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गणेश जी के 12 नाम

 

आइए आज जानते हैं गणेश जी के 12 नाम जो कि हर किसी शुभ कार्य के लिए विद्या अध्ययन शुरुआत के लिए, विवाह के लिए, संग्राम और संकट के समय भी स्मरण करने मात्र से किसी भी प्रकार के बिग नवादा सताती नहीं है।

भगवान श्री गणेश जी के बारह नाम

1 सुमुख
2 एकदंत
3 कपिल
4 गज कर्णक
5 लम्बोदर
6 विकट
7 विघ्ननाश
8 बिनायक
9 धूम्र केतू
10 गणाध्यक्ष
11 भालचन्द्र
12 गजानन
गणेश जी के बारह नाम

श्री गणेश के यह 12 नाम सभी को मंगल प्रदान करने वाले अनिष्ट और विघ्नों को दूर करने वाले सभी कार्यों में सर्वप्रथम स्मरणीय है ।

गणेश जी की आरती 

गणेश जी के 12 नाम


विष्णु स्तोत्र, श्रीविष्णोरष्टाविंशतिनामस्तोत्रम् ,vishnu stotra

                 विष्णु स्तोत्र

              श्रीविष्णोरष्टाविंशतिनामस्तोत्रम्

                    भगवान विष्णु के 28 नाम

विष्णु स्तोत्र,vishnu stotra,




                  अर्जुन उवाच
किं नु नाम सहस्राणि जपते च पुनः पुनः ।
यानि नामानि दिव्यानि तानि चाचक्ष्व केशव ॥१॥
अर्जुनने पूछा-केशव ! मनुष्य बारंवार एक हजार नामों का जप क्यों करता है?
 आपके जी दिव्य नाम हो, उनका वर्णन कीजिये ॥१॥


श्रीभगवानुशच
मत्स्यं कूर्म वराहं च वामनं च जनार्दनम् ।
गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं माधवं मधुसूदनम् ॥ २ ॥

श्रीभगवान् बोले-~अर्जुन ! मत्स्य, कूर्म, वाराह, वामन, जनार्दन, गोविन्द, पुण्डरीकाक्ष, माधव, मधुमूदन।।2।।


पद्मनाभं सहस्राक्षं वनमालिं हलायुधम् ।
गोवर्धनं हपीकेशं वैकुण्ठं पुरुषोत्तमम् ॥३॥


पद्मनाभ, सहस्त्राक्ष, बनमाली,हलायुध, 
गोवर्धन, ऋषिकेश वैकुण्ठ, पुरुषोत्तमः।।3।।



विश्वरूपं वासुदेवं रामं नारायणं हरिम् ।
दामोदरं श्रीधरं च वेदाङ्गं गरुडध्वजम् ॥ ४ ॥

विश्वरूप, वासुदेव, राम, नारायण, हरि 
दामोदर, श्रीधर ,वेदाङ्ग, गरुडध्वजा ।।4।।



अनन्तं कृष्णगोपालं जपतो नास्ति पातकम् ।
गवां कोटिप्रदानस्स अश्वमेधशतस्य च ॥५॥

अनन्त और कृष्णगोपाल-इन नामोंका जप करनेवाले मनुष्यके भीतर पाप नहीं रहता । एक करोड़ गोदान एक सौ अश्वमेध यज्ञ तथा ।।5।।


कन्यादानसहस्राणां फलं प्राप्नोति मानवः ।
अमायां वा पौर्णमास्यामेकादश्यां तथैव च ॥६॥
एक हजार कन्यादान का फल प्राप्त मानव करता है अमावस्या. पूर्णिमा तथा एकादशी तिथिको और।।6।।


सन्ध्याकाले स्मरेन्नित्यं प्रातः काले तथैव च ।
मध्याह्ने च जपन्नित्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥७॥

प्रतिदिन सायं प्रातः एवं मध्याह्नके समय इन नामों-
का जप करनेवाला पुरुष सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है ।।7।।


इति श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रीविष्णोरष्टाविंशतिनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।


 श्री कृष्ण अर्जुन संवाद में श्री विष्णु के 28 नाम का स्तोत्र संपूर्ण हुआ










गणेश मंत्र, गणेशपञ्चरत्नम्

                              गणेशपञ्चरत्नम्

गणेश पंचरत्न
गणेश पंचरत्न




मुदा करात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकं
कलाधरावतंसकं विलासिलोकरञ्जकम् ।
अनायकैकनायक विनाशितेभदैत्यक
नताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम् ॥१॥

नतेतरातिभीकरं नवोदितार्कभास्वरं
नमत्सुरारिनिर्जर नताधिकापदुद्धरम् ।
सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरं
महेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरन्तरम् ॥२॥

समस्तलोकशङ्करं निरस्तदैत्यकुञ्जरं
दरेतरोदरं वरं वरेभवक्त्रमक्षरम् ।
कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्कर
नमस्करं नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम् ॥३॥



अकिंचनार्तिमार्जनं चिरन्तनोक्तिंभाजनं
पुरारिपूर्वनन्दनं सुरारिगर्वचर्वणम् ।
प्रपञ्चनाशभीषणं धनञ्जयादिभूषणं
कपोलदानवारणं भजे
पुराणवारणम् ।।४।।

नितान्तकान्तदन्तकान्तिमन्तकान्तकात्मज-
मचिन्त्यरूपमन्तहीनमन्तरायकृन्तनम्
हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेव योगिनां
तमेकदन्तमेव तं विचिन्तयामि संततम् ॥५॥


महागणेशपञ्चरत्नमादरेण योऽन्वहं
प्रगायति प्रभातके हृदि स्मरन् गणेश्वरम् ।
अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रतां
समाहितायुरष्टभूतिमभ्युपैति सोऽचिरात् ॥ ६ ॥
।। श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं गणेशपञ्चरत्नस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।







इसी प्रकार से अनेक गणेश मंत्र हमारे इस ब्लॉग पर पाठकों को प्राप्त होंगे आशा करता हूं आप सब  लाभ लेंगे तथा ब्लॉग  को फॉलो जरूर करेंगे
जय श्री कृष्णा






गणेश अष्टक ।। Ganesh Ashtakam

गणेश अष्टक

 सर्वे ऊचुः

यतोऽनन्तशक्तैरनन्ताश्च जीवा

यतो निर्गुणादप्रमे या गुणास्ते ।

यतो भाति संर्व त्रिधा भेदभिन्न

सदा तं गणेशं नमामो भजामः।।१।।

सब भक्तों ने कहा

जिस अनन्त शक्तिवाले परमेश्वर से अनन्त

जीव प्रकट हुए हैं, जिन निर्गुण परमात्मा से

अप्रमेय (असंख्य) गुणों की उत्पत्ति हुई हैं,

सात्विक, राजस और तामस- इन तीन

| भेदोंवाला यह सम्पूर्ण जगत् जिससे प्रकट

एवं भासित हो रहा है, उन गणेश का हम |

नमन एवं भजन करते हैं।


यतश्चाविरासीज्जगत्सर्वमेतत्त

थाब्जासनो विश्वगो विश्वगोप्ता।

तथेन्द्रादयो देव सङ्घा मनुष्याः सदा

तं गणेशं नमामो भजामः ।।२।।

जिनसे इस समस्त जगत् का प्रादुर्भाव हुआ

है, जिनसे कमलासन ब्रह्मा, विश्वव्यापी

विश्वरक्षक विष्णु, इन्द्र आदि देव-समुदाय

और मनुष्य प्रकट हुए है, उन गणेश का हम

सदा ही नमन एवं भजन करते हैं।



यतो वाह्निभानूद्भवो भूर्जलं च यतः

सागराश्चन्द्रमा व्यो म वायुः ।

यतः स्थावरा जङ्गमा वृक्षसङ्घा:

सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।।३।।

जिनसे अग्नि और सूर्य का प्राकट्य हुआ,

पृथ्वी, जल, समुद्र, चन्द्रमा, आकाश और

वायु का प्रादुर्भाव हुआ तथा जिससे स्थावर

जङगम और वृक्षसमूह उत्पन्न हुए हैं, उन

गणेश का हम नमन एवं भजन करते हैं।



यतो दानवाः किंनरा यक्षसङघा

यतश्चारणा वारणा: श्वापदाश्च ।

यतः पक्षिकीटा यतो वीरूधश्च

सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।।४।।

जिनसे दानव, किंनर और यक्ष समूह प्रकट

हुए, जिनसे हाथी और हिंसक जीव उत्पन्न

हुए तथा जिनसे पक्षियों, कीटों और लताबेलों

का प्रादुर्भाव हुआ, उन गणेश का हम सदा

ही नमन और भजन करते हैं।



यतो बुद्धिरज्ञाननाशो मुमुक्षोर्यतः

सम्पदो भक्त संतोषिका: स्युः ।

यतो विघ्ननाशो यतः कार्यसिद्धिः

सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।।५।।

जिनसे मुमुक्षुको बुद्धि प्राप्त होती है और

अज्ञान का नाश होता है, जिनसे भक्तों कों

संतोष देने वाली सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं,

तथा जिनसे विघ्नों का नाश और समस्त

कार्यों की सिद्धि होती है, उन गणेश का

हम सदा नमन एवं भजन करते हैं।


यतः पुत्रसम्पद् यतो वाञ्छितार्थो

यतोऽभक्तविघ्नास्तथानेकरूपाः ।

यतः शोकमोहौ यतः काम एव सदा

तं गणेशं नमामो भजामः ।।६।।

जिनसे पुत्र सम्पत्ति सुलभ होती है, जिनसे

मनोवाञ्छित अर्थ सिद्ध होता है, जिनसे

अभक्तों को अनेक प्रकार के विघ्न प्राप्त

होते हैं तथा जिनसे शोक, मोह और काम

प्राप्त होते हैं, उन गणेश का हम सदा नमन

एवं भजन करते हैं।


यतोऽनन्तशक्तिः स शेषो बभूव

धराधारणेऽनेकरूपे च शक्तः ।

यतोऽनेकधा स्वर्गलोका हि नाना

सदा तं गणेशं नमामो भजामः।७।।

जिनसे अनन्त शक्तिसम्पन्न सुप्रसिद्ध शेषनाग

प्रकट हुए, जो इस पृथ्वी को धारण करने

एवं अनेक रूप ग्रहण करने में समर्थ हैं,

जिनसे अनेक प्रकार के अनेक स्वर्गलोक

प्रकट हुए हैं, उन गणेश का हम सदा ही

नमन एवं भजन करते हैं।


यतो वेदवाचो विकुण्ठा मनोभिः

सदा नेति नेतीति यत्ता गृणन्ति ।

चिदानन्दभूतं परब्रह्मरूपं

सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।।८।।


जिनके विषय में वेदवाणी कुण्ठित हैं,

जहाँ मन की भी पहुँच नहीं है तथा श्रुति

सदा सावधान रहकर 'नेति-नेति'

इन

शब्दों द्वारा जिनका वर्णन करती है, जो

सच्चिदानन्द स्वरूप परब्रह्म हैं उन गणेश

का हम सदा ही नमन एवं भजन करते


श्री गणेश उवाच्य

पुनरू चे गणाधीशः स्तोत्रमेतत्पठेन्नरः।

त्रिसंध्यं त्रिदिनं तस्य सर्वं कार्यं भविष्यति।।

यो जपेदष्टदिवसं श्लोकाष्टकमिदं शुभम् ।

अष्टवारं चतुर्थ्यां तु सोऽष्टसिद्धीरवाप्नुयात्।।

यः पठेन्मासमात्रं तु दशवारं दिने दिने।

स मोचयेद्धन्धगतं राजवध्यं न संशयः।।

विद्याकामो लभे द्विद्यां पुत्रार्थी पुत्रमाप्नुयात्।

वाञ्छिताँल्लभते सर्वानेकविंशतिवारतः।।

यो जपेत् परया भक्त्या गजाननपरो नरः।

एवमुक्त्वा ततो देवश्चान्तर्धानं गतः प्रभुः ।।



 श्री गणेश जी फिर बोले

जो मनुष्य तीन दिनों तक तीनों संध्याओं

के समय इस स्तोत्र का पाठ करेगा, उसके

सारे कार्य सिद्ध हो जायेंगे। जो आठ दिनों

तक इन आठ श्लोकों का एक बार पाठ

करेगा और चतुर्थी तिथि को आठ बार इस

स्तोत्र को पढ़ेगा, वह आठों सिद्धियों को

प्राप्त कर लेगा । जो एक मास तक प्रतिदिन

दस-दस बार इस स्तोत्र का पाठ करेगा,

वह कारागार में बँधे हुए तथा राजा के द्वारा

वध-दण्ड पाने वाले कैदी को भी छुड़ा

लेगा, इसमें संशय नहीं हैं। इस स्तोत्र का

इक्कीस बार पाठ करने से विद्यार्थी विद्याको, पुत्रार्थी पुत्र को तथा कामार्थी समस्त मनोवांच्छित कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य परम भक्ति से इस स्तोत्र का जप करता है, वह गजानन का परम भक्त हो जाता है, ऐसा कहकर भगवान गणेश वहीं अन्तर्धान हो गये


।।इति श्रीगणेशपुराणे श्रीगणेशाष्टकं सम्पूर्णम्।।










भवानी अष्टक

श्री भवानी अष्टक -

न तातो न माता न बन्धुर्न दाता न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता ।
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ॥ १ ॥
भवाब्धावपारे महादु:ख्भीरू पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्त: ।
कुसंसारपाशप्रबध्द: सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ॥ २ ॥      
न् जानामि दानं न च ध्यानयोगम् न जानामि तन्त्रम् न च स्तोत्र स्तोत्रम्न्त्रम् ।
न जानामि पुजाम् न च न्यासयोगम् गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ॥ ३ ॥
न जानामि पुण्यं न जानामि तिर्थम् न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित् ।
न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातर्गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ॥ ४ ॥
कुकर्मी कुसड्गी कुबुध्दी: कुदास्: कुलाचारहीन्: कदाचारलीन्: ।
कुदृष्टी: कुवाक्यप्रबन्ध्: सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ॥ ५ ॥
प्रजेशम् रमेशम् महेशम् सुरेशम् दिनेशम् निशीधेश्वरं वा कदाचित् ।
न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ॥ ६ ॥
विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये ।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ॥ ७ ॥
अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो महाक्षीणदीन: सदा जाङ्घवक्र: ।
विपत्तौ प्रविष्ट: प्रनष्ट: सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ॥ ८ ॥
॥इति श्रीमदादिशंकराचार्य् विरचिता भवान्यष्टकं समाप्ता ॥
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