Adhik mass ki Katha 28 adhyaya | अधिक मास की कथा 28अध्याय
॥ अथ अठ्ठाविंशतितमोऽध्यायः प्रारंभ ॥
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकादि ऋषियों से और भगवान विष्णु लक्ष्मीजी से कहते हैं। हे लक्ष्मी! पहले एक समय सोपदेश में उग्र सुमति नाम का एक प्रख्यात राजा हो चुका है। वह राजा महान धर्मात्मा, दानी, अहंकार रहित सदाचार संपन्न और भगवान का भक्त था। नित्य भगवान की पूजा आराधना करना और अनेक पुराणों का श्रवण करना। इसी प्रकार वह अपनी दिनचर्या बनाकर पुत्र के समान प्रजा का पालन किया करता था। राजा की स्त्री का नाम सत्यमती था। वह भी पतिव्रता के धर्म से परिपूर्ण महासौभाग्यवती सभी शुभलक्षणों से संपन्न, और भगवद् भक्ति से परिपूर्ण थी। भगवान की कृपा और अपने पुण्यकर्मों के प्रभाव से राजा रानी दोनों को अपने पूर्वजन्म का वृत्तांत संपूर्ण स्मरण था। इसी कारण से वे दोनों इस जन्म में भी जब जब अधिक मास आता तब बड़ी भक्ति और श्रद्धा से नियमव्रत धारण भगवान पुरुषोत्तम का पूजन, अनेक प्रकार के दान कर्म करते हुए व्यतीत करते।
जनसमुदाय को सुख देने के निमित्त कुंए, बावली, तालाब का निर्माण करवाते थे और यश का प्रसार हो गया। एक समय राज्य में अंगिरस ऋषि का अनेक शिष्यों के साथ आगमन हुआ वे सब भ्रमण करते हुए राज भवन की ओर पहुंचे। ऋषि का आगमन सुनकर राजारानी दोनों मुख्यद्वार पर जाकर मुनि के चरणों में प्रणाम करके आदर पूर्वक राजमहल में लाकर उत्तम सिंहासन पर बैठाया और पाद्य अर्घ्य आदि के द्वारा उनका पूजन किया उनके आसन के पास नीचे बैठकर आदरपूर्वक हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए कहा हे मुनिराज आपके आगमन से मैं कृतार्थ हो गया। मेरा अहो भाग्य है जो आप इस भवन में पधारे इसको अपने चरणरज से पवित्र कर दिए। संतो का आगमन, और संतो की कृपा से दुर्बुद्धि होकर धर्म के प्रति अनुराग की वृद्धि होती है। जिस पर संतो की कृपा हो जाय उसको तीनों लोक में ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो न प्राप्त हो सके। संतो के चरणों का जल अपने सिर में धारण करते ही समस्त तीर्थों का पुण्य प्राप्त हो जाता है। आपके आगमन और दर्शन से मेरे समस्त संसार में कोई पुण्यवान नहीं होगा ऐसा मैं समझता हूं। राजा के ऐसे नम्रतापूर्ण वचनों को सुनकर ऋषि बड़े प्रसन्न होकर राजा के सिरपर हाथ फिरते हुए कहते हैं, हे राजन, तेरे जैसे धर्मात्मा और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को जानने वाले और नम्रता और विनय से युक्त शब्दों को सुनकर मन में बड़ी प्रसन्नता हुई।
विनय के द्वारा संसार में सभी अप्राप्य वस्तुओं को मनुष्य प्राप्त कर लेता है। हमेशा तेरा और तेरी प्रजा का कल्याण हो यह मेरा आशीर्वाद है। तुम दोनों पति पत्नि सदाचार संपन्न और भगवान के भक्त हो। धन राज्य और ऐश्वर्य के मद में लोग भगवान की भक्ति से विमुख हो जाते हैं। परंतु तुम्हारे पूर्वजन्म में ऐसा कौन सा पुण्य कर्म किया जिसके प्रभाव से तुम्हारी बुद्धि स्थिर है और भगवान के प्रति वैसी ही श्रद्धा बनी हुई है। ऋषि के वचनों को सुनकर राजा सुमति हाथ जोड़कर कहता है।
हे ऋषिवर आप त्रिलोकज्ञ हैं। हाथ में आंवले के समान भूत भविष्य वर्तमान को जानते हैं फिर भी आप मुझ से पूछते हैं तो आपकी आज्ञा से मैं अपने पूर्वजन्म का वृतांत कहता हूं। हे मुनिवर मैं पूर्वजन्म में वीरनामा नाम का वैश्य था। मैं जाति से वैश्य जरूर था लेकिन मेरे कर्म शूद्र से भी पतित थे। मैंने अपने जीवन में अनेक पाप कर्म किए। ब्राह्मणों की संपत्ति जबर्दस्ती अपहरण की। चोरी डकैती दूसरों का वध करना यही मेरा नित्य कर्म था। दूसरों को अपशब्द बोलना, कष्ट देना, धन का हरण करके वेश्यालय में खर्च करना मदिरा और मांस का भक्षण करना, यही मेरा कर्म था। मेरे इस कर्म से बंधु बांधव पारिवारिक जन और गांववासी सभी कुपित थे कोई मुझ से बात नहीं करता और अपने दरवाजे पर खड़ा नहीं रखता था इस प्रकार बहुत समय व्यतीत हो गया। लोगों के तिरस्कार से दुःखित होकर मैंने गांव छोड़ दिया और जंगल में पत्ते की झोपड़ी बनाकर रहने लगा। और जंगली जीव, पक्षी, मृग आदि को मारकर उनका मांस भक्षण करके किसी प्रकार दिन बिताने लगा। परंतु जंगल में भी कभी पशु पक्षी का शिकार नहीं मिलता तो भूखा ही रहना पड़ता इस प्रकार भूख से व्याकुल होकर जंगल में घूमता रहता था।
एक समय भूख से व्याकुल जंगल में घूमता हुआ काफी दूर निकल गया वहां मैंने एक स्थान ऐसा देखा कि अत्यंत जीर्ण अवस्था में भगवान विष्णु का मंदिर है। पास में ही सुंदर स्वच्छ जल से भरा हुआ तालाब है कमल खिले हुए हैं और अनेक प्रकार के पक्षी कलरव कर रहे हैं। तालाब के समीप जाकर उसका जल पीकर मन को शांति मिली और विश्राम के निमित्त एक वृक्ष के नीचे लेट गया। इधर मेरी पत्नि मेरे चले जाने के बाद दुःखित होकर इधर-उधर भटकने लगी मेरे बंधुजनों ने मेरे न रहने पर संपत्ति का अपहरण करके मेरी पत्नि को निकाल दिया कोई भी अपने पास उसको आश्रय देने को तैयार नहीं था। मेरे दुष्कर्मों का फल मेरी पत्नि को भी भोगना पड़ रहा था। दुःखित होकर उसने भी जंगल में प्रवेश किया और भटकती भूख प्यास से दुःखित उसी जगह पहुंची जहां मैं लेटा हुआ था। उसको देखकर मुझे भी दुःख हुआ मैंने उसको कुछ जंगली फल खाने को दिए फल खाकर जलपीकर उसका मन कुछ शांत हुआ मेरे पास आकर बैठ गई। और कहने लगी हे स्वामी जानते हुए अथवा अनजानते हुए जो भी पाप मनुष्य से हो जाते हैं उस कर्म का फल मनुष्य को जीवन पर्यन्त और मृत्यु के बाद रौरव आदि नरकों की यातना से दुःख भोगना पड़ता है। अपने पूर्व कर्मों का प्रायश्चित न करने से निरंतर पाप होते रहते हैं। और कभी दुःख से छुटकारा नहीं मिलता। मैंने ज्ञानी और धार्मिक पुरुषों से सुना है कि भगवान के नामों में इतनी शक्ति है कि जन्म जन्मांतर के समस्त पापों को नष्ट करके मन को शांति और सुख की अनुभूति देता है।
जो भगवान का नाम स्मरण करनेवाले भक्त हैं। जो भगवान के मंदिर में जाकर मंदिर की साफ सफाई पूजन और भजन कीर्तन नाम स्मरण करते हैं। ऐसे लोग समस्त पापों से मुक्त होकर संसार में सुखी जीवन व्यतीत करते हुए अंत में मोक्ष को प्राप्त करते हैं। यही कर्म यदि अधिक मास में किया जाय तो अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है। ऐसा मैंने विद्वानों से सुना है। इतना दुःख भोगने के बाद अब यदि अपना कल्याण चाहने की इच्छा हो तो समस्त दुष्कर्मों को छोड़कर अपना भविष्य बनाने के