Adhik mass ki Katha 26 adhyaya | अधिक मास की कथा 26वा अध्याय
॥ अथ षड्विंशतितमोऽध्यायः प्रारंभः ॥
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
श्री भगवान नारायण नारदजी से, सूतजी शौनकादि ऋषियों से और भगवान विष्णु लक्ष्मी जी से कहते हैं। हे लक्ष्मी! अब मैं तुमसे अधिक मास के उद्यापन की विधिपूर्वक कहता हूँ तुम एकाग्रचित्त से सुनो। अधिक मास में नियम व्रत अखंडदीप और मौन व्रतधारण आदि के साथ नित्य भगवान पुरुषोत्तम का पूजन अपनी शक्ति के अनुसार अनेक प्रकार के दान कर्म करते हुए भगवान स्मरण भजन कीर्तन गीता भागवत का श्रवण करते हुए संपूर्ण मास को श्रद्धापूर्वक व्यतीत करना चाहिए, अंत में उद्यापन करना आवश्यक है। उद्यापन के लिये अधिक मास की अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या ये चार तिथियां मुख्य हैं। इन तिथियों में जिसको जिस तिथि में उद्यापन करना सोयस्कर हो। अपनी इच्छा से उस तिथि में करना चाहिए।
उसका विधान इस प्रकार है उद्यापन के एक दिन पहले पूजन हवन करने के लिये सात्विक और कर्मकांडी ब्राह्मण को तथा भोजन के निमित्त अपनी श्रद्धा और शक्ति के अनुसार निश्चित संख्या में आमंत्रित कर देना चाहिए। उद्यापन के दिन प्रातः काल उठकर शौचक्रम दंत मुख मार्जन करके शुद्ध जल से स्नान करके शुद्ध वस्त्रों को धारण करके नित्य नैमित्तिक संध्या वंदन कर्म करके कर्मकांडी ब्राह्मण के विधान से भगवान पुरुषोत्तम का पूजन श्रद्धापूर्वक करना चाहिए। पूजन के स्थान और भगवान के मंडप को तोरण अनेक ऋतु में उत्पन्न फूलमाला और अनेक वस्त्रों की ध्वजा पताकाओं से सुसज्जित करना चाहिए। मंडप के स्थान को गोबर से लीपकर (रंगवल्ली) रांगोड़ी से चौकपूरकर उसपर चौरंग रखकर नया सफेद वस्त्र बिछाकर चावल आदि धान्य से सर्वतोभद्र मंडल बनाकर चारों दिशाओं में चार और बीच में प्रधान कलश को स्थापित करना चाहिए। अपनी शक्ति के अनुसार चांदी तांबा या पीतल के कलश होना चाहिए। उन कलशों में तीर्थों का अथवा गंगाजल अथवा शुद्ध जल भरकर पंचपल्लव सर्वौषधी डालकर वस्त्र से लिपटा हुआ नारियल के फल रखना चाहिए। उन कलशों में क्रम से संकर्षण, वासुदेव प्रद्युम्न अनिरुद्ध का आवाहन ध्यान करके मध्य में प्रधान कलश पर सुवर्ण की बनाई हुई राधा के सहित भगवान पुरुषोत्तम की मूर्ति को प्राणप्रतिष्ठा करके पाद्य अर्ध्य स्नान कराके स्थापित करे चारों कलशों में पाद्य अर्ध्य स्नान करावे।
श्रद्धा के सहित सभी देवताओं को यज्ञोपवीत चंदन गंध अक्षत पुष्प माला धूप दीप नैवेद्य अर्पण करे प्रधान देवता भगवान पुरुषोत्तम को पुरुषयोग्य वस्त्र अलंकार अंगूठी तथा राधाजी को स्त्रीयोग्य वस्त्र साड़ी, ब्लाऊज, श्रृंगार सामग्री, चूड़ी, टिकली, बिंदिया, महावर, कुंकू, सेंदुर, काजल, आईना, अत्तर सुगंधित तेल, आदि अर्पण करके धान्य, चावल, फल मेवा, आदि से ओटी भरे। उत्तम प्रकार के मिष्टान्न पक्वान्न मिठाई मेवा, फल के द्वारा सभी देवताओं को भोग