Adhik mass ki Katha 4 adhayaya| अधिक मास की कथा चौथा अध्याय
॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री गणधिपतये नमः ॥
आज के कथा प्रसंग में व्यासजी श्रोताओं से, सूत जी शौनकादिक ऋषियों से और भगवान नारायण नारदजी से तथा भगवान कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि -
हे युधिष्ठिर मैंने तुमसे अधिक मास को श्रेष्ठता कैसे प्राप्त हुई और उसका पुरुषोत्तम नाम कैसे हुआ यह सब विस्तार पूर्वक कहा। अब मैं तुमसे पुरुषोत्तम मास से संबंधित तुम्हारी पत्नि पांचाली (द्रौपदी) के पूर्व जन्म का इतिहास कहता हूँ। हे युधिष्ठिर पहले किसी समय तपोवन में एक मेधावी नाम के ब्राह्मण की कन्या थी। इसकी माता बाल्यावस्था में ही स्वर्ग सिधार गई थी। पत्नि की मृत्यु के बाद मेधावी ब्राह्मण माता और पिता दोनों का प्रेम देते हुए बालिका का पालन पोषण करने लगे। बालिका भी चंद्रमा के समान सुंदर थी। पिता की सुरक्षा में बालिका दिन पर दिन बढ़ने लगी। जब वह दश वर्ष की हुई तो उसकी सुंदरता में और भी निखार आ गया। वह अत्यंत सुंदर चंद्रमा के समान गौरवर्ण तेजस्वी हिरणी जैसी आँखों वाली, रंभा के समान चपल चंचल और बुद्धिमान थी। पिताने उसके विद्याअध्ययन की उचित व्यवस्था की। बालिका प्रखर बुद्धि की होने के कारण शीघ्र ही अलंकार, साहित्य, और नीतिशास्त्र में प्रवीण हो गई। और सर्व गुण संपन्न हो गई। मेधावी ब्राह्मण के आश्रम के आसपास और भी कई ब्राह्मणों के आश्रम थे उनकी भी कन्याएं थी। उनके साथ बालिका का सखीभाव था उनमें से कई सखियों के विवाह हो चुके थे तथा पुत्रवान भी हो चुकी थी, वे सब अपने पति पुत्रों के साथ लौकिक आनंद भोग रही थी। उनके आनंद को देखकर मेधावी की कन्या के मन में भी विचार उत्पन्न होते थे मन में तर्क वितर्क होते थे। कि मुझे कैसा पति मिलेगा। मेरा कब विवाह होगा। मुझे यह सौभाग्य कब प्राप्त होगा। आदि।
मेरी युवावस्था बीत रही है। परंतु मुझे यह सुख कब प्राप्त होगा। मेरा भाग्य कहां सोया हुआ है। ऐसा सोचकर मन में चिंतित रहने लगी। मेधावी ब्राह्मण भी मन में चिंतात्तुर होते हुए कन्या को योग्य वर की व्यवस्था के लिये अनेक नगरों का स्थानों का भ्रमण करते हुए प्रयास में लगा रहा। अनेक दिन व्यतीत हो गए परंतु कन्या के लिये योग्य वर की प्राप्ति में सफलता नहीं मिल सकी। एक समय मेधावी ब्राह्मण ने कन्या को चिंतात्तुर देखकर अपने मन में निश्चय किया कि अबकी बार में योग्य वर की व्यवस्था करके ही आश्रम में वापस आऊंगा ऐसा निश्चय करके कन्या को समझाकर योग्यवर की तलाश करता हुआ अनेक नगरों का भ्रमण किया परंतु दुर्भाग्य ऐसा कि कहीं भी योग्य और समाधानकारक वर नहीं मिला। अनेक स्थानों का भ्रमण करते हुए ब्राह्मण परिश्रम से थकावट से शरीरे जर्जर होकर बुखार से ग्रसित हो गया ऐसी अवस्था में आश्रम की ओर लौट पड़ा मार्ग में चिंतित होकर विचार करने लगा कि मैंने अपनी कन्या का बड़े प्रेम से पालन पोषण किया उच्च शिक्षा दी परंतु मेरा सारा