लिए धर्म का आचरण करो। ऐसी ज्ञान पूर्ण बातों को सुनकर मेरे मन में भी पाप कर्मों का प्रायश्चित करने की इच्छा जागृत हुई। हम दोनों पति पत्नि वही रहकर नित्य भगवान विष्णु के मंदिर को स्वच्छ रखकर भगवान का पूजन और नाम स्मरण करते हुए, हिंसा त्यागकर, जंगल में उत्पन्न कंद फलों को खाकर समय व्यतीत करने लगे। जंगल में रहने से हमको महीना पर्व और अधिक मास का ज्ञान नहीं था फिर भी निरंतर भगवान की आराधना में लिप्त रहने से हमारे जीवन में अनेक अधिमास व्यतीत हुए उसी पुण्य के प्रभाव से हमें इस जन्म में समस्त सुख वैभव राज्य प्राप्त हुआ और पूर्वजन्म की सब बातें याद हैं।
राजा सुमति के द्वारा पूर्व जन्म का वृतांत और अधिक मास के माहात्म्य को सुनकर अंगिरस ऋषि बड़े प्रसन्न हुए। राजा को आशीर्वाद देकर अपने आश्रम को प्रस्थान कर गए। राजा सुमति भी निरंतर धर्माचरण पर चलकर अधिक मास में भगवान पुरुषोत्तम की आराधना करता हुआ सांसारिक सुखों को भोगकर अंत में मोक्ष को प्राप्त हुआ। सूतजी कहते हैं कि हे ऋषियों इसी कथा प्रसंग को अर्थात लक्ष्मी और विष्णु के संवाद वाल्मीकि ऋषि दृढधन्वा को पूर्व के कथा प्रसंग में सुना रहे थे। उन्होंने कहा हे राजन संसार में भगवान पुरुषोत्तम के समान महान पुण्यदाता कोई देवता नहीं है। अधिकमास के देवता भगवान पुरुषोत्तम है उन्होंने अपने सब गुण धर्म अधिमास को दे दिए हैं इसीलिए भगवान पुरुषोत्तम के सदृश अधिकमास भी उन्हीं के सदृश पुण्य और मोक्ष देने में सामर्थ्यशील है। हे राजा तू भाग्यशाली है। इसीलिए निरंतर अधिकमास में व्रत नियम धारण करते हुए भगवान पुरुषोत्तम की आराधना करता रहता है। तेरा सर्वदा कल्याण हो। ऐसा कहकर वाल्मीकि ऋषि ने जाने की इच्छा प्रकट की। राजा ने ऋषि का पूजन करके उनको विदा किया। ग्राम की सीमा तक उनको पहुंचाने गया। और वापस राजमहल में आकर पत्नि से कहा हे प्रिये यह शरीर नश्वर है इसमें हमेशा काम क्रोध, लोभ, मोह आदि विकार उत्पन्न होते रहते हैं। वात, पित्त, कफ से भरा हुआ रोग से ग्रसित होकर कब नष्ट हो जाए इसका कोई निश्चय नहीं है। इसलिये बचा हुआ शेष जीवन संसार से विरक्त होकर तपोवन में जाकर तपस्या के द्वारा शरीर का परित्याग कर देना ही सर्वोत्तम होगा। पति के ज्ञान पूर्ण वचनों को सुनकर रानी ने भी अपने अंतकरण में विचार किया और कहा पति के जाने पर मुझे यहां रहकर क्या करना है।
जो स्त्रियां पति के बिना बहू के आधीन रहती हैं। वे अपने ही घर में नौकर के समान जीवन बिताती हैं। तथा कुत्ते के समान प्राप्त भोजन करती हैं पति ही परमेश्वर के समान रक्षक और सुखदाता होता है। इसलिये मैं भी पति का अनुसरण करके उन्हीं की सेवा में शरीर का परित्याग कर दूंगी। पत्नि की ऐसी इच्छा को देख राजा ने अपने पुत्र का राजतिलक करके राज्य का भार सौंपकर तपोवन में पत्नि सहित जाकर तपस्या में लीन हो गया। पत्नि भी पति की सेवा करते हुए भगवान की आराधना में लिप्त होकर दोनों ने कुछ दिनों बाद शरीर का परित्याग कर अनंत मोक्ष को प्राप्त किया।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
बृहन्नारदीय पद्याधारे अठ्ठाविंशतितमोऽध्यायः समाप्त
(२८)
॥ शुभमभवतु ॥
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