Adhik mass ki Katha 23 adhyaya | अधिक मास की कथा 23वा अध्याय
।। अथ त्रयोविंशतितमो ऽध्याय: प्रारंभ: ।।
श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकदि ऋषियों से कहते हैं, भगवान विष्णु के द्वारा स्नान के महात्म्य को सुनकर लक्ष्मीजी प्रसन्न होकर प्रश्न करती हैं। हे महाप्रभु अब आप कृपाकर धारणा पारणा (एकांतोरपवास) व्रत के महात्म्य का वर्णन सुनाइयेगा। और यह किससे किया और कैसे फल को प्राप्त किया, सो बताने की कृपा करें। भगवान विष्णु कहते हैं, हे लक्ष्मी विंध्य पर्वत के एक भाग में अमरकंटक नाम का पर्वत हैं। उसी पर्वत में नर्मदाजी का उद्रम स्थान है। उस पर्वत पर सन्यासी जिसे भगवान शंकर निवास करके तपस्या करते हैं। नर्मदाजी का साक्षात शंकर का वर हस्त मानी जाती है। जिसे मनुष्य अपनी मनोरकामनाओं को प्राप्त करते हैं। वैसे ही नर्मदाजी का स्नान परिक्रमा और पूजा नर्मदा नदी के किनारे बड़े बड़े तीर्थस्थल और भगवान शंकर के मंदिर बने हुए हैं। इसी प्रकार भृगुच्छ नाम का एक नगर है। उस नगर में सदाचार संपन्न सत्यवादी कुशल शर्मा नाम का ब्राह्मण रहता था। सुंदर और पतिव्रता कुशलावती नाम की उसकी पति थी। वे दोनों पति-पति अपने धर्म कर्म में लगे हुए जीवन यापन करते थे। उनकी मेधावती नाम की कन्या थी। कन्या जब विवाह योग्य हुई तब ब्राह्मण ने पदमनाभ नाम का ब्राह्मण पुत्र जो कि सुंदर सुशील और विद्वान था उसके साथ अपनी कन्या का विवाह कर दिया। कन्या अपने पति के घर में आनंदपूर्वक रहने लगी। दोनों पति पति में अनंत प्रेम था। एक दिन का भी वियोग दोनों को असह्य था। कुछ दिनों के बाद भाग्य की विवित्रता से एकदिन पदमनाभ नर्मदाजी में स्नान करने गया। अपने समवयस्क लोगों से जल क्रीड़ा करते हुए पानी में डूबने लगा। साथ के लोगों को जब वह नहीं दिखाई दिया तब लोग घबड़ाकर उसको पानी में ढूढने लगे। परंतु उसके प्राण जा चुके थे वह मृत हो चुका था। तुरंत लोगों के द्वारा उसके शरीर को निकालकर बाहर लाए। उसके घर पहुँचा। उसके मातापिता और पति रोते दहाकार करते हुए वहां आए। पति उसके मृतशरीर को गोद में लेकर छाती पीटती हुई रुदन करती रही है देव हे जगन्नाथ मैं इस वैधव्यता का दुख कैसे भोगूंगी।
प्राण क्यों नहीं निकलते। मेरा सौभाग्यही जहां डूब गया अब मैं इस जीवनरूपी सागर को कैसे पार करूंगी। पति के बिना जैसे मछली तड़पती है। उसी प्रकार से वह तड़प रही थी। उसी प्रकार से कुछ दिनों तक सास-श्वसुर के पास रही कुछ दिनों बाद पिता ने उस दुखी कन्या को सांत्वना और धीरज देने के तन्मित अपने घर ले आए। परंतु माता पिता के घर आने के बाद भी उसका दुःख कम नहीं हुआ रात दिन रोती, तड़पती हुई अपने भविष्य में सोचती रहती थी।
आखिर अपने पूर्वजन्म का पाप उदय हुआ यह समझकर उसके प्रायश्चित करने के लिये कोई व्रत या देवता की आराधन करना चाहिए। इस निमित एक बालिका ने अपने पिता से कहा, हे पिता मेरे दुःख को दूर करने के लिये आप कोई व्रत आदी साधन मुझे बताइये। जिसके द्वारा मैं दुःख से छुटकारा पाकर भवसागर से पार हो जाऊं। कन्या के वचनों को सुनकर पिता ने कहा हे पुत्री अब से तोत्तम मास भगवान पुरुषोत्तम का मास आनेवाला हैं। उस मास में एकांतोरपवास जिसको धारणा पारणावत भी कहते हैं, करने से मनुष्य के पापों का समूह नष्ट हो जाता है। सभी दुःख दूर होते है। और मनुष्य भव्यवसागर से पार हो जाता है। पिता के वचनों को सुनकर मेधावती प्रसन्न होते हुए समय व्यतीत होने पर पुरुषोत्तम मास प्रारंभ हुआ तब पिता के कथनानुसार नियम धारण करके हुए ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नर्मदाजी में स्नान करना, भगवान पुरुषोत्तम की पूजा करना, विप्रपूजा करके यथा शक्ति दान देना, भूमि पर शयन करना, एकदीत उपवास करके दूसरे दिन हविष्य खाकर पारणा करना अखंडदीप की स्थापना आदि इस प्रकार नियमपूर्वक बड़ी श्रद्धा से संपूर्ण मास पूरा करके उपवास के दिन विधिवत उद्यापन किया। इस प्रकार उसने अपने जीवन में अनेक पुरुषोत्तमास नियम और श्रद्धापूर्वक