान के प्रति और आप लोगों के चरणों में ऐसी ही श्रद्धा बनी रहे।
इस प्रकार ब्राह्मण लोग उस विप्रदास को आशीर्वाद देकर अपने अपने घर चले गए। विप्रदास अपना समस्त कार्य जैसे मंदिर जाते हुए दान, भोजन सायंकाल होकर रात्रि का समय आ गया। तब वह पति के सहित साथ भगवान का प्रसाद चरणामृत और गोकर्णो गंगा जल लेकर अपने घर जाने के लिए निकला। आद्यात्म ही पर सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले अपने घर के जाने के लिए सैकड़ों प्रेत खड़े हुए दिखाई दिए। वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले भयंकर आकृति वाले सैकड़ों प्रेत खड़े हुए दिखाई दिए। वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले भयंकर आकृति वाले सैकड़ों प्रेत खड़े हुए दिखाई दिए, वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले भयंकर आकृति वाले थे। वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले थे। वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले थे। (पाठ में यहाँ पुनरावृत्ति है) वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले थे। भयंकर आकृति वाले सैकड़ों प्रेत खड़े हुए दिखाई दिए। वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले भयंकर आकृति वाले थे। निरंतर चीत्कार का शब्द और अंगों से समस्त चमकती हुई और मेंढक का मुख, शरीर और जैसा उसका नाम था उसी प्रकार का उसमें गुण था। उसी प्रकार उसकी स्त्री भी अत्यंत सुंदर पतिव्रता, पति की आज्ञा का अनुसरण करने वाली थी। वे दोनों पति-पत्नी हमेशा ब्राह्मणों की सेवा में लगे रहते थे। जब पुरुषोत्तम मास प्रारंभ हुआ तब दोनों पति-पत्नी ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर नित्य ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने का नियम प्रारंभ करके ब्राह्मणों को अनेक प्रकार का दान करने लगे।
हे महाराज हम लोग प्रेत हैं निंदनीय वस्तु का भक्षण, हिंसा आदि निंदनीय हमारे कर्म है अनेक
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पाप कर्म करना दूसरे लोगों को कष्ट देना यही हमारा कर्म है। हम लोग अत्यंत क्रूर स्वभाव के हैं। हमारी संख्या सात सौ है। भूख प्यास से पीड़ित होकर घूमते रहते हैं। इस प्रेत योनि में सिवाय दुःख के कुछ भी नहीं है। आज आपके चरणों को देखकर मन को कुछ समाधान हुआ है। हे महाराज साधुजन के रक्षक होते हैं। हम लोग अत्यंत पापी और दीन है। आपके सिवाय हमारा कोई उद्धार नहीं कर सकता आप महान पुण्यात्मा है हम लोग दुःख भोगते हुए मारे-मारे फिरते हुए, अनेक कल्प बीत गए। आज हमारे सौभाग्य से आपका दर्शन हो गया। आप से प्रार्थना है अपने पुण्य प्रभाव से हम लोगों को इस प्रेत योनि से मुक्ति दे दो।
