Adhik mass ki Katha 6 adhyaya| अधिक मास की कथा छठा अध्याय
॥ अथ षष्ठोऽध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
श्री व्यासजी अपने श्रोतागणों से तथा सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं कि हे ऋषियों! भगवान नारायण के मुखारबिंद से इतनी कथा सुनकर नारदजी बहुत प्रसन्न हुए तथा हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना करते हैं कि हे महाराज! मुझे राजा दृढ़धन्वा का संपूर्ण इतिहास सुनाइये। नारदजी के वचनों को सुनकर भगवान नारायण कहते हैं कि हे नारद! गंगाजी के किनारे बसा हुआ हैहय नाम का एक प्रदेश था। उस राज्य में महापराक्रमी सात्विक प्रकृति वाला चित्रधर्मा नाम का राजा राज्य करता था। वह अपनी शक्ति और पराक्रम के कारण सारे संसार में प्रसिद्ध था। उस राजा को अपनी रानी द्वारा एक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह पुत्र भी सुंदर शरीर व आकृतिवाला विशाल नेत्रोंवाला सभी गुणों से युक्त था। राजा ने अपने पुत्र का नाम विद्वानों की सम्मति से दृढ़धन्वा रखा। वह पुत्र दिन प्रतिदिन चंद्रकला के समान बढ़ने लगा। बाल्यावस्था व्यतीत होने पर राजा ने पुलह ऋषि के आश्रम में विद्याध्ययन के लिये भेजा। वह बालक अत्यंत प्रखर बुद्धिमान होने से शीघ्र ही राजनीति और चौदह विद्याओं में पारंगत हो गया। उसका संपूर्ण शरीर बल शौर्य से परिपूर्ण होकर युवावस्था में प्रवेश किया।
विद्याध्ययन पूर्ण होने पर गुरु की आज्ञा से राजपुत्र अपने राज्य में आकर पिता के साथ राज्यकार्य में सहयोग देने लगा। राज्य की समस्त प्रजा से नीति और धर्मपूर्वक व्यवहार करने से वह समस्त प्रजाजनों की प्रशंसा का पात्र बन गया। पिता चित्रधर्मा ने पुत्र को सर्वगुण संपन्न देखकर पुस्कर राज्य की राजकन्या जो कि अत्यंत सुंदर सुशील थी उसके साथ पुत्र दृढ़धन्वा का विवाह बड़े उत्सव के साथ संपन्न कर दिया। विवाह के पश्चात राजा दृढ़धन्वा को चार पुत्र और एक कन्या उत्पन्न हुई। उनका क्रमशः नामकरण चित्रवाक, चित्रबाहु, मणिमान, और चित्रकुंडल नाम रखा तथा कन्या का चारुमती नाम रखा। वे सभी बालक अत्यंत सुंदर और शुभलक्षणों से युक्त और सर्वगुण संपन्न थे। राजा चित्रधर्मा ने अपने पुत्र को सर्व संपन्न और प्रजापालन में कुशल देखकर सांसारिक मायामोह से मन को विरक्त करके परंपरा से चल रही नीतिका अनुसरण करना उचित समझा कि अब वृद्धावस्था का समय भगवान की आराधना में लगाकर अपनी आत्मा का उद्धार करना चाहिए।
ऐसा सोचकर पुत्र दृढ़धन्वा को राजतिलक करके राज्य सिंहासन और राज्य का समस्त कार्य सौंपकर पुलह ऋषि के आश्रम में जाकर तपस्या करने लगा। अंतःकरण में भगवान का चिंतन करके कठिन तपस्या प्रारंभ की। निंद्रा त्यागकर निराहार रहकर रातदिन भगवान का स्तवन करते रहने से राजा का शरीर अत्यंत कृश व क्षीण होकर कुछ दिनों में उन्होंने शरीर का त्याग करके उनकी आत्मा मोक्ष को प्राप्त हो गई। ऋषि के आश्रम में पिता की सद्गतिका