Adhik mass ki Katha 5 adhyaya| अधिक मास की कथा पांचवा अध्याय
॥ अथ पंचमो ऽ ध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री गणधिपतये नमः ॥
श्री व्यासजी अपने श्रोतागणों से, तथा सूतजी शौनकादि ऋषियों से, भगवान नारायण नारदजी से तथा भगवान कृष्ण धर्मराज से कहते हैं। हे युधिष्ठिर मेधावी ब्राह्मण की कन्या बालिका के ऐसे दुःख पूर्ण शब्दों को सुनकर दुर्वासाऋषि उसको सांत्वना देते हुए कहते हैं। हे ब्राह्मण कन्या अब तू शोक मत कर तेरे दुःखों को समाप्त होने का समय शीघ्र ही आने वाला है। मैंने अपने अंतर मन में तेरे समस्त दुःखों को दूर करने वाला शीघ्र फलदाता अत्यंत गुप्त प्रयास सोचा है। तू मेरे कहे अनुसार प्रयास करने पर समस्त दुःखों से छुटकारा पा जाएगी। मेरे बताए अनुसार नियम संयम व्रत धारण करने से जन्म जन्मांतर के समस्त पातक नष्ट होकर सुखी जीवन प्राप्त करेगी। हे बालिका अब से ३ तीसरा मास जो आएगा वह मास पुरुषोत्तम नाम का मास होगा।
इस मास में थोड़ा भी शुभ और पुण्य कर्म करने से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है। तथा समस्त पाप नष्ट होकर मोक्ष की भी प्राप्ति होती है। कार्तिक आदि जितने भी मास हैं कोई इसके समान पुण्य दाता नहीं है। मास पक्ष तिथी संक्रांति सूर्य चंद्र का ग्रहण आदि जितने भी पुण्यदायक कर्म शास्त्रों में कहे गए हैं कोई भी इसके समान पुण्यदायक नहीं हैं। इसके महात्म्य का वर्णन मैं तुझसे क्या कहूं यह इतना महान है कि बारह हजार वर्ष तक गंगा स्नान करने से तथा सिंहस्त पर्व में नित्य प्रति गौदान करने से जिस पुण्य की प्राप्ति नहीं होती उससे भी ज्यादा पुरुषोत्तम मास में किसी भी कुंआ, बावली, तालाब या नदी के शुद्ध जल में स्नान करने मात्र से प्राप्त हो जाती है। यह पुरुषोत्तम मास देवताओं के भी देवता भगवान पुरुषोत्तम का अत्यंत प्रिय मास है। इस मास में जो भी मनुष्य अथवा स्त्री थोड़ा भी नियम धारण, व्रत, दान, भजनकीर्तन आदि कर्म करते हैं। वे मनवांछित फलों को प्राप्त करके अनंत पुण्य के भागीदार होते हैं। यह मेरा अनुभव किया हुआ है। इसी के प्रभाव से सारे संसार में मेरा प्रताप फैला हुआ है। इसलिये हे बालिके आनेवाले अधिकमास में मेरे कथानुसार स्नान, व्रत आदि नियम धारण करते हुए श्रद्धा पूर्वक कर्म कर जिससे तेरी समस्त इच्छाएं परिपूर्ण होंगी।
भगवान कृष्ण कहते हैं कि हे धर्मराज मेधावी ऋषिकी कन्या प्रारब्ध की मारी हुई, बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी थी। विद्वानों का मत है, जिसका भाग्य बिगड़ा हुआ होता है उसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है। अगर उसके पास कोई अमृत से भरा हुआ घड़ा लाकर देवे तो भी वह भाग्यहीन उसको साधारण पानी समझकर फेंक देगा। कोई चिंतामणि रत्न लाकर देदे तो उसको भी साधारण पत्थर समझकर फेंक देगा। अगर कामधेनु गौ दरवाजे पर आ जाय तो उसको साधारण गाय समझकर भगा देगा। दरवाजे पर कल्पवृक्ष उत्पन्न हो जाय तो उसको भी साधारण झाड़ समझकर उखाड़कर फेंक देगा। प्रारब्ध के कारण ही अभागा उल्टे कर्म करने लगता है। इसी प्रकार वह बालिका भी दुर्वासाऋषि के उपदेश को सुनकर मन से विप्र होकर कहने लगी कि आपके कथानुसार सब बातें मुझे कुछ अच्छी नहीं मालूम हुईं।
