Adhik mass ki Katha 17 adhyaya | अधिक मास की कथा सतरहवा अध्याय
।। अथ सप्तदशो ऽध्यायः प्रारंभः ।।
।। श्री गणाधिपतये नमः ।।
श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं, हे भगवान विष्णु से पुरुषोत्तम मास के महात्म्य को सुनकर लक्ष्मी जी कहती हैं, हे महाप्रभु जिन नर नारियों में उपवास करने की सामर्थ्य न हो उनको कौनसा कर्म करना चाहिये जिससे पुण्य प्राप्ति हो सके भगवान विष्णु लक्ष्मी जी के प्रश्न को सुनकर कहते हैं, हे लक्ष्मी तुमने समस्त जन समुदाय की भलाई के लिये उत्तम प्रश्न किया है, हे लक्ष्मी जो नर नारी संपूर्ण मास उपवास करने में असमर्थ हो उनको करने योग्य अनेक साधन है जैसे मौन धारण करना, एक समय भोजन करना अथवा हविष्यन्न खाकर ही रहना इन नियमों के द्वारा भी संपूर्ण पुण्य प्राप्त होता है। मौन धारण करने से सौभाग्य प्राप्त होता है कलह मिटता है। सुख प्राप्ति और कीर्ति की वृद्धि होती है। शारीरिक क्रांति और आयु की वृद्धि होती है। इसलिये मनुष्य के लिये मौन धारण, बहुत ही लाभदायक है। संपूर्ण समय नहीं तो कम से कम तीन स्थानों में, स्नान भोजन और हवन करने के समय एकाग्रचित और मौन धारण अवश्य करना चाहिये। इन तीनों स्थानों पर मौन धारण से कौन कौन से फल प्राप्त होते है, सो तुम से कहता हूं। मौन होकर स्नान करने से आयु की वृद्धि होती है। मौन होकर भोजन करने से लक्ष्मी की वृद्धि होती है। मौन होकर भोजन करने से समय जो बोलते है उससे वरुण देव क्रोधित होकर भोजन करते से आयु को वृद्धि होते है। समय जो बोलते हैं। उनके आयु का ह्रास होता है मृत्यु कुपित होकर शरीर को रोग ग्रस्त कर आयु का हरण करती है। इसलिये मनुष्य को इन तीनों स्थानों पर अवश्य ही मौन धारण करना चाहिये है लक्ष्मी इन तीनों स्थानों का मौन तो मनुष्य को हमेशा ही करना चाहिये परंतु पुरुषोत्तम मास का मौन विशेष पुण्यदायक होता है सभी प्रकार के पापों का शमन होता है। समस्त मनोकामनाएं परिपूर्ण होती है। अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
इसी पुण्य के प्रभाव से देवर्षि नारद अत्यंत नीच और दासी पुत्र थे परंतु उन्होंने पुरुषोत्तम मास में मौन धारण पुण्य के प्रभाव से ससंगति प्राप्त कर सत्पुरुषों की कृपा से ब्रह्मत्व प्राप्त किया और कुरुक्षेत्र
में तपस्या और उपवास के प्रभाव से ज्ञानी और ब्रह्मपुर की उपाधि प्राप्त कर समस्त ऋषियों में श्रेष्ठता प्राप्त की। हे लक्ष्मी सभी साधनों में सरल और श्रेष्ठ मौन व्रत कहा गया है। अनेक तीर्थों की यात्रा समस्त मासों के धार्मिक कृत्यों से सब पुरुषोत्तम मास में मौन धारण कर्म के सामने तुच्छ है। इस पुण्य कृत्य की प्रशंसा ब्रह्मा महादेव आदि अनेक देवताओं ने की है। मौन धारण के पुण्य प्रभाव से जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट होकर अनंतपुण्य की प्राप्ति होती है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, की उपलब्धि होती है। हे लक्ष्मी इस विषय में एक पुरातन का इतिहास कहता हूं।
पहले अवंति पुरी नाम की नगरी में एक वेदशर्मा नामक ब्राह्मण रहता था। वह ब्राह्मण नित्यवेदी पाठ शांतस्वभाव दानी और जितेंद्रिय था। अपने धर्म कर्म में रातदिन लगा रहता था। हमेशा पुरुषोत्तम मास में व्रत नियम धारण करके संपूर्ण मास श्रद्धा पूर्वक व्यतीत करता था। अनेक समय व्यतीत हो गया उसकी वृद्धावस्था आ गई इसी समय पुरुषोत्तम मास का प्रारंभ होने में जब तीन दिन बाकी रह गए तब वह ब्राह्मण मन में विचार करने लगा कि मैं अनेक वर्षों से पुरुषोत्तम मास में व्रत नियम स्नान आदि करता था परंतु अब मेरे में उपवास करने का सामर्थ्य नहीं है। अब मैं क्या करूं कौन सा कर्म करूं जो मेरे से सार्थक हो सके समझ में नहीं आता इस प्रकार वह ब्राह्मण दिन भर विचारमन रहा और रात्रि में भी वही सोचना हुआ सो गया। अपने भक्त को चिंताग्रस्त देखकर परमदयालु भगवान पुरुषोत्तम रात्रि में उसको स्वप्न में दर्शन देकर कहते है, हे ब्राह्मण तुम मौनव्रत धारण करो इस नियम से तुमको संपूर्ण नियमों के फल की प्राप्ति होगी। इस प्रकार का आदेश देकर भगवान अंतर्ध्यान हो गए। भगवान के अंतर्ध्यान होते ही ब्राह्मण जागृत हो गया।