संपूर्ण किया। समय व्यतीत होते बुद्धवस्था आने पर शरीर कृश हो गए और उसका अंत समय प्राप्त हो गया। पुण्य के प्रभाव से और भगवान शंकर की महान भक्ति के कारण मृत्यु के बाद वह मेधावती की आत्मा शिवलोक में पहुंच कर पार्वतीजी की सखी हो गई। वहां अनेक सुखों को भोगकर पृथ्वी पर फिर से जन्म लिया। काशी नगरी में विशालाक्षी नामक तपस्विनी के रूप में प्रसिद्ध हुई। आज भी काशी में विशालाक्षी मंदिर है लोग उसके पूजा करके अपना मनोरथ पूर्ण करते हैं। हे लक्ष्मी पुरुषोत्तम मास का धारणा पारणावत शरीर को अरोग्यता देनेवाला, अंत में मोक्ष देने वाला है। इसी व्रत के प्रभाव से वह मेधावती मानव शरीर वाली होकर दूसरे जन्म में देव स्वरूप हो गई।
हे लक्ष्मी मेधावती की एक सखी कोमला नाम की ब्राह्मणी थी उसे भी पुण्य के प्रभाव से मृत्यु के बाद शिवलोक से अधिक मास में नरक भोजन में जन्म लेकर तपस्या के प्रभाव से मंगलागौरी के नाम से आज भी प्रसिद्ध है। हे लक्ष्मी पुरुषोत्तम मास का अद्भुत पुण्य है। जिसका वर्णन हजार मुख वाले शेषनाग भी करने में असमर्थ है। इतनी कथा सुनकर लक्ष्मीजी कहती हैं, हे महाप्रभु अब आप विप्रसेवा के महात्म्य का वर्णन सुनाइयेगा। भगवान कहते हैं, हे लक्ष्मी मैं तुम से इस विषय का एक इतिहास सुनाता हूँ। भरतखंड में विराट नाम का देश है। उस देश में अनेक पुण्यशाली और धनिक लोग रहते थे। उस नगर में अनेक मंदिर थे कुएं बावली तालाब और बगीचों से वे नगर हमेशा संपन्न और सुखी रहेगा। वहां परमार्थिक कर्म होते रहने से देवताओं को प्रसन्न वरदान दिया था कि शंकरजी का भी मंदिर है। चारों वर्णों के लोग अपने कर्म धर्म में लगे रहकर सभी प्रकार से सुखी और प्रसन्न है। उसी नगर में धनदास नाम का एक शूद्र रहता था। वह धनसंपन्न था और उसके अनेक नौकर थे। परंतु वह हमेशा ब्राह्मणों को आमंत्रित कर अपने हाथ से ब्राह्मणों का पादप्रक्षालन और पूजा करता था और अनेक प्रकार के दान देकर संतुष्ट करता था। अनेक पर्व के समय स्वयं ब्राह्मण के घर जाकर झाडू लगाए, कपड़े धोए, उनकी आवश्यक इच्छित वस्तु को बाजार से लाकर देना ये सब स्वयं पति के सहित करता था। उसकी पति भी पति का अनुसरण करते हुए विप्र पत्नियों की सेवा करती रहती थी। धनदास को अपने ऊपर धन संपन्न होने का कोई गर्व नहीं था वह विप्रसेवा में कितना भी धन क्यों न खर्च हो जाए उसके मन में चिंता नहीं होती थी। इस प्रकार विप्रसेवा करते हुए उसकी आयु बहुत बीत गई। अचानक दैव के प्रभाव और पूर्वजन्म के कर्म के प्रभाव से धनदास के शरीर में काफी कष्ट का रोग उत्पन्न हो गया। जगह जगह उसके शरीर में व्रण (घाव) खून और पीब बहने लगी। रोग को देखकर धनदास मन में बहुत उदास रहने लगा। कि अब मेरे से ब्राह्मणों की सेवा कैसे होगी। इसी चिंता ग्रस्त स्थिति में एक समय एक सिद्ध पुरुष धनदास के घर आए उनसे उसने अपने मन का दुःख प्रकट किया। उसके दुःख को सुनकर सिद्ध पुरुष ने कहा हे धनदास तू चिंता छोड़ दे तूने जो विप्रसेवा की है, उसका पुण्य तुझे अवश्य प्राप्त होगा। तेरी अच्छी मृत्यु होगी और मृत्यु के बाद तू और तेरी पति सुंदर विमान पर बैठकर स्वर्ग लोक को जाओगे। ऐसा कहकर सिद्ध पुरुष वहां से अंतर्धान हो गए। सिद्ध पुरुष के शब्दों को यादकर धनदास बहुत प्रसन्न हुआ अपने धन संपदा के तीन भाग किए।
एक भाग अपने पुत्र को दूसरा भाग कन्या को और तीसरा अपने साथ लेकर तीर्थ यात्रा को पत्नी समेत निकल गया। अनेक तीर्थों में अपने धनका दान कर दिया। तीर्थ क्षेत्र में रहते हुए, ही दोनों पति पति की एकही दिन मृत्यु हो गई। अपने पुण्य के प्रभाव से सुंदर विमान पर बैठकर उन दोनों की जीवात्मा स्वर्ग लोक को चली गई। हे लक्ष्मी विप्रसेवा का महात्म्य देवताओं की पूजा से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। मैंने भी जब पृथ्वीपर जन्म लिया तब विप्रसेवा अवश्य की है।
(२३)
बृहत् नारदीय पद्माधारे त्रयोविंशतितमो ऽध्याय: समाप्त ।।
।। शुभमभवत् ।।
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