Gita ke 11 adhyay ki Katha| गीता के पांचवें अध्याय की कथा
श्रीमहादेवजी कहते हैं—प्रिये! गीता के वर्णन से सम्बन्ध रखने वाली कथा एवं विश्वरूप अध्याय के पावन महात्म्य को श्रवण करो। विशाल नेत्रों वाली पार्वती! इस अध्याय के महात्म्य का पूरा-पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता। इसके सम्बन्ध में सहस्रों कथाएँ हैं, उनमें से एक यहाँ कही जाती है।
प्रणीता नदी के तट पर मेघंकर नाम से विख्यात एक बहुत बड़ा नगर है। वहाँ के लोगों के सुख-दुःख की उपेक्षा कर वह (नगर) राक्षसों का निवास स्थान बन गया था। वहाँ रहने वाले एक ब्राह्मण, जो ब्रह्मचारी थे, वे सदा जीवनमुक्त योगी की स्थिति में रहते थे। एक समय जब बृहस्पति सिंह राशि पर स्थित थे, महायोगी सुनन्द ने गोदावरी तीर्थ की यात्रा आरम्भ की। वे क्रमशः विरजतीर्थ, तारातीर्थ, कपिलासंगम, अष्टतीर्थ, कपिलाद्वार, नृसिंहवन, अम्बिकापुरी तथा करस्थानपुर आदि क्षेत्रों में स्नान और दर्शन करते हुए 'विवाह मण्डप' नामक नगर में आए। वहाँ उन्होंने प्रत्येक घर में जाकर अपने ठहरने के लिए स्थान माँगा, परन्तु कहीं भी उन्हें स्थान नहीं मिला। अन्त में गाँव के मुखिया (ग्रामपाल) ने उन्हें एक बहुत बड़ी धर्मशाला दिखा दी। ब्राह्मण ने साथियों सहित उसके भीतर जाकर रात में निवास किया।
सबेरा होने पर उन्होंने अपने को तो धर्मशाला के बाहर पाया, किन्तु उनके और साथी नहीं दिखाई दिये। वे उन्हें खोजने के लिए चले, इतने में ही ग्रामपाल से उनकी भेंट हो गई। ग्रामपाल ने कहा—'मुनिश्रेष्ठ! तुम सब प्रकार से दीर्घायु जान पड़ते हो। भाग्यशाली तथा पुण्यवान् पुरुषों में तुम सबसे पवित्र हो। तुम्हारे भीतर कोई लोकोत्तर प्रभाव विद्यमान है। तुम्हारे साथी कहाँ गये? और कैसे इस भवन से बाहर हुए? इसका पता लगाओ। मैं तुम्हारे सामने इतना ही कहता हूँ कि तुम्हारे जैसा तपस्वी मुझे दूसरा कोई नहीं दिखाई देता। विप्रवर! तुम्हें किस महामन्त्र का ज्ञान है? किस विद्या का आश्रय लेते हो तथा किस देवता की दया से तुम्हें अलौकिक शक्ति आ गयी है? भगवन्! कृपा करके इस गाँव में रहो। मैं तुम्हारी सब सेवा-शुश्रूषा करूँगा।'
यूँ कहकर ग्रामपाल ने मुनीश्वर सुनन्द को अपने गाँव में ठहरा लिया। वह दिन-रात बड़ी भक्ति से उनकी सेवा-टहल करने लगा। जब सात-आठ दिन बीत गये, तब एक दिन प्रातःकाल आकर वह बहुत दुःखी हो महात्मा के सामने रोने लगा और बोला—'हाय! आज रात में राक्षसों ने मुझे भाग्यहीन के बेटे को चबा लिया है। मेरा पुत्र बड़ा ही गुणवान् और भक्तिमान् था।' ग्रामपाल के इस प्रकार कहने पर योगी सुनन्द ने पूछा—'कहाँ है वह राक्षस? और किस प्रकार उसने तुम्हारे पुत्र का भक्षण किया है?'
ग्रामपाल बोला—'ब्रह्मण! इस नगर में एक बड़ा भयंकर नरभक्षी राक्षस रहता है। वह प्रतिदिन आकर इस नगर के मनुष्यों को खा लिया करता था। तब एक दिन समस्त नगरवासियों ने मिलकर उससे प्रार्थना की—'राक्षस! तुम हम सब लोगों की रक्षा करो। हम तुम्हारे लिए भोजन की व्यवस्था किये देते हैं। यहाँ बाहर के जो पथिक रात में आकर नींद लेने लगे, उनको खा लिया करना।' इस प्रकार नागरिक मनुष्यों ने गांव के (मुझ) मुखिया द्वारा यह निश्चित किया। तुम भी अन्य राहगीरों के साथ इस घर में आकर सोये थे; किन्तु राक्षस ने उन सबको तो खा लिया, केवल तुम्हें छोड़ दिया है। द्विजोत्तम! तुममें ऐसा क्या प्रभाव है, इस बात को तुम्हीं जानते हो। इस समय मेरे पुत्र का एक मित्र आया था, किन्तु मैं उसे राहगीरों के साथ उसे भी मैंने उसी धर्मशाला में भेज दिया। पुत्र ने जब सुना कि मेरा मित्र भी आया था, तो वह उसे वहाँ से ले आने के लिए गया; परन्तु राक्षस ने उसे भी खा लिया। आज सबेरे मैंने बहुत दुःखी होकर उस राक्षस से पूछा—'ओ दुष्टात्मन्! तूने रात में मेरे पुत्र को भी खा लिया। तुम्हारे पेट में पड़ा हुआ मेरा पुत्र जिससे जीवित हो सके, ऐसा उपाय यदि हो तो बता।'
राक्षस ने कहा—'ग्रामपाल! धर्मशाला के भीतर घुसे हुए तुम्हारे पुत्र को न जानने के कारण मैंने भक्षण किया है। अन्य पथिकों के साथ तुम्हारा पुत्र भी अनजान में ही मेरा ग्रास बन गया है, वह मेरे उदर में जिस प्रकार जीवित और रक्षित रह सकता है, वह उपाय स्वयं विधाता ने ही कर दिया है। जो ब्राह्मण सदा गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करता हो, उसके प्रभाव से मेरी मुक्ति होगी और मेरे हुओं को पुनः जीवन प्राप्त होगा। यहाँ कोई ब्राह्मण रहते हैं, जिनको मैंने एक दिन धर्मशाला से बाहर कर दिया था। वे निरन्तर गीता के ग्यारहवें अध्याय का जप करते हैं। इस अध्याय के मन्त्र से सात बार अभिमन्त्रित करके यदि वे मेरे ऊपर जल का छींटा दे दें तो निस्संदेह मेरा शाप से उद्धार हो जाएगा।'
इस प्रकार उस राक्षस का संदेश पाकर मैं तुम्हारे निकट आया हूँ।
ब्राह्मण ने पूछा—'ग्रामपाल! जो रात में सोये हुए मनुष्यों को खाता है, वह प्राणी किस पाप से राक्षस हुआ है?'
ग्रामपाल बोला—'ब्रह्मण! पहले इस गाँव के खेती की क्यारियों की रक्षा करने में लगा था। वह वहाँ से थोड़ी ही दूर पर एक बहुत बड़ा ब्राह्मण रहता था। वह किसी राहगीर को मारकर खा रहा था। उसी समय दूसरे तपस्वी कहीं से आ निकले, जो उस राहगीर को बचाने के लिए दूसरे को जो देख रहे थे। सिद्ध मुनि को गुस्सा आया और उस राहगीर को खाकर आकाश में उड़ गया। तब तपस्वी ने कुपित होकर उस किसान से कहा—'ओ दुष्ट हलवाहे! तुझे धिक्कार है। तू बड़ा ही कठोर और निर्दयी है। दूसरों की रक्षा से मुँह मोड़कर केवल पेट पालने के धंधे में लगा है। तेरा जीवन नष्टप्राय है। अरे! जो चोर, डाढ़वाले जीव, सर्प, शत्रु, अग्नि, विष, जल, गौध, राक्षस, भूत तथा बेताल आदि के द्वारा खाए हुए मनुष्यों की उपेक्षा करता है, वह उसके समान पाप करता है। जो शाली ब्राह्मणों होकर भी भोजन की चिंता नहीं लेता है, जो कर्म करते मारे जाते हुए 'छोड़ो, छोड़ो' की पुकार करता है, वह पाप की जो राह के लिए 'खेत' की रक्षा करता है, वह पाप का भागी होता है। जो मनुष्य गौओं की रक्षा के लिए भी जो भाग्य के मारे जाते हैं, वे ब्राह्मण, भील तथा दुष्ट ग्वालों के हाथ से मारे जाते हैं, वे भगवान् विष्णु के उस परम पद को पाने के लिए योगियों के लिए भी दुर्लभ है। सहस्र अश्वमेध और सौ वाजपेय यज्ञ मिलकर भी भगवान् विष्णु के उस पद के बराबर भी नहीं हो सकते।
ग्रामपाल! राक्षसी योनि प्राप्त करने के कारण से पुण्यवान् पुरुष भी जो इसे बचा न सके, समय आने पर कुम्भीपाक नामक नरक में पकाया जाता है*, तूने दुष्ट सिद्ध के द्वारा खाए जाते हुए राहगीर को देखकर उसे बचाने में समर्थ होते हुए भी जो इसकी रक्षा नहीं की, इससे तू राक्षस हो जा।'
ग्रामपाल बोला—'महात्मन्! मैं वहाँ उपस्थित अवश्य था, किन्तु मैं ये सब देख घबराहट के कारण वहाँ से नहीं जान सका। अतः मुनि श्रेष्ठ! कृपया आपके अनुग्रह करना चाहिए।'
तपस्वी ब्राह्मण ने कहा—'जो प्रतिदिन गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करता है, उस मनुष्य के द्वारा अभिमन्त्रित जल जब तुम्हारे राक्षस के मस्तक पर डाला जाएगा, तब तुम्हारे पाप से छुटकारा मिल जाएगा।'
यह कहकर तपस्वी ब्राह्मण चले गये और यह हलवाहा राक्षस हो गया; अतः द्विजश्रेष्ठ! तुम चलो और ग्यारहवें अध्याय से तीर्थ के जल को अभिमन्त्रित करो, फिर अपने ही हाथों इस राक्षस के मस्तक पर उसे छिड़क दो।
ग्रामपाल की यह सारी प्रार्थना सुनकर ब्राह्मण का हृदय करुणा से भर आया। वे 'बहुत अच्छा' कहकर उसके साथ राक्षस के निकट गये। वे ग्यारहवें अध्याय के योगी थे। उन्होंने विश्वरूप दर्शन नामक ग्यारहवें अध्याय से जल अभिमन्त्रित करके उस राक्षस के मस्तक पर डाला। गीता के ग्यारहवें अध्याय के प्रभाव से वह राक्षस शाप से मुक्त हो गया। उसने राक्षस-देह का परित्याग करके चतुर्भुजरूप धारण कर लिया तथा उसने राक्षस-देह जिनका परित्याग करके वह चतुर्भुजरूप हो गये। तत्पश्चात् वे सभी विमान पर आरूढ़ हुए। इनमें ही ग्रामपाल ने राक्षस से कहा—'निशाचर! मेरा पुत्र कौन है? उसे दिखाओ।' उसके यूँ कहने पर दिव्य बुद्धि वाले राक्षस ने कहा—'ये जो तमाल के समान श्याम, चार भुजधारी, माणिक्यमय मुकुट से सुशोभित तथा दिव्य मणियों के बने हुए, कर्णफूलों से अलंकृत हैं, हार पहनने के कारण जिनके कंधे मनोहर प्रतीत होते हैं, जो सोने के भुजबंदों से विभूषित, कमल के समान नेत्र वाले, स्त्री स्वरूप तथा हाथों में कमल लिए हुए हैं, और दिव्य विमान पर बैठकर देवत्व को प्राप्त हो चुके हैं, इन्हीं को अपना पुत्र समझो।'
यह सुनकर ग्रामपाल ने उसी रूप में अपने पुत्र को देखा और उसे अपने घर ले जाना चाहा। यह देख उसका पुत्र हँस पड़ा और इस प्रकार कहने लगा।
पुत्र बोला—'ग्रामपाल! कई बार तुम भी मेरे पुत्र हो चुके हो। पहले मैं तुम्हारा पुत्र था, किन्तु अब देवता हो गया हूँ। देखो, यह ब्राह्मण-देवता के प्रसाद से वैकुण्ठधाम को प्राप्त हो गया। ग्यारहवें अध्याय महात्म्य से यह सब लोगों के साथ आबद्ध है। अतः तुम भी इन ब्राह्मणदेव से गीता के ग्यारहवें अध्याय का अध्ययन करो और निरन्तर उसका जप करते रहो। इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारी भी उत्तम गति होगी। तात! मनुष्यों के लिए साधु पुरुषों का संग सर्वथा दुर्लभ है। वह भी इस समय तुम्हें प्राप्त है; अतः अपना अभीष्ट सिद्ध करो। धन, भोग, दान, यज्ञ, तपस्या और पूर्वकर्मों से क्या लेना है। विश्वरूप अध्याय के पाठ से ही परम कल्याण की प्राप्ति हो जाती है। पूर्णांनद संदोह स्वरूप श्री कृष्ण नामक ब्रह्म के मुख से कुरुक्षेत्र में अपने मित्र अर्जुन के प्रति जो अमृतमय उपदेश निकला था, वही श्री विष्णु का परम तात्विक रूप है। तुम उसी का चिन्तन करो। वह मोक्ष के लिए प्रसिद्ध रसायन है। संसार-भय से डरे हुए, मनुष्यों के दुःखों का नाश करने वाला व्याधि का विनाशक तथा अनेक जन्मों के दुःखों का नाश करने वाला है। मैं उसके सिवा दूसरे किसी साधन को ऐसा नहीं देखता, अतः उसी का अभ्यास करो।'
श्रीमहादेवजी कहते हैं—यूँ कहकर वह सबके साथ श्रीविष्णु के परम धाम को चला गया। तब ग्रामपाल ने ब्राह्मण के मुख से उस अध्याय को पढ़ा। फिर वे दोनों ही इसके महात्म्य से विश्वधाम को चले गये। पार्वती! इस प्रकार तुम्हें ग्यारहवें अध्याय की महात्म्य-कथा सुनाई है। इसके श्रवण मात्र से महान् पातकों का नाश हो जाता है।
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