Adhik mass ki Katha 15 adhyaya | अधिक मास की कथा पंद्रहवां अध्याय
॥ अथ पंचदशोऽध्यायः प्रारम्भः ॥
॥ श्री गणाधिपतये नमः ॥
श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकदि ऋषियों से, अगस्त ऋषि राजा चित्रबाहु से और भगवान विष्णु लक्ष्मीजी से कहते हैं, हे लक्ष्मी मणिग्रीव ने अपने जीवन का वृतांत कहते हुए कहा कि, मैं उसी नगर में शुद्ध जाति में उत्पन्न मेरा नाम मणिग्रीव है। मैं भी अपने पत्नी के सहित उसी नगर में रहता था। मैं भी धन संपन्न था शुभकर्म और परोपकार करता हुआ आनंदमय जीवन बिता रहा था।
परंतु दैव योग से मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई। दुष्ट जनों की संगति में पड़कर अपना धर्म छोड़कर दुर्व्यसन, मदिरापान, वेश्यागमन आदि में मैंने अपना सारा धन नष्ट कर दिया। धन नष्ट हो जाने पर चोरी डकैती हिंसाकर्म करने लगा। मेरे इस अपराध से सभी नगरवासी और बंधु वर्ग त्रस्त हो गए। मेरे पति ने मुझे बहुत उपदेश दिए समझाने की कोशिश की परंतु बुद्धि भ्रष्ट होने से मैंने उसकी बात न मानकर आपराधिक कर्म करता रहा। आखिर मेरे दुष्कर्म से तंग आकर नगरवासियों ने राजा के पास शिकायत कर दी। राजा ने भी उनकी बात मानकर मेरी संपत्ति जब्त कर ली। और मुझे नगर से निकाल बाहर कर दिया। मेरी यह पतिव्रता पति ऐसे नाजुक समय में भी अपने मातापिता बंधुवर्ग को त्याग मेरी सेवा में लगी रही। इतने दुर्व्यसन होने पर भी इसने मेरा तिरस्कार नहीं किया। मुझे कोई मारने न सूझने पर आखिर मैंने पति के सहित इस जंगल में आकर अपना निवास बना लिया। यहाँ उदर पोषण के लिये अनेक वन्य पशुपक्षियों की हत्या करके किसी प्रकार जीवनयापन करता हूँ। मुझ से नित्यप्रति हिंसा आदि पाप कर्म होते रहते हैं। हे ऋषिवर मेरा कोई पूर्वका संचित पुण्य था। जिसके प्रभाव से आपके दर्शन हुए। अब मैं आपकी शरण में हूँ। मेरे ऊपर दया करिये। मुझे शरणागत समझकर मेरे समस्त पापों को नष्ट करने के लिये और सद्गति प्राप्त होने के लिये कोई उत्तम उपाय बताएं जिससे मेरे दुःख दारिद्र दूर होकर शेष शांतिपम्य व्यतीत करके अंत में सद्गति प्राप्त हो।
हे ऋषिवर मुझे ऐसा मार्ग दिखाएं जिससे मेरे पाप नष्ट होकर विपुल संपत्ति प्राप्त हो। मैं उसे शुभ
और पुण्य कर्मों में खर्च करके कृतार्थ हो जाऊं। मणिग्रीव के वचनों को सुनकर ऋषि कहते हैं, हे मणिग्रीव तू अब कृतकृत्य हो गया है। तूने ऐसे भयानक जंगल में मेरे प्राणों की रक्षा करके समुचित रूप से मेरा आतिथ्य सत्कार किया। इससे आगे अब तेरा स्त्री सहित कल्याण होगा। भविष्य अच्छा और शुभ होगा इसके लक्षण पहले ही प्रगट हो चुके हैं। अब मैं तुझसे उत्तम प्रकार का कर्म जो कि बिना तीर्थ और दान किए असंतोष को देने वाला है, तुझे बतलाता हूँ ध्यान लगाकर सुन। हे मणिग्रीव अब से जो तीसरा मास आएगा उस मास को पुरुषोत्तम मास कहते हैं।
उस मास में अखंडदीप की स्थापना करने से तुम्हारे समस्त दुःख दारिद्र नष्ट हो जाएंगे तिल का तेल या घी का दीपक होना चाहिए परंतु इस जंगल में तुमको वह प्राप्त नहीं होगा। यहाँ पर महुआ के वृक्ष अधिक दिखाई पड़ते हैं इसलिये महुआ के फलों का तेल निकालकर उसका दीपक लगाना। उसका नियम धारण करना। स्त्री के सहित प्रातः उठकर नित्यकर्मों से निवृत्त होकर इस तालाब में स्नान करना और अपनी कुटी में दीपक की स्थापना करके वहां प्राप्त होने वाले कंद मूल फल फूलों के द्वारा उस दीपक में ही भगवान पुरुषोत्तम का ध्यान करके दीपक का पूजन करना।
