trimbakeshwar jyotirlinga katha | त्रंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा
प्राचीन काल की बात है, जब भारत की भूमि ऋषियों के तपोबल से ओतप्रोत थी। नासिक के निकट स्थित ब्रह्मगिरि पर्वत की वादियों में महर्षि गौतम अपनी धर्मपत्नी अहिल्या के साथ निवास करते थे। वह समय बड़ा ही कठिन था, क्योंकि वरुण देव के कोप के कारण पूरी पृथ्वी पर सौ वर्षों का भीषण अकाल पड़ा था। नदियां सूख चुकी थीं और हरियाली का नामोनिशान मिट गया था। ऐसी विकट परिस्थिति में महर्षि गौतम ने अपनी तपस्या से वरुण देव को प्रसन्न किया और एक अक्षय जल कुंड प्राप्त किया। इस कुंड की विशेषता यह थी कि इसका जल कभी समाप्त नहीं होता था।
महर्षि गौतम ने उस दिव्य जल का उपयोग केवल प्यास बुझाने के लिए नहीं, बल्कि परोपकार के लिए किया। उन्होंने अपने तपोबल से प्रतिदिन अनाज उगाया और अकाल से पीड़ित अन्य ऋषियों और उनके परिवारों को शरण दी। धीरे-धीरे गौतम ऋषि का आश्रम एक विशाल अन्नक्षेत्र बन गया। जहाँ लोग भूख से मर रहे थे, वहाँ गौतम ऋषि के सान्निध्य में सभी सुखी थे। लेकिन कहते हैं न कि मनुष्य की ईर्ष्या कभी-कभी उसके विवेक पर भारी पड़ जाती है। आश्रम में शरण लेने वाले कुछ ऋषियों के मन में महर्षि गौतम की बढ़ती ख्याति को देखकर द्वेष उत्पन्न हो गया। उन्होंने मिलकर गौतम ऋषि को अपमानित करने और उन्हें वहां से निकालने का षड्यंत्र रचा।
इन ऋषियों ने भगवान गणेश की आराधना की और उनसे वरदान माँगा कि गौतम ऋषि पर कोई ऐसा लांछन लगे जिससे उन्हें यह स्थान छोड़ना पड़े। गणेश जी ने उन्हें बहुत समझाया कि उपकारी के साथ छल करना पाप है, परंतु ऋषियों के दुराग्रह के कारण उन्हें एक लीला रचनी पड़ी। गणेश जी ने एक अत्यंत दुर्बल और मरणासन्न गाय का रूप धारण किया और महर्षि गौतम के जौ के खेत में जाकर चरने लगे। जब महर्षि ने अपनी फसल को बचाने के लिए हाथ में एक कोमल तिनका लेकर उस गाय को धीरे से पुचकारा, तो स्पर्श मात्र से वह मायावी गाय वहीं गिर पड़ी और उसने प्राण त्याग दिए।
छिपे हुए ऋषियों ने तुरंत बाहर आकर शोर मचा दिया और महर्षि गौतम पर 'गौ-हत्या' का घोर कलंक लगा दिया। समाज से बहिष्कृत होने के बाद, आत्मग्लानि से भरे गौतम ऋषि ने इस पाप से मुक्ति का मार्ग पूछा। कुटिल ऋषियों ने उनके सामने असंभव शर्तें रख दीं—पूरी पृथ्वी की परिक्रमा, ब्रह्मगिरि के फेरे और अंत में स्वर्ग से गंगा को धरती पर लाना, ताकि उनके जल से शुद्धि हो सके। महर्षि गौतम ने इसे ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार कर लिया। उन्होंने और माता अहिल्या ने भगवान शिव की कठोर आराधना शुरू की।
उनकी निश्छल भक्ति और वर्षों के तप से प्रसन्न होकर महादेव साक्षात प्रकट हुए। शिव जी ने गौतम ऋषि को बताया कि वे निर्दोष हैं और यह सब उन ऋषियों का षड्यंत्र था। महादेव उन ऋषियों को दंड देना चाहते थे, लेकिन क्षमाशील महर्षि गौतम ने उनके पैर पकड़ लिए और कहा कि प्रभु, उन ऋषियों का आभार है जिनकी वजह से मुझे आपके दर्शन प्राप्त हुए। उन्होंने महादेव से प्रार्थना की कि वे गंगा माता को वहां भेज दें। तब शिव जी ने अपनी जटाओं को झटका, जिससे गंगा की धारा वहां प्रकट हुई, जिसे आज हम गोदावरी के नाम से जानते हैं।
गंगा जी ने शर्त रखी कि वह तभी वहां रुकेंगी जब महादेव भी वहां निवास करेंगे। देवताओं की स्तुति और भक्तों के कल्याण के लिए भगवान शिव वहां 'त्र्यंबकेश्वर' के रूप में विराजमान हो गए। यहाँ के ज्योतिर्लिंग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश, तीनों देवों के छोटे लिंग समाहित हैं, जो त्रिदेवों की एकता का प्रतीक हैं। यह पावन कथा हमें सिखाती है कि सत्य और धैर्य के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति का साथ स्वयं ईश्वर देते हैं और अंततः सत्य की ही विजय होती है। आज भी त्र्यंबकेश्वर की यह पावन धरती भक्तों को पापमुक्त कर उन्हें आध्यात्मिक शांति प्रदान करती है।
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