Gita ke 16adhayay ki Katha| गीता के सत्तरह अध्याय की कथा
सिंहलद्वीप के राजा की महाराज खड्गबाहु से बड़ी मैत्री थी, अतः उन्होंने जल के मार्ग से उस हाथी को मित्र की प्रसन्नता के लिये भेज दिया। एक दिन राजा ने श्लोक की समस्यापूर्ति से संतुष्ट होकर किसी कवि को पुरस्कार रूप में वह हाथी दे दिया और उन्होंने सौ स्वर्ण-मुद्राएँ लेकर उसे मालवनरेश के हाथ बेच दिया। कुछ काल व्यतीत होने पर वह हाथी यत्नपूर्वक पालित होने पर भी असाध्य ज्वर से ग्रस्त होकर मरणासन्न हो गया। हाथीवानों ने जब उसे ऐसी शोचनीय अवस्था में देखा तो राजा के पास जाकर हाथी के हित के लिये शीघ्र ही सारा हाल कह सुनाया। 'महाराज! आपका हाथी अस्वस्थ जान पड़ता है। उसका खाना, पीना और सोना सब छूट गया है। हमारी समझ में नहीं आता इसका क्या कारण है।'
हाथीवानों का बताया हुआ समाचार सुनकर राजा ने हाथी के रोग को पहचानने वाले चिकित्सा कुशल मन्त्रियों के साथ उस स्थान पर पदार्पण किया, जहाँ हाथी ज्वरग्रस्त होकर पड़ा था। राजा को देखते ही उसने ज्वर जनित वेदना को भूलकर संसार को आश्चर्य में डालने वाली वाणी में कहा— 'सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता, राजनीति के समुद्र, शत्रु-समुदाय को परास्त करने वाले तथा भगवान् विष्णु के चरणों में अनुराग रखने वाले महाराज! इन औषधों से क्या लेना है? वैद्यो से भी कुछ लाभ होने वाला नहीं है, दान और जप से भी क्या सिद्ध होगा? आप कृपा करके गीता के सत्रहवें अध्याय का पाठ करने वाले किसी ब्राह्मण को बुलवाइये।'
हाथी के कथनानुसार राजा ने सब कुछ वैसा ही किया। तदनन्तर गीता-पाठ करने वाले ब्राह्मण ने जब उत्तम जल को अभिमन्त्रित करके उसके ऊपर डाला, तब दुःशासन गज योनि का परित्याग करके मुक्त हो गया। राजा ने दुःशासन को दिव्य विमान पर आरूढ़ एवं इन्द्र के समान तेजस्वी देखकर पूछा— 'तुम्हारी पूर्व-जन्म में क्या जाति थी? क्या स्वरूप था? कैसे आचरण थे? और किस कर्म से तुम यहाँ हाथी होकर आये थे? ये सारी बातें मुझे बताओ।' राजा के इस प्रकार पूछने पर संकट से छूटे हुए दुःशासन ने विमान पर बैठे-ही-बैठे स्थिरता के साथ अपना पूर्व जन्म का उपर्युक्त समाचार यथावत् कह सुनाया। तत्पश्चात् नरश्रेष्ठ मालवनरेश भी गीता के सत्रहवें अध्याय का पाठ करने लगे। इससे थोड़े ही समय में उनकी मुक्ति हो गई।
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