इस प्रकार संपूर्ण मास पर्यंत अखंडदीप की स्थापना और पूजन से तुम्हारे समस्त पाप लुप्त होकर तुम्हें लक्ष्मी की प्राप्ति होगी। वैसे तो शास्त्रों में पुण्य प्राप्ति के अनेक मार्ग कहे गए हैं जैसे अनेक प्रकार के व्रत, दान, तीर्थों का सेवन, वेदों का अध्ययन, चांद्रायणव्रत, गोमती नदी के तट का सेवन गयाश्राद्ध हजारों के समय जप दान कर्म वैध्यति और व्यतीपात योग में कुरुक्षेत्र का सेवन दंड वन में तपस्या आदि कर्म महान फल देने वाले कहे गए हैं। फिर भी ये सब कर्म पुरुषोत्तम मास के अखंडदीप की स्थापना से सोलहवां हिस्सा भी नहीं प्राप्त कर सकते हैं। मणिग्रीव पुरुषोत्तम मास में अखंडदीप की स्थापना से बांझ स्त्री पुत्र प्राप्त कर सकती है। धनहीन को धन की प्राप्ति होती है। कन्याओं को गुणी सुशील और दीर्घायु वर प्राप्त होता है। धनहीन को धन की इच्छा वालों को सुंदर पतिव्रता पति प्राप्त होते हैं। विद्यार्थियों को उच्च कोटि की विद्या प्राप्त होती है। सिद्धि
प्राप्ति की इच्छा वालों को सिद्धि प्राप्त होती है। मोक्ष की इच्छावालों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। भगवान पुरुषोत्तम को अत्यंत प्रिय ऐसे पुरुषोत्तममास को आराधना बिना विघ्न और नियम के द्वारा भी अत्यंत सरल उपाय मैंने तुझसे कह दिया। तुमने मेरी बहुत सेवा की मुझे जीवनदान दिया इसीलिए प्रसन्न होकर यह अत्यंत गुप्त साधन मैंने तुम से कहा। अब मैं प्रयागराज को प्रस्थान करता हूँ। तुम्हारा कल्याण हो।
ऐसा कहकर भगवान का नाम स्मरण करते हुए मुनि ने प्रस्थान किया। उनको छोड़ने और मार्ग की पहचान बताने के लिये मणिग्रीव और उसकी पति जंगल में काफी दूर तक जाकर मार्ग की रूपरेखा समझाकर मुनि के चरणों में नमस्कार कर उनको विदा करके अपने आश्रम में आ गए। और मुनि के कहे अनुसार भगवान पुरुषोत्तम का मास आने पर बताए हुए नियम से अखंड दीप की स्थापना और पूजन करते हुए भगवान का नाम स्मरण करते हुए श्रद्धापूर्वक समस्त मास को व्यतीत किया। इस पुण्य कर्म के द्वारा उनका मानसिक संताप शांत होकर अंतःकरण शुद्ध हो गया। वे आनंदपूर्वक पति पति जीवन व्यतीत करने लगे जब जब पुरुषोत्तममास आता बड़ी श्रद्धा के सहित अखंडदीप की स्थापना पूजन नाम स्मरण करके संपूर्ण मास को व्यतीत करते हुए वृद्धावस्था और मृत्यु हो जाने पर वे दोनों उत्तम स्वरूप धारण कर विमान पर बैठकर स्वर्ग लोक को चले गए वहां स्वर्गलोक में देवताओं के साथ अनेक सुखों को भोगकर फिर से इस पृथ्वी पर वही दुराचारी और हिंसक मणिग्रीव के पुण्य प्रभाव से राजा चित्रबाहु के नाम से प्रसिद्ध हुआ। पूर्व जन्म की पति इस जन्म में चंद्रकला नाम से प्रसिद्ध तुम्हारी पटरानी हुई। इसने पूर्वजन्म में पतिव्रता रहकर अपने पति की मनक्रम वचन से सेवा की थी और अखंडदीप की स्थापना पूजा में इसका भी पूर्ण सहयोग था उसी के पुण्य प्रभाव से इस जन्म में भी अपने पूर्व जन्म के पति और पटरानी के रूप में समस्त सुखों को प्राप्त किया। जो स्त्रियां पतिव्रता होती हैं।
वे अपने पति के पुण्य का आधाभाग प्राप्त करती हैं। यह अनेक शास्त्रों का सिद्धांत है। हे राजन पूर्व जन्म के पुण्य प्रभाव से ही तुझे यह निष्कंटक राज्य विपुल वैभव और पतिव्रता पति प्राप्त हुई। तुमने
जो मुझसे प्रश्न किया था कि मैंने पूर्वजन्म में कौन सा पुण्य कर्म किया था जिससे मुझे यह सब प्राप्त हुआ। सो मैंने अध्यात्म योग को किया द्वारा तुम्हारे पूर्व जन्म का संपूर्ण वृतांत तुमसे कह दिया। ऐसा कहकर अगस्त ऋषि राजा को शुभाशीष देकर चले गए। राजा भी अपनी पति के सहित राज्य का सुख भोगकर पृथ्वीपर उत्तम संतान स्थापित कर अपनी प्रतिष्ठा को स्थापित कर मृत्यु के बाद मोक्ष को प्राप्त हुआ। इसी प्रकार अधिक मास आने पर जो भी नर नारी व्रत, उपवास, स्नान, अखंडदीप का स्थापना और दीपदान आदि पुण्य कर्मों को करेंगे वे भी संसार में अनेक सुखों को भोगकर अंत में मोक्ष के अधिकारी होंगे।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
(१५)
॥ शुभमभवतु ॥
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
हम से जुड़े रहने के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद