जोड़ जोड़ भर लिये खजाने । Jod Jod Bhar Liye khajane

 ​(तर्ज़: थाली भर कर)

​जोड़ जोड़ भर लिये खजाने, फिर भी तृष्णा अड़ी रही।

धरे रहे तेरे रंगले बंगले, खाली बाहर दरी रही॥टेर॥

​एक ब्राह्मण की सुनो कहानी, पूजा करने आया था।

न्हाये धोय कर नदी किनारे, आसन खूब लगाया था॥

आ गया राम का परवाना, हाथ में माला पड़ी रही॥१॥

​पहन पोशाक बांधकर पगड़ी, दुकान पर एक सेठ गया।

जाते ही एक चकर आया, पाँव फैलाकर लेट गया॥

कूच कर गया लिखने वाला, कलम कान में पड़ी रही॥२॥

​सैर करने को एक बाबूजी, गाड़ी में असवार हुए।

गाड़ी अभी चलने नहीं पाई, बाबू ठण्डे हार हुए॥

लगा तमाचा एक काल का, सड़क पर टमटम खड़ी रही॥३॥

​बंगले ऊपर एक स्त्री, चढ़ी श्रृंगार बनाने को।

भरी सलाईं सुर में वाली, सुरमा आँख लगाने को॥

काल गुरुदेव आई पीछे से, सुरमादानी धरी रही॥४॥

​गौरी शंकर चलो प्राणी, झगड़े और बिषाद तजो।

जाने दो सारी बातों को, अब तो सीताराम भजो॥

खिल-खिल मिल गया फूल खाम में, सदा यही फलझड़ी रही॥

​धरे रहे तेरे रंगले बंगले

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