कार्तिक माघवैशाख मास इतने पुण्यदायक हैं कि शास्त्रों में उनकी प्रशंसा की गई है। इसी प्रकार भगवान शंकर की भक्ति मनुष्य को शीघ्र मोक्षपद देनेवाली है। आकाश में प्रत्यक्ष दिखने वाले भगवान सूर्य की उपासना भी महान पुण्य दायक होती है। अंबिकादेवी व गणेशजी की उपासना भी प्रत्यक्ष फलदायी होती है। इन सबको छोड़कर आप एक साधारण अधिक मास की उपासना करने को कहते हैं। जो कि संसार में मलमास कहा जाता है जिसमें सूर्य की संक्रांति नहीं होती।
समस्त शुभ कर्मों में लोग जिसका परित्याग कर देते हैं। ऐसे निंदनीय मासकी उपासना करने का उपदेश मुझको देते हैं। मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है आपके उपदेश को सुनकर। संसार में सर्वश्रेष्ठ कहे जानेवाले भगवान विष्णु श्री शंकरजी तथा सीतापति राम क्या इनकी भक्ति मेरे दुःखों को दूर नहीं कर सकती जो आप क्षुद्र और मलिन तथा निंदनीय अधिकमास की भक्ति करने का उपदेश देते हैं। बालिका के ऐसे वचनों को सुनकर दुर्वासाऋषि अत्यंत क्रोधित हो गए। उनके नेत्र लाल हो गए। परंतु उन्होंने अपने क्रोध का शमन करते हुए मन में विचार किया कि यह मेरे मित्र मेधावी की कन्या है। तथा प्रारब्ध की मारी हुई बुद्धि से भ्रष्ट हो गई है। दुःखअग्नि से पीड़ित है। मेरे द्वारा दिए हुए श्राप को यह कैसे सहन कर सकेगी। ऐसा सोचकर श्री दुर्वासाऋषि उससे कहते हैं कि हे बालिका तूने बड़ा भारी अपराध किया जो कि पुरुषोत्तम मास की अवहेलना व निंदनीय वचन कहे। अगर कोई तेरी जगह दूसरा होता तो मैं उसे अभी श्राप दे देता। परंतु तू मेरे मित्र की कन्या और पितृहीन और अत्यंत दुःखित है इसलिये मैं तुझे श्राप नहीं देता हूं। परंतु किए हुए अपराध का प्रायश्चित तुझे भोगना पड़ेगा।
दुर्भाग्य के कारण बुद्धि भ्रष्ट होने से तूने परम पुण्यदाता पुरुषोत्तममास की निंदा की है। इसका परिणाम इस जन्म में अथवा अगले जन्म में तुझे भोगना पड़ेगा। क्या करना उचित है अथवा अनुचित है तू अपनी बुद्धि से निर्णय कर। भगवान तेरा कल्याण करें। अब मैं बदरिकाश्रम की ओर जा रहा हूँ। ऐसा कहकर श्री दुर्वासाऋषि वहां से चल दिए। उनके जाते ही वह बालिका निस्तेज हो गई। तथा अपने भविष्य पर विचार करने लगी। अनेक दिन सोच विचार में व्यतीत हो गए। परंतु किसी बात का निर्णय नहीं कर सकी। आखिर एक समय उसने निश्चित किया कि सभी देवताओं में शीघ्र फलदाता भगवान शंकर माने जाते हैं। उन्हीं की तपस्या और आराधना करना चाहिए। ऐसा निश्चय करके वह ब्राह्मण कन्या ने अत्यंत दुष्कर तपस्या करना प्रारंभ कर दिया। समस्त जगत के स्वामी पांचमुख वाले दशभुजा और तीननेत्रोंवाले व्याघ्राम्बर धारण किए हुए। मस्तक में अर्धचंद्र है तथा जटाओं में गंगाजी प्रवाहित हो रही हैं।
