Adhik mass ki Katha 25 adhyaya | अधिक मास की कथा 25वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 21 adhyaya | अधिक मास की कथा 21वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 21 adhyaya | अधिक मास की कथा 21वा अध्याय
।। श्री गणेशाधिपतये नमः ।।
श्री भगवान नारायण नारदजी से तथा सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं। हे ऋषियों भगवान विष्णु से लक्ष्मीजी कहती हैं, हे दयानिधे आपने अप्सरा उद्वार की कथा मुझे सुनाई अब आप पुरुषोत्तम मास के स्नान का फल और माहात्म्य का वर्णन सुनाइये। भगवान विष्णु लक्ष्मीजी की इच्छा को सुनकर प्रसन्नता से कहते हैं, हे लक्ष्मी तुम्हारी इच्छा के अनुसार मैं पुरुषोत्तम मास के स्नान का माहात्म्य वर्णन करता हूँ जो लोग पुरुषोत्तम मास में नित्य प्रति सूर्योदय के पहले स्नान करते हैं उनके समस्त पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। और उनको शारीरिक कष्ट बाधा कभी नहीं होती है। सभी कार्य निर्विघ्नता से पूरे होते हैं। मन में संतोष और प्रसन्नता होती है। सभी तीर्थों में स्नान करने का पुण्य प्राप्त होता है। विधिक (नियम) युक्त स्नान करने से बारहों महीने के स्नान का फल प्राप्त होता है। अधिकमास में गंगाजी के स्नान का बड़ा महत्त्व है। गंगाजी में स्नानकर माधव भगवान का दर्शन करने से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है। अधिकमास में जो लोग सरस्वती नदी में स्नान करते हैं।
उनके सात जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं। सूर्य चंद्रमा के ग्रहण के समय गोदाम करने का जो पुण्य होता है, वही पुण्य अधिकमास में स्नान करने वाले को प्राप्त होता है। वह मनुष्य महामूर्ख होगा जिससे अधिक मास में स्नान करने वाले को प्राप्त नहीं होता है। वह मनुष्य महामूर्ख होगा जिससे अधिक मास में स्नान नहीं किया और पितरों का तर्पण नहीं किया। इस नरक रूपी संसार से अपनी आत्मा की मुक्ति के लिये कोई कर्म नहीं किया उसका जन्म ही वृथा गया ऐसा निश्चित समझना चाहिए। ऐसे लोग पृथ्वी का भार हैं। हे लक्ष्मी जो लोग पुरुषोत्तम मास में श्रद्धापूर्वक स्नान दान तर्पण आदि कर्म करते हैं वे बड़े भाग्यशाली और परम पुण्यशील होते हैं। वैशाख में तप उपवास चैत्र मास में होम कार्तिक मास में दानधर्म ऐसे प्रत्येक मास के अलग अलग पुण्य है। परंतु अधिकमास में व्रत, होम, दान इन तीनों का साधन एक साथ हो करके सभी मासों का पुण्य प्राप्त होता है।
इस कर्म के द्वारा जीवत्मा उत्तम सद्गति को प्राप्त होती है। वह मनुष्य जब तक जीवित रहता है। उत्तम सुख धन धान्य से परिपूर्ण दीर्घायु जीवन व्यतीत करके मृत्यु के बाद मोक्ष को प्राप्त होता है। वह जीवत्मा चौरासीयोनिन का भ्रमण और आवागमन से छुटकारा पाकर परब्रह्म में लीन हो जाते है।
हे लक्ष्मी अधिकमास में स्नान का कितना पुण्य है इस विषय में पुरातन का इतिहास कहता हूँ। दक्षिणदिशा में गोदावरी में स्नान के तट पर पैठण नाम का एक सुंदर नगर है। उस नगर में चारों वर्णों के लोग रहते थे और अपने अपने कर्म में लगे हुए सुखी और संपन्न थे। वहाँ एक ब्राह्मण रहता था। वह सज्जन, विद्वान अनेक जनों से पूजित भगवान का भक्त था। प्रत्येक पुरुषोत्तम में नियमपूर्वक सूर्योदय के पहले स्नान करने की श्रद्धा थी उसका समस्त जीवन शांतमय और सुखमय व्यतीत हो रहा था। वृद्धावस्था आ गई शरीर अवस्था के प्रभाव से कमजोर अशक्त हो गया। गोदावरी नदी उसके घर से कुछ दूरी पर थी नित्य प्रति उतनी दूर कैसे स्नान करने जा सकूँगा यह विचार उसके मन में चिंता का विषय बना हुआ था पुरुषोत्तम मास प्रारंभ हो चुका था। इस प्रकार विचार करते हुए आखिर उसने निश्चय किया कि यदि मास के अंतिम तीन दिन नियमपूर्वक स्नान करूँगा।
पापों को नष्ट करने वाला ऐसे मास को व्यर्थ नहीं बिताना चाहिए। अपनी शक्ति के अनुसार जितना हो सके पुण्य संचित करना चाहिए। हे लक्ष्मी इस प्रकार उस ब्राह्मण ने मन में निश्चय करके पुरुषोत्तम मास के जब अंतिम तीन दिन शेष रहे तब से स्नान का नियम प्रारंभ कर दिया। एक प्रहर रात्रि शेष रहती थी तब घर से स्नान के निमित्त गोदावरी के लिये निकल जाता। और स्नान करके सूर्योदय के पहले ही घर वापस आ जाता था।
दो दिन स्नान का और घर वापस आने का समय निर्विघ्नता हो गया। अंतिम तीसरे दिन ब्राह्मण गोदावरी में स्नान करके कमंडलु में जल भरकर अपने घर वापस आ रहा था। थोड़ा थोड़ा अंधकार था सूर्योदय की आभा प्रकट हो रही थी। ऐसे ही समय मार्ग में एक बड़े भयंकर आकृति वाला प्रेत ब्राह्मण के सामने प्रकट हुआ। वह प्रेत बड़ी बड़ी अंगारे के समान आँखें वाला, सूखा शरीर सिर्फ हड्डियाँ ही दिखाई दे रही थीं। दाढ़ के बीच जीभ लपलपा रही थी पेट पीठ से सटा हुआ बड़े बड़े भयंकर बाल बड़े भयंकर शरीर पीले रंग का बार बार हाथ से पेट को पीटता हुआ मुख फैलाता हुआ डरावना करता हुआ वह प्रेत ब्राह्मण के सामने प्रकट हुआ। उस प्रेत को देखकर ब्राह्मण के मन में भय अवश्य हुआ। परंतु ब्राह्मण मन में भगवान पुरुषोत्तम का नाम स्मरण करते हुए हिम्मत धारण करता कहता है। अरे तू ऐसा भयानक और महान शरीर वाला प्रेत है। ब्राह्मण को नमस्कार करके कहता है। हे ब्राह्मण मैं समस्त प्राणियों को कष्ट देने वाला प्रेत हूँ। मैं श्मशान में रहता हूँ और अत्यंत निंदनीय वस्तुओं को भक्षण करता हूँ। जिन मनुष्यों में आत्मबल तथा संचित पुण्य नहीं रहता तथा जो