इस प्रकार प्रेतराज की प्रार्थना को सुनकर विप्रदास के मन में दया उत्पन्न हो गई। उसने मन में भगवान पुरुषोत्तम का ध्यान करके हाथ में गोकर्णो गंगा का जल लेकर संकल्प किया कि मैंने इस अधिकमास में जो नित्य स्नान का नियम धारण किया उसमें से सात स्नान का पुण्य होते ही वे सब प्रेत योनि से मुक्त होकर दिव्य स्वरूप धारण कर, स्वर्ग लोक को चले गए। हे लक्ष्मी सात सौ प्रेतों का उद्धार सिर्फ सात स्नान के पुण्य से हो गया। हे लक्ष्मी सौराष्ट्र देश में प्रभास नाम की एक नगरी थी उसमें सोमशर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वह वेद शास्त्रों में पारंगत सर्वगुण संपन्न वाजपेय आदि यज्ञों को करता था। अपनी शक्ति के अनुसार दान पुण्य भी करता था। उसने परोपकार की दृष्टि से अनेक गांवों में कुआं बावली भी बनवा दिए थे। समय समय पर कार्तिक स्नान माघ स्नान व्रत, उपवास अनेक पर्वों के पुण्य प्राप्ति के दान भी किए थे।
एक समय वह सोमशर्मा ब्राह्मण किसी पर्व के समय सरस्वती नदी का सागर के साथ जहां संगम हुआ वहां स्नान के निमित्त घर से निकला। जंगल के मार्ग से जा रहा था। रास्ते में एक पर्वतकार शरीर वाला भयंकर राक्षस मार्ग में खड़ा हुआ था। वह पीले रंग का जा रहा था रास्ते में एक पर्वतकार शरीर में स्थित लगा हुआ लंबा, लंबी गर्दन, लंबा पेट, मुख विकराल जिह्वा, बड़ी बड़ी मगरमच्छ जैसी दाढ़े, गुफा जैसी नाक, ऊंट के समान खड़ा हुआ उस राक्षस को देखकर मन में कुछ भयभीत हुआ। परंतु हिम्मत करके मन में नृसिंह भगवान का स्मरण करके खड़ा हो गया। वह राक्षस ब्राह्मण को देखकर उसको पकड़ने के लिए दौड़ा। ब्राह्मण के समीप जाने पर भी वह ब्राह्मण को स्पर्श करने में असमर्थ हो गया।
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पुण्य कर्मों के द्वारा ब्राह्मण तेज और आत्मबल होने से राक्षस असमर्थ हो गया। उसका कोई बल प्रयोग नहीं चलता था। अपनी ऐसी अवस्था देख राक्षस को आश्चर्य हुआ और मन में ज्ञान का उदय हुआ कि यह ब्राह्मण जरूर कोई पुण्यात्मा और तपस्वी होना चाहिए। मैंने तो बड़े-बड़े शक्तिशाली नर और पशुओं को मार डाला। फिर ये साधारण मनुष्य के सामने मेरी शक्ति क्यों क्षीण हो गई। ज्ञान उत्पन्न होते ही वह राक्षस सोमशर्मा को दंडवत नमस्कार करके हाथ जोड़कर प्रार्थना करता है, हे स्वामी! पुण्यात्मा आज मैं आपके पुण्य तप के समक्ष असमर्थ हो गया हूं। मैं राक्षस हूं अनेक स्वरूप का दर्शन करने से मेरे पाप नष्ट हो गए हैं और ज्ञान का उदय हो गया है। मैं आपके दर्शन करने के लिए तरस रहा था। मेरे भाग्य से आपके दर्शन हो गए हैं और आपके दर्शन करने से मेरा पाप नष्ट हो गया है। मैं आपके दर्शन करने से मेरा पाप नष्ट हो गया है। हे स्वामी! मेरे ऊपर भी कृपा करके मुझे इस दुर्गति से मेरा उद्धार करिए। साधुजन हमेशा दोनों के रक्षक और परोपकारी होते हैं। मेरे ऊपर भी आप उपकार करिए।
