Adhik mass ki Katha 14 adhyaya | अधिक मास की कथा चौदहवां अध्याय
॥ अथ चतुर्दशोऽध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री मनमहागणपतये नमः ॥
श्री भगवान नारायण नारदजी से सूतजी शौनकदि ऋषियों से कहते हैं। हे ऋषियों भगवान विष्णु के मुखार बिंदु से दोपदान के माहात्म्य को सुनकर लक्ष्मीजी ने महाप्रभु पुरुषोत्तम मास के माहात्म्य को सुनकर और भी सुनने की इच्छा हो रही है। कृपा करके और भी इतिहास सुनाने की कृपा करें। यह वे लक्ष्मी पुरातन में सौभाग्य नाम का एक नगर था उस नगर के चित्रबाहु नाम का राजा था। वह वीर सत्य प्रतिज्ञावाला महाबुद्धिमान धर्म के कर्म को जाननेवाला परोपकारी, उदार सर्वगुणसंपन्न को सुननेवाला भगवान कृष्ण का परमभक्त था। उसी के समान उसकी पति चंद्रकला भी अत्यंत सुंदर और पतिव्रता थी।
एक समय उस राज्य में अगस्त्य ऋषि भ्रमण करते हुए पहुंचे ऋषि को राजमहल आता देखकर राजा नंगे पैर शीघ्रता से ऋषि के पास पहुंचकर दंडवत नमस्कार करके आदर पूर्वक राजमहल में लाकर उच्च आसन देकर पाद्य अर्घ्य आदि के द्वारा उनका पूजन करके हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए कहे, हे ऋषिवर आज आपने मेरे ऊपर बड़ी कृपा की जो स्वयं पधारकर मुझे दर्शन देकर कृतकृत्य कर दिया मेरा जन्म सफल हो गया। आज का दिन मेरे लिये बड़ा सौभाग्यशाली सिद्ध हुआ है। जो आपके पवित्र चरणों की धूल मुझे प्राप्त हुई है ऋषिवर मैं अपना संपूर्ण राज्य आपको समर्पित करता हूं। मेरे पास ऐसी अदेय वस्तु कोई नहीं है जो मैं आपको न दे सकूं। वैष्णव भक्त ऋषियों की सेवा से जन्म सफल हो जाता है ऐसा गर्ग आदि ऋषियों का मत है।
राजा चित्रबाहु के वचनों को सुनकर ऋषि ने कहा हे राजन तुम धन्य हो और तुम्हारी प्रजा भी धन्य है जो तुम्हारे जैसा भगवान का भक्त राजा उन्हें प्राप्त हुआ। जिस राज्य का राजा विष्णु भक्त ना हो वह राज्य निरर्थक है। जो शरीर नेत्र से हीन है वह निरर्थक है। दांतों के बिना होंठ निरर्थक है। पंख के बिना पक्षी निरर्थक है। नख बिना ब्राह्मण निरर्थक है। दर्भ के बिना संध्यावंदन निरर्थक है।
है। स्नान के बिना व्रत निरर्थक है। उसी प्रकार हे राजन तुम विष्णु के सेवक विष्णु भक्त हो। तुम्हारे आने से तुम अपने राज्य को सफल है। हे राजन तुम्हारा मेरे प्रति समर्पित राज्य में तुम्हीं को देता हूं। मेरी आज्ञा से तुम अपने राज्य को संभालो। मैंने इस राज्य का राजा तुम्हें ही स्थापित किया।
अब मैं अपने आश्रम के लिये प्रस्थान करता हूं तुम्हारा कल्याण हो। ऐसा कहते हुए अगस्त्य ऋषि ने उसे अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दिया और आकर संसार की समस्त पतिव्रता स्त्रियों में तुम्हें प्रथम स्थान प्राप्त हो। राजा चित्रबाहु ने ऋषि अगस्त्य के सम्मुख स्पष्ट कहा है। कृपया कर मुझे यह बताएं कि मैंने पूर्व जन्म में ऐसा कौन सा पुण्य कर्म किया था जिसके प्रभाव से मुझे इस जन्म में अखंड लक्ष्मी, विपुल वैभव, अकंटक राज्य, और पतिव्रता पत्नी प्राप्त हुई है। यह सुनकर ऋषि ने बोला हे राजन तेरे समाधान कर दीजिये। राजा के अनुनय करने पर अगस्त्यऋषि कुछ देर के लिये समाधी लगाकर राजा से बोले हे राजन में तेरी के पूर्व जन्म का हाल जानने की चेष्टा में लगे रहे। फिर समाधी त्यागकर राजा से बोले हे राजन में तेरी इच्छा के अनुसार तेरे पूर्व जन्म का इतिहास कहता हूं। तू पूर्व जन्म में चमत्कारपुर नाम के नगर का वासी था तेरा नाम मणिग्रीव था। जाति से शूद्र था कर्म से अत्यंत दुराचारी था हमेशा, अनेक जीवों की हत्या करना अनेक स्त्रियों का सतीत्व नष्ट करना किसी से द्रव्य आदि लेकर वापस न करना शिष्टाचार न रखना आदि सभी अवगुण थे। और यही तुम्हारी पत्नी चंद्रकला पूर्व जन्म में भी पत्नी थी। मणिग्रीव में जैसे अवगुण थे। उससे विपरीत पति में सभी सद्गुण थे। वह मन कर्म वचन से रातदिन पति की सेवा में लगी रहती। धैर्य धारण करके संकट के समय भी अपने धर्म का पालन करती।
पति के दुष्ट आचरण देखकर भी वह उसको देवता ही समझती और उसको अनेक प्रकार से समझाती। जो पति को अच्छा लगता वही वह आज्ञा का पालन करती। परंतु पति के समझाने का मणिग्रीव पर कोई प्रभाव नहीं होता था। वह निरंतर दुराचरण करता रहता था उसकी दुष्टता इतनी बढ़ गई थी कि समस्त ग्रामवासी और जाति बिरादरी वाले सभी उससे परेशान थे। आखिरकार राजा ने परेशान होकर सभी लोगों द्वारा मणिग्रीव की संपत्ति जब्त कर उसको नगर से बाहर निकाल दिया, राजा की जब्ती के बाद जो कुछ घर आदि सामग्री बची थी उसपर जातिबिरादरी वालों ने अपना अधिकार कर लिया। सभी लोग
उसका तिरस्कार करने लगे। उसका मुख देखना भी लोगों को पसंद नहीं था। इस प्रकार जब सभी तरह से यह मणिग्रीव तिरस्कार हो गया तब ऐसी अवस्था में भी पति उसके साथ पर्वत आचरण करते हुए सेवा में लगी रही थी। आखिर उधर पोषण का कोई मार्ग मणिग्रीव को नहीं दिखाई दिया तब वह जंगल में कंदमूल फलों के द्वारा तथा छोटे छोटे पशु-पक्षियों को मारकर अपना और पति का उधर पोषण करने लगा। इस प्रकार जंगल में रहते हुए बहुत समय बीत गया। एक दिन पशु-पक्षी के शिकार के निमित्त समीप ही छोर जंगल था, वहां उससे प्रवण किया धनुष बाण हाथ में लेकर शिकार ढूंढता हुआ जंगल के मध्य में पहुंचा।
उसी समय उग्रदेव नाम के एक तपस्वी उसी जंगल से प्रयाग की ओर जा रहे थे। परंतु रास्ता भटक जाने से उसी जंगल में बार-बार घूमते रहने से काफी थक गए दोपहर दिन बीत गया। भूख प्यास से तृषित होकर बेहोश होकर बीच जंगल में गिर पड़े। अकस्मात मणिग्रीव शिकार की तलाश में घूमता हुआ उसी जगह पहुंचा ऋषि को बेहोश देखकर मणिग्रीव को दया आ गई उसने ऋषि को उठाकर धीरे धीरे अपनी कुटिया में पहुंचा ऋषि को आंगन में लिटाकर पति से कमल के पत्ते और पानी मंगाकर दोनों नेत्रों में जल लगाने, कमल के पत्ते उनके मस्तक पर रखना इस प्रकार के उपचार कुछ देर तक करते रहने से वे उग्रदेव ऋषि की चेतनता वापस आई। उन्होंने आंखें खोलकर चारों तरफ देखकर आश्चर्य करने लगे कि मैं यह भयंकर जंगल में था यहां कैसे आ गया। इस प्रकार मन में सोचते हुए, उठकर बैठ गए। उनके बैठते ही मणिग्रीव हाथ जोड़कर कहने लगा हे ऋषिवर अब आप स्वस्थ हो गए हैं कृपा करके शीतलताजल में स्नान करिए, नित्यकर्म से निवृत्त होकर फलाहार करें, शुद्ध शीतल जल पीकर विश्राम कीजिए। अब आप यहां पर सुरक्षित है।
किसी प्रकार का भय अपने मन में न रखें आपकी रक्षा का भार मेरे ऊपर है। मेरे साथ चलकर सरोवर में स्नान करें ऐसा कहकर मणिग्रीव ने उनका हाथ पकड़ तालाब के किनारे ले गया, वट वृक्ष के नीचे थोड़ी देर विश्राम करके उन्होंने स्नान किया फिर नित्य नैमित्तिक संध्यावंदन करके तालाब का स्वच्छ जल पीकर वट वृक्ष की छाया में आकर बैठ गए। मणिग्रीव स्त्री को आज्ञा देता है कि अपने आश्रम में जो मैंने कंद मूल फल लाकर रखे हैं उनको ले आओ। पति की आज्ञा से पति ने शीघ्र जाकर आश्रम
से पके हुए फल कंद मूल आदि लाकर ऋषि के सामने रख दिया। तब मणिग्रीव उनसे प्रार्थना करता है हे ऋषिवर आपके दर्शन होने से हमारा जीवन सफल हो गया हमारे सभी पाप भस्म हो गए हमारे आश्रम में आने से आश्रम पवित्र हो गया। आप कृपया करके फलों को खाकर हमको कृतार्थ करो। मणिग्रीव के आग्रह को सुनकर ऋषि कहते है कि तुम कौन हो अपना परिचय दो। बिना परिचय के किसी का दिया हुआ कुछ भी नहीं ग्रहण चाहिए ऐसा विद्वानों का मत है। ऋषि के पूछने पर मणिग्रीव कहता है हे ऋषिवर मेरा नाम मणिग्रीव है मैं जाति से शूद्र हूं दुष्ट आचरण के द्वारा मैंने जाति बांधवों ने मेरा परित्याग कर दिया। इसीलिये मैं जंगल में रहता हूं। इससे शांत होने से मनको समाधान हुआ पके आम आदि फलों को खाया फिर से तालाब का जल पिया, सुधा शांत होने से मनको धीरे धीरे दबाने लगा और पूछने लगा हे ऋषिवर आपका आगमन कहां से हुआ आप कहां जा रहे है। ऐसे भयंकर जंगल में जहां बड़े हिंस्र पशु रहते है। कहीं पानी का ठिकाना नहीं है। कैसे आप पहुंच गए।
ऋषि कहते है हे मणिग्रीव मेरा नाम अगस्त है मैं जाति से ब्राह्मण हूं प्रयागराज की यात्रा को जा रहा था यहां जंगल में रास्ता भूल जाने से भटक गया था रास्ता पूछने के लिये कोई दिखता नहीं था। आखिर सही मार्ग की खोज में मध्याह्न तक घूमता हुआ थक गया प्यास से व्याकुल हो गया था। मेरी ऐसी अवस्था हो गई कि अब प्राण निकलने है और मैं मूर्छित हो गया था। मेरे पूर्वजन्म का पुण्य था अद्य अभी शेष थी इसीलिये में तुम्हें मिल गया तुम पति पत्नि दोनों ने मेरी सेवा की मुझे जीवन दान दिया। मैं इस उपकार के बदले तुम दोनों को क्या दू मेरे पास तो आशीर्वाद के सिवा कुछ भी नहीं है। पहले तुम यह बताओ कि तुम दोनों पति पत्नि ऐसे भयंकर जंगल में क्यों रहते हो। अपने दुःख का कारण बताओ। जो संभव है मैं तुम्हारे कुछ दुःख दूर करने में सहायता दे सकूं ऋषि के ऐसा पूछने पर मणिग्रीव ने अपने जीवन की संपूर्ण गाथा ऋषि को सुना दी।
।। जे जे श्री अधिकमास माहात्म्य सार
(१४)
वृहत्नारदीय पद्माधारे चतुर्दशोऽध्यायः समाप्त ।।
।। शुभमभवतु ।।
५७
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
हम से जुड़े रहने के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद