बिनजारी ए हंस हंस बोल।binjari a hans hans bol

 बिनजारी ए हंस हंस बोल, बाता थारी रह जासी।

सौदागर सोमत जाग, टांडो थारो लड़ जासी॥१॥

काया थारी काचली रे, कोई रही पवन से फूल।

इक दिन हंसा उड़ चले रे, जद मिले रे धुल में धूल॥२॥

सतगुरू के दरबार में, रे लम्बी पेड़ खजूर।

चढ़ें तो मेवा चाख लूं, कोई पड़ती का चकनाचूर॥३॥

कंठी माला काठ की रे, माय रेशमी सूत।

सूत विचारों कोई करे, जद फेरन वालो कपूत॥४॥

मखियाँ बैठी शहद पे रे, कोई रही रे पंख लिपटाय।

उड़ने का सांसा पड़या, कोई लालच बुरी रे बलाय॥५॥

बाल पणो तेने खेल गमायो रे, कोई कीन्यों ना हरि से हेत।

अब पछतायाँ कोई होवै, जद चिड़िया चुग गई खेत॥६॥

कोठी ऊपर मालियो रे, कोई जाँपर बैठया मोर।

मोर विचारों कोई करे, जद घर में घुस गया चोर॥७॥

टांडो थारो लड़ रहयो रे, कोई हो गयो लाद पलाय।

रामानन्द का भणै कबीरा, कोई मौज उड़ाया॥८॥

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