इस प्रकार राक्षस की प्रार्थना सुनकर ब्राह्मण ने मन में विचार किया कि अगर मैंने इसके ऊपर दया नहीं की तो यह राक्षस और अनेक प्राणियों को कष्ट देकर हत्या करेगा। इस का उद्धार करने से मुझे भी पुण्य प्राप्त होगा। ऐसा विचार कर ब्राह्मण ने हाथ में जल लेकर भगवान पुरुषोत्तम का स्मरण करके संकल्प किया कि मैंने अधिक मास में जो स्नान किए हैं उसमें से एक स्नान का पुण्य इस राक्षस को प्राप्त हो, ऐसा कहकर जल राक्षस के ऊपर छोड़ दिया। जल पड़ते ही वह राक्षस दिव्य स्वरूप होकर ब्राह्मण की वंदना करता हुआ स्वर्ग लोक को चला गया। हे लक्ष्मी महान पुण्य दायक पुरुषोत्तम मास में स्नान करने की महिमा है।
|| जै जै श्री अधिकमास महात्म्य सार ||
|| बृहत् नारदीय पद्याधारे द्वाविंशो ऽध्याय: समाप्त: ||
Adhik mass ki Katha 21 adhyaya | अधिक मास की कथा 21वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 21 adhyaya | अधिक मास की कथा 21वा अध्याय
।। श्री गणेशाधिपतये नमः ।।
श्री भगवान नारायण नारदजी से तथा सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं। हे ऋषियों भगवान विष्णु से लक्ष्मीजी कहती हैं, हे दयानिधे आपने अप्सरा उद्वार की कथा मुझे सुनाई अब आप पुरुषोत्तम मास के स्नान का फल और माहात्म्य का वर्णन सुनाइये। भगवान विष्णु लक्ष्मीजी की इच्छा को सुनकर प्रसन्नता से कहते हैं, हे लक्ष्मी तुम्हारी इच्छा के अनुसार मैं पुरुषोत्तम मास के स्नान का माहात्म्य वर्णन करता हूँ जो लोग पुरुषोत्तम मास में नित्य प्रति सूर्योदय के पहले स्नान करते हैं उनके समस्त पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। और उनको शारीरिक कष्ट बाधा कभी नहीं होती है। सभी कार्य निर्विघ्नता से पूरे होते हैं। मन में संतोष और प्रसन्नता होती है। सभी तीर्थों में स्नान करने का पुण्य प्राप्त होता है। विधिक (नियम) युक्त स्नान करने से बारहों महीने के स्नान का फल प्राप्त होता है। अधिकमास में गंगाजी के स्नान का बड़ा महत्त्व है। गंगाजी में स्नानकर माधव भगवान का दर्शन करने से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है। अधिकमास में जो लोग सरस्वती नदी में स्नान करते हैं।
उनके सात जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं। सूर्य चंद्रमा के ग्रहण के समय गोदाम करने का जो पुण्य होता है, वही पुण्य अधिकमास में स्नान करने वाले को प्राप्त होता है। वह मनुष्य महामूर्ख होगा जिससे अधिक मास में स्नान करने वाले को प्राप्त नहीं होता है। वह मनुष्य महामूर्ख होगा जिससे अधिक मास में स्नान नहीं किया और पितरों का तर्पण नहीं किया। इस नरक रूपी संसार से अपनी आत्मा की मुक्ति के लिये कोई कर्म नहीं किया उसका जन्म ही वृथा गया ऐसा निश्चित समझना चाहिए। ऐसे लोग पृथ्वी का भार हैं। हे लक्ष्मी जो लोग पुरुषोत्तम मास में श्रद्धापूर्वक स्नान दान तर्पण आदि कर्म करते हैं वे बड़े भाग्यशाली और परम पुण्यशील होते हैं। वैशाख में तप उपवास चैत्र मास में होम कार्तिक मास में दानधर्म ऐसे प्रत्येक मास के अलग अलग पुण्य है। परंतु अधिकमास में व्रत, होम, दान इन तीनों का साधन एक साथ हो करके सभी मासों का पुण्य प्राप्त होता है।
