Adhik mass ki Katha 27 adhyaya| अधिक मास की कथा 27वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 26 adhyaya | अधिक मास की कथा 26वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 26 adhyaya | अधिक मास की कथा 26वा अध्याय
॥ अथ षड्विंशतितमोऽध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकादि ऋषियों से और भगवान विष्णु लक्ष्मी जी से कहते हैं। हे लक्ष्मी! अब मैं तुमसे अधिक मास के उद्यापन की विधिपूर्वक कहता हूँ तुम एकाग्रचित्त से सुनो। अधिक मास में नियम व्रत अखंडदीप और मौन व्रतधारण आदि के साथ नित्य भगवान पुरुषोत्तम का पूजन अपनी शक्ति के अनुसार अनेक प्रकार के दान कर्म करते हुए भगवान स्मरण भजन कीर्तन गीता भागवत का श्रवण करते हुए संपूर्ण मास को श्रद्धापूर्वक व्यतीत करना चाहिए, अंत में उद्यापन करना आवश्यक है। उद्यापन के लिये अधिक मास की अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या ये चार तिथियां मुख्य हैं। इन तिथियों में जिसको जिस तिथि में उद्यापन करना सोयस्कर हो। अपनी इच्छा से उस तिथि में करना चाहिए।
उसका विधान इस प्रकार है उद्यापन के एक दिन पहले पूजन हवन करने के लिये सात्विक और कर्मकांडी ब्राह्मण को तथा भोजन के निमित्त अपनी श्रद्धा और शक्ति के अनुसार निश्चित संख्या में आमंत्रित कर देना चाहिए। उद्यापन के दिन प्रातः काल उठकर शौचक्रम दंत मुख मार्जन करके शुद्ध जल से स्नान करके शुद्ध वस्त्रों को धारण करके नित्य नैमित्तिक संध्या वंदन कर्म करके कर्मकांडी ब्राह्मण के विधान से भगवान पुरुषोत्तम का पूजन श्रद्धापूर्वक करना चाहिए। पूजन के स्थान और भगवान के मंडप को तोरण अनेक ऋतु में उत्पन्न फूलमाला और अनेक वस्त्रों की ध्वजा पताकाओं से सुसज्जित करना चाहिए। मंडप के स्थान को गोबर से लीपकर (रंगवल्ली) रांगोड़ी से चौकपूरकर उसपर चौरंग रखकर नया सफेद वस्त्र बिछाकर चावल आदि धान्य से सर्वतोभद्र मंडल बनाकर चारों दिशाओं में चार और बीच में प्रधान कलश को स्थापित करना चाहिए। अपनी शक्ति के अनुसार चांदी तांबा या पीतल के कलश होना चाहिए। उन कलशों में तीर्थों का अथवा गंगाजल अथवा शुद्ध जल भरकर पंचपल्लव सर्वौषधी डालकर वस्त्र से लिपटा हुआ नारियल के फल रखना चाहिए। उन कलशों में क्रम से संकर्षण, वासुदेव प्रद्युम्न अनिरुद्ध का आवाहन ध्यान करके मध्य में प्रधान कलश पर सुवर्ण की बनाई हुई राधा के सहित भगवान पुरुषोत्तम की मूर्ति को प्राणप्रतिष्ठा करके पाद्य अर्ध्य स्नान कराके स्थापित करे चारों कलशों में पाद्य अर्ध्य स्नान करावे।
श्रद्धा के सहित सभी देवताओं को यज्ञोपवीत चंदन गंध अक्षत पुष्प माला धूप दीप नैवेद्य अर्पण करे प्रधान देवता भगवान पुरुषोत्तम को पुरुषयोग्य वस्त्र अलंकार अंगूठी तथा राधाजी को स्त्रीयोग्य वस्त्र साड़ी, ब्लाऊज, श्रृंगार सामग्री, चूड़ी, टिकली, बिंदिया, महावर, कुंकू, सेंदुर, काजल, आईना, अत्तर सुगंधित तेल, आदि अर्पण करके धान्य, चावल, फल मेवा, आदि से ओटी भरे। उत्तम प्रकार के मिष्टान्न पक्वान्न मिठाई मेवा, फल के द्वारा सभी देवताओं को भोग लगावे। लौंग, इलायची, जायपत्री, कपूर से बनाया हुआ पान का बीड़ा अर्पण करके पांचों देवताओं के निमित्त घी के पांच दीपक प्रज्वलित करके दीपदान करे। यदि मनुष्य में द्रव्य की शक्ति हो तो चारों देवताओं के निमित्त चार ब्राह्मणों को जप का संकल्प देकर चारों देवताओं की प्रसन्नता के लिये जप करवावे। तांबे के पात्र में जल भरकर उसमें गंध अक्षत पुष्प डालकर अपनी जंघा मोड़कर अर्थात् घुटना टेककर (देव देव नमस्तुभ्यं) इस मंत्र के द्वारा सभी देवताओं को अर्ध्य देना चाहिए। श्रद्धापूर्वक देवताओं को नमस्कार करे। आचार्य ब्राह्मण का पूजन करके भगवान के स्तोत्र का पाठ भागवत पुराण आदि का श्रवण करना चाहिए।
भगवान को छत्र चामर आदि अर्पण करके सभी देवताओं की प्रसन्नता और व्रत की पूर्ति के लिये बेदी बनाकर अग्नि को स्थापित करके अग्नि का पूजन करके शुद्ध घी और हवन सामग्री के द्वारा आचार्य के कहे मंत्रो द्वारा हवन करना चाहिये। हवन पूर्ण होने पर पंचलोक पाल, दशदिक्पाल और क्षेत्रपाल के बलि का विधान करके अग्नि में नारियल में घी भरकर पूर्णाहुति देना चाहिए। अनंतर घी की पांच या सात दीप मालिका सजाकर प्रेममय श्रद्धा में विभोर होकर भगवान की आरती करके मंत्र पुष्पांजली अर्पण करें। सभी देवताओं को साष्टांग दंडवत नमस्कार समर्पित करे। आमंत्रित ब्राह्मणों को पत्नि के सहित पाद प्रक्षालन करवा के गंध अक्षत लगाकर उत्तम प्रकार की भोज्य सामग्री मिष्टान्न पक्वान्न फल दूध खीर के द्वारा भोजन कराकर अपनी शक्ति के अनुसार वस्त्र, दक्षिणा तांबूल पान सुपारी देकर प्रार्थना करें कि हे ब्राह्मणों मैंने अपनी शक्ति के अनुसार इस उद्यापन कर्म में आपकी सेवा में जो भी समर्पित किया उससे आप संतुष्ट होकर आशीर्वाद दें कि यह उद्यापन कर्म परिपूर्ण हुआ इस प्रकार का आशीर्वाद ब्राह्मणों से ग्रहण कर उनको विदा करे। हे लक्ष्मी उद्यापन की रात्रि में अनेक मांगलिक वाद्य संगीत गीत भजन करते हुए रात्रि जागरण करते हुए व्यतीत करना चाहिए। दूसरे दिन प्रातःकाल नित्य नैमित्तिक कर्म करके स्नान करे शुद्ध वस्त्रों को धारण करके संध्या वंदन नित्य पूजन करके सभी देवताओं का उत्तर पूजन करना चाहिए। नाम मंत्रों से आचार्य द्वारा हवन करे, तर्पण मार्जन और भगवान की आरती और मंत्र पुष्पांजली समर्पित करके साष्टांग दंडवत नमस्कार करके हांथ जोड़कर प्रार्थना करे।
हे देवाधिदेव पुरुषोत्तम मैंने अपनी शक्ति और श्रद्धा के अनुसार जो नियमव्रत धारण करते हुए यथाशक्ति उद्यापन कर्म किया उससे आपकी कृपा बनी रहे तथा मेरे मन में निरंतर आपके प्रति श्रद्धा और निष्ठा बनी रहे। इस प्रकार भगवान की प्रार्थना करके आवाहित देवताओं का आचार्य के मंत्रों द्वारा विसर्जन करे। आचार्य का पूजन करके पूर्णपात्र का दान भगवान की मूर्ति और पूजन के मंडल का दान संकल्प पूर्वक आचार्य को देवे। यदि शक्ति हो तो सुंदर सुशील पुष्ट शरीर वाली दुग्ध देने वाली बछड़े के सहित गौ का दान करना चाहिए। आचार्य को वस्त्र आभूषण पददान, तिलपात्र, घृतपात्र, जलपात्र, छाता, जूता, शंख, पंच, रत्न, सप्तधान्य, श्री मदभागवत का दान अपनी श्रद्धा और शक्ति के अनुसार द्रव्य का लोभ त्यागकर करना चाहिए।
हे लक्ष्मी श्रीमद भागवत के दान का बड़ा भारी माहात्म्य है। साक्षात भगवान पुरुषोत्तम के स्वरूप का दान कहलाता है। हजार कन्यादान सैकड़ों बाजपेय यज्ञ करने से तथा अनाज से परिपूर्ण क्षेत्र का दान और अनेक तुलादान करने से जिस पुण्य की प्राप्ति होती है उससे हजार गुणा पुण्य की प्राप्ति श्री मद भागवत का दान करने वाले को प्राप्त होती है।
कांसे के अथवा तांबे, पीतल के पात्र में तैंतीस मालपुआ या अनरसा रखकर कपड़े से ढांककर व्रत की संपूर्णता प्राप्त करने के लिये आचार्य को संकल्प पूर्वक दान करना चाहिए। इस अपूप दान से अधिक मास के व्रत नियम की पूर्णता प्राप्त होती है। इसलिये अपूप दान अवश्य करना चाहिए। अगर मालपुआ, अनरसा बनाने का साधन न हो तो इसको बनाने की कच्ची सामग्री का दान करना चाहिए। ब्राह्मण को ही भगवान का स्वरूप मानकर उत्तम प्रकार के खाद्य सामग्री मिष्टान्न मेवा फल आदि का भोजन कराके पान सुपारी लौंग इलायची देकर उपरोक्त वस्तुओं का यथा शक्ति दान देवे। श्री कृष्णार्पण मस्तु ऐसा कहकर हांथ में जल दक्षिणा लेकर ब्राह्मण के हांथ में छोड़ देवे। मंत्रहीनं क्रियाहीनं और यस्यस्मृत्या इस मंत्र के द्वारा पुरुषोत्तम भगवान की वंदना करके आचार्य ब्राह्मण को विदा करके स्वयं प्रसाद और भोजन को ग्रहण करे। अपनी शक्ति के अनुसार गरीबों को भिक्षार्थियों को भोजन या अन्नदान देवे। यदि कोई मनुष्य अष्टमी या नवमी को उद्यापन करना चाहें उनको उद्यापन के बाद भी अमावस तक नित्यप्रति की तरह पूजन करते रहना चाहिए। और अमावस की रात्रि को मांगलिक वाद्य संगीत भजन कीर्तन करते हुए रात्रि जागरण करके दूसरे दिन आचार्य के द्वारा उत्तर पूजन का विधान करके विसर्जन कराके आचार्य का पूजन भोजन और दान योग्य सामग्रियों का दान भगवान से क्षमा याचना आदि उपरोक्त विधान से कर्म करके यथा शक्ति दक्षिणा और जल हांथ में लेकर श्री कृष्णार्पण मस्तु कहकर ब्राह्मण के हांथ में जल छोड़कर आशीर्वाद ग्रहण करके ब्राह्मण को विदा करके स्वंय प्रसाद और भोजन ग्रहण करे। हे लक्ष्मी इस प्रकार विधान पूर्वक जो मनुष्य अथवा स्त्री अधिक मास का उद्यापन कर्म करेंगे, वे सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्त होकर दुःख दारिद्रय और जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्त होकर सुख, शांति, संपत्ति, संतति, यश, कीर्ति, धनधान्य से संपन्न होकर सांसारिक जीवन व्यतीत करके अंत में अक्षय पद अर्थात् चौरासी लक्ष योनियों में भ्रमण की बाधा से मुक्त होकर अनंत में लीन होकर मोक्ष को प्राप्त होंगे।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
बृहन्नारदीय पद्माधारे षड्विंशतितमोऽध्यायः समाप्त
(२६)
॥ शुभमभवतु ॥
Adhik mass ki Katha 25 adhyaya | अधिक मास की कथा 25वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 25 adhyaya | अधिक मास की कथा 25वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 24 adhyaya | अधिक मास की कथा 24वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 24 adhyaya | अधिक मास की कथा 24वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 23 adhyaya | अधिक मास की कथा 23वा अध्याय
Adhik mass ki Katha 23 adhyaya | अधिक मास की कथा 23वा अध्याय
।। अथ त्रयोविंशतितमो ऽध्याय: प्रारंभ: ।।
श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकदि ऋषियों से कहते हैं, भगवान विष्णु के द्वारा स्नान के महात्म्य को सुनकर लक्ष्मीजी प्रसन्न होकर प्रश्न करती हैं। हे महाप्रभु अब आप कृपाकर धारणा पारणा (एकांतोरपवास) व्रत के महात्म्य का वर्णन सुनाइयेगा। और यह किससे किया और कैसे फल को प्राप्त किया, सो बताने की कृपा करें। भगवान विष्णु कहते हैं, हे लक्ष्मी विंध्य पर्वत के एक भाग में अमरकंटक नाम का पर्वत हैं। उसी पर्वत में नर्मदाजी का उद्रम स्थान है। उस पर्वत पर सन्यासी जिसे भगवान शंकर निवास करके तपस्या करते हैं। नर्मदाजी का साक्षात शंकर का वर हस्त मानी जाती है। जिसे मनुष्य अपनी मनोरकामनाओं को प्राप्त करते हैं। वैसे ही नर्मदाजी का स्नान परिक्रमा और पूजा नर्मदा नदी के किनारे बड़े बड़े तीर्थस्थल और भगवान शंकर के मंदिर बने हुए हैं। इसी प्रकार भृगुच्छ नाम का एक नगर है। उस नगर में सदाचार संपन्न सत्यवादी कुशल शर्मा नाम का ब्राह्मण रहता था। सुंदर और पतिव्रता कुशलावती नाम की उसकी पति थी। वे दोनों पति-पति अपने धर्म कर्म में लगे हुए जीवन यापन करते थे। उनकी मेधावती नाम की कन्या थी। कन्या जब विवाह योग्य हुई तब ब्राह्मण ने पदमनाभ नाम का ब्राह्मण पुत्र जो कि सुंदर सुशील और विद्वान था उसके साथ अपनी कन्या का विवाह कर दिया। कन्या अपने पति के घर में आनंदपूर्वक रहने लगी। दोनों पति पति में अनंत प्रेम था। एक दिन का भी वियोग दोनों को असह्य था। कुछ दिनों के बाद भाग्य की विवित्रता से एकदिन पदमनाभ नर्मदाजी में स्नान करने गया। अपने समवयस्क लोगों से जल क्रीड़ा करते हुए पानी में डूबने लगा। साथ के लोगों को जब वह नहीं दिखाई दिया तब लोग घबड़ाकर उसको पानी में ढूढने लगे। परंतु उसके प्राण जा चुके थे वह मृत हो चुका था। तुरंत लोगों के द्वारा उसके शरीर को निकालकर बाहर लाए। उसके घर पहुँचा। उसके मातापिता और पति रोते दहाकार करते हुए वहां आए। पति उसके मृतशरीर को गोद में लेकर छाती पीटती हुई रुदन करती रही है देव हे जगन्नाथ मैं इस वैधव्यता का दुख कैसे भोगूंगी।
प्राण क्यों नहीं निकलते। मेरा सौभाग्यही जहां डूब गया अब मैं इस जीवनरूपी सागर को कैसे पार करूंगी। पति के बिना जैसे मछली तड़पती है। उसी प्रकार से वह तड़प रही थी। उसी प्रकार से कुछ दिनों तक सास-श्वसुर के पास रही कुछ दिनों बाद पिता ने उस दुखी कन्या को सांत्वना और धीरज देने के तन्मित अपने घर ले आए। परंतु माता पिता के घर आने के बाद भी उसका दुःख कम नहीं हुआ रात दिन रोती, तड़पती हुई अपने भविष्य में सोचती रहती थी।
आखिर अपने पूर्वजन्म का पाप उदय हुआ यह समझकर उसके प्रायश्चित करने के लिये कोई व्रत या देवता की आराधन करना चाहिए। इस निमित एक बालिका ने अपने पिता से कहा, हे पिता मेरे दुःख को दूर करने के लिये आप कोई व्रत आदी साधन मुझे बताइये। जिसके द्वारा मैं दुःख से छुटकारा पाकर भवसागर से पार हो जाऊं। कन्या के वचनों को सुनकर पिता ने कहा हे पुत्री अब से तोत्तम मास भगवान पुरुषोत्तम का मास आनेवाला हैं। उस मास में एकांतोरपवास जिसको धारणा पारणावत भी कहते हैं, करने से मनुष्य के पापों का समूह नष्ट हो जाता है। सभी दुःख दूर होते है। और मनुष्य भव्यवसागर से पार हो जाता है। पिता के वचनों को सुनकर मेधावती प्रसन्न होते हुए समय व्यतीत होने पर पुरुषोत्तम मास प्रारंभ हुआ तब पिता के कथनानुसार नियम धारण करके हुए ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नर्मदाजी में स्नान करना, भगवान पुरुषोत्तम की पूजा करना, विप्रपूजा करके यथा शक्ति दान देना, भूमि पर शयन करना, एकदीत उपवास करके दूसरे दिन हविष्य खाकर पारणा करना अखंडदीप की स्थापना आदि इस प्रकार नियमपूर्वक बड़ी श्रद्धा से संपूर्ण मास पूरा करके उपवास के दिन विधिवत उद्यापन किया। इस प्रकार उसने अपने जीवन में अनेक पुरुषोत्तमास नियम और श्रद्धापूर्वक संपूर्ण किया। समय व्यतीत होते बुद्धवस्था आने पर शरीर कृश हो गए और उसका अंत समय प्राप्त हो गया। पुण्य के प्रभाव से और भगवान शंकर की महान भक्ति के कारण मृत्यु के बाद वह मेधावती की आत्मा शिवलोक में पहुंच कर पार्वतीजी की सखी हो गई। वहां अनेक सुखों को भोगकर पृथ्वी पर फिर से जन्म लिया। काशी नगरी में विशालाक्षी नामक तपस्विनी के रूप में प्रसिद्ध हुई। आज भी काशी में विशालाक्षी मंदिर है लोग उसके पूजा करके अपना मनोरथ पूर्ण करते हैं। हे लक्ष्मी पुरुषोत्तम मास का धारणा पारणावत शरीर को अरोग्यता देनेवाला, अंत में मोक्ष देने वाला है। इसी व्रत के प्रभाव से वह मेधावती मानव शरीर वाली होकर दूसरे जन्म में देव स्वरूप हो गई।
हे लक्ष्मी मेधावती की एक सखी कोमला नाम की ब्राह्मणी थी उसे भी पुण्य के प्रभाव से मृत्यु के बाद शिवलोक से अधिक मास में नरक भोजन में जन्म लेकर तपस्या के प्रभाव से मंगलागौरी के नाम से आज भी प्रसिद्ध है। हे लक्ष्मी पुरुषोत्तम मास का अद्भुत पुण्य है। जिसका वर्णन हजार मुख वाले शेषनाग भी करने में असमर्थ है। इतनी कथा सुनकर लक्ष्मीजी कहती हैं, हे महाप्रभु अब आप विप्रसेवा के महात्म्य का वर्णन सुनाइयेगा। भगवान कहते हैं, हे लक्ष्मी मैं तुम से इस विषय का एक इतिहास सुनाता हूँ। भरतखंड में विराट नाम का देश है। उस देश में अनेक पुण्यशाली और धनिक लोग रहते थे। उस नगर में अनेक मंदिर थे कुएं बावली तालाब और बगीचों से वे नगर हमेशा संपन्न और सुखी रहेगा। वहां परमार्थिक कर्म होते रहने से देवताओं को प्रसन्न वरदान दिया था कि शंकरजी का भी मंदिर है। चारों वर्णों के लोग अपने कर्म धर्म में लगे रहकर सभी प्रकार से सुखी और प्रसन्न है। उसी नगर में धनदास नाम का एक शूद्र रहता था। वह धनसंपन्न था और उसके अनेक नौकर थे। परंतु वह हमेशा ब्राह्मणों को आमंत्रित कर अपने हाथ से ब्राह्मणों का पादप्रक्षालन और पूजा करता था और अनेक प्रकार के दान देकर संतुष्ट करता था। अनेक पर्व के समय स्वयं ब्राह्मण के घर जाकर झाडू लगाए, कपड़े धोए, उनकी आवश्यक इच्छित वस्तु को बाजार से लाकर देना ये सब स्वयं पति के सहित करता था। उसकी पति भी पति का अनुसरण करते हुए विप्र पत्नियों की सेवा करती रहती थी। धनदास को अपने ऊपर धन संपन्न होने का कोई गर्व नहीं था वह विप्रसेवा में कितना भी धन क्यों न खर्च हो जाए उसके मन में चिंता नहीं होती थी। इस प्रकार विप्रसेवा करते हुए उसकी आयु बहुत बीत गई। अचानक दैव के प्रभाव और पूर्वजन्म के कर्म के प्रभाव से धनदास के शरीर में काफी कष्ट का रोग उत्पन्न हो गया। जगह जगह उसके शरीर में व्रण (घाव) खून और पीब बहने लगी। रोग को देखकर धनदास मन में बहुत उदास रहने लगा। कि अब मेरे से ब्राह्मणों की सेवा कैसे होगी। इसी चिंता ग्रस्त स्थिति में एक समय एक सिद्ध पुरुष धनदास के घर आए उनसे उसने अपने मन का दुःख प्रकट किया। उसके दुःख को सुनकर सिद्ध पुरुष ने कहा हे धनदास तू चिंता छोड़ दे तूने जो विप्रसेवा की है, उसका पुण्य तुझे अवश्य प्राप्त होगा। तेरी अच्छी मृत्यु होगी और मृत्यु के बाद तू और तेरी पति सुंदर विमान पर बैठकर स्वर्ग लोक को जाओगे। ऐसा कहकर सिद्ध पुरुष वहां से अंतर्धान हो गए। सिद्ध पुरुष के शब्दों को यादकर धनदास बहुत प्रसन्न हुआ अपने धन संपदा के तीन भाग किए।
एक भाग अपने पुत्र को दूसरा भाग कन्या को और तीसरा अपने साथ लेकर तीर्थ यात्रा को पत्नी समेत निकल गया। अनेक तीर्थों में अपने धनका दान कर दिया। तीर्थ क्षेत्र में रहते हुए, ही दोनों पति पति की एकही दिन मृत्यु हो गई। अपने पुण्य के प्रभाव से सुंदर विमान पर बैठकर उन दोनों की जीवात्मा स्वर्ग लोक को चली गई। हे लक्ष्मी विप्रसेवा का महात्म्य देवताओं की पूजा से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। मैंने भी जब पृथ्वीपर जन्म लिया तब विप्रसेवा अवश्य की है।
(२३)
बृहत् नारदीय पद्माधारे त्रयोविंशतितमो ऽध्याय: समाप्त ।।
।। शुभमभवत् ।।