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Adhik mass ki Katha 14 adhyaya | अधिक मास की कथा चौदहवां अध्याय


Adhik mass ki Katha 14 adhyaya | अधिक मास की कथा चौदहवां अध्याय 


 ॥ अथ चतुर्दशोऽध्यायः प्रारंभः ॥

॥ श्री मनमहागणपतये नमः ॥

श्री भगवान नारायण नारदजी से सूतजी शौनकदि ऋषियों से कहते हैं। हे ऋषियों भगवान विष्णु के मुखार बिंदु से दोपदान के माहात्म्य को सुनकर लक्ष्मीजी ने महाप्रभु पुरुषोत्तम मास के माहात्म्य को सुनकर और भी सुनने की इच्छा हो रही है। कृपा करके और भी इतिहास सुनाने की कृपा करें। यह वे लक्ष्मी पुरातन में सौभाग्य नाम का एक नगर था उस नगर के चित्रबाहु नाम का राजा था। वह वीर सत्य प्रतिज्ञावाला महाबुद्धिमान धर्म के कर्म को जाननेवाला परोपकारी, उदार सर्वगुणसंपन्न को सुननेवाला भगवान कृष्ण का परमभक्त था। उसी के समान उसकी पति चंद्रकला भी अत्यंत सुंदर और पतिव्रता थी।

एक समय उस राज्य में अगस्त्य ऋषि भ्रमण करते हुए पहुंचे ऋषि को राजमहल आता देखकर राजा नंगे पैर शीघ्रता से ऋषि के पास पहुंचकर दंडवत नमस्कार करके आदर पूर्वक राजमहल में लाकर उच्च आसन देकर पाद्य अर्घ्य आदि के द्वारा उनका पूजन करके हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए कहे, हे ऋषिवर आज आपने मेरे ऊपर बड़ी कृपा की जो स्वयं पधारकर मुझे दर्शन देकर कृतकृत्य कर दिया मेरा जन्म सफल हो गया। आज का दिन मेरे लिये बड़ा सौभाग्यशाली सिद्ध हुआ है। जो आपके पवित्र चरणों की धूल मुझे प्राप्त हुई है ऋषिवर मैं अपना संपूर्ण राज्य आपको समर्पित करता हूं। मेरे पास ऐसी अदेय वस्तु कोई नहीं है जो मैं आपको न दे सकूं। वैष्णव भक्त ऋषियों की सेवा से जन्म सफल हो जाता है ऐसा गर्ग आदि ऋषियों का मत है।

राजा चित्रबाहु के वचनों को सुनकर ऋषि ने कहा हे राजन तुम धन्य हो और तुम्हारी प्रजा भी धन्य है जो तुम्हारे जैसा भगवान का भक्त राजा उन्हें प्राप्त हुआ। जिस राज्य का राजा विष्णु भक्त ना हो वह राज्य निरर्थक है। जो शरीर नेत्र से हीन है वह निरर्थक है। दांतों के बिना होंठ निरर्थक है। पंख के बिना पक्षी निरर्थक है। नख बिना ब्राह्मण निरर्थक है। दर्भ के बिना संध्यावंदन निरर्थक है।


है। स्नान के बिना व्रत निरर्थक है। उसी प्रकार हे राजन तुम विष्णु के सेवक विष्णु भक्त हो। तुम्हारे आने से तुम अपने राज्य को सफल है। हे राजन तुम्हारा मेरे प्रति समर्पित राज्य में तुम्हीं को देता हूं। मेरी आज्ञा से तुम अपने राज्य को संभालो। मैंने इस राज्य का राजा तुम्हें ही स्थापित किया।

अब मैं अपने आश्रम के लिये प्रस्थान करता हूं तुम्हारा कल्याण हो। ऐसा कहते हुए अगस्त्य ऋषि ने उसे अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दिया और आकर संसार की समस्त पतिव्रता स्त्रियों में तुम्हें प्रथम स्थान प्राप्त हो। राजा चित्रबाहु ने ऋषि अगस्त्य के सम्मुख स्पष्ट कहा है। कृपया कर मुझे यह बताएं कि मैंने पूर्व जन्म में ऐसा कौन सा पुण्य कर्म किया था जिसके प्रभाव से मुझे इस जन्म में अखंड लक्ष्मी, विपुल वैभव, अकंटक राज्य, और पतिव्रता पत्नी प्राप्त हुई है। यह सुनकर ऋषि ने बोला हे राजन तेरे समाधान कर दीजिये। राजा के अनुनय करने पर अगस्त्यऋषि कुछ देर के लिये समाधी लगाकर राजा से बोले हे राजन में तेरी के पूर्व जन्म का हाल जानने की चेष्टा में लगे रहे। फिर समाधी त्यागकर राजा से बोले हे राजन में तेरी इच्छा के अनुसार तेरे पूर्व जन्म का इतिहास कहता हूं। तू पूर्व जन्म में चमत्कारपुर नाम के नगर का वासी था तेरा नाम मणिग्रीव था। जाति से शूद्र था कर्म से अत्यंत दुराचारी था हमेशा, अनेक जीवों की हत्या करना अनेक स्त्रियों का सतीत्व नष्ट करना किसी से द्रव्य आदि लेकर वापस न करना शिष्टाचार न रखना आदि सभी अवगुण थे। और यही तुम्हारी पत्नी चंद्रकला पूर्व जन्म में भी पत्नी थी। मणिग्रीव में जैसे अवगुण थे। उससे विपरीत पति में सभी सद्गुण थे। वह मन कर्म वचन से रातदिन पति की सेवा में लगी रहती। धैर्य धारण करके संकट के समय भी अपने धर्म का पालन करती।

पति के दुष्ट आचरण देखकर भी वह उसको देवता ही समझती और उसको अनेक प्रकार से समझाती। जो पति को अच्छा लगता वही वह आज्ञा का पालन करती। परंतु पति के समझाने का मणिग्रीव पर कोई प्रभाव नहीं होता था। वह निरंतर दुराचरण करता रहता था उसकी दुष्टता इतनी बढ़ गई थी कि समस्त ग्रामवासी और जाति बिरादरी वाले सभी उससे परेशान थे। आखिरकार राजा ने परेशान होकर सभी लोगों द्वारा मणिग्रीव की संपत्ति जब्त कर उसको नगर से बाहर निकाल दिया, राजा की जब्ती के बाद जो कुछ घर आदि सामग्री बची थी उसपर जातिबिरादरी वालों ने अपना अधिकार कर लिया। सभी लोग


उसका तिरस्कार करने लगे। उसका मुख देखना भी लोगों को पसंद नहीं था। इस प्रकार जब सभी तरह से यह मणिग्रीव तिरस्कार हो गया तब ऐसी अवस्था में भी पति उसके साथ पर्वत आचरण करते हुए सेवा में लगी रही थी। आखिर उधर पोषण का कोई मार्ग मणिग्रीव को नहीं दिखाई दिया तब वह जंगल में कंदमूल फलों के द्वारा तथा छोटे छोटे पशु-पक्षियों को मारकर अपना और पति का उधर पोषण करने लगा। इस प्रकार जंगल में रहते हुए बहुत समय बीत गया। एक दिन पशु-पक्षी के शिकार के निमित्त समीप ही छोर जंगल था, वहां उससे प्रवण किया धनुष बाण हाथ में लेकर शिकार ढूंढता हुआ जंगल के मध्य में पहुंचा।

उसी समय उग्रदेव नाम के एक तपस्वी उसी जंगल से प्रयाग की ओर जा रहे थे। परंतु रास्ता भटक जाने से उसी जंगल में बार-बार घूमते रहने से काफी थक गए दोपहर दिन बीत गया। भूख प्यास से तृषित होकर बेहोश होकर बीच जंगल में गिर पड़े। अकस्मात मणिग्रीव शिकार की तलाश में घूमता हुआ उसी जगह पहुंचा ऋषि को बेहोश देखकर मणिग्रीव को दया आ गई उसने ऋषि को उठाकर धीरे धीरे अपनी कुटिया में पहुंचा ऋषि को आंगन में लिटाकर पति से कमल के पत्ते और पानी मंगाकर दोनों नेत्रों में जल लगाने, कमल के पत्ते उनके मस्तक पर रखना इस प्रकार के उपचार कुछ देर तक करते रहने से वे उग्रदेव ऋषि की चेतनता वापस आई। उन्होंने आंखें खोलकर चारों तरफ देखकर आश्चर्य करने लगे कि मैं यह भयंकर जंगल में था यहां कैसे आ गया। इस प्रकार मन में सोचते हुए, उठकर बैठ गए। उनके बैठते ही मणिग्रीव हाथ जोड़कर कहने लगा हे ऋषिवर अब आप स्वस्थ हो गए हैं कृपा करके शीतलताजल में स्नान करिए, नित्यकर्म से निवृत्त होकर फलाहार करें, शुद्ध शीतल जल पीकर विश्राम कीजिए। अब आप यहां पर सुरक्षित है।

