Adhik mass ki Katha 30 adhyaya| अधिक मास की कथा 30 वा अध्याय
॥ अथ त्रिंशत्तमोऽध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
श्री भगवान नारायणजी से और सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं हे ऋषियों! इसके पहले के अध्याय में जब कदर्यु की जीवात्मा को यम के दूत रस्सों से बांधकर मुद्गरों से पीटते हुए ले जा रहे थे और वह जीवात्मा अपने कर्मों पर पश्चात्ताप कर रहा था। इस प्रकार उस को यमराज के सामने खड़ा किया यमराज ने चित्रगुप्त से पूछा हे चित्रगुप्त! इस जीवात्मा के पाप आदि कर्मों का निवेदन करो। यमराज की आज्ञा को सुनकर चित्रगुप्त ने कहा हे प्रभु! यह जीवात्मा पापी कदर्यु की है। वह जाति से ब्राह्मण था परन्तु इसके कर्म नीच थे यह धन का अत्यंत लोभी इसने चोरी की और मित्र से विश्वासघात किया। बगीचे में रहकर अनेक जीवों की हिंसा की फलों की चोरी की और धन को संचय करके जमीन में गाड़कर रखा। धन के लोभ में अपने परिवार का पालन पोषण नहीं करके उनका त्याग किया और भी अनेक प्रकार के पाप किए हैं। कदर्यु के जीवन का वृत्तांत चित्रगुप्त के द्वारा सुनकर यमराज अत्यंत क्रोधित होकर कहते हैं। इसको फल की चोरी के अपराध में वानर की योनि दी जाय और विश्वास घात व अनेक पाप कर्मों के लिये इसको प्रेत योनि दी जाय और अनेक प्रकार से नरक की यातना भी दी जाय यमराज की आज्ञा को चित्रगुप्त ने सुनकर दूतों को आज्ञा दी की प्रथम इसको प्रेत योनि में डाल दो दूतों ने कदर्यु की जीवात्मा को भयंकर जंगल में ले जाकर प्रेतयोनि में डाल दी वह भयंकर प्रेत हो गया वहां उसको न खाने की कोई वस्तु न पीने का जल प्राप्त हो तथा वह भूख प्यास से तड़पता हुआ रातदिन घूमता रहता था। अनेक वर्षों तक प्रेत योनि का दुःख भोगने के पश्चात फलों की चोरी के अपराध से वानर योनि प्राप्त हुई। वानर की योनि में उसका कालिंजर पर्वत पर जन्म हुआ। कालिंजर पर्वत अत्यंत सुंदर स्थान है वहां बड़े बड़े फलों के वृक्षों की शीतल छाया रहती है। मधुर और मीठे फल बहुतायत से वृक्षों में लगे रहते हैं। वह अत्यंत पवित्र स्थान माना जाता है। वहां पाप नाशक कुंड है। जो कि सरोवर के समान बड़ा और शुद्ध जल से परिपूर्ण रहता है। वह स्थान मृगतीर्थ के नाम से शास्त्रों में प्रसिद्ध है। वहां पितरों के प्रति श्राद्ध पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष देने वाला सिद्ध होता है। इंद्रकेद्वारा निर्मित वह कुंड मृगतीर्थ समस्त पापों का नाशक है। जब कोई महाबली दैत्य देवताओं पर विजय प्राप्त कर लेता है, तो देवतालोग भयभीत होकर इसी कालिंजर पर्वत पर मृग का स्वरूप धारण करके छिपे रहते हैं और उसी कुंड का जल पीते हैं। इसीलिये उसकुंड का नाम मृगतीर्थ प्रसिद्ध हुआ। जब भगवान के द्वारा महाबलि राक्षस का वध हो जाता है, तब इंद्र इत्यादि देवता उसी मृगकुंड में स्नान करके निष्पाप होकर अपने देवता स्वरूप को धारण करके देव लोक को चले जाते हैं।
भगवान नारायण के वचनों को सुनकर नारदजी ने शंका प्रगट की, हे महाप्रभु कदर्यु तो महापापी था फिर उसको ऐसे पवित्र स्थान पर वानर की योनि क्यों प्राप्त हुई। इसका कारण बताकर मुझे शंका से मुक्त करें। देवर्षि नारद की वाणी को सुनकर भगवान आनंदित होकर कहते हैं। हे नारद जिस नगर में कदर्यु रहता था उसी नगर में चित्रकुंडल नाम का एक धनवान वैश्य रहता था। उसकी स्त्री का नाम तारा का था। वे दोनों पति पत्नि भगवान के भक्त और बड़े दानी थे। जब भी अधिकमास आता बड़ी श्रद्धा से नियमव्रत धारण करके अखंडदीप नित्य पूजन दीपदान अनेक प्रकार के दान करके संपूर्ण मास व्यतीत करके अंतिपदिन के पहले चतुर्दशी को उद्यापन हवन ब्राह्मण भोजन अपूपदान सुवर्ण वस्त्र धान्य का दान करते और दूसरे दिन