भजन
म्हाँरी सोन री चीड़ी ए म्हाँरी रूप री चीड़ी।
काया के कारीगर हरि ने किया बिसरी॥ ए म्हाँरी
नौ दस मास तन थड़ता लाग्या काया से घड़ी।
शेर कूथार बान्ध्यो पड़ियो... हीरां रो जड़ी॥ ए म्हाँरी
पानी पाव चुगो चुगाव हरि भरी
पल पल में थारी खबरान्दिन्ही जाने क्युँ बिसरी॥ ए म्हाँरी
छाछ छालता छाती फाट, दुध घालणो दोरो।
घी की बरीया आँसू आव, झूठ बोलणो सोरो॥ ए म्हाँरी
अरन की चोरी करी रे, करे सुई को दान।
ऊँची चढ़ देखन लागी-कद आसि विमान॥ ए म्हाँरी
कहे कबीर सुन एक माली, ओ पद है निमाणीं।
आप थां की तू नै जाणी, स्वर्ण पालखी आणी॥ ए म्हाँरी
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