राधा ढूंढ रही किसी ने मेरा श्याम देखा | Radha Dhundh Rahi Kisi Ne Mera Shyam Dekha

 राधा ढूंढ रही किसी ने मेरा श्याम देखा,


राधा ढूंढ रही किसी ने मेरा श्याम देखा,

श्याम देखा, घनश्याम देखा,

ओ बंसी बजाते हुए,

ओराधा तेरा श्याम देखा॥


राधा तेरा श्याम हमने मथुरा मैं देखा,

बंसी बजाते हुए,

ओराधा तेरा श्याम देखा॥


राधा तेरा श्याम हमने गोकुल मैं देखा

गैया चराते हुए ओ राधा तेरा श्याम देखा॥


राधा तेरा श्याम हमने वृन्दावन मैं देखा

रास रचाते हुए ओ राधा तेरा श्याम देखा॥


राधा तेरा श्याम हमने गतिपुरा मैं देखा,

गोवर्धन उठाते हुए ओ राधा तेरा श्याम देखा॥


राधा तेरा श्याम हमने सर्वजगत मैं देखा,

राधा राधा जपते हुए,

ओराधा तेरा श्याम देखा॥


Shyama Tere Charano Ki |श्यामा तेरे चरणों की गर धूल जो मिल जाए

 श्यामा तेरे चरणों की गर धूल जो मिल जाए



श्यामा तेरे चरणों की गर धूल जो मिल जाए।

सच कहता हूँ मेरी तकदीर बदल जाए॥


राधे तेरी कृपा तो दिन रात बरसती है।

एक बूँद जो मिल जाए, मन की कलि खिल जाए॥


यह मन बड़ा चंचल है, कैसे तेरा भजन करूँ।

जितना इसे समझाऊं, उतना ही मचल जाए॥


नजरो से गिराना ना, चाहे जो भी सजा देना।

नजरो से जो घिर जाए, मुश्किल ही संभल पाए॥


राधे इस जीवन की बस एक तम्मना है।

तुम सामने हो मेरे, मेरा दम ही निकल जाए॥

Adhik mass ki Katha | अधिक मास की कथा

 Adhik mass ki Katha | अधिक मास की कथा 

पहले अध्याय की कथा 

2 दूसरे अध्याय की कथा 

3 तीसरे अध्याय की कथा 

4 चौथे अध्याय की कथा 

5 पांचवे अध्याय की कथा 

6 छठे अध्याय की कथा 

7 सातवें अध्याय की कथा 

8 आठवें अध्याय की कथा 

9 नौवें अध्याय की कथा 

10 दसवें अध्याय की कथा 

11 ग्यारहवे अध्याय की कथा 

12 बारह वे अध्याय की कथा 

13 तेरह वे अध्याय की कथा 

14 चौदहवें अध्याय की कथा 

15 पंद्रहवें अध्याय की कथा 

16 सोलहवें अध्याय की कथा 

17 सत्रहवी अध्याय की कथा 

18 अठारहवें अध्याय की कथा 

19 उन्नीसवे अध्याय की कथा 

20 बीसवें अध्याय की कथा 

21 21वे अध्याय की कथा 

22 22वे अध्याय की कथा 

23 23 वे अध्याय की कथा 

24  24वे अध्याय की कथा 

25  25वे अध्याय की कथा 

26 26वे अध्याय की कथा 

27 27वे अध्याय की कथा 

28 28वे अध्याय की कथा 

29 29 वे अध्याय की कथा 

30 30वे अध्याय की कथा 

31 31वे अध्याय की कथा 

Adhik mass ki Katha 31 adhyaya| अधिक मास की कथा 31वा अध्याय

 Adhik mass ki Katha 31 adhyaya| अधिक मास की कथा 31वा अध्याय 

॥ अथ एकत्रिंशत्तमोऽध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री गणधिपतये नमः ॥
(३१)
