Adhik mass ki Katha 25 adhyaya | अधिक मास की कथा 25वा अध्याय

 Adhik mass ki Katha 25 adhyaya | अधिक मास की कथा 25वा अध्याय 


॥ अथ पंचविंशतितमोऽध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री गणाधिपतये नमः ॥
श्री भगवान नारायण नारदजी से, श्री सूतजी शौनकादि ऋषियों से तथा भगवान विष्णु लक्ष्मीजी से कहते हैं। हे लक्ष्मी! अधिक मास में स्नान व्रत नियम दान आदि कर्म करते हुए भगवान पुरुषोत्तम की आराधना पूजा करते हुए संपूर्ण मास को श्रद्धापूर्वक व्यतीत करते हैं। ऐसे लोग संसार में सदा सुखी जीवन व्यतीत करते हुए अंत में मोक्ष को प्राप्त होते हैं। इस विषय में तुमसे पुरातन का इतिहास कहता हूँ। हे लक्ष्मी! इसी भारत वर्ष में वीरबाहु नाम का एक प्रसिद्ध राजा था। वह राजा नीतिपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करने वाला, यज्ञ यागादिक धार्मिक कृत्यों में रुचि रखकर दैवीकृत्यों को करने वाला महान बलिष्ठ बुद्धिमान और गुणवान था। उसी प्रकार उसकी पत्नी यशोमति नाम का था मदन मंत्री भी महान शूरवीर और स्वामी भक्त था। मंत्री की पत्नी का नाम गुणवती था। गुणवती अत्यंत धार्मिक वृत्तिवाली और पतिव्रता थी। वह हमेशा भगवान का पूजन व्रत उपवास करते हुए अनेक प्रकार के दान धर्म करती रहती थी। जब-जब अधिकमास प्रारंभ होता तब बड़ी श्रद्धा से नियम धारण करते हुए व्रत अखंडदीप अनेक प्रकार के दान करके भगवान पुरुषोत्तम को आराधना में संपूर्ण मास व्यतीत करती थी। इस जगमगाते अक्षय पुण्य के द्वारा मंत्रों के द्वारा पति गुणवती को सौभाग्य सूचक सौंदर्य बिना श्रृंगार किए ही श्रृंगार किया हो। यह सब भगवान पुरुषोत्तम की आराधना और कृपा से अलौकिक सौंदर्य उसको प्राप्त था। उधर राजा वीरबाहु की पति यशोमति अपनी युवावस्था और सुंदरता के जाल में फंसा हुआ राजा को सारे कारभार मंत्री के भरोसे छोड़कर भोगविलास के भोजन पेय पदार्थ, अनेक वाहनों का सुख, शिकार करना, अनेक वन उपवनों का भ्रमण करना इसी मौज मस्ती में राजा और रानी का सारा समय व्यतीत होता था। वे दोनों कभी भी देवताओं की पूजा अर्चना दान पुण्य कोई भी कर्म नहीं करते थे।
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इस प्रकार बहुत समय व्यतीत हो गया राजा के दो पुत्र उत्पन्न हुए राजा के पुत्र प्राप्ति से राजा और रानी को प्रसन्नता हुई उन्होंने पुत्रों के उत्तर होने की खुशी में राजमहल में खूब नर्तकियों का नृत्य गायन वादन आदि के द्वारा उत्सव मनाकर दोनों पुत्रों का नाम सुबाहु और शतबाहु रखा, दोनों पुत्र अत्यंत सुंदर और अच्छे शरीर वाले होकर दिन-प्रतिदिन बड़े होते गए। राजरानी पूर्ववत भोग विलास में निमग्न रहकर समय व्यतीत करने लगे। मंत्री की पत्नी गुणवती एक समय विचार मग्न होकर सोचने लगी। राजा को पूर्वजन्म के पुण्य प्रभाव से इस जन्म में राज्य ऐश्वर्य बलसंपत्ति सभी प्रकार का सुख प्राप्त हुआ है। परंतु राजा इस जन्म में कोई भी दान पुण्य देवताओं की पूजा आराधना नहीं करता तो इसके भविष्य में सुख