Adhik mass ki Katha 31 adhyaya| अधिक मास की कथा 31वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 30 adhyaya| अधिक मास की कथा 30 वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 30 adhyaya| अधिक मास की कथा 30 वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 29 adhyaya | अधिक मास की कथा 29 वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 29 adhyaya | अधिक मास की कथा 29 वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 28 adhyaya | अधिक मास की कथा 28अध्याय
Adhik mass ki Katha 28 adhyaya | अधिक मास की कथा 28अध्याय
Adhik mass ki Katha 27 adhyaya| अधिक मास की कथा 27वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 27 adhyaya| अधिक मास की कथा 27वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 26 adhyaya | अधिक मास की कथा 26वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 26 adhyaya | अधिक मास की कथा 26वा अध्याय
॥ अथ षड्विंशतितमोऽध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकादि ऋषियों से और भगवान विष्णु लक्ष्मी जी से कहते हैं। हे लक्ष्मी! अब मैं तुमसे अधिक मास के उद्यापन की विधिपूर्वक कहता हूँ तुम एकाग्रचित्त से सुनो। अधिक मास में नियम व्रत अखंडदीप और मौन व्रतधारण आदि के साथ नित्य भगवान पुरुषोत्तम का पूजन अपनी शक्ति के अनुसार अनेक प्रकार के दान कर्म करते हुए भगवान स्मरण भजन कीर्तन गीता भागवत का श्रवण करते हुए संपूर्ण मास को श्रद्धापूर्वक व्यतीत करना चाहिए, अंत में उद्यापन करना आवश्यक है। उद्यापन के लिये अधिक मास की अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या ये चार तिथियां मुख्य हैं। इन तिथियों में जिसको जिस तिथि में उद्यापन करना सोयस्कर हो। अपनी इच्छा से उस तिथि में करना चाहिए।
उसका विधान इस प्रकार है उद्यापन के एक दिन पहले पूजन हवन करने के लिये सात्विक और कर्मकांडी ब्राह्मण को तथा भोजन के निमित्त अपनी श्रद्धा और शक्ति के अनुसार निश्चित संख्या में आमंत्रित कर देना चाहिए। उद्यापन के दिन प्रातः काल उठकर शौचक्रम दंत मुख मार्जन करके शुद्ध जल से स्नान करके शुद्ध वस्त्रों को धारण करके नित्य नैमित्तिक संध्या वंदन कर्म करके कर्मकांडी ब्राह्मण के विधान से भगवान पुरुषोत्तम का पूजन श्रद्धापूर्वक करना चाहिए। पूजन के स्थान और भगवान के मंडप को तोरण अनेक ऋतु में उत्पन्न फूलमाला और अनेक वस्त्रों की ध्वजा पताकाओं से सुसज्जित करना चाहिए। मंडप के स्थान को गोबर से लीपकर (रंगवल्ली) रांगोड़ी से चौकपूरकर उसपर चौरंग रखकर नया सफेद वस्त्र बिछाकर चावल आदि धान्य से सर्वतोभद्र मंडल बनाकर चारों दिशाओं में चार और बीच में प्रधान कलश को स्थापित करना चाहिए। अपनी शक्ति के अनुसार चांदी तांबा या पीतल के कलश होना चाहिए। उन कलशों में तीर्थों का अथवा गंगाजल अथवा शुद्ध जल भरकर पंचपल्लव सर्वौषधी डालकर वस्त्र से लिपटा हुआ नारियल के फल रखना चाहिए। उन कलशों में क्रम से संकर्षण, वासुदेव प्रद्युम्न अनिरुद्ध का आवाहन ध्यान करके मध्य में प्रधान कलश पर सुवर्ण की बनाई हुई राधा के सहित भगवान पुरुषोत्तम की मूर्ति को प्राणप्रतिष्ठा करके पाद्य अर्ध्य स्नान कराके स्थापित करे चारों कलशों में पाद्य अर्ध्य स्नान करावे।
श्रद्धा के सहित सभी देवताओं को यज्ञोपवीत चंदन गंध अक्षत पुष्प माला धूप दीप नैवेद्य अर्पण करे प्रधान देवता भगवान पुरुषोत्तम को पुरुषयोग्य वस्त्र अलंकार अंगूठी तथा राधाजी को स्त्रीयोग्य वस्त्र साड़ी, ब्लाऊज, श्रृंगार सामग्री, चूड़ी, टिकली, बिंदिया, महावर, कुंकू, सेंदुर, काजल, आईना, अत्तर सुगंधित तेल, आदि अर्पण करके धान्य, चावल, फल मेवा, आदि से ओटी भरे। उत्तम प्रकार के मिष्टान्न पक्वान्न मिठाई मेवा, फल के द्वारा सभी देवताओं को भोग लगावे। लौंग, इलायची, जायपत्री, कपूर से बनाया हुआ पान का बीड़ा अर्पण करके पांचों देवताओं के निमित्त घी के पांच दीपक प्रज्वलित करके दीपदान करे। यदि मनुष्य में द्रव्य की शक्ति हो तो चारों देवताओं के निमित्त चार ब्राह्मणों को जप का संकल्प देकर चारों देवताओं की प्रसन्नता के लिये जप करवावे। तांबे के पात्र में जल भरकर उसमें गंध अक्षत पुष्प डालकर अपनी जंघा मोड़कर अर्थात् घुटना टेककर (देव देव नमस्तुभ्यं) इस मंत्र के द्वारा सभी देवताओं को अर्ध्य देना चाहिए। श्रद्धापूर्वक देवताओं को नमस्कार करे। आचार्य ब्राह्मण का पूजन करके भगवान के स्तोत्र का पाठ भागवत पुराण आदि का श्रवण करना चाहिए।
