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Shrimad Bhagwad Geeta ke dusra adhyay ki katha | श्रीमद्भगवद्गीता: द्वितीय अध्याय का माहात्म्य

 श्रीमद्भगवद्गीता: द्वितीय अध्याय का माहात्म्य

श्रीभगवान् कहते हैं—लक्ष्मी! प्रथम अध्याय के माहात्म्य का उत्तम उपाख्यान मैंने तुम्हें सुना दिया। अब अन्य अध्यायों के माहात्म्य श्रवण करो।

दक्षिण दिशा में पुरन्दरपुर नामक नगर में देवशर्मा नामक एक विद्वान ब्राह्मण रहते थे। वे अतिथियों के पूजक, स्वाध्यायशील, वेद-शास्त्रों के विशेषज्ञ, यज्ञों का अनुष्ठान करने वाले और तपस्वियों के सदा ही प्रिय थे। उन्होंने उत्तम द्रव्यों के द्वारा अग्नि में हवन करके दीर्घकाल तक देवताओं को तृप्त किया, किंतु उन धर्मात्मा ब्राह्मण को कभी सदा रहने वाली शान्ति न मिली। वे परम कल्याणमय तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा से प्रतिदिन प्रचुर सामग्रियों के द्वारा सत्य-संकल्प वाले तपस्वियों की सेवा करने लगे।

इस प्रकार शुभ आचरण करते हुए उन्हें बहुत समय बीत गया। तदनन्तर एक दिन पृथ्वी पर उनके समक्ष एक त्यागी महात्मा प्रकट हुए। वे पूर्ण अनुभवी, आकांक्षा रहित, नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि रखने वाले तथा शान्तचित्त थे। निरन्तर परमात्मा के चिन्तन में संलग्न हो वे सदा आनन्दविभोर रहते थे। देवशर्मा ने उन नित्यसंतुष्ट तपस्वी को शुद्धभाव से प्रणाम किया और पूछा— 'महात्मन्! मुझे शान्तिमयी स्थिति कैसे प्राप्त होगी?'

तब उन आत्मज्ञानी संत ने देवशर्मा को सौपुर ग्राम के निवासी मित्रवान् का परिचय दिया, जो बकरियों का चरवाहा था, और कहा— 'वही तुम्हें उपदेश देगा।'

यह सुनकर देवशर्मा ने महात्मा के चरणों की वन्दना की और समृद्धशाली सौपुर ग्राम में पहुँचकर उसके उत्तर भाग में एक विशाल वन देखा। उसी वन में नदी के किनारे एक शिला पर मित्रवान् बैठा था। उसके नेत्र आनन्दातिरेक से निश्चल हो रहे थे— वह अपलक दृष्टि से देख रहा था। वह स्थान आपस का स्वाभाविक वैर छोड़कर एकत्रित हुए परस्पर विरोधी जन्तुओं से घिरा था। मृगों के झुंड शान्त भाव से बैठे थे और मित्रवान् दया से भरी हुई आनन्दमयी दृष्टि से पृथ्वी पर मानो अमृत छिड़क रहा था।

देवशर्मा ने विनम्रता से उससे आत्म-ज्ञान का उपाय पूछा। मित्रवान् ने अपनी एक घटना सुनाई:

"विद्वन्! एक समय मैं वन में बकरियों की रक्षा कर रहा था। तभी एक भयानक व्याघ्र (बाघ) आया। मैं डरकर भागने लगा, किंतु एक बकरी निडर होकर नदी के किनारे उस बाघ के पास चली गई। व्याघ्र का द्वेष मिट गया और वह चुपचाप खड़ा हो गया। बकरी ने कहा— 'व्याघ्र! तुम्हें तो अभीष्ट भोजन प्राप्त हुआ है, मेरे शरीर से मांस निकालकर प्रेमपूर्वक खाओ न।'

व्याघ्र बोला— 'बकरी! इस स्थान पर आते ही मेरे मन से द्वेष का भाव निकल गया। भूख-प्यास भी मिट गई।'

