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Bagvat gita ki kahaniya | भगवत गीता की कहानियां

Bagvat gita ki kahaniya|भगवत गीता की कहानियां 

 गीता के पहले अध्याय की कथ
 गीता के दूसरे अध्याय की कथा
गीता के तीसरे अध्याय की कथा
 गीता के चौथे अध्याय की कथा
 गीता के पांचवें अध्याय की कथा
 गीता के छठवें अध्याय की कथा 
गीता के सातवें अध्याय की कथा
गीता के आठवें अध्याय की कथा
 गीता के नॉर्वे अध्याय की कथा 
गीता के दसवें अध्याय की कथा
 गीता के ग्यारहवें वें अध्याय की कथा 
गीता के बारहवें अध्याय की 
गीता के तेरहवें अध्याय की कथा 
गीता के चौदहवां अध्याय कथा
  गीता के पंद्रहवें अध्याय की कथा 
गीता के सोलहवें अध्याय की कथा 
गीता के सत्रह अध्याय की कथा 
गीता के अठारह अध्याय की कथा  

गीता के आठवें अध्याय की कथा| gita ke 8 adhyay ki Katha

 

गीता के आठवें अध्याय की कथा| gita ke 8 adhyay ki Katha 




भगवान् शिव कहते हैं—देवि! अब आठवें अध्यायका माहात्म्य सुनो! उसके सुननेसे तुम्हें बड़ी प्रसन्नता होगी। [ लक्ष्मीजीके पूछनेपर भगवान् विष्णुने उन्हें इस प्रकार अष्टम अध्यायका माहात्म्य बतलाया था। ] दक्षिणमें आमर्दकपुर नामक एक प्रसिद्ध नगर है। वहाँ भावशर्मा नामक एक ब्राह्मण रहता था, जिसने वेश्याको पत्नी बनाकर रखा था। वह मांस खाता, मदिरा पीता, श्रेष्ठ पुरुषोंका धन चुराता, परायी स्त्रीसे व्यभिचार करता और शिकार खेलनेमें दिलचस्पी रखता था। वह बड़े भयानक स्वभावका था और मनमें बड़े-बड़े हौसले रखता था। एक दिन मदिरा पीनेवालोंका समाज जुटा था। उसमें भावशर्माने भरपेट ताड़ी पी—खूब गलेतक उसे चढ़ाया; अतः अजीर्णसे अत्यन्त पीड़ित होकर वह पापात्मा कालवश मर गया और बहुत बड़ा ताड़का वृक्ष हुआ।  

उसकी घनी और ठंडी छायाका आश्रय लेकर ब्रह्मराक्षस-भावको प्राप्त हुए कोई पति-पत्नी वहाँ रहा करते थे। उनके पूर्वजन्मकी घटना इस प्रकार है। एक कुशीबल नामक ब्राह्मण था, जो वेद-वेदांगके तत्त्वोंका ज्ञाता, सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थका विशेषज्ञ और सदाचारी था। उसकी स्त्रीका नाम कुमति था। वह बड़े खोटे विचारकी थी। वह ब्राह्मण विद्वान् होनेपर भी अत्यन्त लोभवश अपनी स्त्रीके साथ प्रतिदिन भैंस, कालपुरुष और घोड़े आदि बड़े दानोंको ग्रहण किया करता था; परंतु दूसरे ब्राह्मणोंको दानमें मिली हुई कौड़ी भी नहीं देता था। वे ही दोनों पति-पत्नी कालवश मृत्युको प्राप्त होकर ब्रह्मराक्षस हुए।  

वे भूख और प्याससे पीड़ित हो इस पृथ्वीपर घूमते हुए उसी ताड़वृक्षके पास आये और उसके मूल भागमें विश्राम करने लगे। इसके बाद पत्नीने पतिसे पूछा—'नाथ! हमलोगोंका यह महान् दुःख कैसे दूर होगा तथा इस ब्रह्मराक्षस-योनिसे किस प्रकार हम दोनोंकी मुक्ति होगी?' तब उस ब्राह्मणने कहा—'ब्रह्मविद्याके उपदेश, अध्यात्म-तत्त्वके विचार और कर्मविधिके ज्ञान बिना किस प्रकार संकटसे छुटकारा मिल सकता है।'  

यह सुनकर पत्नीने पूछा—'किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम' (पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है और कर्म कौन-सा है?) उसकी पत्नीके इतना कहते ही जो आश्चर्यकी घटना घटित हुई, उसको सुनो। उपर्युक्त वाक्य गीताके आठवें अध्यायका आधा श्लोक था। उसके श्रवणसे वह वृक्ष उस समय ताड़के रूपको त्यागकर भावशर्मा नामक ब्राह्मण हो गया। तत्काल ज्ञान होनेसे विशुद्ध-चित्त होकर वह पापके चोलेसे मुक्त हो गया। तथा उस आधे श्लोकके ही माहात्म्यसे वे पति-पत्नी भी मुक्त हो गये। उनके मुखसे दैवात् ही आठवें अध्यायका आधा श्लोक निकल पड़ा था। तदनन्तर आकाशसे एक दिव्य विमान आया और वे दोनों पति-पत्नी उस विमानपर आरूढ़ होकर स्वर्गलोकको चले गये।  

उसके बाद उस बुद्धिमान् ब्राह्मण भावशर्माने आदरपूर्वक उस आधे श्लोकको लिखा और देवदेव जनार्दनकी आराधना करनेकी इच्छासे वह मुक्तिदायिनी काशीपुरीमें चला गया। वहाँ उस उदार बुद्धिवाले ब्राह्मणने भारी तपस्या आरम्भ की। उसी समय क्षीरसागरकी कन्या भगवती लक्ष्मीने हाथ जोड़कर देवताओंके भी देवता जगत्पति जनार्दनसे पूछा—'नाथ! आप सहसा नींद त्यागकर खड़े क्यों हो गये?'  

श्रीभगवान् बोले—देवि! काशीपुरीमें भागीरथीके तटपर बुद्धिमान् ब्राह्मण भावशर्मा मेरे भक्तिरससे परिपूर्ण होकर अत्यन्त कठोर तपस्या कर रहा है। वह अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके गीताके आठवें अध्यायके आधे श्लोकका जप करता है। मैं उसकी तपस्यासे बहुत संतुष्ट हूँ।  

पार्वतीजीने पूछा—भगवन्! श्रीहरि सदा प्रसन्न होनेपर भी जिसके लिये चिन्तित हो उठे थे, उस भगवद्भक्त भावशर्माने कौन-सा फल प्राप्त किया?  

श्रीमहादेवजी बोले—देवि! द्विजश्रेष्ठ भावशर्मा प्रसन्न हुए भगवान् विष्णुके प्रसादको पाकर आत्यन्तिक सुख (मोक्ष)—को प्राप्त हुआ तथा उसके अन्य वंशज भी, जो नरक-यातनामें पड़े थे, उसीके शुद्धकर्मसे भगवद्धामको प्राप्त हुए। पार्वती! यह आठवें अध्यायका माहात्म्य थोड़ेमें ही तुम्हें बताया है। इसपर सदा विचार करते रहना चाहिये।  

गीता के नौवें अध्याय की कथा| gita ke 9adhyay ki Katha

गीता के नौवें अध्याय की कथा| gita ke 9adhyay ki Katha 



श्रीमद्भगवद्गीता के नौवें अध्याय का माहात्म्य


​महादेवजी कहते हैं— "पार्वती! अब मैं आदरपूर्वक नवम अध्याय के माहात्म्य का वर्णन करूँगा, तुम स्थिर होकर सुनो। नर्मदा के तट पर माहिष्मती नाम की एक नगरी है। वहाँ माधव नाम के एक ब्राह्मण रहते थे, जो वेद-वेदांगों के तत्वज्ञ और समय-समय पर आने वाले अतिथियों के प्रेमी थे। उन्होंने विद्या के द्वारा बहुत धन कमाकर एक महान् यज्ञ का अनुष्ठान आरम्भ किया। उस यज्ञ में बलि देने के लिये एक बकरा मँगाया गया।

​जब उसके शरीर की पूजा हो गयी, तब सबको आश्चर्य में डालते हुए उस बकरे ने हँसकर उच्च स्वर से कहा— 'ब्राह्मण! इन बहुत-से यज्ञों द्वारा क्या लाभ है? इनका फल तो नष्ट हो जाने वाला है तथा ये जन्म, जरा और मृत्यु के भी कारण हैं। यह सब करने पर भी मेरी जो वर्तमान दशा है, इसे देख लो!'"

