Adhik mass ki Katha 9adhyaya|अधिक मास की कथा नौवा अध्याय
।। अथ नवमोऽध्यायः प्रारम्भः ।।
।। श्री गणेशाय नमः ।।
भगवान विष्णु नारद जी से सूतजी शौनकदि ऋषियों से तथा वाल्मीकि ऋषि राजा दृढ़धन्वा से उसके पूर्व जन्म का वृत्तांत बतलाते हुए कहते हैं। हे राजन जब ब्राह्मण सुदेव ने भगवान पुरुषोत्तम से आश्चर्य प्रकट करते हुए प्रश्न किया कि कठिन तपस्या करने के बाद जो वरदान मुझे नहीं प्राप्त हो सका उसे कई गुना अधिक वरदान आपने मुझे अनायास कैसे दे दिया। तब भगवान पुरुषोत्तम कहते हैं हे सुदेव तू नहीं जानता अज्ञानवस्था में तुझसे जो कठिन तपस्या घटित हुई है उसके द्वारा अनंत पुण्य तुझे प्राप्त हुआ और उसी के प्रभाव से मुझे प्रसन्न होकर यह वरदान देना पड़ा। हे सुदेव जो मास तेरे दुःखित अवस्था में व्यतीत हुआ वह मेरा परम प्रिय मास था इसमें थोड़ा भी दुःख किया कर्म अनंत पुण्य देने वाला होता है। तुझ से तो कठिन तपस्या घटित हुई है। पुत्र के दुःख में दुःखित अत्रजल का परित्याग कर निरंतर वर्ष में बैठे रहने से रहने से कठिन तपस्या का पुण्य, अखंड उपवास का पुण्य, और भगवान का नाम लेते रहने से चिंतन भजन का पुण्य, इस पुण्य के समान संसार का कोई भी पुण्य कर्म नहीं है।
बड़े बड़े ऋषि मुनि भी पुण्य प्राप्ति के लिये इस मास में निरंतर आराधना करते रहते हैं। इस समय में समस्त पुण्यात्मा संसार में कोई दूसरा नहीं है। इसी के प्रभाव से तुझे यह वरदान प्राप्त हुआ है। हे सुदेव तेरे जन्मांतर के सभी पाप नष्ट होकर शुद्ध पुण्यात्मा की शक्ति प्राप्त हो गई है। इस पुरुषोत्तम मास की महिमा का वर्णन चार मुख वाले ब्रह्मा भी कह सकने में असमर्थ हो गए है। इतना प्रभावशाली यह पुरुषोत्तम मास है। ऐसा कहकर भगवान पुरुषोत्तम वहां से अदृश्य हो गए। वह ब्राह्मण सुदेव पति और पुत्र के सहित प्रसन्नचित्त होकर भगवान पुरुषोत्तम के पुरुषोत्तम मास की महिमा की प्रशंसा करते हुए अपने आश्रम में आकर सुख पूर्वक गृहस्थ जीवन व्यतीत करने लगा। निरंतर देवकर्म व पितृकर्म करते हुए जब पुरुषोत्तम मास आता बड़ी श्रद्धा से व्रतन्नियम धारण करके व्यतीत करता हजार वर्ष तक जीवित रहकर समयानुसार इस शरीर को त्याग कर ब्रह्मलोक का सुख भोगकर फिर से पृथ्वी पर राजा दृढ़धन्वा के रूप में उत्पन्न हुआ।
हे राजन वही पूर्व जन्म की पत्नि गौतमी इस जन्म में पटरानी के रूप में तुझे प्राप्त हुई है। पूर्व जन्म का पुत्र शुकदेव तोते का रूप धारण कर तुझे उपदेश दे गया है। पिता के ऋण से मुक्त होने के के लिये तुझे सांसारिक विषयों में निसन देखकर संसार रूपी सागर को पार करने के लिये उसने यह सद् उपदेश दिया है कि भगवान की आराधना के बिना आत्मा का उद्धार कैसे होगा यदि मैंने पूर्व जन्म के के लिये इस मार्ग का अनुसरण किया। हे राजन अब तू चिंता मुक्त होकर अपने भविष्य को बनाने के लिये इस मास का अनुसरण किया। अब मैं सूतजी से स्नान के लिये जाता हूँ अपने उद्धार कर ले। ऐसा कहकर ऋषि जाने के लिये उद्यत हुए तभी राजा दृढ़धन्वा ऋषि के चरणों को पकड़ कर कहता है।
कि ऋषिवर आपने जो पुरुषोत्तममास के महात्म्य का वर्णन किया है सो मुझे पूर्वजन्म का स्मरण नहीं है कृपाकर आप यह सब आप विस्तार पूर्वक कहने की कृपा करें कि राजा दृढ़धन्वा के प्रश्न पर वाल्मीकि ऋषि कहते है, हे राजन जैसे प्रश्न तुमने मुझसे किया उसी प्रकार का प्रश्न भगवान विष्णु से लक्ष्मीजी ने किया था। मैं तुमसे विस्तार पूर्वक कहता हूँ, एकाग्र चित होकर सुनो एक समय की बात है। वैकुंठ विहारी भगवान विष्णु प्रसन्नचित अपने मंदिर में बैठे हुए थे ऐसे समय लक्ष्मी जी भगवान से कहती हैं। हे नाथ मेरे आपके मुखारविंद से पुरुषोत्तममास की अनेक प्रशंसा सुनी है, कि इस मास में थोड़ा भी कर्म स्नानदान व्रत आदि करने से अक्षय पुण्य व सुख की प्राप्ति होती है, सो आप कृपाकर यह बताएं कि कौन सा व्रत दान आदि कैसे करना चाहिए आप विस्तार पूर्वक बताने की कृपा करें लक्ष्मी जी के प्रश्न पर भगवान विष्णु प्रसन्न होकर कहते है कि लक्ष्मी तुम धन्य हो जो तुम्हारे मन में पुरुषोत्तम मास के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हुई है। हे लक्ष्मी जो महीना सूर्य की संक्रांति से हीन रहता है अर्थात जिस महीने में सूर्य की संक्रांति नहीं होती उसे उस मास को पुरुषोत्तम मास कहा जाता है।
