Adhik mass ki Katha 11adhyaya | अधिक मास की कथा ग्यारहवा अध्याय
॥ अथ एकादशोऽध्यायः प्रारम्भः ॥
॥ श्री गणाधिपतये नमः ॥
श्री भगवान नारायण नारदजी से सूतजी शौनकादि ऋषियों से वाल्मीकि ऋषि राजा दुधना तथा भगवान विष्णु लक्ष्मीजी से कहते हैं तो लक्ष्मी जी कहती हैं कि महाप्रभु आपने जो कहा कि गौ के सदृश ब्राह्मण की पूजा का भी विशेष महत्व है। सो आप कृपा बताएं कि विप्रपूजन कैसे करना चाहिए और वह विप्र कैसा होना चाहिए और इस कर्म से कौन से फल की प्राप्ति होती है। विस्तार पूर्वक बतलाइए। लक्ष्मीजी के प्रश्न करने पर भगवान कहते हैं, हे लक्ष्मी तुम्हारी इच्छा के अनुसार मैं विप्र पूजन का महात्म्य कहता हूं सुनो ऐसे ब्राह्मण की पूजा का विशेष महत्व है। जो तपस्वी, सत्य वचन बोलने वाला, अहिंसाधर्मी, नित्य नैमित्तिक संध्यकर्म गायत्री मंत्र का जप करने वाला, भगवान के प्रति आसक्ति और श्रद्धा रखने वाला, यज्ञ पूजन हवन आदि कर्म करने वाला, ऐसे योग्य ब्राह्मण का पुरुषोत्तम मास में नित्य प्रति पूजन करना चाहिए।
इसका विधान ऐसा है कि सुबह ब्राह्मण को आमंत्रित कर अर्घ्य पाद देकर उत्तम आसन पर बैठाकर गंध अक्षत पुष्प से पूजन करके उत्तम भोज्य पदार्थों से भोजन कराके भगवत संबंधित शास्त्र और इतिहास को ब्राह्मण मुख से श्रवण करके तांबूल, दक्षिणा, वस्त्र आदि प्रदान करे। विशेषकर के वह ब्राह्मण इतिहास और पुराणों का ज्ञाता होना चाहिए। ब्राह्मण को भगवान का स्वरूप समझकर पूजन करना चाहिए। पुराण वक्ता ब्राह्मण प्रत्यक्ष व्यासरूप भगवान ही होता है। उनके पूजन से गंगास्नान के पुण्य की प्राप्ति होती है। ब्राह्मण के द्वारा ज्ञान रूपी शब्दों को सुनकर सांसारिक बंधनों से मुक्ति, भगवान के प्रति आसक्ति, होकर मनुष्य भवसागर पार हो जाता है। इसी से पुरुषोत्तम मास में पुराण श्रवण और पुराण वक्ता ब्राह्मण का पूजन अवश्य करना चाहिए। जिस घर में तुलसी का वृक्ष भगवान की मूर्ति और पुराणों की कथाएं होती है। वह घर तीर्थ के समान पवित्र रहता है। शुद्ध पवित्र सात्विक आचार विचार व्रतधारणा भगवान के प्रतिनिष्ठा शक्ति के अनुसार दानदी कर्म पुरुषोत्तम मास में अवश्य पुण्यदायक होते हैं। जो ब्राह्मण आचारविचार से हीन है, जो ब्राह्मण कर्म संख्या वंदन पूजा अर्चना नहीं करता, व्यभिचार दुराचार है ऐसे ब्राह्मण की पूजा या दान देना दान को पुण्य की अपेक्षा पाप का भागीदार बना देता है।
अथ: पतन कर देता है।
आत्म शुद्धि के लिये लोग तीर्थाटन करते हैं। चांद्रायण व्रत करते हैं। परंतु उनका फल कई दिनों के बाद प्राप्त होता है। परंतु साधुजनों का सत्संग दर्शित प्रत्यक्ष फल तत्काल देने वाला होता है। वातपितकफ विद्रोषों से दूषित शरीर सत रज्जतम तीन गुणों से दूषित मन में श्रद्धा भावना के सानंद उत्पन्न होकर विकार ही होती है। साधु पुरुष और विद्वान हमेशा परमार्थ की प्राप्ति के रत रहते हैं। इनके द्वारा सांसारिक पुरुषों को दिव्यज्ञान के द्वारा आनंद स्वरूप के दर्शित और मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसे विद्वान और साधुजनों का तिरस्कार और निंदा कभी नहीं करनी चाहिए। विष का प्रभाव तो मंत्र औषधि के द्वारा दूर हो सकता है है और अग्नि पानी से शांत हो सकती है। परंतु विद्वानों के क्रोध और श्राप को दूर करने की किसी में क्षमता नहीं है।
इसी प्रकार विद्वान ब्राह्मणों के धन का बलपूर्वक हरण करना भी महान पाप और प्रायश्चित देने वाला होता है। जो मनुष्य मदोन्मत्त होकर किसी प्रकार का विचार न करते हुए जबर्दस्ती ब्राह्मण के धन को लूटते या हरण करते हैं। ऐसा करने पर ब्राह्मण के नेत्रों से आंसुओं के बिंदु गिरते हैं। उतने ही संवत्सर तक उन मनुष्यों को कुभीपाक आदि नरकों में दुख भोगना पड़ता है। अपने पूर्वजों का दिया हुआ या दूसरों का दिया हुआ ब्राह्मण का धन हरण करते हैं। ऐसे लोगों को सात हजार वर्ष तक विष्ठा का कीड़ा बनकर दुख भोगना पड़ता है। तथा इस पाप कर्म में सहयोग देने वाले राज पुरुष या राजा को सभी स्थान पर पराजय होकर अल्पायु, राज्य का क्षय, जन्म जन्मांतर तक नरक की यातना भोगनी पड़ती है। हे लक्ष्मी मैं स्वयं विद्वान ब्राह्मणों की सेवा में हमेशा उद्यत रहता हूं। हमेशा भक्तिभाव से प्रेमपूर्वक विप्रपूजा मेरी पूजा से भी अधिक फलदायी सिद्ध होती है। परंतु अवज्ञा और अपमान महान दुख दाई होता है। हे लक्ष्मी मैं एक पुरातन का इतिहास कहता हूं। एक समय कृष्ण का पुत्र प्रद्युम्न अपने मित्र सांब आदिकों के साथ एक उपवन में भ्रमण करने के लिये गए।
अनेक स्थानों का भ्रमण करने पर सभी बालक थक गए। सारा शरीर पसीने से लथपथ हो गया और खूब जोरों की प्यास लगी। पानी की तलाश में घूमते हुए, एक प्राचीन बावली के पास पहुंच गए। वहां अंदर झांकर देखा तो उन्हें पानी के ऊपर परवतकर एक सर्प पड़ा हुआ दिखा। सभी बालकों ने उस सर्प को निकालने का भरपूर प्रयत्न किया परंतु उसको नहीं निकाल सके। कभी इतना बड़ा सर्प...
न देखते से बड़ा आश्चर्य और कुतूहल के कारण प्रद्युम्न ने घर जाकर कृष्ण से सारा वृतांत कह दिया। सुनकर अंतर्यामी कृष्ण उसका उद्धार करने के लिये बालकों के साथ वहां पहुंचे। भगवान कृष्ण ने बाए हाथ से उस सर्प को बाहर निकाला। भगवान के हाथ का स्पर्श होते ही सर्प का स्वरूप त्याग कर तप्त सुवर्ण के समान कांतिवाला दिव्य पुरुष होकर भगवान के चरणों को प्रणाम कर हाथ जोड़कर मन में भगवान की स्तुति करने लगा। कृष्णजी उससे पूछते हैं कि हे मानव तुम कौन हो और किसके श्राप से तुम्हें यह दुख भोगना पड़ा। उसके वचनों को सुनकर वह दिव्य पुरुष कहता है हे महाप्रभु आप सर्वर्यामी है आपसे कुछ भी छिपा नहीं है फिर भी आप पूछते हैं तो मैं अपने जीवन में अनेक पुण्य कर्म करता था। मेरा नित्य का नियम था ब्राह्मणों को आदरपूर्वक पूजन करके उत्तम और श्रेष्ठ पुष्टि की गाय को सुवर्ण वस्त्र से सुसज्जित कर दान करता था।
अच्छे लक्षणों वाली सुशील अधिक दुधदेने वाली चार स्तनों वाली बछड़े के सहित गौ का दान नित्य प्रति का मेरा नियम था। एक समय मेरी दी हुई गाय, ब्राह्मण के घर से भागकर मेरी दान देने वाली गायों में आकर मिल गई। अज्ञाततावश वही गाय मैंने दूसरे दिन दूसरे ब्राह्मण को दान कर दी। जब वह ब्राह्मण के समीप जाकर गाय को पहचानकर कहने लगा यह मेरी गाय है मुझे राजा ने दान में दी थी। मैं इसको ढूंढ रहा हूं तुम इसको लेकर कहां जा रहे हो।
उसके शब्दों को सुनकर दूसरा ब्राह्मण कहता है मैं अभी राजा के द्वारा इस गाय का दान प्राप्त कर अपने घर जा रहा हूं अभी मेरे हाथ से संकल्प का पानी भी नहीं सूखा है। फिर तुम मुझे चोरी का दोष क्यों लगा रहे हो। इस प्रकार दोनों में विवाद बढ़ गया। इस विवाद को निपटाने के लिये दोनों ब्राह्मण मेरे पास आये। पहले वाला ब्राह्मण कहता है कि हे राजन एक को दान करके वही गाय दूसरे को दान करना, दी हुई वस्तु का हरण करने के सदृश होता है। यह तुमको शोभा नहीं देता।
मैंने ब्राह्मण से प्रार्थना किया, हे विप्र मेरे कर्मचारियों की गलती से अज्ञातवश मुझ से यह कृत्य हो गया है मुझे क्षमा करे मैं इस गाय के बदले आपको दूसरी अनेक गाय देता हूं। परंतु दोनों ब्राह्मण क्रोधित होकर मुझे श्राप देने लगे कि हे राजन तू हम लोगों का विवाद नहीं निपटा सिर्फ सर्प की तरह गर्दन...
हिलाता है इसलिये तू दूसरे जन्म में सर्प की योनि को प्राप्त होगा ऐसा कहकर वह ब्राह्मण चला गया। हे महाप्रभु उसी श्राप से मेरी यह दशा हुई थी। आज आपके दर्शन स्पर्श से मेरा उद्धार हो गया। पूर्व जन्म के पुण्य प्रभाव से मुझे मेरा इतिहास याद था उसी पुण्य के प्रभाव से आज आपके दर्शन भी प्राप्त हुए। अब मैं स्वर्ग लोक को जा रहा हूं। ऐसा कहकर वह दिव्य पुरुष अदृश्य हो गया। हे लक्ष्मी नित्य प्रति गंगास्नान से भी कई गुना अधिक पुण्य देवार्ता नित्य विप्रपूजा का पुण्य होता है।
जय जय श्री अधिकमास महात्म्य सार
॥ शुभमभवतु ॥
(११)
बृहत् नारदीय पदचादरे एकादशोऽध्यायः समाप्त ॥
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