​बकरे के इस अत्यंत कौतूहलजनक वचन को सुनकर यज्ञमण्डप में रहने वाले सभी लोग बहुत ही विस्मित हुए। तब वे यजमान ब्राह्मण हाथ जोड़ अपलक नेत्रों से देखते हुए बकरे को प्रणाम करके श्रद्धा और आदर के साथ पूछने लगे।

​ब्राह्मण बोले— "आप किस जाति के थे? आपका स्वभाव और आचरण कैसा था? तथा किस कर्म से आपको बकरे की योनि प्राप्त हुई? यह सब मुझे बताइये।"

​बकरा बोला— "ब्राह्मण! मैं पूर्वजन्म में ब्राह्मणों के अत्यन्त निर्मल कुल में उत्पन्न हुआ था। समस्त यज्ञों का अनुष्ठान करने वाला और वेद-विद्या में प्रवीण था। एक दिन मेरी स्त्री ने भगवती दुर्गा की भक्ति से विनम्र होकर अपने बालक के रोग की शान्ति के लिये बलि देने के निमित्त मुझसे एक बकरा माँगा। तत्पश्चात् जब चण्डिका के मन्दिर में वह बकरा मारा जाने लगा, उस समय उसकी माता ने मुझे शाप दिया— 'ओ ब्राह्मणों में नीच, पापी! तू मेरे बच्चे का वध करना चाहता है; इसलिये तू भी बकरे की योनि में जन्म लेगा।'

​द्विजश्रेष्ठ! तब कालवश मृत्यु को प्राप्त होकर मैं बकरा हुआ। यद्यपि मैं पशु-योनि में पड़ा हूँ, तो भी मुझे अपने पूर्वजन्मों का स्मरण बना हुआ है। ब्राह्मण! यदि आपको सुनने की उत्कण्ठा हो, तो मैं एक और भी आश्चर्य की बात बताता हूँ। कुरुक्षेत्र नाम का एक नगर है, जो मोक्ष प्रदान करने वाला है। वहाँ चन्द्रशर्मा नाम के एक सूर्यवंशी राजा राज्य करते थे। एक समय जब कि सूर्यग्रहण लगा था, राजा ने बड़ी श्रद्धा के साथ 'कालपुरुष' का दान करने की तैयारी की। उन्होंने वेद-वेदांगों के पारगामी एक विद्वान ब्राह्मण को बुलवाया और पुरोहित के साथ वे तीर्थ के पावन जल से स्नान करने चले। तीर्थ के पास पहुँचकर राजा ने स्नान किया और दो वस्त्र धारण किये। फिर पवित्र एवं प्रसन्नचित्त होकर उन्होंने श्वेत चन्दन लगाया और बगल में खड़े हुए पुरोहित का हाथ पकड़कर तत्काल उचित मनुष्यों से घिरे हुए अपने स्थान पर लौट आये। आने पर राजा ने यथोचित विधि से भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को काल-पुरुष का दान किया।

​तब कालपुरुष का हृदय चीरकर उसमें से एक पापात्मा चाण्डाल प्रकट हुआ। फिर थोड़ी देर के बाद निन्दा भी चाण्डाली का रूप धारण करके कालपुरुष के शरीर से निकली और ब्राह्मण के पास आ गयी। इस प्रकार चाण्डालों की वह जोड़ी आँखें लाल किये निकली और ब्राह्मण के शरीर में हठात् प्रवेश करने लगी। ब्राह्मण मन-ही-मन गीता के नवम अध्याय का जप करते थे और राजा चुपचाप यह सब कौतुक देखने लगे। ब्राह्मण के अन्तःकरण में भगवान् गोविन्द शयन करते थे। वे उन्हीं का ध्यान करने लगे।

​ब्राह्मण ने [जब गीता के नवम अध्याय का जप करते हुए] अपने आश्रयभूत भगवान् का ध्यान किया, उस समय गीता के अक्षरों से प्रकट हुए विष्णुदूतों द्वारा पीड़ित होकर वे दोनों चाण्डाल भाग चले। उनका उद्योग निष्फल हो गया। इस प्रकार इस घटना को प्रत्यक्ष देखकर राजा के नेत्र आश्चर्य से चकित हो उठे। उन्होंने ब्राह्मण से पूछा— 'विप्रवर! इस महाभयंकर आपत्ति को आपने कैसे पार किया? आप किस मन्त्र का जप तथा किस देवता का स्मरण कर रहे थे? वह पुरुष तथा वह स्त्री कौन थी? वे दोनों कैसे उपस्थित हुए? फिर वे शान्त कैसे हो गये? यह सब मुझे बताइये।'

​ब्राह्मण ने कहा— 'राजन्! चाण्डाल का रूप धारण करके भयंकर पाप ही प्रकट हुआ था तथा वह स्त्री निन्दा की साक्षात् मूर्ति थी। मैं इन दोनों को ऐसा ही समझता हूँ। उस समय मैं गीता के नवें अध्याय के मन्त्रों की माला जपता था। उसी का माहात्म्य है कि सारा संकट दूर हो गया। महीपते! मैं नित्य ही गीता के नवम अध्याय का जप करता हूँ, उसी के प्रभाव से प्रतिग्रहजनित आपत्तियों के पार हो सका हूँ।'

​यह सुनकर राजा ने उसी ब्राह्मण से गीता के नवम अध्याय का अभ्यास किया, फिर वे दोनों ही परम शान्ति (मोक्ष) को प्राप्त हो गये।"

गीता के सातवें अध्याय की कथा | gita ke 7 adhyay ki Katha


गीता के सातवें अध्याय की कथा | gita ke 7 adhyay ki Katha 


​भगवान् शिव कहते हैं—पार्वती! अब मैं सातवें अध्याय का माहात्म्य बतलाता हूँ, जिसे सुनकर कानों में अमृत-राशि भर जाती है। पाटलिपुत्र नामक एक दुर्गम नगर है, जिसका गोपुर (द्वार) बहुत ही ऊँचा है। उस नगर में शंकुकर्ण नामक एक ब्राह्मण रहता था, उसने वैश्यवृत्तिका आश्रय लेकर बहुत धन कमाया, किंतु न तो कभी पितरों का तर्पण किया और न देवताओं का पूजन ही। वह धनोपार्जन में तत्पर होकर राजाओं को ही भोज दिया करता था। एक समय की बात है, उस ब्राह्मण ने अपना चौथा विवाह करने के लिये पुत्रों और बन्धुओं के साथ यात्रा की। मार्ग में आधी रात के समय जब वह सो रहा था, एक सर्प ने कहीं से आकर उसकी बाँह में काट लिया।

​उसके काटते ही ऐसी अवस्था हो गयी कि मणि, मन्त्र और ओषधि आदि से भी उसके शरीर की रक्षा असाध्य जान पड़ी। तत्पश्चात् कुछ ही क्षणों में उसके प्राण-पखेरू उड़ गये। फिर बहुत समय के बाद वह प्रेत सर्प-योनि में उत्पन्न हुआ। उसका चित्त धन की वासना में बँधा था। उसने पूर्व-वृत्तान्त को स्मरण करके सोचा— 'मैंने जो घर के बाहर करोड़ों की संख्या में अपना धन गाड़ रखा है, उससे इन पुत्रों को वंचित करके स्वयं ही उसकी रक्षा करूँगा।' एक दिन साँप की योनि से पीड़ित होकर पिता ने स्वप्न में अपने पुत्रों के समक्ष आकर अपना मनोभाव बताया, तब उसके निरंकुश पुत्रों ने सबेरे उठकर बड़े विस्मय के साथ एक-दूसरे से स्वप्न की बातें कहीं। उनमें से मझला पुत्र कुदाल हाथ में लिये घर से निकला और जहाँ उसके पिता सर्पयोनि धारण करके रहते थे, उस स्थान पर गया। यद्यपि उसे धन के स्थान का ठीक-ठीक पता नहीं था तो भी उसने चिह्नों से उसका ठीक निश्चय कर लिया और लोभबुद्धि से वहाँ पहुँचकर बाँबी को खोदना आरम्भ किया। तब उस बाँबी से बड़ा भयानक साँप प्रकट हुआ और बोला— 'ओ मूढ़! तू कौन है, किसलिये आया है, क्यों बिल खोद रहा है, अथवा किसने तुझे भेजा है? ये सारी बातें मेरे सामने बता।'

