Adhik mass ki Katha 24 adhyaya | अधिक मास की कथा 24वा अध्याय
॥ श्री गणाधिपतये नमः ॥
श्री भगवान नारायण नारदजी से सूतजी पौराणिक ऋषियों से कहते हैं। हे ऋषियों! लक्ष्मीजी अब आप कृपाकर बतायें कि अधिक मास में दान करने से किस फल की प्राप्ति होती है। भगवान विष्णु कहते हैं, हे लक्ष्मी! जो मनुष्य अधिक मास में अपनी शक्ति के अनुसार सुपात्र ब्राह्मण को सुवर्ण का दान करते हैं। उनकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। दुःख दारिद्रय की बाधाएं आजीवन पर्यंत नहीं होती। गौदान करने वाले को मृत्यु के उपरांत अनेक कल्पों तक ब्रह्मलोक में निवास करने का फल प्राप्त होता है। जो चांदी का दान करते हैं वे चांदी का दान करके पितृलोक में निवास करते रहे अपने पितरों का उद्धार करते हैं। तंबा या तांबे का पात्र देने से पार्वती सहित भगवान शंकर प्रसन्न होते हैं। उनकी प्रसन्नता से मनुष्य सर्वत्र आनंद और सुख भोगता है। रत्नदान करने से दूसरे जन्म में राजा के घर में जन्म होता है।
मोती का दान करने से मुक्ति की प्राप्ति होती है। कंबल का दान करने से मनुष्य के अनेक जन्मों का पाप नष्ट होता है। सूती वस्त्रों का दान मनुष्य को चंद्रलोक का फल देता है। अत्र का दान महादान कहलाता है। अत्र वज्रल का दान अक्षय पुण्य को देता है। जूता चप्पल या पैरों में पहनने योग्य वस्तु का दान मृत्यु के बाद यमदूतों की यातना से मुक्ति देता है। घी और घी से भरा हुआ पात्र का दान सूर्यलोक का पुण्य देता है। तिलपात्र का दान रुद्रलोक का पुण्य देता है।
हे लक्ष्मी! पुरुषोत्तम मास में द्वादशी के दिन पुरुषोत्तम भगवान और शंकरजी की पूजा करके सुपात्र ब्राह्मण को भी पूजा करके अपनी शक्ति के अनुसार पहले कहे गए वस्तुओं का दान श्रद्धा के सहित संकल्प पूर्वक करना चाहिए। और अमावस को उद्यापन कर्म विद्वान ब्राह्मण के द्वारा विधान पूर्वक कराना चाहिए। शुद्ध घी इलायची शक्कर आदि पदार्थों से बना हुआ मालपुआ, अनरसा या लड्डू तैंतीस की संख्या में कांसे का पात्र या अपनी शक्ति के अनुसार तांबा या पीतल के पात्र में रखकर सुपात्र ब्राह्मण को दान देना चाहिए। इस दान से ही पुरुषोत्तम मास के समस्त नियम व्रत आदि जो भी धारण किए हैं उनकी पूर्ति होती है। इस कर्म के द्वारा दान देकर मनुष्य निर्विघ्नता और अनेक सुखों को प्राप्त करता है। उसकी समस्त मनोकामनाएं परिपूर्ण होती हैं। जन्मजयांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं।
इसलिए मनुष्य को पुरुषोत्तम मास में अपनी शारीरिक शक्ति के अनुसार कोई भी नियम धारण करके श्रद्धापूर्वक द्रव्य का मोह लोभ त्याग कर दान कर्म अवश्य करना चाहिए क्योंकि मनुष्य की आयु फटे दूध के समान दिन प्रतिदिन कम होते जाती है। कब आयु समाप्त होकर मृत्यु हो जाए इसका कोई निश्चित नहीं है। आगे आने वाला पुरुषोत्तम मास देख सकें या नहीं यह भी निश्चित नहीं है। गंगा, गया, कांची, पुष्कर, रेवा, मही, शिवा, यमुना, चंद्रभागा, गोदावरी, कुरुक्षेत्र ये सब पवित्र तीर्थ पुण्यदायक हैं फिर भी पुरुषोत्तम मास के पुण्य की बराबरी नहीं कर सकते।
जैसे उत्तम भूमि में बोया हुआ बीज असंख्य बीज उत्पन्न करता है। गुरुबल की एकलता असंख्य पत्ते उत्पन्न करती है। दूर्वा का एक अंकुर शीघ्र ही असंख्य अंकुरों में उत्पन्न होती है। उसी प्रकार पुरुषोत्तम मास का किंचित भी नियम व्रत आदि कर्म अनंत पुण्य देने वाला होता है। इसलिये मनुष्य को पुरुषोत्तम मास में यथा शक्ति कर्म अवश्य करना चाहिए। है तुमसे पुरातन का एक इतिहास कहता हूं। एक समय ऋषिगण अरुंधती और पार्वतीजी आपस में संवाद चल रहा था। अरुंधती ने हाथ जोड़कर पार्वती से विनय किया है उमा आपने मुझे पुरुषोत्तम मास के निर्मल पुण्य का वर्णन कहा। अब अधिक मास में पुण्य प्राप्ति का कर्म और बताईयेगा। पार्वती जी अरुंधती के वचनों को सुनकर कहती हैं कि मैं एक समय अपने पति के पास बैठी हुई थी उसी समय मेरी माता मेरे पास आकर स्नेहपूर्वक कहती हैं। हे पुत्री तुम मुझसे उत्पन्न होकर तीनों लोक में विख्यात हो गई हो। और सारा संसार तुम्हारी पूजा करता है।