श्री भगवान नारायण नारदजी से सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं। हे ऋषियों इसके पहले कथा प्रसंग में जब उस वानर की मृगतोर्थ कुंड में पांचदिन जल में रहने के बाद मृत्यु हो गई और वानर के शरीर को त्याग जीवात्मा ने चतुर्भुजी दिव्य स्वरूप अलंकार आभूषणों से युक्त भगवान के जैसा उसका स्वरूप हो गया और उसने आकाश मार्ग से एक दिव्य विमान जिसपर भेरी मृदंग के वाद्य बज रहे थे देवांगनाएं नृत्य कर रही थी। सुवर्ण रत्न और मोतियों की झालर से सुशोभित चंद्र के समान कांतिवाला जिसपर भगवान पुरुषोत्तम के पार्षद बैठे हुए ऐसे विमान को अपने पास आकर रुकते हुए देखा तो उस दिव्य देह धारी वानर व कर्दयु की जीवात्मा अत्यंत विस्मय चकित हो सोचने लगी वह विमान यहाँ क्यों आया मुझ पापी को यह सौभाग्य कहां प्राप्त हो सकता है। अभी तो मुझे अनेक नरकों की यातना यमराज की आज्ञा से भोगनी पड़ेगी। विमान का सुख तो किसी बड़े महान पुण्यात्मा को ही प्राप्त हो सकता है।
इस प्रकार विचार कर रहा था वह जीवात्मा। तभी विमान से भगवान के पार्षद व देवांगनाएं उतरकर उस जीवात्मा के सामने नृत्य करने लगी और एक देवांगना ने उसी जीवात्मा को कभी न सूखने वाले सुगंधित पुष्पों की माला पहना दी और एक ने सोने की झारी में गंगाजल लेकर उसके सामने रख दिया और एकने रत्नों से जड़ित सोने के पानदान में ताबुल (पान का बीड़ा) सहित सामने लेकर खड़ी रही इन सब दृश्यों को देखकर वह जीवात्मा अत्यंत भयभीत होकर चित्र के समान खड़ी रह गई। और मन में सोचने लगी। मेरे जैसे दुष्ट और पापी को यह सौभाग्य कहां से प्राप्त होगा। मेरे द्वारा कोई भी पुण्य घटित नहीं हुआ। जिससे मुझे यह सुख प्राप्त हो सके। तभी पार्षद गण जीवात्मा के पास आकर उसको नमस्कार करके हांथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं।
(१२४)
भोगना बाकी है। मेरे समझ में नहीं आ रहा कि मुझ से ऐसा कौन सा पुण्य घटित हुआ कि मेरे समस्त पाप नष्ट होकर यह सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। अरे यमदूतों मैं जानता हूँ कि कितनी बूंद गिरती है। पृथ्वी पर जितनी घास उत्पन्न होती है। उससे भी ज्यादा मेरे द्वारा किए गए पाप हैं। इतने पर भी मेरा यह दिव्य चतुर्भुजी स्वरूप यह विमान और मेरा यह सम्मान विमान पर बैठकर गोलोक चलने का आग्रह मेरे कुछ समझ में नहीं आ रहा कृपा करके मुझे सब समझाकर बताओं कि क्यों ऐसा घटित हो रहा है। जीवात्मा के शब्दों को सुनकर एक पार्षद (देवदूत) ने कहा है स्वामी मैं आपको बताता हूँ। यह जो महीना व्यतीत हुआ सभी महीनों में श्रेष्ठ और थोड़ा भी कर्म करने पर अनंत पुण्यदायक होता है। यह मास भगवान पुरुषोत्तम का मास कहा जाता है जो सभी देवताओं के स्वामी हैं। इस मास में घटित पुण्य प्रत्यक्ष फल देने वाला होता है।
आपसे इस मास मेंकठिन तपस्या घटित हुई है। जो कि मानव शरीर के द्वारा भी नहीं हो पाती। आपने वानर शरीर से मुख में फोड़ेहोने से निराहार रहकर इस मास को व्यतीत करने से संपूर्ण मास के व्रत का पुण्य प्राप्त किया। व जातीय चंचलता के कारण अनेक वृक्षों के फलों को तोड़कर कष्ट के कारण स्वयं न खाकर फेंक दिया जिससे अनेक जीवों पर परोपकार का पुण्य प्राप्त किया। नीचे गिरे फलों को अनेक वन्य पशुओं ने खाकर तृप्त होने से पुण्य प्राप्त किया। मुख की पीड़ा जल तक नहीं पीने से निराहार और जल रहित उपवास का पुण्य प्राप्त किया। मृगतीर्थ कुंड में पानी के भीतर ठंडक व हवा का प्रकोप सहते हुए, अंतिम पांचदिन त्रिकाल स्नान का पुण्य प्राप्त किया। यद्यपि आप से मुख में व्रण होने से अज्ञानावस्था में और जातीय चंचलता के कारण यह सब घटित हुआ है। फिर भी आपको समस्त पुण्य की उपलब्धि का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यही इस मास की विशेषता है किसी भी प्रकार से कैसी भी अवस्था में थोड़ा भी कर्म महान पुण्यदायक होता है।
जो लोग इसके माहात्म्य को जानते हुए नियम व्रत धारण करते हुए कर्म करते हैं, उनको कितना पुण्य घटित होता है इसका वर्णन चार मुखवाले ब्रह्माजी भी कहने में असमर्थ हैं। पुरुषोत्तम मास में यदि कोई एक भी व्रत कर लेवे तो उसके जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। वे लोग बड़े भाग्यशाली हैं जिन्होंने मानवशरीर धारण करके अधिक मास में स्नान व्रत जप दान आदि शुभकर्म करके व्यतीत किया। तथा जो मानवशरीर धारण करके अधिक मास व्यर्थ ही बिता देते हैं वे मूखों को धिक्कार है। देवदूतों के ऐसे शब्दों को सुनकर कर्दयु की जीवात्मा आश्चर्य चकित हो गई। फिर उसने मृगतीर्थ कुंड...
(१२५)
और कालिंजर पर्वत को नमस्कार करके उस दिव्य विमान की प्रदक्षिणा करके देवदूतों के साथ विमान पर बैठकर गोलोक की ओर प्रस्थान किया जब विमान देवलोक से जा रहा था तब इंद्र आदि देवताओं ने विमान पर फूलों की वर्षा की।
वायु की गति से उड़ता हुआ विमान स्वर्ग आदि लोकों के ऊपर से होता हुआ गोलोक को पहुंचा वहां भी पार्षदों द्वारा उस जीवात्मा का स्वागत हुआ फिर देवदूत उस स्थान में पहुंचे जहां गोलोकाधिपति भगवान पुरुषोत्तम रत्न जड़ित सिंहासन पर विराजमान थे वहां पहुंचकर जीवात्मा ने भगवान पुरुषोत्तम को साष्टांग नमस्कार करके वह दिव्यज्योति भगवान के प्रकाश में लीन अर्थात चौरासी लक्ष योनियों में भ्रमण से रहित होकर मोक्ष को प्राप्त हो गई। हे नारद वह ब्राह्मण कर्दयु नीच पापी होकर भी भगवान पुरुषोत्तम के अधिकमास के पुण्य प्रभाव से उत्तम गति अर्थात मोक्ष को प्राप्त हो गया। इतना महान और अक्षय पुण्य को देनेवाला मोक्ष की सद्गति को देनेवाला अधिक मास का पुण्य सर्वश्रेष्ठ है।
सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं, हे ऋषियों भगवान नारायण के द्वारा संपूर्ण मास के माहात्म्य को सुनकर आनंद विभोर होकर बारंबार भगवान को नमस्कार करके भगवान पुरुषोत्तम का नाम स्मरण करते हुए नारदजी सत्यलोक को चले गए। हे ऋषियों आपके द्वारा किए गए प्रश्नों का उत्तर भगवान नारायण और देवर्षि संवाद के रूप में आपको सुनाया अधिक मास के समान पुण्यदाता संसार में कोई कर्म नहीं है और भगवान पुरुषोत्तम के समान मोक्ष दाता और कोई देवता नहीं है। इसलिये मानव शरीर धारण करने पर जीवात्मा को सद्गति (मोक्ष) प्राप्त करने के लिये अधिक मास में अपनी शक्ती और श्रद्धा के अनुसार कर्म अवश्य करना चाहिए क्योंकि जीवात्मा चौरासी लक्ष योनि भ्रमण करने के बाद मानव योनि प्राप्त करता है। यदि मनुष्य योनि में अपने उद्धार के निमित्त शुभकर्म नहीं किया तो माया मोह स्त्री पुत्र धन के जंजाल