इस कर्म के द्वारा जीवत्मा उत्तम सद्गति को प्राप्त होती है। वह मनुष्य जब तक जीवित रहता है। उत्तम सुख धन धान्य से परिपूर्ण दीर्घायु जीवन व्यतीत करके मृत्यु के बाद मोक्ष को प्राप्त होता है। वह जीवत्मा चौरासीयोनिन का भ्रमण और आवागमन से छुटकारा पाकर परब्रह्म में लीन हो जाते है।
हे लक्ष्मी अधिकमास में स्नान का कितना पुण्य है इस विषय में पुरातन का इतिहास कहता हूँ। दक्षिणदिशा में गोदावरी में स्नान के तट पर पैठण नाम का एक सुंदर नगर है। उस नगर में चारों वर्णों के लोग रहते थे और अपने अपने कर्म में लगे हुए सुखी और संपन्न थे। वहाँ एक ब्राह्मण रहता था। वह सज्जन, विद्वान अनेक जनों से पूजित भगवान का भक्त था। प्रत्येक पुरुषोत्तम में नियमपूर्वक सूर्योदय के पहले स्नान करने की श्रद्धा थी उसका समस्त जीवन शांतमय और सुखमय व्यतीत हो रहा था। वृद्धावस्था आ गई शरीर अवस्था के प्रभाव से कमजोर अशक्त हो गया। गोदावरी नदी उसके घर से कुछ दूरी पर थी नित्य प्रति उतनी दूर कैसे स्नान करने जा सकूँगा यह विचार उसके मन में चिंता का विषय बना हुआ था पुरुषोत्तम मास प्रारंभ हो चुका था। इस प्रकार विचार करते हुए आखिर उसने निश्चय किया कि यदि मास के अंतिम तीन दिन नियमपूर्वक स्नान करूँगा।
पापों को नष्ट करने वाला ऐसे मास को व्यर्थ नहीं बिताना चाहिए। अपनी शक्ति के अनुसार जितना हो सके पुण्य संचित करना चाहिए। हे लक्ष्मी इस प्रकार उस ब्राह्मण ने मन में निश्चय करके पुरुषोत्तम मास के जब अंतिम तीन दिन शेष रहे तब से स्नान का नियम प्रारंभ कर दिया। एक प्रहर रात्रि शेष रहती थी तब घर से स्नान के निमित्त गोदावरी के लिये निकल जाता। और स्नान करके सूर्योदय के पहले ही घर वापस आ जाता था।
दो दिन स्नान का और घर वापस आने का समय निर्विघ्नता हो गया। अंतिम तीसरे दिन ब्राह्मण गोदावरी में स्नान करके कमंडलु में जल भरकर अपने घर वापस आ रहा था। थोड़ा थोड़ा अंधकार था सूर्योदय की आभा प्रकट हो रही थी। ऐसे ही समय मार्ग में एक बड़े भयंकर आकृति वाला प्रेत ब्राह्मण के सामने प्रकट हुआ। वह प्रेत बड़ी बड़ी अंगारे के समान आँखें वाला, सूखा शरीर सिर्फ हड्डियाँ ही दिखाई दे रही थीं। दाढ़ के बीच जीभ लपलपा रही थी पेट पीठ से सटा हुआ बड़े बड़े भयंकर बाल बड़े भयंकर शरीर पीले रंग का बार बार हाथ से पेट को पीटता हुआ मुख फैलाता हुआ डरावना करता हुआ वह प्रेत ब्राह्मण के सामने प्रकट हुआ। उस प्रेत को देखकर ब्राह्मण के मन में भय अवश्य हुआ। परंतु ब्राह्मण मन में भगवान पुरुषोत्तम का नाम स्मरण करते हुए हिम्मत धारण करता कहता है। अरे तू ऐसा भयानक और महान शरीर वाला प्रेत है। ब्राह्मण को नमस्कार करके कहता है। हे ब्राह्मण मैं समस्त प्राणियों को कष्ट देने वाला प्रेत हूँ। मैं श्मशान में रहता हूँ और अत्यंत निंदनीय वस्तुओं को भक्षण करता हूँ। जिन मनुष्यों में आत्मबल तथा संचित पुण्य नहीं रहता तथा जो
देवताओं की आराधना से दूर रहते हैं। ऐसे मनुष्यों को हमेशा पीड़ा पहुँचाना ही हमारा कर्म होता है।