किसी प्रकार का भय अपने मन में न रखें आपकी रक्षा का भार मेरे ऊपर है। मेरे साथ चलकर सरोवर में स्नान करें ऐसा कहकर मणिग्रीव ने उनका हाथ पकड़ तालाब के किनारे ले गया, वट वृक्ष के नीचे थोड़ी देर विश्राम करके उन्होंने स्नान किया फिर नित्य नैमित्तिक संध्यावंदन करके तालाब का स्वच्छ जल पीकर वट वृक्ष की छाया में आकर बैठ गए। मणिग्रीव स्त्री को आज्ञा देता है कि अपने आश्रम में जो मैंने कंद मूल फल लाकर रखे हैं उनको ले आओ। पति की आज्ञा से पति ने शीघ्र जाकर आश्रम


से पके हुए फल कंद मूल आदि लाकर ऋषि के सामने रख दिया। तब मणिग्रीव उनसे प्रार्थना करता है हे ऋषिवर आपके दर्शन होने से हमारा जीवन सफल हो गया हमारे सभी पाप भस्म हो गए हमारे आश्रम में आने से आश्रम पवित्र हो गया। आप कृपया करके फलों को खाकर हमको कृतार्थ करो। मणिग्रीव के आग्रह को सुनकर ऋषि कहते है कि तुम कौन हो अपना परिचय दो। बिना परिचय के किसी का दिया हुआ कुछ भी नहीं ग्रहण चाहिए ऐसा विद्वानों का मत है। ऋषि के पूछने पर मणिग्रीव कहता है हे ऋषिवर मेरा नाम मणिग्रीव है मैं जाति से शूद्र हूं दुष्ट आचरण के द्वारा मैंने जाति बांधवों ने मेरा परित्याग कर दिया। इसीलिये मैं जंगल में रहता हूं। इससे शांत होने से मनको समाधान हुआ पके आम आदि फलों को खाया फिर से तालाब का जल पिया, सुधा शांत होने से मनको धीरे धीरे दबाने लगा और पूछने लगा हे ऋषिवर आपका आगमन कहां से हुआ आप कहां जा रहे है। ऐसे भयंकर जंगल में जहां बड़े हिंस्र पशु रहते है। कहीं पानी का ठिकाना नहीं है। कैसे आप पहुंच गए।

ऋषि कहते है हे मणिग्रीव मेरा नाम अगस्त है मैं जाति से ब्राह्मण हूं प्रयागराज की यात्रा को जा रहा था यहां जंगल में रास्ता भूल जाने से भटक गया था रास्ता पूछने के लिये कोई दिखता नहीं था। आखिर सही मार्ग की खोज में मध्याह्न तक घूमता हुआ थक गया प्यास से व्याकुल हो गया था। मेरी ऐसी अवस्था हो गई कि अब प्राण निकलने है और मैं मूर्छित हो गया था। मेरे पूर्वजन्म का पुण्य था अद्य अभी शेष थी इसीलिये में तुम्हें मिल गया तुम पति पत्नि दोनों ने मेरी सेवा की मुझे जीवन दान दिया। मैं इस उपकार के बदले तुम दोनों को क्या दू मेरे पास तो आशीर्वाद के सिवा कुछ भी नहीं है। पहले तुम यह बताओ कि तुम दोनों पति पत्नि ऐसे भयंकर जंगल में क्यों रहते हो। अपने दुःख का कारण बताओ। जो संभव है मैं तुम्हारे कुछ दुःख दूर करने में सहायता दे सकूं ऋषि के ऐसा पूछने पर मणिग्रीव ने अपने जीवन की संपूर्ण गाथा ऋषि को सुना दी।

।। जे जे श्री अधिकमास माहात्म्य सार

(१४)