देवताओं की आराधना से दूर रहते हैं। ऐसे मनुष्यों को हमेशा पीड़ा पहुँचाना ही हमारा कर्म होता है।
हे विप्र मैं बड़ा दुरात्मा हूँ रात-दिन हिंसा और पाप आचरण में लिन रहता हूँ इस प्रेतयोनि के दुःख को भोग रहा हूँ। आपके दर्शन होते से और आपके शब्दों को सुनने से मेरे मन में कुछ ज्ञान का प्रकाश हुआ है। आप बड़े दयालु हैं। कृपा करके मेरा उद्धार करिए, मुझे प्रेत योनि से छुटकारा दिलवाइये। इससे आपको बड़ा पुण्य प्राप्त होगा। आपके दर्शन होते ही मेरे मन को विश्वास हो गया है कि आप प्रार्थना को सुनकर धर्मधर्मी के मन में दया उत्पन्न हो गई। हे लक्ष्मी पुरुषोत्तम पुरुष बड़े दयालु होते हैं। उस प्रेत की उनसे किसी का दुःख सहन नहीं होता। कैसा भी पापी, धर्मात्मा, प्रेत, राक्षस, पिशाच सबको शरण देते हैं। ब्राह्मण, धर्मधर्मी वचनों को सुनकर उस प्रेत को पूर्व जन्म का स्मरण हो गया।
वह हाथ जोड़कर कहता है, हे विप्र मैंने पूर्व जन्म में अनेक पाप किए कई लोगों की हत्या की, डाका और चोरी की। मदिरा पीकर अनेक बलात्कार किए अपने जीवन में कभी शुभ और पुण्य कर्म नहीं किये सारा जीवन पाप कर्म में बिता दिया। आखिर मृत्यु के बाद यमदूतों ने मुझे प्रेत योनि में भेज दिया गया। हे विप्र इस योनि में यातना दी। नरकों का दुःख भोगने के बाद मुझे प्रेत योनि में भेज दिया गया। हे विप्र इस योनि में जैसा मेरा भयंकर आकार है वैसे ही हमारे कर्म होते हैं। हम लोगों से अनेक जीवों की हिंसा होती है। पाप हो होते हैं। कभी शुभ कर्म नहीं होता। अनेक कल्पों से मैं इस प्रेत योनि का दुःख भोग रहा हूँ। आज मेरा अहो भाग्य था जो आप पुण्यात्मा के दर्शन हो गए इससे मैं समझ रहा हूँ कि मेरा पापों के प्रायश्चित का समय आ गया है। और आपके द्वारा मेरा उद्धार हो जाएगा। प्रेत के शब्दों को सुनकर ब्राह्मण धर्मधर्मी कहता है, हे प्रेत वास्तव में तू बहुत दुःखित है। मैं अपने कुछ पुण्य के द्वारा तुझे जल हाथ में लेकर संकल्प किया कि मैंने पुरुषोत्तम मास में तीन दिन स्नान किया है। उसका जो पुण्य है। इस प्रेत को दे देता हूँ। ऐसा कहकर प्रेत के शरीर पर छोड़ दिया। उस पुण्य को करते ही उसका प्रेतत्व नष्ट हो गया।
वह दिव्य स्वरूप का हो गया। और ब्राह्मण की वंदना करता हुआ स्वर्ग लोक को चला गया।
वह ब्राह्मण भी घर में आकर भगवान पुरुषोत्तम की आराधना में निमग्न होकर पुरुषोत्तम मास का उद्यापन करके समापन किया। इस प्रकार वह ब्राह्मण अपनी शेष आयु को पूराकर मृत्यु के बाद उत्तमदिव्य स्वरूप धारण करके विमान पर बैठकर स्वर्ग लोक को चला गया। हे लक्ष्मी सिर्फ तीन दिन के स्नान का इतना पुण्य है तो संपूर्ण मास के स्नान का कितना माहात्म्य और पुण्य होगा। भगवान के वचनों को सुनकर लक्ष्मी जी कहती है। हे प्रभु स्नान की महिमा को सुनकर मेरे मन में और भी स्नान की महिमा सुनने की इच्छा है। कृपा कर स्नान महिमा का वर्णन सुनाइयेगा।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
ब्रह्मनारदीय पद्माधारे एकर्विंशोऽ अध्याय: समाप्त ।।
(२१)
।। शुभमभवतु ।।
अधिक मास ki Katha 10 adhyaya |अधिक मास की कथा दसवां अध्याय
अधिक मास ki Katha 10 adhyaya |अधिक मास की कथा दसवां अध्याय
|| अथ दशमो ऽध्याय: प्रारंभ: ||
|| श्री गणधाय पतयेनम: ||
भगवान विष्णु नारद जी से सूतजी शौनकादि ऋषियों से वाल्मीक ऋषि राजा दृढ़धन्वा से तथा श्रीहरि लक्ष्मीजी से कहते हैं हे लक्ष्मी! चैत्र आदि जो बारह महीने हैं उनका स्वामी सूर्य है। इन बारह महीनों में प्रत्येक मास में सूर्य की संक्रांति होती है। परंतु जो संक्रांति से हीन महीना है, उसी को अधिक मास कहा जाता है। उसी के स्वामी भगवान पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। इस मास में थोड़ा भी जप, नियम, व्रतदान, भजन, कीर्तन आदि अक्षयपुण्य देनेवाला होता है। इसलिये इस मास में प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि अपनी शारीरिक शक्ति के अनुसार नियम व्रत आदि धारण करता हुआ श्रद्धापूर्वक दान का पुण्य यादिक कर्म अवश्य करें। ये समस्त कर्म प्रतिपदा से प्रारंभ कर अमावस पर्यंत एक मास तक करे। जिन मनुष्यों में नियमव्रत करने की शारीरिक क्षमता न हो तथा शारीरिक क्षमता होते हुए आर्थिक क्षमता न हो, उनके लिये सरल उपाय यह है कि एक तो श्री नियम धारण कर भगवान का नाम संकीर्तन करते हुए पुरुषोत्तम मास का पुण्य प्राप्त करे। इसमें न तो शारीरिक शक्ति की आवश्यकता न द्रव्य की आवश्यकता है। सिर्फ मन में श्रद्धा भावना और अपने आत्म के उद्धार की आकांक्षा होनी चाहिए। भगवान के वचनों को सुनकर लक्ष्मीजी प्रश्न करती है, हे प्रभो! जो मनुष्य निर्धन है, दुराचारी है, बुद्धिहीन है ऐसे मनुष्यों के लिये कोई सरल उपाय बताएं। भगवान कहते हैं कि हे लक्ष्मी! पुण्य प्राप्ति के अनेक साधन हैं परंतु इनमें सबसे सरल उपाय यह है कि वे विद्वानों का सत्संग करे। जिससे ज्ञान की वृद्धि होती है, श्रद्धा भावना जागृत होकर पुण्यकर्म में प्रवृत्ति होती है। संतों की कृपा से समस्त मनोकामनाएं परिपूर्ण होकर बैकुंठ धाम की प्राप्ति होते हैं। हे लक्ष्मी! इसी प्रकार गौ और ब्राह्मण के पूजा का भी बड़ा महत्व है। गौ के शरीर में चौदह भुवन निवास करते हैं। हे लक्ष्मी! इसी प्रकार गौ का दर्शन, स्पर्श और पूजन मनुष्य के समस्त पापों को नष्ट करके दुःख शोक दारिद्रय नष्ट होकर घर में लक्ष्मी का आगमन, पुत्र पौत्रों की वृद्धि होती है। गौ का पूजन अर्थात ब्रह्माविष्णु महेश का पूजन होता है। गौ के गोबर में यमुनाजी का वास, गो-मूत्र में नर्मदा जी का वास और दूध में गंगाजी का निवास रहता है। इसलिये गौ का पूजन हमेशा करना चाहिए परंतु पुरुषोत्तम मास में गौ पूजा, सेवा विशेष पुण्य दायी होती है।
इसी प्रकार विष्णुपा का भी विशेष महत्व है। मनुष्य के शरीर के लिये गौ का आधार माता के आधार के समान है। गाय का दूध, दही, घी के शरीर कर्म परिपूर्ण होते है। ये पुराण और वेद शास्त्रों के अति पवित्र मानी गई है। वेद और शास्त्रों में भी गाय का बड़ा महत्व कहा गया है। इसलिये गौ को पूज्य का स्थान तथा यशशाला और पूजन का स्थान गौ के गोबर से ही पवित्र होता है। इसलिये गौ को पूज्य का मुख और दूध को अमृत की संज्ञा दी गई है। जिससे मन में स्वर्गलोक प्राप्ति की इच्छा होती है, पुरुषोत्तम मास में गौ की सेवा और पूजा करने वाले को वही पुण्य की प्राप्ति होती है। गाय सूर्य की कन्या है। समस्त जनकल्याण और यज्ञ साधन की पूर्ति के लिये ही इसकी उत्पत्ति हुई है। जैसे कि भागीरथी गंगा अति पवित्र व जनकल्याण का कारण है, उसी प्रकार गौ भी पवित्र और जनकल्याणप्रदाय है। हे लक्ष्मी! गौ के महत्व का वर्णन चार मुखवाले ब्रह्माजी भी करने में असमर्थ है।
गौ दान का महात्म्य समस्त दानों से श्रेष्ठ होता है। हे लक्ष्मी! जिस मनुष्य के मन में पुरुषोत्तम मास का अनंत पुण्य की प्राप्ति की इच्छा हो। उनको चाहिये कि अच्छे लक्षणों से युक्त सुशील, युवावस्था और पुष्ट शरीर वाली गौ को वस्त्र और अलंकार से सुशोभित करें यदि सामर्थ्य हो तो गाय के सींग सुवर्ण से तथा खुरचांदी से मड़वाकर श्रद्धापूर्वक विधान से पूजन करके सुपात्र ब्राह्मण को संकल्पपूर्वक दान करे। अधिकमास में किया हुआ गौदान जन्म जन्मांतर के पापों को नष्ट करने वाला, तथा स्वर्गलोक देने वाला होता है। तीनों लोकों में गौदान के पुण्य के समान कोई पुण्य कार्य नहीं है। हे लक्ष्मी! गौदान सुपात्र ब्राह्मण को ही देना चाहिए। सुपात्र ब्राह्मण किसे कहते हैं सो सुनो। जो ब्राह्मण अपने धर्म कर्म में लगा हो। जिसमें शास्त्रों का अध्ययन किया और विद्वान हो। जो ब्राह्मण अपने कुटुंब परिवार का पालन करने वाला, और शांत स्वभाववाला, शुद्ध और सात्त्विक प्रकृति वाला, अपने कुटुंब परिवार का पालन करने वाला, भगवान की भक्ति और सेवा में तत्पर हो वही ब्राह्मण सुपात्र माना जाता है।
ऐसे ब्राह्मण को पुरुषोत्तम मास में गौदान करने से महान पुण्य की प्राप्ति और स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है। इसलिये पुरुषोत्तम मास में गौ की सेवा और पूजा करते हुए, पुष्ट शरीर वाली अधिक दूध देनेवाली बछड़े सहित गौ लाकर धर्म शास्त्रों में बताए हुए, अनुसार वस्त्र अलंकार आदि से सजाकर एकाग्रचित्त से श्रद्धा पूर्वक गौ की पूजा करके सुपात्र ब्राह्मण को बुलाकर ब्राह्मण की भी पूजा करे। पाद्य अर्घ आदि उपचार समर्पित करके वस्त्र अलंकार भी दे और उत्तम प्रकार की खाद्य सामग्रियों का भोजन करावे। तांबूल, फल, दक्षिणा देकर संतुष्ट करे। फिर गाय की पूंछ अपने हाथ में लेकर पत्ती छोड़कर ब्राह्मण के चरणों में और ब्राह्मण के चरणों में प्रणाम करे। अगर कोई ब्राह्मण के हाथ में न छोड़ता जाए यह जल ब्राह्मण के हाथ में में छोड़ता जाए। इस प्रकार के दान से ब्राह्मण को प्रतिग्रहण का दोष नहीं लगता। सुपात्र को दान देने से ही दान का सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है। यह गौ दान पितृलोक में और संसार में भी पुण्य देनेवाला तथा दानकर्ता पुरुष को भी महान फलदायी होता है। ये सारे शास्त्रों में और संसार में गौ दान के सदृश कोई पुण्य कर्म नहीं है। कुपात्र को दिया हुआ दान देने वाले और लेने वाले दोनों को नरक की यातना और कष्ट देने वाला तथा सांसारिक जीवन में दुःख दारिद्रय और अनेक व्याधियों से युक्त होकर महान कष्टदायी होता है। इसलिये कभी भी कुपात्र ब्राह्मण को दान नहीं देना चाहिए। उसी प्रकार दुग्धहीन दूध न देनेवाली अत्यंत दुर्बल शरीरवाली, बांझ, रोगी, वृद्ध, अंधी, लंगड़ी, ऐसी गौ का दान पुण्य की अपेक्षा प्रायश्चित देने वाला होता है, ऐसे दान से दाता अपने पूर्वजोंसहित नरक की यातना भोगता है। इसलिये मनुष्य का कर्तव्य है पुण्य प्राप्ति के निमित्त जब द्रव्य और मानसिक श्रद्धा भावना परिपूर्ण हो तभी श्रद्धापूर्वक गौदान करना चाहिए।