ऐसे पार्वतीपति, अनाथों के नाथ, असहाय की रक्षा करने वाले भगवान शंकर की भयंकर कष्ट साध्य तपस्या करने लगी। ग्रीष्म ऋतु में अपने आसन के चारों तरफ अग्नि जलाकर पंचाग्नि साधन करते हुए तपस्या की। तथा वर्षा ऋतु में भयंकर वर्षा में खुले मैदान में आसन लगाकर साधना की। तथा हेमंत और शिशिर ऋतु में जब भयानक ठंड रहती है। तब भी उसने साधना की। प्रातः सायंकाल नित्य नियम धारण करके भोजन का परित्याग करके सूखे पत्तों का आहार करती कुछ दिनों के बाद इसका भी परित्याग करके अधोमुख होकर सिर्फ धूम्रपान करके निंदा का परित्याग करके रात दिन तपस्या में लीन रहने लगी उसका संपूर्ण शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया। मुख पर तपस्या का तेज प्रकाशित होने लगा। उस बालिका की ऐसी उम्र तपस्या और साधना के द्वारा उत्पन्न तेजस्विता को देखकर इंद्रदेव अत्यंत भयभीत रहने लगे कि कहीं यह बालिका मेरा इंद्रसन प्राप्त करने के लिये तो तपस्या नहीं कर रही। ऐसी चिंता उत्पन्न होने से इंद्रने उसकी तपस्या में अनेक बाधाएं डालने की कोशिश की। परंतु वह बालिका इन सब बाधाओं से विचलित नहीं हुई। तथा एकाग्रता से अपनी साधना में लगी रही।
इस प्रकार साधना करते हुए, नौ हजार वर्ष व्यतीत हो गए। उसकी भयंकर तपस्या और साधना से भगवान शंकर का आसन हिलने लगा। आखिर भगवान शंकर को अपने भक्त के सामने प्रकट होना पड़ा। उस समय उनका स्वरूप अत्यंत प्रसन्न स्फटिक मणि के समान गौर वर्ण, पांचमुख, व दशभुजावाले नीलकंठ और पिंगट जटावाले जटाओं से गंगाजी बह रही हैं। मस्तक पर चंद्रकला सुशोभित है। तीन नेत्रों वाले गले में मुंडमाला हांथ में त्रिशूल धारण किए हुए व्याघ्रचर्म से व्याप्त सारे शरीर में भस्म का लेपन नाग का यज्ञोपवीत अत्यंत तेजस्वी स्वरूप द्वारा भगवान शंकर प्रगट हुए। उनके स्वरूप को देखकर बालिका अत्यंत प्रसन्न हो गई। जे जे जै चंद्रमौली देवाधिदेव ऐसा कहते हुए भगवान के चरण कमलों में अपना मस्तक झुकाकर साष्टांग नमस्कार करने लगी। उससे मन ही मन उनका पंचोपचार पूजन किया और उनके सामने प्रसन्न- चित होकर हाथ जोड़कर खड़ी रही।
शंकर जी उससे कहते हैं। हे बालिका मैं तेरी साधना से अत्यंत प्रसन्न हूँ तुझे वरदान देने यहां आया हूं तेरे मन में जो भी इच्छा हो वर मांग। मैं तेरी समस्त इच्छाओं को परिपूर्ण करूंगा। भगवान के ऐसे वचनों को सुनकर बालिका बहुत प्रसन्न होकर कहती है। हे दया के सागर मेरी मनोकामना आप पूर्ण करें मुझे पति दे पति दे पति दे। मैं पति के सिवा कुछ भी नहीं चाहती। मुझे सिर्फ पति का वरदान चाहिये। इसके सिवा मेरे मन में कुछ भी