भगवान को छत्र चामर आदि अर्पण करके सभी देवताओं की प्रसन्नता और व्रत की पूर्ति के लिये बेदी बनाकर अग्नि को स्थापित करके अग्नि का पूजन करके शुद्ध घी और हवन सामग्री के द्वारा आचार्य के कहे मंत्रो द्वारा हवन करना चाहिये। हवन पूर्ण होने पर पंचलोक पाल, दशदिक्पाल और क्षेत्रपाल के बलि का विधान करके अग्नि में नारियल में घी भरकर पूर्णाहुति देना चाहिए। अनंतर घी की पांच या सात दीप मालिका सजाकर प्रेममय श्रद्धा में विभोर होकर भगवान की आरती करके मंत्र पुष्पांजली अर्पण करें। सभी देवताओं को साष्टांग दंडवत नमस्कार समर्पित करे। आमंत्रित ब्राह्मणों को पत्नि के सहित पाद प्रक्षालन करवा के गंध अक्षत लगाकर उत्तम प्रकार की भोज्य सामग्री मिष्टान्न पक्वान्न फल दूध खीर के द्वारा भोजन कराकर अपनी शक्ति के अनुसार वस्त्र, दक्षिणा तांबूल पान सुपारी देकर प्रार्थना करें कि हे ब्राह्मणों मैंने अपनी शक्ति के अनुसार इस उद्यापन कर्म में आपकी सेवा में जो भी समर्पित किया उससे आप संतुष्ट होकर आशीर्वाद दें कि यह उद्यापन कर्म परिपूर्ण हुआ इस प्रकार का आशीर्वाद ब्राह्मणों से ग्रहण कर उनको विदा करे। हे लक्ष्मी उद्यापन की रात्रि में अनेक मांगलिक वाद्य संगीत गीत भजन करते हुए रात्रि जागरण करते हुए व्यतीत करना चाहिए। दूसरे दिन प्रातःकाल नित्य नैमित्तिक कर्म करके स्नान करे शुद्ध वस्त्रों को धारण करके संध्या वंदन नित्य पूजन करके सभी देवताओं का उत्तर पूजन करना चाहिए। नाम मंत्रों से आचार्य द्वारा हवन करे, तर्पण मार्जन और भगवान की आरती और मंत्र पुष्पांजली समर्पित करके साष्टांग दंडवत नमस्कार करके हांथ जोड़कर प्रार्थना करे।
हे देवाधिदेव पुरुषोत्तम मैंने अपनी शक्ति और श्रद्धा के अनुसार जो नियमव्रत धारण करते हुए यथाशक्ति उद्यापन कर्म किया उससे आपकी कृपा बनी रहे तथा मेरे मन में निरंतर आपके प्रति श्रद्धा और निष्ठा बनी रहे। इस प्रकार भगवान की प्रार्थना करके आवाहित देवताओं का आचार्य के मंत्रों द्वारा विसर्जन करे। आचार्य का पूजन करके पूर्णपात्र का दान भगवान की मूर्ति और पूजन के मंडल का दान संकल्प पूर्वक आचार्य को देवे। यदि शक्ति हो तो सुंदर सुशील पुष्ट शरीर वाली दुग्ध देने वाली बछड़े के सहित गौ का दान करना चाहिए। आचार्य को वस्त्र आभूषण पददान, तिलपात्र, घृतपात्र, जलपात्र, छाता, जूता, शंख, पंच, रत्न, सप्तधान्य, श्री मदभागवत का दान अपनी श्रद्धा और शक्ति के अनुसार द्रव्य का लोभ त्यागकर करना चाहिए।
हे लक्ष्मी श्रीमद भागवत के दान का बड़ा भारी माहात्म्य है। साक्षात भगवान पुरुषोत्तम के स्वरूप का दान कहलाता है। हजार कन्यादान सैकड़ों बाजपेय यज्ञ करने से तथा अनाज से परिपूर्ण क्षेत्र का दान और अनेक तुलादान करने से जिस पुण्य की प्राप्ति होती है उससे हजार गुणा पुण्य की प्राप्ति श्री मद भागवत का दान करने वाले को प्राप्त होती है।
कांसे के अथवा तांबे, पीतल के पात्र में तैंतीस मालपुआ या अनरसा रखकर कपड़े से ढांककर व्रत की संपूर्णता प्राप्त करने के लिये आचार्य को संकल्प पूर्वक दान करना चाहिए। इस अपूप दान से अधिक मास के व्रत नियम की पूर्णता प्राप्त होती है। इसलिये अपूप दान अवश्य करना चाहिए। अगर मालपुआ, अनरसा बनाने का साधन न हो तो इसको बनाने की कच्ची सामग्री का दान करना चाहिए। ब्राह्मण को ही भगवान का स्वरूप मानकर उत्तम प्रकार के खाद्य सामग्री मिष्टान्न मेवा फल आदि का भोजन कराके पान सुपारी लौंग इलायची देकर उपरोक्त वस्तुओं का यथा शक्ति दान देवे। श्री कृष्णार्पण मस्तु ऐसा कहकर हांथ में जल दक्षिणा लेकर ब्राह्मण के हांथ में छोड़ देवे। मंत्रहीनं क्रियाहीनं और यस्यस्मृत्या इस मंत्र के द्वारा पुरुषोत्तम भगवान की वंदना करके आचार्य ब्राह्मण को विदा करके स्वयं प्रसाद और भोजन को ग्रहण करे। अपनी शक्ति के अनुसार गरीबों को भिक्षार्थियों को भोजन या अन्नदान देवे। यदि कोई मनुष्य अष्टमी या नवमी को उद्यापन करना चाहें उनको उद्यापन के बाद भी अमावस तक नित्यप्रति की तरह पूजन करते रहना चाहिए। और अमावस की रात्रि को मांगलिक वाद्य संगीत भजन कीर्तन करते हुए रात्रि जागरण करके दूसरे दिन आचार्य के द्वारा उत्तर पूजन का विधान करके विसर्जन कराके आचार्य का पूजन भोजन और दान योग्य सामग्रियों का दान भगवान से क्षमा याचना आदि उपरोक्त विधान से कर्म करके यथा शक्ति दक्षिणा और जल हांथ में लेकर श्री कृष्णार्पण मस्तु कहकर ब्राह्मण के हांथ में जल छोड़कर आशीर्वाद ग्रहण करके ब्राह्मण को विदा करके स्वंय प्रसाद और भोजन ग्रहण करे। हे लक्ष्मी इस प्रकार विधान पूर्वक जो मनुष्य अथवा स्त्री अधिक मास का उद्यापन कर्म करेंगे, वे सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्त होकर दुःख दारिद्रय और जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्त होकर सुख, शांति, संपत्ति, संतति, यश, कीर्ति, धनधान्य से संपन्न होकर सांसारिक जीवन व्यतीत करके अंत में अक्षय पद अर्थात् चौरासी लक्ष योनियों में भ्रमण की बाधा से मुक्त होकर अनंत में लीन होकर मोक्ष को प्राप्त होंगे।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
बृहन्नारदीय पद्माधारे षड्विंशतितमोऽध्यायः समाप्त
(२६)
॥ शुभमभवतु ॥
Adhik mass ki Katha 24 adhyaya | अधिक मास की कथा 24वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 24 adhyaya | अधिक मास की कथा 24वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 23 adhyaya | अधिक मास की कथा 23वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 23 adhyaya | अधिक मास की कथा 23वा अध्याय
।। अथ त्रयोविंशतितमो ऽध्याय: प्रारंभ: ।।
श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकदि ऋषियों से कहते हैं, भगवान विष्णु के द्वारा स्नान के महात्म्य को सुनकर लक्ष्मीजी प्रसन्न होकर प्रश्न करती हैं। हे महाप्रभु अब आप कृपाकर धारणा पारणा (एकांतोरपवास) व्रत के महात्म्य का वर्णन सुनाइयेगा। और यह किससे किया और कैसे फल को प्राप्त किया, सो बताने की कृपा करें। भगवान विष्णु कहते हैं, हे लक्ष्मी विंध्य पर्वत के एक भाग में अमरकंटक नाम का पर्वत हैं। उसी पर्वत में नर्मदाजी का उद्रम स्थान है। उस पर्वत पर सन्यासी जिसे भगवान शंकर निवास करके तपस्या करते हैं। नर्मदाजी का साक्षात शंकर का वर हस्त मानी जाती है। जिसे मनुष्य अपनी मनोरकामनाओं को प्राप्त करते हैं। वैसे ही नर्मदाजी का स्नान परिक्रमा और पूजा नर्मदा नदी के किनारे बड़े बड़े तीर्थस्थल और भगवान शंकर के मंदिर बने हुए हैं। इसी प्रकार भृगुच्छ नाम का एक नगर है। उस नगर में सदाचार संपन्न सत्यवादी कुशल शर्मा नाम का ब्राह्मण रहता था। सुंदर और पतिव्रता कुशलावती नाम की उसकी पति थी। वे दोनों पति-पति अपने धर्म कर्म में लगे हुए जीवन यापन करते थे। उनकी मेधावती नाम की कन्या थी। कन्या जब विवाह योग्य हुई तब ब्राह्मण ने पदमनाभ नाम का ब्राह्मण पुत्र जो कि सुंदर सुशील और विद्वान था उसके साथ अपनी कन्या का विवाह कर दिया। कन्या अपने पति के घर में आनंदपूर्वक रहने लगी। दोनों पति पति में अनंत प्रेम था। एक दिन का भी वियोग दोनों को असह्य था। कुछ दिनों के बाद भाग्य की विवित्रता से एकदिन पदमनाभ नर्मदाजी में स्नान करने गया। अपने समवयस्क लोगों से जल क्रीड़ा करते हुए पानी में डूबने लगा। साथ के लोगों को जब वह नहीं दिखाई दिया तब लोग घबड़ाकर उसको पानी में ढूढने लगे। परंतु उसके प्राण जा चुके थे वह मृत हो चुका था। तुरंत लोगों के द्वारा उसके शरीर को निकालकर बाहर लाए। उसके घर पहुँचा। उसके मातापिता और पति रोते दहाकार करते हुए वहां आए। पति उसके मृतशरीर को गोद में लेकर छाती पीटती हुई रुदन करती रही है देव हे जगन्नाथ मैं इस वैधव्यता का दुख कैसे भोगूंगी।
