Adhik mass ki Katha 12 adhyaya | अधिक मास की कथा बारहवां अध्याय


Adhik mass ki Katha 12 adhyaya | अधिक मास की कथा बारहवां अध्याय 




 ।। अथ द्वादशोऽध्यायः प्रारम्भः ।।

।। श्री गणपतये नमः ।।

भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी सौनकादि ऋषियों से, वाल्मीकि ऋषि राजा दृढ़धन्वा से तथा लक्ष्मीजी ने कहा है, हे प्राणनाथ, आपके मुखारविंद से पुरुषोत्तममास के माहात्म्य को सुनकर उत्तरारा इच्छा प्रबल होती जा रही है। अब आप कृपा कर यह बताएं कि दीप दान का क्या फल प्राप्त होता है तथा दीपक में बत्ती और सामग्री का कौन सा उपयोग करना चाहिए। इसके प्रथम किसका किया, कौन से पुण्य की प्राप्ति की, सो में तुमसे कहता हूं। समस्त पापों से छुटकारा पाने के लिए महापाप जैसे ब्राह्मण हत्या, कुल परिवार की हत्या, गुरु की हत्या, झूठी गवाही देने का पाप, स्त्री की हत्या आदि महापापों को नष्ट करने वाला, आत्मा की शुद्धि करने वाला, मृत्यु के बाद देवलोक और मोक्ष को देनेवाला यह दीपदान और अखण्ड दीप का पुण्यकर्म होता है।

जो भी इस शुभकर्म को करने की इच्छा रखते हों उनको चाहिये जिस दिन पुरुषोत्तममास प्रारम्भ होता है अर्थात शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या पर्यंत संपूर्ण मास इस कर्म को करता रहे। इसका नियम इस प्रकार है। शुक्ल प्रतिपदा को प्रातः सूर्योदय के पहले उठकर शौच मुख मार्जन आदि क्रियाओं से निवृत्त होकर संगम नदी, कुंआ, तालाब के समीप जाकर स्नान करें। स्नान के अनेक फल है जैसे ठंडे जल से स्नान साधारण जल से दुगुना फलदायी होता है। कुंए के जल का स्नान चौगुना फल देने वाला, बांवली के जल का स्नान आठगुणा फल देनेवाला, तालाब के जल का स्नान दस गुणा फल देने वाला, महानदी का स्नान उससे दस गुणा फल दाता, नदी का स्नान उससे दस गुणा फलदाता, जिसको जैसा साधन प्राप्त हो वैसे साधन से स्नान करना चाहिए। आंवले के चूर्ण में गोमूत्र मिलाकर स्नान अत्यंत पवित्रता देने वाला होता है।


देव देव, हृषीकेश सुरसुर नमस्कृत। पापक्षयाय मासेऽस्मिन् - स्नानार्थमहमागताः।।

अर्थात : हे देवाधिदेव हृषीकेश आप देवताओं के देवता हैं। पापक्षय के निमित्त में स्नान कर रहा हूं आपको नमस्कार है। यह प्रार्थना करते हुए स्नान करना चाहिये विशुद्ध अंतःकरण से पुष्कर आदि अनेक तीर्थों के नामों का स्मरण करें (गंगा सावित्री नलिनी भागीरथी सीता मालती त्रिपथगामिनी हेमवती जाह्नवी त्रिदेशेश्वरी) आदि नामों का उच्चारण स्मरण करे। और शुद्ध वस्त्रों को धारण करे। हे लक्ष्मी प्रथम दिन का स्नान अनेक पापों को नष्ट कर देता है। (अर्ध मास) पंद्रह दिन का स्नान सात जन्म के पापों को नष्ट करने वाला और संपूर्ण मास का स्नान हजार जन्म के पापों को नष्ट कर देता है। हे लक्ष्मी अंधकार तभी तक रहता है, जब तक सूर्य का उदय नहीं होता। हाथी मदमस्त तभी तक रहता है, जब तक सिंह की गर्जना नहीं सुनता। समुद्र सर्प तभी तक फुफकारता है, जब तक गरुड़ के दर्शन नहीं होते। इसी प्रकार पापों का समूह मनुष्यों को तभी तक घेरकर रखता है।

जब तक पुरुषोत्तममास का पुण्य प्राप्त नहीं होता। जो पुरुषोत्तममास में पुण्य प्राप्ति का प्रयास नहीं करते। वे जन्म जन्मांतर तक दुःख दारिद्र्य आदि कष्ट भोगते रहते हैं। इसलिये हे लक्ष्मी मनुष्य को चाहिये कि पुरुषोत्तममास अंतयेर अपनी श्रद्धा और शारीरिक शक्ति के अनुसार स्नान, दीपदान, अखण्ड दीप की स्थापना, व्रत, नियम का धारण आदि अनेक प्रकार के करने योग्य कर्मों को अवश्य करना चाहिए। मनुष्य को आयु कोई निश्चित न रहने से आनेवाले समय पर निर्भर न रहकर मोक्ष की इच्छा रखने वालों को पुरुषोत्तममास व्यर्थ ही नहीं बिताना चाहिये। जो लोग इस अनंत पुण्यदाता मास को व्यर्थ ही बिता देते हैं, उनके संपन्न चाहिये, जैसे किसी को अमृत से भरा हुआ घड़ा मिल जाय परंतु भाग्य में न रहने से उस घड़े में साधारण जल भरा हुआ है ऐसा समझकर उस पानी को फेंक देता है। इसी प्रकार किसी को चिंतामणि रत्न प्राप्त होते पर उसको साधारण पत्थर समझकर फेंक देता है। कल्पधेनु गौ दरवाजे पर आनेपर साधारण गाय समझकर भगा देता है।


