हर प्रकार की पूजा, हवन, मंत्र , मुहूर्त, दुर्गा स्थापना मुहूर्त, दीपावली मुहूर्त, गणपति स्थापना मुहूर्त, जाप, पाठ, ज्योतिष, राशिफल, राशि भविष्य, भगवान के 108 नाम, मंत्र, भगवान श्री गणेश, महादेव, विष्णु, लक्ष्मी, हनुमान के मंत्र, पूजा की लिस्ट आदि इस ब्लॉग पर आपको मिलेंगे ।
Gita ke 15 adhayay ki kahani | गीता ke पंद्रह अध्याय की
गौड़देश के राजा कृपाण-नरसिंह के सेनापति 'सरभमेरुण्ड' ने छल से राज्य हड़पने की योजना बनाई थी, लेकिन हैजे (cholera) के कारण उसकी मृत्यु हो गई और अपने पापों के कारण उसने घोड़े के रूप में जन्म लिया। एक वैश्य कुमार ने उस विशेष लक्षणों वाले घोड़े को खरीदकर राजा को भेंट कर दिया। एक बार जब राजा उस घोड़े पर सवार होकर शिकार के लिए जंगल में गए, तो वे प्यास से व्याकुल होकर एक चट्टान के पास रुके। वहाँ हवा से उड़कर आए एक पत्ते पर गीता के पंद्रहवें अध्याय का आधा श्लोक लिखा था, जिसे राजा ने ऊंचे स्वर में पढ़ना शुरू किया। उस पवित्र वाणी को सुनते ही घोड़े ने तुरंत अपना शरीर त्याग दिया और दिव्य विमान पर बैठकर स्वर्ग चला गया। बाद में एक सिद्ध ब्राह्मण विष्णुशर्मा ने राजा को बताया कि वह घोड़ा असल में उनका वही पापी सेनापति था, जो गीता के पाठ के प्रभाव से मुक्त हो गया; यह जानकर राजा ने भी पंद्रहवें अध्याय का निरंतर जप किया और अंततः मोक्ष प्राप्त किया।
Gita 14 adhyaya ki khani | गीता के चौदह अध्याय की कहानी
श्री महादेव जी माता पार्वती को बताते हैं कि सिंहलद्वीप में विक्रम बेताल नाम के एक पराक्रमी राजा थे। एक दिन वे शिकार के लिए राजकुमारों और दो कुतियों के साथ वन में गए। वहाँ उन्होंने एक खरगोश का पीछा किया, जो दौड़ते-दौड़ते थककर एक गहरे गड्ढे (खंदक) में गिर पड़ा। कुतिया भी उसके पीछे वहाँ पहुँची, लेकिन वह स्थान बहुत ही शांत और विलक्षण था। वहाँ हिंसक पशु भी आपस में प्रेम से रहते थे और बंदर भी नारियल व आम खाकर तृप्त थे।
उस स्थान पर वत्स नामक मुनि रहते थे, जो निरंतर गीता के चौदहवें अध्याय का पाठ किया करते थे। उनके एक शिष्य ने वहीं अपने पैर धोए थे, जिससे वहाँ की मिट्टी गीली हो गई थी। वह खरगोश उसी कीचड़ में जा गिरा और उसके स्पर्श मात्र से उसे दिव्य देह प्राप्त हुई और वह विमान पर बैठकर स्वर्गलोक चला गया। उसके पीछे आई कुतिया पर भी उस कीचड़ के छींटे पड़े, जिससे उसने भी अपना पशु रूप त्याग दिया और एक सुंदर देवांगना बनकर स्वर्ग सिधार गई।
यह देखकर राजा आश्चर्यचकित रह गए। तब मुनि के शिष्य ने बताया कि यह सब गीता के चौदहवें अध्याय के पाठ का प्रभाव है। शिष्य ने उनके पूर्वजन्म की कथा भी सुनाई कि वे दोनों पिछले जन्म में महाराष्ट्र के 'प्रत्युदक' नगर के रहने वाले थे। खरगोश पूर्वजन्म में केशव नाम का एक कपटी ब्राह्मण था और कुतिया उसकी पत्नी विलोभना थी। क्रोध और आपसी बैर के कारण पति ने पत्नी की हत्या कर दी थी, जिस पाप के कारण उन्हें इन योनियों में जन्म लेना पड़ा।