इस प्रकार के दान से ही अनंत पुण्य की प्राप्ति कर सकता है। जैसे अमृत कितना स्वादिष्ट है। आकाश कितना बड़ा है। सूर्य का तेज कितना है। पाताल कितना गहरा है। मेरु पर्वत कितना ऊंचा है। भगवान विष्णु और शंकर कितने प्रतापी और तपस्वी हैं। कामदेव की पति कितनी सुंदर है। इन सबकी उपमा का वर्णन करना असंभव है। उसी प्रकार गौ दान के महात्म्य और फल का वर्णन करना असंभव है। इस महात्म्य के श्रवण मात्र से मनुष्यों के अनेक पाप नष्ट हो जाते हैं।
जे जे श्री अधिकमास महात्म्य सार
(४०)
|| शुभमभवतु ||
Adhik mass ki Katha 9adhyaya|अधिक मास की कथा नौवा अध्याय
Adhik mass ki Katha 9adhyaya|अधिक मास की कथा नौवा अध्याय
।। अथ नवमोऽध्यायः प्रारम्भः ।।
।। श्री गणेशाय नमः ।।
भगवान विष्णु नारद जी से सूतजी शौनकदि ऋषियों से तथा वाल्मीकि ऋषि राजा दृढ़धन्वा से उसके पूर्व जन्म का वृत्तांत बतलाते हुए कहते हैं। हे राजन जब ब्राह्मण सुदेव ने भगवान पुरुषोत्तम से आश्चर्य प्रकट करते हुए प्रश्न किया कि कठिन तपस्या करने के बाद जो वरदान मुझे नहीं प्राप्त हो सका उसे कई गुना अधिक वरदान आपने मुझे अनायास कैसे दे दिया। तब भगवान पुरुषोत्तम कहते हैं हे सुदेव तू नहीं जानता अज्ञानवस्था में तुझसे जो कठिन तपस्या घटित हुई है उसके द्वारा अनंत पुण्य तुझे प्राप्त हुआ और उसी के प्रभाव से मुझे प्रसन्न होकर यह वरदान देना पड़ा। हे सुदेव जो मास तेरे दुःखित अवस्था में व्यतीत हुआ वह मेरा परम प्रिय मास था इसमें थोड़ा भी दुःख किया कर्म अनंत पुण्य देने वाला होता है। तुझ से तो कठिन तपस्या घटित हुई है। पुत्र के दुःख में दुःखित अत्रजल का परित्याग कर निरंतर वर्ष में बैठे रहने से रहने से कठिन तपस्या का पुण्य, अखंड उपवास का पुण्य, और भगवान का नाम लेते रहने से चिंतन भजन का पुण्य, इस पुण्य के समान संसार का कोई भी पुण्य कर्म नहीं है।
बड़े बड़े ऋषि मुनि भी पुण्य प्राप्ति के लिये इस मास में निरंतर आराधना करते रहते हैं। इस समय में समस्त पुण्यात्मा संसार में कोई दूसरा नहीं है। इसी के प्रभाव से तुझे यह वरदान प्राप्त हुआ है। हे सुदेव तेरे जन्मांतर के सभी पाप नष्ट होकर शुद्ध पुण्यात्मा की शक्ति प्राप्त हो गई है। इस पुरुषोत्तम मास की महिमा का वर्णन चार मुख वाले ब्रह्मा भी कह सकने में असमर्थ हो गए है। इतना प्रभावशाली यह पुरुषोत्तम मास है। ऐसा कहकर भगवान पुरुषोत्तम वहां से अदृश्य हो गए। वह ब्राह्मण सुदेव पति और पुत्र के सहित प्रसन्नचित्त होकर भगवान पुरुषोत्तम के पुरुषोत्तम मास की महिमा की प्रशंसा करते हुए अपने आश्रम में आकर सुख पूर्वक गृहस्थ जीवन व्यतीत करने लगा। निरंतर देवकर्म व पितृकर्म करते हुए जब पुरुषोत्तम मास आता बड़ी श्रद्धा से व्रतन्नियम धारण करके व्यतीत करता हजार वर्ष तक जीवित रहकर समयानुसार इस शरीर को त्याग कर ब्रह्मलोक का सुख भोगकर फिर से पृथ्वी पर राजा दृढ़धन्वा के रूप में उत्पन्न हुआ।
हे राजन वही पूर्व जन्म की पत्नि गौतमी इस जन्म में पटरानी के रूप में तुझे प्राप्त हुई है। पूर्व जन्म का पुत्र शुकदेव तोते का रूप धारण कर तुझे उपदेश दे गया है। पिता के ऋण से मुक्त होने के के लिये तुझे सांसारिक विषयों में निसन देखकर संसार रूपी सागर को पार करने के लिये उसने यह सद् उपदेश दिया है कि भगवान की आराधना के बिना आत्मा का उद्धार कैसे होगा यदि मैंने पूर्व जन्म के के लिये इस मार्ग का अनुसरण किया। हे राजन अब तू चिंता मुक्त होकर अपने भविष्य को बनाने के लिये इस मास का अनुसरण किया। अब मैं सूतजी से स्नान के लिये जाता हूँ अपने उद्धार कर ले। ऐसा कहकर ऋषि जाने के लिये उद्यत हुए तभी राजा दृढ़धन्वा ऋषि के चरणों को पकड़ कर कहता है।
कि ऋषिवर आपने जो पुरुषोत्तममास के महात्म्य का वर्णन किया है सो मुझे पूर्वजन्म का स्मरण नहीं है कृपाकर आप यह सब आप विस्तार पूर्वक कहने की कृपा करें कि राजा दृढ़धन्वा के प्रश्न पर वाल्मीकि ऋषि कहते है, हे राजन जैसे प्रश्न तुमने मुझसे किया उसी प्रकार का प्रश्न भगवान विष्णु से लक्ष्मीजी ने किया था। मैं तुमसे विस्तार पूर्वक कहता हूँ, एकाग्र चित होकर सुनो एक समय की बात है। वैकुंठ विहारी भगवान विष्णु प्रसन्नचित अपने मंदिर में बैठे हुए थे ऐसे समय लक्ष्मी जी भगवान से कहती हैं। हे नाथ मेरे आपके मुखारविंद से पुरुषोत्तममास की अनेक प्रशंसा सुनी है, कि इस मास में थोड़ा भी कर्म स्नानदान व्रत आदि करने से अक्षय पुण्य व सुख की प्राप्ति होती है, सो आप कृपाकर यह बताएं कि कौन सा व्रत दान आदि कैसे करना चाहिए आप विस्तार पूर्वक बताने की कृपा करें लक्ष्मी जी के प्रश्न पर भगवान विष्णु प्रसन्न होकर कहते है कि लक्ष्मी तुम धन्य हो जो तुम्हारे मन में पुरुषोत्तम मास के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हुई है। हे लक्ष्मी जो महीना सूर्य की संक्रांति से हीन रहता है अर्थात जिस महीने में सूर्य की संक्रांति नहीं होती उसे उस मास को पुरुषोत्तम मास कहा जाता है।