समझकर उछाहकर फेंक देता है। उसी प्रकार दुर्भाग्य होते से मनुष्य पुरुषोत्तम मास के माहात्म्य को न समझकर व्यर्थ ही बिता देता है। हे लक्ष्मी स्नान करके शुद्ध वस्त्रों को धारण कर नित्यकर्म स्थापनार्थ का पूजन करके भगवान पुरुषोत्तम की पूजा करना चाहिये। उसमें सात धागे की बत्ती लगाकर घी या तेल जैसी सुविधा हो, दीप पात्र में भरकर प्रज्वलित करना (जलाना) चाहिये। फिर उस दीप ज्योति का पूजन करके हाथ जोड़कर ज्योतिषस्वरूप से प्रार्थना करना चाहिए। मैंने जिस इच्छा से अखंड दीप प्रज्वलित किया है वह मलोकामना परिपूर्ण होकर मेरा मानसिक अंधकार दूर हो। हे महापभु पुरुषोत्तम देव में मायापिशमयी अज्ञान अंधकार में डूबा हुआ हूं, इससे मेरा उद्धार करें मेरे इस पुण्य कर्म के द्वारा मुझे मोक्ष की प्राप्ति दें। इस प्रकार भगवान से प्रार्थना करके भगवान के नामों का संकीर्तन भजन, पुराणों की कथा का श्रवण आदि शुभकर्मों को करते हुए, संपूर्ण मास को श्रद्धा पूर्वक व्यतीत करें। भगवान पुरुषोत्तम का नित्य पूजन तथा अखंडदीप का भी नित्य पूजन करना चाहिए। इस मास में नित्य प्रति अपनी प्राप्ति के अनुसार अन्न, वस्त्र, सुवर्ण, तिलपात्र आदि का दान, गौदान, दीपदान आदि अनेकदान करना चाहिए। हे लक्ष्मी इन कर्मों को करने से मनुष्य अपने जीवन में सुख सौभाग्य संतति आरोग्य प्राप्त करके मृत्यु के बाद मोक्ष प्राप्त करता है।

हे लक्ष्मी इस दीपदान के पुण्य प्रभाव से ब्राह्मण ब्रह्मज्ञान को, क्षत्रिय राज्य को, वैश्य अतुल संपत्ति को तथा शूद्र अनेक सुखों को प्राप्त करता है। कुंवारी कन्या सुंदर पति, सुहागिन स्त्री अखंड सौभाग्य, कीर्ति प्राप्त होती है। हे लक्ष्मी जो लोग इस मास में अखंडदीप प्रज्वलित करते हैं तथा नित्यदीपदान करते हैं तथा दूसरों को भी इस पुण्यकार्य के लिये प्रेरित करते हैं। वे देवताओं को भी दुर्लभ ऐसे पुण्य के भागीदार होते हैं। हे लक्ष्मी इस विषय का एक पुरातन इतिहास में तुमसे कहता हूं। सरस्वती नदी के किनारे सुशर्मा नाम का एक ब्राह्मण भिक्षावृत्ति के द्वारा अपने कुटुंब का जीवन निर्वाह करता था। पुरुषोत्तम मास प्रारंभ होते ही वह व्यक्ति व्यतीत करता था। जिस स्थानपर अखंडदीप स्थापित था वहां चूहे आया जाया करते थे। तथा चूहों को पकड़ने के लोभ में बिल्ली भी आया करती थी।


एक समय एकादशी के दिन सुशर्मा ब्राह्मण ने भगवान पुरुषोत्तम का पूजन करके व्रत करते हुए रात्रि जागरण के निमित्त भगवान के नामों का संकीर्तन करता हुआ बैठा था। मध्यरात्रि का समय था चूहे पकड़ने के लिये बिल्ली बैठी हुई थी ऐसे समय दीपक की बत्ती पर गुल छा जाने से प्रकाश धीमा पड़ गया उसी समय चूहे के आने से बिल्ली ने चूहा पकड़ने के लिये छलांग लगाई छलांग लगाने पर बिल्ली का पैर दीपक से टकरा गया जिससे दीपक का गुल झड़कर दीपक प्रकाशमान होकर जलने लगा। प्रातः काल किसी कारण वश उस बिल्ली की मृत्यु हो गई। ब्राह्मण सुशर्मा थी इसलोक में अनेक सुख भोगकर मृत्यु के बाद मोक्ष को प्राप्त हो गया। इसी प्रकार कई लोगों का उद्धार दीपदान के द्वारा हो चुका है।

जै जै श्री अधिकमास महात्म्य सार

(१२)

।। शुभमभवतु ।।

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