Adhik mass ki Katha 7 adhyaya| अधिक मास की कथा सातवां अध्याय
॥ अथ सप्तमो ऽ ध्याय: प्रारंभ: ॥
॥ श्री गणेशाय नम: ॥
व्यासजी श्रोतागणों से सूतजी शौनकदि ऋषियों से भगवान नारायण नारदजी से कहते हैं कि हे नारद, वाल्मीकि ऋषि राजा दृढ़धन्वा को बता रहे हैं कि वह सुदेव ब्राह्मण भगवान की स्तुति कर हाथ जोड़कर खड़ा रहा। उसके वचनों को सुनकर सच्चिदानंद भगवान विष्णु गंभीर वाणी में कहते हैं, हे ब्राह्मण तुमने जैसी तपस्या की है। उस उग्र तपस्या के द्वारा मैं अत्यंत प्रसन्न होकर तुझे वरदान देने के लिये मैंने तुझे दर्शन दिया है। अब तेरे मन में जो भी इच्छा हो वह मांग। मैं तेरी सभी इच्छाएं परिपूर्ण करूंगा। भगवान के वचनों को सुनकर ब्राह्मण सुदेव हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना करता है कि हे दया के सागर यदि आप मुझे वरदान देना चाहते हैं तो मुझे एक सुंदर सुपुत्र का वरदान दीजिये। मुझे पुत्र के सिवा कुछ नहीं चाहिए। पुत्र के बिना सारा संसार निरर्थक प्रतीत होता है। ब्राह्मण के वचनों को सुनकर भगवान विष्णु कहते हैं, हे ब्राह्मण पुत्र के अलावा संसार की कोई भी वस्तु मांग ले मैं तुझे राज्य धन संपदा सभी सुख दे सकता हूं। परंतु पुत्र सुख नहीं दे सकता कारण कि तेरे भाग्य में विधाता ने पुत्र का सुख लिखा ही नहीं है। मैंने तेरे ललाट में लिखी हुई सब बातें देख ली है। सात जन्म तक तेरे भाग्य में पुत्र का सुख नहीं है। भगवान के द्वारा वज्र के समान लगने वाले शब्दों को सुनकर अत्यंत दु:खित होकर कटे हुए वृक्ष के समान पृथ्वी पर गिरकर बेहोश हो गया। पति की ऐसी अवस्था देखकर पत्नि गौतमी भी दु:खित होकर रोने लगी। थोड़ी देर रोते हुए उसने धैर्य धारण कर पति के समीप जाकर कहने लगी हे प्राणनाथ उठिये! व्यर्थ में दु:ख मत करिए, मैंने जो आपसे पहले कहा था उन शब्दों को याद करिए। मैंने कहा था कि भाग्य में विधाता ने जो सुख दु:ख लिख दिया है वही मनुष्य को प्राप्त होता है। पूर्वजन्म के पुण्यकर्मों के द्वारा ही मनुष्य सुख प्राप्त करता है। ऐसी स्थिती में भगवान भी क्या कर सकते हैं।
जैसे मृत्यु के समीप जाने वाले मनुष्य को औषधी देना निष्फल होता है। वैसे अभागी मनुष्य के सारे कर्म निष्फल होते हैं। हमने सुना था कि यज्ञ, तप, दान और भगवान की आराधना से मनुष्य अपनी मनोकामना प्राप्त कर सकता है ऐसी श्रुतिपुराण आदि ग्रंथों से भी सुना गया है। परंतु आज हमको पूरा विश्वास हो गया कि भाग्य के सामने सब व्यर्थ है। जैसे सूर्य के प्रकाश के समक्ष जुगनू का प्रकाश व्यर्थ होता है। इसलिये मेरी बातों पर विश्वास करके आप धैर्य धारण करिए और भाग्य के भरोसे अपना शेष जीवन बिताइये। अब हमको भगवान से कोई प्रयोजन नहीं है। गौतमी के ऐसे तीव्र और शोकयुक्त वचनों को सुनकर गुरुजी भगवान से हाथ जोड़कर कहते हैं हे महाप्रभु यह ब्राह्मण सुदेव और उसकी पत्नि गौतमी अत्यंत दु:ख के सागर में डूबे हुए हैं। इनकी रक्षा करने वाला कोई नहीं है। आपके सामने इनकी दयनीय अवस्था प्रगट है। फिर भी आप अपने भक्त पर दया क्यों नहीं करते। आप तो दीन बंधु हैं। दया के सागर हैं। आज आपने अपनी कृपा त्याग कर इतनी कठोरता क्यों धारण की है। आपकी सेवा तो आपके भक्तों को चारों प्रकार की मुक्ति देने वाली है। आपके भक्तों के सामने अष्टसिद्धि नवनिद्धि नौकरों के समान रहती है। फिर आप अपने भक्त की शुभेच्छा को पूर्ण क्यों नहीं करते।