में फंसकर जीवन व्यतीत कर दिया तो मृत्यु के उपरांत कर्मों के द्वारा नरक की यातना और चौरासी लक्ष योनि में बारबार पैदा होना और मृत्यु होना इसी चक्कर में (घटी यंत्र) घड़ी के कांटों के अनुसार अनेक कल्पों तक जीवात्मा दुःख भोगते रहेगी। इसलिये सबसे सरल मोक्ष प्राप्ति का साधन पुरुषोत्तम मास में भगवान पुरुषोत्तम की सेवा आराधना ही सर्वश्रेष्ठ और सतत साधना है। अधिक मास में इसकी कथा तथा माहात्म्य का श्रवण करके अंत में कथावाचक ब्राह्मण की पूजा करके वस्त्र, अन्न दक्षिणा का दान करते हैं। इससे भी भगवान पुरुषोत्तम की प्रसन्नता कृपा प्राप्त होती है। इस प्रकार इस कथा को सूतजी ने शौनकादि ऋषियों को सुनाया और महर्षि वेद-व्यास ने अपने...
(१२६)
श्रोतागणों को सुनाया।
(उसी संस्कृत भाषा का अनुवाद करके प्रांतीय भाषा मराठी (लवणी) भाषा में भृगुकुल में उत्पन्न रेणुका जमदग्नि से उत्तर कोंकण (महाराष्ट्र) में सह्याद्रि पर्वत की तलहटी में प्रसिद्ध राजा पुर नामक ग्राम में धूतपापेश्वर नामक शिवलिंग और मंदिर है उस मंदिर के पुजारी धगवे कुल में उत्पन्न श्री सदाशिव, उनके पुत्र श्री विट्ठल, उनके पुत्र श्री रघुनाथ शास्त्री तर्कशास्त्र और व्याकरण शास्त्र के विद्वान श्री परशुराम शास्त्री ने श्री मातापिता के चरणों का आशीर्वाद और भगवान शंकर की कृपा से प्रांतीय मराठी (लवणी) भाषा में अनुवाद किया यह शुभ कार्य शके अठारह सौ अठत्तर दुर्मुखनाम संवत्सर वैशाख शुक्ल १५ पूर्णिमा सोमवार को परिपूर्ण हुआ। इसी प्रकार भगवान पुरुषोत्तम की महान भक्त प्रत्येक अधिक मास में स्नान व्रत अखंडदीप नित्य इसकी कथा और श्री मदभागवत का श्रवण करते हुए, संपूर्ण मास श्रद्धापूर्वक व्यतीत करके अमावस को उद्यापन का विधान हवनादि कर्म यथा शक्ति दान करते हुए, उत्तर पूजन ब्राह्मण भोजन दक्षिणा आदि कर्म श्रद्धापूर्वक समस्त कर्म संपन्न करने वाली धर्म के प्रति महान रूचि रखने वाली स्व. श्री मन्शीलाल साहु की पत्नि भ. श्री. श्री केशर बाई की अथक आग्रह और इच्छा से इनके कुल पुरोहित उपमन्यु गोत्र में उत्पन्न पं. रजनीकिशोर अवस्थी के ज्येष्ठ पुत्र पं. मधुसूदन अवस्थी ने आज संवत २०५० शके १९१५ वैशाख शुक्ल १५ पूर्णिमा गुरुवार तदनुसार ता. ६ मई सन १९९३ को इस ग्रंथ को मराठी (कोंकणी) भाषा का हिंदी में अनुवाद परिपूर्ण किया।)
इस महान पुण्य कार्य में समस्त जनसमुदाय को इसका लाभ प्राप्त हो भगवान पुरुषोत्तम के प्रति श्रद्धा जागृत करके अपनी आत्मा को मोक्ष की सद्गति प्राप्त करें। कभी भी नष्ट होनेवाला पंचभौतिक शरीर और हमेशा चलायमान होने वाली लक्ष्मी जब दोनों का समागम मनुष्य के जीवन में हो तभी इन दोनों के प्रति मोहत्याग कर मनुष्य कुछ पुण्यकर्म कर सकता है। ऋषियों और महापुरुषों के इन्हीं सद्वाक्यों की प्रेरणा से जागृत होकर चौधरी परिवार में उत्पन्न (श्री केशर बाई की द्वितिय कन्या कमलाबाई व स्व. श्री बलराम चौधरी के पुत्र) श्री सतीश चौधरी ने इसे हिन्दी में अनुवादित ग्रंथ को छपाने का सर्वपुर्ण प्रयास किया।)
॥ शुभमंगल मस्तु ॥