वृहत्नारदीय पद्माधारे चतुर्दशोऽध्यायः समाप्त ।।

।। शुभमभवतु ।।

५७






Adhik mass ki Katha 12 adhyaya | अधिक मास की कथा बारहवां अध्याय


Adhik mass ki Katha 12 adhyaya | अधिक मास की कथा बारहवां अध्याय 




 ।। अथ द्वादशोऽध्यायः प्रारम्भः ।।

।। श्री गणपतये नमः ।।

भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी सौनकादि ऋषियों से, वाल्मीकि ऋषि राजा दृढ़धन्वा से तथा लक्ष्मीजी ने कहा है, हे प्राणनाथ, आपके मुखारविंद से पुरुषोत्तममास के माहात्म्य को सुनकर उत्तरारा इच्छा प्रबल होती जा रही है। अब आप कृपा कर यह बताएं कि दीप दान का क्या फल प्राप्त होता है तथा दीपक में बत्ती और सामग्री का कौन सा उपयोग करना चाहिए। इसके प्रथम किसका किया, कौन से पुण्य की प्राप्ति की, सो में तुमसे कहता हूं। समस्त पापों से छुटकारा पाने के लिए महापाप जैसे ब्राह्मण हत्या, कुल परिवार की हत्या, गुरु की हत्या, झूठी गवाही देने का पाप, स्त्री की हत्या आदि महापापों को नष्ट करने वाला, आत्मा की शुद्धि करने वाला, मृत्यु के बाद देवलोक और मोक्ष को देनेवाला यह दीपदान और अखण्ड दीप का पुण्यकर्म होता है।

जो भी इस शुभकर्म को करने की इच्छा रखते हों उनको चाहिये जिस दिन पुरुषोत्तममास प्रारम्भ होता है अर्थात शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या पर्यंत संपूर्ण मास इस कर्म को करता रहे। इसका नियम इस प्रकार है। शुक्ल प्रतिपदा को प्रातः सूर्योदय के पहले उठकर शौच मुख मार्जन आदि क्रियाओं से निवृत्त होकर संगम नदी, कुंआ, तालाब के समीप जाकर स्नान करें। स्नान के अनेक फल है जैसे ठंडे जल से स्नान साधारण जल से दुगुना फलदायी होता है। कुंए के जल का स्नान चौगुना फल देने वाला, बांवली के जल का स्नान आठगुणा फल देनेवाला, तालाब के जल का स्नान दस गुणा फल देने वाला, महानदी का स्नान उससे दस गुणा फल दाता, नदी का स्नान उससे दस गुणा फलदाता, जिसको जैसा साधन प्राप्त हो वैसे साधन से स्नान करना चाहिए। आंवले के चूर्ण में गोमूत्र मिलाकर स्नान अत्यंत पवित्रता देने वाला होता है।


देव देव, हृषीकेश सुरसुर नमस्कृत। पापक्षयाय मासेऽस्मिन् - स्नानार्थमहमागताः।।

अर्थात : हे देवाधिदेव हृषीकेश आप देवताओं के देवता हैं। पापक्षय के निमित्त में स्नान कर रहा हूं आपको नमस्कार है। यह प्रार्थना करते हुए स्नान करना चाहिये विशुद्ध अंतःकरण से पुष्कर आदि अनेक तीर्थों के नामों का स्मरण करें (गंगा सावित्री नलिनी भागीरथी सीता मालती त्रिपथगामिनी हेमवती जाह्नवी त्रिदेशेश्वरी) आदि नामों का उच्चारण स्मरण करे। और शुद्ध वस्त्रों को धारण करे। हे लक्ष्मी प्रथम दिन का स्नान अनेक पापों को नष्ट कर देता है। (अर्ध मास) पंद्रह दिन का स्नान सात जन्म के पापों को नष्ट करने वाला और संपूर्ण मास का स्नान हजार जन्म के पापों को नष्ट कर देता है। हे लक्ष्मी अंधकार तभी तक रहता है, जब तक सूर्य का उदय नहीं होता। हाथी मदमस्त तभी तक रहता है, जब तक सिंह की गर्जना नहीं सुनता। समुद्र सर्प तभी तक फुफकारता है, जब तक गरुड़ के दर्शन नहीं होते। इसी प्रकार पापों का समूह मनुष्यों को तभी तक घेरकर रखता है।

जब तक पुरुषोत्तममास का पुण्य प्राप्त नहीं होता। जो पुरुषोत्तममास में पुण्य प्राप्ति का प्रयास नहीं करते। वे जन्म जन्मांतर तक दुःख दारिद्र्य आदि कष्ट भोगते रहते हैं। इसलिये हे लक्ष्मी मनुष्य को चाहिये कि पुरुषोत्तममास अंतयेर अपनी श्रद्धा और शारीरिक शक्ति के अनुसार स्नान, दीपदान, अखण्ड दीप की स्थापना, व्रत, नियम का धारण आदि अनेक प्रकार के करने योग्य कर्मों को अवश्य करना चाहिए। मनुष्य को आयु कोई निश्चित न रहने से आनेवाले समय पर निर्भर न रहकर मोक्ष की इच्छा रखने वालों को पुरुषोत्तममास व्यर्थ ही नहीं बिताना चाहिये। जो लोग इस अनंत पुण्यदाता मास को व्यर्थ ही बिता देते हैं, उनके संपन्न चाहिये, जैसे किसी को अमृत से भरा हुआ घड़ा मिल जाय परंतु भाग्य में न रहने से उस घड़े में साधारण जल भरा हुआ है ऐसा समझकर उस पानी को फेंक देता है। इसी प्रकार किसी को चिंतामणि रत्न प्राप्त होते पर उसको साधारण पत्थर समझकर फेंक देता है। कल्पधेनु गौ दरवाजे पर आनेपर साधारण गाय समझकर भगा देता है।