कैसे मिलेगा पूर्व जन्म का पुण्य क्षीण होते ही यह सब नष्ट होकर राजरानी को महान कष्ट भोगना पड़ेगा। इसलिए परोपकार के निमित्त और भविष्य में कष्ट बाधाओं से बचाने के लिये पुण्य कर्म की प्रेरणा देना हमारा कर्तव्य है। ऐसा सोचकर एक समय गुणवती रानी के पास राजमहल में पहुँची। राजमहल अत्यंत सुंदर इंद्र के भवन के जैसा दिखता था अनेक स्थानों पर रत्न जड़े हुए सुवर्ण की नक्काशी से सुशोभित अनेक दास दासियों से परिपूर्ण ऐसे सुंदर राजभवन में रानी हो हमारी स्वामिनी हो मैं तुमसे एक रानी से प्रेम पूर्वक कहती हूँ। हे सखी यशोमति तुम हमारी रानी हो हमारे भविष्य के हित के लिये प्रार्थना करती हूँ तुम मेरे आग्रह को सुनने की कृपा करो। यह अधिक तुम्हारे भविष्य के हित के लिये है। अबसे तीसरा मास भगवान पुरुषोत्तम का मास आने वाला है। उस मास में स्नान, व्रत, दान और नियम धारण आदि थोड़ा भी किया हुआ कर्म महान पुण्य दाता और अंत में मोक्ष देने वाला होता है। इसलिए उस मास में तुम भी भगवान पुरुषोत्तम के प्रति श्रद्धापूर्वक कुछ कर्म करो इससे तुम्हारे समस्त मनोरथ पूर्ण होंगे। गुणवती के वचनों को सुनकर रानी यशोमति मुँह बिचकाकर कहती है, हे गुणवती मैं राजा की अर्धांगिनी होने थे व्रत नियम दान पुण्य कर्म करते हैं उसका कुछ भाग राजा को प्राप्त होता है। पुण्य प्राप्ति राजा की होती है, फिर शरीर को व्रत उपवास आदि करके सुखाने से मुझे प्राप्त क्या होता है। जब बिना परिश्रम के पुण्य प्राप्ति होती है, तो शरीर को व्रत उपवास आदि करके सुखाने से मुझे प्राप्त क्या होता है? जब बिना परिश्रम के पुण्य प्राप्ति होती है, तो शरीर को कष्ट देने से क्या फायदा? भाग्य से मिली संपत्ति का उपभोग करना चाहिए। यह युवावस्था तो सांसारिक सुख का उपभोग करने के लिये होती है। जो तुमने कहा वे सब कर्म वृद्धावस्था में करने चाहिए। अभी से शरीर की सुंदरता को सुखाने का कोई प्रयोजन नहीं है। कोई दूसरी बात मन को आनंद देने वाली करो। कहाँ से अधिक मास लेकर आ गई हो।
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इस प्रकार क्रोध प्रकट करते हुए रानी ने मंत्री की पत्नी गुणवती से कहा। रानी के वचनों को सुनकर गुणवती को मानसिक दुःख हुआ। परंतु रानी के सामने दुःख को प्रकट नहीं किया, कहते हैं, हे लक्ष्मी पराधीनता बड़ी कठिन होती है। मृत्यु के सदृश दुःख दाईनी हमेशा अपनी इच्छा का हनन करने वाली होती है। मालिक के सामने नौकर को अपनी इच्छा त्यागकर मालिक की आज्ञा का पालन करना पड़ता है। इस प्रकार समय व्यतीत होता रहा कुछ दिनों के बाद जब अधिक मास आया तो गुणवती ने पति की आज्ञा लेकर व्रत नियम धारण करते हुए अधिकमास में पूर्ण किया। इस पुण्य के प्रभाव से गुणवती के शरीर में सौभाग्य सूचक चिन्ह और भी अधिक रूप में प्रकट होकर उसके मुख की कांति बिना श्रृंगार किए ही जगमगाने लगी। कुछ दिनों के पश्चात रानी यशोमति ने अधिक मास के प्रति अवहेलना की थी उसके प्रभाव से उसकी युवावस्था को और असर होते वाले दोनों पुत्रों का एकाएक भयानक बुखार आया और उस बुखार की तीव्रता को न सहन करने के कारण दोनों पुत्रों का एक ही समय प्राणांत हो गया।
पुत्रों का इस प्रकार निधन देखकर यशोमति दुःख के कारण बार बार बेहोश होकर हाहाकार करते हुए रोने लगी। इसी प्रकार की हालत राजा वीरबाहु की भी थी। सारे राजमहल में घोर दुःख और हाहाकार मच गया। रानी यशोमति बार-बार अपने मस्तक को पृथ्वी पर पटकती पुत्रों का मुख देखकर अनेक प्रकार की सांत्वना देकर समझाते। उधर अनेक दासियाँ रानी को समझाने की कोशिश करती लेकिन सब व्यर्थ होता। गुणवती को जब यह समाचार सुनाई दिया तब उसको भी मानसिक दुःख हुआ। रानी को सांत्वना देने के निमित्त वह जल्दी से रानी के महल में पहुँची। रानी के मृत पुत्रों को देखकर संतप्त रानी के नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी वह भी रानी के दुःख में सहभागिनी हो गई। शोक से संतप्त रानी बार-बार पुत्रों का मुख चूमती उनके गुणों का वर्णन करती अपने वक्ष स्थल को पीटती और अनेक प्रकार से रुदन करती थी।
इस प्रकार बहुत देर तक रानी का रुदन चलता रहा कुछ समय के बाद रानी ने जब गुणवती की तरफ देखा और उसके मुख को श्रृंगार से रचा हुआ देखा कि उसके मस्तक में कुंकु लगा हुआ है मांग में सिंदूर भरा हुआ है आँखों में काजल लगा हुआ है। मुख में ओठों में लाली ऐसी दिखाई देती है
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जैसे अभी-अभी इसने पान का बीड़ा खाकर मुख रंगा हो। गुणवती के ऐसे श्रृंगार को देखकर रानी यशोमति की क्रोधग्नि भड़क गई। उसने क्रोध में भरकर कहा हे गुणवती मेरे ऊपर दुःख का पहाड़ टूटा हुआ है। ऐसे समय तुम श्रृंगार करके यहाँ आई हो तुमको शर्म नहीं आती क्या, ऐसे समय आने की यही रीति है। तुमको यह उचित मालूम पड़ता है क्या तुम मेरा उपहास करने आई हो।
उठो तुम इसी समय अपने घर जा जाओ। मुझे अपमानितनी को मेरे हाल पर छोड़ दो ऐसा कहकर रानी ने दासी के द्वारा गुणवती को महल से निकाल दिया। गुणवती अपमानित होकर अपने घर आ गई। घर आने पर गुणवती के प्रति दुःख हुआ। चिंतित होकर सोचने लगी मैंने तो कोई श्रृंगार नहीं किया मैं तो सरल स्वभाव से रानी के दुःख प्रकट करने गई थी फिर रानी ने इस प्रकार का व्यवहार क्यों किया। कुछ समय बाद मंत्री के घर आने पर उसने पति से कहा हे प्राणनाथ आज मैं राजमहल में रानी से मिलने और उसके दुःख में सहभागिनी बनने के निमित्त गई थी परंतु रानी ने मुझे उल्टे वचन कहकर तिरस्कार करते हुए महल से बाहर निकाल दिया।
इस प्रकार के व्यवहार से मेरे मन में बड़ा दुःख हुआ मेरे मन में यही चिंता सता रही है कि रानी ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया। पति के वचनों को सुनकर मंत्री ने अनेक प्रकार से पति को समझाया कि रानी इस समय दुःख के सागर में डूबी हुई है ऐसे समय मन व्य्यथित रहता है। अगर रानी ने इस अवस्था में कुछ कह दिया या अनुचित व्यवहार किया तो अपने मन में बुरा नहीं मानना चाहिए। कल सवेरे जाकर रानी को सांत्वना देकर समझाना। मैं भी कल प्रातः काल राजसभा में जाकर राजा को सांत्वना दूंगा। गुणवती को पति के द्वारा समझाने पर मानसिक दुःख का बोझ कुछ कम हुआ। दूसरे दिन प्रातः नित्य कर्मों से निपटकर मंत्री राजदरबार में जाकर पहुँच गया। गुणवती भी पति की आज्ञा से रानी के सौंदर्य के लिए श्रृंगार और सौंदर्य का श्रृंगार किया।