​पुत्र बोला— मैं आपका पुत्र हूँ। मेरा नाम शिव है। मैं रात्रि में देखे हुए स्वप्न से विस्मित होकर यहाँ का सुवर्ण लेने के कौतूहल से आया हूँ।

​पुत्र की यह वाणी सुनकर वह साँप हँसता हुआ उच्च स्वर से इस प्रकार स्पष्ट वचन बोला— 'यदि तू मेरा पुत्र है तो मुझे शीघ्र ही बन्धन से मुक्त कर। मैं पूर्वजन्म के गाड़े हुए धन के ही लिये सर्पयोनि में उत्पन्न हुआ हूँ।'

​पुत्र ने पूछा— पिताजी! आपकी मुक्ति कैसे होगी? इसका उपाय मुझे बताइये; क्योंकि मैं इस रात में सब लोगों को छोड़कर आपके पास आया हूँ।

​पिता ने कहा— बेटा! गीता के अमृतमय सप्तम अध्याय को छोड़कर मुझे मुक्त करने में तीर्थ, दान, तप और यज्ञ भी सर्वथा समर्थ नहीं हैं। केवल गीता का सातवाँ अध्याय ही प्राणियों के जरा-मृत्यु आदि दुःखों को दूर करने वाला है। पुत्र! मेरे श्राद्ध के दिन सप्तम अध्याय का पाठ करने वाले ब्राह्मण को श्रद्धापूर्वक भोजन कराओ। इससे निःसन्देह मेरी मुक्ति हो जायेगी। वत्स! अपनी शक्ति के अनुसार पूर्ण श्रद्धा के साथ वेद-विद्या में प्रवीण अन्य ब्राह्मणों को भी भोजन कराना।

​सर्पयोनि में पड़े हुए पिता के ये वचन सुनकर सभी पुत्रों ने उसकी आज्ञा के अनुसार तथा उससे भी अधिक किया। तब शंकुकर्ण ने अपने सर्पशरीर को त्यागकर दिव्य देह धारण किया और सारा धन पुत्रों के अधीन कर दिया। पिता ने करोड़ों की संख्या में जो धन बाँटकर दिया था, उससे वे सदाचारी पुत्र बहुत प्रसन्न हुए। उनकी बुद्धि धर्म में लगी हुई थी; इसलिये उन्होंने बावली, कुआँ, पोखरा, यज्ञ तथा देवमन्दिर के लिये उस धन का उपयोग किया और अन्नशाला भी बनवायी। तत्पश्चात् सातवें अध्याय का सदा जप करते हुए उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। पार्वती! यह तुम्हें सातवें अध्याय का माहात्म्य बताया गया है; जिसके श्रवणमात्र से मानव सब पातकों से मुक्त हो जाता है।

​क्या आप चाहेंगे कि मैं गीता के किसी और अध्याय की जानकारी ढूँढने में आपकी मदद करूँ?

Gita ke 13 adhyay ki Katha | गीता के तेरहवें अध्याय की कथा

 Gita ke 13 adhyay ki Katha। गीता के तेरहवें अध्याय की कथा 


श्रीमहादेवजी कहते हैं—पार्वती! अब तेरहवें अध्यायकी अगाध महिमाका वर्णन सुनो। उसको सुननेसे तुम बहुत प्रसन्न होओगी। दक्षिण दिशामें तुंगभद्रा नामकी एक बहुत बड़ी नदी है। उसके किनारे हरिहरपुर नामक रमणीय नगर बसा हुआ है। वहाँ हरिहर नामसे साक्षात् भगवान् शिवजी विराजमान हैं, जिनके दर्शनमात्रसे परम कल्याणकी प्राप्ति होती है। हरिहरपुरमें हरिदीक्षित नामक एक श्रोत्रिय ब्राह्मण रहते थे, जो तपस्या और स्वाध्यायमें संलग्न तथा वेदोंके पारगामी विद्वान् थे। उनके एक स्त्री थी, जिसे लोग दुराचारा कहकर पुकारते थे। इस नामके अनुसार ही उसके कर्म भी थे। वह सदा पतिको कुवाच्य कहती थी। उसने कभी भी उनके साथ शयन नहीं किया। पतिसे सम्बन्ध रखनेवाले जितने लोग घरपर आते, उन सबको डाँट बताती और स्वयं कामोन्मत्त होकर निरन्तर व्यभिचारियोंके साथ रमण किया करती थी। एक दिन नगरको इधर-उधर आते-जाते हुए पुरवासियोंसे भरा देख उसने निर्जन एवं दुर्गम वनमें अपने लिये संकेतस्थान बना लिया। एक समय रातमें किसी कामीको न पाकर वह घरके किवाड़ खोल नगरसे बाहर संकेत स्थानपर चली गयी। उस समय उसका चित्त कामसे मोहित हो रहा था। वह एक-एक कुंजमें तथा प्रत्येक वृक्षके नीचे जा-जाकर किसी प्रियतमकी खोज करने लगी; किंतु उन सभी स्थानोंपर उसका परिश्रम व्यर्थ गया। उसे प्रियतमका दर्शन नहीं हुआ। तब वह उस वनमें नाना प्रकारकी बातें कहकर विलाप करने लगी। चारों दिशाओंमें घूम-घूमकर वियोगजनित विलाप करती हुई उस स्त्रीकी आवाज सुनकर कोई सोया हुआ बाघ जाग उठा और उछलकर उस स्थानपर पहुँचा, जहाँ वह रो रही थी। उधर वह भी उसे आते देख किसी प्रेमीकी आशंकासे उसके सामने खड़ी होनेके लिये ओटसे बाहर निकल आयी। उस समय व्याघ्रने आकर उसे नखरूपी बाणोंके प्रहारसे पृथ्वीपर गिरा दिया। इस अवस्थामें भी वह कठोर वाणीमें चिल्लाती हुई पूछ बैठी—'अरे बाघ! तू किसलिये मुझे मारनेको यहाँ आया है? पहले इन सारी बातोंको बता दे, फिर मुझे मारना।'

उसकी यह बात सुनकर प्रचण्ड पराक्रमी व्याघ्र क्षणभरके लिये उसे अपना ग्रास बनानेसे रुक गया और हँसता हुआ-सा बोला—'दक्षिण देशमें मलपहा नामक एक नदी है। उसके तटपर मुनिपर्णा नगरी बसी हुई है। वहाँ पंचलिंग नामसे प्रसिद्ध साक्षात् भगवान् शंकर निवास करते हैं। उसी नगरीमें मैं ब्राह्मणकुमार होकर रहता था। नदीके किनारे अकेला बैठा रहता और जो यज्ञके अधिकारी नहीं हैं, उन लोगोंसे भी यज्ञ कराकर उनका अन्न खाया करता था। इतना ही नहीं, धनके लोभसे सदा अपने वेदपाठके फलको भी बेचा करता था। मेरा लोभ यहाँतक बढ़ गया था कि अन्य भिक्षुओंको गालियाँ देकर हटा देता और स्वयं दूसरोंको नहीं देनेयोग्य धन भी बिना दिये ही हमेशा ले लिया करता था। ऋण लेनेके बहाने मैं सब लोगोंको छला करता था। तदनन्तर कुछ काल व्यतीत होनेपर मैं बूढ़ा हुआ। मेरे बाल सफेद हो गये, आँखोंसे सूझता न था और मुँहके सारे दाँत गिर गये। इतनेपर भी मेरी दान लेनेकी आदत नहीं छूटी। पर्व आनेपर प्रतिग्रहके लोभसे मैं हाथमें कुश लिये तीर्थके समीप चला जाया करता था। तत्पश्चात् जब मेरे सारे अंग शिथिल हो गये, तब एक बार मैं कुछ धूर्त ब्राह्मणोंके घरपर माँगने-खानेके लिये गया। उसी समय मेरे पैरमें कुत्तेने काट लिया। तब मैं मूर्च्छित होकर क्षणभरमें पृथ्वीपर गिर पड़ा। मेरे प्राण निकल गये। उसके बाद मैं इसी व्याघ्रयोनिमें उत्पन्न हुआ। तबसे इस दुर्गम वनमें रहता हूँ तथा अपने पूर्व पापोंको याद करके कभी धार्मिक महात्मा, यति, साधु पुरुष तथा सती स्त्रियोंको मैं नहीं खाता। पापी-दुराचारी तथा कुलटा स्त्रियोंको ही मैं अपना भक्ष्य बनाता हूँ; अतः कुलटा होनेके कारण तू अवश्य ही मेरा ग्रास बनेगी।'

