Gita ke 15 adhayay ki kahani | गीता ke पंद्रह अध्याय की

 

Gita ke 15 adhayay ki kahani | गीता ke पंद्रह अध्याय की 




गौड़देश के राजा कृपाण-नरसिंह के सेनापति 'सरभमेरुण्ड' ने छल से राज्य हड़पने की योजना बनाई थी, लेकिन हैजे (cholera) के कारण उसकी मृत्यु हो गई और अपने पापों के कारण उसने घोड़े के रूप में जन्म लिया। एक वैश्य कुमार ने उस विशेष लक्षणों वाले घोड़े को खरीदकर राजा को भेंट कर दिया। एक बार जब राजा उस घोड़े पर सवार होकर शिकार के लिए जंगल में गए, तो वे प्यास से व्याकुल होकर एक चट्टान के पास रुके। वहाँ हवा से उड़कर आए एक पत्ते पर गीता के पंद्रहवें अध्याय का आधा श्लोक लिखा था, जिसे राजा ने ऊंचे स्वर में पढ़ना शुरू किया। उस पवित्र वाणी को सुनते ही घोड़े ने तुरंत अपना शरीर त्याग दिया और दिव्य विमान पर बैठकर स्वर्ग चला गया। बाद में एक सिद्ध ब्राह्मण विष्णुशर्मा ने राजा को बताया कि वह घोड़ा असल में उनका वही पापी सेनापति था, जो गीता के पाठ के प्रभाव से मुक्त हो गया; यह जानकर राजा ने भी पंद्रहवें अध्याय का निरंतर जप किया और अंततः मोक्ष प्राप्त किया।

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