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गीता तृतीय अध्याय माहात्म्य |gita ke 3 adhayay ki Katha

 

गीता तृतीय अध्याय माहात्म्य |gita ke 3 adhayay  ki Katha 

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जड़ नामक ब्राह्मण और उसका पतन: जनस्थान में 'जड़' नाम का एक ब्राह्मण था, जिसने अपना धर्म छोड़कर व्यभिचार, जुआ और मदिरापान जैसे पापों को अपना लिया था। जब उसका सारा धन नष्ट हो गया, तो वह व्यापार के लिए उत्तर दिशा में गया। लौटते समय रात के अंधेरे में लुटेरों ने उसे मार डाला। अपने पापों के कारण वह एक भयानक प्रेत बना।

​पुत्र की पितृ-भक्ति और गीता पाठ: उसका पुत्र बहुत बड़ा विद्वान और धर्मात्मा था। जब पिता नहीं लौटे, तो वह उन्हें खोजने निकला। मार्ग में उसे पिता की मृत्यु का पता चला। वह पिता का उद्धार करने के लिए उनकी अस्थियाँ लेकर काशी जाने लगा। रास्ते में वह उसी वृक्ष के नीचे रुका जहाँ उसके पिता की हत्या हुई थी। वहाँ उसने संध्या वंदन किया और गीता के तीसरे अध्याय का पाठ किया।

​पिता का उद्धार: जैसे ही पाठ संपन्न हुआ, आकाश में भयंकर शोर हुआ और एक दिव्य विमान उतरा। पुत्र ने देखा कि उसके पिता प्रेत योनि से मुक्त होकर दिव्य रूप में विमान पर बैठे हैं। पिता ने बताया कि "तुम्हारे गीता के तीसरे अध्याय के पाठ से मेरी मुक्ति हो गई है और अब काशी जाने की आवश्यकता नहीं रही।"

​नारकी जीवों का उद्धार: पिता ने पुत्र से आग्रह किया कि वह इसी पाठ के पुण्य से अपने अन्य पूर्वजों और नरक में पड़े जीवों का भी उद्धार करे। पुत्र ने वापस लौटकर श्रीकृष्ण मंदिर में बैठकर तीसरे अध्याय का पाठ किया और सारा पुण्य नरक के जीवों को अर्पित कर दिया।

​यमराज और भगवान विष्णु का मिलन: इस पुण्य के प्रभाव से नरक खाली हो गया। भगवान विष्णु के दूत यमराज के पास पहुँचे और सभी कैदियों को छोड़ने की आज्ञा दी। यमराज स्वयं क्षीरसागर जाकर भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे। भगवान ने यमराज को सांत्वना दी और उन्हें वापस अपने लोक भेजा। अंत में वह धर्मात्मा ब्राह्मण पुत्र भी अपनी जाति और अनगिनत जीवों का उद्धार करके स्वयं विष्णुधाम को गया।

Gita ke 1 adhayay ki Katha| गीता की पहली अध्याय की कथा


Gita ke 1 adhayay ki Katha| गीता की पहली अध्याय की कथा 


 श्रीपार्वतीजीने कहा—भगवन्! आप सब तत्त्वोंके ज्ञाता हैं। आपकी कृपासे मुझे श्रीविष्णु-सम्बन्धी नाना प्रकारके धर्म सुननेको मिले, जो समस्त लोकका उद्धार करनेवाले हैं। देवेश! अब मैं गीताका माहात्म्य सुनना चाहती हूँ, जिसका श्रवण करनेसे श्रीहरिमें भक्ति बढ़ती है।

श्रीमहादेवजी बोले—जिनका श्रीविग्रह अलसीके फूलकी भाँति श्याम-वर्णका है, पक्षिराज गरुड़ ही जिनके वाहन हैं, जो अपनी महिमासे कभी च्युत नहीं होते तथा शेषनागकी शय्यापर शयन करते हैं, उन भगवान् महाविष्णुकी हम उपासना करते हैं। एक समयकी बात है, मुर दैत्यके नाशक भगवान् विष्णु शेषनागके रमणीय आसनपर सुखपूर्वक विराजमान थे। उस समय समस्त लोकोंको आनन्द देनेवाली भगवती लक्ष्मीने आदरपूर्वक प्रश्न किया।

श्रीलक्ष्मीजीने पूछा—भगवन्! आप सम्पूर्ण जगत्का पालन करते हुए भी अपने ऐश्वर्यके प्रति उदासीन-से होकर जो इस क्षीरसागरमें नींद ले रहे हैं, इसका क्या कारण है?

श्रीभगवान् बोले—सुमुखि! मैं नींद नहीं लेता हूँ, अपितु तत्त्वका अनुसरण करनेवाली अन्तर्दृष्टिके द्वारा अपने ही माहेश्वर तेजका साक्षात्कार कर रहा हूँ। देवि! यह वही तेज है, जिसका योगी पुरुष कुशाग्र-बुद्धिके द्वारा अपने अन्तःकरणमें दर्शन करते हैं तथा जिसे मीमांसक विद्वान् वेदोंका सार-तत्त्व निश्चित करते हैं। वह माहेश्वर तेज एक, अजर, प्रकाशस्वरूप, आत्मरूप, रोग-शोकसे रहित, अखण्ड आनन्दका पुंज, निष्पन्द (निरीह) तथा द्वैतरहित है। इस जगत्का जीवन उसीके अधीन है। मैं उसीका अनुभव करता हूँ। देवेश्वरि! यही कारण है कि मैं तुम्हें नींद लेता-सा प्रतीत हो रहा हूँ।

श्रीलक्ष्मीजीने कहा—हृषीकेश! आप ही योगी पुरुषोंके ध्येय हैं। आपके अतिरिक्त भी कोई ध्यान करनेयोग्य तत्त्व है, यह जानकर मुझे बड़ा कौतूहल हो रहा है। इस चराचर जगत्की सृष्टि और संहार करनेवाले स्वयं आप ही हैं। आप सर्वसमर्थ हैं। इस प्रकारकी स्थितिमें होकर भी यदि आप उस परम तत्त्वसे भिन्न हैं तो मुझे उसका बोध कराइये।

श्रीभगवान् बोले—प्रिये! आत्माका स्वरूप द्वैत और अद्वैतसे पृथक्, भाव और अभावसे मुक्त तथा आदि और अन्तसे रहित है। शुद्ध ज्ञानके प्रकाशसे उपलब्ध होनेवाला तथा परमानन्दस्वरूप होनेके कारण एकमात्र सुन्दर है। वही मेरा ईश्वरीय रूप है। आत्माका एकत्व ही सबके द्वारा जाननेयोग्य है। गीताशास्त्रमें इसीका प्रतिपादन हुआ है।

अमित तेजस्वी भगवान् विष्णुके ये वचन सुनकर लक्ष्मी देवीने शंका उपस्थित करते हुए कहा—भगवन्! यदि आपका स्वरूप स्वयं परमानन्दमय और मन-वाणीकी पहुँचके बाहर है तो गीता कैसे उसका बोध कराती है? मेरे इस सन्देहका आप निवारण कीजिये।

श्रीभगवान् बोले—सुन्दरि! सुनो, मैं गीतामें अपनी स्थितिका वर्णन करता हूँ। क्रमशः पाँच अध्यायोंको तुम पाँच मुख जानो, दस अध्यायोंको दस भुजाएँ समझो तथा एक अध्यायको उदर और दो अध्यायोंको दोनों चरणकमल जानो। इस प्रकार यह अठारह अध्यायोंकी वाङ्मयी ईश्वरीय मूर्ति ही समझनी चाहिये।* यह ज्ञानमात्रसे ही महान् पातकोंका नाश करनेवाली है। जो उत्तम बुद्धिवला पुरुष गीताके एक या आधे अध्यायका अथवा एक, आधे या चौथाई श्लोकका भी प्रतिदिन अभ्यास करता है, वह सुशर्माके समान मुक्त हो जाता है।

श्रीलक्ष्मीजीने पूछा—देव! सुशर्मा कौन था? किस जातिका था और किस कारणसे उसकी मुक्ति हुई?