यूँ कहकर वह अपने कठोर नखोंसे उसके शरीरके टुकड़े-टुकड़े करके खा गया। इसके बाद यमराजके दूत उस पापिनीको संयमनीपुरीमें ले गये। वहाँ यमराजकी आज्ञासे उन्होंने अनेकों बार उसे विष्ठा, मूत्र और रक्तसे भरे हुए भयानक कुण्डोंमें गिराया। करोड़ों कल्पोंतक उसमें रखनेके बाद उसे वहाँसे ले आकर सी मन्वन्तरोंतक रौरव नरकमें रखा। फिर चारों ओर मुँह करके दीनभावसे रोती हुई उस पापिनीको वहाँसे खींचकर दहनानन नामक नरकमें गिराया। उस समय उसके केश खुले हुए थे और शरीर भयानक दिखायी देता था। इस प्रकार घोर नरकयातना भोग चुकनेपर वह महापापिनी इस लोकमें आकर चाण्डाल-योनिवें उत्पन्न हुई। चाण्डालके घरमें भी प्रतिदिन बकती हुई वह पूर्वजन्मके अभ्याससे पूर्ववत् पापोंमें प्रवृत्त रही। फिर उसे कोढ़ और राजयक्ष्माका रोग हो गया। नेत्रोंमें पीड़ा होने लगी। फिर कुछ कालके पश्चात् वह पुनः अपने निवासस्थान (हरिहरपुर) को गयी, जहाँ भगवान् शिवके अन्तःपुरकी स्वामिनी (हरिहरपुरकी अधिष्ठात्री देवी) विराजमान हैं। वहाँ उसने वासुदेव नामक एक पवित्र ब्राह्मणका दर्शन किया, जो निरन्तर गीताके तेरहवें अध्यायका पाठ करता रहता था। उसके मुखसे गीताका पाठ सुनते ही वह चाण्डालशरीरसे मुक्त हो गयी और दिव्य देह धारण करके स्वर्गलोकमें चली गयी।

geeta ke 4 adhyay ki katha | गीता के चौथे अध्याय की कथा

श्रीमद्भगवद् गीता के चौथे अध्याय का माहात्म्य

श्रीभगवान् कहते हैं—प्रिये! अब मैं चौथे अध्याय का माहात्म्य बतलाता हूँ। सुनो, भागीरथी के तट पर वाराणसी (बनारस) नाम की एक पुरी है। वहाँ विश्वनाथजी के मन्दिर में भरत नाम के एक योगनिष्ठ महात्मा रहते थे, जो प्रतिदिन आत्मचिन्तन में तत्पर हो आदरपूर्वक गीता के चतुर्थ अध्याय का पाठ किया करते थे। उसके अभ्यास से उनका अन्तःकरण निर्मल हो गया था। वे शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वों से कभी व्यथित नहीं होते थे।

एक समय की बात है, वे तपोधन नगर की सीमा में स्थित देवताओं का दर्शन करने की इच्छा से भ्रमण करते हुए नगर से बाहर निकल गये। वहाँ बेर (Ber) के दो वृक्ष थे। उन्हीं की जड़ में वे विश्राम करने लगे। एक वृक्ष की जड़ में उन्होंने अपना मस्तक रखा था और दूसरे वृक्ष के मूल में उनका एक पैर टिका हुआ था। थोड़ी देर बाद जब वे तपस्वी चले गये तब बेर के वे दोनों वृक्ष पाँच ही छह दिनों के भीतर सूख गये। उनमें पत्ते और डालियाँ भी नहीं रह गयीं। तत्पश्चात वे दोनों वृक्ष कहीं ब्राह्मणों के पवित्र गृह में दो कन्याओं के रूप में उत्पन्न हुए।

वे दोनों कन्याएँ जब बढ़कर सात वर्ष की हो गयीं, तब एक दिन उन्होंने दूर देशों से घूमकर आते हुए भरतमुनि को देखा। उन्हें देखते ही वे दोनों उनके चरणों में पड़ गयीं और मीठी वाणी में बोलीं—'मुने! आपकी ही कृपा से हम दोनों का उद्धार हुआ है। हमने बेर की योनि त्यागकर मानव-शरीर प्राप्त किया है।' उनके इस प्रकार कहने पर मुनि को बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने पूछा—'पुत्रियों! मैंने कब और किस साधन से तुम्हें मुक्त किया था? साथ ही यह भी बताओ कि तुम्हारे बेर के वृक्ष होने में क्या कारण था? क्योंकि इस विषय में मुझे कुछ भी ज्ञात नहीं है।'

तब वे कन्याएँ पहले उन्हें अपने बेर हो जाने का कारण बतलाती हुई बोलीं—"मुने! गोदावरी नदी के तट पर छिन्नपाप नामक एक उत्तम तीर्थ है, जो मनुष्यों को पुण्य प्रदान करनेवाला है। वह पावनता की चरम सीमा पर पहुँचा हुआ है। उस तीर्थ में सत्यतपा नामक एक तपस्वी बड़ी कठोर तपस्या कर रहे थे। वे ग्रीष्म-ऋतु में प्रज्वलित अग्नियों के बीच में बैठते थे, वर्षाकाल में जल की धाराओं से उनके मस्तक के बाल सदा भीगे ही रहते थे तथा जाड़े के समय जल में निवास करने के कारण उनके शरीर में हमेशा रोंगटे खड़े रहते थे। वे बाहर-भीतर से सदा शुद्ध रहते, समय पर तपस्या करते तथा मन और इन्द्रियों को संयम में रखते हुए परम शान्ति प्राप्त करके आत्मा में ही रमण करते थे।

वे अपनी विद्वत्ता के द्वारा जैसा व्याख्यान करते थे, उसे सुनने के लिये साक्षात् ब्रह्माजी भी प्रतिदिन उनके पास उपस्थित होते और प्रश्न करते थे। ब्रह्माजी के साथ उनका संकोच नहीं रह गया था, अतः उनके आने पर भी वे सदा तपस्या में मग्न रहते थे। परमात्मा के ध्यान में निरन्तर संलग्न रहने के कारण उनकी तपस्या सदा बढ़ती रहती थी। सत्यतपा को जीवन्मुक्त के समान मानकर इन्द्र को अपने समृद्धिशाली पद के सम्बन्ध में कुछ भय हुआ, तब उन्होंने उनकी तपस्या में सैकड़ों विघ्न डालने आरम्भ किये। अप्सराओं के समुदाय से हम दोनों को बुलाकर इन्द्र ने इस प्रकार आदेश दिया—'तुम दोनों उस तपस्वी की तपस्या में विघ्न डालो, जो मुझे इन्द्रपद से हटाकर स्वयं स्वर्ग का राज्य भोगना चाहता है।'

इन्द्र का यह आदेश पाकर हम दोनों उनके सामने से चलकर गोदावरी के तीर पर, जहाँ वे मुनि तपस्या करते थे, आयीं। वहाँ मन्द एवं गम्भीर स्वर से बजते हुए मृदंग तथा मधुर वेणुनाद के साथ हम दोनों ने अन्य अप्सराओं सहित मधुर स्वर में गान आरम्भ किया। इतना ही नहीं, उन योगी महात्मा को वश में करने के लिये हमलोग स्वर, ताल और लय के साथ नृत्य भी करने लगीं। बीच-बीच में ज़रा-ज़रा सा अंचल खिसकने पर उन्हें हमारी छाती भी दीख जाती थी। हम दोनों की उन्मत्त गति कामभाव का उद्दीपन करनेवाली थी, किंतु उसने उन निर्विकार चित्तवाले महात्मा के मन में क्रोध का संचार कर दिया। तब उन्होंने हाथ से जल छोड़कर हमें क्रोधपूर्वक शाप दिया—'अरी! तुम दोनों गंगाजी के तट पर बेर के वृक्ष हो जाओ।' यह सुनकर हमलोगों ने बड़ी विनय के साथ कहा—'महात्मन्! हम दोनों पराधीन थीं, अतः हमारे द्वारा जो दुष्कर्म बन गया है, उसे आप क्षमा करें।' यों कहकर हमने मुनि को प्रसन्न कर लिया।

तब उन पवित्र चित्तवाले मुनि ने हमारे शापोद्धार की अवधि निश्चित करते हुए कहा—'भरतमुनि के आने तक ही तुमपर यह शाप लागू होगा। उसके बाद तुमलोगों का मर्त्यलोक में जन्म होगा और पूर्वजन्म की स्मृति बनी रहेगी।' 'मुने! जिस समय हम दोनों बेर-वृक्ष के रूप में खड़ी थीं, उस समय आपने हमारे समीप आकर गीता के चौथे अध्याय का जप करते हुए हमारा उद्धार किया था, अतः हम आपको प्रणाम करती हैं। आपने केवल शाप से ही नहीं, इस भयानक संसार से भी गीता के चतुर्थ अध्याय के पाठ द्वारा हमें मुक्त कर दिया।'

श्रीभगवान् कहते हैं—उन दोनों के इस प्रकार कहने पर मुनि बहुत ही प्रसन्न हुए और उनसे पूजित हो विदा लेकर जैसे आये थे, वैसे ही चले गये तथा वे कन्याएँ भी बड़े आदर के साथ प्रतिदिन गीता के चतुर्थ अध्याय का पाठ करने लगीं, जिससे उनका उद्धार हो गया।




Shrimad Bhagwad Geeta ke dusra adhyay ki katha | श्रीमद्भगवद्गीता: द्वितीय अध्याय का माहात्म्य

 श्रीमद्भगवद्गीता: द्वितीय अध्याय का माहात्म्य

श्रीभगवान् कहते हैं—लक्ष्मी! प्रथम अध्याय के माहात्म्य का उत्तम उपाख्यान मैंने तुम्हें सुना दिया। अब अन्य अध्यायों के माहात्म्य श्रवण करो।

दक्षिण दिशा में पुरन्दरपुर नामक नगर में देवशर्मा नामक एक विद्वान ब्राह्मण रहते थे। वे अतिथियों के पूजक, स्वाध्यायशील, वेद-शास्त्रों के विशेषज्ञ, यज्ञों का अनुष्ठान करने वाले और तपस्वियों के सदा ही प्रिय थे। उन्होंने उत्तम द्रव्यों के द्वारा अग्नि में हवन करके दीर्घकाल तक देवताओं को तृप्त किया, किंतु उन धर्मात्मा ब्राह्मण को कभी सदा रहने वाली शान्ति न मिली। वे परम कल्याणमय तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा से प्रतिदिन प्रचुर सामग्रियों के द्वारा सत्य-संकल्प वाले तपस्वियों की सेवा करने लगे।

इस प्रकार शुभ आचरण करते हुए उन्हें बहुत समय बीत गया। तदनन्तर एक दिन पृथ्वी पर उनके समक्ष एक त्यागी महात्मा प्रकट हुए। वे पूर्ण अनुभवी, आकांक्षा रहित, नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि रखने वाले तथा शान्तचित्त थे। निरन्तर परमात्मा के चिन्तन में संलग्न हो वे सदा आनन्दविभोर रहते थे। देवशर्मा ने उन नित्यसंतुष्ट तपस्वी को शुद्धभाव से प्रणाम किया और पूछा— 'महात्मन्! मुझे शान्तिमयी स्थिति कैसे प्राप्त होगी?'

तब उन आत्मज्ञानी संत ने देवशर्मा को सौपुर ग्राम के निवासी मित्रवान् का परिचय दिया, जो बकरियों का चरवाहा था, और कहा— 'वही तुम्हें उपदेश देगा।'

यह सुनकर देवशर्मा ने महात्मा के चरणों की वन्दना की और समृद्धशाली सौपुर ग्राम में पहुँचकर उसके उत्तर भाग में एक विशाल वन देखा। उसी वन में नदी के किनारे एक शिला पर मित्रवान् बैठा था। उसके नेत्र आनन्दातिरेक से निश्चल हो रहे थे— वह अपलक दृष्टि से देख रहा था। वह स्थान आपस का स्वाभाविक वैर छोड़कर एकत्रित हुए परस्पर विरोधी जन्तुओं से घिरा था। मृगों के झुंड शान्त भाव से बैठे थे और मित्रवान् दया से भरी हुई आनन्दमयी दृष्टि से पृथ्वी पर मानो अमृत छिड़क रहा था।

देवशर्मा ने विनम्रता से उससे आत्म-ज्ञान का उपाय पूछा। मित्रवान् ने अपनी एक घटना सुनाई:

"विद्वन्! एक समय मैं वन में बकरियों की रक्षा कर रहा था। तभी एक भयानक व्याघ्र (बाघ) आया। मैं डरकर भागने लगा, किंतु एक बकरी निडर होकर नदी के किनारे उस बाघ के पास चली गई। व्याघ्र का द्वेष मिट गया और वह चुपचाप खड़ा हो गया। बकरी ने कहा— 'व्याघ्र! तुम्हें तो अभीष्ट भोजन प्राप्त हुआ है, मेरे शरीर से मांस निकालकर प्रेमपूर्वक खाओ न।'

व्याघ्र बोला— 'बकरी! इस स्थान पर आते ही मेरे मन से द्वेष का भाव निकल गया। भूख-प्यास भी मिट गई।'

हम दोनों पास खड़े एक वानरराज के पास गए। वानरराज ने बताया कि सामने वन के भीतर जो मंदिर है, उसमें ब्रह्माजी द्वारा स्थापित एक शिवलिंग है। पूर्वकाल में वहाँ सुकर्मा नामक महात्मा रहते थे। एक बार उनके पास एक अतिथि आए। सुकर्मा की सेवा से प्रसन्न होकर उन अतिथि ने एक शिलाखंड पर गीता का दूसरा अध्याय लिख दिया और सुकर्मा को उसका पाठ करने को कहा।

सुकर्मा के अभ्यास से उनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया और उन्हें आत्मज्ञान प्राप्त हुआ। उस स्थान पर गीता के द्वितीय अध्याय के प्रभाव से ही भूख, प्यास, क्रोध और वैर-भाव का नाश हो गया है।"

मित्रवान् ने कहा— "मैंने भी उस मंदिर में जाकर शिला पर लिखे द्वितीय अध्याय को पढ़ा और उसी की आवृत्ति से मैंने तपस्या का पार पा लिया है। अतः भद्रपुरुष! तुम भी सदा द्वितीय अध्याय की ही आवृत्ति किया करो।"

श्रीभगवान् कहते हैं— प्रिये! मित्रवान् के इस प्रकार आदेश देने पर देवशर्मा ने उसका पूजन किया और पुरन्दरपुर लौट आए। वहाँ किसी देवालय में उन्होंने द्वितीय अध्याय का पाठ शुरू किया। उससे उन्हें शुद्ध अन्तःकरण और परम पद की प्राप्ति हुई।

यह द्वितीय अध्याय का माहात्म्य पूर्ण हुआ।






trimbakeshwar jyotirlinga katha | त्रंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा

 trimbakeshwar jyotirlinga katha | त्रंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा

प्राचीन काल की बात है, जब भारत की भूमि ऋषियों के तपोबल से ओतप्रोत थी। नासिक के निकट स्थित ब्रह्मगिरि पर्वत की वादियों में महर्षि गौतम अपनी धर्मपत्नी अहिल्या के साथ निवास करते थे। वह समय बड़ा ही कठिन था, क्योंकि वरुण देव के कोप के कारण पूरी पृथ्वी पर सौ वर्षों का भीषण अकाल पड़ा था। नदियां सूख चुकी थीं और हरियाली का नामोनिशान मिट गया था। ऐसी विकट परिस्थिति में महर्षि गौतम ने अपनी तपस्या से वरुण देव को प्रसन्न किया और एक अक्षय जल कुंड प्राप्त किया। इस कुंड की विशेषता यह थी कि इसका जल कभी समाप्त नहीं होता था।