समझकर उछाहकर फेंक देता है। उसी प्रकार दुर्भाग्य होते से मनुष्य पुरुषोत्तम मास के माहात्म्य को न समझकर व्यर्थ ही बिता देता है। हे लक्ष्मी स्नान करके शुद्ध वस्त्रों को धारण कर नित्यकर्म स्थापनार्थ का पूजन करके भगवान पुरुषोत्तम की पूजा करना चाहिये। उसमें सात धागे की बत्ती लगाकर घी या तेल जैसी सुविधा हो, दीप पात्र में भरकर प्रज्वलित करना (जलाना) चाहिये। फिर उस दीप ज्योति का पूजन करके हाथ जोड़कर ज्योतिषस्वरूप से प्रार्थना करना चाहिए। मैंने जिस इच्छा से अखंड दीप प्रज्वलित किया है वह मलोकामना परिपूर्ण होकर मेरा मानसिक अंधकार दूर हो। हे महापभु पुरुषोत्तम देव में मायापिशमयी अज्ञान अंधकार में डूबा हुआ हूं, इससे मेरा उद्धार करें मेरे इस पुण्य कर्म के द्वारा मुझे मोक्ष की प्राप्ति दें। इस प्रकार भगवान से प्रार्थना करके भगवान के नामों का संकीर्तन भजन, पुराणों की कथा का श्रवण आदि शुभकर्मों को करते हुए, संपूर्ण मास को श्रद्धा पूर्वक व्यतीत करें। भगवान पुरुषोत्तम का नित्य पूजन तथा अखंडदीप का भी नित्य पूजन करना चाहिए। इस मास में नित्य प्रति अपनी प्राप्ति के अनुसार अन्न, वस्त्र, सुवर्ण, तिलपात्र आदि का दान, गौदान, दीपदान आदि अनेकदान करना चाहिए। हे लक्ष्मी इन कर्मों को करने से मनुष्य अपने जीवन में सुख सौभाग्य संतति आरोग्य प्राप्त करके मृत्यु के बाद मोक्ष प्राप्त करता है।

हे लक्ष्मी इस दीपदान के पुण्य प्रभाव से ब्राह्मण ब्रह्मज्ञान को, क्षत्रिय राज्य को, वैश्य अतुल संपत्ति को तथा शूद्र अनेक सुखों को प्राप्त करता है। कुंवारी कन्या सुंदर पति, सुहागिन स्त्री अखंड सौभाग्य, कीर्ति प्राप्त होती है। हे लक्ष्मी जो लोग इस मास में अखंडदीप प्रज्वलित करते हैं तथा नित्यदीपदान करते हैं तथा दूसरों को भी इस पुण्यकार्य के लिये प्रेरित करते हैं। वे देवताओं को भी दुर्लभ ऐसे पुण्य के भागीदार होते हैं। हे लक्ष्मी इस विषय का एक पुरातन इतिहास में तुमसे कहता हूं। सरस्वती नदी के किनारे सुशर्मा नाम का एक ब्राह्मण भिक्षावृत्ति के द्वारा अपने कुटुंब का जीवन निर्वाह करता था। पुरुषोत्तम मास प्रारंभ होते ही वह व्यक्ति व्यतीत करता था। जिस स्थानपर अखंडदीप स्थापित था वहां चूहे आया जाया करते थे। तथा चूहों को पकड़ने के लोभ में बिल्ली भी आया करती थी।


एक समय एकादशी के दिन सुशर्मा ब्राह्मण ने भगवान पुरुषोत्तम का पूजन करके व्रत करते हुए रात्रि जागरण के निमित्त भगवान के नामों का संकीर्तन करता हुआ बैठा था। मध्यरात्रि का समय था चूहे पकड़ने के लिये बिल्ली बैठी हुई थी ऐसे समय दीपक की बत्ती पर गुल छा जाने से प्रकाश धीमा पड़ गया उसी समय चूहे के आने से बिल्ली ने चूहा पकड़ने के लिये छलांग लगाई छलांग लगाने पर बिल्ली का पैर दीपक से टकरा गया जिससे दीपक का गुल झड़कर दीपक प्रकाशमान होकर जलने लगा। प्रातः काल किसी कारण वश उस बिल्ली की मृत्यु हो गई। ब्राह्मण सुशर्मा थी इसलोक में अनेक सुख भोगकर मृत्यु के बाद मोक्ष को प्राप्त हो गया। इसी प्रकार कई लोगों का उद्धार दीपदान के द्वारा हो चुका है।

जै जै श्री अधिकमास महात्म्य सार

(१२)

।। शुभमभवतु ।।

५०






Adhik mass ki Katha 8 adhyaya| अधिक मास की कथा आठवां अध्याय

 

Adhik mass ki Katha 8 adhyaya| अधिक मास की कथा आठवां अध्याय 




 ॥ अथ अष्टमोऽध्यायः प्रारंभः ॥

।। श्री गणधिपतये नमः ।।

व्यासजी श्रोतागणों से तथा सूतजी शौनकादि ऋषियों से, भगवान् नारायण नारदजी से कहते हैं, हे नारद कल के कथा प्रसंग में वाल्मीकि ऋषि राजा दृढ़धन्वा से उसके पूर्व जन्म का इतिहास सुनाते हुए कहते हैं कि हे राजन् पत्नि गौतमी के वचनों को सुनकर ब्राह्मण को कुछ संतोष हुआ दुःख का परित्याग करके मन में धैर्य धारण करके वह ब्राह्मण सुदेव अपने नित्य नैमित्तिक परिचर्या में लग गया। जो होनेवाला है वह निश्चित ही होगा उसको कोई टाल नहीं सकता। उसको गरुड़जी के वाक्य याद आ गए कि आपत्ति व्याधी दुःख आरोप भगवान्‌की सेवा मनन चिंतन कभी मत छोड़ना भगवान के द्वारा ही समस्त दुःख नष्ट होकर सुख की प्राप्ति होती है। इस परम वाक्य को मन में धारण करके भगवान की आराधना करते हुए अपनी दिनचर्या में संलग्न रहने लगा।

इस प्रकार कुछ समय और बीत गया जब उस बालक की उम्र ने बारहवें वर्ष में प्रवेश किया ऐसे ही एक समय की बात है ग्रीष्म ऋतु का समय था आश्रम के आसपास फूलों के वृक्ष सूख जाने से पूजन के लिये समिधा, कुशा, और फूल लाने वह ब्राह्मण वन में गया हुआ था और पत्नि गृहकार्य में व्यस्त थी। बालक शुकदेव बराबरी के लड़कों के साथ जलक्रीड़ा करने बावली पर गया जल में प्रवेश करने पर बालकों को ग्रीष्म ऋतु के कारण बहुत आनंद आने लगा वे एक दूसरे पर पानी उछालते एक दूसरे का हाथ पकड़कर इधर से उधर खींचते कोई पानी में डुबकी लगाकर किसी का पैर पकड़ कर पानी के भीतर खींचते इस तरह अनेक प्रकार की जलक्रीड़ा करने लगे इस तरह पानी का खेल खेलते हुए काफी समय बीत गया, थकावट आने लगी परंतु बाहर भयानक गर्मी होने से पानी से बाहर निकलने की इच्छा भी नहीं होती थी।

इस प्रकार थकावट में शरीर शिथिल होने पर भी बालक शुकदेव ने श्वासरोककर पानी में घुसकर अपने मित्र का पैर पकड़कर गहरे पानी में खींचकर ले गया नीचे पानी के तलपर पहुंचते ही रोका हुआ श्वास छूट गया और पानी उसके पेट में भर जाने से प्राण निकल गया। मित्रवर्ग शुकदेव को ऊपर न आया देखकर भयभीत हो गए और बावली से बाहर निकलकर चिल्लाते भागते हुए माता गौतमी के पास आए।

जाकर शुकदेव का पानी में डूबने का दुःखद समाचार सुना दिया। सुनते ही गौतमी हाहाकार करती हुई मूर्छित होकर गिर पड़ी। उसी समय ब्राह्मण सुदेव भी वन से वापस आ गया आते ही पुत्र के मरण का समाचार सुनकर कटे हुए वृक्ष के समान पृथ्वी पर गिरकर बेहोश हो गया। थोड़ी देर के बाद जब पत्नि पति की मूर्च्छा दूर हुई तब दोनों हाहाकार करके दौड़ते हुए बावली की ओर भागे। तब तक बालक शुकदेव का मृत शरीर पानी से फूलकर ऊपर तैर रहा था। दोनों ने बालक के शरीर को बावली के बाहर लाकर गोद में रखकर आलिंगन करते हुए बार-बार मुख चूमते हुए रुदन करने लगे।

ब्राह्मण सुदेव कहता है कि हे पुत्र तू निद्रा त्याग कर जल्दी से उठ, मुझसे बात कर, आंखें खोलकर हमारी तरफ देख, तेरे शब्दों को सुनने के लिये हम अधीर हो रहे हैं। इस वृद्धावस्था में हम दोनों को छोड़कर जाना उचित नहीं है। देख तेरे मित्र तुझे अध्ययन करने के लिये बुला रहे हैं। हम तुझे छोड़कर अब आश्रम भी नहीं जाएंगे हमको घर जाने का कोई मतलब नहीं है। हमारे लिये घर अब जंगल के समान दिखाई देता है। हे भगवान मैंने कोई ब्रह्म हत्या नहीं की आज तक कोई पाप कर्म नहीं किया फिर किस कर्म का फल मुझे भोगना पड़ रहा है कि मुझे बालक की मृत्यु देखनी पड़ी है भगवान् में वृद्ध असहाय हूं मेरा सिर्फ एक पुत्र ही सहारा था उसको तुमने मुझ से छीन लिया अब मैं किसका सहारा करूं। हे भगवान आप तो बड़े दयालु प्रसिद्ध हो।

फिर मेरे लिये ऐसी कठोरता क्यों कर रहे हो। ब्राह्मण अनेक प्रकार से रोते हुए विलाप करता हुआ कहता मेघों से पानी गिरता है पानी से पृथ्वी अन्न उत्पन्न करती है। भूमि में अनेक प्रकार के रत्न मिलते हैं। सागर से मोती प्राप्त होते हैं परंतु ऐसा कोई स्थान नहीं दिखता जहां से मेरा मृत पुत्र जीवित प्राप्त हो जाय। हे पुत्र तू भी मेरे ऊपर दया नहीं करता एक बार तो हमसे बात कर देख तेरी माता किस प्रकार बिलख बिलखकर रो रही है। आज तक तू कभी हमसे पूछे बिना कहीं नहीं गया, कभी वेदाध्ययन में नागा नहीं किया फिर तू आज इतना निष्ठुर क्यों हो गया। तेरे वे मीठे वचन अब कहां सुनने को मिलेंगे। मेरा हृदय भी कितना कठोर है, मुझे धिक्कार है बालक मृत देखकर भी मेरे प्राण नहीं निकल रहे। वे राजा दशरथ धन्य हैं। जिन्होंने पुत्र को वनवास जाता देखकर अपने प्राणों का परित्याग कर दिया। मैं दुःख की अग्नि में जल रहा हूं परंतु मेरे प्राण नहीं निकल रहे। हे देवाधिदेव हे जगन्नाथ दोनों पर दया करने वाले लक्ष्मीपति वैकुंठाधिपति आपके सिवा अब मेरी रक्षा करने वाला कोई नहीं है। तीनों लोक में मेरे समान मूर्ख और दुर्भागी कोई नहीं होगा। जो मैंने भगवान के वचनों को न मानकर पुत्र के लिये जिद कि अगर मैं उनका कहना मान लेता तो मुझे यह दिन क्यों देखना पड़ता।

यह दुःखित और रोते हुए पति पत्नि पुत्र के मृत शरीर को गोद में लेकर वहीं बैठे रहे। उन्होंने निश्चित कर लिया कि अब हम जीवित रहकर क्या करेंगे, यहीं बैठे बैठे अपने प्राणों का परित्याग कर देंगे। अकस्मात आकाश में बादल घिर गए, गर्जना होने लगी, बिजली कड़कने लगी और भयंकर बरसात होने लगी। आंधी चलने से बड़े बड़े वृक्ष उखड़कर गिर गए। ऐसा भयंकर प्रकृति का उन्माद होने पर भी ब्राह्मण पति पत्नि दुःखित रोते हुए अचल जल का परित्याग कर बैठे हुए कभी अपने भाग्य को कोसते कभी पुत्र का आलिंगन करते कभी देवाधिदेव भगवान से अपने दुःख का वर्णन करते हुए दया की भीख मांगते हुए उनको चालीस दिन का समय बीत गया कब सूर्य उदय हुआ कब अस्त हुआ इसका भी उनको ज्ञान नहीं था। भाग्यवश वह समय पुरुषोत्तम का संपूर्ण मास था जो ब्राह्मण ने दुःखमय पुत्र शोक में अन्नजल का परित्याग कर व्यतीत किया था।