इस मास के स्वामी गोलोकाधिपति भगवान पुरुषोत्तम हैं। जो हम सब देवताओं के भी स्वामी हैं। इस मास में अपनी शक्ति के अनुसार स्नान, दान, व्रत, जप, तर्पण, पूजा, आराधना, भजनकीर्तन आदि का नियम धारण करना चाहिए। तथा भूमिप्रशयन, तेल का त्याग, एक जति के पत्रावली पर भोजन, मालपूप का दान, नख, केश न काटने का नियम, एक समय भोजन, नित्यदीपदल, जूता चप्पल न पहनने का नियम, किसी एक धान्य का परित्याग, आंवले के चूर्ण से स्नान का नियम, किसी फल का त्याग, नमक का त्याग, तिलपान का दान, सुवर्ण चांदी का दान, गौदान, एक दिन के बाद एकदिन उपवास, हविष्य अन्न खाने का नियम, मौन धारण का नियम, इन में से कोई भी एक अथवा ज्यादा नियम प्रथम दिन से धारण कर मास पर्यंत करना चाहिए, इस प्रकार इस मास में जन्म जन्मांतर के पाप भस्म हो जाते है।
इसमें प्रातः काल उठकर नित्यकर्म शौच, मुख, मार्जन दांतोन आदि करके शुद्ध जल से स्नानकर शुद्ध वस्त्र धारण करके नित्य प्रति का संध्या पूजन करके विद्वान ब्राह्मण को बुलाकर उसका पूजन करके उसकी आज्ञा और क्रम से घर में एकांत और पवित्र स्थानपर गोबर से लीपकर रंगवल्ली से स्थान को सुशोभित करके चौरंगपर सफेद वस्त्र बिछाकर अनाज से अष्ट दल कमल बनाये। उसके उपर अपनी शक्ति के अनुसार चांदी तांबा अथवा पीतल का कलश ८ अंगुल लंबा स्थापित करके उसमें सवापंची पंचपल्लव व सप्त मिट्टी तीर्थ व गंगाजी के जल से पूरित करके पहले वरुण देव का पूजन करके उपर ताम्रपात्र पर राधिका के सहित भगवान कृष्ण की सुवर्ण की मूर्ति को स्थापित करें पहले विद्वान ब्राह्मण के द्वारा विधानपूर्वक प्राण प्रतिष्ठा करके अभिषेक पूजन करे ऋतु में उत्पन्न फूल फल और पूजन सामग्री के द्वारा भगवान पुरुषोत्तम का श्रद्धासहित पूजन करके उत्तम प्रकार के मिष्टान्न का भोग लगाकर तांबूल अर्पण करके आरती करे भगवान को साष्टांग दण्डवत नमस्कार करके मिष्ठान्न का भोग लगाकर त्रुटियों की क्षमा मांगे। संपूर्ण मास पर्यंत जलने वाला अखंडदीप की स्थापना करे।
जैसी शक्ति हो वैसा उपरोक्त कहे गए नियमों में से एक या अधिक नियम धारण करने का संकल्प करके भगवान के सामने हाथ में जल लेकर प्रतिज्ञा करे कि मैं संपूर्ण मास पर्यंत इन नियमों को धारण करता हुआ व्यतीत करूंगा। संकल्प करके भगवान के नामों का उच्चारण करें।
(१) नमः पुरुषोत्तमायाय नमस्ते विश्वभावन।
नमस्तेस्तु हृषीकेश, महापुरुष पूर्वज।
(२) येनेदं अखिलं जातं यंत्र सर्व प्रतिष्ठितम्।
त्वयि मेध्यति यत्रैतत् ते अपरोत्तिम केशवम्।
(३) परेशः परमानंदः परास्पर सरः प्रभुः।
चिद्रूप पश्चितपरज्ञेयो समेकृष्णः प्रसीदतु।
(४) कृष्णं कमल पत्राक्षं रामं रघु कुलोद भवम्।
नृसिंहवामनं विष्णुं स्मरन् याति परांगतिम्।
(५) वासुदेव वाराहंच, कंस केसि निषूदनम्।
पुराण पुरुषं यज्ञ पुरुषं प्रणतोस्म्यहम्।
(६) अनाधि निधनं देवं शंखचक्र गदाधरम्।
त्रिविक्रमं हलधरं प्रणतोस्मि सनातनम्।
(७) सइदं कीर्त योज्नित्यं स्तोत्राणामुक्तमोत्तमम्।
सर्वपाप विनिर्मुक्तते गोलोकं महीयते।
इस मास में ब्रमचर्य धारण कर शुद्ध पवित्र रहकर भगवत संबंधी कथा पुराण का श्रवण करके भजन कीर्तन करते हुए संपूर्ण मास को भक्तिभाव पूर्वक व्यतीत करना चाहिए इस कर्म के पुण्य से पापों का समूह नष्ट होकर समस्त मनोकामनाएं परिपूर्ण होती हैं। सांसारिक सुखों को भोगकर मृत्यु के बाद अक्षयपद अर्थात मोक्ष की प्राप्ति होती है।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
ब्रह्मनारदीय पद्याधारे नवमोऽध्यायः समाप्त।।
(१)
।। शुभमभवतु ।।
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