श्रीमद्भगवद्गीता के 10वें अध्याय की अद्भुत महिमा | The Miraculous Power of Gita Chapter 10
श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय का माहात्म्य
भगवान् शिव कहते हैं—सुन्दरि! अब तुम दशम अध्याय के माहात्म्य की परमपावन कथा सुनो, जो स्वर्ग रूपी दुर्ग में जाने के लिए सुन्दर सोपान और प्रभाव की चरम सीमा है। काशीपुरी में धीरबुद्धि नाम से विख्यात एक ब्राह्मण था, जो मुझमें प्रिय नन्दी के समान भक्ति रखता था। वह पावन कीर्ति के अर्जन में तत्पर रहने वाला, शान्तचित्त और हिंसा, कठोरता एवं दु:साहस से दूर रहने वाला था। जितेन्द्रिय होने के कारण वह निवृत्ति मार्ग में ही स्थित रहता था। उसने वेदरूपी समुद्र का पार पा लिया था।
वह उड़ते-उड़ते सहसा वहाँ से पृथ्वी पर गिर पड़ा। जब होश में आया और अपने गिरने का कोई कारण न देख सका तो मन-ही-मन सोचने लगा— 'अहो! यह मुझ पर क्या आ पड़ा? आज मेरा पतन कैसे हो गया?' पके हुए कपूर के समान मेरे श्वेत शरीर में यह कालिमा कैसे आ गयी? इस प्रकार विस्मित होकर मैं अभी विचार ही कर रहा था कि उस पोखरे के कमलों में से मुझे ऐसी वाणी सुनायी दी— 'हंस! उठो, मैं तुम्हारे गिरने और काले होने का कारण बताती हूँ।' तब मैं उठकर सरोवर के बीच में गया और वहाँ पाँच कमलों से युक्त एक सुन्दर कमलिनी को देखा। उसको प्रणाम करके मैंने प्रदक्षिणा की और अपने पतन का सारा कारण पूछा।
कमलिनी बोली—कलहंस! तुम आकाशमार्ग से मुझे लाँघकर गये हो, उसी पातक के परिणामस्वरूप तुम्हें पृथ्वी पर गिरना पड़ा है तथा उसी के कारण तुम्हारे शरीर में कालिमा दिखायी देती है। तुम्हें गिरा देख मेरे हृदय में दया भर आयी और जब मैं इस मध्यम कमल के द्वारा बोलने लगी हूँ, उस समय मेरे मुख से निकली हुई सुगन्ध को सूंघकर साठ हजार भँवरे स्वर्गलोक को प्राप्त हो गये हैं। पक्षीराज! जिस कारण मुझमें इतना वैभव—ऐसा प्रभाव आया है, उसे बताती हूँ; सुनो। इस जन्म से पहले तीसरे जन्म में मैं इस पृथ्वी पर एक ब्राह्मण की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थी। उस समय मेरा नाम सरोजवदना था। मैं गुरुजनों की सेवा करती हुई सदा एकमात्र पातिव्रत्य के पालन में तत्पर रहती थी। एक दिन की बात है, मैं एक मैना को पढ़ा रही थी। इससे पति सेवा में कुछ विलम्ब हो गया। इससे पतिदेवता कुपित हो गये और उन्होंने शाप दिया— 'पापिनी! तू मैना हो जा।' मरने के बाद यद्यपि मैं मैना ही हुई, तथापि पातिव्रत्य के प्रसाद से मुनियों के ही घर में मुझे आश्रय मिला। किसी मुनिकन्या ने मेरा पालन-पोषण किया।
मैं जिनके घर में थी, वे ब्राह्मण प्रतिदिन प्रातः काल विभूतियोग नाम से प्रसिद्ध गीता के दसवें अध्याय का पाठ करते थे और मैं उस पापहारी अध्याय को सुना करती थी। विहंगम! काल आने पर मैं मैना का शरीर छोड़कर दशम अध्याय के माहात्म्य से स्वर्गलोक में अप्सरा हुई। मेरा नाम पद्मावती हुआ और मैं पद्मा की प्यारी सखी हो गयी। एक दिन मैं विमान से आकाश में विचर रही थी। उस समय सुन्दर कमलों से सुशोभित इस रमणीय सरोवर पर मेरी दृष्टि पड़ी और इसमें उतरकर ज्यों ही मैंने जलक्रीड़ा आरम्भ की, त्यों ही दुर्वासा मुनि आ धमके। उन्होंने वस्त्रहीन अवस्था में मुझे देख लिया। उनके भय से मैंने स्वयं ही एक कमलिनी का रूप धारण कर लिया। मेरे दोनों पैर दो कमल हुए। दोनों हाथ भी दो कमल हो गये और शेष अंगों के साथ मेरा मुख भी एक कमल हुआ। इस प्रकार मैं पाँच कमलों से युक्त हुई। मुनिवर दुर्वासा ने मुझे देखा। उनके नेत्र क्रोधाग्नि से जल रहे थे। वे बोले— 'पापिनी! तू इसी रूप में सौ वर्षों तक पड़ी रह।' यह शाप देकर वे क्षणभर में अन्तर्धान हो गये। कमलिनी होने पर भी विभूतियोगाध्याय के माहात्म्य से मेरी वाणी लुप्त नहीं हुई है। मुझे लाँघनेमात्र के अपराध से तुम पृथ्वी पर गिरे हो। पक्षीराज! यहाँ खड़े हुए तुम्हारे सामने ही आज मेरे शाप की निवृत्ति हो रही है, क्योंकि आज सौ वर्ष पूरे हो गये। मेरे द्वारा गाये जाते हुए उस उत्तम अध्याय को तुम भी सुन लो। उसके श्रवणमात्र से तुम भी आज ही मुक्त हो जाओगे।
यों कहकर पद्मिनी ने स्पष्ट एवं सुन्दर वाणी में दसवें अध्याय का पाठ किया और वह मुक्त हो गयी। उसे सुनने के बाद उसी के दिये हुए इस उत्तम कमल को लाकर मैंने आपको अर्पण किया है। इतनी कथा सुनाकर उस पक्षी ने अपना शरीर त्याग दिया। यह एक अद्भुत-सी घटना हुई। वही पक्षी अब दसवें अध्याय के प्रभाव से ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुआ है। जन्म से ही अभ्यास होने के कारण शैशवावस्था से ही इसके मुख से सदा गीता के दसवें अध्याय का उच्चारण हुआ करता है। दसवें अध्याय के अर्थ-चिन्तन का यह परिणाम हुआ है कि यह सब भूतों में स्थित शङ्ख-चक्रधारी भगवान् विष्णु का सदा ही दर्शन करता रहता है। इसकी स्नेहपूर्ण दृष्टि जब कभी किसी देहधारी के शरीर पर पड़ जाती है, तब वह चाहे शराबी और ब्रह्महत्यारा ही क्यों न हो, मुक्त हो जाता है। तथा पूर्वजन्म में अभ्यास किये हुए दसवें अध्याय के माहात्म्य से इसको दुर्लभ तत्त्वज्ञान प्राप्त है तथा इसने जीवन्मुक्ति भी पा ली है। अत: जब यह रास्ता चलने लगता है तो मैं इसे हाथ का सहारा दिये रहता हूँ। भृंगिरिटे! यह सब दसवें अध्याय की ही महामहिमा है।
पार्वती! इस प्रकार मैंने भृंगिरिटि के सामने जो पापनाशक कथा कही थी, वही यहाँ तुमसे भी कही है। नर हो या नारी अथवा कोई भी क्यों न हो, इस दसवें अध्याय के श्रवणमात्र से उसे सब आश्रमों के पालन का फल प्राप्त होता है।
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