Adhik mass ki Katha 16 adhyaya | अधिक मास की कथा सोलहवां अध्याय

 Adhik mass ki Katha 16 adhyaya | अधिक मास की कथा सोलहवां अध्याय 


।। अथ षोडशोऽध्यायः प्रारभ्यः ।।
।। श्री मन्महागणपतये नमः ।।
श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकदि ऋषियों से, भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी से इस कल्याणदायिनी कथा को सुनाकर लक्ष्मीजी ने भगवान से कहा, हे सच्चिदानंद स्वरूप, संसार के दुःखों का हरण करने वाले परोपकारार्थ इन कथाओं को प्रकट किए। आप कृपाकर यह बताएं कि जो लोग स्नान आदिकर्म करने में शरीर से असमर्थ हों। उनको कौनसा कर्म पुरुषोत्तम मास में करना चाहिए जिससे उनको पुण्य प्राप्ति हो। लक्ष्मीजी के प्रश्न को सुनकर भगवान विष्णु कहते हैं। हे लक्ष्मी तुम्हें समस्त जनसमुदाय के कल्याण के लिये उत्तम प्रश्न किया है। जो नर अथवा नारी शरीर से अशक्त हैं इस कर्म के द्वारा उनकी समस्त मनोरमनाएं परिपूर्ण होगी कलियुग में जो लोग कृष्ण के नामका जप, कीर्तन भजन करना चाहिए। है वे हजारों यज्ञ का फल प्राप्त करते हैं। और करोड़ों तीर्थों का फल प्राप्त करते हैं। जो लोग धर्म में आस्था रखकर पवित्रपूर्ण हरिकीर्तन, भजन, जप निरंतर करते हैं वे ही सत्पुर कहलाते है। और अपने पुण्यकर्म के प्रभाव से पितरों का उद्धार करते हैं।
विद्वानों का कहना है। संसार में सैकड़ों पुत्र दुष्टशरीर वाले पृथ्वी पर उत्पन्न होकर पृथ्वी का भार बनकर रहते हैं। ऐसे पुत्रों से पूर्वजों को कष्ट होता है। यदि कुल में एक भी पुत्र धर्मात्मा और भगवान का भक्त होता है। तो सात कुलों का उद्धार अपने पुण्य कर्मों से कर देता है। धर्मात्मा पुत्र हमेशा भगवान के चरणों में आस्था रखकर भगवान स्मरण जप भागवद् गीता का पाठ और भगवान पुरुषोत्तम की आराधना करते हुए जीवन व्यतीत करते हैं। वे ही संसारिक आवागमन से मुक्त हो जाते हैं। जैसे स्त्री की हत्या, राजा की हत्या, विश्वासघाती, दूसरों का सर्वस्व हरण करने वाला, बालकों की हत्या करने वाला, ग्राम में अग्नि लगाने वाला, गर्भपात करने वाला, मदिरा पीनेवाले, सर्व निंदक, गोरियों का हत्यारा, किए उपकार को न मानने वाला, मार्ग में बाधा उत्पन्न कर यात्रियों को कष्ट देने वाले, आदि अनेक पाप कर्म करने वाले समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं। चारों वेदों का अध्ययन और धर्मशास्त्रों की व्याख्या और इतिहास का उपदेश देने से, चांद्रायण व्रत करने से, अनेक मंत्रों

का जप करने से, सातों द्वीपों की परिक्रमा और अनेक दानदे से, हाथी घोड़े रथ सुवर्ण का दान करने से, अनेक मंदिरों की प्रतिष्ठा करने से, अनेक तीर्थों का भ्रमण करने से जिस पुण्य की प्राप्ति होती है। उससे भी हजार गुना पुण्य की प्राप्ति कलियुग में सिर्फ भगवान के नाम:स्मरण व तप से हो जाती है। सभी युगों से ज्यादा इस कलियुग में भगवान के नाम का माहात्म्य कहा गया है। विशेषकर पुरुषोत्तम मास में और भी विशेष फलदायी महाव्रत भगवान स्मरण का कहा गया है। भगवान के शब्दों को सुनकर लक्ष्मीजी कहती है, हे देवाधिदेव आपने भद्रनाम की महिमा का बहुत उत्तम वर्णन सुनाए, अब आप अन्नदान की महिमा का वर्णन बताईये। भगवान विष्णु प्रसन्न होकर कहते हैं। हे प्रिये तुम्हें उत्तम प्रकार का प्रश्न किया है जिसकी महिमा से मनुष्य तुरंत पापरहित हो जाता है। ऐसा तत्काल फलदाई अन्नदान होता है। संपूर्ण ब्रह्मांड में अन्न को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। क्योंकि अन्न के द्वारा संपूर्ण जीवों का पोषण होता है। अब सब जीवों का प्राण है। अन्न के द्वारा शरीर की पुष्टि होती है। मनुष्य चाहे कोई व्रत जप तप नियम न धारण करे परंतु अन्नदान के द्वारा उत्तम पुण्य प्राप्त कर सकता है। जो मनुष्य पुरुषोत्तम मास में थोड़ा भी अन्नदान कर लेता है। वह अनंत पुण्य को प्राप्त करता है।
उसी प्रकार पुरुषोत्तम मास में जो मनुष्य एक भी उपवास कर लेता है वह समस्त मनोकामना से परिपूर्ण होकर मोक्ष को प्राप्त होता है। संपूर्ण मास का उपवास एक पक्ष का उपवास अथवा छांवत्रि या तीन रात्रि के बाद का एकांतरा उपवास इस प्रकार एक दिन का व्रत आदि धारण करना चाहिये। मनुष्य में जैसी शारीरिक शक्ति और क्षमता हो उसी के अनुसार यह पुरुषोत्तममास में श्रद्धा के सहित एक तो भी व्रत करना चाहिये। हे लक्ष्मी इस विषय में एक पुरातन इतिहास सुनाता हूँ। नर्मदादी के किनारे महिष्मती नाम का एक नगर था उस नगर में तापसी नाम की एक ब्राह्मणी रहती थी। वह हमेशा धर्म कर्म में लगी रहने से उसका तापसी ऐसा नाम प्रसिद्ध हो गया था। पुरुषोत्तम मास में नित्य नियम धारण करते हुए श्रद्धा पूर्वक संपूर्ण मास का पुण्य प्राप्त करती थी। उस तापसी को बाल्यावस्था की सखी जदि जाति में उत्पन्न चपला नाम की थी वह अनेक घरों में लोगों का गृहकार्य करके अपना गुजर करती थी।
अचानक दैव योग से मध्यावस्था के बाद उसके शरीर में कुष्ठ रोग उत्पन्न हो गया जिससे उसको

