Adhik maas ki Katha 2 adhyaya| अधिक मास की कथा दूसरा अध्याय
व्यास जी कहते हैं -
प्रथम अध्याय के कथानुसार धर्मराज ने श्री कृष्णजी से प्रश्न किया, उनके प्रश्नोत्तर में रुक्मिणी रमण भगवान कृष्ण कहते हैं। हे धर्मराज तुम्हारे प्रश्न का उत्तर अत्यंत गुप्त है। जिसको कि आज तक ऋषियों ने मेरे स्त्री, पुत्र, बंधु बांधव भी नहीं प्राप्त कर सके। परंतु तुम मेरे परम भक्त हो, इसलिये मैं तुमसे इस महान पुण्य और मोक्ष दायक प्रसंग को प्रकट करता हूँ।
हे धर्मराज, संसार में कल्प, काष्ठ, लव, घटी, प्रहर रात्रि दिन प्रदोष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर युग, एवं कुंआ, बावली, झरना, तालब, नदियां, समुद्र, एवं लता, वृक्ष वनस्पति, जड़ें वन, उपवन, ग्राम, पर्वत, शहर, देवताओं के निवास और धाम इन सबका कोई न कोई देवता स्वामी है। और वे सब अपने - अपने निश्चित दिन और समय पर पूजित होते हैं। तथा जन समुदाय के द्वारा हर्ष उल्लास के द्वारा पूजन करने पर उत्तम फल देते हैं। अपने- अपने गुण और अधिकार के कारण वे पूजित होते हैं। तथा इनको अपने स्वामी का आश्रय प्राप्त होने से वे सब सौभाग्य-शाली और संसार में प्रशंसनीय माने जाते हैं।
परंतु हे धर्मराज - इन सबके मध्य एक अधिक महीना ऐसा उत्पन्न हुआ कि जिसका समय आने पर लोग अत्यंत निंदा करते तथा निंदनीय शब्दों का प्रयोग करते हुए उसको मलमास कहते एवं अधिकमास में समस्त शुभ कार्य करना छोड़ देते। क्योंकि यह महीना सूर्य की संक्रांतिहीन होता अर्थात इस महिने में सूर्य की संक्रांति न होने से यज्ञ, उत्सव, विवाह, प्रतिष्ठा, वास्तुकर्म अथवा किसी भी शुभ कार्य को नहीं करते और सभी निंदा करते। इस प्रकार सांसारिक पुरुषों की इसके प्रति अशुभ भावना थी। किसी भी शुभकार्य में वर्जित और लोगों के मन में अपने प्रति हीन व निरादर व्यवहार को देखकर इस अधिकमास के मन में अत्यंत दुःख हुआ। चिंताग्रस्त- और दुःख व्यतीत करते हुए अनेक समय बीत जाने पर जब मानसिक क्लेश असह्य हो गया तो वह विचार करने लगा कि संसार में निंदित होकर जीने से तो अपना नाम ही खत्म कर देना अच्छा है, यदि जीवित रहना है तो यश प्राप्ति के लिये किसी देवता का आश्रय [लेना आवश्यक है।]
प्राप्त करना आवश्यक है। इसके लिये संसार प्रसिद्ध शरणागत की रक्षा करने वाले भगवान विष्णु की शरण में जाकर उनसे प्रार्थना करना ही उत्तम रहेगा। ऐसा विचार निश्चय होते ही अधिक मास शीघ्र ही (वैकुंठ लोक) जहां कि शांत स्वरूप समस्त प्राणियों को जीवनदान देने वाले शरण में आए हुए की रक्षा करने वाले भगवान विष्णु हमेशा विराजमान रहते हैं।
ऐसे वैकुंठलोक में पहुंचकर जहां भगवान का निवास मंदिर है। तथा भगवान विष्णु रत्न जड़ित सिंहासन पर आनंद मग्न विराजमान हैं भगवान के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हुआ। उस समय अधिक मास भय और दुःख से कांप रहा था। तथा उसके नेत्रों से आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी। ऐसी अवस्था में थोड़ी देर खड़ा रहने के बाद अधिकमास अत्यंत कातर और दयनीय वाणी से भगवान से कहता है। हे जगन्नाथ, हे देवताओं के स्वामी, हे शरणागत वत्सल, हे दया के सागर आप मेरी ऐसी हालत देखकर भी चुप क्यों बैठे हैं मेरी रक्षा क्यों नहीं करते। मैं निराश्रित हूँ मेरा कोई स्वामी नहीं है। इसीलिये सांसारिक लोगों ने मेरा नाम (मलमास), रख दिया है। मेरी निंदा करते हैं। मेरा मास आने पर अशुभ कहकर समस्त शुभ कार्यों का त्याग कर देते हैं। हे महाप्रभु ऐसी अवस्था में मैं जीवित नहीं रहना चाहता। आप मुझे अपनी शरण में लेकर मेरी रक्षा करें अथवा इस संसार से मेरा नाम समाप्त कर दें।
हे दीनानाथ, आप तो दया के सागर हैं। गजेंद्र की करुण पुकार को सुनकर आप शीघ्र ही रक्षा करने के लिये दौड़ पड़े थे। अधिक मास के अत्यंत दयनीय वचनों को सुनकर भगवान विष्णु उसपर कृपा दृष्टि करते हुए कहते हैं। हे वत्स तू मेरी शरण में आ गया है अब तू किसी भी प्रकार का दुःख मत कर जो भी मेरी शरण में आ जाता है, मैं उसकी अवश्य रक्षा करता हूँ। मेरा यह वैकुंठ स्थान केवल आनंदमय है। यहां दुःख शोक, भय, मृत्यु कुछ भी नहीं है।
भगवान के ऐसे वचनों को सुनकर अधिक मास के सब दुःख दूर हो गये वह स्वस्थचित और आनंदित हो गया, तथा प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना करने लगा। हे सर्वज्ञ, ब्रह्माण्ड नायक, सबमें विराजमान, सारे संसार का पालन करने वाले जगत् के स्वामी आपसे संसार की कोई बात छिपी हुई नहीं है। आप अंतर्यामी हैं। फिर भी मैं आपसे अपने मन की व्यथा कहता हूँ। संसार में कला, घटी, पल, मूहूर्त दिन, रात्रि, मास, वर्ष, पक्ष, ऋतु, अयन, संवत्सर इस सबका कोई न कोई देवता स्वामी होने से समय समय पर लोगों द्वारा पूजनीय और शुभ कर्म के अधिकारी माने जाते हैं तथा अपने स्वामी [की कृपा से लोगों को आशीर्वाद देकर फलीभूत होकर जन समुदाय में यश और प्रशंसा प्राप्त करते हैं।]
के प्रभाव से लोगों को आशीर्वाद देकर फलीभूत होकर जन समुदाय में यश और प्रशंसा प्राप्त करते हैं। परंतु मैं निराश्रित और मेरा कोई स्वामी न होने से लोग मेरी निंदा करते हैं।
अशुभ और मलमास कहकर समस्त शुभ कार्यों में मेरा परित्याग करते हैं। हे महाप्रभु इसी कारण मेरी ऐसी स्थिती हुई मेरे दुःख का कोई पारवार नहीं होने से मैंने अपने मन में निश्चित कर लिया था कि ऐसा जीवित रहने से मरना ही अच्छा है। यही सोचकर मैं आपकी शरण में आया हूँ कि आप तो भगवान की प्रार्थना करता हुआ मूर्छित होकर गिर पड़ा। इसके गिरते ही भगवान की सभा में विराजमान सभी सदस्य आश्चर्य चकित रह गए कि यहां वैकुंठ धाम में कभी दुःख और शोक व्याप्त नहीं है। फिर भी यह कितना दुःखित जीव है कि यहां आनेपर भी इसका दुःख दूर नहीं हो सका, भगवान ने गरूड़जी को संकेत किया, भगवान की आज्ञा से गरूड़जी अपने पंखों से अधिकमास को हवा करके होश में लाने की कोशिश करने लगे। होश में आते ही भगवान उससे कहते हैं।
हे वत्स, उठ तेरा कल्याण होगा। तेरे समस्त दुःखों का अंत निश्चय होग। तू मेरे साथ गोलोकाधिपति भगवान पुरुषोत्तम के पास चल, वहां गोलोक में भगवान पुरुषोत्तम विराजमान हैं। वे पर ब्रह्म परमात्मा समस्त देवताओं के देवता हैं। वे दो भुजावाले पीतांबरधारी, मुरली धारण करनेवाले, भगवान पुरुषोत्तम अखंड ब्रह्माण्ड नायक हैं। उनकी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। वे चत अचल के स्वामी शरणागत वत्सल, सबके दुःखों को क्षण में नष्ट करने वाले हैं हम सभी देवता हमेशा उनकी वंदना किया करते हैं। वे संसार को उत्पन्न करने वाले, पालन करने वाले और प्रलयकर्ता भी वही हैं। ऐसा कहकर भगवान विष्णु गरूड़जी को गोलोक चलने का संकेत करते हुए अधिकमास को अपने साथ गरूड़ पर बैठाकर गोलोक में पहुंचते हैं।
भगवान कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि हे धर्मराज मैं तुमको गोलोक का वर्णन सुनाता हूँ एकाग्रचित होकर सुनो, गोलोक करोड़ों सूर्य से भी ज्यादा तेजमान है। ज्योतिस्वरूप, अनंत विशाल और स्वेच्छामय है। वह ब्रह्मलोक, विष्णुलोक, शिवलोक के ऊपर है। तीन कोटि योजन का उसका विस्तार है। वह गोल आकृति वाला है। उसमें समस्त भूमि रत्न से जड़ित है। वह स्थान बड़े बड़े महात्मा और ऋषियों को भी अप्राप्य है। भगवान पुरुषोत्तम अपने योगबल से उसको अंतरिक्ष में धारण किये हुए हैं। उसमें असंख्य मंदिर हैं गोलोक के नीचे दक्षिणी ओर सुंदर वैकुंठ लोक है। वह एक कोटियोजन लंबा [और चौड़ा है।]
और चौड़ा है। वह भगवान विष्णु का लोक है। उस लोक में भगवान विष्णु को भक्ति और उपासना करने वाले ऋषि, मुनी, तपस्वी, व सांसारिक गृहस्थ मृत्यु के बाद अपने पुण्य के प्रभाव से वैकुंठ लोक को जाते हैं। वहां चतुर्भुजी स्वरूप पीतांबर धारण करके तेजस्वी स्वरूप होकर अपने पुण्य को कर्म के अनुसार उतने समय तक वैकुंठ सुख भोगकर फिर मनुष्य योनि में जन्म लेते हैं। गोलोक के नीचे बाएं बाजू में शिवलोक है वह एक कोटियोजन लंबा चौड़ा है। वहां भगवान शंकर पार्वती समेत विराजमान रहते हैं। वे भगवान शंकर स्फटिक मणि के समान सुंदर स्वरूप चार भुजावाले सारे शरीर में भस्म का लेपन और नाग का यज्ञोपवीत धारण व्याघ्राम्बर पहने हुए जटा में गंगाजी तथा अर्धचंद्र धारण किए हुए त्रिनेत्र वाले, पार्वती सहित विराजमान रहते हैं। शिवलोक में मृत्यु के बाद ऋषि, मुनि, तपस्वी शंकरजी की उपासना करने वाले सांसारिक पुरुष और स्त्रियां अपने पुण्यकर्म के प्रभाव से निश्चित समय तक आनंद पूर्वक रहकर समय समाप्त होने पर फिर पृथ्वीपर जन्म लेकर शुभकर्म और शंकरजी की आराधना करते हुए जीवन व्यतीत करते हैं।
हे धर्मराज, गोलोक में अनंत ज्योति स्वरूप भगवान पुरुषोत्तम का जो स्वरूप है वह नीले कमल के समान सर्वांग श्यामवर्ण नया उत्पन्न कमल पुष्प के समान कोमल, करोड़ों शरद पूर्णिमा के चंद्र के समान देदीप्यमान, प्रसन्न मुख मद्रावाले धनुष के समान नेत्र और भृकुटी वाले, पीतांबर धारण किए हुए कानों में कुंडल, गले में वैजयंती माला पहने हुए, वनमाला कौस्तुभ माला धारण किए हुए, कस्तूरी का तिलक लगाए हुए, रत्न जड़ित सिंहासन पर विराजमान, हाथों में मुरली धारण किए हुए, अत्यंत सुंदर, करोड़ों कामदेव के समान सुंदर आकर्षित युवा किशोर अवस्था वाले सिंहासन पर विराजमान रहते हैं। ऐसे भगवान पुरुषोत्तम का दर्शन बड़े बड़े ऋषि योगी तपस्वी और यज्ञ करने वालों को भी दुर्लभ होता है। वे ही परब्रह्म परमात्मा हैं सारे संसार का आधार और सबके पालनहार उन्हीं की इच्छा से संसार की उत्पत्ति और प्रलय होता है। वे आदि, मध्य और अंत से रहित हैं। विश्व के पालनहार, अनंतकोटि ब्रह्माण्ड नायक और मोक्षस्वरूप है निर्गुण, निर्विकार, सच्चिदानंद हैं। वे ही जीवात्मा को मोक्ष देने वाले हैं। उनकी उपासना करने वाले मृत्यु के बाद मोक्ष को प्राप्त करके उन्हीं में लीन होकर हमेशा के लिए जन्म मृत्यु और चौरासी लक्ष योनि में भ्रमण करने का दुःख जीवात्मा का हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
हे धर्मराज, अधिकमास को साथ में लिये हुए भगवान विष्णु ने गोलोक में प्रवेश किया। दूर से ही भगवान पुरुषोत्तम का सुंदर मंदिर दिखाई दे रहा था। उसके तेज से अधिकमासकी आंखें चकाचौंध [हो रही थी।]
हो रही थी। वह मंदिर मणि के स्तंभो से बना हुआ बीच सिंहासन पर भगवान पुरुषोत्तम विराजमान थे अपने पीछे पीछे अधिकमास को साथ लेकर मंदगति से भगवान विष्णु वहां पहुंचे। भगवान विष्णु को देखकर द्वारपाल ने उठकर उनका अभिवादन किया प्रेम से उनके चरणों में नमस्कार किया भगवान विष्णुने अधिकमास को साथ में लेकर मंदिर में प्रवेश किया मंदिर के भीतर किशोर अवस्था वाले दिव्य स्वरूप भगवान पुरुषोत्तम रत्न जड़ित सिंहासन पर आनंद मुद्रा में विराजमान थे। उनके सामने पहुंचकर भगवान विष्णु हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे समस्त पार्षद गणों ने उठकर भगवान विष्णु का अभिवादन किया। तथा भगवान पुरुषोत्तम ने अपने सिंहासन के समीप सिंहासन पर बैठने का आग्रह करने पर भगवान विष्णु उसपर विराजमान हो गए विष्णु के पीछे अधिकमास, अश्रु पूरित नेत्रों से थरथर कांपता हुआ दोनों हाथ जोड़कर खड़ा रहा। इस प्रकार भगवान नारायण ने नारदमुनि से सूतजीने शौनकादि ऋषियों से तथा भगवान कृष्ण ने धर्मराज से कहा।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार बृहन्नारदीय पद्याधार पुराण का द्वितीय ऽ अध्यायः समाप्त ॥ (२)
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