श्रीभगवान् बोले—प्रिये! सुशर्मा बड़ी खोटी बुद्धिका मनुष्य था। पापियोंका तो वह शिरोमणि ही था। उसका जन्म वैदिक ज्ञानसे शून्य एवं क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाले ब्राह्मणोंके कुलमें हुआ था। वह न ध्यान करता था, न जप; न होम करता था, न अतिथियोंका सत्कार। वह लम्पट होनेके कारण सदा विषयोंके सेवनमें ही आसक्त रहता था। हल जोतता और पत्ते बेचकर जीविका चलाता था। उसे मदिरा पीनेका व्यसन था तथा वह मांस भी खाया करता था। इस प्रकार उसने अपने जीवनका दीर्घकाल व्यतीत कर दिया। एक दिन मूढ़ बुद्धि सुशर्मा पत्ते लानेके लिये किसी ऋषिकी वाटिकामें घूम रहा था। इसी बीचमें कालरूपधारी काले साँप ने उसे डस लिया। सुशर्माकी मृत्यु हो गयी। तदनन्तर वह अनेक नरकोंमें जा वहाँकी यातनाएँ भोगकर मर्त्यलोकमें लौट आया और वहाँ बोझ ढोनेवाला बैल हुआ। उस समय किसी पगुन ने अपने जीवनका आरामसे व्यतीत करनेके लिये उसे खरीद लिया। बैलने अपनी पीठपर पंगुका भार ढोते हुए बड़े कष्टसे सात-आठ वर्ष बिताये। एक दिन पंगुने किसी ऊँचे स्थानपर बहुत देरतक बड़ी तेजीके साथ उस बैलको घुमाया। इससे वह थककर बड़े वेगसे पृथ्वीपर गिरा और मूर्च्छित हो गया। उस समय वहाँ कुतूहलवश आकृष्ट हो बहुत-से लोग एकत्रित हो गये। उस जनसमुदायमें किसी पुण्यात्मा व्यक्तिने उस बैलका कल्याण करनेके लिये उसे अपना पुण्य दान किया।

तत्पश्चात् कुछ दूसरे लोगोंने भी अपने-अपने पुण्योंको याद करके उन्हें उसके लिये दान किया। उस भीड़में एक वेश्या भी खड़ी थी। उसे अपने पुण्यका पता नहीं था तो भी उसने लोगोंकी देखा-देखी उस बैलके लिये कुछ त्याग किया।

तदनन्तर यमराजके दूत उस मरे हुए प्राणीको पहले यमपुरीमें ले गये। वहाँ यह विचारकर कि यह वेश्याके दिये हुए पुण्यसे पुण्यवान् हो गया है, उसे छोड़ दिया गया। फिर वह भूलोकमें आकर उत्तम कुल और शीलवाले ब्राह्मणोंके घरमें उत्पन्न हुआ। उस समय भी उसे अपने पूर्व-जन्मकी बातोंका स्मरण बना रहा। बहुत दिनोंके बाद अपने अज्ञानको दूर करनेवाले कल्याण-तत्त्वका जिज्ञासु होकर वह उस वेश्याके पास गया और उसके दानकी बात बतलाते हुए उसने पूछा—'तुमने कौन-सा पुण्यदान किया था?' वेश्याने उत्तर दिया—'वह पिंजरेमें बैठा हुआ तोता प्रतिदिन कुछ पढ़ता है। उससे मेरा अन्तःकरण पवित्र हो गया है। उसीका पुण्य मैंने तुम्हारे लिये दान किया था।' इसके बाद उन दोनोंने तोतेसे पूछा। तब उस तोतेने अपने पूर्वजन्मका स्मरण करके प्राचीन इतिहास कहना आरम्भ किया।

शुक बोला—पूर्वजन्ममें मैं विद्वान् होकर भी विद्वत्ताके अभिमानसे मोहित रहता था। मेरा राग-द्वेष इतना बढ़ गया था कि मैं गुणवान् विद्वानोंके प्रति भी ईर्ष्याभाव रखने लगा। फिर समयानुसार मेरी मृत्यु हो गयी और मैं अनेकों घृणित लोकोंमें भटकता फिरा। उसके बाद इस लोकमें आया। सद्गुरुकी अत्यन्त निन्दा करनेके कारण तोतेके कुलमें मेरा जन्म हुआ। पापी होनेके कारण छोटी अवस्था में ही मेरा माता-पितासे वियोग हो गया। एक दिन मैं ग्रीष्म-ऋतुमें तपे हुए मार्गपर पड़ा था। वहाँसे कुछ श्रेष्ठ मुनि मुझे उठा लाये और महात्माओंके आश्रयमें आश्रमके भीतर एक पिंजरेमें उन्होंने मुझे डाल दिया। वहीं मुझे पढ़ाया गया। ऋषियोंके बालक बड़े आदरके साथ गीताके प्रथम अध्यायकी आवृत्ति करते थे। उन्हीं सुनकर मैं भी बारंबार पाठ करने लगा। इसी बीचमें एक चोरी करनेवाले बहेलियेने मुझे वहाँसे चुरा लिया। तत्पश्चात् इस देवीने मुझे खरीद लिया। यही मेरा वृत्तान्त है, जिसे मैंने आपलोगोंसे बता दिया। पूर्वकालमें मैंने इस प्रथम अध्यायका अभ्यास किया था, जिससे मैंने अपने पापको दूर किया है। फिर उसीसे इस वेश्याका भी अन्तःकरण शुद्ध हुआ है और उसीके पुण्यसे ये द्विजश्रेष्ठ सुशर्मा भी पापमुक्त हुए हैं।

Gita ke 18 adhayay ki Katha| गीता के अठारहवा अध्याय की कथा

 

Gita ke 18 adhayay ki Katha| गीता के अठारहवा अध्याय की कथा 



श्रीपार्वतीजीने कहा—भगवन्! आपने सत्रहवें अध्यायका माहात्म्य बतलाया। अब अठारहवें अध्यायके माहात्म्यका वर्णन कीजिये।

श्रीमहादेवजीने कहा—गिरिनन्दिनि! चिन्मय आनन्दकी धारा बहानेवाले अठारहवें अध्यायके पावन माहात्म्यको जो वेदसे भी उत्तम है, श्रवण करो। यह सम्पूर्ण शास्त्रोंका सर्वस्व, कानोंमें पड़ा हुआ रसायनके समान तथा संसारके यातना-जालको छिन्न-भिन्न करनेवाला है। सिद्ध पुरुषोंके लिये यह परम रहस्यकी वस्तु है। इसमें अविद्याका नाश करनेकी पूर्ण क्षमता है। यह भगवान् विष्णुकी चेतना तथा सर्वश्रेष्ठ परमपद है। इतना ही नहीं, यह विवेकमी लताका मूल, काम-क्रोध और मदको नष्ट करनेवाला, इन्द्र आदि देवताओंके चित्तका विश्राम-मन्दिर तथा सनक-सनन्दन आदि महायोगियोंका मनोरंजन करनेवाला है। इसके पाठमात्रसे यमदूतोंकी गर्जना बंद हो जाती है। पार्वती! इससे बढ़कर कोई ऐसा रहस्यमय उपदेश नहीं है, जो संतप्त मानवोंके त्रिविध तापको हरनेवाला और बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला हो। अठारहवें अध्यायका लोकोत्तर माहात्म्य है। इसके सम्बन्धमें जो पवित्र उपाख्यान है, उसे भक्तिपूर्वक सुनो। उसके श्रवणमात्रसे जीव समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।

मेरुगिरिके शिखरपर अमरावती नामवाली एक रमणीय पुरी है। उसे पूर्वकालमें विश्वकर्मा ने बनाया था। उस पुरीमें देवताओंद्वारा सेवित इन्द्र शचीके साथ निवास करते थे। एक दिन वे सुखपूर्वक बैठे हुए थे, इतनेहीमें उन्होंने देखा कि भगवान् विष्णुके दूतोंसे सेवित एक अन्य पुरुष वहाँ आ रहा है। इन्द्र उस नवागत पुरुषके तेजसे तिरस्कृत होकर तुरंत ही अपने मणिमय सिंहासनसे मण्डपमें गिर पड़े। तब इन्द्रके सेवकों ने देवलोकके साम्राज्यका मुकुट इस नूतन इन्द्रके मस्तकपर रख दिया। फिर तो दिव्य गीत गाती हुई देवांगनाओंके साथ सब देवता उनकी आरती उतारने लगे। ऋषियोंने वेदमन्त्रोंका उच्चारण करके उन्हें अनेक आशीर्वाद दिये। गन्धर्वोंका ललित स्वरमें मंगलमय गान होने लगा।