इस मास के स्वामी गोलोकाधिपति भगवान पुरुषोत्तम हैं। जो हम सब देवताओं के भी स्वामी हैं। इस मास में अपनी शक्ति के अनुसार स्नान, दान, व्रत, जप, तर्पण, पूजा, आराधना, भजनकीर्तन आदि का नियम धारण करना चाहिए। तथा भूमिप्रशयन, तेल का त्याग, एक जति के पत्रावली पर भोजन, मालपूप का दान, नख, केश न काटने का नियम, एक समय भोजन, नित्यदीपदल, जूता चप्पल न पहनने का नियम, किसी एक धान्य का परित्याग, आंवले के चूर्ण से स्नान का नियम, किसी फल का त्याग, नमक का त्याग, तिलपान का दान, सुवर्ण चांदी का दान, गौदान, एक दिन के बाद एकदिन उपवास, हविष्य अन्न खाने का नियम, मौन धारण का नियम, इन में से कोई भी एक अथवा ज्यादा नियम प्रथम दिन से धारण कर मास पर्यंत करना चाहिए, इस प्रकार इस मास में जन्म जन्मांतर के पाप भस्म हो जाते है।
इसमें प्रातः काल उठकर नित्यकर्म शौच, मुख, मार्जन दांतोन आदि करके शुद्ध जल से स्नानकर शुद्ध वस्त्र धारण करके नित्य प्रति का संध्या पूजन करके विद्वान ब्राह्मण को बुलाकर उसका पूजन करके उसकी आज्ञा और क्रम से घर में एकांत और पवित्र स्थानपर गोबर से लीपकर रंगवल्ली से स्थान को सुशोभित करके चौरंगपर सफेद वस्त्र बिछाकर अनाज से अष्ट दल कमल बनाये। उसके उपर अपनी शक्ति के अनुसार चांदी तांबा अथवा पीतल का कलश ८ अंगुल लंबा स्थापित करके उसमें सवापंची पंचपल्लव व सप्त मिट्टी तीर्थ व गंगाजी के जल से पूरित करके पहले वरुण देव का पूजन करके उपर ताम्रपात्र पर राधिका के सहित भगवान कृष्ण की सुवर्ण की मूर्ति को स्थापित करें पहले विद्वान ब्राह्मण के द्वारा विधानपूर्वक प्राण प्रतिष्ठा करके अभिषेक पूजन करे ऋतु में उत्पन्न फूल फल और पूजन सामग्री के द्वारा भगवान पुरुषोत्तम का श्रद्धासहित पूजन करके उत्तम प्रकार के मिष्टान्न का भोग लगाकर तांबूल अर्पण करके आरती करे भगवान को साष्टांग दण्डवत नमस्कार करके मिष्ठान्न का भोग लगाकर त्रुटियों की क्षमा मांगे। संपूर्ण मास पर्यंत जलने वाला अखंडदीप की स्थापना करे।
जैसी शक्ति हो वैसा उपरोक्त कहे गए नियमों में से एक या अधिक नियम धारण करने का संकल्प करके भगवान के सामने हाथ में जल लेकर प्रतिज्ञा करे कि मैं संपूर्ण मास पर्यंत इन नियमों को धारण करता हुआ व्यतीत करूंगा। संकल्प करके भगवान के नामों का उच्चारण करें।
(१) नमः पुरुषोत्तमायाय नमस्ते विश्वभावन।
नमस्तेस्तु हृषीकेश, महापुरुष पूर्वज।
(२) येनेदं अखिलं जातं यंत्र सर्व प्रतिष्ठितम्।
त्वयि मेध्यति यत्रैतत् ते अपरोत्तिम केशवम्।
(३) परेशः परमानंदः परास्पर सरः प्रभुः।
चिद्रूप पश्चितपरज्ञेयो समेकृष्णः प्रसीदतु।
(४) कृष्णं कमल पत्राक्षं रामं रघु कुलोद भवम्।
नृसिंहवामनं विष्णुं स्मरन् याति परांगतिम्।
(५) वासुदेव वाराहंच, कंस केसि निषूदनम्।
पुराण पुरुषं यज्ञ पुरुषं प्रणतोस्म्यहम्।
(६) अनाधि निधनं देवं शंखचक्र गदाधरम्।
त्रिविक्रमं हलधरं प्रणतोस्मि सनातनम्।
(७) सइदं कीर्त योज्नित्यं स्तोत्राणामुक्तमोत्तमम्।
सर्वपाप विनिर्मुक्तते गोलोकं महीयते।
इस मास में ब्रमचर्य धारण कर शुद्ध पवित्र रहकर भगवत संबंधी कथा पुराण का श्रवण करके भजन कीर्तन करते हुए संपूर्ण मास को भक्तिभाव पूर्वक व्यतीत करना चाहिए इस कर्म के पुण्य से पापों का समूह नष्ट होकर समस्त मनोकामनाएं परिपूर्ण होती हैं। सांसारिक सुखों को भोगकर मृत्यु के बाद अक्षयपद अर्थात मोक्ष की प्राप्ति होती है।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
ब्रह्मनारदीय पद्याधारे नवमोऽध्यायः समाप्त।।
(१)
।। शुभमभवतु ।।
Adhik maas ki Katha 1 adhayay| अधिक मास की कथा प्रथम अध्याय
Adhik maas ki Katha 1 adhayay| अधिक मास की कथा प्रथम अध्याय
|| अथ प्रथम अध्यायः ||
|| श्री मन्महागणधिपतये नमः ||
वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्य समप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरुमे देव सर्व कार्येषु सर्वदा ॥
करोड़ों सूर्य के समान कान्तिवाले वक्रतुण्ड वाले ऐसे भगवान गणपति से प्रार्थना है। हमारे समस्त कार्यों को हमेशा विघ्न रहित करके पूर्ण करें।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवेनमः ॥
गुरु ब्रह्मास्वरूप हैं गुरु विष्णु स्वरूप हैं गुरु महादेव स्वरूप हैं गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं जिस गुरु के मार्गदर्शन और ज्ञान प्राप्ति की कृपा से हम ग्रंथ की रचना करते हैं ऐसे गुरु को साष्टांग नमस्कार है।
शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमा माद्यां जगद्व्यापिनीं ।
वीणा पुस्तक धारिणीं अभयदां जाड्यांधकारा पहाम् ।
हस्ते स्फटिक मालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम् ।
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धि प्रदां शारदाम् ॥
आदि शक्ति संपूर्ण संसार को वाणी की शक्ति देने वाली श्वेत वस्त्रों को धारण कर श्वेत कमल पर विराजमान वीणा और पुस्तक धारण करने वाली जडबुद्धि के अंधकार को नष्ट करने वाली, भय को दूर करने वाली हाथ में स्फटिक मणि की माला से सुशोभित विद्या और बुद्धि देने वाली परमेश्वरी भगवती शारदा को हम नमस्कार करते हैं। ग्राम देवता, स्थान देवता, वास्तुदेवता, कुलदेवता, माता-पिता, इष्ट देवता समस्त देवगणों की प्रार्थना कर नमस्कार करते हुए ग्रंथ का प्रारंभ करते हैं।
श्री व्यास जी कहते हैं श्रोतागणों से — हे श्रोतागणों, भगवान के चरणों में श्रद्धा रखने वालों, मोक्ष प्राप्ति के साधन में तत्पर रहने वालों मैं आपकी इच्छानुसार संसार में अल्प प्रयास से महान फल देने वाला भक्ति के सभी प्रयासों में सर्व श्रेष्ठ कहा जाने वाला (जैसे - चारों वेदों में सामवेद सर्व श्रेष्ठ है। नदियों में गंगा जी श्रेष्ठ हैं। पर्वतों में सुमेरु पर्वत श्रेष्ठ है। गायों में कामधेनु श्रेष्ठ है। वर्णों में विप्रवर्ण श्रेष्ठ है। पुराणों में महाभारत पुराण श्रेष्ठ है। इसी प्रकार यह श्रेष्ठ है। जोकि पुरुषोत्तम मास के नाम से संसार में प्रसिद्ध है। एक समय की बात है नैमिसारण्य नाम का जो तपोवन है।
उस तपोवन में ऋषियों के द्वारा प्रारंभ किया गया, ज्ञान-और मोक्ष प्राप्ति के साधन देने वाला यज्ञ हो रहा था। कुछ दिन व्यतीत होने पर समस्त ऋषियों ने ऋषिश्रेष्ठ सूत जी से प्रश्न किया कि हे ऋषिवर हम लोगों ने आपके मुखार बिंद से श्रद्धा और भक्ति संबंधी अनेक ज्ञान की कथाएं सुनी। अब हम आपसे शीघ्र फलदाता तथा मोक्ष प्राप्ति का साधन जानना चाहते हैं। आप तो कथा प्रसंगों में कह चुके हैं कि जीवात्मा को मोक्ष प्राप्ति के लिये अत्यंत कठिन साधन अर्थात् (तपस्या, योग साधना) करना चाहिए। परंतु हे ऋ
षिवर मोक्ष का साधन देने वाला यदि सांसारिक मनुष्य जो कि मायामोह के बंधन में फंसे हुए पारिवारिक विषय वासना में लिप्त हैं। ऐसे लोगों के लिये मोक्ष प्राप्ति का कोई साधन जो कि सर्व-साधारण के लिये सरल हो, बताने की कृपा करें।
ऋषियों के विशेष आग्रह को सुनकर सूत जी बहोत प्रसन्न होकर कहते हैं। हे ऋषियों आप लोग धन्य हैं। जो कि परोपकार करते हुए श्रद्धापूर्वक परमात्मा का यशोगान सुनना चाहते हैं। मैंने अपने गुरु के द्वारा मोक्ष दायिनी, अनंत पुण्य देने वाला सर्व सुलभ और सांसारिक पुरुषों को अत्यंत सरल मार्ग-मोक्ष प्राप्ति का सुना है। वह मैं आपके सामने प्रगट करता हूं। आप लोग एकाग्र चित्त होकर सुनें। जैसा कि प्रश्न आपने मुझसे किया उसी प्रकार नारदजी ने भगवान नारायण से किया तथा- धर्मराज ने भगवान श्रीकृष्ण से किया कि हे महाप्रभों मैंने आपके मुखार बिंद से अनेक धार्मिक प्रसंग सुने आज मैं आपसे सांसारिक मायामोह में फंसे हुए अनेक पाप कर्मों में लिप्त, चौरासी लक्षयोनि में बारंबार जन्म लेने और मृत्यु को प्राप्त होने वाले जीवात्मा को मोक्ष प्राप्ति का साधन बताइये।
|| शुभम् भवतु ||
Adhik maas ki Katha 2 adhyaya| अधिक मास की कथा दूसरा अध्याय
Adhik maas ki Katha 2 adhyaya| अधिक मास की कथा दूसरा अध्याय
व्यास जी कहते हैं -
प्रथम अध्याय के कथानुसार धर्मराज ने श्री कृष्णजी से प्रश्न किया, उनके प्रश्नोत्तर में रुक्मिणी रमण भगवान कृष्ण कहते हैं। हे धर्मराज तुम्हारे प्रश्न का उत्तर अत्यंत गुप्त है। जिसको कि आज तक ऋषियों ने मेरे स्त्री, पुत्र, बंधु बांधव भी नहीं प्राप्त कर सके। परंतु तुम मेरे परम भक्त हो, इसलिये मैं तुमसे इस महान पुण्य और मोक्ष दायक प्रसंग को प्रकट करता हूँ।
हे धर्मराज, संसार में कल्प, काष्ठ, लव, घटी, प्रहर रात्रि दिन प्रदोष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर युग, एवं कुंआ, बावली, झरना, तालब, नदियां, समुद्र, एवं लता, वृक्ष वनस्पति, जड़ें वन, उपवन, ग्राम, पर्वत, शहर, देवताओं के निवास और धाम इन सबका कोई न कोई देवता स्वामी है। और वे सब अपने - अपने निश्चित दिन और समय पर पूजित होते हैं। तथा जन समुदाय के द्वारा हर्ष उल्लास के द्वारा पूजन करने पर उत्तम फल देते हैं। अपने- अपने गुण और अधिकार के कारण वे पूजित होते हैं। तथा इनको अपने स्वामी का आश्रय प्राप्त होने से वे सब सौभाग्य-शाली और संसार में प्रशंसनीय माने जाते हैं।