यदि आपने इस ब्राह्मण की इच्छा पूर्ण नहीं की तो सांसारिक मनुष्य आपकी आराधना तपस्या करना छोड़कर भाग्य के भरोसे ही रहेंगे। सब लोग आपकी भक्ति से विमुख होकर भाग्य को प्रधानता देंगे। हे महाप्रभु आपने गजेंद्र की रक्षा की तथा ध्रुव को अक्षय पद दिया, भक्त प्रहलाद को सर्वश्रेष्ठता दी, सारे संसार में आपकी दयालुता प्रसिद्ध है। यह ब्राह्मण आपकी शरण में है। फिर आप इसकी उपेक्षा क्यों करते हैं। इससे संसार में आपकी निंदा होगी। गरुड़जी के ऐसे वचनों को सुनकर भगवान कहते हैं, हे गरुड़ यदि तेरे मन में इस ब्राह्मण के प्रति दया उत्पन्न हो गई है, तो मेरी आज्ञा से इसे पुत्र का वरदान बारह वर्ष का दे दे। भगवान के वचनों को सुनकर गरुड़ प्रसन्न होकर कहते हैं, हे ब्राह्मण यद्यपि तेरे भाग्य में सात जन्म तक पुत्र का सुख नहीं है। फिर भी मैं भगवान की आज्ञा से तुझे एक उत्तम पुत्र का वरदान देता हूं। इस पुत्र के द्वारा तुझे अत्यंत दु:ख भी होगा। फिर भी तुम भगवान की आराधना मत छोड़ना तुम्हारा कल्याण होगा। भगवान की भक्ति चाहे सकाम हो या निष्काम कभी व्यर्थ नहीं जाती यह पांच तत्वों का बना हुआ भौतिक शरीर कभी भी पानी के बुलबुले के समान नष्ट होने वाला है। इस पर अभिमान कभी भी नहीं करना चाहिए हमेशा भगवान की आराधना करने से ही जीवात्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिये भगवान की सेवा से कभी विमुख नहीं होना चाहिये यही संसार का मुख्य सार है। मैंने तुझे एक सुंदर सर्वगुण संपन्न पुत्र का वरदान भगवान की आज्ञा से दिया है।
अब तुम पत्नि के सहित सांसारिक वातावरण में रहकर भगवान का चिंतन और सेवा करते रहो उसी से तुम्हारे सभी दु:ख दूर होंगे। इस प्रकार वरदान देकर गरुड़ सहित भगवान वैकुंठ लोक को चले गए। वह ब्राह्मण सुदेव भी अपने पत्नि के सहित आश्रम में आकर पहले की तरह गृहस्थ जीवन व्यतीत करने लगा। कुछ दिनों के बाद ब्राह्मण की पत्नि भगवान के वरदान के अनुसार गर्भावस्था को प्राप्त हुई और नवमास व्यतीत होने पर उसने पुत्र रत्न को जन्म दिया। अत्यंत सुंदर और सभी लक्षणों से युक्त ऐसे पुत्र को प्राप्त कर पति, पत्नि दोनों को महान आनंद हुआ। ब्राह्मण सुदेव ने यथा समय विद्वान ब्राह्मणों को बुलाकर बालक का जात कर्मसंस्कार किया। और अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को वस्त्र, पात्र, दक्षिणा दिया और याचक गरजियों को भी दान देकर संतुष्ट किया, बारहवें दिन ज्योतिष शास्त्र को जानने वाले विद्वानों के द्वारा बालक का नामकरण संस्कार करके शुकदेव, ऐसा नाम रखा गया।
वह बालक शुकदेव अपने मातापिता की सेवा में दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा। जैसे जैसे दिन बीतने लगे वैसे वैसे बालक के अंग प्रत्यंग सुंदर और बलवान होते गए। अपने उम्र के बालकों के साथ वह बालक्रीड़ा में आनंदित रहने लगा। उस बालक को देख-देखकर मातापिता हमेशा आनंदित होते थे। पांचवर्ष बीतने पर उसको अक्षरांभ कराके विद्याध्ययन कराने लगे वह बालक विद्याध्ययन में अत्यंत प्रवीण होकर अनेक विद्याओं को सीखने में तत्पर रहने लगा। जब