Adhik mass ki Katha 18 adhyaya | अधिक मास की कथा अठारहवां अध्याय

 Adhik mass ki Katha 18 adhyaya | अधिक मास की कथा अठारहवां अध्याय 


|| अथ अष्टदशोऽध्यायः प्रारंभः ||
|| श्री गणेशाय नमः ||
श्री भगवान नारायण नारदजी से तथा सूतजी शौनक आदि ऋषियों से कहते हैं। लक्ष्मी जी भगवान विष्णु से कहती हैं। हे सच्चिदानंद हे देवदेव आपके मुखारबिंद से मौन भोजन के महिमा का वर्णन सुनकर मेरे मन में अब पुरुषोत्तम मास में पांच महापर्व का माहात्म्य सुनने की प्रबल इच्छा जागृत है। आप कृपाकर बताएं कि वे पांच महापर्व कौन से हैं और कौनसा कर्म करने से किस फल की प्राप्ति होती है।
लक्ष्मीजी के वचनों को सुनकर भगवान विष्णु कहते हैं। हे लक्ष्मी तुम्हारी इच्छा के अनुसार पांच महापर्वों का वर्णन विस्तारपूर्वक कहता हूँ। वैधृति, व्यतिपात, पूर्णिमा, अमावस्या और द्वादशी ये पांच महापर्व कहे गए हैं। ये पांचों महापर्व एक से बढ़कर फल देने वाले हैं। वैधृति पर्व में कर्म करने से मैं (साक्षात विष्णु) प्रसन्न होता हूँ। व्यतिपात योग से धर्मराज। पूर्णिमा के पर्व में ब्रह्मदेव। अमावस्या के पर्व से भगवान हृषीकेश प्रसन्न होते हैं। वैधृति पर्व में जो मनुष्य स्नान दान होम कर्म करते हैं। उनकी समस्त मनोकामनाएं मैं (विष्णु) प्रसन्न होकर पूर्ण करता हूँ। हे लक्ष्मी इन पांचों महापर्वों के इतने महान पुण्य हैं कि इन पुण्यों की प्राप्ति के लिये इंद्र आदि देवता भी लालायित रहते हैं। इन पर्वों में अपनी शक्ति के अनुसार मनुष्य को धन, धान्य, तिल, दूध, घी, फल आदि का दान अवश्य करना चाहिए। इसके करने से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है। यह पुण्य अक्षय होता है। दैत्यराज प्रहलाद ने इसी वैधृति पर्व में स्नान दान होमदि कर्म करके अक्षय पुण्य प्राप्त किया। तथा इंद्र ने भी इसी पुण्य के द्वारा इंद्रत्व प्राप्त किया। उसी प्रकार वैधृति पर्व में दान होम कर्म भी अक्षय पुण्य को देनेवाला होता है। इसके प्रभाव से नष्ट हुई लक्ष्मी और अनेक पुण्य प्राप्त करके हमेशा के लिये इंद्रपद के अधिकारी हो गए थे। परंतु सूर्यवंशी राजा मांधाता परमधार्मिक और अनेक पुण्य कर्मों करके के वे इंद्रसन पर ज्यादा दिन नहीं बैठ सके। राजा मांधाता ने जब इंद्रसन को प्राप्त कर लिया। तब इंद्र को बड़ी चिंता हुई।
अचानक देवर्षि नारद से उनकी भेंट हुई। और उन्होंने अपनी चिंता का कारण बताकर चिंतामुक्त होने का उपाय पूछा तब देवर्षि नारद ने उनको पुरुषोत्तम मास में वैधृति पर्व में स्नान दान होम का माहात्म्य समझाकर नियम पूर्वक कर्म करने की शिक्षा दी। नारदजी के बताए अनुसार पुरुषोत्तम मास अनेपइंद्र ने वैधृति पर्व में नियम पूर्वक समस्त कर्म किए और अक्षय पुण्य के अधिकारी होतेपर फिर से इंद्रसन प्राप्त कर लिया।