भगवान का उत्तर पूजन करके विसर्जन क्षमा याचना करके अनेक प्रकार का दान शय्यादान तिलपात्र का दान द्रव्य दान और भिक्षुकों को भी अन्न आदि का दान करके व्रत का समापन करते थे। ऐसा उनका प्रत्येक अधिक मास का नियम था। ऐसे ही एक समय अधिकमास के उद्यापन में उस वैश्य ने वेद शास्त्रों को जाननेवाले अनेक विद्वानों को आमंत्रित करके पूजन हवन की समस्त विधि को संपन्न करके ब्राह्मणों को भोजन कराके तांबूल, द्रव्य, वस्त्र, आभूषण और बहुमूल्य वस्तुओं को देकर संतुष्ट करके विदा किया और अनेक प्रकार के मांगलिक वाद्यों के द्वारा भजन कीर्तन में संलग्न होकर भजन करने लगा। कदर्यु को जब उत्सव के वाद्य और भजन की आवाज सुनाई दी तो वह भी द्रव्य प्राप्त करने की इच्छा से वहां पहुंच गया और भगवान के पूजन मंडप और हवन कुंड के दर्शन करके भगवान को नमस्कार करके यज्ञ की भस्म को ललाट पर लगाकर प्रणाम किया और पूजा द्वार पर कुछ मिलने की आशा से खड़ा हो गया काफी देर तक खड़ा रहा।
भजन कीर्तन का जब विश्राम हुआ वैश्य ने कदर्यु को देखा तो कदर्यु के पास आकर उसको भी कुछ दक्षिणा दी। परंतु कदर्यु को लोभ के कारण संतोष नहीं हुआ और कुछ प्राप्त होगा इस आशा से वैष्णव की प्रशंसा करने लगा। हाथ जोड़कर गदगद वाणी से कहता है। हे धर्मात्मा तुम बड़े भाग्यशाली हो तुमने भगवान पुरुषोत्तम की आराधना उद्यापन कर्म बड़ी श्रद्धा से की है। इस प्रकार का पुण्यकर्म आज तक इस नगरी में किसी ने नहीं किया। तुम्हारे माता पिता धन्य हैं। जिन्होंने तुम जैसे धर्मात्मा पुत्र को जन्म दिया। और तुम भी धन्य हो कि तुम्हारे मन में भगवान पुरुषोत्तम के प्रति इतनी श्रद्धा भावना है तुमने यह पुण्य कर्म करके अपना इहलोक और परलोक दोनों बना लिया।
भगवान पुरुषोत्तम की आराधना से जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट होकर सभी प्रकार के सुख की उपलब्धि आजन्म पर्यन्त रहती है। अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस का समस्त कर्म अक्षय पुण्य देता है। हे वैश्य तुमने अनेक ब्राह्मणों को बहुत सा द्रव्य दान में दिया परंतु मैं कैसा भाग्यहीन हूं कि मुझे इतना सा ही प्राप्त हुआ। कदर्यु के वचनों को सुनकर उस वैश्य ने प्रसन्न होकर और भी द्रव्य देकर कदर्यु को प्रसन्न कर दिया। कदर्यु द्रव्य प्राप्त कर आनंदित होकर उस द्रव्य को लाकर जमीन में गाड़ दिया। किसी भी निमित्त से कदर्यु ने उद्यापन पूजन का दर्शन किया यज्ञ हवन की भस्म का प्राशन किया भगवान को नमस्कार करके पुरुषोत्तम मास और पुण्य की प्रशंसा की इससे उसको भी कुछ पुण्य की प्राप्ति हुई जिसके कारण उसको कालिंजर पर्वत की पुण्य पावन भूमि पर वानर की योनि प्राप्त हुई। हे नारद वानरों को वैसे भी भगवान राम का वरदान प्राप्त है। त्रेतायुग में जब राम और रावण का युद्ध हुआ श्रीराम की सेना में वानर ही वानर थे। भगवान राम ने विभीषण को छोड़कर समस्त राक्षसों को मारकर विजय प्राप्त की। इस युद्ध में बहुत से वानर भी मृत्यु को प्राप्त हुए।
रावण के मारे जाने पर ब्रह्मा आदि देवताओं ने प्रसन्न होकर श्री राम से अनुरोध किया कि हे राम आपने इस अधम राक्षस और रावण को मारकर हम सब देवताओं को भय से मुक्त कर दिया इसलिये हम सब देवता प्रसन्न होकर आपको वरदान देना चाहते हैं। आपके मन में जो इच्छा हो वरदान मांगो। देवताओं की इच्छा को सुनकर श्री राम ने कहा, हे देवताओं यदि आप वरदान देना चाहते हैं। तो इस युद्ध में जो वानर राक्षसों के द्वारा मारे गए हैं उनके ऊपर अमृत की वर्षा करके जीवित कर दो। रामचंद्रजी के द्वारा यह वरदान मांगने पर देवताओं ने मृत वानरों पर अमृत की वर्षा की।
वानरों के मृत शरीर पर अमृत गिरते ही समस्त वानर जय जय श्री राम कहते हुए उठकर बैठ गए जैसे घोर निद्रा से जागे हुए हों। जब भगवान राम अयोध्या को जाने के लिये पुष्पक विमान पर बैठे तो समस्त वानरगण विमान के पास आकर खड़े हो गए। तो भगवान राम ने अत्यंत प्रेम से कहा, हे सुग्रीव, हनुमंत, अंगद, जांबवंत सहित समस्त मित्र वानरों तुम लोगों ने युद्ध में सहयोग देकर मित्रता कार्य किया है। अब तुम लोग अपनी इच्छा से कहीं भी जा सकते हो मैं तुम समस्त वानर जाति को वरदान देता हूं कि आप लोग जहां कहीं भी रहेंगे उस स्थान पर फल से परिपूर्ण वृक्ष और जल चाहे वह नदी तालाब या झरना हो जल से परिपूर्ण रहेंगे सुंदर शीतल छाया प्राप्त होगी। कभी भी कहीं पर भूख और प्यास का कष्ट नहीं होगा। और तुम वानर जाति हमेशा दीर्घायु होगे। हे नारद श्रीराम के द्वारा आशीर्वाद वरदान के कारण ही जहां जहां वानर रहते हैं वह स्थान फल फूल और जल से परिपूर्ण रहता है।
परंतु वानर योनि में भी अपने पूर्व कर्मों के अनुसार सुख दुःख भोगना ही पड़ता है। उस कदर्यु की जीवात्मा का कालिंजर पर्वत पर वानर योनि में जन्म हुआ। दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा। उत्तम उत्तम फलों को खाकर हष्ट पुष्ट बड़े शरीर वाला दीर्घ काय हो गया। जातीय चंचलता के कारण एक जगह स्थिर न रहकर इस वृक्ष से उस वृक्षपर कूदते रहता था। पूर्व जन्म के पाप का फल तो भोगना ही पड़ेगा। पित्त की अधिकता होने से उस वानर के मुख में फोड़ा होगया उसकी भयानक पीड़ा से उसको महान दुःख तथा मुख से चबाना खाना सब बंद हो गया। खाना बंद होने से शरीर दुर्बल और अशक्त हो गया। परंतु स्वभाव की चंचलता से वृक्ष से फल तोड़ता जैसे ही खाने के लिये मुखखोलता भयंकर पीड़ा होती तो फल को फेंक देता। कभी एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर कूदता तो शारीरिक शक्ति हीनता से पूरी उछाल न भरने से पृथ्वी पर गिरकर कई जगह शरीर में चोट लगने से महान कष्ट भोगना पड़ता। इस प्रकार भूख प्यास से व्याकुल इस वृक्ष से उस वृक्ष पर घूमते हुए अनेक दिन बीत गए। फलों को तोड़कर फेंक देने का क्रम बराबर चालू था उस जीवात्मा के सौभाग्य से वह अधिक मास का पुण्यदायक समय था।
उस मास के जब अंतिम पांच दिन शेष रहे तब उस वानर को अत्यंत प्यास से विकलता ऊपर हो गई। वह मृगतीर्थ कुंड के ऊपर वृक्ष की डाली पर बैठा हुआ कुंड केजल की तरफ तृष्णा भरी दृष्टि से देख रहा था परंतु कोई उपाय वहां तक जाकर जलपीने का सूझ नहीं रहा था। ऐसे में जातीय चंचलता से दूसरी डाली पर जाने के लिये उड़ान मारी परंतु शारीरिक कमजोरी के कारण उस डाली तक न जाकर नीचे मृगकुंड में गिर पड़ा उस समय उसकुंड में कम पानी होने से उसमें डूब नहीं सका परंतु उसकी छाती भर पानी होने से जल में ही पांचदिन तक पड़ा रहा शरीर अशक्त होने के कारण इतनी ऊंची उड़ान नहीं ले सकता था कि कुंड के बाहर आ जाए। भूख से व्याकुल और कमजोर शरीर मुख में फोड़ा और पानी में लगातार भीगे रहने से गिरते के पांचवे दिन (अर्थात् दशमी से अमावस पर्यंत) मध्यान्ह के समय उस पवित्र मृगतीर्थ के जल में उसने प्राणों का परित्याग कर दिया। वानर के शरीर का त्याग करते ही उसकी जीवात्मा ने दिव्य स्वरूप धारण कर लिया। वह चतुर्भुजी मेघ के समान श्यामल वर्ण का अत्यंत तेजस्वी सूर्य के समान कांतिवाला पीतांबर धारण किए हुए, सिरपर सुंदर रत्नों से जड़ा हुआ मुकुट कानों में कुंडल आदि आभूषण से सुसज्जित शरीर वाला दशों उंगलियों में मुद्रिका गले में वैजयंती माला ऐसे दिव्य स्वरूप का हो गया। उसी समय उस जीवात्मा को आकाश मार्ग से दिव्य विमान आता हुआ दिखाई दिया।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
बृहन्नारदीय पद्याधारे त्रिंशत्तमोऽध्यायः समाप्त ॥
(३०)
॥ शुभमभवतु ॥
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