हम दोनों पास खड़े एक वानरराज के पास गए। वानरराज ने बताया कि सामने वन के भीतर जो मंदिर है, उसमें ब्रह्माजी द्वारा स्थापित एक शिवलिंग है। पूर्वकाल में वहाँ सुकर्मा नामक महात्मा रहते थे। एक बार उनके पास एक अतिथि आए। सुकर्मा की सेवा से प्रसन्न होकर उन अतिथि ने एक शिलाखंड पर गीता का दूसरा अध्याय लिख दिया और सुकर्मा को उसका पाठ करने को कहा।

सुकर्मा के अभ्यास से उनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया और उन्हें आत्मज्ञान प्राप्त हुआ। उस स्थान पर गीता के द्वितीय अध्याय के प्रभाव से ही भूख, प्यास, क्रोध और वैर-भाव का नाश हो गया है।"

मित्रवान् ने कहा— "मैंने भी उस मंदिर में जाकर शिला पर लिखे द्वितीय अध्याय को पढ़ा और उसी की आवृत्ति से मैंने तपस्या का पार पा लिया है। अतः भद्रपुरुष! तुम भी सदा द्वितीय अध्याय की ही आवृत्ति किया करो।"

श्रीभगवान् कहते हैं— प्रिये! मित्रवान् के इस प्रकार आदेश देने पर देवशर्मा ने उसका पूजन किया और पुरन्दरपुर लौट आए। वहाँ किसी देवालय में उन्होंने द्वितीय अध्याय का पाठ शुरू किया। उससे उन्हें शुद्ध अन्तःकरण और परम पद की प्राप्ति हुई।

यह द्वितीय अध्याय का माहात्म्य पूर्ण हुआ।






trimbakeshwar jyotirlinga katha | त्रंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा

 trimbakeshwar jyotirlinga katha | त्रंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा

प्राचीन काल की बात है, जब भारत की भूमि ऋषियों के तपोबल से ओतप्रोत थी। नासिक के निकट स्थित ब्रह्मगिरि पर्वत की वादियों में महर्षि गौतम अपनी धर्मपत्नी अहिल्या के साथ निवास करते थे। वह समय बड़ा ही कठिन था, क्योंकि वरुण देव के कोप के कारण पूरी पृथ्वी पर सौ वर्षों का भीषण अकाल पड़ा था। नदियां सूख चुकी थीं और हरियाली का नामोनिशान मिट गया था। ऐसी विकट परिस्थिति में महर्षि गौतम ने अपनी तपस्या से वरुण देव को प्रसन्न किया और एक अक्षय जल कुंड प्राप्त किया। इस कुंड की विशेषता यह थी कि इसका जल कभी समाप्त नहीं होता था।

​महर्षि गौतम ने उस दिव्य जल का उपयोग केवल प्यास बुझाने के लिए नहीं, बल्कि परोपकार के लिए किया। उन्होंने अपने तपोबल से प्रतिदिन अनाज उगाया और अकाल से पीड़ित अन्य ऋषियों और उनके परिवारों को शरण दी। धीरे-धीरे गौतम ऋषि का आश्रम एक विशाल अन्नक्षेत्र बन गया। जहाँ लोग भूख से मर रहे थे, वहाँ गौतम ऋषि के सान्निध्य में सभी सुखी थे। लेकिन कहते हैं न कि मनुष्य की ईर्ष्या कभी-कभी उसके विवेक पर भारी पड़ जाती है। आश्रम में शरण लेने वाले कुछ ऋषियों के मन में महर्षि गौतम की बढ़ती ख्याति को देखकर द्वेष उत्पन्न हो गया। उन्होंने मिलकर गौतम ऋषि को अपमानित करने और उन्हें वहां से निकालने का षड्यंत्र रचा।

​इन ऋषियों ने भगवान गणेश की आराधना की और उनसे वरदान माँगा कि गौतम ऋषि पर कोई ऐसा लांछन लगे जिससे उन्हें यह स्थान छोड़ना पड़े। गणेश जी ने उन्हें बहुत समझाया कि उपकारी के साथ छल करना पाप है, परंतु ऋषियों के दुराग्रह के कारण उन्हें एक लीला रचनी पड़ी। गणेश जी ने एक अत्यंत दुर्बल और मरणासन्न गाय का रूप धारण किया और महर्षि गौतम के जौ के खेत में जाकर चरने लगे। जब महर्षि ने अपनी फसल को बचाने के लिए हाथ में एक कोमल तिनका लेकर उस गाय को धीरे से पुचकारा, तो स्पर्श मात्र से वह मायावी गाय वहीं गिर पड़ी और उसने प्राण त्याग दिए।

​छिपे हुए ऋषियों ने तुरंत बाहर आकर शोर मचा दिया और महर्षि गौतम पर 'गौ-हत्या' का घोर कलंक लगा दिया। समाज से बहिष्कृत होने के बाद, आत्मग्लानि से भरे गौतम ऋषि ने इस पाप से मुक्ति का मार्ग पूछा। कुटिल ऋषियों ने उनके सामने असंभव शर्तें रख दीं—पूरी पृथ्वी की परिक्रमा, ब्रह्मगिरि के फेरे और अंत में स्वर्ग से गंगा को धरती पर लाना, ताकि उनके जल से शुद्धि हो सके। महर्षि गौतम ने इसे ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार कर लिया। उन्होंने और माता अहिल्या ने भगवान शिव की कठोर आराधना शुरू की।

​उनकी निश्छल भक्ति और वर्षों के तप से प्रसन्न होकर महादेव साक्षात प्रकट हुए। शिव जी ने गौतम ऋषि को बताया कि वे निर्दोष हैं और यह सब उन ऋषियों का षड्यंत्र था। महादेव उन ऋषियों को दंड देना चाहते थे, लेकिन क्षमाशील महर्षि गौतम ने उनके पैर पकड़ लिए और कहा कि प्रभु, उन ऋषियों का आभार है जिनकी वजह से मुझे आपके दर्शन प्राप्त हुए। उन्होंने महादेव से प्रार्थना की कि वे गंगा माता को वहां भेज दें। तब शिव जी ने अपनी जटाओं को झटका, जिससे गंगा की धारा वहां प्रकट हुई, जिसे आज हम गोदावरी के नाम से जानते हैं।

​गंगा जी ने शर्त रखी कि वह तभी वहां रुकेंगी जब महादेव भी वहां निवास करेंगे। देवताओं की स्तुति और भक्तों के कल्याण के लिए भगवान शिव वहां 'त्र्यंबकेश्वर' के रूप में विराजमान हो गए। यहाँ के ज्योतिर्लिंग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश, तीनों देवों के छोटे लिंग समाहित हैं, जो त्रिदेवों की एकता का प्रतीक हैं। यह पावन कथा हमें सिखाती है कि सत्य और धैर्य के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति का साथ स्वयं ईश्वर देते हैं और अंततः सत्य की ही विजय होती है। आज भी त्र्यंबकेश्वर की यह पावन धरती भक्तों को पापमुक्त कर उन्हें आध्यात्मिक शांति प्रदान करती है।




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गणेश जी की कहानी


गणेश जी की कहानी

तिलकुटी चौथ की कहानी

एक शहर में देवरानी जेठानी रहती थी । देवरानी गरीब थी और जेठानी अमीर थी ।

देवरानी गणेश जी की भक्त थी। देवरानी का पति जंगल से लकड़ी काट कर बेचता था और अक्सर बीमार रहता था। देवरानी जेठानी के घर का सारा काम करती और बदले में जेठानी बचा हुआ खाना, पुराने कपड़े आदि उसको दे देती थी। इसी से देवरानी का परिवार चल रहा था।

माघ महीने में देवरानी ने तिल चौथ का व्रत किया। पाँच रूपये का तिल व गुड़ लाकर तिलकुट्टा बनाया। पूजा करके तिल चौथ की कथा ( तिल चौथ की कहानी ) सुनी और तिलकुट्टा छींके में रख दिया और सोचा की चाँद उगने पर पहले तिलकुट्टा और उसके बाद ही कुछ खायेगी ।

कथा सुनकर वह जेठानी के यहाँ काम करने चली गई। खाना बनाकर जेठानी के बच्चों से खाना खाने को कहा तो बच्चे बोले – माँ ने व्रत किया हैं और माँ भूखी हैं। जब माँ खाना खायेगी तभी हम भी खाएंगे।

जेठजी को खाना खाने को कहा तो जेठजी बोले ” मैं अकेला नही खाऊँगा , जब चाँद निकलेगा तब सब खाएंगे तभी मैं भी खाऊँगा ”

देवरानी ने कहा – मुझे तो घर जाना है इसलिए मुझे खाना दे दो ।

जेठानी ने उसे कहा – आज तो किसी ने भी अभी तक खाना नहीं खाया तुम्हें कैसे दे दूँ ?

तुम सुबह सवेरे ही बचा हुआ खाना ले जाना।

देवरानी उदास मन से घर चली आई।

देवरानी के घर पर पति , बच्चे सब आस लगाए बैठे थे की आज तो त्यौहार हैं इसलिए कुछ पकवान आदि खाने को मिलेगा। परन्तु जब बच्चो को पता चला कि आज तो रोटी भी नहीं मिलेगी तो बच्चे रोने लगे।

उसके पति को भी बहुत गुस्सा आया कहने लगा सारा दिन काम करके भी दो रोटी नहीं ला सकती तो काम क्यों करती हो ? पति ने गुस्से में आकर पत्नी को कपड़े धोने के धोवने से मारा। धोवना हाथ से छूट गया तो पाटे से मारा।

वह बेचारी गणेश जी को याद करती हुई रोते रोते पानी पीकर सो गयी।

उस दिन गणेश जी देवरानी के सपने में आये और कहने लगे ” धोवने मारी , पाटे मारी , सो रही है या जाग रही है ”

वह बोली ” कुछ सो रही हूँ , कुछ जाग रही हूँ ”

गणेश जी बोले ,” भूख लगी हैं , कुछ खाने को दे ”

देवरानी बोली ” क्या दूँ , मेरे घर में तो अन्न का एक दाना भी नहीं हैं ” जेठानी बचा खुचा खाना देती थी आज वो भी नहीं मिला। पूजा का बचा हुआ तिलकुटा छींके में पड़ा हैं , वही खा लो।

गणेश जी ने तिलकुटा खाया और उसके बाद कहने लगे – ” धोवने मारी , पाटे मारी , निमटाई लगी है ! कहाँ निमटे ”

वो बोली ” ये पड़ा घर , जहाँ इच्छा हो वहाँ निमट लो ”

फिर गणेश जी बोले “अब कहाँ पोंछू”

अब देवरानी को बहुत गुस्सा आया कि कब से तंग करे जा रहे हैं , सो बोली ” मेरे सर पर पोछो और कहाँ पोछोगे ”

सुबह जब देवरानी उठी तो यह देखकर हैरान रह गई कि पूरा घर हीरे-मोती से जगमगा रहा है , सिर पर जहाँ बिंदायकजी पोछनी कर गये थे वहाँ हीरे के टीके और बिंदी जगमगा रहे थे

उस दिन देवरानी जेठानी के काम करने नहीं गई।

जेठनी मे कुछ देर तो राह देखी फिर बच्चो को देवरानी को बुलाने भेज दिया । जेठानी ने सोचा कल खाना नहीं दिया था इसीलिए शायद देवरानी बुरा मान गई होगी।

बच्चे बुलाने गए और बोले – चाची चलो ! माँ ने बुलाया है सारा काम पड़ा है ।

दुनिया में चाहे कोई मौका चूक जाए पर देवरानी जेठानी आपस में कहने का मौके नहीं छोड़ती। देवरानी ने कहा ” बेटा बहुत दिन तेरी माँ के यहाँ काम कर लिया ,अब तुम अपनी माँ को ही मेरे यहाँ काम करने भेज दो ”

बच्चो ने घर जाकर माँ को बताया कि चाची का तो पूरा घर हीरे मोतियों से जगमगा रहा है। जेठानी दौड़ती हुई देवरानी के पास आई और पूछा कि ये सब हुआ कैसे ? देवरानी ने उसके साथ जो हुआ वो सब कह डाला।

घर लौटकर जेठानी ने कुछ सोचा और अपने पति से कहने लागि – आप मुझे धोवने और पाटे से मारो।

उसका पति बोला कि भलीमानस मैंने तो कभी तुम पर हाथ भी नहीं उठाया। मैं तुम्हे धोवने और पाटे से कैसे मार सकता हूँ। वह नहीं मानी और जिद करने लगी। मजबूरन पति को उसे मारना पड़ा।

मार खाने के बाद , उसने ढ़ेर सारा घी डालकर चूरमा बनाया और छीकें में रखकर और सो गयी।