समाचार सुनकर राजा दृढ़धन्वा को दुःख और हर्ष दोनों हुए। पितृ भक्त होने से राजा ने ब्राह्मणों की आज्ञा से पिता का और्ध्वदैहिक कर्म, श्राद्ध, पिंडदान किया तथा बहुत द्रव्य सुवर्ण, गौ आदि वस्तुओं का दान दिया। जिस याचक की जो इच्छा थी उनकी इच्छानुसार हाथी घोड़ा, पालकी, रथ, पृथ्वी, द्रव्य आदि देकर सबको प्रसन्न किया। नगर में भोज्यन्न करके हजारों ब्राह्मण और लाखों प्रजाजनों को उत्तम भोजन कराके संतुष्ट किया। पिता के समस्त और्ध्वदैहिक कर्म अत्यंत श्रद्धा के सहित संपन्न करके वह राजा दृढ़धन्वा वेद वेदांग में विद्वान धनुर्विद्या में निपुण, क्षमा में पृथ्वी के समान, गंभीरता में सागर के समान, विद्वता में ब्रह्मा के समान, उदारता में भगवान शंकर के सदृश, एक पत्निव्रत धारी शत्रुओं के समूह को पराजित करता हुआ चारों दिशाओं में अपने राज्य का विस्तार करके अखंड चक्रवर्ती राजा बन गया।
सभी राजा उसको अपने राज्य का कर देने लगे। उस राजा दृढ़धन्वा की कीर्ति, जैसे आकाश में शुक्ल पक्ष में चंद्रमा के प्रकाश के समान फैल गई। राज ऐश्वर्य दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा। संसार के सभी सुख राजा को प्राप्त हो गए। एक समय राजा रात्रि में शयनकक्ष में जाकर शयन की स्थिती में बिस्तरपर लेटा हुआ मनमें विचार करने लगा। मेरा यह अतुल वैभव, अखंड चक्रवर्ती राज्य, मुझे कौन से पुण्य से प्राप्त हुआ, मेरा यह भाग्योदय कैसे हुआ। मैंने आजतक न तो तपस्या की न व्रत उपवास किया न किसी प्रकार का दान, पुण्य, यज्ञ, हवनादि कर्म किया। फिर यह अनंत वैभव और सभी सुख कैसे प्राप्त हुए। यही विचार अंतर्मन में बारबार उत्पन्न होने से राजा को रात भर नींद नहीं आई।
ब्रह्म मुहूर्त में प्रातः एक घटीरात्रि शेष रहने पर शय्या छोड़ राजा उठा नित्य कर्मों से निपटकर उसने अनेक प्रकार के दान ब्राह्मणों और याचकों को देकर भगवान की वंदना करके चतुरंगिनी सेनासाथ में लेकर घोड़े पर सवार होकर भयानक जंगल में शिकार करने के लिये चल दिया। जंगल में सेना की हलचल को सुनकर जंगली जानवर व्याघ्र, हरिण, आदि इधर से उधर भागने लगे राजा भी तीक्ष्णबाण और अचूक निशानों से अनेक पशुओं का शिकार करते हुए उससे एक अत्यंत पुष्ट शरीर वाला मृग देखकर उसके पीछे घोड़ा दौड़ाते हुए एक तीक्ष्ण बाण उसके ऊपर चला दिया बाण तो मृग के शरीर में घुस गया परंतु फिर भी वह मृग, भागता हुआ घोर जंगल में में छिप गया। राजा उसका पीछा रक्त की धार के आधार पर करता हुआ जंगल में मृग को ढूंढने लगा परंतु छिप जाने से राजा को मृग नहीं मिला राजा उसकी तलाश में बहुत दूर निकल गया काफी देर तक इधर उधर घोड़ा दौड़ाने पर भी वह मृग नहीं मिला। राजा भी थककर प्यास के लगने से व्याकुल होकर मध्यान्ह के समय सूर्य के तापसे पीड़ित हो गया। वहां न तो राजा का कोई सेवक था जो कि राजा के लिये पानी आदि की व्यवस्था करके राजा को शांति देता। ऐसी अवस्था में राजा भटकता हुआ ऐसे स्थान पर पहुंच गया, कि उसे अत्यंत सुंदर स्वच्छ जल से भरा हुआ कमल पुष्पों से शोभित ऐसा तालाब दिखाई दिया उस तालाब को देखकर राजा ने अत्यंत प्रसन्न होकर तालाब के जल को पीकर घोड़े को भी जल पिलाया। पास ही विशाल वट वृक्ष और उसकी शीतल छाया को देखकर थोड़ी देर विश्राम करने के उद्देश्य से घोड़े को वृक्ष की जड़ से बांधकर वृक्ष की शीतल छाया में राजा विश्राम कर रहा था उसी डाली के ऊपर एक बड़ी आकृति का तोता आकर बैठा और राजा को संबोधित करके कहने लगा कि हे राजन
श्लोक : विद्यामानतुलं सुखमालोक्ययतीव भूतले।
न चिंतयसि तत्वं त्वं तत्कथं परमेष्यसि ॥
अर्थ : पृथ्वी पर ऐसा अनुपम सुख प्राप्त हुआ। परंतु इसके तत्व को आंतरिक मन से विचार करके भवसागर से कैसे पार होगे। इस प्रकार बारबार इस श्लोक को सुनकर राजा अपने मन में विचार करने लगा। यह तोता मनुष्य की वाणी में मुझे क्या शिक्षा दे रहा है। यह राजा की समझ में नहीं आ रहा था। कभी विचार करता कि जैसे राजा परीक्षित भवसागर में डूब रहा था। तब उसके उद्धार के लिये व्यास पुत्र श्री शुकदेव ऋषि ने श्री मद्भागवद् का ज्ञान देकर उद्धार किया था उसी प्रकार वही शुकदेव तोते का रूपधर कहीं मेरे उद्धार के लिये तो नहीं आए। राजा के मन में अनेक विचार उत्पन्न हो रहे थे। परंतु श्लोक का अर्थ समझ में न आने से राजा बड़ा मानसिक चिंता से घिरा हुआ था। ऐसे ही समय राजा की चतुरंगिणी सेना वहां पहुंच गई। तोता भी वहां से उड़कर अदृश्य हो गया। राजा भी अपनी सेना के साथ अपने राज भवन में आ गया। परंतु राजा के मन मस्तिष्क में रातदिन तोते का वही श्लोक गूंजता रहा। उससे राजा की ऐसी अवस्था हो गई कि राजा न तो किसी से बोलता था न किसी की बात का कोई जवाब देता था।
खाना पीना निद्रा सबका परित्याग करके एकांत में बैठा रहता था, राजा की ऐसी विषम स्थिती को देखकर उसकी पटरानी को बहुत चिंता उत्पन्न हो गई। एक दिन रानी साहस करके राजा के समीप पहुंचकर हाथ जोड़कर विनम्रता पूर्वक कहने लगी। हे प्राणनाथ आप इतने खिन्न क्यों हैं? मुझसे क्या भूल हो गई, जो आपने खानपान का परित्याग करके मौन धारण कर लिया। आपकी अवस्था देखकर मुझे अत्यंत दारुण दुःख हो रहा है। इसलिये हे प्राणनाथ मेरे ऊपर दया करके आप भोजन करिए, प्रसन्न होकर कुछ बात करिए। बारबार रानी के आग्रह करने पर भी राजा पर कोई असर न होकर राजा उसी प्रकार निश्चल बैठा रहा राजा के मन में तोते का कहा हुआ श्लोक ही विचार का कारण बना रहा।
पत्नी की ऐसी अवस्था देखकर रानी बहुत दुःखित होकर मछली की तरह तड़पने लगी। उसके कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। कुछ दिन ऐसे ही व्यतीत हो गए। ऐसे ही समय अचानक रामायण ग्रंथ के रचयिता वाल्मीकि ऋषि भ्रमण करते हुए उस राजा के राजमहल में पधारे। दूतों के द्वारा ऋषि का आगमन सुनकर राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे संतों के पैर जल्दी मुख्यद्वार पर आकर ऋषि के चरणों में नमस्कार करके आदरपूर्वक महल के भीतर ले जाकर उत्तम सिंहासन पर बैठाकर चरण प्रक्षालन करके अर्घ्य देकर ऋषि का पूजन किया और कहने लगा। हे ऋषिवर आज मैं अपने आप को बड़ा भाग्यवान समझता हूं। आज मेरा जन्म सफल हो गया। सारे संसार को अपने तपोबल से पवित्र करनेवाले आप जैसे महान ऋषि के आगमन से मैं धन्य हो गया। राजा के ऐसे प्रार्थनीय वचनों को सुनकर ऋषि प्रसन्न होकर कहते हैं कि हे राजन मैं तेरे आदर सत्कार से बहुत प्रसन्न हूं। संसार में जैसी तेरी प्रसिद्धि थी वैसा ही तू है।
परंतु हे राजन मैं तुझे अत्यंत चिंतातुर देख रहा हूं। मुझे अपनी चिंता का कारण बता मैं तेरी समस्त चिंताओं को दूर करूंगा। ऋषि के प्रश्न करने पर राजा ने कहा हे ऋषिवर आपके चरणों की कृपा से मुझे सभी सुख प्राप्त हैं। किसी प्रकार की कमी नहीं है। परंतु मेरे मन में एक शंका उत्पन्न हो गई है। जो मेरे हृदय में शूल की तरह चुभती रहती है। आप सिर्फ उस शंका का निवारण कर दीजिये बड़ी कृपा होगी। हे ऋषिवर कुछ दिनों पहले मैं शिकार करने गया था। घने जंगल में घूमता हुआ थक गया था। विश्रांति के लिये मैं एक बड़े वट वृक्ष के लिये लेट गया। थोड़ी ही देर में हिल्स डाली के नीचे मैं लेटा हुआ था उसी डालपर एक सुंदर और बड़ी आकृतिवाला तोता आकर बैठ गया। और बारबार यह श्लोक मनुष्य की वाणी में मुझे संबोधित करके कहने लगा। हे राजन -
श्लोक : विद्यामानतुलं सुखमालोक्ययतीव भूतले।
न चिंतयसि तत्वं त्वं तत्कथं परमेष्यसि ॥
उस तोते के द्वारा यह सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। परंतु उसका अर्थ न समझने के कारण मेरे मनमें उसी विषय में रातदिन चिंता व्याप्त है। आज मेरे पास आपकी कृपा से इतना बड़ा राज्य है। उत्तम चार पुत्र और एक कन्या है। सुंदर और पतिव्रता पत्नि है। हाथी, घोड़ा, रत्न आदि अतुल संपत्ति है। ये सब मुझे कौन से पुण्य के प्रभाव से प्राप्त हुआ। और वह तोता मुझे क्या उपदेश दे रहा था। इन सब विषयों का विचार करके मुझे विस्तार पूर्वक समझाइये। जिससे मेरे मन की शंका दूर हो जाय। राजा के वचनोंको सुनकर वाल्मीकि ऋषि ने प्राणायाम करके अपने आपको ध्यानस्थ किया और एक घटीपर्यंत ध्यानस्थ रहकर राजा के पूर्व जन्म के वृत्तांत का अवलोकन करके राजा से कहने लगे कि हे राजन तेरे सब प्रश्नों का उत्तर तेरे पूर्व जन्म से संबंधित है। इसलिये मैं तेरे पूर्व जन्म का वृत्तांत कहता हूं ध्यान लगाकर सुन। तू पूर्व जन्म में द्रविड़ देश में उत्पन्न हुआ था। जाति से ब्राह्मण और सुदेव तेरा नाम था। ताम्रपर्णी नदी के किनारे तपोवन में कुटिया बनाकर रहता था।
सत्य बोलना, धर्म में तत्पर रहकर ब्राह्मण के बालकों को वेद की शिक्षा देना यही तुम्हारा दैनिक कर्म था सदृण संपन्न पति परायण गौतमी नाम की तुम्हारी पत्नि थी। वह रातदिन पति की आज्ञा का अनुसरण करती और जैसे पार्वती शंकरजी से प्रेम करती है उसी प्रकार का प्रेम उसका अपने पति के प्रति था। इस प्रकार वह ब्राह्मण सुदेव अपने गार्हस्थ्य धर्म का पालन करता हुआ जीवन व्यतीत कर रहा था। अनेक दिन व्यतीत होने पर उन्हें कोई संतति उत्पन्न न होने से ब्राह्मण मन में दुःखित रहने लगा। एक समय ब्राह्मण अपने आश्रम में विश्राम कर रहा था और पत्नि उसकी सेवा में लगी हुई पैर दबा रही थी तब ब्राह्मण पत्नि से बोला। हे प्रिये संसार में पुत्र सुख के समान कोई सुख नहीं होता।