आठवां वर्ष प्रारंभ हुआ तब ब्राह्मण सुदेव के मन में बालक के यज्ञोपवीत संस्कार करने की अभिलाषा उत्पन्न हुई। इसी प्रेरणा से उसने शुभ मुहूर्त देखकर योग्य विद्वान ब्राह्मणों ने बालक शुकदेव को गायत्री मंत्र का उपदेश देकर उसका संस्कार करा दिया। इस संस्कार में भी सुदेव ने ब्राह्मणों को दान दक्षिणा तथा याचकों को भी बहुत सा दान देकर संतुष्ट किया। इस संस्कार के प्रभाव से बालक के शरीर में सूर्य के तेज से तेजस्विता उत्पन्न होकर शरीर अत्यंत प्रखर होकर बढ़ने लगा। बालक को वेदाध्ययन के लिये गुरु के पास भेजने लगे। बालक कुशाग्र बुद्धि होने से शीघ्र ही वेदपाठ में प्रवीण होने लगा और अनेक शास्त्रों का अध्ययन करने लगा।
बालक की दिनचर्या को देखकर ब्राह्मण पति पत्नि अपने आपको भाग्यशाली और धन्य समझने लगे। इस प्रकार सुख पूर्वक समय व्यतीत हो रहा था। ऐसे ही एक दिन उस ब्राह्मण के आश्रम में देवल नाम के ऋषि का आगमन हुआ उनको देखकर सुदेव बड़े प्रसन्न हुए और उनको नमस्कार कर आदर सहित पाद्य अर्घ्य देकर उत्तम आसन पर विराजमान किया। उसी समय बालक शुकदेव ने भी आकर मुनि के चरणों में मस्तक रखकर दंडवत नमस्कार किया। बालक को शुभाशिष देते हुए ऋषि ने उसको अपने पास बैठाया और उसकी प्रशंसा करते हुए ब्राह्मण सुदेव से कहते हैं कि हे सुदेव तू धन्य है जो तूने सभी सुंदर लक्षणों से युक्त ऐसे बालक का पिता होने का सौभाग्य प्राप्त किया। बुद्धि में प्रखर वेद और विद्याध्ययन में प्रवीण ऐसे बालक शायद ही कहीं देखने में आते हैं। इस प्रकार बालक की प्रशंसा करते हुए ऋषि बालक के हाथ को अपने हाथ में लेकर उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि ब्राह्मण सुदेव इस बालक का सुंदर और पुष्ट शरीर, घुटने तक लंबी भुजाएं, कान तक लंबे नेत्र, शंख के समान कंठ, विनय और काले घुंघराले बाल, ऊंचा वक्षस्थल, पुष्ट कंधे, हास्य मुख इन सभी लक्षणों से संपन्न यह बालक है परंतु एक ही कुलक्षण का संकेत इसकी हस्त रेखा में है जो तुम्हारे लिये महान दु:खदायी है। जिसके सामने सब सुलक्षण व्यर्थ होंगे।
दीर्घश्वास छोड़ते हुए ऋषि कहते हैं। हे सुदेव यह बालक अतिअल्प आयु वाला है बारहवर्ष की आयु में यह पानी में डूबने से मृत्यु को प्राप्त होगा। परंतु तुम अपने मन में दु:ख मत करो जो होने वाला है वह होकर रहेगा। उसको कोई रोक नहीं सकता। ऐसा कहकर देवल ऋषि वहां से निकल गए। ऋषि के जाने पर उनके शब्दों को याद कर ब्राह्मण पति पत्नि दोनों अति दु:ख से मूर्छित हो गए, कुछ देर बाद होश आने पर पुत्र को गोद में लेकर प्यार करके दु:ख भरे स्वर में ब्राह्मणी पति से कहती है, हे प्राणनाथ धैर्य धारण करें जो होने वाला है उसके विषय में सोचना व्यर्थ है। बड़े-बड़े देवताओं को भी समयानुकूल दु:ख और कष्ट भोगना पड़ा है। महान पराक्रमी दैत्यराज बली हिरण्याक्ष वृत्रासुर कार्तवीर्य जैसे राजाओं को भी मृत्यु ने नहीं छोड़ा तो मनुष्य की क्या शक्ति है जो रोक सके।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार बृहन्नारदीय
पद्याधारे सप्तमो ऽ ध्याय: समाप्त ॥
(७)
॥ शुभम भवतु ॥
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
हम से जुड़े रहने के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद