(तर्ज : खड़ी नीम के नीचे एक ली)
बिना भजन आ काया कांई काम री
क्यूँ भटके हे बावला, ले ओर प्रभु रे नाम री।
ओ तन है माटी रो पुतलो, माटी म लि जावलो।
जैसी करणी करसी बावला, वैसी हो तूं पाँवलो।
जिण पर करे गुमान आ धरी काया खाली नाम री।
क्यूँ भटके हे
थारो म्हारो छोड़ नहीं तो, अन्त समय पछतावरी। -२
दिन उगयोड़ो सूरज ज्यूं तूं सांझा हुया ढल ज्यावलो। -२
कुण जाणे हे आवन वाले शाम की।
क्यूँ भटके है
अनमोले री परख ना जाणी, फिर क्यूं तू इतरायो है
पुण्य कमाई छोड़ बावला, पापा मं भरमायो है।
भक्त मण्डल तो केव बातयां काम री।
क्यूँ भटके रे
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