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Adhik mass ki Katha 20 adhyaya | अधिक मास की कथा 20वा अध्याय

 

Adhik mass ki Katha 20 adhyaya | अधिक मास की कथा 20वा अध्याय 



॥ अथ विंशते ऽध्यायः प्रारंभः ॥

॥ श्री गणाधिपतये नमः ॥

श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकदि ऋषियों से कहते हैं भगवान के मुखारविंद से पुरुषोत्तम मास के पांच महापर्वों का वर्णन सुनकर लक्ष्मीजी बहुत प्रसन्न होकर कहती है हे महाप्रभु अमृत तुल्य कथा को सुनकर अभी मनकी तृप्ति नहीं हुई, इसलिये जनकल्याण हेतु आप और माहात्म्य इतिहास का वर्णन सुनाइये। भगवान कहते हैं लक्ष्मी से, हे लक्ष्मी द्वादशी और व्यतीपात का पर्व महान पुण्यदायक है। इन पर्वों में थोड़ा भी दान कर्म अनेक यज्ञों का और अनेक तीर्थों का फल देता है। अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। द्वादशी को प्रातः स्नान और नित्यकर्म से निवृत होकर भगवान पुरुषोत्तम का पूजन करके उत्तम सामग्री और शुद्ध घी से बनाए हुए तैंतीस मालपुए या अनरसे कांसे के पात्र में रखकर वस्त्र से ढांककर भगवान के सामने अर्पण करे। और पैरों में पहनने योग्य पादत्राण (चप्पल जूता) अक्षत से मालपुआ का पूजन करके संकल्प पूर्वक सत्पात्र ब्राह्मण को दान देवे। और हाथ जोड़कर भगवान पुरुषोत्तम की प्रार्थना करें (इस मंत्र के द्वारा)

श्लोक :

(१) कल्ला कालदि रूपेण योनित्यं वर्तते हरिः ।

लोके विप्रस्वरूपेण तस्मै कालात्मने नमः ॥

(२) यस्य हस्ते गदाचक्रे गरुड़स्य वाहनम् ।

शंखः करतले यस्य समे विष्णुः प्रसीद तु ॥

(३) अर्धमासे तु संप्राप्ते घृत वस्त्र मुपान हौ ।

दानं गृहाण सर्वात्मन् व्रत संपूर्णं हे तवे ॥

चित्र 2 (पृष्ठ 78)

(४) राज्यंच शर्कराचैव त्रयींसंद अपूपकम् ।

प्राणिनतां प्राणनाथाय तस्मै कालात्मने नमः ॥

(५) कुरुक्षेत्र मिदं देशः साक्षाद् विष्णुमूर्धिजः ।

पृथ्वी समर्पितं दानं गृहाण पुरुषोत्तम ॥

(६) मल्लानांचैव शुद्धयर्थ पाप प्रशमनायच ।

पुत्र पौत्रादि वृद्धयर्थ तव दास्यामि भास्कर ॥

(७) अर्धमासे तु संप्राप्ते पुण्ये दंत जनार्दन ।

त्वं उदिष्य सुराध्यक्ष प्रसीद पुरुषोत्तम ॥

(८) शरण्यं सर्वभूतानां सर्वेविष्णुः प्रसी दतु ॥

इन श्लोकों के द्वारा भगवान की प्रार्थना कर पानी छोड़े। इस महान पुण्य कर्म के द्वारा संपूर्ण मनोकामनाएं पूर्ण होकर सुख शांतिपूर्वक जीवन होता है। सांसारिक सुखों को भोगकर मृत्यु के बाद स्वर्ग का सुख प्राप्त होता है। हे लक्ष्मी इस विषय का मैं एक इतिहास तुम से कहता हूँ। यक्षराज कुबेर की एक स्थित विलासिनी नाम की अप्सरा थी। एक समय वह स्वर्ग लोक से मृत्यु लोक का भ्रमण करने आई। घूमते हुए वह कुरुक्षेत्र में जा पहुंची।

अपनी सखियों के साथ कई दिनों तक वहां का आनंद लेते हुए रही। एकदिन उसकी सखियों ने उसका अनेक रंग के फूलों से श्रृंगार किया और हंसी मजाक करते हुए श्रृंगार रस के गाते गाने लगीं। युवावस्था श्रृंगार से युक्त और कामोद्दीपक गायन आदि वातावरण के द्वारा उस अप्सरा के शरीर में मदन जागृत हो गया वह फूलों की माला हाथ में लेकर मदमस्त होकर घूमने लगी। जंगल में भ्रमण कर रही थी। अचानक उसी मार्ग से नारदजी जा रहे थे। वह अप्सरा मदोन्मत्त होकर और साधारण पुरुष समझकर उनके गले में फूलों की माला डाल दी। माला गले में डालते ही नारदजी अत्यंत

चित्र 3 (पृष्ठ 79)

कोधित हो गए। और कहने लगे अरे दुष्ट तूने मुझे स्पर्श कर दिया। तू इतनी कामांध हो गई कि संन्यासी को साधारण पुरुष समझकर मेरे गले माला डाल दी। मैं तुझे श्राप देता हूँ तू पिशाचिनी हो जा। ऋषि के श्राप को सुनकर अप्सरा भयभीत होकर ऋषि के चरणों को पकड़कर रोती हुई क्षमा मांगने लगी। हे ऋषिवर मैं अबला और दीन जड़बुद्धि हूँ। आप महान सामर्थ्यवान हो दया के सागर हो दीन वत्सल हो विद्वान हो मेरे अपराध को क्षमा कर दो। इस समय आप के सिवा यहां मेरी रक्षा करने वाला कोई नहीं है। उसकी ऐसी दीनवाणी को सुनकर नारदजी ने सोचा यह मेरी प्रणागत हो गई है। स्त्री जाति की नहीं है। यह उसकी हत्या नहीं करते। इस समय आप के सिवा यह मेरी रक्षा करने वाला कोई नहीं है। स्त्री जाति की नहीं है। यह सोचकर उन्होंने अपने क्रोध का शमन किया और बोले मेरा दिया हुआ श्राप कभी असत्य नहीं हो सकता। तू पिशाचिनी होगी। जहां महानदी गंगा का सागर के साथ संगम हुआ है, वहां कुमारी क्षेत्र नाम की एक तपस्विनी हजारों वर्ष से तपस्या हुई रहती है। उसने अत्यंत दुक्कर तपस्या की है और एक सौ आठ पुरुषोत्तम मास का नियमपूर्वक स्नान, दान, अखंडदीप उपवास आदि नियम धारण करके पुण्य अर्जित किया है। तू पिशाचिनी होकर ब्रह्मवास से व्याकुल भ्रमण करते हुए अधिकमास में वहां पहुंचेगी तब उसके समीप पहुंचेगी तब उसके दर्शन होंगे पिशाचिनी के स्वभाववश तू तपस्विनी को खाने के लिये दौड़कर प्रार्थना करेगी।

हे तपस्विनी पुण्य स्वरूपिणी मेरे ऊपर दया करो मैं पिशाच योनि में महान दुख भोग रही हूँ। मेरा इस योनि से उद्धार करो। आपके सिवा कोई मेरा उद्धार नहीं कर सकता। इस प्रकार दीन वचनों से तू अपने उद्धार की बारंबार भिक्षा मांगेगी। तेरी दीन वाणी और हीन दशा को देखकर उस तपस्विनी को दया उत्पन्न होगी। और वह तुझे अपने किए हुए पुरुषोत्तम मास का एक पुण्य तुझे देगी। उसके प्रभाव से तेरा उद्धार होगा। ऐसा कहकर नारदऋषि वहां से चल दिए। उनके जाते ही वह अप्सरा पिशाच बन गई। और भयंकर स्वरूप की होकर जंगल में भटकने लगी। अनेक पशुओं की हिंसा करके और भी पाप कर्मों की वृद्धि होने लगी। जंगल में उत्तम फलों के वृक्ष हैं। जगह जगह सुंदर तालाब और नदियां बहती हैं। परंतु प्रेत पिशाचवालों को वृक्ष से तोड़कर फल खाने का अधिकार नहीं है नीचे गिरे हुए फल ही खा सकते हैं। उसी प्रकार तालाब और नदी के जल को स्पर्श करने का अधिकार न होते हुए






Adhik mass ki Katha 9adhyaya|अधिक मास की कथा नौवा अध्याय


Adhik mass ki Katha 9adhyaya|अधिक मास की कथा नौवा अध्याय 




 ।। अथ नवमोऽध्यायः प्रारम्भः ।।

।। श्री गणेशाय नमः ।।

भगवान विष्णु नारद जी से सूतजी शौनकदि ऋषियों से तथा वाल्मीकि ऋषि राजा दृढ़धन्वा से उसके पूर्व जन्म का वृत्तांत बतलाते हुए कहते हैं। हे राजन जब ब्राह्मण सुदेव ने भगवान पुरुषोत्तम से आश्चर्य प्रकट करते हुए प्रश्न किया कि कठिन तपस्या करने के बाद जो वरदान मुझे नहीं प्राप्त हो सका उसे कई गुना अधिक वरदान आपने मुझे अनायास कैसे दे दिया। तब भगवान पुरुषोत्तम कहते हैं हे सुदेव तू नहीं जानता अज्ञानवस्था में तुझसे जो कठिन तपस्या घटित हुई है उसके द्वारा अनंत पुण्य तुझे प्राप्त हुआ और उसी के प्रभाव से मुझे प्रसन्न होकर यह वरदान देना पड़ा। हे सुदेव जो मास तेरे दुःखित अवस्था में व्यतीत हुआ वह मेरा परम प्रिय मास था इसमें थोड़ा भी दुःख किया कर्म अनंत पुण्य देने वाला होता है। तुझ से तो कठिन तपस्या घटित हुई है। पुत्र के दुःख में दुःखित अत्रजल का परित्याग कर निरंतर वर्ष में बैठे रहने से रहने से कठिन तपस्या का पुण्य, अखंड उपवास का पुण्य, और भगवान का नाम लेते रहने से चिंतन भजन का पुण्य, इस पुण्य के समान संसार का कोई भी पुण्य कर्म नहीं है।

बड़े बड़े ऋषि मुनि भी पुण्य प्राप्ति के लिये इस मास में निरंतर आराधना करते रहते हैं। इस समय में समस्त पुण्यात्मा संसार में कोई दूसरा नहीं है। इसी के प्रभाव से तुझे यह वरदान प्राप्त हुआ है। हे सुदेव तेरे जन्मांतर के सभी पाप नष्ट होकर शुद्ध पुण्यात्मा की शक्ति प्राप्त हो गई है। इस पुरुषोत्तम मास की महिमा का वर्णन चार मुख वाले ब्रह्मा भी कह सकने में असमर्थ हो गए है। इतना प्रभावशाली यह पुरुषोत्तम मास है। ऐसा कहकर भगवान पुरुषोत्तम वहां से अदृश्य हो गए। वह ब्राह्मण सुदेव पति और पुत्र के सहित प्रसन्नचित्त होकर भगवान पुरुषोत्तम के पुरुषोत्तम मास की महिमा की प्रशंसा करते हुए अपने आश्रम में आकर सुख पूर्वक गृहस्थ जीवन व्यतीत करने लगा। निरंतर देवकर्म व पितृकर्म करते हुए जब पुरुषोत्तम मास आता बड़ी श्रद्धा से व्रतन्नियम धारण करके व्यतीत करता हजार वर्ष तक जीवित रहकर समयानुसार इस शरीर को त्याग कर ब्रह्मलोक का सुख भोगकर फिर से पृथ्वी पर राजा दृढ़धन्वा के रूप में उत्पन्न हुआ।

हे राजन वही पूर्व जन्म की पत्नि गौतमी इस जन्म में पटरानी के रूप में तुझे प्राप्त हुई है। पूर्व जन्म का पुत्र शुकदेव तोते का रूप धारण कर तुझे उपदेश दे गया है। पिता के ऋण से मुक्त होने के के लिये तुझे सांसारिक विषयों में निसन देखकर संसार रूपी सागर को पार करने के लिये उसने यह सद् उपदेश दिया है कि भगवान की आराधना के बिना आत्मा का उद्धार कैसे होगा यदि मैंने पूर्व जन्म के के लिये इस मार्ग का अनुसरण किया। हे राजन अब तू चिंता मुक्त होकर अपने भविष्य को बनाने के लिये इस मास का अनुसरण किया। अब मैं सूतजी से स्नान के लिये जाता हूँ अपने उद्धार कर ले। ऐसा कहकर ऋषि जाने के लिये उद्यत हुए तभी राजा दृढ़धन्वा ऋषि के चरणों को पकड़ कर कहता है।

कि ऋषिवर आपने जो पुरुषोत्तममास के महात्म्य का वर्णन किया है सो मुझे पूर्वजन्म का स्मरण नहीं है कृपाकर आप यह सब आप विस्तार पूर्वक कहने की कृपा करें कि राजा दृढ़धन्वा के प्रश्न पर वाल्मीकि ऋषि कहते है, हे राजन जैसे प्रश्न तुमने मुझसे किया उसी प्रकार का प्रश्न भगवान विष्णु से लक्ष्मीजी ने किया था। मैं तुमसे विस्तार पूर्वक कहता हूँ, एकाग्र चित होकर सुनो एक समय की बात है। वैकुंठ विहारी भगवान विष्णु प्रसन्नचित अपने मंदिर में बैठे हुए थे ऐसे समय लक्ष्मी जी भगवान से कहती हैं। हे नाथ मेरे आपके मुखारविंद से पुरुषोत्तममास की अनेक प्रशंसा सुनी है, कि इस मास में थोड़ा भी कर्म स्नानदान व्रत आदि करने से अक्षय पुण्य व सुख की प्राप्ति होती है, सो आप कृपाकर यह बताएं कि कौन सा व्रत दान आदि कैसे करना चाहिए आप विस्तार पूर्वक बताने की कृपा करें लक्ष्मी जी के प्रश्न पर भगवान विष्णु प्रसन्न होकर कहते है कि लक्ष्मी तुम धन्य हो जो तुम्हारे मन में पुरुषोत्तम मास के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हुई है। हे लक्ष्मी जो महीना सूर्य की संक्रांति से हीन रहता है अर्थात जिस महीने में सूर्य की संक्रांति नहीं होती उसे उस मास को पुरुषोत्तम मास कहा जाता है।

इस मास के स्वामी गोलोकाधिपति भगवान पुरुषोत्तम हैं। जो हम सब देवताओं के भी स्वामी हैं। इस मास में अपनी शक्ति के अनुसार स्नान, दान, व्रत, जप, तर्पण, पूजा, आराधना, भजनकीर्तन आदि का नियम धारण करना चाहिए। तथा भूमिप्रशयन, तेल का त्याग, एक जति के पत्रावली पर भोजन, मालपूप का दान, नख, केश न काटने का नियम, एक समय भोजन, नित्यदीपदल, जूता चप्पल न पहनने का नियम, किसी एक धान्य का परित्याग, आंवले के चूर्ण से स्नान का नियम, किसी फल का त्याग, नमक का त्याग, तिलपान का दान, सुवर्ण चांदी का दान, गौदान, एक दिन के बाद एकदिन उपवास, हविष्य अन्न खाने का नियम, मौन धारण का नियम, इन में से कोई भी एक अथवा ज्यादा नियम प्रथम दिन से धारण कर मास पर्यंत करना चाहिए, इस प्रकार इस मास में जन्म जन्मांतर के पाप भस्म हो जाते है।

इसमें प्रातः काल उठकर नित्यकर्म शौच, मुख, मार्जन दांतोन आदि करके शुद्ध जल से स्नानकर शुद्ध वस्त्र धारण करके नित्य प्रति का संध्या पूजन करके विद्वान ब्राह्मण को बुलाकर उसका पूजन करके उसकी आज्ञा और क्रम से घर में एकांत और पवित्र स्थानपर गोबर से लीपकर रंगवल्ली से स्थान को सुशोभित करके चौरंगपर सफेद वस्त्र बिछाकर अनाज से अष्ट दल कमल बनाये। उसके उपर अपनी शक्ति के अनुसार चांदी तांबा अथवा पीतल का कलश ८ अंगुल लंबा स्थापित करके उसमें सवापंची पंचपल्लव व सप्त मिट्टी तीर्थ व गंगाजी के जल से पूरित करके पहले वरुण देव का पूजन करके उपर ताम्रपात्र पर राधिका के सहित भगवान कृष्ण की सुवर्ण की मूर्ति को स्थापित करें पहले विद्वान ब्राह्मण के द्वारा विधानपूर्वक प्राण प्रतिष्ठा करके अभिषेक पूजन करे ऋतु में उत्पन्न फूल फल और पूजन सामग्री के द्वारा भगवान पुरुषोत्तम का श्रद्धासहित पूजन करके उत्तम प्रकार के मिष्टान्न का भोग लगाकर तांबूल अर्पण करके आरती करे भगवान को साष्टांग दण्डवत नमस्कार करके मिष्ठान्न का भोग लगाकर त्रुटियों की क्षमा मांगे। संपूर्ण मास पर्यंत जलने वाला अखंडदीप की स्थापना करे।

जैसी शक्ति हो वैसा उपरोक्त कहे गए नियमों में से एक या अधिक नियम धारण करने का संकल्प करके भगवान के सामने हाथ में जल लेकर प्रतिज्ञा करे कि मैं संपूर्ण मास पर्यंत इन नियमों को धारण करता हुआ व्यतीत करूंगा। संकल्प करके भगवान के नामों का उच्चारण करें।

(१) नमः पुरुषोत्तमायाय नमस्ते विश्वभावन।

नमस्तेस्तु हृषीकेश, महापुरुष पूर्वज।

(२) येनेदं अखिलं जातं यंत्र सर्व प्रतिष्ठितम्।

त्वयि मेध्यति यत्रैतत् ते अपरोत्तिम केशवम्।

(३) परेशः परमानंदः परास्पर सरः प्रभुः।

चिद्रूप पश्चितपरज्ञेयो समेकृष्णः प्रसीदतु।

(४) कृष्णं कमल पत्राक्षं रामं रघु कुलोद भवम्।

नृसिंहवामनं विष्णुं स्मरन् याति परांगतिम्।

(५) वासुदेव वाराहंच, कंस केसि निषूदनम्।

पुराण पुरुषं यज्ञ पुरुषं प्रणतोस्म्यहम्।

(६) अनाधि निधनं देवं शंखचक्र गदाधरम्।

त्रिविक्रमं हलधरं प्रणतोस्मि सनातनम्।

(७) सइदं कीर्त योज्नित्यं स्तोत्राणामुक्तमोत्तमम्।

सर्वपाप विनिर्मुक्तते गोलोकं महीयते।

इस मास में ब्रमचर्य धारण कर शुद्ध पवित्र रहकर भगवत संबंधी कथा पुराण का श्रवण करके भजन कीर्तन करते हुए संपूर्ण मास को भक्तिभाव पूर्वक व्यतीत करना चाहिए इस कर्म के पुण्य से पापों का समूह नष्ट होकर समस्त मनोकामनाएं परिपूर्ण होती हैं। सांसारिक सुखों को भोगकर मृत्यु के बाद अक्षयपद अर्थात मोक्ष की प्राप्ति होती है।

जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार

ब्रह्मनारदीय पद्याधारे नवमोऽध्यायः समाप्त।।

(१)

।। शुभमभवतु ।।





Adhik maas ki Katha 1 adhayay| अधिक मास की कथा प्रथम अध्याय

 


 

Adhik maas ki Katha 1 adhayay| अधिक मास की कथा प्रथम अध्याय 




|| अथ प्रथम अध्यायः ||

|| श्री मन्महागणधिपतये नमः ||

वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्य समप्रभ ।

निर्विघ्नं कुरुमे देव सर्व कार्येषु सर्वदा ॥

करोड़ों सूर्य के समान कान्तिवाले वक्रतुण्ड वाले ऐसे भगवान गणपति से प्रार्थना है। हमारे समस्त कार्यों को हमेशा विघ्न रहित करके पूर्ण करें।

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।

गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवेनमः ॥

गुरु ब्रह्मास्वरूप हैं गुरु विष्णु स्वरूप हैं गुरु महादेव स्वरूप हैं गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं जिस गुरु के मार्गदर्शन और ज्ञान प्राप्ति की कृपा से हम ग्रंथ की रचना करते हैं ऐसे गुरु को साष्टांग नमस्कार है।

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमा माद्यां जगद्व्यापिनीं ।

वीणा पुस्तक धारिणीं अभयदां जाड्यांधकारा पहाम् ।

हस्ते स्फटिक मालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम् ।

वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धि प्रदां शारदाम् ॥

आदि शक्ति संपूर्ण संसार को वाणी की शक्ति देने वाली श्वेत वस्त्रों को धारण कर श्वेत कमल पर विराजमान वीणा और पुस्तक धारण करने वाली जडबुद्धि के अंधकार को नष्ट करने वाली, भय को दूर करने वाली हाथ में स्फटिक मणि की माला से सुशोभित विद्या और बुद्धि देने वाली परमेश्वरी भगवती शारदा को हम नमस्कार करते हैं। ग्राम देवता, स्थान देवता, वास्तुदेवता, कुलदेवता, माता-पिता, इष्ट देवता समस्त देवगणों की प्रार्थना कर नमस्कार करते हुए ग्रंथ का प्रारंभ करते हैं।


श्री व्यास जी कहते हैं श्रोतागणों से — हे श्रोतागणों, भगवान के चरणों में श्रद्धा रखने वालों, मोक्ष प्राप्ति के साधन में तत्पर रहने वालों मैं आपकी इच्छानुसार संसार में अल्प प्रयास से महान फल देने वाला भक्ति के सभी प्रयासों में सर्व श्रेष्ठ कहा जाने वाला (जैसे - चारों वेदों में सामवेद सर्व श्रेष्ठ है। नदियों में गंगा जी श्रेष्ठ हैं। पर्वतों में सुमेरु पर्वत श्रेष्ठ है। गायों में कामधेनु श्रेष्ठ है। वर्णों में विप्रवर्ण श्रेष्ठ है। पुराणों में महाभारत पुराण श्रेष्ठ है। इसी प्रकार यह श्रेष्ठ है। जोकि पुरुषोत्तम मास के नाम से संसार में प्रसिद्ध है। एक समय की बात है नैमिसारण्य नाम का जो तपोवन है।

उस तपोवन में ऋषियों के द्वारा प्रारंभ किया गया, ज्ञान-और मोक्ष प्राप्ति के साधन देने वाला यज्ञ हो रहा था। कुछ दिन व्यतीत होने पर समस्त ऋषियों ने ऋषिश्रेष्ठ सूत जी से प्रश्न किया कि हे ऋषिवर हम लोगों ने आपके मुखार बिंद से श्रद्धा और भक्ति संबंधी अनेक ज्ञान की कथाएं सुनी। अब हम आपसे शीघ्र फलदाता तथा मोक्ष प्राप्ति का साधन जानना चाहते हैं। आप तो कथा प्रसंगों में कह चुके हैं कि जीवात्मा को मोक्ष प्राप्ति के लिये अत्यंत कठिन साधन अर्थात् (तपस्या, योग साधना) करना चाहिए। परंतु हे ऋ

षिवर मोक्ष का साधन देने वाला यदि सांसारिक मनुष्य जो कि मायामोह के बंधन में फंसे हुए पारिवारिक विषय वासना में लिप्त हैं। ऐसे लोगों के लिये मोक्ष प्राप्ति का कोई साधन जो कि सर्व-साधारण के लिये सरल हो, बताने की कृपा करें।

ऋषियों के विशेष आग्रह को सुनकर सूत जी बहोत प्रसन्न होकर कहते हैं। हे ऋषियों आप लोग धन्य हैं। जो कि परोपकार करते हुए श्रद्धापूर्वक परमात्मा का यशोगान सुनना चाहते हैं। मैंने अपने गुरु के द्वारा मोक्ष दायिनी, अनंत पुण्य देने वाला सर्व सुलभ और सांसारिक पुरुषों को अत्यंत सरल मार्ग-मोक्ष प्राप्ति का सुना है। वह मैं आपके सामने प्रगट करता हूं। आप लोग एकाग्र चित्त होकर सुनें। जैसा कि प्रश्न आपने मुझसे किया उसी प्रकार नारदजी ने भगवान नारायण से किया तथा- धर्मराज ने भगवान श्रीकृष्ण से किया कि हे महाप्रभों मैंने आपके मुखार बिंद से अनेक धार्मिक प्रसंग सुने आज मैं आपसे सांसारिक मायामोह में फंसे हुए अनेक पाप कर्मों में लिप्त, चौरासी लक्षयोनि में बारंबार जन्म लेने और मृत्यु को प्राप्त होने वाले जीवात्मा को मोक्ष प्राप्ति का साधन बताइये।

|| शुभम् भवतु ||








Adhik maas ki Katha 2 adhyaya| अधिक मास की कथा दूसरा अध्याय



Adhik maas ki Katha 2 adhyaya| अधिक मास की कथा दूसरा अध्याय

व्यास जी कहते हैं -

प्रथम अध्याय के कथानुसार धर्मराज ने श्री कृष्णजी से प्रश्न किया, उनके प्रश्नोत्तर में रुक्मिणी रमण भगवान कृष्ण कहते हैं। हे धर्मराज तुम्हारे प्रश्न का उत्तर अत्यंत गुप्त है। जिसको कि आज तक ऋषियों ने मेरे स्त्री, पुत्र, बंधु बांधव भी नहीं प्राप्त कर सके। परंतु तुम मेरे परम भक्त हो, इसलिये मैं तुमसे इस महान पुण्य और मोक्ष दायक प्रसंग को प्रकट करता हूँ।

हे धर्मराज, संसार में कल्प, काष्ठ, लव, घटी, प्रहर रात्रि दिन प्रदोष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर युग, एवं कुंआ, बावली, झरना, तालब, नदियां, समुद्र, एवं लता, वृक्ष वनस्पति, जड़ें वन, उपवन, ग्राम, पर्वत, शहर, देवताओं के निवास और धाम इन सबका कोई न कोई देवता स्वामी है। और वे सब अपने - अपने निश्चित दिन और समय पर पूजित होते हैं। तथा जन समुदाय के द्वारा हर्ष उल्लास के द्वारा पूजन करने पर उत्तम फल देते हैं। अपने- अपने गुण और अधिकार के कारण वे पूजित होते हैं। तथा इनको अपने स्वामी का आश्रय प्राप्त होने से वे सब सौभाग्य-शाली और संसार में प्रशंसनीय माने जाते हैं।
परंतु हे धर्मराज - इन सबके मध्य एक अधिक महीना ऐसा उत्पन्न हुआ कि जिसका समय आने पर लोग अत्यंत निंदा करते तथा निंदनीय शब्दों का प्रयोग करते हुए उसको मलमास कहते एवं अधिकमास में समस्त शुभ कार्य करना छोड़ देते। क्योंकि यह महीना सूर्य की संक्रांतिहीन होता अर्थात इस महिने में सूर्य की संक्रांति न होने से यज्ञ, उत्सव, विवाह, प्रतिष्ठा, वास्तुकर्म अथवा किसी भी शुभ कार्य को नहीं करते और सभी निंदा करते। इस प्रकार सांसारिक पुरुषों की इसके प्रति अशुभ भावना थी। किसी भी शुभकार्य में वर्जित और लोगों के मन में अपने प्रति हीन व निरादर व्यवहार को देखकर इस अधिकमास के मन में अत्यंत दुःख हुआ। चिंताग्रस्त- और दुःख व्यतीत करते हुए अनेक समय बीत जाने पर जब मानसिक क्लेश असह्य हो गया तो वह विचार करने लगा कि संसार में निंदित होकर जीने से तो अपना नाम ही खत्म कर देना अच्छा है, यदि जीवित रहना है तो यश प्राप्ति के लिये किसी देवता का आश्रय [लेना आवश्यक है।]
प्राप्त करना आवश्यक है। इसके लिये संसार प्रसिद्ध शरणागत की रक्षा करने वाले भगवान विष्णु की शरण में जाकर उनसे प्रार्थना करना ही उत्तम रहेगा। ऐसा विचार निश्चय होते ही अधिक मास शीघ्र ही (वैकुंठ लोक) जहां कि शांत स्वरूप समस्त प्राणियों को जीवनदान देने वाले शरण में आए हुए की रक्षा करने वाले भगवान विष्णु हमेशा विराजमान रहते हैं।
ऐसे वैकुंठलोक में पहुंचकर जहां भगवान का निवास मंदिर है। तथा भगवान विष्णु रत्न जड़ित सिंहासन पर आनंद मग्न विराजमान हैं भगवान के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हुआ। उस समय अधिक मास भय और दुःख से कांप रहा था। तथा उसके नेत्रों से आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी। ऐसी अवस्था में थोड़ी देर खड़ा रहने के बाद अधिकमास अत्यंत कातर और दयनीय वाणी से भगवान से कहता है। हे जगन्नाथ, हे देवताओं के स्वामी, हे शरणागत वत्सल, हे दया के सागर आप मेरी ऐसी हालत देखकर भी चुप क्यों बैठे हैं मेरी रक्षा क्यों नहीं करते। मैं निराश्रित हूँ मेरा कोई स्वामी नहीं है। इसीलिये सांसारिक लोगों ने मेरा नाम (मलमास), रख दिया है। मेरी निंदा करते हैं। मेरा मास आने पर अशुभ कहकर समस्त शुभ कार्यों का त्याग कर देते हैं। हे महाप्रभु ऐसी अवस्था में मैं जीवित नहीं रहना चाहता। आप मुझे अपनी शरण में लेकर मेरी रक्षा करें अथवा इस संसार से मेरा नाम समाप्त कर दें।
हे दीनानाथ, आप तो दया के सागर हैं। गजेंद्र की करुण पुकार को सुनकर आप शीघ्र ही रक्षा करने के लिये दौड़ पड़े थे। अधिक मास के अत्यंत दयनीय वचनों को सुनकर भगवान विष्णु उसपर कृपा दृष्टि करते हुए कहते हैं। हे वत्स तू मेरी शरण में आ गया है अब तू किसी भी प्रकार का दुःख मत कर जो भी मेरी शरण में आ जाता है, मैं उसकी अवश्य रक्षा करता हूँ। मेरा यह वैकुंठ स्थान केवल आनंदमय है। यहां दुःख शोक, भय, मृत्यु कुछ भी नहीं है।
भगवान के ऐसे वचनों को सुनकर अधिक मास के सब दुःख दूर हो गये वह स्वस्थचित और आनंदित हो गया, तथा प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना करने लगा। हे सर्वज्ञ, ब्रह्माण्ड नायक, सबमें विराजमान, सारे संसार का पालन करने वाले जगत् के स्वामी आपसे संसार की कोई बात छिपी हुई नहीं है। आप अंतर्यामी हैं। फिर भी मैं आपसे अपने मन की व्यथा कहता हूँ। संसार में कला, घटी, पल, मूहूर्त दिन, रात्रि, मास, वर्ष, पक्ष, ऋतु, अयन, संवत्सर इस सबका कोई न कोई देवता स्वामी होने से समय समय पर लोगों द्वारा पूजनीय और शुभ कर्म के अधिकारी माने जाते हैं तथा अपने स्वामी [की कृपा से लोगों को आशीर्वाद देकर फलीभूत होकर जन समुदाय में यश और प्रशंसा प्राप्त करते हैं।]
के प्रभाव से लोगों को आशीर्वाद देकर फलीभूत होकर जन समुदाय में यश और प्रशंसा प्राप्त करते हैं। परंतु मैं निराश्रित और मेरा कोई स्वामी न होने से लोग मेरी निंदा करते हैं।
अशुभ और मलमास कहकर समस्त शुभ कार्यों में मेरा परित्याग करते हैं। हे महाप्रभु इसी कारण मेरी ऐसी स्थिती हुई मेरे दुःख का कोई पारवार नहीं होने से मैंने अपने मन में निश्चित कर लिया था कि ऐसा जीवित रहने से मरना ही अच्छा है। यही सोचकर मैं आपकी शरण में आया हूँ कि आप तो भगवान की प्रार्थना करता हुआ मूर्छित होकर गिर पड़ा। इसके गिरते ही भगवान की सभा में विराजमान सभी सदस्य आश्चर्य चकित रह गए कि यहां वैकुंठ धाम में कभी दुःख और शोक व्याप्त नहीं है। फिर भी यह कितना दुःखित जीव है कि यहां आनेपर भी इसका दुःख दूर नहीं हो सका, भगवान ने गरूड़जी को संकेत किया, भगवान की आज्ञा से गरूड़जी अपने पंखों से अधिकमास को हवा करके होश में लाने की कोशिश करने लगे। होश में आते ही भगवान उससे कहते हैं।
हे वत्स, उठ तेरा कल्याण होगा। तेरे समस्त दुःखों का अंत निश्चय होग। तू मेरे साथ गोलोकाधिपति भगवान पुरुषोत्तम के पास चल, वहां गोलोक में भगवान पुरुषोत्तम विराजमान हैं। वे पर ब्रह्म परमात्मा समस्त देवताओं के देवता हैं। वे दो भुजावाले पीतांबरधारी, मुरली धारण करनेवाले, भगवान पुरुषोत्तम अखंड ब्रह्माण्ड नायक हैं। उनकी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। वे चत अचल के स्वामी शरणागत वत्सल, सबके दुःखों को क्षण में नष्ट करने वाले हैं हम सभी देवता हमेशा उनकी वंदना किया करते हैं। वे संसार को उत्पन्न करने वाले, पालन करने वाले और प्रलयकर्ता भी वही हैं। ऐसा कहकर भगवान विष्णु गरूड़जी को गोलोक चलने का संकेत करते हुए अधिकमास को अपने साथ गरूड़ पर बैठाकर गोलोक में पहुंचते हैं।
भगवान कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि हे धर्मराज मैं तुमको गोलोक का वर्णन सुनाता हूँ एकाग्रचित होकर सुनो, गोलोक करोड़ों सूर्य से भी ज्यादा तेजमान है। ज्योतिस्वरूप, अनंत विशाल और स्वेच्छामय है। वह ब्रह्मलोक, विष्णुलोक, शिवलोक के ऊपर है। तीन कोटि योजन का उसका विस्तार है। वह गोल आकृति वाला है। उसमें समस्त भूमि रत्न से जड़ित है। वह स्थान बड़े बड़े महात्मा और ऋषियों को भी अप्राप्य है। भगवान पुरुषोत्तम अपने योगबल से उसको अंतरिक्ष में धारण किये हुए हैं। उसमें असंख्य मंदिर हैं गोलोक के नीचे दक्षिणी ओर सुंदर वैकुंठ लोक है। वह एक कोटियोजन लंबा [और चौड़ा है।]
और चौड़ा है। वह भगवान विष्णु का लोक है। उस लोक में भगवान विष्णु को भक्ति और उपासना करने वाले ऋषि, मुनी, तपस्वी, व सांसारिक गृहस्थ मृत्यु के बाद अपने पुण्य के प्रभाव से वैकुंठ लोक को जाते हैं। वहां चतुर्भुजी स्वरूप पीतांबर धारण करके तेजस्वी स्वरूप होकर अपने पुण्य को कर्म के अनुसार उतने समय तक वैकुंठ सुख भोगकर फिर मनुष्य योनि में जन्म लेते हैं। गोलोक के नीचे बाएं बाजू में शिवलोक है वह एक कोटियोजन लंबा चौड़ा है। वहां भगवान शंकर पार्वती समेत विराजमान रहते हैं। वे भगवान शंकर स्फटिक मणि के समान सुंदर स्वरूप चार भुजावाले सारे शरीर में भस्म का लेपन और नाग का यज्ञोपवीत धारण व्याघ्राम्बर पहने हुए जटा में गंगाजी तथा अर्धचंद्र धारण किए हुए त्रिनेत्र वाले, पार्वती सहित विराजमान रहते हैं। शिवलोक में मृत्यु के बाद ऋषि, मुनि, तपस्वी शंकरजी की उपासना करने वाले सांसारिक पुरुष और स्त्रियां अपने पुण्यकर्म के प्रभाव से निश्चित समय तक आनंद पूर्वक रहकर समय समाप्त होने पर फिर पृथ्वीपर जन्म लेकर शुभकर्म और शंकरजी की आराधना करते हुए जीवन व्यतीत करते हैं।
हे धर्मराज, गोलोक में अनंत ज्योति स्वरूप भगवान पुरुषोत्तम का जो स्वरूप है वह नीले कमल के समान सर्वांग श्यामवर्ण नया उत्पन्न कमल पुष्प के समान कोमल, करोड़ों शरद पूर्णिमा के चंद्र के समान देदीप्यमान, प्रसन्न मुख मद्रावाले धनुष के समान नेत्र और भृकुटी वाले, पीतांबर धारण किए हुए कानों में कुंडल, गले में वैजयंती माला पहने हुए, वनमाला कौस्तुभ माला धारण किए हुए, कस्तूरी का तिलक लगाए हुए, रत्न जड़ित सिंहासन पर विराजमान, हाथों में मुरली धारण किए हुए, अत्यंत सुंदर, करोड़ों कामदेव के समान सुंदर आकर्षित युवा किशोर अवस्था वाले सिंहासन पर विराजमान रहते हैं। ऐसे भगवान पुरुषोत्तम का दर्शन बड़े बड़े ऋषि योगी तपस्वी और यज्ञ करने वालों को भी दुर्लभ होता है। वे ही परब्रह्म परमात्मा हैं सारे संसार का आधार और सबके पालनहार उन्हीं की इच्छा से संसार की उत्पत्ति और प्रलय होता है। वे आदि, मध्य और अंत से रहित हैं। विश्व के पालनहार, अनंतकोटि ब्रह्माण्ड नायक और मोक्षस्वरूप है निर्गुण, निर्विकार, सच्चिदानंद हैं। वे ही जीवात्मा को मोक्ष देने वाले हैं। उनकी उपासना करने वाले मृत्यु के बाद मोक्ष को प्राप्त करके उन्हीं में लीन होकर हमेशा के लिए जन्म मृत्यु और चौरासी लक्ष योनि में भ्रमण करने का दुःख जीवात्मा का हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
हे धर्मराज, अधिकमास को साथ में लिये हुए भगवान विष्णु ने गोलोक में प्रवेश किया। दूर से ही भगवान पुरुषोत्तम का सुंदर मंदिर दिखाई दे रहा था। उसके तेज से अधिकमासकी आंखें चकाचौंध [हो रही थी।]
हो रही थी। वह मंदिर मणि के स्तंभो से बना हुआ बीच सिंहासन पर भगवान पुरुषोत्तम विराजमान थे अपने पीछे पीछे अधिकमास को साथ लेकर मंदगति से भगवान विष्णु वहां पहुंचे। भगवान विष्णु को देखकर द्वारपाल ने उठकर उनका अभिवादन किया प्रेम से उनके चरणों में नमस्कार किया भगवान विष्णुने अधिकमास को साथ में लेकर मंदिर में प्रवेश किया मंदिर के भीतर किशोर अवस्था वाले दिव्य स्वरूप भगवान पुरुषोत्तम रत्न जड़ित सिंहासन पर आनंद मुद्रा में विराजमान थे। उनके सामने पहुंचकर भगवान विष्णु हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे समस्त पार्षद गणों ने उठकर भगवान विष्णु का अभिवादन किया। तथा भगवान पुरुषोत्तम ने अपने सिंहासन के समीप सिंहासन पर बैठने का आग्रह करने पर भगवान विष्णु उसपर विराजमान हो गए विष्णु के पीछे अधिकमास, अश्रु पूरित नेत्रों से थरथर कांपता हुआ दोनों हाथ जोड़कर खड़ा रहा। इस प्रकार भगवान नारायण ने नारदमुनि से सूतजीने शौनकादि ऋषियों से तथा भगवान कृष्ण ने धर्मराज से कहा।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार बृहन्नारदीय पद्याधार पुराण का द्वितीय ऽ अध्यायः समाप्त ॥ (२)




