Adhik mass ki Katha 29 adhyaya | अधिक मास की कथा 29 वा अध्याय
॥ अथ एकोनविंशोऽध्यायः प्रारंभः ॥
श्री मन्महागणधिपतये नमः ॥
(२९)
श्री भगवान नारायण नारदजी से सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं, हे ऋषियों! पहले के कथा प्रसंग में राजा दृढधन्वा अपने राज्य का कार्य भार ज्येष्ठ पुत्र पर सौंपकर पत्नि के सहित तपोवन में गंगाजी के किनारे कुटिया बनाकर रहने लगा। गंगाजी में त्रिकाल स्नान करना नित्य नैमित्तिक कर्मों के साथ भगवद भजन और आराधना करना कंद मूलफल जो भी तपोवन में प्राप्त होते उनको खाकर और गंगाजल पीकर रहना यही उनकी दिनचर्या थी। रात्री भी पति की सेवा में रहकर पति को प्रत्येक कर्म में सहयोग देना यही उस साध्वी का कार्य था। इस प्रकार तपोवन में रहकर भगवदाराधना करते हुए अनेक समय व्यतीत होने लगा। पुरुषोत्तम मास आने पर राजा व रानी दोनों ने निराहार रहकर सिर्फ गंगाजल पीकर एक पैर के अंगूठे के आधार पर खड़े होकर दोनों हाथ ऊपर करके भगवान पुरुषोत्तम के नाम का जप करते हुए संपूर्ण मास को भक्ति से परिपूर्ण होकर व्यतीत किया। रानी भी पति का अनुसरण करती रही। इस प्रकार अधिकमास का अनुष्ठान परिपूर्ण होने पर आकाश से दिव्य विमान आया उस विमान से कांति निकल कर चारों ओर प्रकाश हो रहा था सोने की घंटियां रत्नों और मोतियों की झालर बंधी हुई थी झमझम शब्द हो रहा था। दिव्यांगनाएं नृत्य कर रही थी। उस विमान पर दो दिव्य देवदूत बैठे हुए थे। विमान को पास आता हुआ देखकर राजा व रानी को बड़ा आश्चर्य हुआ। विमान से उतर कर दोनों दिव्य दूतों ने राजा से आग्रह किया हे पुण्यात्माओं! आपकी तपस्या से प्रसन्न होकर गोलोकाधिपति भगवान पुरुषोत्तम ने आपके लिये विमान भेजा है आप इस नश्वर शरीर को त्यागकर विमान पर बैठें। उनके आग्रह पर राजा व रानी ने पंचमहाभौतिक शरीर का भगवान पुरुषोत्तम का नाम स्मरण करते हुए शरीर का त्याग कर दिया। उनकी आत्मा चतुर्भुजी स्वरूप की होकर सूर्य के समान तेजस्विनी हो गई। दोनों दिव्य पुरुषों ने राजारानी को आदरपूर्वक विमान पर बैठाया। विमान अत्यंत तेजगति से अनेक लोकों को लांघता हुआ गोलोक में पहुंचा भगवान के पार्षदों ने राजा रानी का सत्कार किया इस प्रकार राजा व रानी दोनों दिव्यस्वरूप से भगवान पुरुषोत्तम के सान्निध्य में रहकर मोक्ष को प्राप्त हो गए।
हे ऋषियों! हजारों वर्षों तक तपस्या करने पर जिस पुण्य फल की प्राप्ति नहीं होती। वही पुण्य सिर्फ अधिक मास में स्नान व्रत जप दान करने वाले को प्राप्त हो जाती है। अज्ञानावस्था में भी घटित हुआ व्रत आदि पुण्यकर्म अनंत फल को देने वाला होता है। जैसे एक वानर को एक शाखा से दूसरे वृक्षपर कूदते हुए पानी के कुंड़ में गिर जाने से अधिक-मास के स्नान और व्रत का पुण्य प्राप्त हुआ और उस पुण्य के प्रभाव से महाप्रतापी होते हुए भी सब पाप नष्ट होकर दिव्य स्वरूप का होकर विमान पर बैठकर गोलोक को प्राप्त हुआ। अज्ञानावस्था में घटित पुण्य इतना फलदायी हो सकता है।
तो मनुष्य अपनी श्रद्धा से इसके माहात्म्य को समझकर अधिक-मास में नियम धारण करते हुए व्रत पूजन दान कर्म के द्वारा व्यतीत करेंगे। उनके पुण्य का वर्णन करना सूर्य को दीपक दिखाने के बराबर है। हे महाप्रभु आप मुझे उस वानर का संपूर्ण प्रसंग सुनाइये कि कैसे उस पापी वानर को आकस्मिक पुण्य का लाभ प्राप्त होकर मोक्ष प्राप्त हुआ देवर्षि नारद के आग्रह करने पर भगवान नारायण कहते हैं, हे नारद केरल नाम के देश में एक ब्राह्मण रहता था। वह ब्राह्मण मूर्ख और महालोभी था। जैसे शहद की मधुमक्खी एक एक फूलों से बूंद-बूंद शहद लाकर अपने छत्ते में जमा करती है। वैसे ही वह ब्राह्मण भीख मांगकर एक एक पैसा जमाकर जमीन में गाड़कर रखता था। उसने प्राप्त किए पैसों का कभी सदुपयोग नहीं किया यह द्रव्य न अपने परिवारजनों पर खर्च किया, न कभी भगवान के पूजन हवन में, न पितरों के श्राद्ध में न, दान पुण्य में, यहां तक कि लोभ के कारण कभी अच्छे वस्त्र नहीं पहना, कभी अच्छी स्वादिष्ट वस्तु या अन्न भी नहीं खाया।
मनुष्य का जो कर्तव्य है अपने परिवार का पालन पोषण करना, सामाजिक प्रतिष्ठा के लिये शुभकर्म करना ऐसे कोई भी कर्म अपने जीवन में उसने नहीं किये। माघमास में तिल का दान, सूर्य की संक्रांति में अनेक दान, व सूर्यचंद्रमा के ग्रहण के समय जप हवन कर्म, पर्व के समय स्नान, आदि कोई शुभ और पुण्य प्राप्ति के कर्म अपने जीवन में कभी नहीं किया। उसके कर्मों के कारण समाज और परिवार के लोग उसको धिक्कारते और निंदा करते थे फिर भी वह किसी की परवाह न करके अपने स्वभाव के अनुसार धन को जमीन में गाड़कर रखना, कैसा भी वर्षा या ठंड का मौसम हो फटे चीथड़े वस्त्र पहनकर गुजारा करना यही उसका नित्य कर्म था। उसके पिता का रखा हुआ नाम चित्रशर्मा था। परंतु उसके व्यवहार और कर्म को देखकर लोगों ने उसका नाम कदर्यु रख दिया। सभी जगह लोग कदर्यु नाम से पुकारने व जानने लगे।
तिरस्कार करने से उसने अपने परिवार को त्याग कर अलग रहने लगा। उसका नित्य नियम था प्रातःकाल से ही भिक्षा मांगने निकलना, रास्ते में जो भी मिले बड़ी दीनवाणी से आंखों से आंसू बहाते हुए अपने शरीर की हालत दिखाते हुए प्रार्थना करते हुए भिक्षा मांगना। इस प्रकार अपने नगर के अलावा अनेक नगरों में वह भिक्षा मांगता फिरता रहता था। जब जन समुदाय में कदर्यु के स्वभाव और कंजूसी का प्रचार व प्रसार हो गया। तो सभी लोग उसको धिक्कारने लगे और भिक्षा देना भी बंद कर दिया। भिक्षा न मिलने से कदर्यु का मन बड़ा बेचैन रहने लगा। रातदिन चिंताग्रस्त होकर सोचता था कि मैं अब क्या करूं कहां जाऊं कैसे धन प्राप्ति हो। अचानक उसको याद आया कि मेरा बचपन का मित्र एक माली है। गांव से कुछ दूर उसका बगीचा है, वहीं वह रहता है। उसके पास जाना चाहिए ऐसा सोचकर वहां जाने का निश्चय किया। माली हमेशा बगीचे में रहता था गांव की ओर कदर्यु की बातों से अनभिज्ञ था। कदर्यु बगीचे में जाकर मित्र माली से बड़े प्रेम से मिला और आंखों से पानी बहाते हुए अपनी गरीबी का बखान करते हुए सहायता की भीख मांगने लगा। हे मित्र मैं अपने दुर्भाग्य का वर्णन कैसे करूं मैं बड़ा दुःखी हूं। क्या करूं कुछ समझ में नहीं आता। ग्रामवासी सब मेरा तिरस्कार करते हैं कोई भिक्षा तक नहीं देता। मैंने नगर का त्याग कर दिया है। जहां जीवन यापन नहीं होता ऐसे नगर में रहकर क्या फायदा। माली ने कदर्यु के प्रार्थना युक्त वचन और दयनीय अवस्था को देखा तो उसको दया आ गई। और कहा हे कदर्यु अच्छा हुआ तुम्हारे आने से मुझे भी सहयोग मिलेगा। मैं अकेला होने से दिन भर बगीचे में रहता जिससे मेरे गांव के सब कार्य बंद हो गए थे। घर परिवार की देखभाल भी बराबर नहीं हो पाती थी मैं अब बगीचे की चिंता से मुक्त होकर गांव में फूलहार का व्यवसाय करके घर परिवार की देखरेख कर सकूंगा। तुम यहीं बगीचे में रहकर इसकी देखरेख करो। ऐसा कहकर कदर्यु को अपने बगीचे में रख लिया कुछ दिन माली नित्य प्रति बगीचे में आकर वहां का कामकाज उसको समझाने लगा। जो काम माली बतलाता कदर्यु बड़ी मेहनत से उस कार्य को करता। बड़ी तन्मयता से बगीचे के फलों की रक्षा करता गिरे और पके हुए फल माली को सौंप देता। उसके व्यवहार और मेहनत को देखकर माली को उसपर विश्वास हो गया कि यह अपने परिवार बंधु बांधव जैसा ही है। बगीचे की सारी जिम्मेदारी उस पर छोड़ कर गांव में रहने लगा तथा अपने पूर्वजों का पारंपरिक व्यवसाय फूलों की दुकान को शुरु कर दिया।
अब माली को कदर्यु पर विश्वास और समय की कमी से बगीचे में बहुत कम कई दिनों के बाद जाने का मौका मिलता था। कुछ दिनों तक कदर्यु ने बगीचे के पके फलों को मालिक के पास पहुंचाया। परंतु लोभी होने के कारण उसके मन की भावना बदल गई और पके फलों को माली के पास पहुंचाना बंद कर दिया बगीचे से निकले हुए चोटीले दागी फलों को स्वंय पेटभर खाता और अच्छे फलों को बेंचकर जो पैसा मिलता उसको जमीन में गाड़ देता। कई दिनों तक फल न पहुंचने से माली एक दिन समय निकालकर बगीचे में पहुंचकर कदर्यु से फल न लाने के विषय में पूछने लगा। तो कदर्यु कहता है हे मित्र इस बगीचे में पशुपक्षी बहुत आते हैं और सब फल खाकर नष्ट कर देते हैं। देखो मैंने कई पक्षियों को भगाया और मारा भी देखो उनके पंख और शरीर का मांस पड़ा हुआ है। यहां तो मेरे खाने के लिये भी फल नहीं मिलते मैं तो किसी तरह गांव से अन्न की भिक्षा मांगकर अपना गुजारा करके तुम्हारे बगीचे की देखभाल करता हूं। पक्षियों के मरे हुए शरीर और मांस पंख आदि देखकर माली को कदर्यु की बातों पर विश्वास हो गया। गांव में माली का व्यवसाय अच्छा होने से आमदनी खूब बढ़ गई थी इस कारण बगीचे के विषय में उसको चिंता नहीं थी। माली गांव वापस चला गया और अपने व्यवसाय में लग गया।
इधर कदर्यु पहले से भी अधिक फलों की चोरी करके बेंचता और प्राप्त किए धन को जमीन में गाड़ देता। इस प्रकार कई वर्षों तक यही क्रम चलता रहा। कदर्यु की आयु का अंतिम समय आ गया एक दिन कदर्यु मृत्यु को प्राप्त हो गया। मृत्यु के समय यम के दूतों ने उसकी जीवात्मा को रस्सी से बांधकर यमपुरी ले चले। मार्ग में यमदूत उसको मुद्गरों से मारते अनेक प्रकार कष्ट देते हुए ले जा रहे थे तब उसकी आत्मा स्वंय को धिक्कार रही थी कि मैंने अति उत्तम मनुष्य शरीर प्राप्त करके भी कोई शुभ कर्म नहीं किया। हमेशा लोभ और चोरी करके सारे जीवन को व्यर्थ ही बिता दिया। न तो कोई दान किया न पूजन हवन किया न कोई व्रत उपवास किया न किसी पर्व में दान पुण्य किया न अच्छे वस्त्र पहना न अच्छा भोजन किया जमीन में गाड़ा हुआ धन वहीं गाड़ा रह गया। उसका भी कोई उपयोग मैंने नहीं किया।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
॥ बृहन्नारदीय पुराधारे एकोनत्रिंशोऽध्यायः समाप्त ॥
(२९)
॥ शुभमभवतु ॥
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