लगावे। लौंग, इलायची, जायपत्री, कपूर से बनाया हुआ पान का बीड़ा अर्पण करके पांचों देवताओं के निमित्त घी के पांच दीपक प्रज्वलित करके दीपदान करे। यदि मनुष्य में द्रव्य की शक्ति हो तो चारों देवताओं के निमित्त चार ब्राह्मणों को जप का संकल्प देकर चारों देवताओं की प्रसन्नता के लिये जप करवावे। तांबे के पात्र में जल भरकर उसमें गंध अक्षत पुष्प डालकर अपनी जंघा मोड़कर अर्थात् घुटना टेककर (देव देव नमस्तुभ्यं) इस मंत्र के द्वारा सभी देवताओं को अर्ध्य देना चाहिए। श्रद्धापूर्वक देवताओं को नमस्कार करे। आचार्य ब्राह्मण का पूजन करके भगवान के स्तोत्र का पाठ भागवत पुराण आदि का श्रवण करना चाहिए।
भगवान को छत्र चामर आदि अर्पण करके सभी देवताओं की प्रसन्नता और व्रत की पूर्ति के लिये बेदी बनाकर अग्नि को स्थापित करके अग्नि का पूजन करके शुद्ध घी और हवन सामग्री के द्वारा आचार्य के कहे मंत्रो द्वारा हवन करना चाहिये। हवन पूर्ण होने पर पंचलोक पाल, दशदिक्पाल और क्षेत्रपाल के बलि का विधान करके अग्नि में नारियल में घी भरकर पूर्णाहुति देना चाहिए। अनंतर घी की पांच या सात दीप मालिका सजाकर प्रेममय श्रद्धा में विभोर होकर भगवान की आरती करके मंत्र पुष्पांजली अर्पण करें। सभी देवताओं को साष्टांग दंडवत नमस्कार समर्पित करे। आमंत्रित ब्राह्मणों को पत्नि के सहित पाद प्रक्षालन करवा के गंध अक्षत लगाकर उत्तम प्रकार की भोज्य सामग्री मिष्टान्न पक्वान्न फल दूध खीर के द्वारा भोजन कराकर अपनी शक्ति के अनुसार वस्त्र, दक्षिणा तांबूल पान सुपारी देकर प्रार्थना करें कि हे ब्राह्मणों मैंने अपनी शक्ति के अनुसार इस उद्यापन कर्म में आपकी सेवा में जो भी समर्पित किया उससे आप संतुष्ट होकर आशीर्वाद दें कि यह उद्यापन कर्म परिपूर्ण हुआ इस प्रकार का आशीर्वाद ब्राह्मणों से ग्रहण कर उनको विदा करे। हे लक्ष्मी उद्यापन की रात्रि में अनेक मांगलिक वाद्य संगीत गीत भजन करते हुए रात्रि जागरण करते हुए व्यतीत करना चाहिए। दूसरे दिन प्रातःकाल नित्य नैमित्तिक कर्म करके स्नान करे शुद्ध वस्त्रों को धारण करके संध्या वंदन नित्य पूजन करके सभी देवताओं का उत्तर पूजन करना चाहिए। नाम मंत्रों से आचार्य द्वारा हवन करे, तर्पण मार्जन और भगवान की आरती और मंत्र पुष्पांजली समर्पित करके साष्टांग दंडवत नमस्कार करके हांथ जोड़कर प्रार्थना करे।
हे देवाधिदेव पुरुषोत्तम मैंने अपनी शक्ति और श्रद्धा के अनुसार जो नियमव्रत धारण करते हुए यथाशक्ति उद्यापन कर्म किया उससे आपकी कृपा बनी रहे तथा मेरे मन में निरंतर आपके प्रति श्रद्धा और निष्ठा बनी रहे। इस प्रकार भगवान की प्रार्थना करके आवाहित देवताओं का आचार्य के मंत्रों द्वारा विसर्जन करे। आचार्य का पूजन करके पूर्णपात्र का दान भगवान की मूर्ति और पूजन के मंडल का दान संकल्प पूर्वक आचार्य को देवे। यदि शक्ति हो तो सुंदर सुशील पुष्ट शरीर वाली दुग्ध देने वाली बछड़े के सहित गौ का दान करना चाहिए। आचार्य को वस्त्र आभूषण पददान, तिलपात्र, घृतपात्र, जलपात्र, छाता, जूता, शंख, पंच, रत्न, सप्तधान्य, श्री मदभागवत का दान अपनी श्रद्धा और शक्ति के अनुसार द्रव्य का लोभ त्यागकर करना चाहिए।