महल में पहुँचकर रानी का क्रोध तमतमाने लगा। उसने क्रोधपूर्ण होकर दासी को तरह आज भी श्रृंगार और सौंदर्य की युक्त देखकर रानी का क्रोध तमतमाने लगा। उसने क्रोधपूर्ण होकर दासी को तरह आज भी राजसभा में राजा को बुलाने के लिये भेजा। राजा के आने पर रानी ने कहा देखिये आज अपने लिये कितने दुःख का दिन है ऐसे समय यह गुणवती कितने ठाठ बाट से सजधज और श्रृंगार करके आई है। कल भी इसी प्रकार से आई थी मैंने इसको महल के बाहर निकाल दिया था। फिर भी आज यह उसी प्रकार सजधज कर आई है। यह हमारे अधीन रहकर भी बाहर से प्रेम और अंदर से द्वेष की भावना रखती है। मेरे दोनों पुत्रों की मृत्यु देखकर इसके मन में बड़ी प्रसन्नता हुई है। मैं इस बात को सहन नहीं कर सकती आपको
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विश्वास न होते स्वयं देखले ऐसा कहकर रानी के श्रृंगार युक्त मुख को देखकर रानी के पास पहुँची। राजा रानी का कथन उसे सत्य मालूम पड़ने लगा।
राजा ने उसी समय आदेश देकर मंत्री और उसकी पति को कैद करके जेल में पिलवा दिया और मंत्री के घर का सब द्रव्य और सामान जब्त कर लिया। मंत्री और उसकी पति जेल में रहकर विचार करते हैं कि ऐसा क्यों हुआ हमने कोई अपराध न करने पर भी यह सजा क्यों मिल रही है। कौन सा पाप कर्म हमसे हुआ जिसका प्रायश्चित हमको भोगना पड़ रहा है। पति के वचनों को सुनकर गुणवती ने कहा हे स्वामी हमारा राजा अविचारी, क्रोधी और पति की सलाह को मानने वाले है ऐसे राजा के विषय में सोचना व्यर्थ है। हमारे प्रारब्ध का भोग हमको भोगना पड़ रहा है। इसको मिटाने के लिए सर्व दुःखनाशक दया के सागर भगवान पुरुषोत्तम ही हमारी रक्षा कर सकते हैं। उन्हीं की प्रार्थना करते हुए अपना समय व्यतीत करना चाहिए। वे ही हमें इस दुःख से छुटकारा देंगे। इस प्रकार हथकड़ी बेड़ी से जकड़े हुए, पति-पत्नी भगवान का निरंतर नाम स्मरण करते हुए जेल की यातना सहने लगे।
कुछ दिन व्यतीत होने पर भगवान को अपने भक्तों पर दुःख पड़ना असह्य हो गया। भगवान ने एक ही रात्रि में राजा और रानी को स्वप्न देकर आदेश दिया हे वीरबाहु राजा तू बड़ा मूर्ख है। तूने इन दोनों को बिना विचार किए और उसकी पति को जेल में डालकर बड़ा अन्याय किया है। तेरे दोनों बड़े पुण्यात्मा और मेरे भक्त हैं। इनको जल्दी से मुक्त कर दे नहीं तो मैं तेरा सब नष्ट कर दूंगा। वे दोनों मेरे अनंत भक्त हैं। उन्होंने अनेक अधिकमास में व्रत नियम धारण करके मेरी आराधना करके अक्षयपुण्य प्राप्त किया है। पूर्व जन्म में ये दोनों अत्यंत निर्धन थे फिर भी अधिकमास में मैंने इनको मंत्री पद प्राप्त हुआ और उसकी पति गुणवती को अखंड सौंदर्य बिना श्रृंगार किए ही स्पष्ट