परंतु हे धर्मराज - इन सबके मध्य एक अधिक महीना ऐसा उत्पन्न हुआ कि जिसका समय आने पर लोग अत्यंत निंदा करते तथा निंदनीय शब्दों का प्रयोग करते हुए उसको मलमास कहते एवं अधिकमास में समस्त शुभ कार्य करना छोड़ देते। क्योंकि यह महीना सूर्य की संक्रांतिहीन होता अर्थात इस महिने में सूर्य की संक्रांति न होने से यज्ञ, उत्सव, विवाह, प्रतिष्ठा, वास्तुकर्म अथवा किसी भी शुभ कार्य को नहीं करते और सभी निंदा करते। इस प्रकार सांसारिक पुरुषों की इसके प्रति अशुभ भावना थी। किसी भी शुभकार्य में वर्जित और लोगों के मन में अपने प्रति हीन व निरादर व्यवहार को देखकर इस अधिकमास के मन में अत्यंत दुःख हुआ। चिंताग्रस्त- और दुःख व्यतीत करते हुए अनेक समय बीत जाने पर जब मानसिक क्लेश असह्य हो गया तो वह विचार करने लगा कि संसार में निंदित होकर जीने से तो अपना नाम ही खत्म कर देना अच्छा है, यदि जीवित रहना है तो यश प्राप्ति के लिये किसी देवता का आश्रय [लेना आवश्यक है।]
प्राप्त करना आवश्यक है। इसके लिये संसार प्रसिद्ध शरणागत की रक्षा करने वाले भगवान विष्णु की शरण में जाकर उनसे प्रार्थना करना ही उत्तम रहेगा। ऐसा विचार निश्चय होते ही अधिक मास शीघ्र ही (वैकुंठ लोक) जहां कि शांत स्वरूप समस्त प्राणियों को जीवनदान देने वाले शरण में आए हुए की रक्षा करने वाले भगवान विष्णु हमेशा विराजमान रहते हैं।
ऐसे वैकुंठलोक में पहुंचकर जहां भगवान का निवास मंदिर है। तथा भगवान विष्णु रत्न जड़ित सिंहासन पर आनंद मग्न विराजमान हैं भगवान के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हुआ। उस समय अधिक मास भय और दुःख से कांप रहा था। तथा उसके नेत्रों से आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी। ऐसी अवस्था में थोड़ी देर खड़ा रहने के बाद अधिकमास अत्यंत कातर और दयनीय वाणी से भगवान से कहता है। हे जगन्नाथ, हे देवताओं के स्वामी, हे शरणागत वत्सल, हे दया के सागर आप मेरी ऐसी हालत देखकर भी चुप क्यों बैठे हैं मेरी रक्षा क्यों नहीं करते। मैं निराश्रित हूँ मेरा कोई स्वामी नहीं है। इसीलिये सांसारिक लोगों ने मेरा नाम (मलमास), रख दिया है। मेरी निंदा करते हैं। मेरा मास आने पर अशुभ कहकर समस्त शुभ कार्यों का त्याग कर देते हैं। हे महाप्रभु ऐसी अवस्था में मैं जीवित नहीं रहना चाहता। आप मुझे अपनी शरण में लेकर मेरी रक्षा करें अथवा इस संसार से मेरा नाम समाप्त कर दें।
हे दीनानाथ, आप तो दया के सागर हैं। गजेंद्र की करुण पुकार को सुनकर आप शीघ्र ही रक्षा करने के लिये दौड़ पड़े थे। अधिक मास के अत्यंत दयनीय वचनों को सुनकर भगवान विष्णु उसपर कृपा दृष्टि करते हुए कहते हैं। हे वत्स तू मेरी शरण में आ गया है अब तू किसी भी प्रकार का दुःख मत कर जो भी मेरी शरण में आ जाता है, मैं उसकी अवश्य रक्षा करता हूँ। मेरा यह वैकुंठ स्थान केवल आनंदमय है। यहां दुःख शोक, भय, मृत्यु कुछ भी नहीं है।
भगवान के ऐसे वचनों को सुनकर अधिक मास के सब दुःख दूर हो गये वह स्वस्थचित और आनंदित हो गया, तथा प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना करने लगा। हे सर्वज्ञ, ब्रह्माण्ड नायक, सबमें विराजमान, सारे संसार का पालन करने वाले जगत् के स्वामी आपसे संसार की कोई बात छिपी हुई नहीं है। आप अंतर्यामी हैं। फिर भी मैं आपसे अपने मन की व्यथा कहता हूँ। संसार में कला, घटी, पल, मूहूर्त दिन, रात्रि, मास, वर्ष, पक्ष, ऋतु, अयन, संवत्सर इस सबका कोई न कोई देवता स्वामी होने से समय समय पर लोगों द्वारा पूजनीय और शुभ कर्म के अधिकारी माने जाते हैं तथा अपने स्वामी [की कृपा से लोगों को आशीर्वाद देकर फलीभूत होकर जन समुदाय में यश और प्रशंसा प्राप्त करते हैं।]
के प्रभाव से लोगों को आशीर्वाद देकर फलीभूत होकर जन समुदाय में यश और प्रशंसा प्राप्त करते हैं। परंतु मैं निराश्रित और मेरा कोई स्वामी न होने से लोग मेरी निंदा करते हैं।
अशुभ और मलमास कहकर समस्त शुभ कार्यों में मेरा परित्याग करते हैं। हे महाप्रभु इसी कारण मेरी ऐसी स्थिती हुई मेरे दुःख का कोई पारवार नहीं होने से मैंने अपने मन में निश्चित कर लिया था कि ऐसा जीवित रहने से मरना ही अच्छा है। यही सोचकर मैं आपकी शरण में आया हूँ कि आप तो भगवान की प्रार्थना करता हुआ मूर्छित होकर गिर पड़ा। इसके गिरते ही भगवान की सभा में विराजमान सभी सदस्य आश्चर्य चकित रह गए कि यहां वैकुंठ धाम में कभी दुःख और शोक व्याप्त नहीं है। फिर भी यह कितना दुःखित जीव है कि यहां आनेपर भी इसका दुःख दूर नहीं हो सका, भगवान ने गरूड़जी को संकेत किया, भगवान की आज्ञा से गरूड़जी अपने पंखों से अधिकमास को हवा करके होश में लाने की कोशिश करने लगे। होश में आते ही भगवान उससे कहते हैं।
हे वत्स, उठ तेरा कल्याण होगा। तेरे समस्त दुःखों का अंत निश्चय होग। तू मेरे साथ गोलोकाधिपति भगवान पुरुषोत्तम के पास चल, वहां गोलोक में भगवान पुरुषोत्तम विराजमान हैं। वे पर ब्रह्म परमात्मा समस्त देवताओं के देवता हैं। वे दो भुजावाले पीतांबरधारी, मुरली धारण करनेवाले, भगवान पुरुषोत्तम अखंड ब्रह्माण्ड नायक हैं। उनकी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। वे चत अचल के स्वामी शरणागत वत्सल, सबके दुःखों को क्षण में नष्ट करने वाले हैं हम सभी देवता हमेशा उनकी वंदना किया करते हैं। वे संसार को उत्पन्न करने वाले, पालन करने वाले और प्रलयकर्ता भी वही हैं। ऐसा कहकर भगवान विष्णु गरूड़जी को गोलोक चलने का संकेत करते हुए अधिकमास को अपने साथ गरूड़ पर बैठाकर गोलोक में पहुंचते हैं।