परम प्रिय भगवान्पुरुषोत्तम का अत्यंत अनंत पुण्य दाता मास में अज्ञातवस्था में ब्राह्मण के द्वारा जो कठिन तपस्या घटित हुई उसके द्वारा भगवान् पुरुषोत्तम प्रसन्न होकर ब्राह्मण के समक्ष प्रगट हुए उस समय भगवान का स्वरूप नवीन मेघ के समान पीतांबर धारण किए हुए दो भुजावाले मुरली धारण किए हुए गले में वनमाला सुशोभित हो रही है। ऐसी सुंदर आकृति और स्वरूप में प्रगट हुए। भगवान के सुंदर स्वरूप को देखकर ब्राह्मण गोद से बालक का मृत शरीर जमीन पर रखकर प्रसन्नमुख बारंबार दंडवत करता हुआ हांथ जोड़कर खड़ा हुआ। दया के सागर मोक्ष के दाता भगवान पुरुषोत्तम उससे कहते हैं हे ब्राह्मण तू धन्य है, बड़ा भाग्यशाली है तूने जो इस पुरुषोत्तम मास में कठिन तपस्या की है उससे मैं बहुत प्रसन्न हूं। हे ब्राह्मण तेरा यह मृत पुत्र जीवित होकर इसकी आयु बारह हजार वर्ष की होगी।

पुत्र सुख के अलावा और भी बहुत सांसारिक सुख तुझे प्राप्त होंगे। इस पुत्र के साथ गृहस्थ सुख भोगकर इस शरीर को छोड़ने के बाद तुझे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होगी। वहां बारह हजार वर्ष सुख भोगने पर पृथ्वी पर मनुष्य योनि में जन्म होगा। इस संसार में राजा दृढ़धन्वा के नाम से प्रसिद्ध होकर धन, बल, वाहन, संपत्ति, राज, ऐश्वर्य दिन प्रतिदिन बढ़कर चक्रवर्ती राजा के रूप में प्रख्यात होगा। यही पत्नि दूसरे जन्म में तेरी पटरानी होगी। सर्वगुण संपन्न सुंदर चारपुत्र और एक कन्या होगी अनेक दिन राजसुख में निमग्न व्यतीत होंगे। सांसारिक विषय में निमग्न होने से भगवान का स्मरण भूल सा जायेगा। तब यही तेरा पुत्र तोता का शरीर धारण कर वट वृक्ष पर बैठकर मनुष्य वाणी में तुझे उपदेश देकर सचेत करेगा।

इसके वाक्यों को सुनकर तुझे वैराग्य उत्पन्न होकर चिंताग्रस्त रहेगा। तब वाल्मीकि ऋषि के द्वारा यथार्थ ज्ञान प्राप्त करके तू भगवान की सेवा में लिप्त होगा तथा समयावधि के अनुसार मोक्ष को प्राप्त करेगा। इस प्रकार का वरदान देते ही ब्राह्मण का मृतपुत्र जीवित होकर मातापिता तथा भगवान के चरणों को प्रणाम करके प्रसन्न मुख स्वस्थ हो गया।

भगवान पुरुषोत्तम के द्वारा प्राप्त वरदान तथा जीवित पुत्र को देखकर ब्राह्मण पति पत्नि अत्यंत प्रसन्न होकर बारंबार भगवान के चरणों में प्रणाम करते हुए हांथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए कहते हैं हे महाप्रभु दीन दयालु कृपाकर मेरे मानसिक संदेह को दूर करने की कृपा करें। हे ऋषिकेश मैंने चार हजार वर्ष तक कठिन तपस्या की जिससे भगवान विष्णु प्रसन्न होकर वरदान देने के लिये प्रगट हुए। मैंने पुत्र प्राप्ति का वरदान मांगा तो उन्होंने कहा तेरे प्रारब्ध में सात जन्म तक पुत्र का सुख नहीं है। सो हे महाप्रभु आज मैं देख रहा हूं मेरा मृत पुत्र भी जीवित हो गया और आपने ब्रह्मलोक का सुख दूसरे जन्म में मुझे अखंड चक्रवर्ती राज्य, चार पुत्र एक कन्या और संसार के सभी सुखों का वरदान बिना किसी तपस्या व आराधना के आपने मुझे क्यों दे दिया। यह सब देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है। कृपा करके मेरे मानसिक संदेह को दूर कर दीजिये। इस प्रकार वह ब्राह्मण सुदेव भगवान पुरुषोत्तम से प्रार्थना करता हुआ हाथ जोड़कर खड़ा रहा।

जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार बृहन्नारदीय

पद्याधारे अष्टमो s अध्यायः समाप्त ॥

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॥ शुभंभवतु ॥