महाकष्ट होने लगा। लोगों ने अपने अपने घर में उससे काम करना बंद कर दिया इसका कारण यह गंध से वह व्याकुल और रोग से ग्रसित होने से मृत्यु की कामना करने लगी परंतु मृत्यु भी नहीं हो रही थी। इस समय कष्ट के समय उसको अपनी सखी तापसी के पास जाकर प्रार्थना करने लगी। हे सखी मेरा संपूर्ण जीवन निरर्थक हो व्यतीत हुआ। मेरे अन्न पोषण के निमित्त दूसरे के गृह कार्य करने में जीवन व्यतीत कर दिया। जीवन में कोई भी पुण्य कार्य व्रत नियम आदि मैंने नहीं किया। इसलिए मुझे मृत्यु भी नहीं होती। मृत्यु के बाद भी मुझे कर्मों के कारण नरक यातना भोगनी पड़ेगी। इसलिए हे सखी तुम बड़ी पुण्यवान हो।
तुम अगर अपने पुण्य में से थोड़ा पुण्य मुझे दे दो तो मेरा उद्धार हो जायेगा। तुम्हारे पुण्य के प्रभाव से सुखपूर्वक मेरी मृत्यु होकर मैं नरक की यातना से बच जाऊंगी। हे सखी तुम बड़ी दयालु हो। मेरी प्रार्थना स्वीकार करो तुम्हारे सिवा मेरा उद्धार करने वाला कोई नहीं है। उसकी करुणापूर्ण प्रार्थना सुनकर तापसी को दया आ गई और उसने हाथ में जल लेकर भगवान पुरुषोत्तम का स्मरण करके संकल्प किया कि मैंने पुरुषोत्तम मास में जो उपवास का नियम धारण किया था उसमें से एक उपवास का पुण्य इसको समर्पित करती हूं। ऐसा कहकर हाथ का संकल्पित जल जैसे उसके शरीर पर छोड़ा वैसे ही हो स्वर्ग लोक से उत्तम विमान आया और उसका रोगग्रस्त शरीर मृत्यु को प्राप्त होकर उसकी आत्मा दिव्य स्वरूप होकर स्वर्ग लोक के विमान पर बैठकर स्वर्ग लोक को चली गई। स्वर्ग लोक के सुखों को भोगकर फिर से पृथ्वी पर जन्म लिया। इस जन्म में वह पुण्य के प्रभाव से काशी नाम की नगरी में राजकन्या के रूप में उत्पन्न होकर अनेक परोपकारी और शुभ कृत्यों को करते हुए भगवान विश्वनाथ की अनन्य भक्ति करते हुए संसार में विख्यात होकर शिवलोक को प्राप्त हुई। हे लक्ष्मी पुरुषोत्तममास के एक उपवास का पुण्य इतना प्रभावशाली हुआ कि वह सुदंरी जिससे जीवन भर कोई शुभ कर्म नहीं किया अपनी सखी तापसी के द्वारा दिए हुए पुण्य के प्रभाव से इतना सुख और उत्पाद प्राप्त किया तो फिर जो स्वयं भगवान पुरुषोत्तम की सेवा आराधना व्रत नियम धारण करेंगे उनको कितना पुण्य और उस पुण्य के प्रभाव से कितना सुख प्राप्त होगा इसकी कल्पना तुम स्वयं कर सकती हो।
जे जे श्री अधिकमास माहात्म्यसार बृहन्नारदीय पद्याधारे षोडशोऽध्यायः समाप्त ।। (१६)






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