Adhik mass ki Katha 27 adhyaya| अधिक मास की कथा 27वा अध्याय

 Adhik mass ki Katha 27 adhyaya| अधिक मास की कथा 27वा अध्याय 

॥ अथ सप्तविंशतितमोऽध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री मन्महागणधिपतये नमः ॥
श्री भगवान नारायण नारदजी से सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं। हे ऋषियों इसके पहले के अध्याय में भगवान ने अधिक मास के उद्यापन का विधान और समस्त मास की पूर्णता के लिये दान का विधान कहा। आज के कथा प्रसंग में भगवान विष्णु कहते हैं। हे लक्ष्मी पुरुषोत्तम मास का व्रत सभी व्रतों में सर्वोत्तम और सभी पुण्यकर्मों से विशेष महान अक्षय पुण्य को देने वाला होता है। जो लोग पुरुषोत्तम मास में नियमव्रत आदि धारण करते हुए श्रद्धापूर्वक मास को व्यतीत करते हैं। वे पुण्यात्मा के पास अन्तिम समय यमदूत कभी नहीं आते जैसे सिंह को देखकर हाथी भाग जाते हैं। और गरुड़ को देखकर सांप बिल में घुस जाते हैं। सूर्य का प्रकाश आते ही अंधकार भाग जाता है। उसी प्रकार पुण्यात्मा को देखकर यमदूत कभी उनके पास नहीं जाते। हे लक्ष्मी जिसने पुरुषोत्तम मास में आराधना की है। उसके घर और शरीर में समस्त तीर्थों का वास रहता है। और समस्त देवताओं की कृपा रहती है। और समस्त विघ्नबाधाएं नष्ट होकर मन में शांति स्थापित रहती है। उनके समक्ष भूत प्रेत पिशाच आदि की कोई बाधा नहीं आती वे कहीं भी रहें सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करते हुए यज्ञ यागादिक करने वाले पुण्यात्माओं से भी ज्यादा पुण्य शाली होकर अंत में अक्षय पुण्य के द्वारा मोक्ष को प्राप्त करते हैं। हे लक्ष्मी इसके पुण्य फल का वर्णन करने में हजार जिह्वा वाले शेषनाग भी असमर्थ हैं।
हे लक्ष्मी इस मास को किस प्रकार कौन कौन से नियम धारण करने योग्य होते है सो मैं कहता हूं इसमें अपनी शारीरिक शक्ति के अनुसार कोई भी एक या अनेक नियम को धारण करने का संकल्प (निश्चय) करके नित्य प्रातः स्नान पूजन जप स्मरण भजन कीर्तन करते हुए सात्विक वृत्ति से रहना चाहिये। इसके नियम हैं, भूमि पर सोना, किसी एक तेल का परित्याग, एक ही जाति की पत्रावलीपर भोजन करना, नख और बालों को न काटना, एक ही अन्न का भोजन करना नित्य दीपदान करना, मालपुआ या अन्नशा या मिष्ठान का दान करना, नित्य ब्राह्मण भोजन करवाना, जूता चप्पल न पहनना, आंवले के चूर्ण को पानी में डालकर स्नान करना, किसी एक फल का त्याग, नमक का त्याग, नियतलीला, तांबूल, धान्य का दान, सुवर्ण, चांदी या द्रव्य का दान, भागवत श्रवण का नियम, अयाचित, नक्त, धारणापारण, या एक समय भोजन का नियम, हविष्यान्न भोजन का नियम, मौन धारण का नियम तुलसी पूजन, शालिग्राम पूजन, आदि अनेक नियमों में से एक दो या तीन चार जितने भी नियम धारण करने की शारीरिक क्षमता हो उतने नियम का निश्चय करके संपूर्ण मास पर्यंत पालन करना चाहिये बीच में नियम भंग न हो इस बात की दक्षता रखना चाहिये।
एक भी नियम धारण करके यदि दक्षता पूर्ण संपूर्ण मास पालन किया जाय तो भी अनन्य पुण्य की प्राप्ति होती है। इस मास में सभी को इन वस्तुओं का त्याग करना चाहिए। राई, चना, नागरमोथा, तिल का तेल, प्याज, लहसुन, मूली, गाजर, बैंगन, इमली, जाम्बीर नींबू, मादक नशा उत्पन्न करने वाले पदार्थ, मसूर की दाल, पकाया हुआ बासी अन्न, गाय भैंस के अलावा दूसरे पशुओं का दूध, भूमि से उत्पन्न नमक, तांबे के बर्तन में रखा हुआ दूध या घी, सिर्फ अपने लिये पकाया हुआ अन्न, ब्रह्मचर्य धारण, जलहुुआ अन्न, दूसरों से निंदित अन्न, अपने मन से दूषित अन्न देवता और ब्राह्मणों से द्वेष रखने वालों का अन्न, कौवों से स्पर्श किया अन्न, सूतक लगी अवस्था का अन्न इन सभी वस्तु और पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। तथा दूसरों से द्वेष करना, किसी की निंदा करना, वेद ब्राह्मण, राजा, स्त्री और गौ की निंदा नहीं करना चाहिए। इस प्रकार इन नियमों का पालन करते हुए अधिक मास को बिताना चाहिए।
तुलसीदल या मंजरी से शालिग्राम की नित्यपूजा और नित्य श्री मद भागवत का श्रवण अनंत पुण्य देने वाला होता है। मृत्यु के उपरांत चतुर्भुजी स्वरूप धारण करके स्वर्गों की प्राप्ति देता है। व्रत उपवास का नियम धारण करने वाले को नित्य अश्वमेघ यज्ञ के फल की प्राप्ति होती है। हे लक्ष्मी नियम धारण करनेवाले को किस प्रकार अंत में नियम छोड़ना चाहिए सो मैं कहता हूं। नक्त भोजन का नियम धारण करने वाले को अंत में ब्राह्मण भोजन और सुवर्ण का दान करके नियम छोड़ना चाहिए। आंवले के चूर्ण का स्नान करने वाले को दही और दूध का दान करना चाहिए। एक अन्न का भोजन करने वाले को गेहूं और चावल का दान, भूमि पर सोने के नियम वाले को शय्यादान, तेल त्याग में घी का दान, घी के त्याग में दूध का दान, पत्रावली पर भोजन करने वाले को घी, शक्कर और अन्न का दान मौन व्रत वाले को घंटा घड़ियाल का दान, नखकेश धारण के नियम में आईने का दान, जूता चप्पल के नियम में जूता या चप्पल का दान, लवण त्याग करने पर घी, शक्कर, नमक का दान, दीपदान के नियम में चांदी का दीपक, सुवर्ण की बत्ती का दान, धारणापारण नियम में वस्त्र और कुंभ (जलपात्र) का दान, एक समय भोजन के नियम में उत्तम अन्न और शुद्ध घी से बने तीस लड्डू का दान करना चाहिए नियम की पूर्ति और फल की प्राप्ति के लिये इसी प्रकार नियम छोड़ना चाहिए यह कर्म अमावस्या के दिन करना श्रेष्ठ होता है।
जो जो पदार्थ छोड़ने का नियम धारण किया हो असमर्थ पुरुषों को वही पदार्थ दान करना चाहिए भगवान पुरुषोत्तम का पूजन हवन करके उपरोक्त प्रकार से दान करके ब्राह्मण का आशीर्वाद प्राप्त करके नियम छोड़ना चाहिए। अपने नियम और व्रत की सफलता के लिये यथा शक्ति दक्षिणा देकर व्रत की पूर्ति का फल प्राप्त करे। हे लक्ष्मी समस्त मनोकामनाओं को देनेवाला महान पुण्यदायक अधिक मास का नियम है। इन नियमों को अनेक देवता ऋषि संन्यासी भी धारण करके अक्षय पुण्य को प्राप्त करते हैं।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
॥ बृहन्नारदीय पुराणांतर्गत सप्तविंशतितमोऽध्यायः समाप्त ॥
॥ शुभमभवतु ॥




Adhik mass ki Katha 26 adhyaya | अधिक मास की कथा 26वा अध्याय

 

Adhik mass ki Katha 26 adhyaya | अधिक मास की कथा 26वा अध्याय 




॥ अथ षड्विंशतितमोऽध्यायः प्रारंभः ॥

॥ श्री गणेशाय नमः ॥

श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकादि ऋषियों से और भगवान विष्णु लक्ष्मी जी से कहते हैं। हे लक्ष्मी! अब मैं तुमसे अधिक मास के उद्यापन की विधिपूर्वक कहता हूँ तुम एकाग्रचित्त से सुनो। अधिक मास में नियम व्रत अखंडदीप और मौन व्रतधारण आदि के साथ नित्य भगवान पुरुषोत्तम का पूजन अपनी शक्ति के अनुसार अनेक प्रकार के दान कर्म करते हुए भगवान स्मरण भजन कीर्तन गीता भागवत का श्रवण करते हुए संपूर्ण मास को श्रद्धापूर्वक व्यतीत करना चाहिए, अंत में उद्यापन करना आवश्यक है। उद्यापन के लिये अधिक मास की अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या ये चार तिथियां मुख्य हैं। इन तिथियों में जिसको जिस तिथि में उद्यापन करना सोयस्कर हो। अपनी इच्छा से उस तिथि में करना चाहिए।

उसका विधान इस प्रकार है उद्यापन के एक दिन पहले पूजन हवन करने के लिये सात्विक और कर्मकांडी ब्राह्मण को तथा भोजन के निमित्त अपनी श्रद्धा और शक्ति के अनुसार निश्चित संख्या में आमंत्रित कर देना चाहिए। उद्यापन के दिन प्रातः काल उठकर शौचक्रम दंत मुख मार्जन करके शुद्ध जल से स्नान करके शुद्ध वस्त्रों को धारण करके नित्य नैमित्तिक संध्या वंदन कर्म करके कर्मकांडी ब्राह्मण के विधान से भगवान पुरुषोत्तम का पूजन श्रद्धापूर्वक करना चाहिए। पूजन के स्थान और भगवान के मंडप को तोरण अनेक ऋतु में उत्पन्न फूलमाला और अनेक वस्त्रों की ध्वजा पताकाओं से सुसज्जित करना चाहिए। मंडप के स्थान को गोबर से लीपकर (रंगवल्ली) रांगोड़ी से चौकपूरकर उसपर चौरंग रखकर नया सफेद वस्त्र बिछाकर चावल आदि धान्य से सर्वतोभद्र मंडल बनाकर चारों दिशाओं में चार और बीच में प्रधान कलश को स्थापित करना चाहिए। अपनी शक्ति के अनुसार चांदी तांबा या पीतल के कलश होना चाहिए। उन कलशों में तीर्थों का अथवा गंगाजल अथवा शुद्ध जल भरकर पंचपल्लव सर्वौषधी डालकर वस्त्र से लिपटा हुआ नारियल के फल रखना चाहिए। उन कलशों में क्रम से संकर्षण, वासुदेव प्रद्युम्न अनिरुद्ध का आवाहन ध्यान करके मध्य में प्रधान कलश पर सुवर्ण की बनाई हुई राधा के सहित भगवान पुरुषोत्तम की मूर्ति को प्राणप्रतिष्ठा करके पाद्य अर्ध्य स्नान कराके स्थापित करे चारों कलशों में पाद्य अर्ध्य स्नान करावे।

श्रद्धा के सहित सभी देवताओं को यज्ञोपवीत चंदन गंध अक्षत पुष्प माला धूप दीप नैवेद्य अर्पण करे प्रधान देवता भगवान पुरुषोत्तम को पुरुषयोग्य वस्त्र अलंकार अंगूठी तथा राधाजी को स्त्रीयोग्य वस्त्र साड़ी, ब्लाऊज, श्रृंगार सामग्री, चूड़ी, टिकली, बिंदिया, महावर, कुंकू, सेंदुर, काजल, आईना, अत्तर सुगंधित तेल, आदि अर्पण करके धान्य, चावल, फल मेवा, आदि से ओटी भरे। उत्तम प्रकार के मिष्टान्न पक्वान्न मिठाई मेवा, फल के द्वारा सभी देवताओं को भोग लगावे। लौंग, इलायची, जायपत्री, कपूर से बनाया हुआ पान का बीड़ा अर्पण करके पांचों देवताओं के निमित्त घी के पांच दीपक प्रज्वलित करके दीपदान करे। यदि मनुष्य में द्रव्य की शक्ति हो तो चारों देवताओं के निमित्त चार ब्राह्मणों को जप का संकल्प देकर चारों देवताओं की प्रसन्नता के लिये जप करवावे। तांबे के पात्र में जल भरकर उसमें गंध अक्षत पुष्प डालकर अपनी जंघा मोड़कर अर्थात् घुटना टेककर (देव देव नमस्तुभ्यं) इस मंत्र के द्वारा सभी देवताओं को अर्ध्य देना चाहिए। श्रद्धापूर्वक देवताओं को नमस्कार करे। आचार्य ब्राह्मण का पूजन करके भगवान के स्तोत्र का पाठ भागवत पुराण आदि का श्रवण करना चाहिए।

भगवान को छत्र चामर आदि अर्पण करके सभी देवताओं की प्रसन्नता और व्रत की पूर्ति के लिये बेदी बनाकर अग्नि को स्थापित करके अग्नि का पूजन करके शुद्ध घी और हवन सामग्री के द्वारा आचार्य के कहे मंत्रो द्वारा हवन करना चाहिये। हवन पूर्ण होने पर पंचलोक पाल, दशदिक्पाल और क्षेत्रपाल के बलि का विधान करके अग्नि में नारियल में घी भरकर पूर्णाहुति देना चाहिए। अनंतर घी की पांच या सात दीप मालिका सजाकर प्रेममय श्रद्धा में विभोर होकर भगवान की आरती करके मंत्र पुष्पांजली अर्पण करें। सभी देवताओं को साष्टांग दंडवत नमस्कार समर्पित करे। आमंत्रित ब्राह्मणों को पत्नि के सहित पाद प्रक्षालन करवा के गंध अक्षत लगाकर उत्तम प्रकार की भोज्य सामग्री मिष्टान्न पक्वान्न फल दूध खीर के द्वारा भोजन कराकर अपनी शक्ति के अनुसार वस्त्र, दक्षिणा तांबूल पान सुपारी देकर प्रार्थना करें कि हे ब्राह्मणों मैंने अपनी शक्ति के अनुसार इस उद्यापन कर्म में आपकी सेवा में जो भी समर्पित किया उससे आप संतुष्ट होकर आशीर्वाद दें कि यह उद्यापन कर्म परिपूर्ण हुआ इस प्रकार का आशीर्वाद ब्राह्मणों से ग्रहण कर उनको विदा करे। हे लक्ष्मी उद्यापन की रात्रि में अनेक मांगलिक वाद्य संगीत गीत भजन करते हुए रात्रि जागरण करते हुए व्यतीत करना चाहिए। दूसरे दिन प्रातःकाल नित्य नैमित्तिक कर्म करके स्नान करे शुद्ध वस्त्रों को धारण करके संध्या वंदन नित्य पूजन करके सभी देवताओं का उत्तर पूजन करना चाहिए। नाम मंत्रों से आचार्य द्वारा हवन करे, तर्पण मार्जन और भगवान की आरती और मंत्र पुष्पांजली समर्पित करके साष्टांग दंडवत नमस्कार करके हांथ जोड़कर प्रार्थना करे।

हे देवाधिदेव पुरुषोत्तम मैंने अपनी शक्ति और श्रद्धा के अनुसार जो नियमव्रत धारण करते हुए यथाशक्ति उद्यापन कर्म किया उससे आपकी कृपा बनी रहे तथा मेरे मन में निरंतर आपके प्रति श्रद्धा और निष्ठा बनी रहे। इस प्रकार भगवान की प्रार्थना करके आवाहित देवताओं का आचार्य के मंत्रों द्वारा विसर्जन करे। आचार्य का पूजन करके पूर्णपात्र का दान भगवान की मूर्ति और पूजन के मंडल का दान संकल्प पूर्वक आचार्य को देवे। यदि शक्ति हो तो सुंदर सुशील पुष्ट शरीर वाली दुग्ध देने वाली बछड़े के सहित गौ का दान करना चाहिए। आचार्य को वस्त्र आभूषण पददान, तिलपात्र, घृतपात्र, जलपात्र, छाता, जूता, शंख, पंच, रत्न, सप्तधान्य, श्री मदभागवत का दान अपनी श्रद्धा और शक्ति के अनुसार द्रव्य का लोभ त्यागकर करना चाहिए।

हे लक्ष्मी श्रीमद भागवत के दान का बड़ा भारी माहात्म्य है। साक्षात भगवान पुरुषोत्तम के स्वरूप का दान कहलाता है। हजार कन्यादान सैकड़ों बाजपेय यज्ञ करने से तथा अनाज से परिपूर्ण क्षेत्र का दान और अनेक तुलादान करने से जिस पुण्य की प्राप्ति होती है उससे हजार गुणा पुण्य की प्राप्ति श्री मद भागवत का दान करने वाले को प्राप्त होती है।

कांसे के अथवा तांबे, पीतल के पात्र में तैंतीस मालपुआ या अनरसा रखकर कपड़े से ढांककर व्रत की संपूर्णता प्राप्त करने के लिये आचार्य को संकल्प पूर्वक दान करना चाहिए। इस अपूप दान से अधिक मास के व्रत नियम की पूर्णता प्राप्त होती है। इसलिये अपूप दान अवश्य करना चाहिए। अगर मालपुआ, अनरसा बनाने का साधन न हो तो इसको बनाने की कच्ची सामग्री का दान करना चाहिए। ब्राह्मण को ही भगवान का स्वरूप मानकर उत्तम प्रकार के खाद्य सामग्री मिष्टान्न मेवा फल आदि का भोजन कराके पान सुपारी लौंग इलायची देकर उपरोक्त वस्तुओं का यथा शक्ति दान देवे। श्री कृष्णार्पण मस्तु ऐसा कहकर हांथ में जल दक्षिणा लेकर ब्राह्मण के हांथ में छोड़ देवे। मंत्रहीनं क्रियाहीनं और यस्यस्मृत्या इस मंत्र के द्वारा पुरुषोत्तम भगवान की वंदना करके आचार्य ब्राह्मण को विदा करके स्वयं प्रसाद और भोजन को ग्रहण करे। अपनी शक्ति के अनुसार गरीबों को भिक्षार्थियों को भोजन या अन्नदान देवे। यदि कोई मनुष्य अष्टमी या नवमी को उद्यापन करना चाहें उनको उद्यापन के बाद भी अमावस तक नित्यप्रति की तरह पूजन करते रहना चाहिए। और अमावस की रात्रि को मांगलिक वाद्य संगीत भजन कीर्तन करते हुए रात्रि जागरण करके दूसरे दिन आचार्य के द्वारा उत्तर पूजन का विधान करके विसर्जन कराके आचार्य का पूजन भोजन और दान योग्य सामग्रियों का दान भगवान से क्षमा याचना आदि उपरोक्त विधान से कर्म करके यथा शक्ति दक्षिणा और जल हांथ में लेकर श्री कृष्णार्पण मस्तु कहकर ब्राह्मण के हांथ में जल छोड़कर आशीर्वाद ग्रहण करके ब्राह्मण को विदा करके स्वंय प्रसाद और भोजन ग्रहण करे। हे लक्ष्मी इस प्रकार विधान पूर्वक जो मनुष्य अथवा स्त्री अधिक मास का उद्यापन कर्म करेंगे, वे सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्त होकर दुःख दारिद्रय और जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्त होकर सुख, शांति, संपत्ति, संतति, यश, कीर्ति, धनधान्य से संपन्न होकर सांसारिक जीवन व्यतीत करके अंत में अक्षय पद अर्थात् चौरासी लक्ष योनियों में भ्रमण की बाधा से मुक्त होकर अनंत में लीन होकर मोक्ष को प्राप्त होंगे।

जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार

बृहन्नारदीय पद्माधारे षड्विंशतितमोऽध्यायः समाप्त

(२६)

॥ शुभमभवतु ॥








Adhik mass ki Katha 25 adhyaya | अधिक मास की कथा 25वा अध्याय

 Adhik mass ki Katha 25 adhyaya | अधिक मास की कथा 25वा अध्याय 


॥ अथ पंचविंशतितमोऽध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री गणाधिपतये नमः ॥
श्री भगवान नारायण नारदजी से, श्री सूतजी शौनकादि ऋषियों से तथा भगवान विष्णु लक्ष्मीजी से कहते हैं। हे लक्ष्मी! अधिक मास में स्नान व्रत नियम दान आदि कर्म करते हुए भगवान पुरुषोत्तम की आराधना पूजा करते हुए संपूर्ण मास को श्रद्धापूर्वक व्यतीत करते हैं। ऐसे लोग संसार में सदा सुखी जीवन व्यतीत करते हुए अंत में मोक्ष को प्राप्त होते हैं। इस विषय में तुमसे पुरातन का इतिहास कहता हूँ। हे लक्ष्मी! इसी भारत वर्ष में वीरबाहु नाम का एक प्रसिद्ध राजा था। वह राजा नीतिपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करने वाला, यज्ञ यागादिक धार्मिक कृत्यों में रुचि रखकर दैवीकृत्यों को करने वाला महान बलिष्ठ बुद्धिमान और गुणवान था। उसी प्रकार उसकी पत्नी यशोमति नाम का था मदन मंत्री भी महान शूरवीर और स्वामी भक्त था। मंत्री की पत्नी का नाम गुणवती था। गुणवती अत्यंत धार्मिक वृत्तिवाली और पतिव्रता थी। वह हमेशा भगवान का पूजन व्रत उपवास करते हुए अनेक प्रकार के दान धर्म करती रहती थी। जब-जब अधिकमास प्रारंभ होता तब बड़ी श्रद्धा से नियम धारण करते हुए व्रत अखंडदीप अनेक प्रकार के दान करके भगवान पुरुषोत्तम को आराधना में संपूर्ण मास व्यतीत करती थी। इस जगमगाते अक्षय पुण्य के द्वारा मंत्रों के द्वारा पति गुणवती को सौभाग्य सूचक सौंदर्य बिना श्रृंगार किए ही श्रृंगार किया हो। यह सब भगवान पुरुषोत्तम की आराधना और कृपा से अलौकिक सौंदर्य उसको प्राप्त था। उधर राजा वीरबाहु की पति यशोमति अपनी युवावस्था और सुंदरता के जाल में फंसा हुआ राजा को सारे कारभार मंत्री के भरोसे छोड़कर भोगविलास के भोजन पेय पदार्थ, अनेक वाहनों का सुख, शिकार करना, अनेक वन उपवनों का भ्रमण करना इसी मौज मस्ती में राजा और रानी का सारा समय व्यतीत होता था। वे दोनों कभी भी देवताओं की पूजा अर्चना दान पुण्य कोई भी कर्म नहीं करते थे।
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इस प्रकार बहुत समय व्यतीत हो गया राजा के दो पुत्र उत्पन्न हुए राजा के पुत्र प्राप्ति से राजा और रानी को प्रसन्नता हुई उन्होंने पुत्रों के उत्तर होने की खुशी में राजमहल में खूब नर्तकियों का नृत्य गायन वादन आदि के द्वारा उत्सव मनाकर दोनों पुत्रों का नाम सुबाहु और शतबाहु रखा, दोनों पुत्र अत्यंत सुंदर और अच्छे शरीर वाले होकर दिन-प्रतिदिन बड़े होते गए। राजरानी पूर्ववत भोग विलास में निमग्न रहकर समय व्यतीत करने लगे। मंत्री की पत्नी गुणवती एक समय विचार मग्न होकर सोचने लगी। राजा को पूर्वजन्म के पुण्य प्रभाव से इस जन्म में राज्य ऐश्वर्य बलसंपत्ति सभी प्रकार का सुख प्राप्त हुआ है। परंतु राजा इस जन्म में कोई भी दान पुण्य देवताओं की पूजा आराधना नहीं करता तो इसके भविष्य में सुख कैसे मिलेगा पूर्व जन्म का पुण्य क्षीण होते ही यह सब नष्ट होकर राजरानी को महान कष्ट भोगना पड़ेगा। इसलिए परोपकार के निमित्त और भविष्य में कष्ट बाधाओं से बचाने के लिये पुण्य कर्म की प्रेरणा देना हमारा कर्तव्य है। ऐसा सोचकर एक समय गुणवती रानी के पास राजमहल में पहुँची। राजमहल अत्यंत सुंदर इंद्र के भवन के जैसा दिखता था अनेक स्थानों पर रत्न जड़े हुए सुवर्ण की नक्काशी से सुशोभित अनेक दास दासियों से परिपूर्ण ऐसे सुंदर राजभवन में रानी हो हमारी स्वामिनी हो मैं तुमसे एक रानी से प्रेम पूर्वक कहती हूँ। हे सखी यशोमति तुम हमारी रानी हो हमारे भविष्य के हित के लिये प्रार्थना करती हूँ तुम मेरे आग्रह को सुनने की कृपा करो। यह अधिक तुम्हारे भविष्य के हित के लिये है। अबसे तीसरा मास भगवान पुरुषोत्तम का मास आने वाला है। उस मास में स्नान, व्रत, दान और नियम धारण आदि थोड़ा भी किया हुआ कर्म महान पुण्य दाता और अंत में मोक्ष देने वाला होता है। इसलिए उस मास में तुम भी भगवान पुरुषोत्तम के प्रति श्रद्धापूर्वक कुछ कर्म करो इससे तुम्हारे समस्त मनोरथ पूर्ण होंगे। गुणवती के वचनों को सुनकर रानी यशोमति मुँह बिचकाकर कहती है, हे गुणवती मैं राजा की अर्धांगिनी होने थे व्रत नियम दान पुण्य कर्म करते हैं उसका कुछ भाग राजा को प्राप्त होता है। पुण्य प्राप्ति राजा की होती है, फिर शरीर को व्रत उपवास आदि करके सुखाने से मुझे प्राप्त क्या होता है। जब बिना परिश्रम के पुण्य प्राप्ति होती है, तो शरीर को व्रत उपवास आदि करके सुखाने से मुझे प्राप्त क्या होता है? जब बिना परिश्रम के पुण्य प्राप्ति होती है, तो शरीर को कष्ट देने से क्या फायदा? भाग्य से मिली संपत्ति का उपभोग करना चाहिए। यह युवावस्था तो सांसारिक सुख का उपभोग करने के लिये होती है। जो तुमने कहा वे सब कर्म वृद्धावस्था में करने चाहिए। अभी से शरीर की सुंदरता को सुखाने का कोई प्रयोजन नहीं है। कोई दूसरी बात मन को आनंद देने वाली करो। कहाँ से अधिक मास लेकर आ गई हो।
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इस प्रकार क्रोध प्रकट करते हुए रानी ने मंत्री की पत्नी गुणवती से कहा। रानी के वचनों को सुनकर गुणवती को मानसिक दुःख हुआ। परंतु रानी के सामने दुःख को प्रकट नहीं किया, कहते हैं, हे लक्ष्मी पराधीनता बड़ी कठिन होती है। मृत्यु के सदृश दुःख दाईनी हमेशा अपनी इच्छा का हनन करने वाली होती है। मालिक के सामने नौकर को अपनी इच्छा त्यागकर मालिक की आज्ञा का पालन करना पड़ता है। इस प्रकार समय व्यतीत होता रहा कुछ दिनों के बाद जब अधिक मास आया तो गुणवती ने पति की आज्ञा लेकर व्रत नियम धारण करते हुए अधिकमास में पूर्ण किया। इस पुण्य के प्रभाव से गुणवती के शरीर में सौभाग्य सूचक चिन्ह और भी अधिक रूप में प्रकट होकर उसके मुख की कांति बिना श्रृंगार किए ही जगमगाने लगी। कुछ दिनों के पश्चात रानी यशोमति ने अधिक मास के प्रति अवहेलना की थी उसके प्रभाव से उसकी युवावस्था को और असर होते वाले दोनों पुत्रों का एकाएक भयानक बुखार आया और उस बुखार की तीव्रता को न सहन करने के कारण दोनों पुत्रों का एक ही समय प्राणांत हो गया।
पुत्रों का इस प्रकार निधन देखकर यशोमति दुःख के कारण बार बार बेहोश होकर हाहाकार करते हुए रोने लगी। इसी प्रकार की हालत राजा वीरबाहु की भी थी। सारे राजमहल में घोर दुःख और हाहाकार मच गया। रानी यशोमति बार-बार अपने मस्तक को पृथ्वी पर पटकती पुत्रों का मुख देखकर अनेक प्रकार की सांत्वना देकर समझाते। उधर अनेक दासियाँ रानी को समझाने की कोशिश करती लेकिन सब व्यर्थ होता। गुणवती को जब यह समाचार सुनाई दिया तब उसको भी मानसिक दुःख हुआ। रानी को सांत्वना देने के निमित्त वह जल्दी से रानी के महल में पहुँची। रानी के मृत पुत्रों को देखकर संतप्त रानी के नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी वह भी रानी के दुःख में सहभागिनी हो गई। शोक से संतप्त रानी बार-बार पुत्रों का मुख चूमती उनके गुणों का वर्णन करती अपने वक्ष स्थल को पीटती और अनेक प्रकार से रुदन करती थी।
इस प्रकार बहुत देर तक रानी का रुदन चलता रहा कुछ समय के बाद रानी ने जब गुणवती की तरफ देखा और उसके मुख को श्रृंगार से रचा हुआ देखा कि उसके मस्तक में कुंकु लगा हुआ है मांग में सिंदूर भरा हुआ है आँखों में काजल लगा हुआ है। मुख में ओठों में लाली ऐसी दिखाई देती है
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जैसे अभी-अभी इसने पान का बीड़ा खाकर मुख रंगा हो। गुणवती के ऐसे श्रृंगार को देखकर रानी यशोमति की क्रोधग्नि भड़क गई। उसने क्रोध में भरकर कहा हे गुणवती मेरे ऊपर दुःख का पहाड़ टूटा हुआ है। ऐसे समय तुम श्रृंगार करके यहाँ आई हो तुमको शर्म नहीं आती क्या, ऐसे समय आने की यही रीति है। तुमको यह उचित मालूम पड़ता है क्या तुम मेरा उपहास करने आई हो।
उठो तुम इसी समय अपने घर जा जाओ। मुझे अपमानितनी को मेरे हाल पर छोड़ दो ऐसा कहकर रानी ने दासी के द्वारा गुणवती को महल से निकाल दिया। गुणवती अपमानित होकर अपने घर आ गई। घर आने पर गुणवती के प्रति दुःख हुआ। चिंतित होकर सोचने लगी मैंने तो कोई श्रृंगार नहीं किया मैं तो सरल स्वभाव से रानी के दुःख प्रकट करने गई थी फिर रानी ने इस प्रकार का व्यवहार क्यों किया। कुछ समय बाद मंत्री के घर आने पर उसने पति से कहा हे प्राणनाथ आज मैं राजमहल में रानी से मिलने और उसके दुःख में सहभागिनी बनने के निमित्त गई थी परंतु रानी ने मुझे उल्टे वचन कहकर तिरस्कार करते हुए महल से बाहर निकाल दिया।
इस प्रकार के व्यवहार से मेरे मन में बड़ा दुःख हुआ मेरे मन में यही चिंता सता रही है कि रानी ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया। पति के वचनों को सुनकर मंत्री ने अनेक प्रकार से पति को समझाया कि रानी इस समय दुःख के सागर में डूबी हुई है ऐसे समय मन व्य्यथित रहता है। अगर रानी ने इस अवस्था में कुछ कह दिया या अनुचित व्यवहार किया तो अपने मन में बुरा नहीं मानना चाहिए। कल सवेरे जाकर रानी को सांत्वना देकर समझाना। मैं भी कल प्रातः काल राजसभा में जाकर राजा को सांत्वना दूंगा। गुणवती को पति के द्वारा समझाने पर मानसिक दुःख का बोझ कुछ कम हुआ। दूसरे दिन प्रातः नित्य कर्मों से निपटकर मंत्री राजदरबार में जाकर पहुँच गया। गुणवती भी पति की आज्ञा से रानी के सौंदर्य के लिए श्रृंगार और सौंदर्य का श्रृंगार किया।
महल में पहुँचकर रानी का क्रोध तमतमाने लगा। उसने क्रोधपूर्ण होकर दासी को तरह आज भी श्रृंगार और सौंदर्य की युक्त देखकर रानी का क्रोध तमतमाने लगा। उसने क्रोधपूर्ण होकर दासी को तरह आज भी राजसभा में राजा को बुलाने के लिये भेजा। राजा के आने पर रानी ने कहा देखिये आज अपने लिये कितने दुःख का दिन है ऐसे समय यह गुणवती कितने ठाठ बाट से सजधज और श्रृंगार करके आई है। कल भी इसी प्रकार से आई थी मैंने इसको महल के बाहर निकाल दिया था। फिर भी आज यह उसी प्रकार सजधज कर आई है। यह हमारे अधीन रहकर भी बाहर से प्रेम और अंदर से द्वेष की भावना रखती है। मेरे दोनों पुत्रों की मृत्यु देखकर इसके मन में बड़ी प्रसन्नता हुई है। मैं इस बात को सहन नहीं कर सकती आपको
(पृष्ठ १०१)
विश्वास न होते स्वयं देखले ऐसा कहकर रानी के श्रृंगार युक्त मुख को देखकर रानी के पास पहुँची। राजा रानी का कथन उसे सत्य मालूम पड़ने लगा।
राजा ने उसी समय आदेश देकर मंत्री और उसकी पति को कैद करके जेल में पिलवा दिया और मंत्री के घर का सब द्रव्य और सामान जब्त कर लिया। मंत्री और उसकी पति जेल में रहकर विचार करते हैं कि ऐसा क्यों हुआ हमने कोई अपराध न करने पर भी यह सजा क्यों मिल रही है। कौन सा पाप कर्म हमसे हुआ जिसका प्रायश्चित हमको भोगना पड़ रहा है। पति के वचनों को सुनकर गुणवती ने कहा हे स्वामी हमारा राजा अविचारी, क्रोधी और पति की सलाह को मानने वाले है ऐसे राजा के विषय में सोचना व्यर्थ है। हमारे प्रारब्ध का भोग हमको भोगना पड़ रहा है। इसको मिटाने के लिए सर्व दुःखनाशक दया के सागर भगवान पुरुषोत्तम ही हमारी रक्षा कर सकते हैं। उन्हीं की प्रार्थना करते हुए अपना समय व्यतीत करना चाहिए। वे ही हमें इस दुःख से छुटकारा देंगे। इस प्रकार हथकड़ी बेड़ी से जकड़े हुए, पति-पत्नी भगवान का निरंतर नाम स्मरण करते हुए जेल की यातना सहने लगे।
कुछ दिन व्यतीत होने पर भगवान को अपने भक्तों पर दुःख पड़ना असह्य हो गया। भगवान ने एक ही रात्रि में राजा और रानी को स्वप्न देकर आदेश दिया हे वीरबाहु राजा तू बड़ा मूर्ख है। तूने इन दोनों को बिना विचार किए और उसकी पति को जेल में डालकर बड़ा अन्याय किया है। तेरे दोनों बड़े पुण्यात्मा और मेरे भक्त हैं। इनको जल्दी से मुक्त कर दे नहीं तो मैं तेरा सब नष्ट कर दूंगा। वे दोनों मेरे अनंत भक्त हैं। उन्होंने अनेक अधिकमास में व्रत नियम धारण करके मेरी आराधना करके अक्षयपुण्य प्राप्त किया है। पूर्व जन्म में ये दोनों अत्यंत निर्धन थे फिर भी अधिकमास में मैंने इनको मंत्री पद प्राप्त हुआ और उसकी पति गुणवती को अखंड सौंदर्य बिना श्रृंगार किए ही स्पष्ट दिखाई देता है। गुणवती के माथे पर कुंकु आंखों में काजल मांग में सिंदूर मुख में पान की लालिमा ये सब अक्षयपुण्य के द्वारा धुलवा कर देख ले, ये वे सौभाग्य चिन्ह मिटते हैं कि नहीं तब तुझे पूर्ण विश्वास हो जायेगा। वे श्रृंगार चिन्ह अगर नहीं मिटते हैं, तो उनको निर्दोष समझकर जेल से मुक्त कर दे। तुम्हारी पति रानी ने अधिकमास की अपेक्षा की है और इसीलिये तुमको पुरुषोत्तम प्राप्त हुआ है, इस प्रकार का आदेश देकर भगवान
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अंतर्ध्यान हो गए। प्रातःकाल उठकर राजा ने स्वप्न के प्रतिविस्तार करता हुआ रानी से स्वप्न का वृतांत कहा। रानी ने भी राजा से कहा कि मुझे भी इसी प्रकार का स्वप्न दिखा है। दोनों वे स्वप्न की हथकड़ी बेड़ी खुलवाकर दासी के द्वारा रानी का मुख बारबार धुलवाया और पोंछा गया। परंतु पति की हथकड़ियों में कोई कमी नहीं हुई। फिर भी रानी ने स्वयं अपने हाथों से गुणवती का मुख धोया और पोंछा। बारबार धोने के बाद थी जब गुणवती के सौभाग्य चिन्ह जैसे के तैसे रहे तब रानी बड़ी लज्जित होकर गुणवती से क्षमा मांगने लगी कि हे गुणवती मैंने तुम्हारा अपमान किया और बंधन का कुछ दिया उसके लिए क्षमा कर दो। इस प्रकार और गुणवती को आदरपूर्वक राजमहल में लाकर उनका आदर सत्कार किया गया। राजा ने भी हाथ जोड़कर मंत्री को आदेश दिया। हे मंत्री आप महान पुण्यात्मा हो आपके लिये स्वयं भगवान ने स्वप्न देकर हमको आदेश दिया। आपने अधिकमास में किस प्रकार का अनंतपुण्य और आपकी पति ने अखंड श्रृंगार को प्राप्त किया।
हमको भी उसका विधान बताएं आगे आने वाले अधिक मास में हम भी नियम धारण करते हुए, भगवान पुरुषोत्तम की आराधना और क्षमा प्रार्थना करेंगे। रानी ने अधिक मास की उपेक्षा की जिसके प्रायश्चित में हमें पुत्रशोक प्राप्त हुआ। उन्हीं देवता को आराधना करके फिर से पुत्र सुख प्राप्त करेंगे। इस प्रकार राजा और रानी ने दोनों को संबोधित करके उनकी संपत्ति और मंत्रीपद देकर प्रसन्न कर दिया। राजा और रानी को अधिक मास का प्रत्यक्ष फल और अनुभव प्राप्त कर पूर्ण विश्वास हो गया। आगे आने वाले पुरुषोत्तम मास में राजा और रानी ने गुणवती के मार्गदर्शन में नियम धारण करते हुए व्रत उपवास भगवान पुरुषोत्तम का पूजन दान पुण्यकर्म करते हुए श्रद्धापूर्वक संपूर्ण मास व्यतीत किया। और भविष्य में आने वाले सभी अधिकमास में निरंतर पुण्यकर्म करते रहे। इसके पुण्य प्रभाव से राजा के राज्य का और अधिक विस्तार होकर यशकीर्ति और पराक्रम में वृद्धि हुई और रानी को अत्यंत सुंदर सर्वगुण संपन्न ऐसे पांच पुत्र उत्पन्न हुए जिससे उसका पूर्व पुत्र शोक नष्ट हो गया। और रानी को अत्यंत संसार में जीवित रहे सभी प्रकार का सुख भोगकर अंत में मोक्ष को प्राप्त हो गए।
॥ जै जै श्री अधिकमास महात्म्य सार बृहत्नारदीय पंचविंशतितमोऽध्यायः समाप्त ॥
(२५)
॥ शुभमभवत् ॥





Adhik mass ki Katha 24 adhyaya | अधिक मास की कथा 24वा अध्याय

 Adhik mass ki Katha 24 adhyaya | अधिक मास की कथा 24वा अध्याय 


॥ श्री गणाधिपतये नमः ॥
श्री भगवान नारायण नारदजी से सूतजी पौराणिक ऋषियों से कहते हैं। हे ऋषियों! लक्ष्मीजी अब आप कृपाकर बतायें कि अधिक मास में दान करने से किस फल की प्राप्ति होती है। भगवान विष्णु कहते हैं, हे लक्ष्मी! जो मनुष्य अधिक मास में अपनी शक्ति के अनुसार सुपात्र ब्राह्मण को सुवर्ण का दान करते हैं। उनकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। दुःख दारिद्रय की बाधाएं आजीवन पर्यंत नहीं होती। गौदान करने वाले को मृत्यु के उपरांत अनेक कल्पों तक ब्रह्मलोक में निवास करने का फल प्राप्त होता है। जो चांदी का दान करते हैं वे चांदी का दान करके पितृलोक में निवास करते रहे अपने पितरों का उद्धार करते हैं। तंबा या तांबे का पात्र देने से पार्वती सहित भगवान शंकर प्रसन्न होते हैं। उनकी प्रसन्नता से मनुष्य सर्वत्र आनंद और सुख भोगता है। रत्नदान करने से दूसरे जन्म में राजा के घर में जन्म होता है।
मोती का दान करने से मुक्ति की प्राप्ति होती है। कंबल का दान करने से मनुष्य के अनेक जन्मों का पाप नष्ट होता है। सूती वस्त्रों का दान मनुष्य को चंद्रलोक का फल देता है। अत्र का दान महादान कहलाता है। अत्र वज्रल का दान अक्षय पुण्य को देता है। जूता चप्पल या पैरों में पहनने योग्य वस्तु का दान मृत्यु के बाद यमदूतों की यातना से मुक्ति देता है। घी और घी से भरा हुआ पात्र का दान सूर्यलोक का पुण्य देता है। तिलपात्र का दान रुद्रलोक का पुण्य देता है।
हे लक्ष्मी! पुरुषोत्तम मास में द्वादशी के दिन पुरुषोत्तम भगवान और शंकरजी की पूजा करके सुपात्र ब्राह्मण को भी पूजा करके अपनी शक्ति के अनुसार पहले कहे गए वस्तुओं का दान श्रद्धा के सहित संकल्प पूर्वक करना चाहिए। और अमावस को उद्यापन कर्म विद्वान ब्राह्मण के द्वारा विधान पूर्वक कराना चाहिए। शुद्ध घी इलायची शक्कर आदि पदार्थों से बना हुआ मालपुआ, अनरसा या लड्डू तैंतीस की संख्या में कांसे का पात्र या अपनी शक्ति के अनुसार तांबा या पीतल के पात्र में रखकर सुपात्र ब्राह्मण को दान देना चाहिए। इस दान से ही पुरुषोत्तम मास के समस्त नियम व्रत आदि जो भी धारण किए हैं उनकी पूर्ति होती है। इस कर्म के द्वारा दान देकर मनुष्य निर्विघ्नता और अनेक सुखों को प्राप्त करता है। उसकी समस्त मनोकामनाएं परिपूर्ण होती हैं। जन्मजयांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं।
इसलिए मनुष्य को पुरुषोत्तम मास में अपनी शारीरिक शक्ति के अनुसार कोई भी नियम धारण करके श्रद्धापूर्वक द्रव्य का मोह लोभ त्याग कर दान कर्म अवश्य करना चाहिए क्योंकि मनुष्य की आयु फटे दूध के समान दिन प्रतिदिन कम होते जाती है। कब आयु समाप्त होकर मृत्यु हो जाए इसका कोई निश्चित नहीं है। आगे आने वाला पुरुषोत्तम मास देख सकें या नहीं यह भी निश्चित नहीं है। गंगा, गया, कांची, पुष्कर, रेवा, मही, शिवा, यमुना, चंद्रभागा, गोदावरी, कुरुक्षेत्र ये सब पवित्र तीर्थ पुण्यदायक हैं फिर भी पुरुषोत्तम मास के पुण्य की बराबरी नहीं कर सकते।
जैसे उत्तम भूमि में बोया हुआ बीज असंख्य बीज उत्पन्न करता है। गुरुबल की एकलता असंख्य पत्ते उत्पन्न करती है। दूर्वा का एक अंकुर शीघ्र ही असंख्य अंकुरों में उत्पन्न होती है। उसी प्रकार पुरुषोत्तम मास का किंचित भी नियम व्रत आदि कर्म अनंत पुण्य देने वाला होता है। इसलिये मनुष्य को पुरुषोत्तम मास में यथा शक्ति कर्म अवश्य करना चाहिए। है तुमसे पुरातन का एक इतिहास कहता हूं। एक समय ऋषिगण अरुंधती और पार्वतीजी आपस में संवाद चल रहा था। अरुंधती ने हाथ जोड़कर पार्वती से विनय किया है उमा आपने मुझे पुरुषोत्तम मास के निर्मल पुण्य का वर्णन कहा। अब अधिक मास में पुण्य प्राप्ति का कर्म और बताईयेगा। पार्वती जी अरुंधती के वचनों को सुनकर कहती हैं कि मैं एक समय अपने पति के पास बैठी हुई थी उसी समय मेरी माता मेरे पास आकर स्नेहपूर्वक कहती हैं। हे पुत्री तुम मुझसे उत्पन्न होकर तीनों लोक में विख्यात हो गई हो। और सारा संसार तुम्हारी पूजा करता है।
परंतु मुझे और मेरे नाम तक को कोई नहीं जानता ब्रह्मा आदि देवता तक तुम्हारी आराधना करते हैं। तुम्हारी माता होने का सौभाग्य मुझे अवश्य प्राप्त हुआ है। परंतु मेरी ख्याति सिर्फ अपने घर परिवार तक ही सीमित हैं। सांसारिक मनुष्य कोई मुझे नहीं जानते। प्रत्येक दिन पक्ष मास पर्व और प्रत्येक शुभकार्यों में तुम्हारी पूजा होती हैं। परंतु मेरे नाम से मेरे मस्तक पर कोई एक फूल तक नहीं चढ़ाता। ऐसी अवस्था में तुम्हारी माता होने का मुझे क्या श्रेय मिला। वर्ष के तीनसौ पैंसठ दिन सभी तुम्हारी पूजा और व्रत में लोग व्यतीत करते हैं। परंतु मुझे लोग आधी घटी तक भी याद नहीं करते। हे अरुंधती माता के ऐसे वचनों को सुनकर मैंने हंसते हुए माता से कहा कि हे माता आप ऐसा क्यों बोलती हो। यद्यपि संपूर्ण बारह मास लोग मेरी पूजा करते हैं। परंतु अत्यंत धार्मिक और पुण्यदाता ऐसा जो अधिक मास होता है उसमें कोई मेरी पूजा नहीं करता। इसलिये मैंने अधिकमास आने पर मैं तुम्हारी पूजा करूंगी ऐसी सांत्वना देकर अधिक मास को पुण्यदाई और कृपा करके मुझे विस्तार पूर्वक बताइये।
पार्वतीजी के वचनों को सुनकर अरुंधती जी कहती हैं। हे कल्याणी आपने अधिक मास में किस प्रकार किस विधान से माता का व्रत और पूजन किया तथा उस व्रत के द्वारा कौन से पुण्य की प्राप्ति होती है कृपा करके मुझे विस्तार पूर्वक बताइये।
पार्वतीजी कहती है, हे सखी तुमने जन कल्याण के लिये उत्तम प्रश्न किया है। मैंने अपनी माता की ख्याति के लिये अधिकमास के उनके प्रति समर्पित कर दिया है। हे अरुंधती अधिकमास की शुक्लपक्ष की तृतीया के दिन किसी जलाशय कुंआ, नदी, तालाब अथवा अपने घर में शुद्ध जल से स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करे नित्य नैमित्तिक संध्या पूजा करके घर के पवित्र स्थान में गोबर से लीपकर चौकपुरकर पलाश की लकड़ी का आसन रखना चाहिए। आसन पर सुंदर वस्त्र बिछाकर माता की मूर्ति ऐसी बनी हो जो हांथी पर पति और पुत्र के सहित बैठी हुई अनेक अलंकार और वस्त्रों से सुशोभित ऐसी सुंदर माता की मूर्ति को आसन पर स्थापित करना चाहिए।
विद्वान ब्राह्मण के द्वारा मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करके पाद्य, स्नान, अर्घ्य, अक्षत पुष्प, धूपदीप, नैवेद्य, पान, सुपारी, फल, दक्षिणा समर्पित करके आरंभी श्रद्धा पूर्वक पुष्पांजलि जलाकर नित्यपूजन में श्रद्धा पूर्वक करना चाहिए। धन का लोभ त्यागकर संपूर्ण मास पर्यंत अखंडदीप जलाकर माता के प्रति अर्पण करना चाहिए। शरीर में जैसे उत्पन्न होने वाले फल और फूलों को तथा स्वादिष्ट व्यंजनों को माता के प्रति अर्पण करना चाहिए। शरीर में जैसी शक्ति हो उसके अनुसार व्रत उपवास या एक समय भोजन का नियम धारण करना चाहिए। यदि शरीर शक्तिहीन हो तो पहले और आखिरी दिन का उपवास या पूजन हवन करके अंत में अमावस के दिन माता की सुवर्ण की मूर्ति बनाकर विद्वान ब्राह्मण के द्वारा पूजन हवन करके संकल्पपूर्वक वस्त्र और अलंकार के सहित मूर्ति का दान करना चाहिए। यदि मनुष्य में धन संपन्नता हो तो पांच ब्राह्मण पति के सहित आमंत्रित करके उनका पाद प्रक्षालन करके उनका यथाशक्ति वस्त्र दक्षिणा देकर आशीर्वाद ग्रहण करके व्रत की पूर्ति करनी चाहिए। हे अरुंधती इस प्रकार जो भी क्रिया या स्त्रियां इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करेंगी उनको संपूर्ण पुरुषोत्तम मास के पुण्य की प्राप्ति होगी। मनुष्य सांसारिक बाधाओं से छुटकारा पाकर सुख और शांति का जीवन व्यतीत करेंगे तथा अखंड सौभाग्य और पुत्र पौत्रादिकों का सुख प्राप्त करके अंत में मोक्ष को प्राप्त करेंगे। यह माता मैंने का व्रत और पूजन समस्त सांसारिक सुख को देनेवाला अंत में मोक्ष को देने वाला है।
जे जै श्री अधिकमास महात्म्य सार
ब्रह्मरादिय पद्याधारे चतुर्विंशतितमो ऽध्याय: समाप्त
(२४)
।। शुभमभवतु ।।






Adhik mass ki Katha 23 adhyaya | अधिक मास की कथा 23वा अध्याय


Adhik mass ki Katha 23 adhyaya | अधिक मास की कथा 23वा अध्याय 




 ।। अथ त्रयोविंशतितमो ऽध्याय: प्रारंभ: ।।

श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकदि ऋषियों से कहते हैं, भगवान विष्णु के द्वारा स्नान के महात्म्य को सुनकर लक्ष्मीजी प्रसन्न होकर प्रश्न करती हैं। हे महाप्रभु अब आप कृपाकर धारणा पारणा (एकांतोरपवास) व्रत के महात्म्य का वर्णन सुनाइयेगा। और यह किससे किया और कैसे फल को प्राप्त किया, सो बताने की कृपा करें। भगवान विष्णु कहते हैं, हे लक्ष्मी विंध्य पर्वत के एक भाग में अमरकंटक नाम का पर्वत हैं। उसी पर्वत में नर्मदाजी का उद्रम स्थान है। उस पर्वत पर सन्यासी जिसे भगवान शंकर निवास करके तपस्या करते हैं। नर्मदाजी का साक्षात शंकर का वर हस्त मानी जाती है। जिसे मनुष्य अपनी मनोरकामनाओं को प्राप्त करते हैं। वैसे ही नर्मदाजी का स्नान परिक्रमा और पूजा नर्मदा नदी के किनारे बड़े बड़े तीर्थस्थल और भगवान शंकर के मंदिर बने हुए हैं। इसी प्रकार भृगुच्छ नाम का एक नगर है। उस नगर में सदाचार संपन्न सत्यवादी कुशल शर्मा नाम का ब्राह्मण रहता था। सुंदर और पतिव्रता कुशलावती नाम की उसकी पति थी। वे दोनों पति-पति अपने धर्म कर्म में लगे हुए जीवन यापन करते थे। उनकी मेधावती नाम की कन्या थी। कन्या जब विवाह योग्य हुई तब ब्राह्मण ने पदमनाभ नाम का ब्राह्मण पुत्र जो कि सुंदर सुशील और विद्वान था उसके साथ अपनी कन्या का विवाह कर दिया। कन्या अपने पति के घर में आनंदपूर्वक रहने लगी। दोनों पति पति में अनंत प्रेम था। एक दिन का भी वियोग दोनों को असह्य था। कुछ दिनों के बाद भाग्य की विवित्रता से एकदिन पदमनाभ नर्मदाजी में स्नान करने गया। अपने समवयस्क लोगों से जल क्रीड़ा करते हुए पानी में डूबने लगा। साथ के लोगों को जब वह नहीं दिखाई दिया तब लोग घबड़ाकर उसको पानी में ढूढने लगे। परंतु उसके प्राण जा चुके थे वह मृत हो चुका था। तुरंत लोगों के द्वारा उसके शरीर को निकालकर बाहर लाए। उसके घर पहुँचा। उसके मातापिता और पति रोते दहाकार करते हुए वहां आए। पति उसके मृतशरीर को गोद में लेकर छाती पीटती हुई रुदन करती रही है देव हे जगन्नाथ मैं इस वैधव्यता का दुख कैसे भोगूंगी।

प्राण क्यों नहीं निकलते। मेरा सौभाग्यही जहां डूब गया अब मैं इस जीवनरूपी सागर को कैसे पार करूंगी। पति के बिना जैसे मछली तड़पती है। उसी प्रकार से वह तड़प रही थी। उसी प्रकार से कुछ दिनों तक सास-श्वसुर के पास रही कुछ दिनों बाद पिता ने उस दुखी कन्या को सांत्वना और धीरज देने के तन्मित अपने घर ले आए। परंतु माता पिता के घर आने के बाद भी उसका दुःख कम नहीं हुआ रात दिन रोती, तड़पती हुई अपने भविष्य में सोचती रहती थी।

आखिर अपने पूर्वजन्म का पाप उदय हुआ यह समझकर उसके प्रायश्चित करने के लिये कोई व्रत या देवता की आराधन करना चाहिए। इस निमित एक बालिका ने अपने पिता से कहा, हे पिता मेरे दुःख को दूर करने के लिये आप कोई व्रत आदी साधन मुझे बताइये। जिसके द्वारा मैं दुःख से छुटकारा पाकर भवसागर से पार हो जाऊं। कन्या के वचनों को सुनकर पिता ने कहा हे पुत्री अब से तोत्तम मास भगवान पुरुषोत्तम का मास आनेवाला हैं। उस मास में एकांतोरपवास जिसको धारणा पारणावत भी कहते हैं, करने से मनुष्य के पापों का समूह नष्ट हो जाता है। सभी दुःख दूर होते है। और मनुष्य भव्यवसागर से पार हो जाता है। पिता के वचनों को सुनकर मेधावती प्रसन्न होते हुए समय व्यतीत होने पर पुरुषोत्तम मास प्रारंभ हुआ तब पिता के कथनानुसार नियम धारण करके हुए ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नर्मदाजी में स्नान करना, भगवान पुरुषोत्तम की पूजा करना, विप्रपूजा करके यथा शक्ति दान देना, भूमि पर शयन करना, एकदीत उपवास करके दूसरे दिन हविष्य खाकर पारणा करना अखंडदीप की स्थापना आदि इस प्रकार नियमपूर्वक बड़ी श्रद्धा से संपूर्ण मास पूरा करके उपवास के दिन विधिवत उद्यापन किया। इस प्रकार उसने अपने जीवन में अनेक पुरुषोत्तमास नियम और श्रद्धापूर्वक संपूर्ण किया। समय व्यतीत होते बुद्धवस्था आने पर शरीर कृश हो गए और उसका अंत समय प्राप्त हो गया। पुण्य के प्रभाव से और भगवान शंकर की महान भक्ति के कारण मृत्यु के बाद वह मेधावती की आत्मा शिवलोक में पहुंच कर पार्वतीजी की सखी हो गई। वहां अनेक सुखों को भोगकर पृथ्वी पर फिर से जन्म लिया। काशी नगरी में विशालाक्षी नामक तपस्विनी के रूप में प्रसिद्ध हुई। आज भी काशी में विशालाक्षी मंदिर है लोग उसके पूजा करके अपना मनोरथ पूर्ण करते हैं। हे लक्ष्मी पुरुषोत्तम मास का धारणा पारणावत शरीर को अरोग्यता देनेवाला, अंत में मोक्ष देने वाला है। इसी व्रत के प्रभाव से वह मेधावती मानव शरीर वाली होकर दूसरे जन्म में देव स्वरूप हो गई।

हे लक्ष्मी मेधावती की एक सखी कोमला नाम की ब्राह्मणी थी उसे भी पुण्य के प्रभाव से मृत्यु के बाद शिवलोक से अधिक मास में नरक भोजन में जन्म लेकर तपस्या के प्रभाव से मंगलागौरी के नाम से आज भी प्रसिद्ध है। हे लक्ष्मी पुरुषोत्तम मास का अद्भुत पुण्य है। जिसका वर्णन हजार मुख वाले शेषनाग भी करने में असमर्थ है। इतनी कथा सुनकर लक्ष्मीजी कहती हैं, हे महाप्रभु अब आप विप्रसेवा के महात्म्य का वर्णन सुनाइयेगा। भगवान कहते हैं, हे लक्ष्मी मैं तुम से इस विषय का एक इतिहास सुनाता हूँ। भरतखंड में विराट नाम का देश है। उस देश में अनेक पुण्यशाली और धनिक लोग रहते थे। उस नगर में अनेक मंदिर थे कुएं बावली तालाब और बगीचों से वे नगर हमेशा संपन्न और सुखी रहेगा। वहां परमार्थिक कर्म होते रहने से देवताओं को प्रसन्न वरदान दिया था कि शंकरजी का भी मंदिर है। चारों वर्णों के लोग अपने कर्म धर्म में लगे रहकर सभी प्रकार से सुखी और प्रसन्न है। उसी नगर में धनदास नाम का एक शूद्र रहता था। वह धनसंपन्न था और उसके अनेक नौकर थे। परंतु वह हमेशा ब्राह्मणों को आमंत्रित कर अपने हाथ से ब्राह्मणों का पादप्रक्षालन और पूजा करता था और अनेक प्रकार के दान देकर संतुष्ट करता था। अनेक पर्व के समय स्वयं ब्राह्मण के घर जाकर झाडू लगाए, कपड़े धोए, उनकी आवश्यक इच्छित वस्तु को बाजार से लाकर देना ये सब स्वयं पति के सहित करता था। उसकी पति भी पति का अनुसरण करते हुए विप्र पत्नियों की सेवा करती रहती थी। धनदास को अपने ऊपर धन संपन्न होने का कोई गर्व नहीं था वह विप्रसेवा में कितना भी धन क्यों न खर्च हो जाए उसके मन में चिंता नहीं होती थी। इस प्रकार विप्रसेवा करते हुए उसकी आयु बहुत बीत गई। अचानक दैव के प्रभाव और पूर्वजन्म के कर्म के प्रभाव से धनदास के शरीर में काफी कष्ट का रोग उत्पन्न हो गया। जगह जगह उसके शरीर में व्रण (घाव) खून और पीब बहने लगी। रोग को देखकर धनदास मन में बहुत उदास रहने लगा। कि अब मेरे से ब्राह्मणों की सेवा कैसे होगी। इसी चिंता ग्रस्त स्थिति में एक समय एक सिद्ध पुरुष धनदास के घर आए उनसे उसने अपने मन का दुःख प्रकट किया। उसके दुःख को सुनकर सिद्ध पुरुष ने कहा हे धनदास तू चिंता छोड़ दे तूने जो विप्रसेवा की है, उसका पुण्य तुझे अवश्य प्राप्त होगा। तेरी अच्छी मृत्यु होगी और मृत्यु के बाद तू और तेरी पति सुंदर विमान पर बैठकर स्वर्ग लोक को जाओगे। ऐसा कहकर सिद्ध पुरुष वहां से अंतर्धान हो गए। सिद्ध पुरुष के शब्दों को यादकर धनदास बहुत प्रसन्न हुआ अपने धन संपदा के तीन भाग किए।

एक भाग अपने पुत्र को दूसरा भाग कन्या को और तीसरा अपने साथ लेकर तीर्थ यात्रा को पत्नी समेत निकल गया। अनेक तीर्थों में अपने धनका दान कर दिया। तीर्थ क्षेत्र में रहते हुए, ही दोनों पति पति की एकही दिन मृत्यु हो गई। अपने पुण्य के प्रभाव से सुंदर विमान पर बैठकर उन दोनों की जीवात्मा स्वर्ग लोक को चली गई। हे लक्ष्मी विप्रसेवा का महात्म्य देवताओं की पूजा से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। मैंने भी जब पृथ्वीपर जन्म लिया तब विप्रसेवा अवश्य की है।

(२३)

बृहत् नारदीय पद्माधारे त्रयोविंशतितमो ऽध्याय: समाप्त ।।

।। शुभमभवत् ।।