परंतु मुझे और मेरे नाम तक को कोई नहीं जानता ब्रह्मा आदि देवता तक तुम्हारी आराधना करते हैं। तुम्हारी माता होने का सौभाग्य मुझे अवश्य प्राप्त हुआ है। परंतु मेरी ख्याति सिर्फ अपने घर परिवार तक ही सीमित हैं। सांसारिक मनुष्य कोई मुझे नहीं जानते। प्रत्येक दिन पक्ष मास पर्व और प्रत्येक शुभकार्यों में तुम्हारी पूजा होती हैं। परंतु मेरे नाम से मेरे मस्तक पर कोई एक फूल तक नहीं चढ़ाता। ऐसी अवस्था में तुम्हारी माता होने का मुझे क्या श्रेय मिला। वर्ष के तीनसौ पैंसठ दिन सभी तुम्हारी पूजा और व्रत में लोग व्यतीत करते हैं। परंतु मुझे लोग आधी घटी तक भी याद नहीं करते। हे अरुंधती माता के ऐसे वचनों को सुनकर मैंने हंसते हुए माता से कहा कि हे माता आप ऐसा क्यों बोलती हो। यद्यपि संपूर्ण बारह मास लोग मेरी पूजा करते हैं। परंतु अत्यंत धार्मिक और पुण्यदाता ऐसा जो अधिक मास होता है उसमें कोई मेरी पूजा नहीं करता। इसलिये मैंने अधिकमास आने पर मैं तुम्हारी पूजा करूंगी ऐसी सांत्वना देकर अधिक मास को पुण्यदाई और कृपा करके मुझे विस्तार पूर्वक बताइये।
पार्वतीजी के वचनों को सुनकर अरुंधती जी कहती हैं। हे कल्याणी आपने अधिक मास में किस प्रकार किस विधान से माता का व्रत और पूजन किया तथा उस व्रत के द्वारा कौन से पुण्य की प्राप्ति होती है कृपा करके मुझे विस्तार पूर्वक बताइये।
पार्वतीजी कहती है, हे सखी तुमने जन कल्याण के लिये उत्तम प्रश्न किया है। मैंने अपनी माता की ख्याति के लिये अधिकमास के उनके प्रति समर्पित कर दिया है। हे अरुंधती अधिकमास की शुक्लपक्ष की तृतीया के दिन किसी जलाशय कुंआ, नदी, तालाब अथवा अपने घर में शुद्ध जल से स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करे नित्य नैमित्तिक संध्या पूजा करके घर के पवित्र स्थान में गोबर से लीपकर चौकपुरकर पलाश की लकड़ी का आसन रखना चाहिए। आसन पर सुंदर वस्त्र बिछाकर माता की मूर्ति ऐसी बनी हो जो हांथी पर पति और पुत्र के सहित बैठी हुई अनेक अलंकार और वस्त्रों से सुशोभित ऐसी सुंदर माता की मूर्ति को आसन पर स्थापित करना चाहिए।
विद्वान ब्राह्मण के द्वारा मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करके पाद्य, स्नान, अर्घ्य, अक्षत पुष्प, धूपदीप, नैवेद्य, पान, सुपारी, फल, दक्षिणा समर्पित करके आरंभी श्रद्धा पूर्वक पुष्पांजलि जलाकर नित्यपूजन में श्रद्धा पूर्वक करना चाहिए। धन का लोभ त्यागकर संपूर्ण मास पर्यंत अखंडदीप जलाकर माता के प्रति अर्पण करना चाहिए। शरीर में जैसे उत्पन्न होने वाले फल और फूलों को तथा स्वादिष्ट व्यंजनों को माता के प्रति अर्पण करना चाहिए। शरीर में जैसी शक्ति हो उसके अनुसार व्रत उपवास या एक समय भोजन का नियम धारण करना चाहिए। यदि शरीर शक्तिहीन हो तो पहले और आखिरी दिन का उपवास या पूजन हवन करके अंत में अमावस के दिन माता की सुवर्ण की मूर्ति बनाकर विद्वान ब्राह्मण के द्वारा पूजन हवन करके संकल्पपूर्वक वस्त्र और अलंकार के सहित मूर्ति का दान करना चाहिए। यदि मनुष्य में धन संपन्नता हो तो पांच ब्राह्मण पति के सहित आमंत्रित करके उनका पाद प्रक्षालन करके उनका यथाशक्ति वस्त्र दक्षिणा देकर आशीर्वाद ग्रहण करके व्रत की पूर्ति करनी चाहिए। हे अरुंधती इस प्रकार जो भी क्रिया या स्त्रियां इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करेंगी उनको संपूर्ण पुरुषोत्तम मास के पुण्य की प्राप्ति होगी। मनुष्य सांसारिक बाधाओं से छुटकारा पाकर सुख और शांति का जीवन व्यतीत करेंगे तथा अखंड सौभाग्य और पुत्र पौत्रादिकों का सुख प्राप्त करके अंत में मोक्ष को प्राप्त करेंगे। यह माता मैंने का व्रत और पूजन समस्त सांसारिक सुख को देनेवाला अंत में मोक्ष को देने वाला है।
जे जै श्री अधिकमास महात्म्य सार
ब्रह्मरादिय पद्याधारे चतुर्विंशतितमो ऽध्याय: समाप्त
(२४)
।। शुभमभवतु ।।
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