ब्रह्माजी ने भी इसी अक्षयपुण्य के द्वारा सृष्टि रचना में विशेष दक्षता प्राप्त की। प्रत्येक मास में वैधृति पर्व आता है। श्रद्धालु मनुष्य प्रत्येक वैधृति पर्व में पुण्य कर्म कर सकते हैं। परंतु पुरुषोत्तम मास का वैधृति पर्व विशेष रूप से अक्षय पुण्य को देनेवाला होता है। इस पर्व में प्रातः स्नानकर भगवान पुरुषोत्तम का पूजन कर श्राद्ध, शहद, दध, घी, तिलके लड्डू, नारियल, सौलह पान, सौलह सुपारी इन सबको एकत्र कर पात्र में रखकर श्रद्धा से संकल्प-पूर्वक दान करना चाहिए। इस पुण्यकर्म से मनुष्य को समस्त सांसारिक सुख प्राप्त होकर अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। हे लक्ष्मी इस प्रकार महान पुण्य देने वाला वैधृति पर्व का माहात्म्य मैंने संक्षेप में तुम से कहा। अब व्यतिपात योग के पर्व का माहात्म्य कहता हूँ। व्यतिपात योग सूर्य और चंद्रमा के संयोग से उत्पन्न हुआ महान पर्व है। इस पर्व में कर्म करने से मनुष्य में धार्मिक वृत्ति का निर्माण और वृद्धि होते हैं। तथा धर्मराज प्रसन्न होते हैं। और कर्म करने वाले मनुष्य को धन धान्य, संतति, संपत्ति और विशुद्ध कीर्ति प्राप्त होकर सांसारिक जीवन सुखमय व्यतीत होता है।
सूर्य चंद्रमा के ग्रहण में कुरुक्षेत्र में दान करने से जिस पुण्य की प्राप्ति होती है। उससे बारहगुना पुण्य व्यतिपात योग में करने से प्राप्त होते हैं। कुरुक्षेत्र और चक्रतीर्थ में देह का परित्याग करने से जिस पुण्य की प्राप्ति होती है। उससे भी ज्यादा पुण्य व्यतिपात योग में दान करने से होती है। इस योग में तपस्या के प्रभाव से अनेक ऋषियों ने स्वर्ग लोक को प्राप्त कर लिया। इस योग में करने से पितृ लोक में पूर्वज प्रसन्न होते हैं। व्यतिपात योग भी प्रत्येक मास में आता है। परंतु पुरुषोत्तम मास में व्यतिपात योग महान पुण्य देता है।
भाद्रपद मास की अमावस्या को गंगाजी में स्नान करने से जिस पुण्य की प्राप्ति होती है। उससे भी हजार गुना पुण्य पुरुषोत्तम मास में व्यतिपात पुण्य देनेवाला होता है। प्रातः स्नान करके भगवान पुरुषोत्तम की पूजा करके ब्राह्मण का पाद प्रक्षालन करके पूजा करें। नारियल, तेरह,
केला के फल, तेरह खाािक, तेरह अंगूर, तेरह आम के फल, अखंड (अक्षत) कटहल का फल और ऋतु में उत्पन्न होने वाले जो भी फल प्राप्त हों। दक्षिणा के सहित संकल्पपूर्वक दान करना चाहिए। इस पुण्य के प्रभाव से समस्त पापों का समूह भस्म हो जाते हैं। जैसे अग्नि में तृण घास आदि भस्म होते हैं उसी प्रकार वैधव्य या शुद्ध हो, भक्ति और श्रद्धा से किया हुआ यह कर्म सबके लिये समान फल देने वाला होता है। समस्त फलों की प्राप्ति के लिये इस महापर्व में सुवर्णदान अवश्य करना चाहिए। इस व्यतिपात योग में तिलपात्र के दान का भी बड़ा महत्व है।
हे लक्ष्मी पुरुषोत्तम मास के व्यतिपात योग में जो भी मनुष्य श्रद्धा से धन, धान्य, तिलपात्र का दान उपरोक्त वस्तु सामग्री का दान करते हैं उनके तत्काल पुण्य की प्राप्ति होती है। इसलिये मनुष्य को चाहिये कि इस पर्व में अपनी शक्ति के अनुसार दान कर्म अवश्य करें।