प्राण क्यों नहीं निकलते। मेरा सौभाग्यही जहां डूब गया अब मैं इस जीवनरूपी सागर को कैसे पार करूंगी। पति के बिना जैसे मछली तड़पती है। उसी प्रकार से वह तड़प रही थी। उसी प्रकार से कुछ दिनों तक सास-श्वसुर के पास रही कुछ दिनों बाद पिता ने उस दुखी कन्या को सांत्वना और धीरज देने के तन्मित अपने घर ले आए। परंतु माता पिता के घर आने के बाद भी उसका दुःख कम नहीं हुआ रात दिन रोती, तड़पती हुई अपने भविष्य में सोचती रहती थी।
आखिर अपने पूर्वजन्म का पाप उदय हुआ यह समझकर उसके प्रायश्चित करने के लिये कोई व्रत या देवता की आराधन करना चाहिए। इस निमित एक बालिका ने अपने पिता से कहा, हे पिता मेरे दुःख को दूर करने के लिये आप कोई व्रत आदी साधन मुझे बताइये। जिसके द्वारा मैं दुःख से छुटकारा पाकर भवसागर से पार हो जाऊं। कन्या के वचनों को सुनकर पिता ने कहा हे पुत्री अब से तोत्तम मास भगवान पुरुषोत्तम का मास आनेवाला हैं। उस मास में एकांतोरपवास जिसको धारणा पारणावत भी कहते हैं, करने से मनुष्य के पापों का समूह नष्ट हो जाता है। सभी दुःख दूर होते है। और मनुष्य भव्यवसागर से पार हो जाता है। पिता के वचनों को सुनकर मेधावती प्रसन्न होते हुए समय व्यतीत होने पर पुरुषोत्तम मास प्रारंभ हुआ तब पिता के कथनानुसार नियम धारण करके हुए ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नर्मदाजी में स्नान करना, भगवान पुरुषोत्तम की पूजा करना, विप्रपूजा करके यथा शक्ति दान देना, भूमि पर शयन करना, एकदीत उपवास करके दूसरे दिन हविष्य खाकर पारणा करना अखंडदीप की स्थापना आदि इस प्रकार नियमपूर्वक बड़ी श्रद्धा से संपूर्ण मास पूरा करके उपवास के दिन विधिवत उद्यापन किया। इस प्रकार उसने अपने जीवन में अनेक पुरुषोत्तमास नियम और श्रद्धापूर्वक संपूर्ण किया। समय व्यतीत होते बुद्धवस्था आने पर शरीर कृश हो गए और उसका अंत समय प्राप्त हो गया। पुण्य के प्रभाव से और भगवान शंकर की महान भक्ति के कारण मृत्यु के बाद वह मेधावती की आत्मा शिवलोक में पहुंच कर पार्वतीजी की सखी हो गई। वहां अनेक सुखों को भोगकर पृथ्वी पर फिर से जन्म लिया। काशी नगरी में विशालाक्षी नामक तपस्विनी के रूप में प्रसिद्ध हुई। आज भी काशी में विशालाक्षी मंदिर है लोग उसके पूजा करके अपना मनोरथ पूर्ण करते हैं। हे लक्ष्मी पुरुषोत्तम मास का धारणा पारणावत शरीर को अरोग्यता देनेवाला, अंत में मोक्ष देने वाला है। इसी व्रत के प्रभाव से वह मेधावती मानव शरीर वाली होकर दूसरे जन्म में देव स्वरूप हो गई।
हे लक्ष्मी मेधावती की एक सखी कोमला नाम की ब्राह्मणी थी उसे भी पुण्य के प्रभाव से मृत्यु के बाद शिवलोक से अधिक मास में नरक भोजन में जन्म लेकर तपस्या के प्रभाव से मंगलागौरी के नाम से आज भी प्रसिद्ध है। हे लक्ष्मी पुरुषोत्तम मास का अद्भुत पुण्य है। जिसका वर्णन हजार मुख वाले शेषनाग भी करने में असमर्थ है। इतनी कथा सुनकर लक्ष्मीजी कहती हैं, हे महाप्रभु अब आप विप्रसेवा के महात्म्य का वर्णन सुनाइयेगा। भगवान कहते हैं, हे लक्ष्मी मैं तुम से इस विषय का एक इतिहास सुनाता हूँ। भरतखंड में विराट नाम का देश है। उस देश में अनेक पुण्यशाली और धनिक लोग रहते थे। उस नगर में अनेक मंदिर थे कुएं बावली तालाब और बगीचों से वे नगर हमेशा संपन्न और सुखी रहेगा। वहां परमार्थिक कर्म होते रहने से देवताओं को प्रसन्न वरदान दिया था कि शंकरजी का भी मंदिर है। चारों वर्णों के लोग अपने कर्म धर्म में लगे रहकर सभी प्रकार से सुखी और प्रसन्न है। उसी नगर में धनदास नाम का एक शूद्र रहता था। वह धनसंपन्न था और उसके अनेक नौकर थे। परंतु वह हमेशा ब्राह्मणों को आमंत्रित कर अपने हाथ से ब्राह्मणों का पादप्रक्षालन और पूजा करता था और अनेक प्रकार के दान देकर संतुष्ट करता था। अनेक पर्व के समय स्वयं ब्राह्मण के घर जाकर झाडू लगाए, कपड़े धोए, उनकी आवश्यक इच्छित वस्तु को बाजार से लाकर देना ये सब स्वयं पति के सहित करता था। उसकी पति भी पति का अनुसरण करते हुए विप्र पत्नियों की सेवा करती रहती थी। धनदास को अपने ऊपर धन संपन्न होने का कोई गर्व नहीं था वह विप्रसेवा में कितना भी धन क्यों न खर्च हो जाए उसके मन में चिंता नहीं होती थी। इस प्रकार विप्रसेवा करते हुए उसकी आयु बहुत बीत गई। अचानक दैव के प्रभाव और पूर्वजन्म के कर्म के प्रभाव से धनदास के शरीर में काफी कष्ट का रोग उत्पन्न हो गया। जगह जगह उसके शरीर में व्रण (घाव) खून और पीब बहने लगी। रोग को देखकर धनदास मन में बहुत उदास रहने लगा। कि अब मेरे से ब्राह्मणों की सेवा कैसे होगी। इसी चिंता ग्रस्त स्थिति में एक समय एक सिद्ध पुरुष धनदास के घर आए उनसे उसने अपने मन का दुःख प्रकट किया। उसके दुःख को सुनकर सिद्ध पुरुष ने कहा हे धनदास तू चिंता छोड़ दे तूने जो विप्रसेवा की है, उसका पुण्य तुझे अवश्य प्राप्त होगा। तेरी अच्छी मृत्यु होगी और मृत्यु के बाद तू और तेरी पति सुंदर विमान पर बैठकर स्वर्ग लोक को जाओगे। ऐसा कहकर सिद्ध पुरुष वहां से अंतर्धान हो गए। सिद्ध पुरुष के शब्दों को यादकर धनदास बहुत प्रसन्न हुआ अपने धन संपदा के तीन भाग किए।
एक भाग अपने पुत्र को दूसरा भाग कन्या को और तीसरा अपने साथ लेकर तीर्थ यात्रा को पत्नी समेत निकल गया। अनेक तीर्थों में अपने धनका दान कर दिया। तीर्थ क्षेत्र में रहते हुए, ही दोनों पति पति की एकही दिन मृत्यु हो गई। अपने पुण्य के प्रभाव से सुंदर विमान पर बैठकर उन दोनों की जीवात्मा स्वर्ग लोक को चली गई। हे लक्ष्मी विप्रसेवा का महात्म्य देवताओं की पूजा से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। मैंने भी जब पृथ्वीपर जन्म लिया तब विप्रसेवा अवश्य की है।
(२३)
बृहत् नारदीय पद्माधारे त्रयोविंशतितमो ऽध्याय: समाप्त ।।
।। शुभमभवत् ।।
Adhik mass ki Katha 22 adhyaya | अधिक मास की कथा 22वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 22 adhyaya | अधिक मास की कथा 22वा अध्याय
|| अथ द्वाविंशो ऽध्याय: प्रारम्भ: ||
|| श्री गणेशाय नम: ||
हे लक्ष्मी! भगवान नारायण से सूतजी शौनकादि ऋषियों से और भगवान विष्णु लक्ष्मी जी से कहते हैं। हे लक्ष्मी! पहले किसी समय मारवाड़ प्रदेश में गोकर्ण पर्वत के किनारे शिवपुरी नाम की एक सुंदर नगरी थी। वह नगरी चारों तरफ विख्यात और प्रसिद्ध थी। उसमें बड़े बड़े राजमार्ग और छोटे बड़े गलियाँ, गलियारे बने हुए थे। बड़े बड़े महल और छोटे बड़े मकान बहुत से थे। उस नगरी में चारों वेदों के ज्ञाता विद्वान ब्राह्मण और क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सभी वर्ण और जाति के लोग रहते थे। और अपने अपने कर्म करते हुए सब संपन्न और सुखी थे। सत्य बोलना, शुद्ध सात्विक व्यवहार करना यही समस्त नगरवासियों में विशेषता थी।
अनेक स्थानों पर कथा, भागवत, होम, हवन, यज्ञ आदि हमेशा होते रहते थे। वेद मंत्रों का घोष और शास्त्रों की चर्चा हर मंदिरों में हुआ करती थी। सभी जाति के लोग एकत्रित होकर भजन, कीर्तन आदि किया करते थे। उस नगरी में अधर्म और पाप कहीं देखने में नहीं आता था। ऐसी वह उत्तम शिवपुरी नाम की नगरी थी। उसी नगर में विप्रदास नाम का एक शूद्र रहता था। वह सदाचार संपन्न और जैसा उसका नाम था उसमें गुण भी था। उसी प्रकार उसकी स्त्री भी अत्यंत सुंदर पतिव्रता, पति की आज्ञा का अनुसरण करने वाली थी। वे दोनों पति-पत्नी हमेशा ब्राह्मणों की सेवा में लगे रहते थे। जब पुरुषोत्तम मास प्रारंभ हुआ तब दोनों पति-पत्नी ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर नित्य ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने का नियम प्रारंभ करके ब्राह्मणों को अनेक प्रकार का दान करने लगे।
हे लक्ष्मी! गोकर्ण पर्वत के समीप गोकर्णो नाम की नदी थी। उसी नदी के किनारे सारणेश्वर नाम का भगवान शंकर का भव्य मंदिर था। उस मंदिर में लिंगरूप भगवान शंकर की सुंदर और जागृत मूर्ति है। भगवान सारणेश्वर की पूजा अर्चना से मनुष्यों की समस्त मनोकामनाएं परिपूर्ण होती है। वह विप्रदास पति के सहित नित्य प्रति उसी गोकर्णो नदी में ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने के लिए जाता था। और स्नान करके भगवान सारणेश्वर की पूजा करते और विद्वान ब्राह्मणों की पूजा करके श्रद्धापूर्वक अन्न, वस्त्र, तिलपात्र, सुवर्ण, द्रव्य का दान करते थे।
(पृष्ठ ६८)
इस प्रकार संपूर्ण अधिकमास पर्यंत उनका क्रम चलता रहा अंतिम अमावस के दिन उसी मंदिर में अनेक विद्वान ब्राह्मणों को निमंत्रित करके यथानियम पूर्वक अध्यापन किया और स्वर्णिक ब्राह्मणों को उत्तम भोज्य सामग्रियों से भोजन कराकर वस्त्र अलंकार और सुवर्ण आदि की दक्षिणा दी। और हाथ जोड़कर ब्राह्मणों से दीनवाणी के द्वारा प्रार्थना कि हे महाराज! मैं अत्यंत दीन और गरीब हूं, आप लोगों ने मेरे ऊपर बड़ी कृपा की जो मेरा निमंत्रण स्वीकार करके अपने यहां आए। आप लोग मुझे आशीर्वाद दें कि मेरा यह उद्यापन संपन्न हो गया और मेरे मन में भगवान के प्रति और आप लोगों के चरणों में ऐसी ही श्रद्धा बनी रहे।
इस प्रकार ब्राह्मण लोग उस विप्रदास को आशीर्वाद देकर अपने अपने घर चले गए। विप्रदास अपना समस्त कार्य जैसे मंदिर जाते हुए दान, भोजन सायंकाल होकर रात्रि का समय आ गया। तब वह पति के सहित साथ भगवान का प्रसाद चरणामृत और गोकर्णो गंगा जल लेकर अपने घर जाने के लिए निकला। आद्यात्म ही पर सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले अपने घर के जाने के लिए सैकड़ों प्रेत खड़े हुए दिखाई दिए। वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले भयंकर आकृति वाले सैकड़ों प्रेत खड़े हुए दिखाई दिए। वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले भयंकर आकृति वाले सैकड़ों प्रेत खड़े हुए दिखाई दिए, वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले भयंकर आकृति वाले थे। वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले थे। वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले थे। (पाठ में यहाँ पुनरावृत्ति है) वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले थे। भयंकर आकृति वाले सैकड़ों प्रेत खड़े हुए दिखाई दिए। वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले भयंकर आकृति वाले थे। निरंतर चीत्कार का शब्द और अंगों से समस्त चमकती हुई और मेंढक का मुख, शरीर और जैसा उसका नाम था उसी प्रकार का उसमें गुण था। उसी प्रकार उसकी स्त्री भी अत्यंत सुंदर पतिव्रता, पति की आज्ञा का अनुसरण करने वाली थी। वे दोनों पति-पत्नी हमेशा ब्राह्मणों की सेवा में लगे रहते थे। जब पुरुषोत्तम मास प्रारंभ हुआ तब दोनों पति-पत्नी ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर नित्य ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने का नियम प्रारंभ करके ब्राह्मणों को अनेक प्रकार का दान करने लगे।
हे महाराज हम लोग प्रेत हैं निंदनीय वस्तु का भक्षण, हिंसा आदि निंदनीय हमारे कर्म है अनेक
(पृष्ठ ६९)
पाप कर्म करना दूसरे लोगों को कष्ट देना यही हमारा कर्म है। हम लोग अत्यंत क्रूर स्वभाव के हैं। हमारी संख्या सात सौ है। भूख प्यास से पीड़ित होकर घूमते रहते हैं। इस प्रेत योनि में सिवाय दुःख के कुछ भी नहीं है। आज आपके चरणों को देखकर मन को कुछ समाधान हुआ है। हे महाराज साधुजन के रक्षक होते हैं। हम लोग अत्यंत पापी और दीन है। आपके सिवाय हमारा कोई उद्धार नहीं कर सकता आप महान पुण्यात्मा है हम लोग दुःख भोगते हुए मारे-मारे फिरते हुए, अनेक कल्प बीत गए। आज हमारे सौभाग्य से आपका दर्शन हो गया। आप से प्रार्थना है अपने पुण्य प्रभाव से हम लोगों को इस प्रेत योनि से मुक्ति दे दो।
इस प्रकार प्रेतराज की प्रार्थना को सुनकर विप्रदास के मन में दया उत्पन्न हो गई। उसने मन में भगवान पुरुषोत्तम का ध्यान करके हाथ में गोकर्णो गंगा का जल लेकर संकल्प किया कि मैंने इस अधिकमास में जो नित्य स्नान का नियम धारण किया उसमें से सात स्नान का पुण्य होते ही वे सब प्रेत योनि से मुक्त होकर दिव्य स्वरूप धारण कर, स्वर्ग लोक को चले गए। हे लक्ष्मी सात सौ प्रेतों का उद्धार सिर्फ सात स्नान के पुण्य से हो गया। हे लक्ष्मी सौराष्ट्र देश में प्रभास नाम की एक नगरी थी उसमें सोमशर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वह वेद शास्त्रों में पारंगत सर्वगुण संपन्न वाजपेय आदि यज्ञों को करता था। अपनी शक्ति के अनुसार दान पुण्य भी करता था। उसने परोपकार की दृष्टि से अनेक गांवों में कुआं बावली भी बनवा दिए थे। समय समय पर कार्तिक स्नान माघ स्नान व्रत, उपवास अनेक पर्वों के पुण्य प्राप्ति के दान भी किए थे।
एक समय वह सोमशर्मा ब्राह्मण किसी पर्व के समय सरस्वती नदी का सागर के साथ जहां संगम हुआ वहां स्नान के निमित्त घर से निकला। जंगल के मार्ग से जा रहा था। रास्ते में एक पर्वतकार शरीर वाला भयंकर राक्षस मार्ग में खड़ा हुआ था। वह पीले रंग का जा रहा था रास्ते में एक पर्वतकार शरीर में स्थित लगा हुआ लंबा, लंबी गर्दन, लंबा पेट, मुख विकराल जिह्वा, बड़ी बड़ी मगरमच्छ जैसी दाढ़े, गुफा जैसी नाक, ऊंट के समान खड़ा हुआ उस राक्षस को देखकर मन में कुछ भयभीत हुआ। परंतु हिम्मत करके मन में नृसिंह भगवान का स्मरण करके खड़ा हो गया। वह राक्षस ब्राह्मण को देखकर उसको पकड़ने के लिए दौड़ा। ब्राह्मण के समीप जाने पर भी वह ब्राह्मण को स्पर्श करने में असमर्थ हो गया।
(पृष्ठ ७०)
पुण्य कर्मों के द्वारा ब्राह्मण तेज और आत्मबल होने से राक्षस असमर्थ हो गया। उसका कोई बल प्रयोग नहीं चलता था। अपनी ऐसी अवस्था देख राक्षस को आश्चर्य हुआ और मन में ज्ञान का उदय हुआ कि यह ब्राह्मण जरूर कोई पुण्यात्मा और तपस्वी होना चाहिए। मैंने तो बड़े-बड़े शक्तिशाली नर और पशुओं को मार डाला। फिर ये साधारण मनुष्य के सामने मेरी शक्ति क्यों क्षीण हो गई। ज्ञान उत्पन्न होते ही वह राक्षस सोमशर्मा को दंडवत नमस्कार करके हाथ जोड़कर प्रार्थना करता है, हे स्वामी! पुण्यात्मा आज मैं आपके पुण्य तप के समक्ष असमर्थ हो गया हूं। मैं राक्षस हूं अनेक स्वरूप का दर्शन करने से मेरे पाप नष्ट हो गए हैं और ज्ञान का उदय हो गया है। मैं आपके दर्शन करने के लिए तरस रहा था। मेरे भाग्य से आपके दर्शन हो गए हैं और आपके दर्शन करने से मेरा पाप नष्ट हो गया है। मैं आपके दर्शन करने से मेरा पाप नष्ट हो गया है। हे स्वामी! मेरे ऊपर भी कृपा करके मुझे इस दुर्गति से मेरा उद्धार करिए। साधुजन हमेशा दोनों के रक्षक और परोपकारी होते हैं। मेरे ऊपर भी आप उपकार करिए।
इस प्रकार राक्षस की प्रार्थना सुनकर ब्राह्मण ने मन में विचार किया कि अगर मैंने इसके ऊपर दया नहीं की तो यह राक्षस और अनेक प्राणियों को कष्ट देकर हत्या करेगा। इस का उद्धार करने से मुझे भी पुण्य प्राप्त होगा। ऐसा विचार कर ब्राह्मण ने हाथ में जल लेकर भगवान पुरुषोत्तम का स्मरण करके संकल्प किया कि मैंने अधिक मास में जो स्नान किए हैं उसमें से एक स्नान का पुण्य इस राक्षस को प्राप्त हो, ऐसा कहकर जल राक्षस के ऊपर छोड़ दिया। जल पड़ते ही वह राक्षस दिव्य स्वरूप होकर ब्राह्मण की वंदना करता हुआ स्वर्ग लोक को चला गया। हे लक्ष्मी महान पुण्य दायक पुरुषोत्तम मास में स्नान करने की महिमा है।
|| जै जै श्री अधिकमास महात्म्य सार ||
|| बृहत् नारदीय पद्याधारे द्वाविंशो ऽध्याय: समाप्त: ||
Adhik mass ki Katha 20 adhyaya | अधिक मास की कथा 20वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 20 adhyaya | अधिक मास की कथा 20वा अध्याय
॥ अथ विंशते ऽध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री गणाधिपतये नमः ॥
श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकदि ऋषियों से कहते हैं भगवान के मुखारविंद से पुरुषोत्तम मास के पांच महापर्वों का वर्णन सुनकर लक्ष्मीजी बहुत प्रसन्न होकर कहती है हे महाप्रभु अमृत तुल्य कथा को सुनकर अभी मनकी तृप्ति नहीं हुई, इसलिये जनकल्याण हेतु आप और माहात्म्य इतिहास का वर्णन सुनाइये। भगवान कहते हैं लक्ष्मी से, हे लक्ष्मी द्वादशी और व्यतीपात का पर्व महान पुण्यदायक है। इन पर्वों में थोड़ा भी दान कर्म अनेक यज्ञों का और अनेक तीर्थों का फल देता है। अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। द्वादशी को प्रातः स्नान और नित्यकर्म से निवृत होकर भगवान पुरुषोत्तम का पूजन करके उत्तम सामग्री और शुद्ध घी से बनाए हुए तैंतीस मालपुए या अनरसे कांसे के पात्र में रखकर वस्त्र से ढांककर भगवान के सामने अर्पण करे। और पैरों में पहनने योग्य पादत्राण (चप्पल जूता) अक्षत से मालपुआ का पूजन करके संकल्प पूर्वक सत्पात्र ब्राह्मण को दान देवे। और हाथ जोड़कर भगवान पुरुषोत्तम की प्रार्थना करें (इस मंत्र के द्वारा)
श्लोक :
(१) कल्ला कालदि रूपेण योनित्यं वर्तते हरिः ।
लोके विप्रस्वरूपेण तस्मै कालात्मने नमः ॥
(२) यस्य हस्ते गदाचक्रे गरुड़स्य वाहनम् ।
शंखः करतले यस्य समे विष्णुः प्रसीद तु ॥
(३) अर्धमासे तु संप्राप्ते घृत वस्त्र मुपान हौ ।
दानं गृहाण सर्वात्मन् व्रत संपूर्णं हे तवे ॥
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(४) राज्यंच शर्कराचैव त्रयींसंद अपूपकम् ।
प्राणिनतां प्राणनाथाय तस्मै कालात्मने नमः ॥
(५) कुरुक्षेत्र मिदं देशः साक्षाद् विष्णुमूर्धिजः ।
पृथ्वी समर्पितं दानं गृहाण पुरुषोत्तम ॥
(६) मल्लानांचैव शुद्धयर्थ पाप प्रशमनायच ।
पुत्र पौत्रादि वृद्धयर्थ तव दास्यामि भास्कर ॥
(७) अर्धमासे तु संप्राप्ते पुण्ये दंत जनार्दन ।
त्वं उदिष्य सुराध्यक्ष प्रसीद पुरुषोत्तम ॥
(८) शरण्यं सर्वभूतानां सर्वेविष्णुः प्रसी दतु ॥
इन श्लोकों के द्वारा भगवान की प्रार्थना कर पानी छोड़े। इस महान पुण्य कर्म के द्वारा संपूर्ण मनोकामनाएं पूर्ण होकर सुख शांतिपूर्वक जीवन होता है। सांसारिक सुखों को भोगकर मृत्यु के बाद स्वर्ग का सुख प्राप्त होता है। हे लक्ष्मी इस विषय का मैं एक इतिहास तुम से कहता हूँ। यक्षराज कुबेर की एक स्थित विलासिनी नाम की अप्सरा थी। एक समय वह स्वर्ग लोक से मृत्यु लोक का भ्रमण करने आई। घूमते हुए वह कुरुक्षेत्र में जा पहुंची।
अपनी सखियों के साथ कई दिनों तक वहां का आनंद लेते हुए रही। एकदिन उसकी सखियों ने उसका अनेक रंग के फूलों से श्रृंगार किया और हंसी मजाक करते हुए श्रृंगार रस के गाते गाने लगीं। युवावस्था श्रृंगार से युक्त और कामोद्दीपक गायन आदि वातावरण के द्वारा उस अप्सरा के शरीर में मदन जागृत हो गया वह फूलों की माला हाथ में लेकर मदमस्त होकर घूमने लगी। जंगल में भ्रमण कर रही थी। अचानक उसी मार्ग से नारदजी जा रहे थे। वह अप्सरा मदोन्मत्त होकर और साधारण पुरुष समझकर उनके गले में फूलों की माला डाल दी। माला गले में डालते ही नारदजी अत्यंत
चित्र 3 (पृष्ठ 79)
कोधित हो गए। और कहने लगे अरे दुष्ट तूने मुझे स्पर्श कर दिया। तू इतनी कामांध हो गई कि संन्यासी को साधारण पुरुष समझकर मेरे गले माला डाल दी। मैं तुझे श्राप देता हूँ तू पिशाचिनी हो जा। ऋषि के श्राप को सुनकर अप्सरा भयभीत होकर ऋषि के चरणों को पकड़कर रोती हुई क्षमा मांगने लगी। हे ऋषिवर मैं अबला और दीन जड़बुद्धि हूँ। आप महान सामर्थ्यवान हो दया के सागर हो दीन वत्सल हो विद्वान हो मेरे अपराध को क्षमा कर दो। इस समय आप के सिवा यहां मेरी रक्षा करने वाला कोई नहीं है। उसकी ऐसी दीनवाणी को सुनकर नारदजी ने सोचा यह मेरी प्रणागत हो गई है। स्त्री जाति की नहीं है। यह उसकी हत्या नहीं करते। इस समय आप के सिवा यह मेरी रक्षा करने वाला कोई नहीं है। स्त्री जाति की नहीं है। यह सोचकर उन्होंने अपने क्रोध का शमन किया और बोले मेरा दिया हुआ श्राप कभी असत्य नहीं हो सकता। तू पिशाचिनी होगी। जहां महानदी गंगा का सागर के साथ संगम हुआ है, वहां कुमारी क्षेत्र नाम की एक तपस्विनी हजारों वर्ष से तपस्या हुई रहती है। उसने अत्यंत दुक्कर तपस्या की है और एक सौ आठ पुरुषोत्तम मास का नियमपूर्वक स्नान, दान, अखंडदीप उपवास आदि नियम धारण करके पुण्य अर्जित किया है। तू पिशाचिनी होकर ब्रह्मवास से व्याकुल भ्रमण करते हुए अधिकमास में वहां पहुंचेगी तब उसके समीप पहुंचेगी तब उसके दर्शन होंगे पिशाचिनी के स्वभाववश तू तपस्विनी को खाने के लिये दौड़कर प्रार्थना करेगी।
हे तपस्विनी पुण्य स्वरूपिणी मेरे ऊपर दया करो मैं पिशाच योनि में महान दुख भोग रही हूँ। मेरा इस योनि से उद्धार करो। आपके सिवा कोई मेरा उद्धार नहीं कर सकता। इस प्रकार दीन वचनों से तू अपने उद्धार की बारंबार भिक्षा मांगेगी। तेरी दीन वाणी और हीन दशा को देखकर उस तपस्विनी को दया उत्पन्न होगी। और वह तुझे अपने किए हुए पुरुषोत्तम मास का एक पुण्य तुझे देगी। उसके प्रभाव से तेरा उद्धार होगा। ऐसा कहकर नारदऋषि वहां से चल दिए। उनके जाते ही वह अप्सरा पिशाच बन गई। और भयंकर स्वरूप की होकर जंगल में भटकने लगी। अनेक पशुओं की हिंसा करके और भी पाप कर्मों की वृद्धि होने लगी। जंगल में उत्तम फलों के वृक्ष हैं। जगह जगह सुंदर तालाब और नदियां बहती हैं। परंतु प्रेत पिशाचवालों को वृक्ष से तोड़कर फल खाने का अधिकार नहीं है नीचे गिरे हुए फल ही खा सकते हैं। उसी प्रकार तालाब और नदी के जल को स्पर्श करने का अधिकार न होते हुए