हे विप्र मैं बड़ा दुरात्मा हूँ रात-दिन हिंसा और पाप आचरण में लिन रहता हूँ इस प्रेतयोनि के दुःख को भोग रहा हूँ। आपके दर्शन होते से और आपके शब्दों को सुनने से मेरे मन में कुछ ज्ञान का प्रकाश हुआ है। आप बड़े दयालु हैं। कृपा करके मेरा उद्धार करिए, मुझे प्रेत योनि से छुटकारा दिलवाइये। इससे आपको बड़ा पुण्य प्राप्त होगा। आपके दर्शन होते ही मेरे मन को विश्वास हो गया है कि आप प्रार्थना को सुनकर धर्मधर्मी के मन में दया उत्पन्न हो गई। हे लक्ष्मी पुरुषोत्तम पुरुष बड़े दयालु होते हैं। उस प्रेत की उनसे किसी का दुःख सहन नहीं होता। कैसा भी पापी, धर्मात्मा, प्रेत, राक्षस, पिशाच सबको शरण देते हैं। ब्राह्मण, धर्मधर्मी वचनों को सुनकर उस प्रेत को पूर्व जन्म का स्मरण हो गया।
वह हाथ जोड़कर कहता है, हे विप्र मैंने पूर्व जन्म में अनेक पाप किए कई लोगों की हत्या की, डाका और चोरी की। मदिरा पीकर अनेक बलात्कार किए अपने जीवन में कभी शुभ और पुण्य कर्म नहीं किये सारा जीवन पाप कर्म में बिता दिया। आखिर मृत्यु के बाद यमदूतों ने मुझे प्रेत योनि में भेज दिया गया। हे विप्र इस योनि में यातना दी। नरकों का दुःख भोगने के बाद मुझे प्रेत योनि में भेज दिया गया। हे विप्र इस योनि में जैसा मेरा भयंकर आकार है वैसे ही हमारे कर्म होते हैं। हम लोगों से अनेक जीवों की हिंसा होती है। पाप हो होते हैं। कभी शुभ कर्म नहीं होता। अनेक कल्पों से मैं इस प्रेत योनि का दुःख भोग रहा हूँ। आज मेरा अहो भाग्य था जो आप पुण्यात्मा के दर्शन हो गए इससे मैं समझ रहा हूँ कि मेरा पापों के प्रायश्चित का समय आ गया है। और आपके द्वारा मेरा उद्धार हो जाएगा। प्रेत के शब्दों को सुनकर ब्राह्मण धर्मधर्मी कहता है, हे प्रेत वास्तव में तू बहुत दुःखित है। मैं अपने कुछ पुण्य के द्वारा तुझे जल हाथ में लेकर संकल्प किया कि मैंने पुरुषोत्तम मास में तीन दिन स्नान किया है। उसका जो पुण्य है। इस प्रेत को दे देता हूँ। ऐसा कहकर प्रेत के शरीर पर छोड़ दिया। उस पुण्य को करते ही उसका प्रेतत्व नष्ट हो गया।
वह दिव्य स्वरूप का हो गया। और ब्राह्मण की वंदना करता हुआ स्वर्ग लोक को चला गया।
वह ब्राह्मण भी घर में आकर भगवान पुरुषोत्तम की आराधना में निमग्न होकर पुरुषोत्तम मास का उद्यापन करके समापन किया। इस प्रकार वह ब्राह्मण अपनी शेष आयु को पूराकर मृत्यु के बाद उत्तमदिव्य स्वरूप धारण करके विमान पर बैठकर स्वर्ग लोक को चला गया। हे लक्ष्मी सिर्फ तीन दिन के स्नान का इतना पुण्य है तो संपूर्ण मास के स्नान का कितना माहात्म्य और पुण्य होगा। भगवान के वचनों को सुनकर लक्ष्मी जी कहती है। हे प्रभु स्नान की महिमा को सुनकर मेरे मन में और भी स्नान की महिमा सुनने की इच्छा है। कृपा कर स्नान महिमा का वर्णन सुनाइयेगा।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
ब्रह्मनारदीय पद्माधारे एकर्विंशोऽ अध्याय: समाप्त ।।
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।। शुभमभवतु ।।