Gita ke 16 adhayay ki Katha| गीता के सोलहवें अध्याय की कथा

Gita ke 16 adhayay ki Katha| गीता के सोलहवें अध्याय की कथा 



 श्रीमहादेवजी कहते हैं—पार्वती! अब मैं गीताके सोलहवें अध्यायका माहात्म्य बताऊँगा, सुनो। गुजरातमें सौराष्ट्र नामक एक नगर है। वहाँ खड्गबाहु नामक राजा राज्य करते थे, जो दूसरे इन्द्रके समान प्रतापी थे। उनके एक हाथी था, जो मद बहाया करता और सदा मदसे उन्मत्त रहता था। उस हाथीका नाम अरिमर्दन था। एक दिन रातमें वह हठात् साँकलों और लोहेके खम्भोंको तोड़-फोड़कर बाहर निकला। हाथीवान् उसके दोनों ओर अंकुश लेकर डरा रहे थे। किंतु क्रोधवश उन सबको अवहेलना करके उसने अपने रहनेके स्थान—हथिमारको ढहा दिया। उसपर चारों ओरसे भालोंकी मार पड़ रही थी; फिर भी हाथीवान् ही डरे हुए थे, हाथीको तनिक भी भय नहीं होता था। इस कौतूहलपूर्ण घटनाको सुनकर राजा स्वयं हाथीको मनानेकी कलामें निपुण राजकुमारोंके साथ वहाँ आये। आकर उन्होंने उस बलवान् दंतैल हाथीको देखा। नगरके निवासी अन्य काम-धंधोंकी चिन्ता छोड़ अपने बालकोंको भयसे बचाते हुए बहुत दूर खड़े होकर उस महाभयंकर गजराजको देखते रहे। इसी समय कोई ब्राह्मण तालाबसे नहाकर उसी मार्गसे लौटे। वे गीताके सोलहवें अध्यायके 'अभयम्' आदि कुछ श्लोकोंका जप कर रहे थे। पुरवासियों और पीलवानों (महावतों)-ने उन्हें बहुत मना किया, किंतु उन्होंने किसीकी न मानी। उन्हें हाथीसे भय नहीं था, इसीलिये वे विचलित नहीं हुए। उधर हाथी अपने फूत्कारसे चारों दिशाओंको व्याप्त करता हुआ लोगोंको कुचल रहा था। वे ब्राह्मण उसके बहते हुए मदको हाथसे छूकर कुशलतापूर्वक (निर्भयता)-से निकल गये। इससे वहाँ राजा तथा देखनेवाले पुरवासियोंके मनमें इतना विस्मय हुआ कि उसका वर्णन नहीं हो सकता। राजाके कमलनेत्र चकित हो उठे थे। उन्होंने ब्राह्मणको बुला सवारीसे उतरकर उन्हें प्रणाम किया और पूछा—'ब्रह्मन्! आज आपने यह महान् अलौकिक कार्य किया है; क्योंकि इस कालके समान भयंकर गजराजके सामनेसे आप सकुशल लौट आये हैं। प्रभो! आप किस देवताका पूजन तथा किस मन्त्रका जप करते हैं? बताइये, आपने कौन-सी सिद्धि प्राप्त की है?' ब्राह्मणने कहा—'राजन्! मैं प्रतिदिन गीताके सोलहवें अध्यायके कुछ श्लोकोंका जप किया करता हूँ, इसीसे ये सारी सिद्धियाँ प्राप्त हुई हैं।' श्रीमहादेवजी कहते हैं—तब हाथीका कौतूहल देखनेकी इच्छा छोड़कर राजा ब्राह्मण देवताको साथ ले अपने महलमें आये। वहाँ शुभ मुहूर्त देखकर एक लाख स्वर्णमुद्राओंकी दक्षिणा दे उन्होंने ब्राह्मणको संतुष्ट किया और उनसे गीता-मन्त्रकी दीक्षा ली। गीताके सोलहवें अध्यायके 'अभयम्' आदि कुछ श्लोकोंका अभ्यास कर लेनेके बाद उनके मनमें हाथीको छोड़कर उसके कौतुक देखनेकी इच्छा जाग्रत् हुई। फिर तो एक दिन सैनिकोंके साथ बाहर निकलकर राजाने हाथीवानोंसे उसी मत गजराजका बन्धन खुलवाया। वे निर्भय हो गये। राजाके सुख-विलासके प्रति आदरका भाव नहीं रहा। वे अपना जीवन तृणवत् समझकर हाथीके सामने चले गये। साहसी मनुष्योंमें अग्रगण्य राजा खड्गबाहु मन्त्रपर विश्वास करके हाथीके समीप गये और मदकी अनवरत धारा बहते हुए उसके गण्डस्थलको हाथसे छूकर सकुशल लौट आये। कालके मुखसे साधु पुरुषकी भाँति राजा उस गजराजके मुखसे बचकर निकल आये। नगरमें आनेपर उन्होंने अपने राजकुमारको राज्यपर अभिषिक्त कर दिया तथा स्वयं गीताके सोलहवें अध्यायका पाठ करके परमगति प्राप्त की।