इस प्रकार इस नवीन इन्द्रको सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किये बिना ही नाना प्रकारके उत्सवोंसे सेवित देखकर पुराने इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। वे सोचने लगे 'इसने तो मार्गमें न कभी पाँसले बनवाये हैं, न पोखरे खुदवाये हैं और न पथिकोंको विश्राम देनेवाले बड़े-बड़े वृक्ष ही लगवाये हैं। अकाल पड़नेपर अन्नदानके द्वारा इसने प्राणियोंका सत्कार भी नहीं किया है। इसके द्वारा तीर्थोंमें सत्र और गाँवोंमें यज्ञका अनुष्ठान भी नहीं हुआ है। फिर इसने यहाँ भाग्यकी दी हुई ये सारी वस्तुएँ कैसे प्राप्त की हैं?' इस चिन्तासे व्याकुल होकर इन्द्र भगवान् विष्णुसे पूछने लिये प्रेमपूर्वक क्षीरसागरके तटपर गये और वहाँ अकस्मात् अपने साम्राज्यसे भ्रष्ट होनेका दुःख निवेदन करते हुए बोले—'लक्ष्मीकान्त! मैंने पूर्वकालमें आपकी प्रसन्नताके लिये सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। उसीके पुण्यसे मुझे इन्द्रपदकी प्राप्ति हुई थी; किंतु इस समय स्वर्गमें कोई दूसरा ही इन्द्र अधिकार जमाये बैठा है। उसने तो न कभी धर्मका अनुष्ठान किया है और न यज्ञोंका। फिर उसने मेरे दिव्य सिंहासनपर कैसे अधिकार जमाया है?'

श्रीभगवान् बोले—इन्द्र! वह गीताके अठारहवें अध्यायमेंसे पाँच श्लोकोंका प्रतिदिन पाठ करता है। उसीके पुण्यसे उसने तुम्हारे उत्तम साम्राज्यको प्राप्त कर लिया है। गीताके अठारहवें अध्यायका पाठ सब पुण्योंका शिरोमणि है। उसीका आश्रय लेकर तुम भी अपने पदपर स्थिर हो सकते हो।

भगवान् विष्णुके ये वचन सुनकर और उस उत्तम उपायको जानकर इन्द्र ब्राह्मणका वेष बनाये गोदावरीके तटपर गये। वहाँ उन्होंने कालिकाग्राम नामक उत्तम और पवित्र नगर देखा, जहाँ कालका भी मर्दन करनेवाले भगवान् कालेश्वर विराजमान हैं। वहीं गोदावरी-तटपर एक परम धर्मात्मा ब्राह्मण बैठे थे, जो बड़े ही दयालु और वेदोंके पारंगत विद्वान् थे। वे अपने मनको वशमें करके प्रतिदिन गीताके अठारहवें अध्यायका स्वाध्याय किया करते थे। उन्हें देखकर इन्द्रने बड़ी प्रसन्नताके साथ उनके दोनों चरणोंमें मस्तक झुकाया और उन्हींसे अठारहवें अध्यायको पढ़ा। फिर उसीके पुण्यसे उन्होंने श्रीविष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लिया। इन्द्र आदि देवताओंका पद बहुत ही छोटा है, यह जानकर वे परम हर्षके साथ उत्तम वैकुण्ठधामको गये। अतः यह अध्याय मुनियोंके लिये श्रेष्ठ परम तत्त्व है। पार्वती! अठारहवें अध्यायके इस दिव्य माहात्म्यका वर्णन समाप्त हुआ। इसके श्रवणमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है। इस प्रकार सम्पूर्ण गीताका पापनाशक माहात्म्य बतलाया गया। महाभागे! जो पुरुष श्रद्धायुक्त होकर इसका श्रवण करता है, वह समस्त यज्ञोंका फल पाकर अन्तमें श्रीविष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लेता है।

Gita ke 16adhayay ki Katha| गीता के सत्तरह अध्याय की कथा

 

Gita ke 16adhayay ki Katha| गीता के सत्तरह अध्याय की कथा 


श्री महादेवजी कहते हैं—पार्वती! सोलहवें अध्याय का माहात्म्य बतलाया गया। अब सत्रहवें अध्याय की अनन्त महिमा श्रवण करो। राजा खड्गबाहु के पुत्र का दुःशासन नामक एक नौकर था। वह बड़ी खोटी बुद्धि का मनुष्य था। एक बार वह माण्डलीक राजकुमारों के साथ बहुत धन की बाजी लगाकर हाथी पर चढ़ा और कुछ ही कदम आगे जाने पर लोगों के मना करने पर भी वह मूढ़ हाथी के प्रति जोर-जोर से कठोर शब्द करने लगा। उसकी आवाज सुनकर हाथी क्रोध से अन्धा हो गया और दुःशासन पर फिसल जाने के कारण पृथ्वी पर गिर पड़ा। दुःशासन को गिरकर कुछ-कुछ उच्छ्वास लेते देख काल के समान निरंकुश हाथी ने क्रोध में भरकर उसे ऊपर फेंक दिया। ऊपर से गिरते ही उसके प्राण निकल गये। इस प्रकार कालवश मृत्यु को प्राप्त होने के बाद उसे हाथी की योनि मिली और सिंहलद्वीप के महाराज के यहाँ उसने अपना बहुत समय व्यतीत किया।

सिंहलद्वीप के राजा की महाराज खड्गबाहु से बड़ी मैत्री थी, अतः उन्होंने जल के मार्ग से उस हाथी को मित्र की प्रसन्नता के लिये भेज दिया। एक दिन राजा ने श्लोक की समस्यापूर्ति से संतुष्ट होकर किसी कवि को पुरस्कार रूप में वह हाथी दे दिया और उन्होंने सौ स्वर्ण-मुद्राएँ लेकर उसे मालवनरेश के हाथ बेच दिया। कुछ काल व्यतीत होने पर वह हाथी यत्नपूर्वक पालित होने पर भी असाध्य ज्वर से ग्रस्त होकर मरणासन्न हो गया। हाथीवानों ने जब उसे ऐसी शोचनीय अवस्था में देखा तो राजा के पास जाकर हाथी के हित के लिये शीघ्र ही सारा हाल कह सुनाया। 'महाराज! आपका हाथी अस्वस्थ जान पड़ता है। उसका खाना, पीना और सोना सब छूट गया है। हमारी समझ में नहीं आता इसका क्या कारण है।'

हाथीवानों का बताया हुआ समाचार सुनकर राजा ने हाथी के रोग को पहचानने वाले चिकित्सा कुशल मन्त्रियों के साथ उस स्थान पर पदार्पण किया, जहाँ हाथी ज्वरग्रस्त होकर पड़ा था। राजा को देखते ही उसने ज्वर जनित वेदना को भूलकर संसार को आश्चर्य में डालने वाली वाणी में कहा— 'सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता, राजनीति के समुद्र, शत्रु-समुदाय को परास्त करने वाले तथा भगवान् विष्णु के चरणों में अनुराग रखने वाले महाराज! इन औषधों से क्या लेना है? वैद्यो से भी कुछ लाभ होने वाला नहीं है, दान और जप से भी क्या सिद्ध होगा? आप कृपा करके गीता के सत्रहवें अध्याय का पाठ करने वाले किसी ब्राह्मण को बुलवाइये।'

हाथी के कथनानुसार राजा ने सब कुछ वैसा ही किया। तदनन्तर गीता-पाठ करने वाले ब्राह्मण ने जब उत्तम जल को अभिमन्त्रित करके उसके ऊपर डाला, तब दुःशासन गज योनि का परित्याग करके मुक्त हो गया। राजा ने दुःशासन को दिव्य विमान पर आरूढ़ एवं इन्द्र के समान तेजस्वी देखकर पूछा— 'तुम्हारी पूर्व-जन्म में क्या जाति थी? क्या स्वरूप था? कैसे आचरण थे? और किस कर्म से तुम यहाँ हाथी होकर आये थे? ये सारी बातें मुझे बताओ।' राजा के इस प्रकार पूछने पर संकट से छूटे हुए दुःशासन ने विमान पर बैठे-ही-बैठे स्थिरता के साथ अपना पूर्व जन्म का उपर्युक्त समाचार यथावत् कह सुनाया। तत्पश्चात् नरश्रेष्ठ मालवनरेश भी गीता के सत्रहवें अध्याय का पाठ करने लगे। इससे थोड़े ही समय में उनकी मुक्ति हो गई।

गीता के आठवें अध्याय की कथा| gita ke 8 adhyay ki Katha

 

गीता के आठवें अध्याय की कथा| gita ke 8 adhyay ki Katha 




भगवान् शिव कहते हैं—देवि! अब आठवें अध्यायका माहात्म्य सुनो! उसके सुननेसे तुम्हें बड़ी प्रसन्नता होगी। [ लक्ष्मीजीके पूछनेपर भगवान् विष्णुने उन्हें इस प्रकार अष्टम अध्यायका माहात्म्य बतलाया था। ] दक्षिणमें आमर्दकपुर नामक एक प्रसिद्ध नगर है। वहाँ भावशर्मा नामक एक ब्राह्मण रहता था, जिसने वेश्याको पत्नी बनाकर रखा था। वह मांस खाता, मदिरा पीता, श्रेष्ठ पुरुषोंका धन चुराता, परायी स्त्रीसे व्यभिचार करता और शिकार खेलनेमें दिलचस्पी रखता था। वह बड़े भयानक स्वभावका था और मनमें बड़े-बड़े हौसले रखता था। एक दिन मदिरा पीनेवालोंका समाज जुटा था। उसमें भावशर्माने भरपेट ताड़ी पी—खूब गलेतक उसे चढ़ाया; अतः अजीर्णसे अत्यन्त पीड़ित होकर वह पापात्मा कालवश मर गया और बहुत बड़ा ताड़का वृक्ष हुआ।  

उसकी घनी और ठंडी छायाका आश्रय लेकर ब्रह्मराक्षस-भावको प्राप्त हुए कोई पति-पत्नी वहाँ रहा करते थे। उनके पूर्वजन्मकी घटना इस प्रकार है। एक कुशीबल नामक ब्राह्मण था, जो वेद-वेदांगके तत्त्वोंका ज्ञाता, सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थका विशेषज्ञ और सदाचारी था। उसकी स्त्रीका नाम कुमति था। वह बड़े खोटे विचारकी थी। वह ब्राह्मण विद्वान् होनेपर भी अत्यन्त लोभवश अपनी स्त्रीके साथ प्रतिदिन भैंस, कालपुरुष और घोड़े आदि बड़े दानोंको ग्रहण किया करता था; परंतु दूसरे ब्राह्मणोंको दानमें मिली हुई कौड़ी भी नहीं देता था। वे ही दोनों पति-पत्नी कालवश मृत्युको प्राप्त होकर ब्रह्मराक्षस हुए।  

वे भूख और प्याससे पीड़ित हो इस पृथ्वीपर घूमते हुए उसी ताड़वृक्षके पास आये और उसके मूल भागमें विश्राम करने लगे। इसके बाद पत्नीने पतिसे पूछा—'नाथ! हमलोगोंका यह महान् दुःख कैसे दूर होगा तथा इस ब्रह्मराक्षस-योनिसे किस प्रकार हम दोनोंकी मुक्ति होगी?' तब उस ब्राह्मणने कहा—'ब्रह्मविद्याके उपदेश, अध्यात्म-तत्त्वके विचार और कर्मविधिके ज्ञान बिना किस प्रकार संकटसे छुटकारा मिल सकता है।'  

यह सुनकर पत्नीने पूछा—'किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम' (पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है और कर्म कौन-सा है?) उसकी पत्नीके इतना कहते ही जो आश्चर्यकी घटना घटित हुई, उसको सुनो। उपर्युक्त वाक्य गीताके आठवें अध्यायका आधा श्लोक था। उसके श्रवणसे वह वृक्ष उस समय ताड़के रूपको त्यागकर भावशर्मा नामक ब्राह्मण हो गया। तत्काल ज्ञान होनेसे विशुद्ध-चित्त होकर वह पापके चोलेसे मुक्त हो गया। तथा उस आधे श्लोकके ही माहात्म्यसे वे पति-पत्नी भी मुक्त हो गये। उनके मुखसे दैवात् ही आठवें अध्यायका आधा श्लोक निकल पड़ा था। तदनन्तर आकाशसे एक दिव्य विमान आया और वे दोनों पति-पत्नी उस विमानपर आरूढ़ होकर स्वर्गलोकको चले गये।  

उसके बाद उस बुद्धिमान् ब्राह्मण भावशर्माने आदरपूर्वक उस आधे श्लोकको लिखा और देवदेव जनार्दनकी आराधना करनेकी इच्छासे वह मुक्तिदायिनी काशीपुरीमें चला गया। वहाँ उस उदार बुद्धिवाले ब्राह्मणने भारी तपस्या आरम्भ की। उसी समय क्षीरसागरकी कन्या भगवती लक्ष्मीने हाथ जोड़कर देवताओंके भी देवता जगत्पति जनार्दनसे पूछा—'नाथ! आप सहसा नींद त्यागकर खड़े क्यों हो गये?'  

श्रीभगवान् बोले—देवि! काशीपुरीमें भागीरथीके तटपर बुद्धिमान् ब्राह्मण भावशर्मा मेरे भक्तिरससे परिपूर्ण होकर अत्यन्त कठोर तपस्या कर रहा है। वह अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके गीताके आठवें अध्यायके आधे श्लोकका जप करता है। मैं उसकी तपस्यासे बहुत संतुष्ट हूँ।  

पार्वतीजीने पूछा—भगवन्! श्रीहरि सदा प्रसन्न होनेपर भी जिसके लिये चिन्तित हो उठे थे, उस भगवद्भक्त भावशर्माने कौन-सा फल प्राप्त किया?  

श्रीमहादेवजी बोले—देवि! द्विजश्रेष्ठ भावशर्मा प्रसन्न हुए भगवान् विष्णुके प्रसादको पाकर आत्यन्तिक सुख (मोक्ष)—को प्राप्त हुआ तथा उसके अन्य वंशज भी, जो नरक-यातनामें पड़े थे, उसीके शुद्धकर्मसे भगवद्धामको प्राप्त हुए। पार्वती! यह आठवें अध्यायका माहात्म्य थोड़ेमें ही तुम्हें बताया है। इसपर सदा विचार करते रहना चाहिये।  

गीता के नौवें अध्याय की कथा| gita ke 9adhyay ki Katha

गीता के नौवें अध्याय की कथा| gita ke 9adhyay ki Katha 



श्रीमद्भगवद्गीता के नौवें अध्याय का माहात्म्य


​महादेवजी कहते हैं— "पार्वती! अब मैं आदरपूर्वक नवम अध्याय के माहात्म्य का वर्णन करूँगा, तुम स्थिर होकर सुनो। नर्मदा के तट पर माहिष्मती नाम की एक नगरी है। वहाँ माधव नाम के एक ब्राह्मण रहते थे, जो वेद-वेदांगों के तत्वज्ञ और समय-समय पर आने वाले अतिथियों के प्रेमी थे। उन्होंने विद्या के द्वारा बहुत धन कमाकर एक महान् यज्ञ का अनुष्ठान आरम्भ किया। उस यज्ञ में बलि देने के लिये एक बकरा मँगाया गया।

​जब उसके शरीर की पूजा हो गयी, तब सबको आश्चर्य में डालते हुए उस बकरे ने हँसकर उच्च स्वर से कहा— 'ब्राह्मण! इन बहुत-से यज्ञों द्वारा क्या लाभ है? इनका फल तो नष्ट हो जाने वाला है तथा ये जन्म, जरा और मृत्यु के भी कारण हैं। यह सब करने पर भी मेरी जो वर्तमान दशा है, इसे देख लो!'"

​बकरे के इस अत्यंत कौतूहलजनक वचन को सुनकर यज्ञमण्डप में रहने वाले सभी लोग बहुत ही विस्मित हुए। तब वे यजमान ब्राह्मण हाथ जोड़ अपलक नेत्रों से देखते हुए बकरे को प्रणाम करके श्रद्धा और आदर के साथ पूछने लगे।

​ब्राह्मण बोले— "आप किस जाति के थे? आपका स्वभाव और आचरण कैसा था? तथा किस कर्म से आपको बकरे की योनि प्राप्त हुई? यह सब मुझे बताइये।"

​बकरा बोला— "ब्राह्मण! मैं पूर्वजन्म में ब्राह्मणों के अत्यन्त निर्मल कुल में उत्पन्न हुआ था। समस्त यज्ञों का अनुष्ठान करने वाला और वेद-विद्या में प्रवीण था। एक दिन मेरी स्त्री ने भगवती दुर्गा की भक्ति से विनम्र होकर अपने बालक के रोग की शान्ति के लिये बलि देने के निमित्त मुझसे एक बकरा माँगा। तत्पश्चात् जब चण्डिका के मन्दिर में वह बकरा मारा जाने लगा, उस समय उसकी माता ने मुझे शाप दिया— 'ओ ब्राह्मणों में नीच, पापी! तू मेरे बच्चे का वध करना चाहता है; इसलिये तू भी बकरे की योनि में जन्म लेगा।'

​द्विजश्रेष्ठ! तब कालवश मृत्यु को प्राप्त होकर मैं बकरा हुआ। यद्यपि मैं पशु-योनि में पड़ा हूँ, तो भी मुझे अपने पूर्वजन्मों का स्मरण बना हुआ है। ब्राह्मण! यदि आपको सुनने की उत्कण्ठा हो, तो मैं एक और भी आश्चर्य की बात बताता हूँ। कुरुक्षेत्र नाम का एक नगर है, जो मोक्ष प्रदान करने वाला है। वहाँ चन्द्रशर्मा नाम के एक सूर्यवंशी राजा राज्य करते थे। एक समय जब कि सूर्यग्रहण लगा था, राजा ने बड़ी श्रद्धा के साथ 'कालपुरुष' का दान करने की तैयारी की। उन्होंने वेद-वेदांगों के पारगामी एक विद्वान ब्राह्मण को बुलवाया और पुरोहित के साथ वे तीर्थ के पावन जल से स्नान करने चले। तीर्थ के पास पहुँचकर राजा ने स्नान किया और दो वस्त्र धारण किये। फिर पवित्र एवं प्रसन्नचित्त होकर उन्होंने श्वेत चन्दन लगाया और बगल में खड़े हुए पुरोहित का हाथ पकड़कर तत्काल उचित मनुष्यों से घिरे हुए अपने स्थान पर लौट आये। आने पर राजा ने यथोचित विधि से भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को काल-पुरुष का दान किया।

​तब कालपुरुष का हृदय चीरकर उसमें से एक पापात्मा चाण्डाल प्रकट हुआ। फिर थोड़ी देर के बाद निन्दा भी चाण्डाली का रूप धारण करके कालपुरुष के शरीर से निकली और ब्राह्मण के पास आ गयी। इस प्रकार चाण्डालों की वह जोड़ी आँखें लाल किये निकली और ब्राह्मण के शरीर में हठात् प्रवेश करने लगी। ब्राह्मण मन-ही-मन गीता के नवम अध्याय का जप करते थे और राजा चुपचाप यह सब कौतुक देखने लगे। ब्राह्मण के अन्तःकरण में भगवान् गोविन्द शयन करते थे। वे उन्हीं का ध्यान करने लगे।

​ब्राह्मण ने [जब गीता के नवम अध्याय का जप करते हुए] अपने आश्रयभूत भगवान् का ध्यान किया, उस समय गीता के अक्षरों से प्रकट हुए विष्णुदूतों द्वारा पीड़ित होकर वे दोनों चाण्डाल भाग चले। उनका उद्योग निष्फल हो गया। इस प्रकार इस घटना को प्रत्यक्ष देखकर राजा के नेत्र आश्चर्य से चकित हो उठे। उन्होंने ब्राह्मण से पूछा— 'विप्रवर! इस महाभयंकर आपत्ति को आपने कैसे पार किया? आप किस मन्त्र का जप तथा किस देवता का स्मरण कर रहे थे? वह पुरुष तथा वह स्त्री कौन थी? वे दोनों कैसे उपस्थित हुए? फिर वे शान्त कैसे हो गये? यह सब मुझे बताइये।'

​ब्राह्मण ने कहा— 'राजन्! चाण्डाल का रूप धारण करके भयंकर पाप ही प्रकट हुआ था तथा वह स्त्री निन्दा की साक्षात् मूर्ति थी। मैं इन दोनों को ऐसा ही समझता हूँ। उस समय मैं गीता के नवें अध्याय के मन्त्रों की माला जपता था। उसी का माहात्म्य है कि सारा संकट दूर हो गया। महीपते! मैं नित्य ही गीता के नवम अध्याय का जप करता हूँ, उसी के प्रभाव से प्रतिग्रहजनित आपत्तियों के पार हो सका हूँ।'

​यह सुनकर राजा ने उसी ब्राह्मण से गीता के नवम अध्याय का अभ्यास किया, फिर वे दोनों ही परम शान्ति (मोक्ष) को प्राप्त हो गये।"

गीता के सातवें अध्याय की कथा | gita ke 7 adhyay ki Katha


गीता के सातवें अध्याय की कथा | gita ke 7 adhyay ki Katha 


​भगवान् शिव कहते हैं—पार्वती! अब मैं सातवें अध्याय का माहात्म्य बतलाता हूँ, जिसे सुनकर कानों में अमृत-राशि भर जाती है। पाटलिपुत्र नामक एक दुर्गम नगर है, जिसका गोपुर (द्वार) बहुत ही ऊँचा है। उस नगर में शंकुकर्ण नामक एक ब्राह्मण रहता था, उसने वैश्यवृत्तिका आश्रय लेकर बहुत धन कमाया, किंतु न तो कभी पितरों का तर्पण किया और न देवताओं का पूजन ही। वह धनोपार्जन में तत्पर होकर राजाओं को ही भोज दिया करता था। एक समय की बात है, उस ब्राह्मण ने अपना चौथा विवाह करने के लिये पुत्रों और बन्धुओं के साथ यात्रा की। मार्ग में आधी रात के समय जब वह सो रहा था, एक सर्प ने कहीं से आकर उसकी बाँह में काट लिया।

​उसके काटते ही ऐसी अवस्था हो गयी कि मणि, मन्त्र और ओषधि आदि से भी उसके शरीर की रक्षा असाध्य जान पड़ी। तत्पश्चात् कुछ ही क्षणों में उसके प्राण-पखेरू उड़ गये। फिर बहुत समय के बाद वह प्रेत सर्प-योनि में उत्पन्न हुआ। उसका चित्त धन की वासना में बँधा था। उसने पूर्व-वृत्तान्त को स्मरण करके सोचा— 'मैंने जो घर के बाहर करोड़ों की संख्या में अपना धन गाड़ रखा है, उससे इन पुत्रों को वंचित करके स्वयं ही उसकी रक्षा करूँगा।' एक दिन साँप की योनि से पीड़ित होकर पिता ने स्वप्न में अपने पुत्रों के समक्ष आकर अपना मनोभाव बताया, तब उसके निरंकुश पुत्रों ने सबेरे उठकर बड़े विस्मय के साथ एक-दूसरे से स्वप्न की बातें कहीं। उनमें से मझला पुत्र कुदाल हाथ में लिये घर से निकला और जहाँ उसके पिता सर्पयोनि धारण करके रहते थे, उस स्थान पर गया। यद्यपि उसे धन के स्थान का ठीक-ठीक पता नहीं था तो भी उसने चिह्नों से उसका ठीक निश्चय कर लिया और लोभबुद्धि से वहाँ पहुँचकर बाँबी को खोदना आरम्भ किया। तब उस बाँबी से बड़ा भयानक साँप प्रकट हुआ और बोला— 'ओ मूढ़! तू कौन है, किसलिये आया है, क्यों बिल खोद रहा है, अथवा किसने तुझे भेजा है? ये सारी बातें मेरे सामने बता।'

​पुत्र बोला— मैं आपका पुत्र हूँ। मेरा नाम शिव है। मैं रात्रि में देखे हुए स्वप्न से विस्मित होकर यहाँ का सुवर्ण लेने के कौतूहल से आया हूँ।

​पुत्र की यह वाणी सुनकर वह साँप हँसता हुआ उच्च स्वर से इस प्रकार स्पष्ट वचन बोला— 'यदि तू मेरा पुत्र है तो मुझे शीघ्र ही बन्धन से मुक्त कर। मैं पूर्वजन्म के गाड़े हुए धन के ही लिये सर्पयोनि में उत्पन्न हुआ हूँ।'

​पुत्र ने पूछा— पिताजी! आपकी मुक्ति कैसे होगी? इसका उपाय मुझे बताइये; क्योंकि मैं इस रात में सब लोगों को छोड़कर आपके पास आया हूँ।

​पिता ने कहा— बेटा! गीता के अमृतमय सप्तम अध्याय को छोड़कर मुझे मुक्त करने में तीर्थ, दान, तप और यज्ञ भी सर्वथा समर्थ नहीं हैं। केवल गीता का सातवाँ अध्याय ही प्राणियों के जरा-मृत्यु आदि दुःखों को दूर करने वाला है। पुत्र! मेरे श्राद्ध के दिन सप्तम अध्याय का पाठ करने वाले ब्राह्मण को श्रद्धापूर्वक भोजन कराओ। इससे निःसन्देह मेरी मुक्ति हो जायेगी। वत्स! अपनी शक्ति के अनुसार पूर्ण श्रद्धा के साथ वेद-विद्या में प्रवीण अन्य ब्राह्मणों को भी भोजन कराना।

​सर्पयोनि में पड़े हुए पिता के ये वचन सुनकर सभी पुत्रों ने उसकी आज्ञा के अनुसार तथा उससे भी अधिक किया। तब शंकुकर्ण ने अपने सर्पशरीर को त्यागकर दिव्य देह धारण किया और सारा धन पुत्रों के अधीन कर दिया। पिता ने करोड़ों की संख्या में जो धन बाँटकर दिया था, उससे वे सदाचारी पुत्र बहुत प्रसन्न हुए। उनकी बुद्धि धर्म में लगी हुई थी; इसलिये उन्होंने बावली, कुआँ, पोखरा, यज्ञ तथा देवमन्दिर के लिये उस धन का उपयोग किया और अन्नशाला भी बनवायी। तत्पश्चात् सातवें अध्याय का सदा जप करते हुए उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। पार्वती! यह तुम्हें सातवें अध्याय का माहात्म्य बताया गया है; जिसके श्रवणमात्र से मानव सब पातकों से मुक्त हो जाता है।

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Gita ke 12 adhyay ki Katha | गीता के बारहवें अध्याय की कथा



Gita ke 12 adhyay ki Katha | गीता के बारहवें अध्याय की कथा 





 श्री महादेवजी कहते हैं—पार्वती! दक्षिण दिशा में कोल्हापुर नामक एक नगर है, जो सब प्रकार के सुखों का आधार, सिद्ध-महात्माओं का निवासस्थान तथा सिद्धि-प्राप्तिका क्षेत्र है। वह पराशक्ति भगवती लक्ष्मी का प्रधान पीठ है। सम्पूर्ण देवता उसका सेवन करते हैं। वह पुराणप्रसिद्ध तीर्थ भोग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला है। वहाँ करोड़ों तीर्थ और शिवलिंग हैं। रुद्रगया भी वहीं है। वह विशाल नगर लोगों में बहुत विख्यात है। एक दिन कोई युवक पुरुष उस नगर में आया। [ वह कहीं का राजकुमार था ] उसके शरीर का रंग गोरा, नेत्र सुन्दर, ग्रीवा शंख के समान, कंधे मोटे, छाती चौड़ी तथा भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं। नगर में प्रवेश करके सब ओर महलों की शोभा निहारता हुआ वह देवेश्वरी महालक्ष्मी के दर्शनार्थ उत्कंठित हो मणिकंठ तीर्थ में गया और वहाँ स्नान करके उसने पितरों का तर्पण किया। फिर महामाया महालक्ष्मीजी को प्रणाम करके भक्तिपूर्वक स्तवन करना आरम्भ किया।

राजकुमार बोला—जिसके हृदय में असीम दया भरी हुई है, जो समस्त कामनाओं को देती तथा अपने कटाक्षमात्र से सारे जगत् की सृष्टि, पालन और संहार करती है, उस जगन्माता महालक्ष्मी की जय हो। जिस शक्ति के सहारे उसी के आदेश के अनुसार परमेश्ठी ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, भगवान अच्युत जगत् का पालन करते हैं तथा भगवान रुद्र अखिल विश्व का संहार करते हैं, उस सृष्टि, पालन और संहार की शक्ति से सम्पन्न भगवती पराशक्ति का मैं भजन करता हूँ।

कमले! योगिजन तुम्हारे चरणकमलों का चिन्तन करते हैं। कमलालये! तुम अपनी स्वाभाविक सत्ता से ही हमारे समस्त इन्द्रियगोचर विषयों को जानती हो। तुम्हें कल्पनाओं के समूह को तथा उसका संकल्प करनेवाले मन को उत्पन्न करती हो। इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति—ये सब तुम्हारे ही रूप हैं। तुम परांसवित् (परमज्ञान)-रूपिणी हो। तुम्हारा स्वरूप निष्कल, निर्मल, नित्य, निराकार, निरंजन, अन्तरहित, आतंकशून्य, आलम्बहीन तथा निरामय है। देवि! तुम्हारी महिमा का वर्णन करने में कौन समर्थ हो सकता है। जो षट्चक्रों का भेदन करके अन्तःकरण के बारह स्थानों में विहार करती है, अनाहत, ध्वनि, विन्दु, नाद और कला—ये जिसके स्वरूप हैं, उस माता महालक्ष्मी को मैं प्रणाम करता हूँ। [ मुखरूपी ] पूर्ण चन्द्रमा से प्रकट होनेवाली अमृतराशि को बहाया करती हो। तुम्हीं परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी नामक वाणी हो। मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। देवि! तुम जगत् की रक्षा के लिये अनेक रूप धारण करती हो। अम्बिके! तुम्हीं ब्राह्मी, वैष्णवी तथा माहेश्वरी शक्ति हो। वाराही, महालक्ष्मी, नारसिंही, ऐन्द्री, कौमारी, चण्डिका, जगत् को पवित्र करनेवाली लक्ष्मी, जगन्माता सावित्री, चन्द्रकला तथा रोहिणी भी तुम्हीं हो। परमेश्वरि! तुम भक्तों का मनोरथ पूर्ण करने के लिये कल्पलता के समान हो। मुझपर प्रसन्न हो जाओ।

उसके इस प्रकार स्तुति करने पर भगवती महालक्ष्मी अपना साक्षात् स्वरूप धारण करके बोलीं—'राजकुमार! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। तुम कोई उत्तम वर माँगो।'

राजपुत्र बोला—माँ! मेरे पिता राजा बृहद्रथ अश्वमेध नामक महान् यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे थे। वे दैवयोग से रोगग्रस्त होकर स्वर्गगामी हो गये। इसी बीच में यूप में बँधे हुए मेरे यज्ञसम्बन्धी घोड़े को, जो समूची पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटा था, किसी ने रात्रि में बन्धन काटकर कहीं अन्यत्र पहुँचा दिया। उसकी खोज में मैंने कुछ लोगों को भेजा था; किंतु वे कहीं भी उसका पता न पाकर जब खाली हाथ लौट आये हैं, तब मैं सब ऋत्विजों से आज्ञा लेकर तुम्हारी शरण में आया हूँ। देवि! यदि तुम मुझपर प्रसन्न हो तो मेरे यज्ञ का घोड़ा मुझे मिल जाय, जिससे यज्ञ पूर्ण हो सके। तभी मैं अपने पिता महाराज का ऋण उतार सकूँ। शरणागतों पर दया करनेवाली जगज्जननी लक्ष्मी! जिससे मेरा यज्ञ पूर्ण हो, वह उपाय करो।

भगवती लक्ष्मी ने कहा—राजकुमार! मेरे मन्दिर के दरवाजे पर एक ब्राह्मण रहते हैं, जो लोगों में सिद्धसमाधिक के नाम से विख्यात हैं। वे मेरी आज्ञा से तुम्हारा सब काम पूरा कर देंगे।

महालक्ष्मी के इस प्रकार कहने पर राजकुमार उस स्थान पर आये, जहाँ सिद्धसमाधि रहते थे। उनके चरणों में प्रणाम करके राजकुमार चुपचाप हाथ जोड़ खड़े हो गये। तब ब्राह्मण ने कहा—'तुम्हें माताजी ने यहाँ भेजा है। अच्छा, देखो; अब मैं तुम्हारा सारा अभीष्ट कार्य सिद्ध करता हूँ।' यों कहकर मन्त्रवेत्ता ब्राह्मण ने सब देवताओं को वहीं खींचा। राजकुमार ने देखा, उस समय सब देवता हाथ जोड़े थर-थर काँपते हुए वहाँ उपस्थित हो गये। तब उन श्रेष्ठ ब्राह्मण ने समस्त देवताओं से कहा—'देवगण! इस राजकुमार का अश्व, जो यज्ञ के लिये निश्चित हो चुका था, रात में देवराज इन्द्र ने चुराकर अन्यत्र पहुँचा दिया है; उसे शीघ्र ले आओ।'