Adhik mass ki Katha 30 adhyaya| अधिक मास की कथा 30 वा अध्याय

 Adhik mass ki Katha 30 adhyaya| अधिक मास की कथा 30 वा अध्याय 


॥ अथ त्रिंशत्तमोऽध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
श्री भगवान नारायणजी से और सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं हे ऋषियों! इसके पहले के अध्याय में जब कदर्यु की जीवात्मा को यम के दूत रस्सों से बांधकर मुद्गरों से पीटते हुए ले जा रहे थे और वह जीवात्मा अपने कर्मों पर पश्चात्ताप कर रहा था। इस प्रकार उस को यमराज के सामने खड़ा किया यमराज ने चित्रगुप्त से पूछा हे चित्रगुप्त! इस जीवात्मा के पाप आदि कर्मों का निवेदन करो। यमराज की आज्ञा को सुनकर चित्रगुप्त ने कहा हे प्रभु! यह जीवात्मा पापी कदर्यु की है। वह जाति से ब्राह्मण था परन्तु इसके कर्म नीच थे यह धन का अत्यंत लोभी इसने चोरी की और मित्र से विश्वासघात किया। बगीचे में रहकर अनेक जीवों की हिंसा की फलों की चोरी की और धन को संचय करके जमीन में गाड़कर रखा। धन के लोभ में अपने परिवार का पालन पोषण नहीं करके उनका त्याग किया और भी अनेक प्रकार के पाप किए हैं। कदर्यु के जीवन का वृत्तांत चित्रगुप्त के द्वारा सुनकर यमराज अत्यंत क्रोधित होकर कहते हैं। इसको फल की चोरी के अपराध में वानर की योनि दी जाय और विश्वास घात व अनेक पाप कर्मों के लिये इसको प्रेत योनि दी जाय और अनेक प्रकार से नरक की यातना भी दी जाय यमराज की आज्ञा को चित्रगुप्त ने सुनकर दूतों को आज्ञा दी की प्रथम इसको प्रेत योनि में डाल दो दूतों ने कदर्यु की जीवात्मा को भयंकर जंगल में ले जाकर प्रेतयोनि में डाल दी वह भयंकर प्रेत हो गया वहां उसको न खाने की कोई वस्तु न पीने का जल प्राप्त हो तथा वह भूख प्यास से तड़पता हुआ रातदिन घूमता रहता था। अनेक वर्षों तक प्रेत योनि का दुःख भोगने के पश्चात फलों की चोरी के अपराध से वानर योनि प्राप्त हुई। वानर की योनि में उसका कालिंजर पर्वत पर जन्म हुआ। कालिंजर पर्वत अत्यंत सुंदर स्थान है वहां बड़े बड़े फलों के वृक्षों की शीतल छाया रहती है। मधुर और मीठे फल बहुतायत से वृक्षों में लगे रहते हैं। वह अत्यंत पवित्र स्थान माना जाता है। वहां पाप नाशक कुंड है। जो कि सरोवर के समान बड़ा और शुद्ध जल से परिपूर्ण रहता है। वह स्थान मृगतीर्थ के नाम से शास्त्रों में प्रसिद्ध है। वहां पितरों के प्रति श्राद्ध पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष देने वाला सिद्ध होता है। इंद्रकेद्वारा निर्मित वह कुंड मृगतीर्थ समस्त पापों का नाशक है। जब कोई महाबली दैत्य देवताओं पर विजय प्राप्त कर लेता है, तो देवतालोग भयभीत होकर इसी कालिंजर पर्वत पर मृग का स्वरूप धारण करके छिपे रहते हैं और उसी कुंड का जल पीते हैं। इसीलिये उसकुंड का नाम मृगतीर्थ प्रसिद्ध हुआ। जब भगवान के द्वारा महाबलि राक्षस का वध हो जाता है, तब इंद्र इत्यादि देवता उसी मृगकुंड में स्नान करके निष्पाप होकर अपने देवता स्वरूप को धारण करके देव लोक को चले जाते हैं।