इच्छा नहीं है। उसके ऐसे वचनों को सुनकर भगवान शंकर कहते हैं। हे बालिका तूने अपने मुख से जितनेबार जो मांगा है। वही तुझे प्राप्त होगा। तूने पांच बार पति शब्द का उच्चारण किया है इसलिये तुझे पांच पति होते का वरदान मैं देता हूं। हे बालिका तेरे पांचों पति शूरवीर, प्रतापी, सत्यप्रतिज्ञा वाले, धार्मिक, अनेक यज्ञों को करने वाले, जितेंद्रीय, सारे संसार में प्रसिद्ध, यशस्वी, कीर्तिमान, क्षत्रिय जाति के तुझ से अत्यंत प्रेम करने वाले होंगे।
शंकर जी के ऐसे वरदान को सुनकर बालिका दुःखित होकर कहती है, हे प्रभु मैं आपकी भक्त होकर मेरे लिये ऐसा निंदनीय वरदान क्यों दे रहे हैं। हे दया के सागर एक स्त्री का एक ही पति होता है आज तक संसार में कभी भी एक स्त्री के पांच पति नहीं हुए। न तो सुना गया न आज तक ऐसा देखा गया है। एक पुरुष को अनेक स्त्रियां हो सकती हैं, हुई हैं। परंतु एक स्त्री का दूसरा पति नहीं हो सकता, फिर मैं पांच पति की पत्नि कैसे बन सकूंगी। आपको अपने भक्त के प्रति ऐसा वरदान शोभा नहीं देता। मेरी निंदा के साथ आपकी भी संसार निंदा करेगा। बालिका के वचनों को सुनकर भगवान शंकर कहते हैं, मेरा यह वरदान इस जन्म में नहीं अगले जन्म में तुझे प्राप्त होगा। तुझे इस शरीर से छुटकारा मिलने पर तेरा दूसरा जन्म बिना योनि के होगा और मेरे दिए वरदान के मुताबिक पांच पतियों का सुख प्राप्त कर अनेक राजसी ऐश्वर्यों को भोगकर तू मोक्ष को प्राप्त होगी।
दुर्वासाऋषि साक्षात मेरा ही स्वरूप है। तूने उनके शब्दों का अपमान किया वे अत्यंत क्रोधी हैं। यह तो तेरा सौभाग्य था जो उन्होंने तुझे श्राप नहीं दिया, अपने क्रोध का शमन कर दिया। तूने लोक में ऐसा कोई सामर्थ्यवान नहीं है जो उनके श्राप से बच सके। उनके वचनों को याद कर उन्होंने कहा था कि पुरुषोत्तम की निंदा करने से तुझे प्रायश्चित भोगना पड़ेगा। हे बालिका भगवान पुरुषोत्तम हम लोगों के भी देवता हैं। हम लोग ब्रह्मा, विष्णु और मैं तथा अनेक तपस्वी सिद्ध योगी नारदादी ऋषि सभी उनकी उपासना करते हैं। ऐसे भगवान पुरुषोत्तम का अत्यंत प्रिय मास पुरुषोत्तम मास है। उन्होंने अपना नाम, शक्ति आदि सभी कुछ उसको दे दी है। वह निंदा पात्र हो ही नहीं भगवान की हुई, इसी कारण तेरी आकांक्षा में भ्रम पैदा होकर तेरे पांच बार पति शब्द का वरदान मांगा और मैंने दिया। अब यह वचन असत्य नहीं हो सकता। ऐसा कहकर भगवान शंकर वहां से अंतर्ध्यान हो गए।