तब देवताओं ने मुनि के कहने से यज्ञ का घोड़ा लाकर दे दिया। इसके बाद उन्होंने उन्हें जाने की आज्ञा दी। देवताओं का आकर्षण देखकर तथा खोये हुए अश्व को पाकर राजकुमार ने मुनि के चरणों में प्रणाम करके कहा—'महर्षे! आपका यह सामर्थ्य आश्चर्यजनक है। आप ही ऐसा कार्य कर सकते हैं, दूसरा कोई नहीं। ब्रह्मन्! मेरी प्रार्थना सुनिये, मेरे पिता राजा बृहद्रथ अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान आरम्भ करके दैवयोग से मृत्यु को प्राप्त हो गये हैं। अभी तक उनका शरीर तपाये हुए तेल में सुखाकर मैंने रख छोड़ा है। साधुश्रेष्ठ! आप उन्हें पुनः जीवित कर दीजिये।'

यह सुनकर महामुनि ब्राह्मण ने किंचित मुसकराकर कहा—'चलो, जहाँ यज्ञमण्डप में तुम्हारे पिता मौजूद हैं, चलें।' तब सिद्धसमाधि ने राजकुमार के साथ वहाँ जाकर जल अभिमन्त्रित किया और उसे उस शव के मस्तक पर रखा। उसके रखते ही राजा सचेत होकर उठ बैठे। फिर उन्होंने ब्राह्मण को देखकर पूछा—'धर्मस्वरूप! आप कौन हैं?' तब राजकुमार ने महाराज से पहले का सारा हाल कह सुनाया। राजा ने अपने को पुनः जीवनदान देनेवाले ब्राह्मण को नमस्कार करके पूछा—'ब्रह्मन्! किस पुण्य से आपको यह अलौकिक शक्ति प्राप्त हुई है?' उनके यों कहने पर ब्राह्मण ने मधुर वाणी में कहा—'राजन्! मैं प्रतिदिन आलस्यरहित होकर गीता के बारहवें अध्याय का जप करता हूँ; उसी से मुझे यह शक्ति मिली है, जिससे तुम्हें जीवन प्राप्त हुआ है।' यह सुनकर ब्राह्मणों सहित राजा ने उन ब्रह्मर्षि से गीता के बारहवें अध्याय का अध्ययन किया। उसके माहात्म्य से उन सबकी सद्गति हो गयी। दूसरे-दूसरे जीव भी उसके पाठ से परम मोक्ष को प्राप्त हो चुके हैं।

Gita ke 11 adhyay ki Katha| गीता के पांचवें अध्याय की कथा

 

Gita ke 11 adhyay ki Katha| गीता के पांचवें अध्याय की कथा 



श्रीमहादेवजी कहते हैं—प्रिये! गीता के वर्णन से सम्बन्ध रखने वाली कथा एवं विश्वरूप अध्याय के पावन महात्म्य को श्रवण करो। विशाल नेत्रों वाली पार्वती! इस अध्याय के महात्म्य का पूरा-पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता। इसके सम्बन्ध में सहस्रों कथाएँ हैं, उनमें से एक यहाँ कही जाती है।

प्रणीता नदी के तट पर मेघंकर नाम से विख्यात एक बहुत बड़ा नगर है। वहाँ के लोगों के सुख-दुःख की उपेक्षा कर वह (नगर) राक्षसों का निवास स्थान बन गया था। वहाँ रहने वाले एक ब्राह्मण, जो ब्रह्मचारी थे, वे सदा जीवनमुक्त योगी की स्थिति में रहते थे। एक समय जब बृहस्पति सिंह राशि पर स्थित थे, महायोगी सुनन्द ने गोदावरी तीर्थ की यात्रा आरम्भ की। वे क्रमशः विरजतीर्थ, तारातीर्थ, कपिलासंगम, अष्टतीर्थ, कपिलाद्वार, नृसिंहवन, अम्बिकापुरी तथा करस्थानपुर आदि क्षेत्रों में स्नान और दर्शन करते हुए 'विवाह मण्डप' नामक नगर में आए। वहाँ उन्होंने प्रत्येक घर में जाकर अपने ठहरने के लिए स्थान माँगा, परन्तु कहीं भी उन्हें स्थान नहीं मिला। अन्त में गाँव के मुखिया (ग्रामपाल) ने उन्हें एक बहुत बड़ी धर्मशाला दिखा दी। ब्राह्मण ने साथियों सहित उसके भीतर जाकर रात में निवास किया।

सबेरा होने पर उन्होंने अपने को तो धर्मशाला के बाहर पाया, किन्तु उनके और साथी नहीं दिखाई दिये। वे उन्हें खोजने के लिए चले, इतने में ही ग्रामपाल से उनकी भेंट हो गई। ग्रामपाल ने कहा—'मुनिश्रेष्ठ! तुम सब प्रकार से दीर्घायु जान पड़ते हो। भाग्यशाली तथा पुण्यवान् पुरुषों में तुम सबसे पवित्र हो। तुम्हारे भीतर कोई लोकोत्तर प्रभाव विद्यमान है। तुम्हारे साथी कहाँ गये? और कैसे इस भवन से बाहर हुए? इसका पता लगाओ। मैं तुम्हारे सामने इतना ही कहता हूँ कि तुम्हारे जैसा तपस्वी मुझे दूसरा कोई नहीं दिखाई देता। विप्रवर! तुम्हें किस महामन्त्र का ज्ञान है? किस विद्या का आश्रय लेते हो तथा किस देवता की दया से तुम्हें अलौकिक शक्ति आ गयी है? भगवन्! कृपा करके इस गाँव में रहो। मैं तुम्हारी सब सेवा-शुश्रूषा करूँगा।'

यूँ कहकर ग्रामपाल ने मुनीश्वर सुनन्द को अपने गाँव में ठहरा लिया। वह दिन-रात बड़ी भक्ति से उनकी सेवा-टहल करने लगा। जब सात-आठ दिन बीत गये, तब एक दिन प्रातःकाल आकर वह बहुत दुःखी हो महात्मा के सामने रोने लगा और बोला—'हाय! आज रात में राक्षसों ने मुझे भाग्यहीन के बेटे को चबा लिया है। मेरा पुत्र बड़ा ही गुणवान् और भक्तिमान् था।' ग्रामपाल के इस प्रकार कहने पर योगी सुनन्द ने पूछा—'कहाँ है वह राक्षस? और किस प्रकार उसने तुम्हारे पुत्र का भक्षण किया है?'

ग्रामपाल बोला—'ब्रह्मण! इस नगर में एक बड़ा भयंकर नरभक्षी राक्षस रहता है। वह प्रतिदिन आकर इस नगर के मनुष्यों को खा लिया करता था। तब एक दिन समस्त नगरवासियों ने मिलकर उससे प्रार्थना की—'राक्षस! तुम हम सब लोगों की रक्षा करो। हम तुम्हारे लिए भोजन की व्यवस्था किये देते हैं। यहाँ बाहर के जो पथिक रात में आकर नींद लेने लगे, उनको खा लिया करना।' इस प्रकार नागरिक मनुष्यों ने गांव के (मुझ) मुखिया द्वारा यह निश्चित किया। तुम भी अन्य राहगीरों के साथ इस घर में आकर सोये थे; किन्तु राक्षस ने उन सबको तो खा लिया, केवल तुम्हें छोड़ दिया है। द्विजोत्तम! तुममें ऐसा क्या प्रभाव है, इस बात को तुम्हीं जानते हो। इस समय मेरे पुत्र का एक मित्र आया था, किन्तु मैं उसे राहगीरों के साथ उसे भी मैंने उसी धर्मशाला में भेज दिया। पुत्र ने जब सुना कि मेरा मित्र भी आया था, तो वह उसे वहाँ से ले आने के लिए गया; परन्तु राक्षस ने उसे भी खा लिया। आज सबेरे मैंने बहुत दुःखी होकर उस राक्षस से पूछा—'ओ दुष्टात्मन्! तूने रात में मेरे पुत्र को भी खा लिया। तुम्हारे पेट में पड़ा हुआ मेरा पुत्र जिससे जीवित हो सके, ऐसा उपाय यदि हो तो बता।'

राक्षस ने कहा—'ग्रामपाल! धर्मशाला के भीतर घुसे हुए तुम्हारे पुत्र को न जानने के कारण मैंने भक्षण किया है। अन्य पथिकों के साथ तुम्हारा पुत्र भी अनजान में ही मेरा ग्रास बन गया है, वह मेरे उदर में जिस प्रकार जीवित और रक्षित रह सकता है, वह उपाय स्वयं विधाता ने ही कर दिया है। जो ब्राह्मण सदा गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करता हो, उसके प्रभाव से मेरी मुक्ति होगी और मेरे हुओं को पुनः जीवन प्राप्त होगा। यहाँ कोई ब्राह्मण रहते हैं, जिनको मैंने एक दिन धर्मशाला से बाहर कर दिया था। वे निरन्तर गीता के ग्यारहवें अध्याय का जप करते हैं। इस अध्याय के मन्त्र से सात बार अभिमन्त्रित करके यदि वे मेरे ऊपर जल का छींटा दे दें तो निस्संदेह मेरा शाप से उद्धार हो जाएगा।'

इस प्रकार उस राक्षस का संदेश पाकर मैं तुम्हारे निकट आया हूँ।

ब्राह्मण ने पूछा—'ग्रामपाल! जो रात में सोये हुए मनुष्यों को खाता है, वह प्राणी किस पाप से राक्षस हुआ है?'