और आश्चर्य चकित हो मन में सोचने लगा यह दिन दयालु भगवान की ही कृपा थी मुझे प्राप्त की असमर्थ और चिंताग्रस्त स्थिति देखकर स्वयं मार्गदर्शन करने के निमित्त मुझे आदेश देने आए। यह सोचते हुए उसके नेत्रों से आंसुओं की धारा बहने लगी और श्रद्धापूर्वक भगवान का स्मरण करते हुए कहता है। हे शारंगधर हे दीनदयाल मेरे उपर कृपा कर, मेरे उद्धार के लिये मुझे इतना कष्ट किया। आपके इस उपकार को मैं कैसे चुकाऊंगा। इस प्रकार प्रेम में निमग्न होकर ब्राह्मण ने रात्रि व्यतीत की। प्रातः उठकर हर्षित हो नित्य करने लगा। इस प्रकार जिस दिन से पुरुषोत्तम मास प्रारंभ हुआ उसदिन प्रातः स्नानकर नित्य कर्मों से निवृत होकर भगवान पुरुषोत्तम की पूजाकर मौन व्रत धारण करने का संकल्प करके संपूर्ण मास मौन धारण करते
हुए भोजन करने का नियम चलता रहा। अंत में उपवास के दिन विधानपूर्वक उद्यापन किया यथाशक्ति दान पुण्यआदि कर्म किया। ब्राह्मण के इस प्रकार श्रद्धापूर्वक किए हुए कृत्य से प्रसन्न होकर भगवान पुरुषोत्तम साक्षात प्रगट होकर कहते है, हे ब्राह्मण मैं तुझ पर अत्यंत प्रसन्न हूँ तेरे मन में जो इच्छा हो वरदान मांग ले। मैं तेरी समस्त इच्छाओं को परिपूर्ण करूँगा।
भगवान को अपने समक्ष देखकर और वरदान का आग्रह करते हुए देखकर वह ब्राह्मण अत्यंत प्रसन्न होकर बारंबार भगवान को दंडवत नमस्कार करता हुआ हाथ जोड़कर कहता है, हे महाप्रभु दीनदयाल यदि आप मेरी इच्छा पूर्ण करना चाहते है तो मैं आपसे यही प्रार्थना करता हूँ कि मेरी भक्ति आपके चरणों में हमेशा इसी तरह बनी रहे। और संसार में आपके जितने भी भक्त जन हो उनको भी इसी प्रकार आपकी कृपा प्राप्त होती रहे। इस जन्म में मेरे द्वारा मनक्रम वचन से ब्राह्मणों की सेवा और अनेक धार्मिक कर्म घटित हो। मैं दीन दुखियों की सहायता और दूसरों पर उपकार करता रहूँ। मेरा शरीर निरोगी रहे, घर में लक्ष्मी स्थिर रहे। इस प्रकार आपकी सेवा में मेरा संपूर्ण जीवन व्यतीत हो। मृत्यु के बाद मुझे स्वर्ग लोक की प्राप्ति हो। ब्राह्मण की इच्छा को सुनकर उसकी इच्छा के अनुसार वरदान देकर भगवान अंतर्ध्यान हो गए।
भगवान की कृपा से वह ब्राह्मण संसार में सर्वसंभ्र होकर अनेक शुभ कर्मों को करता हुआ अनेक सांसारिक भोगों को भोगकर अनेक यज्ञ किए, परोपकार के निमित्त नित्य कुआं, बावली, तालाब, धर्म शालाएं, प्याऊ, अत्रका सत्र चलाता हुआ आनंद मय जीवन व्यतीत करता हुआ। संपूर्ण जीवन सुखमय बिताकर आयु समाप्त होने पर मृत्यु को प्राप्त हुआ उत्तम विमान उसको लेने के लिये स्वर्ग लोक से आया। उसकी आत्मा ने दिव्य रूप धारणकर उत्तम विमान पर बैठकर देवंगनाओं से पूजित होकर स्वर्ग लोक को चला गया। वहां जाकर वह देवताओं से पूजित और सत्कार प्राप्त करके पुरुषोत्तम मास में भगवान की आराधना ने थी प्रशंसा की उसी के पुण्य प्रभाव से तुमको यह परमपद और स्वर्ग की प्राप्ति हुई। इस प्रकार आनंदपूर्वक वह ब्राह्मण स्वर्ग लोक का सुख भोगता हुआ आज भी स्वर्ग में विद्यमान है।
जै जै श्री अधिकमास महात्म्य सार
बृहत्नारदीय पद्मादशे ऽध्यायः समाप्त
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