दिखाई देता है। गुणवती के माथे पर कुंकु आंखों में काजल मांग में सिंदूर मुख में पान की लालिमा ये सब अक्षयपुण्य के द्वारा धुलवा कर देख ले, ये वे सौभाग्य चिन्ह मिटते हैं कि नहीं तब तुझे पूर्ण विश्वास हो जायेगा। वे श्रृंगार चिन्ह अगर नहीं मिटते हैं, तो उनको निर्दोष समझकर जेल से मुक्त कर दे। तुम्हारी पति रानी ने अधिकमास की अपेक्षा की है और इसीलिये तुमको पुरुषोत्तम प्राप्त हुआ है, इस प्रकार का आदेश देकर भगवान
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अंतर्ध्यान हो गए। प्रातःकाल उठकर राजा ने स्वप्न के प्रतिविस्तार करता हुआ रानी से स्वप्न का वृतांत कहा। रानी ने भी राजा से कहा कि मुझे भी इसी प्रकार का स्वप्न दिखा है। दोनों वे स्वप्न की हथकड़ी बेड़ी खुलवाकर दासी के द्वारा रानी का मुख बारबार धुलवाया और पोंछा गया। परंतु पति की हथकड़ियों में कोई कमी नहीं हुई। फिर भी रानी ने स्वयं अपने हाथों से गुणवती का मुख धोया और पोंछा। बारबार धोने के बाद थी जब गुणवती के सौभाग्य चिन्ह जैसे के तैसे रहे तब रानी बड़ी लज्जित होकर गुणवती से क्षमा मांगने लगी कि हे गुणवती मैंने तुम्हारा अपमान किया और बंधन का कुछ दिया उसके लिए क्षमा कर दो। इस प्रकार और गुणवती को आदरपूर्वक राजमहल में लाकर उनका आदर सत्कार किया गया। राजा ने भी हाथ जोड़कर मंत्री को आदेश दिया। हे मंत्री आप महान पुण्यात्मा हो आपके लिये स्वयं भगवान ने स्वप्न देकर हमको आदेश दिया। आपने अधिकमास में किस प्रकार का अनंतपुण्य और आपकी पति ने अखंड श्रृंगार को प्राप्त किया।
हमको भी उसका विधान बताएं आगे आने वाले अधिक मास में हम भी नियम धारण करते हुए, भगवान पुरुषोत्तम की आराधना और क्षमा प्रार्थना करेंगे। रानी ने अधिक मास की उपेक्षा की जिसके प्रायश्चित में हमें पुत्रशोक प्राप्त हुआ। उन्हीं देवता को आराधना करके फिर से पुत्र सुख प्राप्त करेंगे। इस प्रकार राजा और रानी ने दोनों को संबोधित करके उनकी संपत्ति और मंत्रीपद देकर प्रसन्न कर दिया। राजा और रानी को अधिक मास का प्रत्यक्ष फल और अनुभव प्राप्त कर पूर्ण विश्वास हो गया। आगे आने वाले पुरुषोत्तम मास में राजा और रानी ने गुणवती के मार्गदर्शन में नियम धारण करते हुए व्रत उपवास भगवान पुरुषोत्तम का पूजन दान पुण्यकर्म करते हुए श्रद्धापूर्वक संपूर्ण मास व्यतीत किया। और भविष्य में आने वाले सभी अधिकमास में निरंतर पुण्यकर्म करते रहे। इसके पुण्य प्रभाव से राजा के राज्य का और अधिक विस्तार होकर यशकीर्ति और पराक्रम में वृद्धि हुई और रानी को अत्यंत सुंदर सर्वगुण संपन्न ऐसे पांच पुत्र उत्पन्न हुए जिससे उसका पूर्व पुत्र शोक नष्ट हो गया। और रानी को अत्यंत संसार में जीवित रहे सभी प्रकार का सुख भोगकर अंत में मोक्ष को प्राप्त हो गए।
॥ जै जै श्री अधिकमास महात्म्य सार बृहत्नारदीय पंचविंशतितमोऽध्यायः समाप्त ॥
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॥ शुभमभवत् ॥





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