​महर्षि गौतम ने उस दिव्य जल का उपयोग केवल प्यास बुझाने के लिए नहीं, बल्कि परोपकार के लिए किया। उन्होंने अपने तपोबल से प्रतिदिन अनाज उगाया और अकाल से पीड़ित अन्य ऋषियों और उनके परिवारों को शरण दी। धीरे-धीरे गौतम ऋषि का आश्रम एक विशाल अन्नक्षेत्र बन गया। जहाँ लोग भूख से मर रहे थे, वहाँ गौतम ऋषि के सान्निध्य में सभी सुखी थे। लेकिन कहते हैं न कि मनुष्य की ईर्ष्या कभी-कभी उसके विवेक पर भारी पड़ जाती है। आश्रम में शरण लेने वाले कुछ ऋषियों के मन में महर्षि गौतम की बढ़ती ख्याति को देखकर द्वेष उत्पन्न हो गया। उन्होंने मिलकर गौतम ऋषि को अपमानित करने और उन्हें वहां से निकालने का षड्यंत्र रचा।

​इन ऋषियों ने भगवान गणेश की आराधना की और उनसे वरदान माँगा कि गौतम ऋषि पर कोई ऐसा लांछन लगे जिससे उन्हें यह स्थान छोड़ना पड़े। गणेश जी ने उन्हें बहुत समझाया कि उपकारी के साथ छल करना पाप है, परंतु ऋषियों के दुराग्रह के कारण उन्हें एक लीला रचनी पड़ी। गणेश जी ने एक अत्यंत दुर्बल और मरणासन्न गाय का रूप धारण किया और महर्षि गौतम के जौ के खेत में जाकर चरने लगे। जब महर्षि ने अपनी फसल को बचाने के लिए हाथ में एक कोमल तिनका लेकर उस गाय को धीरे से पुचकारा, तो स्पर्श मात्र से वह मायावी गाय वहीं गिर पड़ी और उसने प्राण त्याग दिए।

​छिपे हुए ऋषियों ने तुरंत बाहर आकर शोर मचा दिया और महर्षि गौतम पर 'गौ-हत्या' का घोर कलंक लगा दिया। समाज से बहिष्कृत होने के बाद, आत्मग्लानि से भरे गौतम ऋषि ने इस पाप से मुक्ति का मार्ग पूछा। कुटिल ऋषियों ने उनके सामने असंभव शर्तें रख दीं—पूरी पृथ्वी की परिक्रमा, ब्रह्मगिरि के फेरे और अंत में स्वर्ग से गंगा को धरती पर लाना, ताकि उनके जल से शुद्धि हो सके। महर्षि गौतम ने इसे ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार कर लिया। उन्होंने और माता अहिल्या ने भगवान शिव की कठोर आराधना शुरू की।

​उनकी निश्छल भक्ति और वर्षों के तप से प्रसन्न होकर महादेव साक्षात प्रकट हुए। शिव जी ने गौतम ऋषि को बताया कि वे निर्दोष हैं और यह सब उन ऋषियों का षड्यंत्र था। महादेव उन ऋषियों को दंड देना चाहते थे, लेकिन क्षमाशील महर्षि गौतम ने उनके पैर पकड़ लिए और कहा कि प्रभु, उन ऋषियों का आभार है जिनकी वजह से मुझे आपके दर्शन प्राप्त हुए। उन्होंने महादेव से प्रार्थना की कि वे गंगा माता को वहां भेज दें। तब शिव जी ने अपनी जटाओं को झटका, जिससे गंगा की धारा वहां प्रकट हुई, जिसे आज हम गोदावरी के नाम से जानते हैं।

​गंगा जी ने शर्त रखी कि वह तभी वहां रुकेंगी जब महादेव भी वहां निवास करेंगे। देवताओं की स्तुति और भक्तों के कल्याण के लिए भगवान शिव वहां 'त्र्यंबकेश्वर' के रूप में विराजमान हो गए। यहाँ के ज्योतिर्लिंग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश, तीनों देवों के छोटे लिंग समाहित हैं, जो त्रिदेवों की एकता का प्रतीक हैं। यह पावन कथा हमें सिखाती है कि सत्य और धैर्य के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति का साथ स्वयं ईश्वर देते हैं और अंततः सत्य की ही विजय होती है। आज भी त्र्यंबकेश्वर की यह पावन धरती भक्तों को पापमुक्त कर उन्हें आध्यात्मिक शांति प्रदान करती है।




 भजन    गुण मिलान   
 108 नामावली    ज्योतिष 
   पूजा पाठ कहानी व्रत कथा

   

Siv Parwati Kahani | शिव पार्वती भाग्य की कहानी

 एक बार भगवान शिव और मां पार्वती भ्रमण करते हुए मृत्यु लोक में आ पहुंचे यहां उन्होंने देखा कि एक ब्राह्मण भगवान का पूजन पाठ कर रहा था परंतु उसके पास आज भोजन कर ले तो कल का कोई ठिकाना नहीं था यहां तक की सुबह भोजन कर ले तो शाम का भी कोई ठिकाना नहीं ।

 ऐसा देखकर माता पार्वती को बड़ी दया आ गई और भगवान शिव से माता पार्वती बोली की है भोलेनाथ आप दया के सागर हो आप देवाधिदेव हो महादेव हो आप इस ब्राह्मण के ऊपर कुछ कृपा करिए । ऐसा सुनकर भगवान शिव ने उस ब्राह्मण को देखा और माता पार्वती से बोले पार्वती इस ब्राह्मण के भाग्य में कुछ भी नहीं है इसने अपने पिछले जन्मों में ऐसा कुछ काम नहीं किया जिससे इसको धन मिल सके इसलिए इसको किसी भी प्रकार से धन नहीं दिया जा सकता 

 माता पार्वती ने हठ पकड़ लिया और बहुत जिद करने के बाद में भगवान शिव बोले है पार्वती यह ब्राह्मण जिस रास्ते से जाएगा उस रास्ते पर एक धन की पोटली रख देंगे यदि इसने वह पोटली उठा ली तो वह धनवान हो जाएगा और हम आगे बढ़ जाएंगे ।

भगवान शिव ने इसी प्रकार किया जिस रास्ते से ब्राह्मण जाने वाला था उस रास्ते पर एक धन के पोटली रख दी परंतु ब्राह्मण पोटली के पास पहुंचने वाला था कि उसके मन में विचार आया कि आज तो मेरे पास दो आंखें हैं यदि यह बुढ़ापे में काम नहीं करें तो मैं कैसे अपना गुजरा करूंग इसलिए मैं हो सके तो अंधा होने की प्रैक्टिस अभ्यास आज ही कर लेता हूं तो मुझे बुढ़ापे में काम आएगा उसने पोटली आने के पहले आंखें बंद कर ली और जैसे ही पोटली आई तो उसने उस पोटली को लात मार आगे बढ़ गया ।

तब भगवान शिव ने कहा देखो पार्वती मैंने कहा था ना इसके नसीब में इसके भाग्य में धन लिखा ही नहीं है तो इसे कोई भी नहीं दे सकता परंतु माता पार्वती शांत नहीं हुई बोली इस प्रकार से नहीं इसके घर पर जाकर आप इस भक्त पर कृपा कर वरदान के रूप में वर दीजिए तब भगवान शिव बोले पार्वती तुम कहती हो तो मैं चला जाता हूं और तुम इस अकेले को वरदान देने के लिए कह रही हो मैं इसके घर में जितने लोग हैं सब को एक-एक वरदान दूंगा पर देख लेना कुछ होना नहीं है ऐसा कर कर भगवान शंकर ब्राह्मण के एक साधु का भेष धारण करके चले गए ।

साधु बनकर भगवान ने ब्राह्मण के घर के बाहर अलख निरंजन अलख निरंजन इस प्रकार आवाज की ब्राह्मण बाहर आया और बोला भैया हमारे घर में तुम्हें देने के लायक कुछ भी नहीं मैं खुद भिक्षाटन करता हूं मांग कर खाता हूं तो साधु रूप धारण किए हुए भगवान शिव ने कहा हे ब्राह्मण तुझ पर भगवान अति प्रसन्न है तुम वर मांगो तेरे घर में जितने लोग हैं सब लोग एक-एक वरदान मांग लो और तुम्हें अब भीक्षा मांगने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी । 