भगवान नारायण के वचनों को सुनकर नारदजी ने शंका प्रगट की, हे महाप्रभु कदर्यु तो महापापी था फिर उसको ऐसे पवित्र स्थान पर वानर की योनि क्यों प्राप्त हुई। इसका कारण बताकर मुझे शंका से मुक्त करें। देवर्षि नारद की वाणी को सुनकर भगवान आनंदित होकर कहते हैं। हे नारद जिस नगर में कदर्यु रहता था उसी नगर में चित्रकुंडल नाम का एक धनवान वैश्य रहता था। उसकी स्त्री का नाम तारा का था। वे दोनों पति पत्नि भगवान के भक्त और बड़े दानी थे। जब भी अधिकमास आता बड़ी श्रद्धा से नियमव्रत धारण करके अखंडदीप नित्य पूजन दीपदान अनेक प्रकार के दान करके संपूर्ण मास व्यतीत करके अंतिपदिन के पहले चतुर्दशी को उद्यापन हवन ब्राह्मण भोजन अपूपदान सुवर्ण वस्त्र धान्य का दान करते और दूसरे दिन भगवान का उत्तर पूजन करके विसर्जन क्षमा याचना करके अनेक प्रकार का दान शय्यादान तिलपात्र का दान द्रव्य दान और भिक्षुकों को भी अन्न आदि का दान करके व्रत का समापन करते थे। ऐसा उनका प्रत्येक अधिक मास का नियम था। ऐसे ही एक समय अधिकमास के उद्यापन में उस वैश्य ने वेद शास्त्रों को जाननेवाले अनेक विद्वानों को आमंत्रित करके पूजन हवन की समस्त विधि को संपन्न करके ब्राह्मणों को भोजन कराके तांबूल, द्रव्य, वस्त्र, आभूषण और बहुमूल्य वस्तुओं को देकर संतुष्ट करके विदा किया और अनेक प्रकार के मांगलिक वाद्यों के द्वारा भजन कीर्तन में संलग्न होकर भजन करने लगा। कदर्यु को जब उत्सव के वाद्य और भजन की आवाज सुनाई दी तो वह भी द्रव्य प्राप्त करने की इच्छा से वहां पहुंच गया और भगवान के पूजन मंडप और हवन कुंड के दर्शन करके भगवान को नमस्कार करके यज्ञ की भस्म को ललाट पर लगाकर प्रणाम किया और पूजा द्वार पर कुछ मिलने की आशा से खड़ा हो गया काफी देर तक खड़ा रहा।
भजन कीर्तन का जब विश्राम हुआ वैश्य ने कदर्यु को देखा तो कदर्यु के पास आकर उसको भी कुछ दक्षिणा दी। परंतु कदर्यु को लोभ के कारण संतोष नहीं हुआ और कुछ प्राप्त होगा इस आशा से वैष्णव की प्रशंसा करने लगा। हाथ जोड़कर गदगद वाणी से कहता है। हे धर्मात्मा तुम बड़े भाग्यशाली हो तुमने भगवान पुरुषोत्तम की आराधना उद्यापन कर्म बड़ी श्रद्धा से की है। इस प्रकार का पुण्यकर्म आज तक इस नगरी में किसी ने नहीं किया। तुम्हारे माता पिता धन्य हैं। जिन्होंने तुम जैसे धर्मात्मा पुत्र को जन्म दिया। और तुम भी धन्य हो कि तुम्हारे मन में भगवान पुरुषोत्तम के प्रति इतनी श्रद्धा भावना है तुमने यह पुण्य कर्म करके अपना इहलोक और परलोक दोनों बना लिया।