अंत में, उस शिष्य के प्रभाव और गीता के पाठ की महिमा सुनकर राजा ने भी श्रद्धापूर्वक चौदहवें अध्याय का अभ्यास शुरू किया और अंत में परमगति को प्राप्त हुए।
श्रीभगवान् कहते हैं—प्रिये! अब मैं चौथे अध्याय का माहात्म्य बतलाता हूँ। सुनो, भागीरथी के तट पर वाराणसी (बनारस) नाम की एक पुरी है। वहाँ विश्वनाथजी के मन्दिर में भरत नाम के एक योगनिष्ठ महात्मा रहते थे, जो प्रतिदिन आत्मचिन्तन में तत्पर हो आदरपूर्वक गीता के चतुर्थ अध्याय का पाठ किया करते थे। उसके अभ्यास से उनका अन्तःकरण निर्मल हो गया था। वे शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वों से कभी व्यथित नहीं होते थे।
एक समय की बात है, वे तपोधन नगर की सीमा में स्थित देवताओं का दर्शन करने की इच्छा से भ्रमण करते हुए नगर से बाहर निकल गये। वहाँ बेर (Ber) के दो वृक्ष थे। उन्हीं की जड़ में वे विश्राम करने लगे। एक वृक्ष की जड़ में उन्होंने अपना मस्तक रखा था और दूसरे वृक्ष के मूल में उनका एक पैर टिका हुआ था। थोड़ी देर बाद जब वे तपस्वी चले गये तब बेर के वे दोनों वृक्ष पाँच ही छह दिनों के भीतर सूख गये। उनमें पत्ते और डालियाँ भी नहीं रह गयीं। तत्पश्चात वे दोनों वृक्ष कहीं ब्राह्मणों के पवित्र गृह में दो कन्याओं के रूप में उत्पन्न हुए।
वे दोनों कन्याएँ जब बढ़कर सात वर्ष की हो गयीं, तब एक दिन उन्होंने दूर देशों से घूमकर आते हुए भरतमुनि को देखा। उन्हें देखते ही वे दोनों उनके चरणों में पड़ गयीं और मीठी वाणी में बोलीं—'मुने! आपकी ही कृपा से हम दोनों का उद्धार हुआ है। हमने बेर की योनि त्यागकर मानव-शरीर प्राप्त किया है।' उनके इस प्रकार कहने पर मुनि को बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने पूछा—'पुत्रियों! मैंने कब और किस साधन से तुम्हें मुक्त किया था? साथ ही यह भी बताओ कि तुम्हारे बेर के वृक्ष होने में क्या कारण था? क्योंकि इस विषय में मुझे कुछ भी ज्ञात नहीं है।'
तब वे कन्याएँ पहले उन्हें अपने बेर हो जाने का कारण बतलाती हुई बोलीं—"मुने! गोदावरी नदी के तट पर छिन्नपाप नामक एक उत्तम तीर्थ है, जो मनुष्यों को पुण्य प्रदान करनेवाला है। वह पावनता की चरम सीमा पर पहुँचा हुआ है। उस तीर्थ में सत्यतपा नामक एक तपस्वी बड़ी कठोर तपस्या कर रहे थे। वे ग्रीष्म-ऋतु में प्रज्वलित अग्नियों के बीच में बैठते थे, वर्षाकाल में जल की धाराओं से उनके मस्तक के बाल सदा भीगे ही रहते थे तथा जाड़े के समय जल में निवास करने के कारण उनके शरीर में हमेशा रोंगटे खड़े रहते थे। वे बाहर-भीतर से सदा शुद्ध रहते, समय पर तपस्या करते तथा मन और इन्द्रियों को संयम में रखते हुए परम शान्ति प्राप्त करके आत्मा में ही रमण करते थे।
वे अपनी विद्वत्ता के द्वारा जैसा व्याख्यान करते थे, उसे सुनने के लिये साक्षात् ब्रह्माजी भी प्रतिदिन उनके पास उपस्थित होते और प्रश्न करते थे। ब्रह्माजी के साथ उनका संकोच नहीं रह गया था, अतः उनके आने पर भी वे सदा तपस्या में मग्न रहते थे। परमात्मा के ध्यान में निरन्तर संलग्न रहने के कारण उनकी तपस्या सदा बढ़ती रहती थी। सत्यतपा को जीवन्मुक्त के समान मानकर इन्द्र को अपने समृद्धिशाली पद के सम्बन्ध में कुछ भय हुआ, तब उन्होंने उनकी तपस्या में सैकड़ों विघ्न डालने आरम्भ किये। अप्सराओं के समुदाय से हम दोनों को बुलाकर इन्द्र ने इस प्रकार आदेश दिया—'तुम दोनों उस तपस्वी की तपस्या में विघ्न डालो, जो मुझे इन्द्रपद से हटाकर स्वयं स्वर्ग का राज्य भोगना चाहता है।'
इन्द्र का यह आदेश पाकर हम दोनों उनके सामने से चलकर गोदावरी के तीर पर, जहाँ वे मुनि तपस्या करते थे, आयीं। वहाँ मन्द एवं गम्भीर स्वर से बजते हुए मृदंग तथा मधुर वेणुनाद के साथ हम दोनों ने अन्य अप्सराओं सहित मधुर स्वर में गान आरम्भ किया। इतना ही नहीं, उन योगी महात्मा को वश में करने के लिये हमलोग स्वर, ताल और लय के साथ नृत्य भी करने लगीं। बीच-बीच में ज़रा-ज़रा सा अंचल खिसकने पर उन्हें हमारी छाती भी दीख जाती थी। हम दोनों की उन्मत्त गति कामभाव का उद्दीपन करनेवाली थी, किंतु उसने उन निर्विकार चित्तवाले महात्मा के मन में क्रोध का संचार कर दिया। तब उन्होंने हाथ से जल छोड़कर हमें क्रोधपूर्वक शाप दिया—'अरी! तुम दोनों गंगाजी के तट पर बेर के वृक्ष हो जाओ।' यह सुनकर हमलोगों ने बड़ी विनय के साथ कहा—'महात्मन्! हम दोनों पराधीन थीं, अतः हमारे द्वारा जो दुष्कर्म बन गया है, उसे आप क्षमा करें।' यों कहकर हमने मुनि को प्रसन्न कर लिया।
तब उन पवित्र चित्तवाले मुनि ने हमारे शापोद्धार की अवधि निश्चित करते हुए कहा—'भरतमुनि के आने तक ही तुमपर यह शाप लागू होगा। उसके बाद तुमलोगों का मर्त्यलोक में जन्म होगा और पूर्वजन्म की स्मृति बनी रहेगी।' 'मुने! जिस समय हम दोनों बेर-वृक्ष के रूप में खड़ी थीं, उस समय आपने हमारे समीप आकर गीता के चौथे अध्याय का जप करते हुए हमारा उद्धार किया था, अतः हम आपको प्रणाम करती हैं। आपने केवल शाप से ही नहीं, इस भयानक संसार से भी गीता के चतुर्थ अध्याय के पाठ द्वारा हमें मुक्त कर दिया।'
श्रीभगवान् कहते हैं—उन दोनों के इस प्रकार कहने पर मुनि बहुत ही प्रसन्न हुए और उनसे पूजित हो विदा लेकर जैसे आये थे, वैसे ही चले गये तथा वे कन्याएँ भी बड़े आदर के साथ प्रतिदिन गीता के चतुर्थ अध्याय का पाठ करने लगीं, जिससे उनका उद्धार हो गया।