व्रत, तप, दान, इनका पुण्य तो मनुष्य को परलोक में सुख देता है। परंतु एक सुपुत्र इसलोक में महान सुखदाई होता है। हमको वह भी नहीं प्राप्त हो सका। मुझे तो यह जीवन निष्फल सा ही प्रतीत हो रहा है। मेरे पुत्र को गोद में नहीं खिलाया वेदाध्ययन नहीं कराया, मैं कितना भाग्यहीन हूं। मैं पितृऋण से मुक्त कैसे हो सकूंगा। मेरा यह जीवन व्यर्थ ही व्यतीत हो रहा है। ऐसे जीवन से तो मृत्यु हो जाय यही मैं चाहता हूं। पति के ऐसे दुःखमय वचनों को सुनकर भार्या गौतमी भी अपने मन में दुःखित होकर कहती है, हे प्राणनाथ ऐसे अपशब्द मत बोलिये। आप इतने ज्ञानी धर्म के तत्व को जानने वाले होकर सांसारिक मायामोह में क्यों लिप्त होना चाहते है। हे स्वामी मनुष्य के भाग्य में जो सुख नहीं है।
वह पुत्र प्राप्ति के बाद भी नहीं मिल सकता बल्कि दुःख बढ़ सकता है। पूर्व का इतिहास साक्षी है। राजा अंग भी अपने पुत्र के द्वारा ही अत्यंत दुखित होकर रात्रि में जंगल की ओर भाग गए। ऐसे ही संसार में अनेक प्रसंग घटित हुए हैं। इसलिये पुत्र के द्वारा ही सुख घटित होगा ऐसा सोचना व्यर्थ है। यदि पुत्र प्राप्ति की इच्छा ही है। तो सुपुत्र की प्राप्ति के लिये मनोवांछित फलदेने वाले ऐसे श्री विष्णु की आराधना, उपासना करना चाहिए। पत्नि के वचनों को सुनकर ब्राह्मण के मन को कुछ समाधान हुआ। वह निश्चय करके ताम्रपर्णी नदी में स्नानकरके पत्नि के साथ तपस्या में लीन हो गया। अन्न का परित्याग करके सूखे पत्ते खाकर जलपीकर रहने लगा कुछ दिनों बाद धारादित निराहार एकादिन आहार इस प्रकार कुछ दिन के बाद बिल्कुल निराहार रहकर तपस्या करता था। पत्नि भी पति की सेवा करती हुई सहयोग देती थी इस प्रकार तपस्या करते हुए चार हजार वर्ष व्यतीत हो गए। उसकी तपस्या को देखकर तीनों लोक के प्राणी थर्राने लगे। भगवान विष्णु का सिंहासन हिलने लगा। आखिर अपने भक्त की मनोकामना के लिये भगवान विष्णु को वहां प्रगट होना पड़ा श्यामल शरीर चतुर्भुजी स्वरूप प्रसन्न मुद्रावाले आराध्यदेव भगवान विष्णु को अपने प्रत्यक्ष देखकर ब्राह्मण अति प्रसन्न होकर साष्टांग दंडवत नमस्कार करता हुआ प्रार्थना करता है हे महाप्रभु दीन वत्सल जगद् का उद्धार करने वाले शरणागत की रक्षा करने वाले मैं आपकी शरण में हूं, आप मेरी रक्षा करिए मैं दुःख रूपी सागर में डूब रहा हूं। मेरे दुःख को दूर करिए। ऐसा कहता हुआ स्त्री सहित ब्राह्मण हाथ जोड़कर भगवान के सामने खड़ा रहा।
जै जै श्री अधिकमास महात्म्य सार वृहत्प्रदीय
पद्माधारे षष्ठोऽध्यायः समाप्त ॥
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