भगवान कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि हे धर्मराज मैं तुमको गोलोक का वर्णन सुनाता हूँ एकाग्रचित होकर सुनो, गोलोक करोड़ों सूर्य से भी ज्यादा तेजमान है। ज्योतिस्वरूप, अनंत विशाल और स्वेच्छामय है। वह ब्रह्मलोक, विष्णुलोक, शिवलोक के ऊपर है। तीन कोटि योजन का उसका विस्तार है। वह गोल आकृति वाला है। उसमें समस्त भूमि रत्न से जड़ित है। वह स्थान बड़े बड़े महात्मा और ऋषियों को भी अप्राप्य है। भगवान पुरुषोत्तम अपने योगबल से उसको अंतरिक्ष में धारण किये हुए हैं। उसमें असंख्य मंदिर हैं गोलोक के नीचे दक्षिणी ओर सुंदर वैकुंठ लोक है। वह एक कोटियोजन लंबा [और चौड़ा है।]
और चौड़ा है। वह भगवान विष्णु का लोक है। उस लोक में भगवान विष्णु को भक्ति और उपासना करने वाले ऋषि, मुनी, तपस्वी, व सांसारिक गृहस्थ मृत्यु के बाद अपने पुण्य के प्रभाव से वैकुंठ लोक को जाते हैं। वहां चतुर्भुजी स्वरूप पीतांबर धारण करके तेजस्वी स्वरूप होकर अपने पुण्य को कर्म के अनुसार उतने समय तक वैकुंठ सुख भोगकर फिर मनुष्य योनि में जन्म लेते हैं। गोलोक के नीचे बाएं बाजू में शिवलोक है वह एक कोटियोजन लंबा चौड़ा है। वहां भगवान शंकर पार्वती समेत विराजमान रहते हैं। वे भगवान शंकर स्फटिक मणि के समान सुंदर स्वरूप चार भुजावाले सारे शरीर में भस्म का लेपन और नाग का यज्ञोपवीत धारण व्याघ्राम्बर पहने हुए जटा में गंगाजी तथा अर्धचंद्र धारण किए हुए त्रिनेत्र वाले, पार्वती सहित विराजमान रहते हैं। शिवलोक में मृत्यु के बाद ऋषि, मुनि, तपस्वी शंकरजी की उपासना करने वाले सांसारिक पुरुष और स्त्रियां अपने पुण्यकर्म के प्रभाव से निश्चित समय तक आनंद पूर्वक रहकर समय समाप्त होने पर फिर पृथ्वीपर जन्म लेकर शुभकर्म और शंकरजी की आराधना करते हुए जीवन व्यतीत करते हैं।
हे धर्मराज, गोलोक में अनंत ज्योति स्वरूप भगवान पुरुषोत्तम का जो स्वरूप है वह नीले कमल के समान सर्वांग श्यामवर्ण नया उत्पन्न कमल पुष्प के समान कोमल, करोड़ों शरद पूर्णिमा के चंद्र के समान देदीप्यमान, प्रसन्न मुख मद्रावाले धनुष के समान नेत्र और भृकुटी वाले, पीतांबर धारण किए हुए कानों में कुंडल, गले में वैजयंती माला पहने हुए, वनमाला कौस्तुभ माला धारण किए हुए, कस्तूरी का तिलक लगाए हुए, रत्न जड़ित सिंहासन पर विराजमान, हाथों में मुरली धारण किए हुए, अत्यंत सुंदर, करोड़ों कामदेव के समान सुंदर आकर्षित युवा किशोर अवस्था वाले सिंहासन पर विराजमान रहते हैं। ऐसे भगवान पुरुषोत्तम का दर्शन बड़े बड़े ऋषि योगी तपस्वी और यज्ञ करने वालों को भी दुर्लभ होता है। वे ही परब्रह्म परमात्मा हैं सारे संसार का आधार और सबके पालनहार उन्हीं की इच्छा से संसार की उत्पत्ति और प्रलय होता है। वे आदि, मध्य और अंत से रहित हैं। विश्व के पालनहार, अनंतकोटि ब्रह्माण्ड नायक और मोक्षस्वरूप है निर्गुण, निर्विकार, सच्चिदानंद हैं। वे ही जीवात्मा को मोक्ष देने वाले हैं। उनकी उपासना करने वाले मृत्यु के बाद मोक्ष को प्राप्त करके उन्हीं में लीन होकर हमेशा के लिए जन्म मृत्यु और चौरासी लक्ष योनि में भ्रमण करने का दुःख जीवात्मा का हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
हे धर्मराज, अधिकमास को साथ में लिये हुए भगवान विष्णु ने गोलोक में प्रवेश किया। दूर से ही भगवान पुरुषोत्तम का सुंदर मंदिर दिखाई दे रहा था। उसके तेज से अधिकमासकी आंखें चकाचौंध [हो रही थी।]
हो रही थी। वह मंदिर मणि के स्तंभो से बना हुआ बीच सिंहासन पर भगवान पुरुषोत्तम विराजमान थे अपने पीछे पीछे अधिकमास को साथ लेकर मंदगति से भगवान विष्णु वहां पहुंचे। भगवान विष्णु को देखकर द्वारपाल ने उठकर उनका अभिवादन किया प्रेम से उनके चरणों में नमस्कार किया भगवान विष्णुने अधिकमास को साथ में लेकर मंदिर में प्रवेश किया मंदिर के भीतर किशोर अवस्था वाले दिव्य स्वरूप भगवान पुरुषोत्तम रत्न जड़ित सिंहासन पर आनंद मुद्रा में विराजमान थे। उनके सामने पहुंचकर भगवान विष्णु हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे समस्त पार्षद गणों ने उठकर भगवान विष्णु का अभिवादन किया। तथा भगवान पुरुषोत्तम ने अपने सिंहासन के समीप सिंहासन पर बैठने का आग्रह करने पर भगवान विष्णु उसपर विराजमान हो गए विष्णु के पीछे अधिकमास, अश्रु पूरित नेत्रों से थरथर कांपता हुआ दोनों हाथ जोड़कर खड़ा रहा। इस प्रकार भगवान नारायण ने नारदमुनि से सूतजीने शौनकादि ऋषियों से तथा भगवान कृष्ण ने धर्मराज से कहा।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार बृहन्नारदीय पद्याधार पुराण का द्वितीय ऽ अध्यायः समाप्त ॥ (२)