उस समय बालिका की ऐसी दयनीय अवस्था हो गयी। कि शरीर भय से कांपने लगा सांस जोर से चलने लगी। मुख का तेज लुप्त हो गया। नेत्रों से आंसुओं की धारा बहने लगी। सारा शरीर तप्त होकर जलने लगा। चिंताग्नि के भड़काने से वह कोमल विप्रबाला थोड़े दिनों में जर्जर शरीर वाली हो गई। तथा कुछ दिन मानसिक दुःख में लिप्त बालिका काल के विकराल काल में समा गई अर्थात मृत्यु को प्राप्त हो गई। तपस्या के प्रभाव से उसके समस्त पाप नष्ट हो चुके थे। उसके शरीर को आश्रम के समीप रहने वाले ब्राह्मणों ने शमशान भूमि में ले जाकर अग्नि को समर्पित कर दिया। भगवान कृष्ण कहते हैं धर्मराज उसी समय राजा द्रुपद यज्ञ कर रहे थे। उसी यज्ञ कुंड से बालिका के रूप में उत्पन्न होकर तुम्हारी पत्नि बनी। पूर्व जन्म में पांच बार पति का वरदान मांगने से भगवान के दिए वरदान से यह तुम पांच पतियों की रानी बनी। यह द्रौपदी अत्यंत पवित्र और पतिव्रता तथा मुझे अत्यंत प्रिय है। मेरी भक्त है, इसलिये उसपर मेरा विशेष प्रेम है। मैं उसका रक्षक हूं।
परंतु पूर्व जन्म में इसने पुरुषोत्तम मास की अवहेलना की थी। इसलिये उसको वनवास और कौरवों से दुःख प्राप्त हो रहा है। जिस पुरुषोत्तम मास की बड़े-बड़े देवता ऋषिमुनि हमेशा स्तुति करते हैं उसकी निंदा का प्रायश्चित तो भोगना ही पड़ेगा। तुमको उस प्रायश्चित से निवृत्त होने के लिये सर्वसुगम उपाय मैं बतला रहा हूं। आनेवाले पुरुषोत्तम मास में नियमसंयम धारण करते हुए व्रत, उपवास, स्नान, दान इत्यादि कर्म करने से तुम पांडव और द्रौपदी जन्म जन्मांतर के पापों से मुक्त तथा प्रायश्चित से भी मुक्त होकर अपना अखण्ड चक्रवर्ती राज्य, कौरवों पर विजय प्राप्त करके, अनेक यज्ञादि पुण्य कर्मों के द्वारा संसार में प्रशंसा प्राप्त करोगे। सभी प्रकार के सुख साधन प्राप्त करोगे। ऐसी प्रेरणा देते हुए भगवान कृष्ण द्वारकापुरी जाने के लिये उद्यत हुए। उनको रथ में बैठाकर समस्त पांडव प्रार्थना करने लगे कि हे कृष्ण आप हमारे स्वामी और रक्षक हो, हम आपके दास हैं।
हमेशा इसी प्रकार हम पर कृपा दृष्टि रखना। नेत्रों में आंसू भरकर गले मिलकर उनको विदा किया। उस समय पांडव वनवास भोग रहे थे। अनेक तीर्थ यात्राओं का भ्रमण करते हुए काफी समय व्यतीत हो गया। जब पुरुषोत्तम मास आया तब कृष्ण के वचनों का स्मरण करते हुए उनकी दी हुई प्रेरणा के अनुसार नियम संयम धारण करके नित्य स्नान, व्रत, मनन, चिंतन करते हुए श्रद्धापूर्वक पुरुषोत्तम मास को व्यतीत किया, इस कर्म के द्वारा पांडवों को अनंत पुण्य की प्राप्ति हुई। द्रौपदी पुरुषोत्तम मास की अवहेलना करने के प्रायश्चित से मुक्त हो गई। इसके प्रभाव से उन्होंने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके अपना राज्य प्राप्त किया। संसार में उत्तम पराक्रम, प्रशंसा को प्राप्त कर अखण्ड चक्रवर्ती राज्य किया। अनेक यज्ञों को करके पुण्य के द्वारा मोक्ष को प्राप्त किया। सूत जी कहते हैं कि हे ऋषियों इसी प्रकार सूर्यवंश में उत्पन्न राज दृढ़धन्वा ने भी भगवान पुरुषोत्तम की आराधना करके संसार में अनेक सुखों को भोगकर मोक्ष पद को प्राप्त किया था।
जे जै श्री अधिकमास माहात्म्यसार बृहन्नारदीय पद्मपुराणे पंचमो ऽ ध्यायः समाप्त
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