रात को चौथ विन्दायक जी उसके भी सपने में आये कहने लगे , “भूख लगी है , क्या खाऊँ ”

जेठानी ने कहा ” हे गणेश जी महाराज , मेरी देवरानी के यहाँ तो आपने सूखा चूटकी भर तिलकुट्टा खाया था , मैने तो झरते घी का चूरमा बनाकर आपके लिए छींके में रखा हैं , फल और मेवे भी रखे है जो चाहें खा लो ”

गणेश जी बोले ,”अब निपटे कहाँ ” ( माही चौथ की कहानी …. )

जेठानी बोली ,”उसके यहाँ तो टूटी फूटी झोपड़ी थी मेरे यहाँ तो कंचन के महल हैं जहाँ चाहो निपटो ”

फिर गणेश जी ने पूछा ,”अब पोंछू कहाँ ”

जेठानी बोली ” मेरे ललाट पर बड़ी सी बिंदी लगाकर पोंछ लो ”

धन की भूखी जेठानी सुबह बहुत जल्दी उठ गयी। सोचा घर हीरे जवाहरात से भर चूका होगा पर देखा तो पूरे घर में गन्दगी फैली हुई थी। तेज बदबू आ रही थी। उसके सिर पर भी बहुत सी गंदगी लगी हुई थी।

उसने कहा “हे गणेश जी महाराज , ये आपने क्या किया ” मुझसे रूठे और देवरानी पर टूटे।

जेठानी ने घर और की सफाई करने की बहुत ही कोशिश करी परन्तु गंदगी और ज्यादा फैलती गई। जेठानी के पति को मालूम चला तो वह भी बहुत गुस्सा हुआ और बोला तेरे पास इतना सब कुछ था फिर भी तेरा मन नहीं भरा।

परेशान होकर चौथ के बिंदायक जी ( गणेशजी ) से मदद की विनती करने लगी। बोली – मुझसे बड़ी भूल हुई। मुझे क्षमा करो ।

बिंदायक जी ने कहा ” देवरानी से जलन के कारण तूने जो किया था यह उसी का फल है। अब तू अपने धन में से आधा उसे देगी तभी यह सब साफ होगा ”

उसने आधा धन तो बाँट दिया किन्तु मोहरों की एक हांडी चूल्हे के नीचे गाढ़ रखी थी। उसने सोचा किसी को पता नहीं चलेगा और उसने उस धन को नहीं बांटा ।

उसने कहा ” हे चौथ बिंदायक जी , अब तो अपना यह बिखराव समेटो ”

वे बोले , पहले चूल्हे के नीचे गाढ़ी हुयी मोहरो की हांडी औरताक में रखी सुई की भी पांति कर।

इस प्रकार बिंदायकजी ने सुई जैसी छोटी चीज का भी बंटवारा करवाकर अपनी माया समेटी।

हे गणेश जी महाराज , जैसी आपने देवरानी पर कृपा करी वैसी सब पर करना। कहानी कहने वाले , सुनने वाले व हुंकारा भरने वाले सब पर कृपा करना। किन्तु जेठानी को जैसी सजा दी वैसी किसी को मत देना।

बोलो गणेश जी महाराज की – जय !!!

चौथ माता की – जय !!!



गणेश जी की कहानी ganesh ji ki kahani

 

गणेश जी की कहानी

गणेश जी की कहानी

गणेश जी की कहानी


गजानंद जी की कहानी

एक बार श्री गणेश जी पृथ्वी लोक पर भ्रमण करते हुए किसी के खेत में से अनाज के 12 दाने चख लेते हैं।

गणेश जी को मन में विचार आता है कि हमने इस खेत से जो दाने ले लिए हैं इस व्यक्ति के हम कर्जदार हो गए अतः हमें उसकी सेवा करनी चाहिए

खेत किसी सेठ का था गणेश जी सेठ के दानों का ऋण चुकाने के लिए वहां पर नौकर बनकर रह गए ।

श्री गणेश जी 12 दानो के लिये सेठ जी के नौकर बन गए, 1 दिन सेठानी शौच जाकर राख से हाथ धोने लग गई तब गणेश जी ने उसके हाथ से राख छीन ली और मिट्टी से हाथ धुलवा दीये ।

तब सेठानी बहुत नाराज हुई और सेठ जी से जाकर बोली कि इस लड़के ने मेरा हाथ मरोड़ दिया आपने यह कैसा नौकर रखा है सेठानी को गुस्से में देखकर सेठ जी ने गणेश को बुलाया और कारण पूछा तो गणेश जी बोले सेठानी जी राख से हाथ धो रही थी जिससे रिद्धि सिद्धि चली जाती है जबकि मिट्टी से हाथ धोने से घर में रिद्धि-सिद्धि का वास होता है मैंने तो यह सीख दी है तब सेठ जी ने सोचा गणेश है तो बहुत समझदार ।

थोड़े दिन बाद कुंभ का मेला आया तब सेठ जी ने गणेश को बुलाकर कहा कि अपने सेठानी के साथ में चले जाओ और इनको कुंभ नहला कर लेकर आओ। गणेश सेठानी के साथ चला गया वहां पर सेठानी एक किनारे पर बैठकर नहाने लगे तब गणेश उनको पानी के भीतर लेकर नहला कर ले आया अर्थात डुबकी लगा कर ले आया तब सेठानी बहुत नाराज हुई और घर पर आकर सेठ जी से बोली आज तो गणेश ने मेरी इज्जत ही ले ली सब लोगों के सामने मुझे गठित कर अंदर ले गया और पानी में नहीं लाया तब सेठ जी ने गणेश को पूछा तो गणेश बोला कि किनारे पर लोगों के नहाए हुए पानी में नहाने से उत्तम फल नहीं मिलता इसलिए भीतर जाकर नहाने से अगले जन्म में राजपाट मिलेगा यही सोच कर मैंने इनको नहीं लाया तब सेठ जी ने सोचा गणेश है तो समझदार।


1 दिन सेठ जी हवन में बैठे हुए थे तो गणेश से बोले कि जाकर सेठानी को बुला कर लिया तब गणेश गया तो देखता है कि सेठानी ने काला ब्लाउज पहना हुआ है गणेश ने उसको फाड़ दिया तब सेठानी रूथ कर सो गई, हवन में नहीं गई तो सेठ जी बुलाने के लिए खुदा आए तब सेठानी बोली इस नौकर गणेश ने मेरा ब्लाउज काट दिया तब सेठ जी को बहुत गुस्सा आया गणेश को बुलाया तो गणेश ने बताया की सेठानी काला ब्लाउज पहन कर आ रही थी जोकि पूजा में ठीक नहीं है मैंने उनको कहा था कि लाल ब्लाउज पहन कर आओ पूजा में काले कलर के कपड़े नहीं पहनने चाहिए । सेठ जी शुभकाम में काला कपडा पहनने से काम सफल नहीं होता है। सेठ जी ने फिर सोचा कि गणेश है तो समझदार।

एक दिन सेठ जी पूजा करने लगे तब पंडित जी ने कहा कि मैं गणेश जी की मूर्ति लाना भूल गया तब गणेश बोला मुझे ही मूर्ति समझकर बिठा लीजिए तुम्हारा सब काम सफल हो जाएगा तब सेठ जी को बहुत गुस्सा आ गया और बोले अब तक तो सेठानी से मजाक करता था अब मुझसे भी करने लग गया तब गणेश जी बोले की मजाक नहीं कर रहा हूं सच्ची बात कर रहा हूं ।

तब श्री गणेश जी ने अपना स्वरूप दिखाया और उस सेठ सेठानी जी ने सदेही श्री गणेश जी की पूजा की और पूजा खत्म होते ही भगवान श्री गणेश अंतर्ध्यान हो गए ।

सेठ जी को बहुत चिंता हुई कि हमने श्रीगणेश को इतने दिन तक नौकर बनाकर रखा और भला बुरा कहा तब भगवान श्री गणेश जी ने उनको सपने में दर्शन देकर थे कि मैंने आप के खेत से 12 दाने ले लिए थे उनका ऋण चुकाने के लिए मैं आपके यहां नौकर बन कर रहा अतः आप चिंता ना करें ।

इस प्रकार गणेश जी ने अपना भूल से किया हुआ कर्म का भी पश्चाताप किया और ऋण चुकाया उसी प्रकार हम सबको भी अपने सभी कर्ज चुकाने चाहिए।

गणेश जी का कर्ज