Adhik mass ki Katha 21 adhyaya | अधिक मास की कथा 21वा अध्याय
।। श्री गणेशाधिपतये नमः ।।
श्री भगवान नारायण नारदजी से तथा सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं। हे ऋषियों भगवान विष्णु से लक्ष्मीजी कहती हैं, हे दयानिधे आपने अप्सरा उद्वार की कथा मुझे सुनाई अब आप पुरुषोत्तम मास के स्नान का फल और माहात्म्य का वर्णन सुनाइये। भगवान विष्णु लक्ष्मीजी की इच्छा को सुनकर प्रसन्नता से कहते हैं, हे लक्ष्मी तुम्हारी इच्छा के अनुसार मैं पुरुषोत्तम मास के स्नान का माहात्म्य वर्णन करता हूँ जो लोग पुरुषोत्तम मास में नित्य प्रति सूर्योदय के पहले स्नान करते हैं उनके समस्त पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। और उनको शारीरिक कष्ट बाधा कभी नहीं होती है। सभी कार्य निर्विघ्नता से पूरे होते हैं। मन में संतोष और प्रसन्नता होती है। सभी तीर्थों में स्नान करने का पुण्य प्राप्त होता है। विधिक (नियम) युक्त स्नान करने से बारहों महीने के स्नान का फल प्राप्त होता है। अधिकमास में गंगाजी के स्नान का बड़ा महत्त्व है। गंगाजी में स्नानकर माधव भगवान का दर्शन करने से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है। अधिकमास में जो लोग सरस्वती नदी में स्नान करते हैं।
उनके सात जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं। सूर्य चंद्रमा के ग्रहण के समय गोदाम करने का जो पुण्य होता है, वही पुण्य अधिकमास में स्नान करने वाले को प्राप्त होता है। वह मनुष्य महामूर्ख होगा जिससे अधिक मास में स्नान करने वाले को प्राप्त नहीं होता है। वह मनुष्य महामूर्ख होगा जिससे अधिक मास में स्नान नहीं किया और पितरों का तर्पण नहीं किया। इस नरक रूपी संसार से अपनी आत्मा की मुक्ति के लिये कोई कर्म नहीं किया उसका जन्म ही वृथा गया ऐसा निश्चित समझना चाहिए। ऐसे लोग पृथ्वी का भार हैं। हे लक्ष्मी जो लोग पुरुषोत्तम मास में श्रद्धापूर्वक स्नान दान तर्पण आदि कर्म करते हैं वे बड़े भाग्यशाली और परम पुण्यशील होते हैं। वैशाख में तप उपवास चैत्र मास में होम कार्तिक मास में दानधर्म ऐसे प्रत्येक मास के अलग अलग पुण्य है। परंतु अधिकमास में व्रत, होम, दान इन तीनों का साधन एक साथ हो करके सभी मासों का पुण्य प्राप्त होता है।
इस कर्म के द्वारा जीवत्मा उत्तम सद्गति को प्राप्त होती है। वह मनुष्य जब तक जीवित रहता है। उत्तम सुख धन धान्य से परिपूर्ण दीर्घायु जीवन व्यतीत करके मृत्यु के बाद मोक्ष को प्राप्त होता है। वह जीवत्मा चौरासीयोनिन का भ्रमण और आवागमन से छुटकारा पाकर परब्रह्म में लीन हो जाते है।
हे लक्ष्मी अधिकमास में स्नान का कितना पुण्य है इस विषय में पुरातन का इतिहास कहता हूँ। दक्षिणदिशा में गोदावरी में स्नान के तट पर पैठण नाम का एक सुंदर नगर है। उस नगर में चारों वर्णों के लोग रहते थे और अपने अपने कर्म में लगे हुए सुखी और संपन्न थे। वहाँ एक ब्राह्मण रहता था। वह सज्जन, विद्वान अनेक जनों से पूजित भगवान का भक्त था। प्रत्येक पुरुषोत्तम में नियमपूर्वक सूर्योदय के पहले स्नान करने की श्रद्धा थी उसका समस्त जीवन शांतमय और सुखमय व्यतीत हो रहा था। वृद्धावस्था आ गई शरीर अवस्था के प्रभाव से कमजोर अशक्त हो गया। गोदावरी नदी उसके घर से कुछ दूरी पर थी नित्य प्रति उतनी दूर कैसे स्नान करने जा सकूँगा यह विचार उसके मन में चिंता का विषय बना हुआ था पुरुषोत्तम मास प्रारंभ हो चुका था। इस प्रकार विचार करते हुए आखिर उसने निश्चय किया कि यदि मास के अंतिम तीन दिन नियमपूर्वक स्नान करूँगा।
पापों को नष्ट करने वाला ऐसे मास को व्यर्थ नहीं बिताना चाहिए। अपनी शक्ति के अनुसार जितना हो सके पुण्य संचित करना चाहिए। हे लक्ष्मी इस प्रकार उस ब्राह्मण ने मन में निश्चय करके पुरुषोत्तम मास के जब अंतिम तीन दिन शेष रहे तब से स्नान का नियम प्रारंभ कर दिया। एक प्रहर रात्रि शेष रहती थी तब घर से स्नान के निमित्त गोदावरी के लिये निकल जाता। और स्नान करके सूर्योदय के पहले ही घर वापस आ जाता था।
