गीता तृतीय अध्याय माहात्म्य |gita ke 3 adhayay ki Katha
जड़ नामक ब्राह्मण और उसका पतन: जनस्थान में 'जड़' नाम का एक ब्राह्मण था, जिसने अपना धर्म छोड़कर व्यभिचार, जुआ और मदिरापान जैसे पापों को अपना लिया था। जब उसका सारा धन नष्ट हो गया, तो वह व्यापार के लिए उत्तर दिशा में गया। लौटते समय रात के अंधेरे में लुटेरों ने उसे मार डाला। अपने पापों के कारण वह एक भयानक प्रेत बना।
पुत्र की पितृ-भक्ति और गीता पाठ: उसका पुत्र बहुत बड़ा विद्वान और धर्मात्मा था। जब पिता नहीं लौटे, तो वह उन्हें खोजने निकला। मार्ग में उसे पिता की मृत्यु का पता चला। वह पिता का उद्धार करने के लिए उनकी अस्थियाँ लेकर काशी जाने लगा। रास्ते में वह उसी वृक्ष के नीचे रुका जहाँ उसके पिता की हत्या हुई थी। वहाँ उसने संध्या वंदन किया और गीता के तीसरे अध्याय का पाठ किया।
पिता का उद्धार: जैसे ही पाठ संपन्न हुआ, आकाश में भयंकर शोर हुआ और एक दिव्य विमान उतरा। पुत्र ने देखा कि उसके पिता प्रेत योनि से मुक्त होकर दिव्य रूप में विमान पर बैठे हैं। पिता ने बताया कि "तुम्हारे गीता के तीसरे अध्याय के पाठ से मेरी मुक्ति हो गई है और अब काशी जाने की आवश्यकता नहीं रही।"
नारकी जीवों का उद्धार: पिता ने पुत्र से आग्रह किया कि वह इसी पाठ के पुण्य से अपने अन्य पूर्वजों और नरक में पड़े जीवों का भी उद्धार करे। पुत्र ने वापस लौटकर श्रीकृष्ण मंदिर में बैठकर तीसरे अध्याय का पाठ किया और सारा पुण्य नरक के जीवों को अर्पित कर दिया।
यमराज और भगवान विष्णु का मिलन: इस पुण्य के प्रभाव से नरक खाली हो गया। भगवान विष्णु के दूत यमराज के पास पहुँचे और सभी कैदियों को छोड़ने की आज्ञा दी। यमराज स्वयं क्षीरसागर जाकर भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे। भगवान ने यमराज को सांत्वना दी और उन्हें वापस अपने लोक भेजा। अंत में वह धर्मात्मा ब्राह्मण पुत्र भी अपनी जाति और अनगिनत जीवों का उद्धार करके स्वयं विष्णुधाम को गया।
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