भगवान पुरुषोत्तम की आराधना से जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट होकर सभी प्रकार के सुख की उपलब्धि आजन्म पर्यन्त रहती है। अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस का समस्त कर्म अक्षय पुण्य देता है। हे वैश्य तुमने अनेक ब्राह्मणों को बहुत सा द्रव्य दान में दिया परंतु मैं कैसा भाग्यहीन हूं कि मुझे इतना सा ही प्राप्त हुआ। कदर्यु के वचनों को सुनकर उस वैश्य ने प्रसन्न होकर और भी द्रव्य देकर कदर्यु को प्रसन्न कर दिया। कदर्यु द्रव्य प्राप्त कर आनंदित होकर उस द्रव्य को लाकर जमीन में गाड़ दिया। किसी भी निमित्त से कदर्यु ने उद्यापन पूजन का दर्शन किया यज्ञ हवन की भस्म का प्राशन किया भगवान को नमस्कार करके पुरुषोत्तम मास और पुण्य की प्रशंसा की इससे उसको भी कुछ पुण्य की प्राप्ति हुई जिसके कारण उसको कालिंजर पर्वत की पुण्य पावन भूमि पर वानर की योनि प्राप्त हुई। हे नारद वानरों को वैसे भी भगवान राम का वरदान प्राप्त है। त्रेतायुग में जब राम और रावण का युद्ध हुआ श्रीराम की सेना में वानर ही वानर थे। भगवान राम ने विभीषण को छोड़कर समस्त राक्षसों को मारकर विजय प्राप्त की। इस युद्ध में बहुत से वानर भी मृत्यु को प्राप्त हुए।
रावण के मारे जाने पर ब्रह्मा आदि देवताओं ने प्रसन्न होकर श्री राम से अनुरोध किया कि हे राम आपने इस अधम राक्षस और रावण को मारकर हम सब देवताओं को भय से मुक्त कर दिया इसलिये हम सब देवता प्रसन्न होकर आपको वरदान देना चाहते हैं। आपके मन में जो इच्छा हो वरदान मांगो। देवताओं की इच्छा को सुनकर श्री राम ने कहा, हे देवताओं यदि आप वरदान देना चाहते हैं। तो इस युद्ध में जो वानर राक्षसों के द्वारा मारे गए हैं उनके ऊपर अमृत की वर्षा करके जीवित कर दो। रामचंद्रजी के द्वारा यह वरदान मांगने पर देवताओं ने मृत वानरों पर अमृत की वर्षा की।
वानरों के मृत शरीर पर अमृत गिरते ही समस्त वानर जय जय श्री राम कहते हुए उठकर बैठ गए जैसे घोर निद्रा से जागे हुए हों। जब भगवान राम अयोध्या को जाने के लिये पुष्पक विमान पर बैठे तो समस्त वानरगण विमान के पास आकर खड़े हो गए। तो भगवान राम ने अत्यंत प्रेम से कहा, हे सुग्रीव, हनुमंत, अंगद, जांबवंत सहित समस्त मित्र वानरों तुम लोगों ने युद्ध में सहयोग देकर मित्रता कार्य किया है। अब तुम लोग अपनी इच्छा से कहीं भी जा सकते हो मैं तुम समस्त वानर जाति को वरदान देता हूं कि आप लोग जहां कहीं भी रहेंगे उस स्थान पर फल से परिपूर्ण वृक्ष और जल चाहे वह नदी तालाब या झरना हो जल से परिपूर्ण रहेंगे सुंदर शीतल छाया प्राप्त होगी। कभी भी कहीं पर भूख और प्यास का कष्ट नहीं होगा। और तुम वानर जाति हमेशा दीर्घायु होगे। हे नारद श्रीराम के द्वारा आशीर्वाद वरदान के कारण ही जहां जहां वानर रहते हैं वह स्थान फल फूल और जल से परिपूर्ण रहता है।