दो दिन स्नान का और घर वापस आने का समय निर्विघ्नता हो गया। अंतिम तीसरे दिन ब्राह्मण गोदावरी में स्नान करके कमंडलु में जल भरकर अपने घर वापस आ रहा था। थोड़ा थोड़ा अंधकार था सूर्योदय की आभा प्रकट हो रही थी। ऐसे ही समय मार्ग में एक बड़े भयंकर आकृति वाला प्रेत ब्राह्मण के सामने प्रकट हुआ। वह प्रेत बड़ी बड़ी अंगारे के समान आँखें वाला, सूखा शरीर सिर्फ हड्डियाँ ही दिखाई दे रही थीं। दाढ़ के बीच जीभ लपलपा रही थी पेट पीठ से सटा हुआ बड़े बड़े भयंकर बाल बड़े भयंकर शरीर पीले रंग का बार बार हाथ से पेट को पीटता हुआ मुख फैलाता हुआ डरावना करता हुआ वह प्रेत ब्राह्मण के सामने प्रकट हुआ। उस प्रेत को देखकर ब्राह्मण के मन में भय अवश्य हुआ। परंतु ब्राह्मण मन में भगवान पुरुषोत्तम का नाम स्मरण करते हुए हिम्मत धारण करता कहता है। अरे तू ऐसा भयानक और महान शरीर वाला प्रेत है। ब्राह्मण को नमस्कार करके कहता है। हे ब्राह्मण मैं समस्त प्राणियों को कष्ट देने वाला प्रेत हूँ। मैं श्मशान में रहता हूँ और अत्यंत निंदनीय वस्तुओं को भक्षण करता हूँ। जिन मनुष्यों में आत्मबल तथा संचित पुण्य नहीं रहता तथा जो
देवताओं की आराधना से दूर रहते हैं। ऐसे मनुष्यों को हमेशा पीड़ा पहुँचाना ही हमारा कर्म होता है।
हे विप्र मैं बड़ा दुरात्मा हूँ रात-दिन हिंसा और पाप आचरण में लिन रहता हूँ इस प्रेतयोनि के दुःख को भोग रहा हूँ। आपके दर्शन होते से और आपके शब्दों को सुनने से मेरे मन में कुछ ज्ञान का प्रकाश हुआ है। आप बड़े दयालु हैं। कृपा करके मेरा उद्धार करिए, मुझे प्रेत योनि से छुटकारा दिलवाइये। इससे आपको बड़ा पुण्य प्राप्त होगा। आपके दर्शन होते ही मेरे मन को विश्वास हो गया है कि आप प्रार्थना को सुनकर धर्मधर्मी के मन में दया उत्पन्न हो गई। हे लक्ष्मी पुरुषोत्तम पुरुष बड़े दयालु होते हैं। उस प्रेत की उनसे किसी का दुःख सहन नहीं होता। कैसा भी पापी, धर्मात्मा, प्रेत, राक्षस, पिशाच सबको शरण देते हैं। ब्राह्मण, धर्मधर्मी वचनों को सुनकर उस प्रेत को पूर्व जन्म का स्मरण हो गया।
वह हाथ जोड़कर कहता है, हे विप्र मैंने पूर्व जन्म में अनेक पाप किए कई लोगों की हत्या की, डाका और चोरी की। मदिरा पीकर अनेक बलात्कार किए अपने जीवन में कभी शुभ और पुण्य कर्म नहीं किये सारा जीवन पाप कर्म में बिता दिया। आखिर मृत्यु के बाद यमदूतों ने मुझे प्रेत योनि में भेज दिया गया। हे विप्र इस योनि में यातना दी। नरकों का दुःख भोगने के बाद मुझे प्रेत योनि में भेज दिया गया। हे विप्र इस योनि में जैसा मेरा भयंकर आकार है वैसे ही हमारे कर्म होते हैं। हम लोगों से अनेक जीवों की हिंसा होती है। पाप हो होते हैं। कभी शुभ कर्म नहीं होता। अनेक कल्पों से मैं इस प्रेत योनि का दुःख भोग रहा हूँ। आज मेरा अहो भाग्य था जो आप पुण्यात्मा के दर्शन हो गए इससे मैं समझ रहा हूँ कि मेरा पापों के प्रायश्चित का समय आ गया है। और आपके द्वारा मेरा उद्धार हो जाएगा। प्रेत के शब्दों को सुनकर ब्राह्मण धर्मधर्मी कहता है, हे प्रेत वास्तव में तू बहुत दुःखित है। मैं अपने कुछ पुण्य के द्वारा तुझे जल हाथ में लेकर संकल्प किया कि मैंने पुरुषोत्तम मास में तीन दिन स्नान किया है। उसका जो पुण्य है। इस प्रेत को दे देता हूँ। ऐसा कहकर प्रेत के शरीर पर छोड़ दिया। उस पुण्य को करते ही उसका प्रेतत्व नष्ट हो गया।
वह दिव्य स्वरूप का हो गया। और ब्राह्मण की वंदना करता हुआ स्वर्ग लोक को चला गया।
वह ब्राह्मण भी घर में आकर भगवान पुरुषोत्तम की आराधना में निमग्न होकर पुरुषोत्तम मास का उद्यापन करके समापन किया। इस प्रकार वह ब्राह्मण अपनी शेष आयु को पूराकर मृत्यु के बाद उत्तमदिव्य स्वरूप धारण करके विमान पर बैठकर स्वर्ग लोक को चला गया। हे लक्ष्मी सिर्फ तीन दिन के स्नान का इतना पुण्य है तो संपूर्ण मास के स्नान का कितना माहात्म्य और पुण्य होगा। भगवान के वचनों को सुनकर लक्ष्मी जी कहती है। हे प्रभु स्नान की महिमा को सुनकर मेरे मन में और भी स्नान की महिमा सुनने की इच्छा है। कृपा कर स्नान महिमा का वर्णन सुनाइयेगा।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
ब्रह्मनारदीय पद्माधारे एकर्विंशोऽ अध्याय: समाप्त ।।
(२१)
।। शुभमभवतु ।।
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