परिश्रम व्यर्थ हो गया यह कन्या का दुर्भाग्य ही मालूम होता है। इस प्रकार चिंता में ग्रस्त बुखार से पीड़ित वह ब्राह्मण आश्रम की तरफ लौट आ रहा था आश्रम थोड़ी ही दूरी पर था कि मेधावी की शारीरिक अवस्था अत्यंत दयनीय हो गई उसका शरीर बुखार की ज्वाला से जलने लगा, मस्तक में भयंकर पीड़ा होने लगी श्वास जोर जोर से चलने लगी। पैरों से चलना मुश्किल हो गया। जैसे शराबी व्यक्ति नशे की हालत में कदम बराबर नहीं रख पाता वैसे ही मेधावी की हालत हो गई ऐसी अवस्था में भी बड़े प्रयास से वह ब्राह्मण अपने आश्रम की ओर चलता हुआ आया। आश्रम कुछ कदमों की दूरी पर था कि मेधावी ब्राह्मण मूर्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा, उसके शरीर में कंपन होने लगे, हाथ पैर ठंडे पड़ गए, नेत्र बारबार बंद होते और खुलते लगे। अपना अंतिम समय देखकर मेधावी ब्राह्मण बारबार भगवान से प्रार्थना करने लगा कि हे गोविंद हे कृष्ण हे पुरुषोत्तम दीनानाथ इस समय आपके सिवा मेरा कोई रक्षक नहीं है। इस भवसागर से मुझे बचाइये मैं आपकी शरण में हूं।
इस प्रकार भगवान की प्रार्थना करता हुआ उसकी आत्मा शरीर से अलग हो गयी अर्थात वह मृत्यु को प्राप्त हो गया। अंतिम समय भगवान का स्मरण और नाम का उच्चारण करने से वैकुंठ लोक से भगवान के दूत उत्तम विमान लेकर आये और उस ब्राह्मण की आत्मा दिव्य स्वरूप धारण कराके आदर पूर्वक वैकुंठ लोक को चली गई आश्रम में कार्य करती हुई बालिका के कानों में पिता के कराहने के शब्द कानों में पड़ते ही बालिका दौड़ती हुई पिता के पास पहुंची वहां जाकर देखती हैं कि पिता मृत अवस्था में पड़ा हुआ है। ऐसा देखकर (पिता की मृत्यु) देखकर बालिका भयभीत और थरथर कांपती हुई बड़े जोर से रोने लगी पिता के शिर को गोदी पर रखकर कहती है पिताजी उठो बोलो तुम मेरे से बोलते क्यों नहीं क्या तुम मुझ से अब गए हो। नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता तुम तो मुझ से बहुत प्रेम करते थे। माता और पिता दोनों का प्रेम देकर तुमने मुझे इतना बड़ा किया, इतना विद्याअध्ययन कराया, तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकते। मैं लड़की की जात, आपके बिना मेरी देखभाल और रक्षा कौन करेगा? यहां अपना सगा कहलाने वाला भाई, बांधव कोई तो नहीं है। मेरी माता बड़ी तपस्विनी और लक्ष्मी का स्वरूप थी जो आपके पहले ही स्वर्ग चली गई। आपका यह आश्रम मुझे जंगल जैसा मालूम होता है। हे तात मुझे अकेली छोड़कर मत जाओं। आपने मेरे विवाह के उद्यम में अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। आप वापस आ जाओं। इस प्रकार बारंबार नेत्रों से आंसू बहाती जोर जोर से रुदन करती बहुत समय व्यतीत हुआ। जंगल में जैसे कुररी पक्षी निरंतर एक शब्द का उच्चारण करते हुए चिल्लाता है। उसी प्रकार बालिका निरंतर रो रही थी। उसके निरंतर रूदन को सुनकर आसपास रहने वाले अनेक ब्राह्मण और ऋषि एकत्रित हो गए। उन्होंने मेधावी के मृतशरीर को देखकर अत्यंत दुःख व्यक्त करते हुए बालिका को आश्वासन देते हुए समझाने लगे।
हे पुत्री विधि के विधान को कोई नहीं टाल सकता तेरे पिता इतनी ही आयु लेकर आए थे आयु समाप्त होने पर सभी को शरीर का त्याग करना पड़ता है। इस तरह अनेक प्रकार से समझाया सभी ब्राह्मणों ने मेधावी के शरीर को लेकर श्मशान में उसको अग्नि में समर्पित कर सबलोग नदी में स्नानकर मेधावी ब्राह्मण की आत्मा को तिलांजली देकर अपने अपने आश्रम को वापस आ गए। वह बालिका अत्यंत दुःख से परिपूर्ण अपनी अंतरात्मा में धैर्य धारण करते हुए यथा शक्ति खर्च करते हुए पिता का अंत्येष्टि कर्म, श्राद्ध, पिंडदान, दशगात्रादि कर्म किया तेरहवे दिन त्रयोदशाह कर्म ब्राह्मण भोजन आदि यथा शक्तिदान पुण्य कर्म पिता के निमित्त किया। इस कर्म से निवृत होकर रात दिन पितृ वियोग और अपने भविष्य की कल्पना में चिंतित और दुःखित रहने लगी। जैसे जल के बिना मछली की अवस्था होती है वैसी अवस्था उस समय बालिका की थी। रातदिन शोकाकुल रहने से खानापीना और निद्रा की कमी होने लगी। सूने आश्रम में बैठी हुई नेत्रों से टपटप आंसू बहाती हुई चिंता से ग्रस्त रहने लगी। इस प्रकार कुछ दिन व्यतीत हो गए। अचानक दैव योग से भ्रमण करते हुए उस तपोवन में दुर्वासऋषी ने प्रवेश किया। ऋषियों के द्वारा जब मेधावी ब्राह्मण की मृत्यु का समाचार दुर्वासऋषि को सुनाया गया तो दुर्वास ऋषि अपने मित्र की मृत्यु को सुनकर मेधावी के आश्रम की ओर चल पड़े।
भगवान कृष्ण कहते हैं कि हे युधिष्ठिर दुर्वास ऋषि अत्यंत क्रोधी थे, क्रोध में वे दूसरे शंकर ही प्रतीत होते थे। तपस्या के कारण उनके शरीर में महान तेजस्विता थी बड़ी बड़ी जटाएं शिर पर धारण किए हुए अत्यंत उग्र स्वरूप उनका दिखाई देता था। उनके क्रोध और उग्रस्वरूप से बड़े बड़े देवता भी हमेशा भयभीत रहते थे। तपस्या के द्वारा उन्होंने त्रिदशाकर्षिणी शक्ति प्राप्त की थी। मैं देवाधिदेव होने पर भी उन्होंने मुझे एक समय पीड़ित और शापित किया।
एक समय उन्होंने रथ में घोड़े की जगह मुझे और रुक्मिणी को रथ खींचने के लिये कहा और स्वंय रथपर सवार हो गए। रथ आगे बढ़ाने की आज्ञा दी। हम दोनों रथ खींचने लगे थोड़ा आगे चलने पर सुकुमारी रुक्मिणी थककर जब प्यासी हुई असह्य प्यास से कंठ सूखने लगा। परंतु दुर्वासऋषि के डर से न तो रथ रोक सकते थे, न रुक्मिणी को पानी पिला सकते थे ऐसी अवस्था में रुक्मिणी ने मुझ से असह्य वेदना प्रकट की मैंने उसकी अवस्था को देखकर चलते चलते एक जगह पृथ्वी को अंगूठे से दबाकर पाताल गंगा की धारा प्रगट कर रुक्मिणी के मुंह में पहुंचा दी। रुक्मिणी उससे तृप्त हो गई। परंतु दुर्वासऋषि ने जब यह कांड देखा तो अत्यंत क्रोधित हुए। अरेचक्रपाणि कृष्ण ये रुक्मिणी तेरी पटरानी है तुझे बहुत प्रिय है। इसीलिये तुमने मेरे अस्तित्व और मर्यादा का उल्लंघन कर पातालगंगा को प्रगट कर उसकी तृषा (प्यास) शांत की। तूने अपना पराक्रम दिखाने के लिये यह कार्य किया। परंतु इस कर्म का फल तुझे भोगना पड़ेगा तुम दोनों को वियोग का दंड भोगना पड़ेगा।
हे युधिष्ठिर इस प्रकार के वे अत्यंत क्रोधी दुर्वासमुनि मेधावी ब्राह्मण के आश्रम में पहुंचे। उनको देखकर बालिका अत्यंत प्रसन्न हो गई। दुःख का परित्याग कर मन में धैर्य धारण कर मुनि के चरणों में नमस्कार किया। उत्तम आसन पर बैठाकर पाद्य अर्घ्य के द्वारा उनका पूजन किया कंद मूल फल आदि वन में उत्पन्न होने वाली खाद्य सामग्री द्वारा भोजन कराया। फिर ऋषि को विश्राम करने के लिये उत्तम कुशासन देकर विश्राम कराया। इसके बाद बालिका हांथ जोड़कर ऋषि के समक्ष प्रार्थनापूर्वक कहने लगी हे ऋषिवर आज मेरा अहो भाग्य है। जो आप पधारे और मुझे अपने सत्कार का सौभाग्य दिया, हे अत्रिगोत्र के सूर्य आप कहां से आ रहे है। मुझ दुर्भाग्यिनी के आश्रम में कैसे पधारे। आपके आने से मैं समझती हूं मेरे सारे संकट समाप्त हो गये और मेरा भाग्योदय हो गया है। आप मुझे कल्याण देने के लिये ही पधारे हैं। आप जैसे तेजस्वी ऋषि का आगमन दर्शन बड़े भाग्य से प्राप्त होता है आपके चरण धूलिका स्पर्श करके मैं धन्य हो गई मेरा जन्म सार्थक हो गया। ऐसा कहकर बालिका हाथ जोड़कर खड़ी रही। बालिका के द्वारा सम्मान, आवभगत, और सत्कार अनुनय विनय के शब्दों द्वारा दुर्वासऋषि बहुत प्रसन्न होकर कहते हैं कि हे बालिका तूने अपने पिता के कुल का उद्धार कर दिया। मेधावी ऋषि की तपस्या का ही यह प्रभाव है जो तुझ जैसी बुद्धिमान कुशल कन्या उत्पन्न हुई। मैं कैलाश से आ रहा हूं मार्ग से जाते हुए तुम्हारे पिता के स्वर्गवास का समाचार सुनकर मुझे दुःख हुआ। मेधावी मेरे मित्र थे। तुम एकाकी हो तुम को सांत्वना और धैर्य देने के निमित्त मैं आ गया। तुम्हारी आवभगत सत्कार के द्वारा मन में प्रसन्नता हुई। तुम सचमुच पिता के कुल का गौरव बढ़ाने वाली गुणवंती कन्या हो। भगवान तुम्हारा कल्याण करें और पिता के बिछुड़ने का दुःख सहन करने की शक्ति दें। अब मैं बदरिकाश्रम जा रहा हूं। जहां साक्षात नारायण समस्त संसार के कल्याण के लिये रातदिन तपस्या करते हैं। उनके दर्शन करके फिर अपने आश्रम को जाऊंगा। हे बालिका दुःख का परित्याग करके मन में उत्तम विचारों के द्वारा स्वस्थ रहो। मुनि के वचनों को सुनकर बालिका कहती है हे ऋषिवर आपके दर्शनों से ही मेरा शोक दूर हो गया। तथा आपकी कृपा दृष्टि से भविष्य में भी मेरा कल्याण ही होगा। परंतु मेरे हृदय में जो दावाग्नि जल रही हैं। आप उसके विषय में मुझे मार्ग दिखाएं। इस संसार में मेरा बंधुबांधव अपना कहलाने वाला कोई नहीं है। जिधर देखती हूं मुझे अंधेरा ही दिखाई देता है। क्या मेरे विवाह योग्य संसार में कोई वर नहीं हैं। मेरी मध्य अवस्था व्यतीत हो रही है। यही चिंता मुझे रात दिन चैन नहीं लेने देती। मुझे भोजन भी नहीं अच्छा लगता अब मैंने निश्चय किया है कि अपने प्राणों का परित्याग कर दूंगी ऐसा कहकर बालिका दयनीय हो गई।
जै जै श्री आधिकमास महात्म्य ब्रह्नारदीय सार पदमाधारे चतुर्थोऽध्यायः समाप्त
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