परंतु वानर योनि में भी अपने पूर्व कर्मों के अनुसार सुख दुःख भोगना ही पड़ता है। उस कदर्यु की जीवात्मा का कालिंजर पर्वत पर वानर योनि में जन्म हुआ। दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा। उत्तम उत्तम फलों को खाकर हष्ट पुष्ट बड़े शरीर वाला दीर्घ काय हो गया। जातीय चंचलता के कारण एक जगह स्थिर न रहकर इस वृक्ष से उस वृक्षपर कूदते रहता था। पूर्व जन्म के पाप का फल तो भोगना ही पड़ेगा। पित्त की अधिकता होने से उस वानर के मुख में फोड़ा होगया उसकी भयानक पीड़ा से उसको महान दुःख तथा मुख से चबाना खाना सब बंद हो गया। खाना बंद होने से शरीर दुर्बल और अशक्त हो गया। परंतु स्वभाव की चंचलता से वृक्ष से फल तोड़ता जैसे ही खाने के लिये मुखखोलता भयंकर पीड़ा होती तो फल को फेंक देता। कभी एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर कूदता तो शारीरिक शक्ति हीनता से पूरी उछाल न भरने से पृथ्वी पर गिरकर कई जगह शरीर में चोट लगने से महान कष्ट भोगना पड़ता। इस प्रकार भूख प्यास से व्याकुल इस वृक्ष से उस वृक्ष पर घूमते हुए अनेक दिन बीत गए। फलों को तोड़कर फेंक देने का क्रम बराबर चालू था उस जीवात्मा के सौभाग्य से वह अधिक मास का पुण्यदायक समय था।
उस मास के जब अंतिम पांच दिन शेष रहे तब उस वानर को अत्यंत प्यास से विकलता ऊपर हो गई। वह मृगतीर्थ कुंड के ऊपर वृक्ष की डाली पर बैठा हुआ कुंड केजल की तरफ तृष्णा भरी दृष्टि से देख रहा था परंतु कोई उपाय वहां तक जाकर जलपीने का सूझ नहीं रहा था। ऐसे में जातीय चंचलता से दूसरी डाली पर जाने के लिये उड़ान मारी परंतु शारीरिक कमजोरी के कारण उस डाली तक न जाकर नीचे मृगकुंड में गिर पड़ा उस समय उसकुंड में कम पानी होने से उसमें डूब नहीं सका परंतु उसकी छाती भर पानी होने से जल में ही पांचदिन तक पड़ा रहा शरीर अशक्त होने के कारण इतनी ऊंची उड़ान नहीं ले सकता था कि कुंड के बाहर आ जाए। भूख से व्याकुल और कमजोर शरीर मुख में फोड़ा और पानी में लगातार भीगे रहने से गिरते के पांचवे दिन (अर्थात् दशमी से अमावस पर्यंत) मध्यान्ह के समय उस पवित्र मृगतीर्थ के जल में उसने प्राणों का परित्याग कर दिया। वानर के शरीर का त्याग करते ही उसकी जीवात्मा ने दिव्य स्वरूप धारण कर लिया। वह चतुर्भुजी मेघ के समान श्यामल वर्ण का अत्यंत तेजस्वी सूर्य के समान कांतिवाला पीतांबर धारण किए हुए, सिरपर सुंदर रत्नों से जड़ा हुआ मुकुट कानों में कुंडल आदि आभूषण से सुसज्जित शरीर वाला दशों उंगलियों में मुद्रिका गले में वैजयंती माला ऐसे दिव्य स्वरूप का हो गया। उसी समय उस जीवात्मा को आकाश मार्ग से दिव्य विमान आता हुआ दिखाई दिया।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
बृहन्नारदीय पद्याधारे त्रिंशत्तमोऽध्यायः समाप्त ॥
(३०)
॥ शुभमभवतु ॥