ग्रामपाल बोला—'ब्रह्मण! पहले इस गाँव के खेती की क्यारियों की रक्षा करने में लगा था। वह वहाँ से थोड़ी ही दूर पर एक बहुत बड़ा ब्राह्मण रहता था। वह किसी राहगीर को मारकर खा रहा था। उसी समय दूसरे तपस्वी कहीं से आ निकले, जो उस राहगीर को बचाने के लिए दूसरे को जो देख रहे थे। सिद्ध मुनि को गुस्सा आया और उस राहगीर को खाकर आकाश में उड़ गया। तब तपस्वी ने कुपित होकर उस किसान से कहा—'ओ दुष्ट हलवाहे! तुझे धिक्कार है। तू बड़ा ही कठोर और निर्दयी है। दूसरों की रक्षा से मुँह मोड़कर केवल पेट पालने के धंधे में लगा है। तेरा जीवन नष्टप्राय है। अरे! जो चोर, डाढ़वाले जीव, सर्प, शत्रु, अग्नि, विष, जल, गौध, राक्षस, भूत तथा बेताल आदि के द्वारा खाए हुए मनुष्यों की उपेक्षा करता है, वह उसके समान पाप करता है। जो शाली ब्राह्मणों होकर भी भोजन की चिंता नहीं लेता है, जो कर्म करते मारे जाते हुए 'छोड़ो, छोड़ो' की पुकार करता है, वह पाप की जो राह के लिए 'खेत' की रक्षा करता है, वह पाप का भागी होता है। जो मनुष्य गौओं की रक्षा के लिए भी जो भाग्य के मारे जाते हैं, वे ब्राह्मण, भील तथा दुष्ट ग्वालों के हाथ से मारे जाते हैं, वे भगवान् विष्णु के उस परम पद को पाने के लिए योगियों के लिए भी दुर्लभ है। सहस्र अश्वमेध और सौ वाजपेय यज्ञ मिलकर भी भगवान् विष्णु के उस पद के बराबर भी नहीं हो सकते।

ग्रामपाल! राक्षसी योनि प्राप्त करने के कारण से पुण्यवान् पुरुष भी जो इसे बचा न सके, समय आने पर कुम्भीपाक नामक नरक में पकाया जाता है*, तूने दुष्ट सिद्ध के द्वारा खाए जाते हुए राहगीर को देखकर उसे बचाने में समर्थ होते हुए भी जो इसकी रक्षा नहीं की, इससे तू राक्षस हो जा।'

ग्रामपाल बोला—'महात्मन्! मैं वहाँ उपस्थित अवश्य था, किन्तु मैं ये सब देख घबराहट के कारण वहाँ से नहीं जान सका। अतः मुनि श्रेष्ठ! कृपया आपके अनुग्रह करना चाहिए।'

तपस्वी ब्राह्मण ने कहा—'जो प्रतिदिन गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करता है, उस मनुष्य के द्वारा अभिमन्त्रित जल जब तुम्हारे राक्षस के मस्तक पर डाला जाएगा, तब तुम्हारे पाप से छुटकारा मिल जाएगा।'

यह कहकर तपस्वी ब्राह्मण चले गये और यह हलवाहा राक्षस हो गया; अतः द्विजश्रेष्ठ! तुम चलो और ग्यारहवें अध्याय से तीर्थ के जल को अभिमन्त्रित करो, फिर अपने ही हाथों इस राक्षस के मस्तक पर उसे छिड़क दो।

ग्रामपाल की यह सारी प्रार्थना सुनकर ब्राह्मण का हृदय करुणा से भर आया। वे 'बहुत अच्छा' कहकर उसके साथ राक्षस के निकट गये। वे ग्यारहवें अध्याय के योगी थे। उन्होंने विश्वरूप दर्शन नामक ग्यारहवें अध्याय से जल अभिमन्त्रित करके उस राक्षस के मस्तक पर डाला। गीता के ग्यारहवें अध्याय के प्रभाव से वह राक्षस शाप से मुक्त हो गया। उसने राक्षस-देह का परित्याग करके चतुर्भुजरूप धारण कर लिया तथा उसने राक्षस-देह जिनका परित्याग करके वह चतुर्भुजरूप हो गये। तत्पश्चात् वे सभी विमान पर आरूढ़ हुए। इनमें ही ग्रामपाल ने राक्षस से कहा—'निशाचर! मेरा पुत्र कौन है? उसे दिखाओ।' उसके यूँ कहने पर दिव्य बुद्धि वाले राक्षस ने कहा—'ये जो तमाल के समान श्याम, चार भुजधारी, माणिक्यमय मुकुट से सुशोभित तथा दिव्य मणियों के बने हुए, कर्णफूलों से अलंकृत हैं, हार पहनने के कारण जिनके कंधे मनोहर प्रतीत होते हैं, जो सोने के भुजबंदों से विभूषित, कमल के समान नेत्र वाले, स्त्री स्वरूप तथा हाथों में कमल लिए हुए हैं, और दिव्य विमान पर बैठकर देवत्व को प्राप्त हो चुके हैं, इन्हीं को अपना पुत्र समझो।'

यह सुनकर ग्रामपाल ने उसी रूप में अपने पुत्र को देखा और उसे अपने घर ले जाना चाहा। यह देख उसका पुत्र हँस पड़ा और इस प्रकार कहने लगा।

पुत्र बोला—'ग्रामपाल! कई बार तुम भी मेरे पुत्र हो चुके हो। पहले मैं तुम्हारा पुत्र था, किन्तु अब देवता हो गया हूँ। देखो, यह ब्राह्मण-देवता के प्रसाद से वैकुण्ठधाम को प्राप्त हो गया। ग्यारहवें अध्याय महात्म्य से यह सब लोगों के साथ आबद्ध है। अतः तुम भी इन ब्राह्मणदेव से गीता के ग्यारहवें अध्याय का अध्ययन करो और निरन्तर उसका जप करते रहो। इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारी भी उत्तम गति होगी। तात! मनुष्यों के लिए साधु पुरुषों का संग सर्वथा दुर्लभ है। वह भी इस समय तुम्हें प्राप्त है; अतः अपना अभीष्ट सिद्ध करो। धन, भोग, दान, यज्ञ, तपस्या और पूर्वकर्मों से क्या लेना है। विश्वरूप अध्याय के पाठ से ही परम कल्याण की प्राप्ति हो जाती है। पूर्णांनद संदोह स्वरूप श्री कृष्ण नामक ब्रह्म के मुख से कुरुक्षेत्र में अपने मित्र अर्जुन के प्रति जो अमृतमय उपदेश निकला था, वही श्री विष्णु का परम तात्विक रूप है। तुम उसी का चिन्तन करो। वह मोक्ष के लिए प्रसिद्ध रसायन है। संसार-भय से डरे हुए, मनुष्यों के दुःखों का नाश करने वाला व्याधि का विनाशक तथा अनेक जन्मों के दुःखों का नाश करने वाला है। मैं उसके सिवा दूसरे किसी साधन को ऐसा नहीं देखता, अतः उसी का अभ्यास करो।'

श्रीमहादेवजी कहते हैं—यूँ कहकर वह सबके साथ श्रीविष्णु के परम धाम को चला गया। तब ग्रामपाल ने ब्राह्मण के मुख से उस अध्याय को पढ़ा। फिर वे दोनों ही इसके महात्म्य से विश्वधाम को चले गये। पार्वती! इस प्रकार तुम्हें ग्यारहवें अध्याय की महात्म्य-कथा सुनाई है। इसके श्रवण मात्र से महान् पातकों का नाश हो जाता है।