इस प्रकार सुनकर अपने परिवार के सभी सदस्यों को बुलाया जिसमें उसकी पत्नी और एक उसका लड़का था तब भगवान ने कहा पहले कौन वरदान मांगेगा ।

तब ब्राह्मण ने मन मे विचार किया कि मैं तीन रोटी लाता हूं तो ब्राह्मणी बराबर बांट देती है और चार रोटी लाता हूं तो भी बराबर बांट देती है और यदि दो रोटी लेकर आता हूं तो भी बराबर बांट देती है इसलिए ब्राह्मणी मांगने में बड़ी होशियार है उसको ही पहले मांगने का अधिकार दिया जाना चाहिए तो ब्राह्मण ने ब्राह्मणी से कहा पहले तुम मांगो ब्राह्मणी से जैसे ही वर मांगने के लिए कहा तो ब्राह्मणी बड़े-बड़े ख्वाब देखने लगी और उसने धन के लालच में बड़ा बनने के लिए भगवान से मांगा की है भगवान मुझे देना चाहते हो तो जो राजा जा रहा है उसकी रानी बना दो भगवान ने तथास्तु कहा तुरंत ही रानी बन गई ।

परंतु ब्राह्मण को बड़ा गुस्सा आ गया उसने भगवान के कहने से पहले ही बोला कि हे भगवान मुझे यदि कुछ देना चाहते हो तो उस ब्राह्मणी को काली कलूटी बना दो तब क्या था भगवान शिव ने तथास्तु कहा और वह देखते ही देखते राजा के पीछे बैठी हुई काली कलूटी  बन गई जब राजा ने देखा कि कोई स्त्री काली कलूटी बैठी हुई है तो उसने उठाकर नीचे फेंक दिया ।

 अब वरदान के लिए एक बालक बच गया था तब भगवान ने कहा बालक जो तुम्हें मांगना है मांग लो तब बालक ने कहा हे भगवान मेरी मां जैसे पहले थी वैसे ही कर दो हमें और कुछ नहीं चाहिए भगवान तथास्तु ककह कर आ गए और माता पार्वती से बोले पार्वती मैंने कहा था ना कि जिसने पिछले जन्म में कुछ किसी को दिया ही नहीं हो तो उसको इस जन्म में कुछ नहीं मिल सकता अर्थात अगर भाग्य में नहीं है तो भगवान स्वयं खुद देना चाहे तो भी नहीं दे सकते ।

निष्कर्ष  भाग्य के बिना और समय के पहले किसी को कुछ नहीं मिल सकता ।

कहानी कुछ न्याय इसी जीवन में होते हैं

 कहानी कुछ न्याय इसी जीवन में होते हैं

कहानी 

एक जितेंद्र नाम का व्यक्ति शहर में व्यापार किया करता था वह मेहनती था निष्ठा के साथ अपना कार्य किया करता था एक दिन उसकी मित्रता एक संजय नाम के व्यक्ति से हो गई !

संजय का हाल बहुत खराब था वह काम के लिए तरस रहा था उसे कभी रोजगार प्राप्त होता तो कभी नहीं होता एक दिन उसने अपनी व्यथा जितेंद्र को सुनाई और कहा कि मेरे बच्चे स्कूल में पढ़ रहे हैं मुझे धन की बड़ी जरूरत है कोई काम हो तो जरूर बताओ जितेंद्र ने भी उसको मित्र जैसा समझा क्योंकि जितेंद्र के पास चार-पांच कंपनियों का काम था इसलिए उसने दो कंपनियों का काम उसे दे दिया !

समय का पहिया इस तरह घूम गया कि जितेंद्र के पास 5 कंपनियों का काम था उसके पास काम ना के बराबर रह गया और संजय के पास दो कंपनियों से 9 कंपनी का काम हो गया था एक दिन जितेंद्र ने उसे कहा कि मुझे भी काम की जरूरत है परंतु उसने सुना अनसुना कर दिया उसने जो जितेंद्र से जरूर के समय दो कंपनियों का काम लिया था वह भी वापस नहीं दिया !

जितेंद्र का समय फिर बदल गया उसके पास ज्ञान की कोई कमी नहीं थी इसलिए कई कंपनियों का आर्डर आने लगा फिर जितेंद्र का काम चालू हो गया दोनों मित्र बने हुए थे कभी अपनी कंपनी का ऑर्डर संजय से पूरा करा था तो संजय कभी अपनी कंपनी का आर्डर जितेंद्र से पूरा कर लेता था इस प्रकार कई दिन बीत गए परंतु कई मामलों में संजय जब उलझ जाता था तो वह जितेंद्र की मदद लिया करता था इसके कारण जितेंद्र को अपने ज्ञान का घमंड हो गया था और कई कमियां संजय की निकाल कर उसे क्रोध में डांट फटकार कर दिया करता था भले ही यह जितेंद्र का अपनापन था परंतु संजय को यह रास नहीं आया वह सोचने लगा कि कब मुझे मौका मिलेगा तो मैं उसे इसी प्रकार से डांट फटकार कर अपना बदला पूरा करूंगा !

संजय के किसी कामकाज के सिलसिला में जितेंद्र के साथ में 5 लोग मिलजुल के बात कर रहे थे उसी समय संजय ने बहाना और बात बनाते हुए कहा कि ईन्होंने कौन सा मुझे काम दिया था जो इन्होंने दिया था उसको मैंने अगले महीने ही बढ़ा कर दे दिया था ! संजय ने यही बात दो-तीन बार दो-तीन जगह दोहराई तब जितेंद्र ने कहा कि मैंने अपना गुणगान सुनने के लिए या मदद जताने के लिए नहीं की थी आप बार-बार इसे मत सुनाया करो यह सुनकर संजय को फिर बुरा लगा और जितेंद्र से ज्ञान की बातें सुन सुन कर वह सोच रहा था कि मैं अब इसे ज्ञान कब दूं क्योंकि जितेंद्र का ज्ञान का घमंड तीसरी आसमान पर पहुंच गया था क्युकि तर्क वितर्क करने में और ज्ञान देने में जितेंद्र को अधिक आनंद आता था !

एक दिन सहयोग इस प्रकार बना कि संजय ने किसी काम के लिए जितेंद्र को बुलाया परंतु जितेंद्र ने कहा कि मेरे पास काम है परंतु मैं तुम्हारे काम के लिए आ जाऊंगा और सच में उसने अपना काम छोड़कर संजय के काम हो तवज्जो दी परंतु संजय यह स्वीकार नहीं कर पाया कि मेरे लिए कोई अपना काम कैसे छोड़ सकता है इसलिए उसने जितेंद्र को झूठा कहा और उसके मित्र को भी झूठा कहा यह जितेंद्र सहन नहीं कर पाया और उसने संजय से अपने मित्रता के साथ-साथ कामकाज के रिश्ते भी तोड़ लिए !

एक दिन संजय ने अपने काम के लिए अपने गांव से एक मित्र को बुलाया और अपना काम सौंप दिया परंतु उसके मित्र ने संजय की जिस कंपनी में अच्छी चलती थी जहां से उसे अच्छा रोजगार प्राप्त होता था वहां चुगली करने शुरू कर दी उसके काम में कमियां निकालना शुरू कर दी जिसके कारण संजय को बड़ा नुकसान हुआ और उसके मित्र ने कुछ ऐसा किया कि पुलिस तक जाने की नौबत आ गई संजय की बड़ी बदनामी हुई कई दिनों कई महीनो तक वह यह सोचता रह गया कि मेरे किस कार्य के कारण मेरे साथ ऐसी घटना घटी इसी दुख के साथ-साथ दूसरी कंपनियों में अपना कामकाज करने लगा और जीवन धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा !

निष्कर्ष

जितेंद्र की तरह किसी को भी ज्ञान का घमंड नहीं होना चाहिए घमंड में कही हुई बातों से रिश्ते टूटते हैं जुड़ते नहीं है और संजय ने जितेंद्र का एहसान माना नहीं एक दिन संजय जिस मित्र को गांव से लाया था उस मित्र ने भी संजय का एहसान माना नहीं अर्थात यदि आप किसी को यश देते हैं तो आपको यश मिलता है आप किसी को अच्छा कहेंगे तो आपको भी लोग अच्छा कहेंगे ! जैसा लोगों को दोगे वैसा ही प्राप्त होगा !