हे लक्ष्मी श्रीमद भागवत के दान का बड़ा भारी माहात्म्य है। साक्षात भगवान पुरुषोत्तम के स्वरूप का दान कहलाता है। हजार कन्यादान सैकड़ों बाजपेय यज्ञ करने से तथा अनाज से परिपूर्ण क्षेत्र का दान और अनेक तुलादान करने से जिस पुण्य की प्राप्ति होती है उससे हजार गुणा पुण्य की प्राप्ति श्री मद भागवत का दान करने वाले को प्राप्त होती है।
कांसे के अथवा तांबे, पीतल के पात्र में तैंतीस मालपुआ या अनरसा रखकर कपड़े से ढांककर व्रत की संपूर्णता प्राप्त करने के लिये आचार्य को संकल्प पूर्वक दान करना चाहिए। इस अपूप दान से अधिक मास के व्रत नियम की पूर्णता प्राप्त होती है। इसलिये अपूप दान अवश्य करना चाहिए। अगर मालपुआ, अनरसा बनाने का साधन न हो तो इसको बनाने की कच्ची सामग्री का दान करना चाहिए। ब्राह्मण को ही भगवान का स्वरूप मानकर उत्तम प्रकार के खाद्य सामग्री मिष्टान्न मेवा फल आदि का भोजन कराके पान सुपारी लौंग इलायची देकर उपरोक्त वस्तुओं का यथा शक्ति दान देवे। श्री कृष्णार्पण मस्तु ऐसा कहकर हांथ में जल दक्षिणा लेकर ब्राह्मण के हांथ में छोड़ देवे। मंत्रहीनं क्रियाहीनं और यस्यस्मृत्या इस मंत्र के द्वारा पुरुषोत्तम भगवान की वंदना करके आचार्य ब्राह्मण को विदा करके स्वयं प्रसाद और भोजन को ग्रहण करे। अपनी शक्ति के अनुसार गरीबों को भिक्षार्थियों को भोजन या अन्नदान देवे। यदि कोई मनुष्य अष्टमी या नवमी को उद्यापन करना चाहें उनको उद्यापन के बाद भी अमावस तक नित्यप्रति की तरह पूजन करते रहना चाहिए। और अमावस की रात्रि को मांगलिक वाद्य संगीत भजन कीर्तन करते हुए रात्रि जागरण करके दूसरे दिन आचार्य के द्वारा उत्तर पूजन का विधान करके विसर्जन कराके आचार्य का पूजन भोजन और दान योग्य सामग्रियों का दान भगवान से क्षमा याचना आदि उपरोक्त विधान से कर्म करके यथा शक्ति दक्षिणा और जल हांथ में लेकर श्री कृष्णार्पण मस्तु कहकर ब्राह्मण के हांथ में जल छोड़कर आशीर्वाद ग्रहण करके ब्राह्मण को विदा करके स्वंय प्रसाद और भोजन ग्रहण करे। हे लक्ष्मी इस प्रकार विधान पूर्वक जो मनुष्य अथवा स्त्री अधिक मास का उद्यापन कर्म करेंगे, वे सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्त होकर दुःख दारिद्रय और जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्त होकर सुख, शांति, संपत्ति, संतति, यश, कीर्ति, धनधान्य से संपन्न होकर सांसारिक जीवन व्यतीत करके अंत में अक्षय पद अर्थात् चौरासी लक्ष योनियों में भ्रमण की बाधा से मुक्त होकर अनंत में लीन होकर मोक्ष को प्राप्त होंगे।
जै जै श्री अधिकमास माहात्म्य सार
बृहन्नारदीय पद्माधारे षड्विंशतितमोऽध्यायः समाप्त
(२६)
॥ शुभमभवतु ॥
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