हे लक्ष्मी मैंने संक्षेप में व्यतिपात योग के पर्व का माहात्म्य तुम से कह दिया। अब मैं तुम से पूर्णिमा के माहात्म्य का वर्णन कहता हूँ। पूर्णिमा का व्रत करने से समस्त देवता प्रसन्न होते हैं। विशेषकर पुरुषोत्तम मास की पूर्णिमा को थोड़ा भी दानपुण्य महान फल को देने वाला होता है। स्नान करके भगवान पुरुषोत्तम की पूजा करके जो भी वस्तु दान देने की इच्छा हो जैसे सुवर्ण, तिलपात्र, धन, धान्य, वस्त्र फल आदि संकल्पपूर्वक दान करना चाहिए। इस दान को ब्राह्मण के रूप में साक्षात ब्रह्माजी ग्रहण करके प्रसन्न होते हैं। समस्त तीर्थों का पुण्य प्राप्त होता है। मन वाणी और शरीर से किये हुए समस्त पाप नष्ट होकर अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। लक्ष्मी जैसे पूर्णिमा का माहात्म्य है उसी प्रकार अमावस्या का भी बड़ा महत्व है। अमावस्या विशेषकर पुरुषोत्तम मास की अक्षय पुण्यदायिनी होती हैं। अमावस्या को स्नान व्रत दान कर्म से पितृलोक मे स्थित देवता और पूर्वज प्रसन्न और तृप्त होते हैं। मनुष्य अपने पूर्वज के ऋण से मुक्त हो जाता है। अमावस्या के दिन प्रातः स्नान कर भगवान पुरुषोत्तम की पूजा करके देवताओं का और पितरों का तर्पण करके अपनी शक्ति और श्रद्धा के अनुसार दान देने योग्य वस्तु सामग्री जैसे सुवर्ण, तिलपात्र, धन, धान्य, वस्त्र, फल आदि का दान सुपात्र ब्राह्मण को पूजन करके संकल्पपूर्वक तैंतीस मालपुआ उत्तम सामग्री से बनाकर पात्र में रखकर दान करना चाहिए।
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इस दान से पितर वर्ग प्रसन्न होकर दान करने वाले को समस्त मनोकामनाएं परिपूर्ण करते हैं। जो मनुष्य पितरों के निमित्त अमावस्या के दिन अन्न आदि का दान नहीं करते तथा पितृतर्पण नहीं करते ऐसे मनुष्य नरक के अधिकारी बनते हैं। क्योंकि पितृवर्ग अमावस्या के दिन अपने कुल की संतति से अन्न-वस्त्र जल की आकांक्षा रखते हैं कि हमारे कुल में कोई ऐसी धर्मात्मा संतति होगी जो हमारे निमित्त अन्नदान, वस्त्र आदि अनेक वस्तुओं का दान करेगा हमारा श्राद्ध, पिंडदान, व तर्पण करके हमको तृप्त करेगा। परंतु जब उनकी आकांक्षा पूर्ण नहीं होती। तब वे पितृगण भूख और प्यास से व्याकुल होकर वायु का भक्षण करते हैं। तथा वे क्रोधित होकर अपने कुल के वर्तमान संतति को श्राप दे देते हैं। उनके श्राप से कुल की वर्तमान संतति को अनेक दुःख घटित होते हैं। संपत्ति नष्ट हो जाती है। इसके श्राप से कुल घटित होते हैं। सारा जीवन दुःखमय व्यतीत होता है। इसलिये मनुष्य को चाहिये कि जितने कार्य देवताओं का महत्व है उतना ही पितरों के महत्व को समझकर उनकी प्रसन्नता के लिये श्राद्ध तर्पण दान आदि कर्म अवश्य करें। हे लक्ष्मी मैंने तुम से अमावस्या के महापर्व का माहात्म्य संक्षेप में कह दिया।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
बृहस्पतिरदीय पद्यांशोऽ १८ अध्यायः समाप्त ||
|| शुभमभवतु ||




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