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Hindi kahani दो दोस्तों की कहानी कहानी मेहनत की और लालच की

 




Hindi kahani दो दोस्तों की कहानी कहानी मेहनत की और लालच की

परिचय

एक छोटे से गाँव में, राम और श्याम नाम के दो दोस्त रहते थे। राम बहुत ही मेहनती और ईमानदार था, जबकि श्याम थोड़ा आलसी और चालाक। दोनों की दोस्ती बचपन से थी, लेकिन उनके स्वभाव में जमीन-आसमान का अंतर था। एक दिन, गाँव में एक प्रतियोगिता आयोजित की गई, जिसमें सबसे अच्छा काम करने वाले को इनाम दिया जाना था। राम ने मेहनत से काम किया, जबकि श्याम ने चालाकी से काम निकालने की कोशिश की। इस कहानी के माध्यम से हमें यह सीख मिलती है कि मेहनत और ईमानदारी हमेशा फल देती है।


 Hindi kahani दो दोस्तों की कहानी कहानी मेहनत की और लालच की


### h1: प्रतियोगिता की घोषणा


एक दिन, गाँव के सरपंच ने घोषणा की कि अगले सप्ताह एक प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। इस प्रतियोगिता में गाँव के सभी युवाओं को भाग लेना था। प्रतियोगिता का विषय था "सबसे उपयोगी और सुंदर वस्तु बनाना"। जो भी इस प्रतियोगिता में जीतेगा, उसे गाँव की तरफ से एक बड़ा इनाम दिया जाएगा।


राम और श्याम दोनों ने इस प्रतियोगिता में भाग लेने का फैसला किया। राम ने सोचा कि वह अपने हाथों से कुछ ऐसा बनाएगा जो गाँव के लिए उपयोगी हो। उसने लकड़ी से एक सुंदर और मजबूत बेंच बनाने का निर्णय लिया। दूसरी ओर, श्याम ने सोचा कि वह कुछ ऐसा बनाएगा जो दिखने में सुंदर हो, चाहे वह उपयोगी हो या न हो। उसने कागज से एक सुंदर फूलदान बनाने का निर्णय लिया।

राम की मेहनत


राम ने अपने काम में जुट गया। वह रोज सुबह उठकर जंगल जाता और अच्छी लकड़ी ढूंढता। फिर वह उसे घर लाकर, उस पर मेहनत से काम करता। वह चाहता था कि उसकी बेंच न केवल सुंदर हो, बल्कि मजबूत और टिकाऊ भी हो। उसने बेंच को इस तरह से डिजाइन किया कि वह गाँव के बुजुर्गों के लिए आरामदायक हो। राम की मेहनत और लगन देखकर गाँव के लोग उसकी तारीफ करते।


 श्याम की चालाकी


दूसरी ओर, श्याम ने अपने काम में चालाकी दिखाई। उसने सोचा कि क्यों इतनी मेहनत करें, जब कम मेहनत में भी काम चल सकता है। उसने कागज से एक सुंदर फूलदान बनाया, जो दिखने में तो आकर्षक था, लेकिन उपयोग में नहीं आ सकता था। श्याम ने सोचा कि चूंकि प्रतियोगिता में सुंदरता का मूल्यांकन होगा, इसलिए उसका फूलदान जीत जाएगा। उसने अपने फूलदान को रंग-बिरंगे कागज से सजाया और उसे आकर्षक बनाने की पूरी कोशिश की।

राम की बेंच लकड़ी से बनी थी, जो मजबूत और टिकाऊ थी। उसने बेंच को इस तरह से डिजाइन किया था कि वह न केवल सुंदर दिखे, बल्कि उपयोग में भी आसान हो। बेंच की सीट और पीठ को आरामदायक बनाने के लिए उसने उसे थोड़ा घुमावदार बनाया था। बेंच के पैरों को मजबूत बनाने के लिए उसने उन्हें थोड़ा मोटा रखा था।


श्याम का फूलदान कागज से बना था, जो दिखने में तो सुंदर था, लेकिन उपयोग में नहीं आ सकता था। उसने फूलदान को रंग-बिरंगे कागज से सजाया था और उसके ऊपर चमकीले रंगों का उपयोग किया था। फूलदान का आकार सुंदर था, लेकिन वह पानी नहीं रोक सकता था, इसलिए उसमें फूल रखना संभव नहीं था।


निष्कर्ष


प्रतियोगिता के दिन, गाँव के सभी लोग इकट्ठा हुए। राम ने अपनी बेंच प्रस्तुत की, जो न केवल सुंदर थी, बल्कि उपयोगी भी थी। श्याम ने अपना फूलदान प्रस्तुत किया, जो दिखने में तो आकर्षक था, लेकिन उपयोग में नहीं आ सकता था। जजों ने दोनों की वस्तुओं का मूल्यांकन किया और राम की बेंच को विजेता घोषित किया।


इस प्रतियोगिता से राम और श्याम दोनों को एक महत्वपूर्ण सीख मिली। राम को यह सीख मिली कि मेहनत और ईमानदारी हमेशा फल देती है। श्याम को यह सीख मिली कि चालाकी से काम नहीं चलता, बल्कि मेहनत और ईमानदारी से काम करना चाहिए। दोनों दोस्तों ने इस घटना के बाद अपने जीवन में मेहनत और ईमानदारी को अपनाया और आगे बढ़े।


 सीख


इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि मेहनत और ईमानदारी हमेशा फल देती है। चाहे कितनी भी मुश्किलें आएं, अगर हम मेहनत और ईमानदारी से काम करें, तो हमें सफलता जरूर मिलती है। चालाकी और आलस से कभी भी सही नतीजे नहीं मिलते। इसलिए, हमेशा मेहनत और ईमानदारी के रास्ते पर चलना चाहिए।

Hindi kahani दो दोस्तों की कहानी कहानी मेहनत की और लालच की यह कहानी आपको कैसी लगी कमेंट करके जरूर बताएं ।



कहानी लालच की भक्ति

एक बार एक गांव में सेठ हुआ करता था वह अपने व्यापार से संतुष्ट नहीं था वह राजा बनना चाहता था उसे जब भी कोई सत्संग या कोई संत की सेवा करने का अवसर मिलता तो वह यही अपनी इच्छा जाहिर करता कि मुझे राज्य का राजा बनना है ।
एक दिन गांव में कोई संत आए उनसे भी सेठ ने यही इच्छा जाहिर की तब संत ने बताया कि भगवान शिव की तपस्या करने पर तुम्हें बहुत बड़ा राज्य प्राप्त हो सकता है ।
सेठ भी संत की बात मानकर तपस्या के लिए जंगल में चला गया और कई वर्षों तक उसने तपस्या की आखिर एक दिन भगवान शंकर प्रसन्न होकर उसे दर्शन देने आए तब सेठ जी ने भगवान शंकर से राज्य मांगा और भगवान शंकर से बोला है महादेव इस संसार का एकमात्र राजा में ही बन जाऊं परंतु भगवान शंकर बोले यह सेठ ऐसा संभव नहीं है परंतु मैं तुम्हें यह वरदान दे सकता हूं कि आज के दिन जहां तक तुम्हारी दृष्टि पड़ेगी वहां तक तुम्हारा राज्य हो जाएगा भगवान वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए ।
फिर क्या था सेठ को जैसे हि वरदान मिला वैसे ही वह भाग भाग कर अपने दृष्टि से दूर-दूर तक की जमीन को देखने लगा ताकि उसका राज्य बढ़ता ही जाए वह सेठ सुबह से लेकर शाम तक बिना खाना खाए बिना पानी पिए अपना राज्य बढ़ाने के लिए भागत गया और अपने दृष्टि से चारों तरफ देखता रह गया । भूख और प्यास के कारण तथा जोर-जोर से भागने की वजह से शाम के समय भूखप्यास से कमजोरी के कारण सेठ के प्राण निकल गए और वह राज्य उसके कुछ काम आया ही नहीं ।

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इस कहानी से यही सीख मिलती हैं की लालच से भगवान की भक्ति नहीं करनी चाहिए तथा जो मिला है उसमें संतुष्ट रहना चाहिए ।

कहानी लालच की भक्ति